Quantcast
Channel: समालोचन
Viewing all 1573 articles
Browse latest View live

कथा- गाथा : पिता- राष्ट्रपिता : राकेश मिश्र

$
0
0

























जिसके चिंतन और कर्म के केंद्र में सबसे अंतिम व्यक्ति है उसे क्रांतिकारी नहीं माना गया. जो यह कहता था कि अगर मेरा पुनर्जन्म हो तो किसी दलित के घर हो उसे दलित विरोधी समझा गया. जो आजीवन एक आदर्श हिन्दूकी तरह जीवन व्यतीत करता रहा और मरते वक्त भी जिसके मुंह से रामनिकला उसे हिन्दू द्वेषी कहा गया.

गांधी को लेकर अतिवाद की परिणति उनकी हत्या में हुई. आज  भी उनके विचारों को विकृत कर उन्हें धूमिल करने  की संगठित कोशिशें जारी हैं.

युवा कथाकार राकेश मिश्र की कहानी पिता से राष्ट्रपिता तक जाती है.    



पिता-राष्‍ट्रपिता                            
राकेश मिश्र



लाहाबाद तीसरी जगह थीजहाँ राकेश भाई ने मुझे बुलाया था. बुलाया क्‍या,बुलवाया था. बाक़ायदा ए. सी. द्वितीय श्रेणी का रेल किराया और तीन हजा़र रुपये मानधन के साथ. स्‍थानीय आतिथ्‍य की व्‍यवस्‍था तो आमन्‍त्रण भेजने वाली संस्‍था को करनी ही थी. राकेश भाई कम्‍युनिस्‍ट थे और फिलहाल सरकार द्वारा पोषित और संरक्षित एक गाँधीवादी संस्‍था के निदेशक थे. मैं दलित था और अभी नया-नया एक कॉलेज में गाँधी विचार पढ़ाने के लिए व्‍याख्‍याता नियुक्‍त हुआ था.

साल भर पहले ही उनसे मेरी मुलाकात हुई थी. हिन्‍द-स्‍वराज के शताब्‍दी वर्ष में मेरे कॉलेज ने यू. जी.सी. के अनुदान से एक सेमिनार आयोजित किया था. गाँधीवादी संस्‍था के निदेशक होने के नाते राकेश भाई उसमें बतौर मुख्‍य अतिथि आमंत्रित थे. गाँधी विचार का व्‍याख्‍याता होने के नाते मैंने भी उस सेमिनार में अपना परचा पढ़ा था. चूँकि वह मेरी कक्षा नहीं थी जहाँ पाठ्यक्रम की बारिश में गाँधीजी के रचनात्‍मक कार्यक्रम का गुणगान मेरी मजबूरी हो. लिहाजा़ मैंने गाँधीजी के हरिजन उद्धार और अस्‍पृश्‍यता निवारण जैसे कार्यक्रमों का खूब मजा़क उडा़या. मेरी नियुक्ति के बाद यह मेरा पहला अवसर था जहाँ मैं खुलकर अपनी बात कह पा रहा था इसलिए मैंने बाबासाहेब के हवाले से गाँधीजी के तमाम ऐसे क्रियाकलापों को उनकी हिप्‍पोक्रेसी और यथास्थितिवाद के पोषक के तौर पर स्‍थापित किया. मेरे परचे में मेरी तमाम स्‍थापनाओं के समर्थन में सन्‍दर्भ थे. उन सन्‍दर्भों की एक संरचना थी,उनकी विश्‍वसनीयता थी,इ‍सलिए मेरे विभागाध्‍यक्ष की रोषपूर्ण दृष्टि भी मेरे समर्थन में बजनेवाली तालियों को रोक नहीं पायी.

अन्‍त तक आते-आते मैंने हिन्‍द स्‍वराज की प्रासंगिकता पर ही सवाल उठा दिया कि जिस किताब में दलित-समस्‍या पर एक भी सवाल-जवाब नहीं हो,उस किताब को आखि़र इतनी तवज्‍जो क्‍यों दी जा रही है. क्‍यों इसे  गाँधीजी के सपनों के भारत का घोषणापत्र कहा जा रहा है ! क्‍या  गाँधीजी के सपनों के  भारत  में दलितों के लिए कोई जगह नहीं होनी थी.

अपना परचा समाप्‍त कर अपने विभागाध्‍यक्ष से नज़रें चुराता हुआ जब मैं अपनी सीट की तरफ़ बढ़ा रहा था, तो राकेश भाई ने मंच से उठकर मेरी पीठ थपथपाई, मुझसे हाथ मिलाया और हाथ छोड़ते हुए उन्‍होंने अपने शरीर को ऐसा लोच दिया, मानो मेरे गले लग रहे हों. फिर अपने अध्‍यक्षीय सम्‍बोधन में उन्‍होंने अपनी बातचीत का अधिकांश हिस्‍सा मेरे परचे के ही इर्द-गिर्द रखा. उन्‍होंने मेरे नज़रिये की जो़रदार तारीफ़ की और इस बात पर जो़र दिया कि गाँधीजी को देवता मानकर उन्‍हें पूजने की जरुरत नहीं है  बल्कि एक इंसान के तौर पर उनकी खामियों,कमजो़रियों के साथ उनके मूल्‍यांकन की आवश्यकता है.

गाँधीजी की छठी औलाद मेरे विभागाध्‍यक्ष को यह सबकुछ नागवार लग रहा होगा,उनका वश चलता तो वे मुझे कब का बर्खास्‍त कर चुके होते और राकेश भाई को धक्‍के मारकर मंच से उतार चुके होते लेकिन वे सरकार द्वारा पोषित और संरक्षित एक संस्‍था के निदेशक थे और चूँकि उन्‍होंने मेरी पुरजो़र तारीफ़ की थी, इसलिए मजबूरन मेरे विभागाध्‍यक्ष को इस बात पर गर्वित होना पड़ा कि उनके विभाग में मेरे जैसे हीरा अस्तित्‍वमान है,लगे हाथों उन्‍होंने इसी त्‍वरा में राकेश भाई की भी तारीफ़ कर डाली कि आखि़र हीरे की पहचान तो जौहरी को ही होती है.

कार्यक्रम ख़त्‍म होने के बाद राकेश भाई ने मुझसे बेतकल्‍लुफ़ होते हुए इस हीरे और जौहरी की जुगलबंदी पर जोरदार ठहाका लगाया. मैं उन्‍हें सरका सम्‍बोधन दे रहा था लेकिन उन्‍होंने फिर ठहाका लगाते हुए कहा कि वह सिर्फ़ अपने सरऔर 'पैर'से जाने जाएं ऐसा नहीं चाहते. बल्कि उनके प्रति किये जा रहे सम्‍बोधन में उनका पूरा वजूददिखना चाहिए. उन्‍होंने ही बताया कि पहले कामरेडकहने से उनका यह मक़सद हल हो जाता था लेकिन इस संस्‍था में नियुक्‍त होने के बाद से उनको खुद ही यह सम्‍बोधन अटपटा लगने लगा. थोड़ी देर रुककर खु़द ही उन्‍होंने कहा- यदि कहना ही है तो उन्‍हें राकेश भाई कहा जाय,इससे उन्‍हें बेहतर महसूस होगा. मेरी और उनकी उम्र में तक़रीबन तीस-पैंतीस वर्ष का फ़ासला था. एक दो बार भाईके सम्‍बोधन में मुझे थोड़ा अटपटा-सा लगा. लेकिन उनकी स्वाभाविकता से जल्‍द ही मैं इसका अभ्‍यस्‍त हो गया.

इसके बाद उन्‍होंने मेरे मराठी-भाषी होकर अच्‍छी हिन्‍दी बोलने पर आश्‍चर्य जताया,जिसके जवाब में मैने उन्‍हें बताया कि ग़रीबी के कारण मेरी पढ़ाई-लिखाई एक राजस्‍थानी सेठ के खैराती स्‍कूल और कॉलेज में हुई है,जिसका माध्‍यम हिन्‍दी था. फिर उन्‍होंने मेरे टाइटल सपकालेके बारे में जानना चाहा,जिसकी व्‍याख्‍या करते हुए मैं थोड़ा स्‍याणाबन गया. मैंने उन्‍हें बताया कि दर असल यह मेरे कुल का नाम है और बाबा साहेब डॉ. अम्‍बेडकर का भी यही कुलनाम है.

ओहो........ तो ये बात है मैं डॉ. अम्‍बेडकर के किसी वंशज से मुख़ातिब हूँ ! कहते हुए उन्‍होंने फिर एक जोरदार ठहाका लगाया. उन्‍होंने बताया कि इतना तो वे जानते थे कि अम्‍बेडकरटाइटिल बाबा  साहेब को उनके एक ब्राम्‍हण अध्‍यापक ने दी थी लेकिन वे सपकाले नहीं होकर सलपाले थे,  लेकिन बाबा साहेब का वंशज होने से जिस गर्व और विशिष्‍टता'की अनुभूति मुझे हो रही थी,उसे मैं सत्‍यऔर ज्ञान के दबाव से व्‍यर्थ ही खोना नहीं चाह रहा था.

उस कार्यक्रम के बाद तो जैसे हमारी जोड़ी ही बन गयी. हिन्‍द स्‍वराज के उस शताब्‍दी वर्ष में देश भर में कार्यक्रम होने थे और अधिकांश जगहों पर राकेश भाई को मुख्‍य अतिथि बनना था,अध्‍यक्षता करनी थी,और उन अधिकांश जगहों पर उन्‍होंने मुझे भी बुलाये जाने की सिफ़ारिश की. मैं भी न सिर्फ हिन्‍द स्‍वराज बल्कि गाँधीजी की लिखी तमाम किताबों,आलेखों भाषणों से छाँट-छाँट कर उनसे हिप्‍पोक्रेसी और वर्णाश्रम समर्थक वक्‍तव्‍य छाँटता रहा,और हर सेमिनार में पहले से ज्‍या़दा आक्रामक और तल्‍ख होता गया. राकेश भाई को हर बार मेरी सिफ़ारिश पर गर्व होता था. 

गुजरात में तो जब मैंने गाँधीजी की आत्‍मकथा के हवाले  से  उनकी  भोजन सम्‍बन्‍धी  शुचिता और सबक्र का माखौल उडा़या,और यह स्‍थापित किया कि जिस देश का इतना बड़ा भाग मरे हुए जानवर का मांस खाने को अभिशप्‍त था,वहाँ शाकाहार और अन्‍नाहार का ऐसा सात्विक आग्रह एक क्रूर अभिजात्‍यता और अश्‍लील पाखंड के अलावा कुछ नहीं,तो राकेश भाई अश-अश कर उठे थे. मेरे यह कहने पर कि वास्‍तव में गाँधी जी की आत्‍मकथा का शीर्षक सत्‍य के साथ मेरे प्रयोगन होकर भोजन के साथ मेरे प्रयोगहोना चाहिए था तो सेमिनार के बाद गहरे आवेश और आवेग में वे बहुत देर तक मेरा हाथ थामे रहे- 


‘‘पार्टनर, अब तो हमारी पार्टी, उस का़बिल नहीं रही,लेकिन सोवियत संघ वाले ज़माने में यदि तुम मुझे मिलते तो ....... आज दुनिया देखती. एक हताश और आर्द्र-सी उनकी आवाज़ थी.  अभी तो पार्टी में जाना जैसे खु़द को डम्‍प कर लेना है. अब तो हम जैसे लोग भी अपने होने को यहीं 'भोजन के प्रयोगों'में ही तलाशते हैं .’’ 

कहते हुए उन्‍होंने वही अपना पुराना लेकिन असरकारक जो़रदार ठहाका लगाया जिसकी गर्मी में उनके अफ़सोस की आर्द्रता वाष्‍प बनकर उड़ गयी. और अब यह इलाहाबाद था जहाँ मैं गाँधी जी जैसे सनातनी हिन्‍दू के धर्मनिरपेक्ष और समतामूलक राष्‍ट्रपिता होने की अवधारणा पर सवाल उठाने आया था. मैने फोन पर अपने  भाषण की रुपरेखा राकेश भाई को समझा दी थी,और वेवह इस संगोष्‍ठी के हँगामेदार होने को लकर आश्‍वस्‍त थे. जब मैने फोन पर उनको अपने पर्चे का यह अंश पढ़कर सुनाया था कि यदि किसी दुरभिसन्धि के फलस्‍वरुप गाँधीजी को राष्‍ट्रपिताकहना हमारी मजबूरी ही हो जाय तो मैं माँ के रुप में समादृत इस राष्‍ट्र की हत्‍या ही कर देना उपयुक्‍त समझूँगा. तो राकेश भाई की एक की एक चिहुँकती –सी आवाज आयी थी, ‘आग लगा दोगे! जल्‍दी आओ.

मेरे इलाहाबाद पहुँचने से पहले ही राकेश भाई वहाँ मौजूद थे. बल्कि मैं ट्रेन के लेट हो जाने के कारण लगभग चार-साढ़े चार बजे सुबह गेस्‍ट हाउस पहुँचा और अब सोउुँ की उधेड़बुन में ही था कि राकेश भाई मेरे कमरे में थे . ‘‘अरे मैं तो डर ही गया था कि कहीं ट्रेन इतनी लेट न हो जाय कि .......’’

“आग लगने से पहले ही बुझ जाय’’,कहकर  मैंने उनकी ताल से ताल मिलायी और एक जोरदार ठहाके तथा एक प्‍यारी धौल से लगभग अँकवार में भरकर उन्‍होंने मेरे स्‍वागत किया.

‘‘चलों,अब क्‍या सो पाओगे ....... चलकर कहीं चाय-वाय देखा जाय,फिर जल्‍दी से तैयार भी होना होगा. सेमिनार दस बजे से ही है .’’कहकर उन्‍होंने घड़ी को ऐसे देखा,मानो न जाने वह अब दस बजा ही दे कमबख्‍त़.

वह नवम्‍बर की गुनगुनी-सी सुबह थी,इलाहाबाद की सड़कों पर अभी उजाला पूरी तरह पसरा नहीं था,और सिविल लाइंस के चायवालों की नींद अभी तक खुली  नहीं थी,सिवा एक दुकान के. जहाँ की अँगीठी से उठते धुएँ से दुकान खुल चुकने का अन्‍दाजा़ लगाते हम वहाँ पहुँचे थे. वहाँ पचास-बावन साल का एक अनुभवी दस-बारह साल के बच्‍चे को अँगीठी में कोयाला ठीक से डालने की नसीहत दे रहा था,और वह बच्‍चा उसकी सलाह से आजिज़-सा आकर ताबड़-तोड़ पंखा झल रहा था. हमें दुकान में आया देख वह शख्‍स़ तपाक से खड़ा हो गया और ओस में भीगे बेंच को कपड़े से पोंछता हुआ बाला, ‘‘आइए साह‍ब ! बस थोड़ी ही देर में चाय हुआ चाहती है.’’

चाय के साथ  साथ हुआ चाहती हैके प्रयोग ने हम दोनों को जैसे ठिठका दिया. यह महसूस करते हुए भी कि अभी अँगीठी सुलगने में काफ़ी देर है,हम दोनों उसके अदब और लहजे के  लिहाज़ में बेंच पर बैठ गये.

वातावरण में हल्‍की ठंड थी और चाय बनने में काफ़ी देर. यदि अँगीठी सुलग रही होती तो उसके पास थोड़ी देर बैठने में आनन्‍द आ जाता. हमें बेंच पर बैठाकर वह शख्स फिर से अँगीठी ठीक से कैसे सुलगाई जाती है,पर टिक गया और जवाब में वह बच्‍चा और जोर-जोर से पंखा झलने लगा.

हम  उसकी ओर से ध्‍यान हटाकर फिर अपनी बातचीत का सिरा पकड़ने की कोशिश में लग गये. राकेश भाई के अनुसार इस संगोष्‍ठी में का़फी सर फुटव्‍वल होने की सम्‍भावना थी क्‍योंकि इसमें गाँधी-गाँधी जपने वाले कई उद्भट कि़स्‍म के विद्वान आमंत्रित थें. उनमें एक की ख्‍याति तो ऐसी थी कि उसने एक सभा में गाँधी जी के खिलाफ बोलने वाले की कान ही चबा डाला था और बाद में इस बात पर आश्‍वस्‍त भी था कि उसने हिंसा भी गाँधीवादी तौर-तरीके़ से ही की थी.

‘‘देखना कहीं तुम उसकी ब़गल में ही नही बैठ जाना,नहीं तो इस बार वह तुम्‍हारी नाक पर हमला न कर बैठे .’’राकेश भाई ने चिन्‍ता मिश्रित शरारत से कहा.

‘‘आप निश्चिन्त रहें.’’कहते हुए मैंने एक सिगरेट सुलगा ली. जब उनकी ही नाक कट जाएगी,तो वे क्‍या खाकर नाक पर हमला करेंगे.’’कुछ राकेश भाई की बेतकल्‍लुफी और कुछ मेरे भीतर पनप रहे नये आत्‍मविश्‍वास ने मुझे इतना बेपरवाह बना दिया था कि मैं सिगरेट के धुएँ की दिशा से लापरवाह रहूँ .

राकेश भाई बहुत संजीदगी से मेरे पर्चे के सन्‍दर्भों को समझना चाह रहे थे ताकि मेरा भाषण कोरी ल़प्‍फाजी़ न रह जाय. वे बार-बार इस बात पर भी जो़र दे रहे थे कि यह इलाहाबाद है और यहाँ से गुज़रते वक्‍त मिर्जा़ गा़लिब को भी पसीने छूट गये थे. मैं बड़े आत्‍मविश्‍वास से धुआँ उड़ाता हुआ,सिगरेट की राख झाड़ता हुआ,उन्‍हें मुतमईन कर रहा था कि इस बार की हमारी जुगलबन्‍दी गाँधीवादियों की आत्‍मा तक को कँपा डालेगी.

अपनी धुनक में हम उस अधेड़ से दिखनेवाले चायवाले और उसकी भाषा की नजा़कत को लगभग भूल चुके थे. तभी लगभग ख़लल डालने के से अन्‍दाज़ में उसकी आवाज़ आयी – भाई साहब ! बुरा न मानें तो एक बात कहूँ .’’

हम लोग जिस तरह की बातचीत में थे,उसमें इस तरह का सवाल बुरा मानने वाली ही बात थी,लेकिन राकेश भाई अपनी ट्रेनिंग के कारण अनायास बोल पड़े  ‘‘हीं. बोलो भाई. बातों से क्‍या बुरा मानना.’’ 

मेरा ध्‍यान इस पर भी गया कि वह काफी देर से हमारे सर पर खड़ा होकर हमारी बातें सुन रहा था और यह तो निहायत बुरा मानने वाली बात थी. मैंने एक आजिज़ और उचटती-सी नज़र उस पर डाली. मैंने भरसक अपनी मुद्रा ऐसी रखने की कोशिश की कि उसे ख़ुद बुरा लग जाए. लेकिन राकेश भाई के हौसले से उसे राह मिल चु‍की थी. वह इत्‍मीनान से हमारे सामनेवाली बेंच को अपने  अँगोछे से साफ़ करता हुआ राकेश भाई से मुखा़तिब हुआ, ‘भाई साहब !  आजकल के लौंडे अपने पद और रुतबे के आगे बुज़ुर्गियत और अनुभव को कोई तरजी़ह ही नहीं देते.’’

मेरे लौ सुर्ख हो उठे. राकेश भाई भी ऐसी किसी टिप्‍पणी के लिए तैयार नहीं थे. लेकिन बुरा न मानने का यकीन वे पहले ही दिला चुके थे इसलिए मेरी तरफ़ एक लाचार मुस्‍कान उछालते हुए वे चुप ही रहे. मैंने गौ़र किया कि सिर्फ़ एक लौंडा़ शब्‍द ही भदेस था,नहीं तो भाषा की समूची संरचना परिष्‍कृत और तहजी़बियत लिये थी. शायद उसने मेरी नाराज़गी की भंगिमा भाँपते हुए जानबूझकर मुझे चोट पहुँचाने के लिए लौंडे शब्‍द का इस्‍तेमाल किया था. वह यह जान भी गया था शायद इसलिए चोट पर मरहम रखने की कोशिश –सा करता बोला

‘‘यह मैं आप लोगों के लिए नहीं कह रहा हूँ. अब देखिये न,मैं कई वर्षों से इस लौंडे को अँगीठी सही तरीके़ से सुलगाने की तरकी़ब सुझा रहा हूँ,लेकिन क्‍या मजाल कि वह कोयला ठीक तरीके़ से जमा ले.  जवान को अपनी ही ताक़त पर यकी़न है कि खू़ब जो़र से पंखा झलेंगे तो जैसे अँगीठी अपने आप सही तरीक़े से सुलग जाएगी."  उसने सायास उस पंखा झलते बच्‍चे को भी बातचीत की ज़द में लपेटना चाहा,लेकिन उसने एक उपेक्षित सी मुस्‍कान के अलावा उसे कोई तवज्‍जो नहीं दी,बल्कि हमने गौ़र किया कि उसकी बात सुनकर वह दुगने वेग से पंखा झलने लगा. उस लड़के की उपेक्षा का उस आदमी पर कुछ खा़स असर नहीं हुआ, बल्कि जैसे वह उधर से निश्चित होकर पूरी तरह हमींसे मुखातिब हो गया- ‘‘सिर्फ़ इसी लड़के की बात क्‍यों !’’ 

"जब हम भी गदहपचीसी में थे,तो कहाँ किसी को अपने आगे लगाते थे. किसी को क्‍यों हमने तो अपने बाप तक को कभी अपने पुट्ठे पर हाथ नहीं धरने दिया .’’

हम समझ गये कि यह अ‍ब अपनी राम कहानी सुनाने के मूड में आ चुका है,लेकिन हम उसे झेलने को तेयार नहीं थे. राकेश भाई ने उसे निरुत्‍साहित करते हुए और उसकी औका़त की याद दिलाते हुए टोका,

‘‘देखना,जरा चाय जल्‍दी मिल जाय.’’  

उसने इस टोकने का ज़रा भी नोटिस नहीं लिया,बल्कि धुआँती अँगीठी की ओर देखकर दार्शनिक भाव से मुस्‍कराया, ‘‘जल्‍दी तो साहब,साहबजा़दों को रहती है. आप तो काफ़ी इल्‍मवान  दिखाई देते हैं .’’

मुझे लगा कि वह जानबूझकर मुझे खिजा रहा है,नहीं तो फिर से वही राग छेड़ने की क्‍या  जरुरत थी. शायद मेरे किसी ओवर कांफिडेंटवाक्‍य ने उसे मुझसे रुष्‍ट कर दिया था. मैंने उसके आहत अहम को लगभग सहलाते हुए कहा – ‘‘कोई बात नहीं. हम आराम से हैं,आप इत्‍मीनान से चाय बनाइए.’’ लेकिन मेरी बात का जैसे उसपर उलटा असर हुआ, ‘‘वैसे बाबू ! आप इत्‍मीनान की  बात कर रहे हैं,जरुर लेकिन वह चेहरे पर दिखाई नहीं दे रहा,बल्कि साहब जल्‍दी की बात किये जरुर लेकिन निश्चिंत है कि पहले अँगीठी सुलगेगी,तभी तो चाय बनेगी. 

उसकी इस ढिठाई पर हमारी सुलग रही थी,लेकिन वह कोई ऐसी खुली बदतमीजी़ भी नहीं कर रहा था कि सीधे-सीधे वहाँ से उठ  लिया जाय. हमारे सुलगने से बेपरवाह वह जारी था- ये बात होती है,अनुभव की. अनुभव हमेशा जोश पर भारी पड़ता है. जैसे अब मेरा ही देखिए अपने अनुभव के दम पर मैं बता सकता हूँ कि बाबू आप कोई बडे़ अफ़सर होंगे .’’  उसने मुझे इंगित करते हुए कहा, ‘‘और साहब आप इनके मातहत तो नहीं लेकिन ओहदे  में छोटे होंगे.’’ राकेश भाई को देखते हुए उसने मंतव्‍य दिया.

पहले ही वाक्‍य से उसके अनुभव की पोल खुल गयी थी. उसका सारा अनुमान सम्‍भवतः हमारे पहने हुए कपड़ो से संचालित था. मैं ट्रेन से सीधे चाय दुकान पर था. इसलिए याञा के तैयार कपडो़ में अपटुडेट. जबकि राकेश भाई अपने रात के कपडो़ में पाजामा कमीज़ पहने थे. उसके अललटप्‍पू अनुमान और अनुभवी होने के दावे पर हम दोनों ज़रा खुलकर हँसे. और शायद राकेश भाई को अपने छोटे ओहदे वाली बात सुनकर मजा़ भी आ गया था. इस सस्‍पेंस को बाद में खोलने के इरादे से उन्‍होंने जैसे उसे चढ़ाया ‘‘बहुत ठीक अनुमान लगाये हो. और क्‍या बताता है तुम्‍हारा अनुभव. वैसे हमारा अनुभव कहता है कि तुम इधर के हो नहीं और यह धन्‍धा भी तुम्‍हारा बहुत पुराना नहीं है .’’       

‘‘अरे ! क्‍या बात पकड़ी है साहब,आपने. आखि़र इसी को तो अनुभव कहते हैं. बाबू तो हमको निरा चाय वाला ही समझ रहे होंगे .’’ 
मुझ पर अपने हमले में वह कोई कमी नहीं होने दे रहा था. मैं समझ गया कि मेरे कुछ और बोलने पर वह कुछ ज्‍या़दा ही तल्‍ख टिप्‍पणी करेगा इसलिए इस बार केवल मुस्‍कराकर रह गया.

मेरे मुस्‍कराने को जैसे उसने अपनी हेठी समझा. एकदम अकड़कर बोला, ‘‘म फौज में थे साहब. असम राइफल्‍स. 36 बटालियन.’’  

‘‘उत्‍तर प्रदेश का आदमी,असम राइफल्‍स में. अच्‍छा. ’’मेरे मुँह से अनायास निकल गया.

‘‘वही तो आप तुरन्‍त शक कर रहे होंगे कि मैं यूँ ही हाँक रहा हूँ. लेकिन बाबू वह ज़माना दूसरा था,उस समय ऐसी कोई बात नहीं थी कि कोई दूसरे राज्‍य की यूनिट में भरती नहीं हो सकता.’’   

‘‘अब भी ऐसी कोई बात नहीं है. भारत का कोई भी नागरिक किसी भी रेजिमेंट या बटालियन में जा सकता है.’’  राकेश भाई ने अपने ज्ञान से उसे दुरुस्‍त किया.

तब उसने मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे मेरे अनुभवहीन होने की बात उसने कितनी सटीक कही थी ‘‘तो साहब,जैसे कि मैंने पहले बताया था, अपने बाप तक को कभी अपने आगे नहीं लगाया था,तो बाप से मेरी बनती नहीं थी! वो पक्‍का बनिया आदमी था साहब! यहीं इलाहाबाद में, कर्नलगंज में उसकी  किराने की बड़ी-सी दुकान थी. तेल का भी अच्‍छा कारोबार था,आज भी आप कर्नलगंज में पीपा सेठके बारे में पूछेंगे,तो लोग उनकी कंजूसी और काइयाँगिरी के कि़स्‍से  सुनाने लगेंगे.’’बाप का जि़क्र करते हुए उसका चेहरा वाक़ई कसैला हो गया था.

"तो साहब,अम्‍मा तो थीं नहीं और बाप थे कसाई,हमें भी अपने जैसा बनाना चाहते थे कसाई,हमे भी अपने जैसा बनना चाहते थे,तो एक दिन हमने भी बता दिया कि हम भी उन्‍हीं के लड़के हैं. गल्‍ले से सारा रुपया उठाया और स्‍टेशन पर पहली गाड़ी जहाँ की मिली,वहाँ नौ दो ग्‍यारह ."  

"तो कहाँ  की थी,पहली गाडी़.’’  उसके बताने के अन्‍दाज़ में मुझे भी रस आने लगा था. पहली बार उसने मेरे टोकने का कोई बुरा नहीं माना.

‘‘कलकत्‍ता की थी बाबू . और यदि जेब में पैसा हो तो कलकते का मजा़ तो पूछिये ही मत ! और यदि जेब में पैसा हो तो कलकते की रौनक़ कुछ कम नहीं थी. वहीं एक होटल में बैरे का काम पकड़ लिया,और अपनी  जिन्‍दगी अपने हाथ से लुटाने लायक़ बने रहे.’’   

‘‘लेकिन फिर फौज में.मेरी   जिज्ञासा बढ़ गयी थी. लेकिन इस बार मेरी बेसब्री उसे थोड़ी खल गयी. उसने फिर मेरे युवा होने को मेरी बेसब्री का मूल माना,और छोटे-से क्षेपक के बाद फिर जैसे मेरी जिज्ञासा शान्‍त करते हुए बोला- ‘‘उस समय बाबू,नौकरी की ऐसी मारा-मारी नहीं थी. भगवान की दया से मेरा अभी का शरीर तो आप देख ही रहे हैं,उस समय तो,माशा अल्‍लाह हम फूटते हुए गबरु जवान थे. खड़े हुए,दौडे़ और जैसे ही सीना फुलाकर माप देने लगे कि अफसर ने लपककर सीने से भींच लिया – स्‍साले ..... . क्‍या खाकर सीना बनाया है तूने, 36 चाहिए,56 है स्‍साले .

‘‘तो साहब ! पता चला कि हम तो आ गये,असम राइफल्‍स में,रातों रात .’’    

‘‘वाह गुरु ! ये तो रातो-रात कि़स्‍सत पलटने वाली बात हुई.’’  मेरी इस बात पर उसने मुझे ऐसे देखा जैसे मैंने कितनी ओछी बात कह दी हो .

‘‘कि़स्‍सत बाबू मेरी कब खराब थी. होटल में बैरा मैं अपनी मर्जी़ से था. और फौ़ज में भी अपनी मर्जी से ही गया था. इसमें कि़स्‍मत को क्‍यों घसीट रहे हो.उसने लगभग डाँटते हुए मुझसे  कहा.

राकेश भाई को उसका यूँ तैश में आना कुछ अच्‍छा नहीं लगा,उन्‍होंने लगभग टालते हुए कहा, ‘‘चलो ठीक है,तो तुम फ़ौज से रिटायर होकर इस ठिकाने पर हो,तभी तुम्‍हारी भाषा इधर की नही लगती.’’ 

‘‘भाषा तो साहब ! मेरी किधर की भी नहीं लगेगी आपको. फ़ौज में तरह-तरह के लोग,तरह-तरह की उनकी बोली,तरह-तरह की उनकी आदतें ! अब जैसे मेरी आदत को ही लीजिए. इतना कडा़ अनुशासन या वहाँ.  सुबह-शाम परेड,फिजीकल, ड्रिल,लेकिन एक आदत हमारी छुटाये न छूटे-बीड़ी की आदत.’’ 

‘‘बीड़ी तो छुपकर पीने में बहुत मुश्किल होती होगी.’’मैने एक नयी सिगरेट सुलगाते हुए पूछा.

‘‘मुश्किल किस बात में नहीं होती है बाबू. ग़रीब आदमी को तो हर बात में मुश्किल है.’’वह अनायास दार्शनिक हो उठा. ‘‘ऐश तो बड़े आदमियों की ही है,आप जैसे बड़े अफ़सरों की है.’’  

मेंरे बारे में किसी खा़स सूचना के बिना ही वह मुझ पर हमलावर था. "अब आप कितने आराम से सिगरेट फूँक रहे हैं जबकि साहब आपके पिता के उम्र के होंगे,लेकिन ये आपको कुछ नहीं कह सकते,क्‍योंकि आप अफ़सर हैं .’’            

उसका यह हमला इतना बेलौस और अचानक था कि मैं पल भर में ही एक झेंपू स्थिति में पहुँच गया था. अपने हाथ में सिगरेट थामें मैंने एक लाचार और लगभग कातर दृष्टि से राकेश भाई को देखा. राकेश भाई को लगा कि कहीं मैं उसके नैतिक हमले के दबाव में सिगरेट कुचल ही न दूँ,इसलिए उन्‍होंने हाथ बढ़ाकर मेरी उँगलियों से सिगरेट निकाल ली और मुट्ठी बंद कर एक जो़र का सुट्टा खींचकर फिर मेरी ओर बढ़ा दी. मैंने कभी उनको सिगरेट पीते नहीं देखा था,लेकिन अपने अनुभव से उन्‍होंने एक झटके में मुझे दुविधा से उबार लिया था. उनकी इस त्‍वरित कार्यवाही  पर वह धीमे से मुस्‍करा उठा- ‘‘ग़जब साहब. आपने यूँ ही धूप में बाल नहीं पकाये हैं. नहीं तो बाबू तो अभी शर्मिन्‍दा हो ही गये थे.वह खुलकर हँसा. उसकी हँसी मेरे गले में ख़राश बनकर उतर गयी.

‘‘तो साहब,परेशानी तो थी ही छुपकर बीड़ी पीने में,आखि़र मैं कोई अफ़सर तो था नहीं..... लेकिन जहाँ चाह वहाँ राह. ड्यूटी बाँटने वाला सूबेदार भी अपनी ही तरफ का था. बिहार का,गया जि़ले का.’’  

‘‘अच्‍छा, गया तो बहुत फेमस है बिहार में.राकेश भाई ने केवल बात पर एक ताल दी. लेकिन उसने उस ताल को अपनी बात में बात के लय में डुबो दिया.

‘‘तो बाबू हमने उससे कह सुनकर अपनी ड्यूटी लगवा ली थी गारद में ! गारद समझते हैं आप लोग.’’

‘‘अरे हाँ भाई ! खू़ब समझते हैं,गारद मतलब शास्‍त्रागार,जहाँ हथियार वगै़रह रखे जाते हैं.’’ राकेश भाई ने कहकर उसे विजेता के से अन्‍दाज में देखा. लेकिन वह तो जैसे उनसे पहले से ही पराजित था – ‘‘सही,एकदम सही साहब ! वही गारद होता है,और वहाँ चौबीस घंटे की पहरेदारी होती है. एकदम अटूट पहरेदारी,आठ-आठ घंटे की शिफ्ट में,क्‍या मजाल कि पहरे पर कोई पलक भी झपका ले जाय.’’ गारद की पहरेदारी के बयान से जैसे उसका सीना फूलने लगा था.

‘‘तो उसी गारद में अपनी ड्यूटी लगवा ली थी मैंने. रात की शिफ्टवाली. आराम से खाना-वाना खाकर दस बजे गारद ड्यूटी  पर चले जाओ,और नींद तो हमको वैसे भी नहीं आ सकती थी.

‘‘क्‍यों,नींद से क्‍या बैर था भाई.’’ राकेश भाई अब तक उसकी बात में गा़लिब हो चुके थे.    

‘‘बैर-भाव कुछ नहीं,साहब. वैसे गारद की ड्यूटी का भौंकाल ही बड़ा होता है. एक –दो घंटे चुस्‍ती से खड़े रहिए,  फिर आराम से बारह-एक बजे के बाद बैठकर हमलोग ताश खेलते थे. और फिर मेरी वो आदत-बीड़ी पीने की. तो आराम से वहाँ बीड़ी पीजिए. रात में गारद की तरफ़ कौन आता है.
’’

‘‘तब तो खूब मजे़ में कटी होगी तुम्‍हारी ..... ’’ ‘‘हाँ,कट ही रही थी,मजे़ में लेकिन कहते हैं न कि बहुत अधिक निश्चिन्‍तता कभी-कभी प्राणघातक हो जाती है.
’’

प्राणघातक कहने से जैसे उसकी कहानी में अचानक वीर रस का संचार हो गया. हमारे भी कान किसी अनहोनी को सुनने लिए खड़े हो गये !

‘‘तो क्‍या,कभी गारद पर हमला हो गया था. असम में उग्रवादी भी तो बहुत होंगे उस समय.’’राकेश भाई ने अपने जानते सटीक रिजनिंग लगयी.

‘‘नहीं साहब. उग्रवादी तो थे ही,लेकिन वे सेना की टुकड़ीपर हमला करने की हिम्‍मत नहीं कर सकते. वो तो ज्‍या़दा-से-ज्‍या़दा सी.आर.पी.एफ. तक को अटैक कर सकते हैं ! हम भारतीय फौ़ज थे, इंडियन आर्मी. हम पर कौन अटैक कर सकता है.कहते-कहते वह खड़ा हो गया और हाथ-पैरों को ‘वार्मअपहोने के स्‍टाइल में हिलाने लगा.   

‘‘तो प्राणधातक क्‍या हुआ था.’’  राकेश भाई उपने अनुमान के ग़लत हो जाने से शायद खीझ से गये थे.

‘‘साहब ! आर्मी में सबसे जानलेवा होता है,अनुशासन. जब तक आप पर कोई ध्‍यान नहीं दे रहा,तब तक तो आप मजे़ में हैं. लेकिन यदि आप  किसी अफ़सर की नज़र में चले गये तो फिर गये आप से आप ! अनुशासन मतलब अफसर की नज़र में ऑल राइट.’’

‘‘अच्‍छा’’  तो पकड़े गये तुम बीड़ी पीते हुए ... ’’राकेश भाई ने बात को जैसे गति देने की कोशिश की. नहीं तो उसकी सुई अनुशासन और अफ़सर पर ही अटक जाती.

‘‘हा ....हा.....हा...’’उसने जो़र का ठहाका लगाया. ‘‘यही तो बात है,साहब असली कहानी तो यही है .....’’ पक्‍के कहानीबाज़ की तरह उसने अपनी बात अधूरी छोड़ी .  ‘‘पकड़ा नहीं गया था ...... देखा गया था ....... बीड़ी पीते हुए .’’ 

‘‘अरे देखे गये थे,मतलब पकड़े ही तो गये होंगे.’’मैंने बहुत देर बाद उसकी बात में दख़ल दिया !

‘‘यही तो बात है. देखा था अफ़सर ने मुझे बीड़ी पीते हुए,लेकिन पकड़ नहीं पाया.’’ 
अपने मूँछों को सहलाते हुए उसने कहा. 
‘‘दर असल उस दिन ठंड कुछ ज्‍या़दा ही थी. दस बजे मैं ड्यूटी पर गया और थोड़ी देर बाद ही मुझे जोरों की तलब लगी. बन्‍दूक को कमर से टिकाये जैसे ही मैंने बीड़ी जलाने के लिए तीली जलाई,वैसे ही गाड़ी की एक तेज़ हेडलाइट मेरे चेहरे को छूती-सी गुज़र गयी."कर्नल साहब उस दिन क्‍लब से शायद देर से लौट रहे थे,और हमें पता ही नही था.
‘‘अच्‍छा. फिर ... ’’

‘‘हेडलाइट इतनी साफ़ पडी़ थी मेरे चेहरे पर कि मेरा कलेजा तो धक्‍क से  रह गया, कर्नल साहब यदि गाड़ी चला रहे थे तो उन्‍होंने जलती तीली ज़रुर देख ली होगी. और वह कर्नल था भी बड़ा खब्ती' ! नयी उम्र का था,नया-नया अफ़सर. गुस्‍सा तो जैसे साले की नाक पर ही बैठा रहता था. और यदि उसने देख था मुझे इस हालत में तो उसे मेरे पास आना ही था.

‘‘और साहब ! मेरा अन्‍दाजा़ एकदम सही था. थोड़ी ही देर में सायरन बजने लगा. सावधान,होशियार की आवाजें आने लगीं. मैं समझ गया कि आज तो मेरा खु़दा ही मालिक है. दस मिनट के अन्‍दर कर्नल की कार मेरे आगे. मैं दम साधे खड़ा रहा ! कर्नल गाड़ी से उतरा. नशे में धुत्‍त ! मैंने भी एड़ी पटककर जोरदार सैल्‍यूट ठोका – जय हिन्‍द सर !

‘‘उसने सैल्‍युट की कोई नोटिस नहीं ली. सीधा मेरे आगे खड़ा हो गया- तुम बीड़ी जला रहे थे. नशे की लरज़ के बावजूद उसकी आवाज़ ऐसी कड़क थी कि मेरे होश फ़ना हो गये .

लेकिन मैं भी साहब,जान का सवाल था,फिर एड़ी पटकी और कहा – नहीं सर ! ऐसा कुछ नहीं था.

‘‘अच्‍छा, हम दोनों के मुँह से एक साथ निकला.’’हाँ साहब ! लेकिन कर्नल तो कर्नल,उसने तीली जलाते हुए मुझे साफ़ देखा था. एक क्षण के लिए उसे लगा कि कहीं नशे में होने के कारण उसे मतिभ्रम तो नहीं हो गया था. लेकिन वह कर्नल था,  फौज का कर्नल. यदि उसे ही मतिभ्रम होने लगे वो भी नशे में,तो यह उसके लिए जैसे डूब मरने की बात थी. वह मान ही नहीं सकता था कि उसे कुछ धोखा भी हो सकता है.

उसने कहा कुछ नहीं. केवल अपने साथ के कमांडेंट को मेरी तलाशी लेने को कहा. मैं चुपचाप खड़ा रहा. तलाशी पूरी हुई लेकिन मिला कुछ नहीं,मैं एकदम सावधान की मुद्रा में डटा रहा.

कर्नल का  मिजा़ज भन्‍ना रहा था. उसने मुझे साफ़ तौर पर तीली जलाते हुए देखा था,और तलाशी में कुछ भी बरामद नहीं !

उसका वश चलता तो वहीं वह खड़े-खड़े मेरा कोर्टमार्शल कर देता,लेकिन उसके लिए पहले सबूत तो हो .

‘‘तो कहाँ छुपा दी थी,तुमने तीली और बीड़ी ? ’’राकेश भाई ने हँसते हुए पूछा.

‘‘यही तो साहब,कर्नल भी जानना रहा था. आखि़र उसने अपनी आँखों से देखा था.’’ 

‘‘उसका चेहरा क्रोध से तमतमा रहा था. उसने कमांडेंट के कान में कुछ कहा,और वापस चला गया. मैं जानता था कि वह यूँ ही वापस जानेवालों में नहीं था. आखि़र अफ़सर था,युवा था बाबू की तरह क्‍यों बाबू .’’वह मेरी तरफ़ मुखातिब हुआ .

मैं जैसे नींद से जागा. हाँ तो फिर क्‍या किया उसने. मेरी भी उत्‍सुकता बढ़ गयी थी.

‘‘करना क्‍या था. वापस आया वहपूरे दल-बल के साथ. सर्चलाइट लिए हुए ! और लगभग आधे घंटे तक मेरे आसपास के आधे किलोमीटर के एरिया तक का एक-एक तिनका छान मारा उसने. लेकिन साहब,न तो वह बीड़ी हाथ आयी और नही वह जली हुई तीली.’’  

‘‘अच्‍छा कहाँ फेंक आये थे तुम.
  राकेश भाई की आवाज़ में भी परम जिज्ञासा थी.

‘‘वही तो !’’ वह भी आसानी से कहानी के रोमांच को तोड़ना नहीं चाह रहा था.

‘‘
कर्नल परेशान,उसके लगुए - भगुए  परेशान.  एकदम से ह़कीकत में जिसे कहते हैं,चप्‍पा-चप्‍पा छान मारना,वैसी तलाशी हुई उस दिन,लेकिन सबूत को नहीं मिलना था,नहीं मिला.

‘‘लाचार होकर कर्नल लौटा,जैसे अपनी कोई पोस्‍ट हार गया था वह. वहाँ से गया,और कमरे में बन्‍द.  एकदम से तीन दिन तक बाहर नहीं निकला.’’  

‘‘अच्‍छा ! क्‍या करता रहा तीन दिन कमरे में.’’ 

करता क्‍या रहा. बाल नोचता रहा. शराब पीता  रहा. आखि़र उसने अपनी आँख से देखा था,साहब. वह कैसे मान ले कि यह केवल नज़र का धोखा था. और बात सच भी थी तीली तो जलाई थी ही मैंने और उसने देखा तो सही ही था.

तीन दिन बाद वह अपने कमरे से निकला. लोग उसकी हालत देखकर डरे हुए थे. आँखें लाल-लाल,बाल बिखरे हुए, पपोटे सूजे हुए.


‘‘उसने सारे ऑफि़सर्स को तलब किया और बोला,- यह हो नहीं सकता कि मेरी नज़र ने धोखा खाया हो,तीली  उस जवान ने जलायी थी और यह मैंने अपनी आँखों से देखा था. लेकिन यह भी सच है कि इस बात का कोई सबूत मेरे पास नहीं है. यदि मुझे सबूत नहीं मिला तो मुझे सेवा में रहने का कोई हक नहीं. मैं रिजा़इन कर दूँगा. उसने सारे ऑफ़सर्स  से राय माँगी कि वे किसी भी तरह उसके देखे हुए सच को सच साबित करें.’’  

“अच्‍छा, बात इतनी बढ़ गयी, और वह भी एक बीड़ी के  लिए.......’’ राकेश भाई ने उसे टोका .

बात अब बीड़ी की कहाँ रह गयी थी साहब ! बात तो उस कर्नल की का़बिलियत तक चली गयी थी.  उसकी जि़द के लिए एक-एक तिनके को खोद डाला गया था और पूरी यूनिट इसकी गवाह थी. 

यदि सबूत नहीं मिला तो समूचे यूनिट में कर्नल की क्‍या इज्‍ज़त रह जाती.  एक शराबी की. जो कुछ भी धोखे से देख सकता है.

‘‘तो साहब ! मीटिंग में जितने लोग,उतने सुझाव. किसी ने कहा दो झापड़ लगाकर सच उगलवा लेते हैं,कोई कोई तो थर्ड डिग्री तक उतर आया था.’’   

‘‘लेकिन वह कर्नल था,कोई ऐसी-वैसी बात जो कानूनन  सही न हो उसकी ईमेज को और गिरा सकती थी .’’   

‘‘हाँ सही बात है .’’मैंने एकदम से कहा . ‘‘ आखि़र जब सबूत ही नहीं है तो सजा़ किस बात की.’’

‘‘वही,वही बात थी.’’पहली बार वह मेरी प्रतिक्रिया के प्रति इतना उदार और सकारात्‍मक था. 

‘‘लेकिन उस मीटिंग में एक अनुभवी आदमी भी था साहब. आपकी ही उमर का रहा होगा,वह उस समय. वह राकेश भाई से मुखातिब था. सूबेदार था और दूसरे ही दिन रिटायर होने वाला था.
’’

‘‘अच्‍छा.’’
राकेश भाई ने मुस्‍कराते हुए मेरी तरफ़ देखा.

‘‘हाँ साहब !जब सब बोल चुके,तो उसने कहा, --सर ! वैसे तो मैं ओहदे में आप सबसे नीचे हूँ. लेकिन इजाज़त हो तो मुझे एक मौका़ आजमाने दिया जाय."

कोई और समय होता तो लोग उसे आँखों से ही चुप करा देते,लेकिन उसकी इस बात से कर्नल को जैसे कोई उम्‍मीद- सी जगती दिखी.

उसने कहा,-बिल्‍कुल इजाज़त है,कुछ भी  करों,लेकिन किसी भी तरह सबूत लाओ.
सर लेकिन वचन देना होगा कि यदि जवान ने सच क़बूल लिया तो आप  फिर उसे कोई सजा़ नहीं देंगे. सूबेदार जैसे अपनी तरक़ीब पर आश्‍वस्‍त था.

साहब,कर्नल को उसे वचन देना पड़ा. आखि़र अब क्रोध और अनुशासन से मामला बदलकर  खु़द कर्नल के यकी़न और भ्रम का हो गया था.

आखि़र सूबेदार के कहने पर मुझे बुलवाया गया.

मैं बाग़वानी की अपनी ड्यूटी पर था. मैं समझ गया था कि उसी मामले में मेरी पेशी है,लेकिन जब कुछ मिला ही नहीं,तो मुझे डरने की कोई ज़रुरत भी नहीं थी.

मैं सीधे मीटिंग रुम में ही लाया गया. यूनिट के तमाम ऑफि़सर्स को एक साथ देखकर मैं भी थोड़ी देर के लिए हिल गया. लेकिन चुपचाप सैल्‍यूट मारकर तनकर खड़ा रहा.

‘‘फिर’’हमारा तनाव भी चरम पर था. मैंने एक और  सिगरेट सुलगा ली.

फिर क्‍या साहब. उस अनुभवी सूबेदर ने सीधे मेरे कन्‍धे पर हाथ रखा और मेरी आँख में आँख डालकर बोला ,--"देखो बेटा,बात अब सजा़ और अनुशासन से बहुत ऊपर उठ चु‍की है.  बात अब कर्नल साहब के देखे हुए सच के यकीन का है.  मैं सारी बातों को हटाकर,सिर्फ़ एक बाप होकर अपने बेटे से पूछता हूँ कि आखि़र सच क्‍या था."

साहब ! काशउस सूबेदार को मेरे और मेरे बाप के रिश्‍ते के बारे में थोड़ा भी पता होता. बाप से मेरा क्‍या मतलब. उस बाप से  जिससे मैंने कभी कोई मतलब रखा ही नहीं.

लेकिन साहब. उस सूबेदार की आँख में जाने क्‍या था,और उसकी पकड़ में क्‍या जादू था कि मुझे मेरे बाप की बेतरह याद आने लगी. उसकी याद से ज्‍या़दा,मेरा करम मुझे याद आने लगा,मेरी ज्यादतियां जो मैंने उससे की थीं. आखि़र एक ही बेटा था मैं उसका और एक पल के लिए लगा कि जैसे मेरा बाप ही मेरे आगे गिड़गिड़ा रहा  हो.

और साहब ! बाप का वास्‍ता, ऐसा लगा मुझे  कि मैंने भी सोच लिया,जो होगा देखा जाएगा. सच बता ही देता हूँ. जब बाप ही इस हाल में सच की दुहाई दे रहा है तो मैं भी इसी बाप का बेटा हूँ.

मैंने भी तनकर कहा,-- "चाचा! आप बाप बनकर ही पूछ रहे हैं,तो सच वही है जो कर्नल साहब ने देखा था. तीली जलाई थी मैंने."

सारे अफ़सर अवाक्. कर्नल का चेहरा जैसा पिघल रहा था,उसकी काँपती-सी आवाज़ निकली लेकिन वो तीली....... वो बीड़ी .......”

‘‘साहब,आज भी है,राइफल नं. 292 के बैरल में,वह तीली और बीड़ी अभी भी मौजूद है."मैंने भी जान पर खेलकर सैल्‍यूट ठोकते हुए जवाब दिया. अब मुझे किसी बात की परवाह नहीं थी. बाप का हक़ अदा कर दिया था मैंने.

कहकर वह तनकर खड़ा हो गया और हम दोनों ने लक्ष्‍य किया  कि आखि़री वाक्‍य बोलते हुए उसकी आवाज़ भर्रा गयी थी. ‘‘फिर ...... . फिर क्‍या हुआ ...... मैं और आगे जानना चाह रहा था.’’

‘‘फिर क्‍या होना था इनाम – इकराम पार्टी-शार्टी और क्‍या’’
कहता हुआ वह आगे बढ़ गया. तभी वह बच्‍चा चाय लेकर आ गया. हम तो जैसे चाय को भूल ही गये थे. हम चुपचाप चाय पीकर वापस हो लिये.

सेमिनार जब शुरु हुआ तो मैंने गाँधीजी पर बहुत साधारण-सी ही बातें कहीं. कहीं-कहीं तो उनके त्‍याग और उपवास के प्रसंग पर मैं भावुक भी हो गया. राकेश भाई अवाक् थे कि यह अचानक मुझे क्‍या हो गया था. इस बात पर तो उन्‍होंने मुझे आँख तरेर कर भी देखा कि वे राष्‍ट्रपिता के तौर पर हमेशा हमारे भीतर एक सातत्‍व की तरह जीवित रहेंगे. लेकिन मैं इतने रौ और उत्‍साह में था कि राकेश भाई की तरफ़ से आँख फेर लेने में मुझे कोई झिझक या शर्म नहीं महसूस हुई.



राकेश मिश्र / मो. नं. 09970251140

कथा- गाथा : बहुरूपिया : राकेश बिहारी

$
0
0
कृति : Egon Schiele












राकेश बिहारी आलोचक के साथ साथ हिंदी के समर्थ कथाकार भी हैं. उनके दो कहानी संग्रह- ‘वह सपने बेचता था’ तथा ‘गौरतलब कहानियाँ’ प्रकाशित हैं.

प्रस्तुत कहानी साहित्य में उस आखेटक प्रवृत्ति को केंद्र में रख लिखी गयी है जो युवा स्त्रियों का शिकार करती है.  एक वरिष्ठ साहित्यकार एक पाठिका से संदेशों  के आदान-प्रदान में इतने अन्तरंग हो जाते हैं कि न्यूनतम मर्यादा भी भूल जाते हैं. अंत में उनका ‘बैंड बजता’ है. राकेश बिहारी ने उस विद्रूप विडम्बना का दिलचस्प ढंग से चित्रण किया है.




कहानी
बहुरूपिया                                       
राकेश बिहारी

(इस कहानी का किसी वास्तविक व्यक्ति के जीवन से कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संबंध नहीं है. किसी जीवित या मृत व्यक्ति के जीवन की घटनाओं से इस कहानी के किसी भी साम्य को महज संयोग समझा जाये.)




र्तिका की आँखों से गिरती आंसू की बूंदें नीलिमा की बाँहों पर तेजाब-सी पड़ रही थीं. वह हतप्रभ थी.  क्या भाषा में प्रेम और संवेदना के मनोरम फूल खिलाने वाला कोई महाकवि भीतर से इतना कुरूप और अश्लील हो सकता है? आए दिन खबरिया चैनलों और शहर-दर-शहर सभा-सेमीनारों के मंचों पर सार्वजनिक बुद्धिजीवी की तरह लच्छेदार भाषण करने वाला ख्यात कवि मिथिलेशवाचस्पति, जो कभी राजस्व सेवा का शीर्षस्थ अधिकारी था,आजकल एक प्रकाशन  संस्थान का मुख्य सलाहकार है. यह सोच कर उसे हैरत हुई थी कि नखदंतविहीन होने के बाद इस तरह शिकार पर निकलने वाला यह घाघ कवि अपने पद और रुतवे के युवा दिनों में क्या करता होगा... प्रकटतः कुछ सांत्वना भरे शब्दों के साथ वर्तिका के आँसू पोंछते हुये नीलिमा ने मन ही मन संकल्प किया- जिस कविता-प्रेम ने उसकी सबसे अच्छी सहेली को इतना रुलाया है, उन्हीं कविताओं के सहारे वह उस बुड्ढे का बैंड बजा देगी.प्रबंधन और लोक प्रशासन विषयों के साथ सिविल सर्विसेज की तैयारी करने वाली नीलिमा ने उसी दिन से ढूंढ-ढूंढ कर प्रेम कवितायें पढ़ना शुरू कर दिया था.

कुछ ही दिनों बात होली आई थी. कॉलोनी के किशोर-किशोरियाँ झुंड बना कर होली खेलने निकल रहे थे. दूर क्लब के लाउडस्पीकर से तेज़ आवाज़ में होली के परिचित गानों की निकलने वाली धुनें सड़क के दोनों किनारे खड़े कदंब और शीशम के बृक्षों से टकरा कर चारों दिशाओं में गूंज रही थीं. नीलिमा की माँ मिसेज परवाल रसोई में मालपूये तल रही थीं और नीलिमा ड्राइंग रूम में बैठी नेट पर प्रेम कवितायें तलाशती हुई दोस्तों के शुभकामना संदेशों का जवाब दे रही थी. उसे याद आया, पिछले दिनों उसकी सहेली समीक्षा,जो हिन्दी में एम..करने के बाद इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्यूनिकेशन से पत्रकारिता की पढ़ाई कर रही है, ने बताया था कि हिन्दी समय डॉट कॉम पर तमाम लेखकों-कवियों के परिचय उपलब्ध हैं. नीलिमा ने वहीं से मिथिलेश वाचस्पति का नंबर लिया. हिन्दी समय डॉट कॉम पर उसकी तस्वीर देखते ही उसे वर्तिका की रो-रो कर सूजी हुई लाल और उदास आँखें याद हो आई थीं. मन ही मन मिथिलेश वाचस्पति को गालियां देती हुई नीलिमा ने अपनी मोबाइल में उसका नंबर ‘कुत्ता कवि’ नाम से सुरक्षित किया और पिछले तीन महीने में अर्जित अपने कविता ज्ञान का उपयोग करते हुये मोबाइल पर एक संदेश टाइप करने लगी-

आओ
जैसे अंधेरा आता है अंधेरे के पास
जैसे जल मिलता है जल से
जैसे रोशनी घुलती है रोशनी से...
नमस्ते! कैसे हैं?
आपकी अनगिनत प्रशंसिकाओं में से एक
नीलिमा

संदेश टाइप करने के बाद नीलिमा ने उसे दो-तीन बार सावधानी से पढ़ा था ताकि वर्तनी की कोई अशुद्धि न रह जाये और कुछ पल रुक कर गुस्से से उसे [i]घूरने के बाद सेंड का बटन ऐसे दबाया था जैसे रिवॉल्वर से गोली दाग रही हो.
लगभग दस मिनट के बाद नीलिमा की मोबाइल में सुसुप्त पड़ी हरी रोशनी थरथराहट के साथ जागृत हुई-

मुझे लो, जैसे जल लेता है चंद्रमा को
जैसे अंधेरा लेता है जड़ों को
जैसे अनंत लेता है समय को
अच्छा हूँ. प्रतीक्षारत हूँ.
मिथिलेश वाचस्पति

प्रतीक्षारत शब्द पर नीलिमा ठिठकी थी. निमिष भर को उसे मिथिलेश वाचस्पति की शब्दों की बाजीगरी पर गुस्सा आया था पर अगले ही पल होठों पर फैली एक तिर्यक मुस्कान के साथ बिना किसी देरी के उसने जवाब जड़ दिया था – ऐसा न कहें कविवर! प्रतीक्षा में होना तो प्रशंसकों का धर्म है! पर आपने ऐसा कह कर इस नाचीज को होली पर जैसे ईदी दे दीहै.

नीलिमा अभी इस बात की कल्पना ही कर पाती कि एक प्रशंसिका के भाषा कौशल पर मुग्ध उस कुत्ता कवि ने किस तरह अपनी जीभ लपलपाई होगी कि उसका मोबाइल एक बार पुनः हरे कंपन से भर उठा-

‘आप जैसी शब्दसमृद्ध प्रशंसिका के संदेश से आज मेरा दिन सुंदर हो गया! आप कहाँ हैं? दिल्ली में या कहीं और? यूं तो आप सहसा मेरे अंदर प्रवेश कर गई हैं, फिर भी कहाँ हैं?’

‘दिल्ली तो मेरे लिए बहुत दूर है मेरे कवि! पर जिस सहजता से आपने अपनी इस प्रशंसिका को  स्वीकार किया है, मुझे अपने भाग्य पर भरोसा नहीं हो रहा. जिस कवि के सुंदर शब्दों को अपने रोम-रोम में बसाये न जाने कबसे किसी कस्तूरी मृग की तरह बेचैन घूम रही हूँ,उस कवि के भीतर मैं सहसा प्रवेश कर गई! यह सच तो है न कविवर? मेरा चिरसंचित स्वप्न क्या सचमुच साकार हो गया है? मैं खुद को चिकोटी काटकर देखना चाहती हूँ... कहीं मैं स्वप्न तो नहीं देख रही, मेरे कवि?’– स्कूल के दिनों से ही साहित्य में किसी तरह पास होनेवाली नीलिमा को जैसे अपनी ही भाषा पर भरोसा नहीं हो रहा. पल भर को उसने सोचा कि यह अबतक पढ़ी गईं प्रेम कविताओं का असर है या फिर वर्तिका की सोहबत का जो उसके संवाद इतने नाटकीय और भावनात्मक हुये जा रहे हैं!

मिथिलेश वाचस्पति के ठंडे पड़े नसों में नीलिमा के शब्दों ने जैसे अचानक से एक नई जुंबिश घोल दी थी.  एक अनाम पुलक के आवेग से भर उसने मन ही मन कहा- चिकोटी तो खुद को मैं काट के देखना चाहता हूँ नीलम प्रिये... और उसकी काँपती उँगलियों ने नई ऊर्जा के साथ उत्तर टाइप करना शुरू कर दिया– ‘अपने चिरसंचित स्वप्न को तुम सहसा सच में बदलते देख रही हो, नीलिमा! मेरी प्रेम कविताओं को ऐसी अंतरंगता से बहुत थोड़े ही लोगों ने पढ़ा-समझा है. मेरी होली आज तुम्हारे कारण सचमुच बहुत सुंदर हो गई! और हाँ, दिल्ली इतनी भी दूर नहीं नीलिमे! जब हम इतने पास आ गए हैं तो दिल्ली क्या? कवि और कविप्रिया कबतक दूर रह सकते हैं...?’किंचित असमंजस के बाद मिथिलेश वाचस्पति ने अपने संवाद को बुलेट ट्रेन की गति से दौड़ जाने दिया.

मिथिलेश वाचस्पति की दुस्साहसी और अधीर गतिशीलता ने नीलिमा को जितना गुस्से से भरा उतना ही इस बात के लिए आश्वस्त भी किया कि वह बिलकुल सही दिशा में बढ़ रही है...‘ आपकी सहजता ने मुझे हृदय की अतल गहराइयों तक अभिभूत कर दिया है कवि! लेकिन मैं तो आज आपको पाकर भी अधूरी ही रह गई. कवि के रंगों के बिना कविप्रिया की कैसी होली?’

मेरे सारे रंग आज तुम्हारे ही लिए हैं नीलमप्रिये! बताओं कौन सा रंग लगाऊँ...? कहाँ...? कैसे...?आज इस कवि के सारे रंग कविप्रिया पर आसक्त हैं...

रंग का वक्त तो बीत चुका मरे कवि! इससे पहले कि गुलाल का समय भी बीत जाये, मेरे समीप आओ, तुम्हारे गालों पर अपने उरोजों से गुलाल मल दूँ!’ नीलिमा की साँसें अचानक बहुत तेज हो गई थीं... नहीं, वह इस तरह कैसे किसी को लिख सकती है... एक अजनबी कवि से बात करने के रोमांच पर सहसा एक अनाम भय की चादर-सी बिछ गई... उसने चाहा कि वह उस संदेश को रोक ले पर ‘तीर कमान से, बात जुबान से और प्राण शरीर से...’ की तरह उसका यह संदेश आउट बॉक्स से निकल चुका था. भय और संकोच से भरी नीलिमा ने अपनी कापती उँगलियों से मोबाइल स्विच ऑफ कर दिया. 

मिथिलेश वाचस्पति की आँखें फटी की फटी रह गईं... इस बार उसने सचमुच खुद को चिकोटी काटी... नहीं, वह कोई स्वप्न नहीं देख रहा. नीलिमा किसी इन्द्रलोक से उतर कर साक्षात उस तक चली आई है. उसने सोचा, पूरे जीवन के कविता-कर्म का मानदेय उसे इकट्ठा ही मिल गया है. ड्राइंग रूम के सेल्फ में करीने से सजे मानपत्रों, ताम्रपत्रों और सम्मान में मिले तमाम स्मृति चिन्हों की चमक उसके लिए सहसा बढ़ गई थी... आवेग और उत्तेजना से थरथराते कवि ने अपनी कविप्रिया को एक पर एक कई संदेश भेजे पर जवाब में उसकी मोबाइल के स्क्रीन पर देरतक कोई रोशनी नहीं चमकी. व्यग्रता में बार-बार उठा कर मोबाइल का इनबॉक्स चेक किया पर स्थिति यथावत बनी रही... एक बार तो उसकी इच्छा हुई कि फोन ही कर लें लेकिन दूसरी तरफ किसी और की उपस्थिति की अज्ञात आशंका ने उसे ऐसा नहीं करने दिया.

बेचैनी से भरा मिथिलेश वाचस्पति टेबल पर रखे तांबे के जग से निकाल कर दो ग्लास पानी पीने के बाद प्रतीक्षा से लबालब भराकमरे में ही चहलकदमी करने लगा. कवि की नजर ड्रेसिंग टेबल में जड़े आदमक़द आरसी पर गई और वह रुक कर अपनी प्रतिछवि निहारने लगा. आज ही सुबह उसने दाढ़ी बनाई थी. चेहरा क्लीन था. पर उम्र के साथ त्वचा में उग आया ढीलापन चेहरे पर साफ नज़र आ रहा था. कनपटी के ऊपर बालों की सफेदी देख कवि को बाबा तुलसी की याद हो आई... क्षण भर को लगा जैसे वे खुद राजा दशरथ हो गए हैं और हाथ में आईना लिए अपने सफ़ेद बालों को देख रहे हैं... ‘राय सुभाय मुकुरु कर लीन्हा, बदन बिलोक मुकुट सम कीन्हा. श्रवण समीप भए सित केसा. मनहुं जरठपन अस उपदेसा...’जरठपन के उपदेश की स्मृति होते ही मिथिलेश वाचस्पति ने खुद को बरजा- ‘दशरथ ही सुनें ऐसे उपदेश... मेरे जीवन में तो नीलिमा है...  पर क्या नीलिमा मेरे सफ़ेद बाल और ढीली पड़ चुकी त्वचा को स्वीकार कर पाएगी...?’ मिथिलेश वाचस्पति की उत्तेजना पर जैसे किसी ने एक अदृश्य गांठ लगा दी थी. उसने मेज के ड्राअर से दवाइयों की पेटिका निकाली, रेवाइटल का एक कैप्सूल निगला और वह ड्रेसिंग टेबल की दराज में हेयर डाई खोजने लगा...

देर शाम जब नीलिमा ने अपना मोबाइल ऑन किया मिथिलेश वाचस्पति के कुल चौदह संदेश एक पर एक किसी सैलाब की तरह उसके इनबॉक्स में आ पहुंचे. उन संवादों का हर्फ-हर्फ उसकी व्यग्रता और बेचैनी की गवाहियाँ दे रहा था. उसकी बेचैनी ने नीलिमा को एक खास तरह के संतोष से भर दिया. –
‘आपको सहसा सम्मुख पाकर वर्षों की संचित मेरी कामनाएँ पूरे आवेग के साथ मुखर हो गई थीं. पर आपके आभामंडल के आगे अपनी लघुता के अहसास ने मुझे एक अनाम भय से रोक दिया. आपकी कवितायें मुझे संयोग की अनगिनत अकल्पनाओं से समृद्ध करती रही हैं. उसी के आवेग में कुछ लिख गई. तब से संकोच और वर्जना में डूबी हुई हूँ. कुछ नहीं समझ आया तो घबराहट में मोबाइल ऑफ कर दिया था. मोबाइल ऑन करने पर आपके संदेश मिले. एक अजीब तरह की ग्लानि और अपराधबोध से भरी हुई हूँ. मुझे क्षमा कर दें मेरे कवि!’

नीलिमा का संदेश कुछ ज्यादा ही लंबा हो गया था. उसने इसे तीन टुकड़ों में मिथिलेश वाचस्पति को भेज दिया.

नीलिमा के संदेशों ने मिथिलेश वाचस्पति को उसका सुकून लौटा दिया था. उसकी नसें एक बार फिर उम्मीद के गुलाबी प्रवाह से आपादमस्तक भर गई थीं. उसने जवाब देने में निमिष भर की देरी नहीं की. जवाब देते हुये उसके चेहरे पर तल्लीनता का ऐसा भाव था जैसे वह उँगलियों से नहीं अपनी नाभि से सन्देश टाइप कर रहा हो- ‘तुम्हारा संकोच सर्वथा स्वाभाविक है. प्रेम की अपनी आभा होती है, मैं तुम्हारे शब्द-शब्द में उस आभा को महसूस कर रहा हूँ. अपने को खुला छोड़ दो मेरे लिए. जो भी मन में हैं, वह निस्संकोच कहो, करो नीलिमा!’

‘आपके संदेश ने मुझे जैसे अचानक से भारहीन कर दिया है. आपकी सहजताओं को जीते हुये मुझ पर  आपकी कविताओं के नए अर्थ खुल रहे हैं. सहजता प्रेम की सहचरी है और आप साक्षात प्रेम की प्रतिमूर्ति!’ नीलिमा के संदेश की आभा में मिथिलेश वाचस्पति का चेहरा नहा-सा उठा था. उसके चेहरे पर हरदम व्याप्त रहनेवाली लोलुपता कुछ देर को जैसे बालसुलभ परितृप्ति में बदलगई थी.’

‘मैं सच में अभिभूत हूँ. मैं सोच भी नहीं सकता था कि कहीं तुम जैसा कोई है जो मेरी कविताओं से और उस कारण मुझसे इतना प्यार करता है. यह मेरी सबसे सुंदर रंगभरी होली है.’

‘आपका स्वीकार मेरे लिए होली का उपहार है. इसके लिए आभार शब्द बहुत छोटा होगा.‘

नीलिमा के संदेश पढ़ते हुये मिथिलेश वाचस्पति ने अपनी शिराओं में एक गुनगुना-सा प्रवाह महूस किया. बाहर आसमान में उतर रहे अंधेरे से बेखबर उसकी ढीली त्वचा पर एक नूर फैलने लगा था.  उसे लगा जैसे वह दुनिया की हर भाषा में लिखी गई तमाम प्रेम कविताओं का नायक हो गया है और नीलिमा इस ब्रह्मांड की अकेली नायिका है. नीलिमामय मिथिलेश वाचस्पति मोबाइल स्क्रीन पर एक कविता उकेरने लगा-

‘सुनो चारुशीला!
एक रंग और एक रंग मिलकर एक ही रंग होता है
एक बादल और एक बादल मिलकर एक ही बादल होता है
एक नदी और एक नदी मिलकर एक ही नदी होती है
नदी नहीं होंगे हम
बादल नहीं होंगे हम
रंग नहीं होंगे तो फिर क्या होंगे
अच्छा जरा सोचकर बताओ
कि एक मैं और तुम मिलकर कितने हुये…’

नीलिमा हमेशा साहित्य से कटी-कटी रहती थी. कविता-कहानी को बैठे ठालों का भावोच्छ्वास मानती थी. लेकिन दुनिया भर की प्रेम कवितायें तलाशते-खंगालते कब उसके भीतर कविताओं का आस्वादक पैदा हो गया उसे भी नहीं पता चला. पल भर को वह मिथिलेश वाचस्पति की कविताओं में खो-सी गई. लेकिन अगले ही पल उसे अपना वह संकल्प याद हो आया – जिस कविता-प्रेम ने उसकी सबसे अच्छी सहेली को इतना रुलाया है, उन्हीं कविताओं के सहारे वह उस बुड्ढे का बैंड बजा देगी.अपने संकल्प की स्मृति होते ही नीलिमा ने एक पर एक कई कविताएं मिथिलेश वाचस्पति को भेज डाली -

‘मुझको प्यास के पहाड़ों पर लिटा दो
जहाँ मैं एक झरने की तरह तड़प रहा हूँ
मुझको सूरज की किरणों में जलने दो
ताकि उसकी आंच और लपट में तुम फौवारेकी तरह नाचो
मुझे जंगली फूलों की तरह ओस से टपकने दो
ताकि उनकी दबी हुई खुशबू से अपने पलकों की उनींदी जलन को तुम भिगा सको...’

मिथिलेश वाचस्पति विस्मित था, नीलिमा की स्मृति और अपनी कविताओं दोनों पर. उसे बहुत शिद्दत से अहसास हुआ कि वह प्यास के पहाड़ों पर लेटा हुआ है और नीलिमा उस मीठे झरने की तरह प्रकट हुई है जिसका उसे जाने कब से इंतज़ार था...

कृति : Egon Schiele


‘ओ, माई गर्ल! यू हैव सो मेनी पोयम्स ऑफ माइन्स इन यू. आई एम ऑलरेडी इन यू. यू शुड बी इन मी पावरफुली, वाइटली, मेमोरेबली... लेट अस पजेज़ एंड प्रीजर्व इच अदर...’

‘आ गए न अपनी औकात पर... हिन्दी का एक महाकवि प्यार के वक्त अङ्ग्रेज़ी के आँचल में दुबक गया... हिन्दी फिल्मों की कमाई खाने वाले उन मुंबइया कलाकारों से अलग कहाँ हो तुम जो अवार्ड हासिल करने के बाद अपने करोड़ों चाहने वालों का शुक्रिया अदा करते हुये मुस्कुरानेके लिए भी अङ्ग्रेज़ी की ही शरण लेते हैं...’
मिथिलेश वाचस्पति सहम-सा गया था. उसे नीलिमा से ऐसे शब्दों की उम्मीद कदापि नहीं थी. वह अचानक ही कहीं वह हाथ से निकाल न जायेकी प्रतीति से भर गया और खुद को संयत करते हुये  बात को संभालने की कोशिश की...तुम्हारे भाषा प्रेम पर मैं मुग्ध हूँ. तुमने खुद को प्यार किए जाने का एक और कारण मुझे दे दिया है. तुम ठीक कह रही हो,सच्चा प्यार तो अपनी भाषा में ही किया जा सकता है. मेरे शब्दों से तुम्हारी तरह प्यार करनेवाला कोई दूसरा याद नहीं आता. इन शब्दों के कवि को कितना प्यार करोगी चारुशीले?’
मिथिलेश वाचस्पति के चतुर शब्दों के पीछे छिपे उसके भय को नीलिमा ने पढ़ लिया था. उसने उसे सहज करने के लिए इस बार फिर उसे एक कविता भेजी-

‘मैं मींच कर आँखें
कि जैसे क्षितिज
तुमको खोजता हूँ.
ओ हमारे सांस के सूर्य!
सांस की गंगा
अनवरत बह रही है
तुम कहाँ डूबे हुये हो?’

नीलिमा के उत्तर की सहजता ने मिथिलेश वाचस्पति को उत्साहित किया था- ‘मुझे लग रहा है कि हमें अब एक मांसल भरे-पूरे स्पेस की अपने बीच रचना करनी चाहिए. तुम पागल, मैं उत्तेजित यह सुंदर और अप्रत्याशित है.’

मिथिलेश वाचस्पति के शब्द नीलिमा के लिए किसी झटके से कम नहीं थे. उसे वर्तिका की बातें याद हो आईं. उसे भी वह कविप्रिया और चारुशीला जैसे शब्दों से ही संबोधित करता थाऔर अब यह पूरा का पूरा संदेश!बिलकुल वही,शब्द-दर-शब्द... मिथिलेश वाचस्पति के इन्हीं शब्दों से तो वह आहत हुई थी. उसने ठीक ही तो कहा था वर्तिका से कि यह कवि किसी स्त्री को देखते ही इसी तरह लोलुप हो उठता होगा.  यह सोचते हुये कि उसने अबतक जाने कितनी स्त्रियॉं के आगे अपनी ये कुंठायें उड़ेली होंगी नीलिमा ने  मोबाइल स्वीच ऑफ कर दिया.

नीलिमा के लिए किसिम-किसिम की कल्पनाओं के रोमांच से दिन भर गुजरते कवि की रात बेचैनियों से भर गई थी. उसकी पत्नी पिछले ही सप्ताह कुछ दिनोंके लिए अपनी बहन के घरजाते हुये सेवक रघुवर शरण को आउट हाउस के बजाय ड्राइंग रूम में सोने का निर्देश दे गई थीं. यह कहते हुये कि आज देर रात तक उन्हें ड्राइंग रूम में कुछ जरूरी फिल्में देखनी हैं मिथिलेश वाचस्पति ने रघुवर शरणको आउट हाउस में भेज दिया. अपनी भाषा में प्रेम करने के कविप्रिया के आग्रह का हृदय से अनुपालन करते कवि के एकतरफा संदेशों की भाषा तत्सम,तद्भव की घुमावदार घाटियों से उतरती हुई देशज शब्दोंकी ‘चकारयुक्त’ तलहटियों तक पहुँच गई थी. मिथिलेश वाचस्पति जैसे नशे में था. संदेश टाइप करते हुये उसकी उँगलियों के पोर जलने लगे थे. प्रणय की उत्कट कामना से लरज़ता कवि मन ही मन नीलिमा की पारिवारिक स्थिति और असुविधाओं का खयाल करते हुये खुद को सांत्वना देने की कोशिश करता रहा. नीलिमा की मोबाइल किसी और के हाथ न हो की आशंकाओं के बीच अपने सुदीर्घ सार्वजनिक जीवन में आई तमाम देशी-विदेशी स्त्रियॉं को याद करते हुये मिथिलेश वाचस्पति ने मोबाइल को ज़ोर से अपनी बाईं मुट्ठी में भींच लिया था. तभी उसे हाल के दिनों में जगह-जगह लगी एक मोबाइल कंपनी के होर्डिंग्स पर चमकते  विज्ञापन की वह इबारत याद हो आई...कर लो दुनिया मुट्ठी मेंऔर उसके दाहिने हाथ की मुट्ठी गॉड हेल्प्स दोज हू हेल्प देमसेल्व्सके मुहावरे को चरितार्थ करने के लिए विकल हो उठी.

अगली सुबह नींद खुलते ही नीलिमा ने मोबाइल ऑन किया. इनबॉक्स मेँ थोक के भाव भरभरा कर गिरे संदेशों की भाषा ने नीलिमा को मिथिलेश वाचस्पति के प्रति नए सिरे से घृणा और गुस्से से भर दिया. उसके मुंह मेंढेर सारा थूक भर आया, वह वाश बेसिन तक गई, कुल्ला किया और मन ही मन मिथिलेश  वाचस्पति को एक भद्दी-सी गाली दी. अभी उसने मिथिलेश वाचस्पति को संदेश भेजने के लिए मोबाइल हाथ मेँ लिया ही था कि वह उसके इनबॉक्स मेँ हाजिर हो गया- ‘बीती विभावरी जाग री!’
‘नमस्ते! कैसे हैं? मोबाइल स्विच ऑफ कर लेने के लिए एक बार  पुनः शर्मिंदा हूँ. पर अचानक पति आ गए थे. क्या करती?’ -  पति शब्द ने पल भर को मिथिलेश वाचस्पति की तेज दौड़ती  बुलेट ट्रेन को झटके से रोक दिया था. यह सोच कर उसे दूर बैठे उस पति नामधारी जीव से ईर्ष्या-सी हुई थी कि जब बीती रात वह प्रेम की उत्कट अभिलाषा लिए सांस-सांस तड़प रहा था  यह पति नामक प्राणी उसकी कविप्रिया के साथ प्रेमरत रहा होगा. लेकिन अपनी पहली प्रेमिका सोनल जो कि अविवाहिता थी को याद करते हुये उसे नीलिमा के शादीशुदा होने का कहीं गहरे संतोष भी मिला. नीलिमा कम से कम उसकी तरह प्रणय के बाद परिणय की जिद पर तो नहीं उतर आएगी... कितनी मुश्किल से पीछा छुड़ाया था उसने सोनल से...

‘तुमने बिलकुल सही किया नीलिमा!. मुझे तुम्हारी बुद्धिमता पर प्यार आ रहा है. वैसे तुम्हारे पति क्या करते हैं?’

‘स्टेशनरी की दूकान है. अभी उनके लिए नाश्ता तैयार करना है. दस बजे उनके दूकान चले जाने के बाद मैसेज करूंगी. आप इस बीच कुछ मत लिखिएगा. मेरे संदेश की प्रतीक्षा कीजिएगा, मैं पहली फुर्सत में आपको मैसेज करूंगी.‘ मिथिलेश वाचस्पति के जवाब की प्रतीक्षा किए बिना नीलिमा ने मोबाइल रख दिया.

मिथिलेश वाचस्पति की खुशी का ठिकाना नहीं था. वह तो जैसे बादलों पर सवार था. उसने घड़ी पर नज़र दौड़ाई, दस बजने में अभी एक घंटा तेईस मिनट की देरी थी. यह उसके लिए प्राणायाम का समय था. अनुलोम-विलोम के दौरान हर एक सांस के आरोह-अवरोह में उसे नीलिमा की उपस्थिति का अहसास हो रहा था... जैसे साक्षात नीलिमा ही प्राणवायु की तरह उसके भीतर आ-जा रही हो... पद्मासन में बैठ जब उसने खुद को एकाग्र करने की कोशिश करते हुये आँखें बंद की, उसकी कल्पनाशीलता अपने चरम पर थी... उसे लगा जैसे वह किसी नदी के तट पर काव्य सृजन में तल्लीन है और दूसरे किनारे पर अपने सम्पूर्ण दिगंबर वैभव के साथ खड़ी नीलिमा जैसे उसी की प्रतीक्षा कर रही है... सहसा हरिवंश राय बच्चन की पंक्ति उसके रोम-रोम को पुलकित कर गई... ‘मधुर प्रतीक्षा ही जब इतनी प्रिय तुम आते तब क्या होता...?’

दस बजे के लिए वह खुद को ऐसे तैयार कर रहा था जैसे वह सचमुच नीलिमा के साथ डेट पर जाने वाला हो. नहाने के पूर्व उसने कुछ ही दिनों पहले मैसूर विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित एक सेमीनार के दौरान उपहार स्वरूप प्राप्त मैसूर सैंडल सोप की नई-नकोर बट्टी निकाली. नहाने के बाद इंपोर्टेड बॉडी लोशन से अपनी त्वचा को एक नई नरमी बरती, पार्क एवेन्यू का पसंदीदा डीयो लगाया और कल ही लौंड्री से आय हुये कपड़ों में से एक रेशमी कुर्ता-पाजामा निकाल कर अपना वस्त्राभिषेक करने के बाद ड्रेसिंग टेबल के आगे आ खड़ा हुआ. उसकी ढीली पड़ चुकी त्वचा ने आज एक खास तरह का आत्मविश्वास ओढ़ लिया था. ड्राइंग रूम में आकर सोफ़े पर बैठते हुये उसने मोबाइल को हाथ में ले कर चूमा फिर उसे अपनी पलकों से ऐसे लगाया जैसे पहली बार नीलिमा की मुलायम उँगलियों को अपने प्यार का स्पर्श दे रहा हो... हमेशा की तरह रघुवर शरण कप, चम्मच और शुगरफ्री सहित चाय की केतली रख गया था. उसने आवाज़ देकर एक और कप मंगाई और दोनों कपों को अगल-बगल रखते हुये दरवाजे की तरफ कुछ इस तरह देखा जैसे अभी-अभी नीलिमा आएगी और वे दोनों साथ ही चाय पीएंगे.कवि उल्लसित था... प्रसन्न था... आतुर था... प्रतीक्षा में था... उसकी नज़रें सामने दीवार पर लगी घड़ी की सुइयों में उलझी थी. उधर घड़ी की सुइयों ने दस बजने का संकेत किया और इधर मोबाइल का हृदय नीलिमा के संदेश के साथ झंकृत हो उठा...

‘क्या कर रहे हो कवि...?’ नीलिमा ने जानबूझकर उसी संदेश को आगे बढ़ाया- ‘माफ कीजिएगा, क्या कर रहे हैं, कवि?’
‘इसमें माफी क्यों? तुम्हें तुम ही कहना चाहिए मुझे... उम्र और वय की सीमा से बहुत दूर, प्रेम तो बराबरी का रिश्ता है...’
‘सच कहूँ तो चाहती तो मैं भी हूँ, लेकिन ‘तुम्हारी’, नहीं-नहीं... ‘आपकी’ उम्र को देखते हुये मुझे यह शोभा नहीं देता.‘
क्या औपचारिकता प्रेम को शोभा देती है?
नीलिमा ने बात को बिना कोई तूल दिये कवि के इसरार पर अपनी स्वीकृति की सील लगा दी... ‘तुम भी न!’
नीलिमा के संक्षिप्त संवाद की कलात्मकता पर रीझते हुये मिथिलेश वाचस्पति ने पेंग आगे बढ़ाई –‘सोचता हूँ, जो इतना कम बोलती है, उसकी आवाज कितनी मीठी होगी.‘
‘चाहती तो मैं भी हूँ की तुम्हारी आवाज़ सुनूँ, लेकिन...’
‘लेकिन...? मैं अभी तुम्हारी इच्छा पूरी किए देता हूँ.’
‘माफ करना मेरे कवि, मैं बात नहीं कर पाऊँगी. घर में सास-ससुर हैं. मोबाइल साइलेंट रख कर मैसेज तो कर सकती हूँ, लेकिन...’
मिथिलेश वाचस्पति ने नीलिमा के शब्दों के पीछे छुपी विवशता को गहनता से महसूस करते हुये लिखा था... ‘बताओ, मैं तुम्हारी मदद कैसे कर सकता हूँ? तुम कहाँ रहती हो?’
‘तुम मेरी मदद करना चाहते हो यह मेरा सौभाग्य है.‘ नीलिमा ने जानबूझ कर उसके दूसरे प्रश्न को अनुत्तरित छोड़ दिया.
‘यह तो बताओ प्रिये कि तुम कहाँ रहती हो? और हाँ, निराश होनेकी जरूरत नहीं, कोई न कोई रास्ता अवश्य निकलेगा.’

नीलिमा असमंजस में थी... सही जगह बता दिया तो कहीं यह घर तक न आ धमके... पर गलत भी कैसे बताए... कहीं उसने मोबाइल नंबर की लोकेशन ट्रेस की तो...? मिथिलेश वाचस्पति से बातचीत करते हुये पहली बार नीलिमा थोड़ा परेशान हुई...  क्यों न वह जिला मुख्यालय का नाम ही लिख दे. यह न झूठ होगा न सच... वैसे भी जिला मुखयालय उसके कस्बे से कोई चालीस किलोमीटर दूर है... आ भी गया तो यहाँ तक नहीं पहुँच पाएगा... नीलिमा अभी इसी उधेड़बुन में थी कि मिथिलेश वाचस्पति के तीन मैसेज एक के बाद एक आ पहुंचे...

‘कहाँ गई प्रिये?’
‘चारुशीले!’
‘नीलिमाआआआ!!!’

मिथिलेश वाचस्पति की आकुलता ने एक बार फिर से नीलिमा को सहज कर दिया था. उसने भी उसी तरह के गतिधर्मी शिल्प में एक के बाद एक तीन मैसेज जड़ दिये...

‘बाथरूम गई थी.’
‘तनिक धीरज तो रखो मेरे कवि!’
‘सिंगरौली, मध्य प्रदेश में रहती हूँ.’

बाथरूम की बात सुनते ही एक बार फिर मिथिलेश वाचस्पति बादलों के रथ पर सवार हो गया... उसे लगा जैसे वह मेघदूत है और नितंबों से सरके वस्त्र को अपने हाथों से सम्हालती नीलिमा साक्षात गंभीरा नदी, जिसके तट से नीला जल उतरने के बाद उसे बेंत की झुकी हुई डालियाँ छू रही हैं. अबतक दर्जनों स्त्रियॉं के निर्वसनदेह-तट के आस्वाद ग्रहण कर चुका मिथिलेश वाचस्पति अपनी इन कल्पनाओं में ठहर-सा गया था...

“तस्याः किंचितकरधृतमिव प्राप्तवानीरशाखं
नीत्वा नीलं सलिलवसनं मुक्तरोघोनितम्बम. 
प्रस्थानं ते कथमपि सखे! लम्बमानस्य भावि
शातास्वादो विवृतजघनां को विहातुंग समूर्थः॥”

कालिदास के मेघदूतम की पंक्तियाँ अपने सम्पूर्ण अर्थ-वैभव के साथ कवि के अणु-अणु में साकार हो रही थीं. उसने सोचा कविता शब्दों से केलि है... केलि यानी पूर्वरंग...जैसे चुंबन, स्पर्श, कुचमर्दन... और हाँ, जब कोई कविता पाठक के मर्म को भेद दे तो वह शब्दों से संभोग है...कविता की इस अनुपम परिभाषा को आविष्कृत करते हुये मिथिलेश वाचस्पति मन ही मन कविकुलकुरु कालिदास का धन्यवाद ही कर रहा था कि मोबाइल पर संदेश प्राप्ति की सूचना ने उसे अपने ड्राइंग रूम में ला दिया.

‘चुप क्यों ही गए मेरे कवि? कविप्रिया के दूरस्थ होने ने निराश तो नहीं कर दिया?’

‘जब कवि और कविप्रिया के हृदयो के तार इस अंतरंगता से जुड़े हों तो भौगोलिक दूरी मायने नहीं रखती. मैं तो सिंगरौली की यादों में खो गया था.’
‘क्या आप जानते हैं सिंगरौली को...?’ नीलिमा ने सोचा कहीं स्थान का नाम बता कर उसने कोई गलती तो नहीं कर दी?
‘सिंगरौली को कौन नहीं जानता... निर्मल वर्मा ने कभी सिंगरौली पर एक बहुत खूबसूरत किताब लिखी थी. मिले तो कभी पढ़ो उसे. हाँ, नौकरी के शुरुआती कुछ साल मैं रीवा में पदस्थापित भी था.  इसलिए सिंगरौली सुनते ही अतीत की स्मृतियाँ किसी पुराने प्रेम की तरह ताज़ा हो गई...’
कवि के शब्दों ने नीलिमा की बढ़ आई आशंकाओं पर विराम लगा दिया था... ‘पुराने प्रेम की तरह...? या फिर कोई पुराना प्रेम ही याद हो आया?’
‘तुमसे प्रेम करता हूँ, झूठ नहीं कहूँगा. दस-बारह वर्षों से अकेला हूँ. पत्नी हैं, पर उनके साथ भी प्रणय नहीं. इतना लंबा जीवन है तो प्रेम भी कई किए... देश और विदेश दोनों जगह... मेरे संबंध ज्यादातर नृत्य और ललितकला की दुनिया की स्त्रियॉं से रहे हैं. पर अब सिर्फ तुम, नीलिमे!’
‘पत्नी के साथ ऐसा क्यों?’
‘उम्र भी कोई चीज होती है नीलिमा!’
सारी दोपहर नीलिमा इसी तरह के छोटे-छोटे प्रश्नों से मिथिलेश वाचस्पति को उकसाती रही और वह अपने जीवन के ‘वीरगाथा काल’ के तमाम किस्से रीतिकालीन सौंदर्य वैभव के साथ रस-ले-ले कर सुनाता हुआ बीच-बीच में अपना प्रणय निवेदन कभी संकेतों में तो कभी प्रत्यक्षत: दुहराता रहा. जब नीलिमा ने खाना बनाने की बात करते हुये जाने की बात की तो कवि एक बार फिर से मनुहार पर उतर आया... ‘प्रिये शेष बहुत है बात अभी मत जाओ...’
नीलिमा ने एक नए अर्थबोध के साथ बच्चनजी की ही एक पंक्ति से जवाब दिया था... ‘क्या तुंझ तक ही जीवन समाप्त?’
‘जाओ, पर एक आग्रह है...’
‘क्या?’
‘आज रात सोने के पहले तुम्हारी आवाज़ सुनना चाहता हूँ...’
‘मैंने कहा न इतना निरापद नहीं है यह मेरे लिए...’
‘प्लीज... बस एक बार...’
‘तुम्हारी इच्छा नहीं पूरी करके मैं खुद से शर्मिंदा हूँ कवि! पर तुम चाहो तो एक कम कर सकती हूँ...’
‘क्या?’ मिथिलेश वाचस्पति अधीर हुआ जा रहा था.
‘रात को सोने के पहले अपनी सांसें सुना सकती हूँ... लेकिन एक शर्त है...’
अपने आग्रह और नीलिमा की शर्त के बीच उसके साँसों की कल्पना करता कवि इस वक्त किसी भी बात के लिए तैयार हो सकता था. उसने बिना किसी देरी के कहा- ‘बोलो, तुम्हारी हर शर्त मंजूर है.’
‘मैं चाहती हूँ, मेरे साँसों को तुम अपनी एक नई कविता का उपहार दो... एक कविता अपनी कविप्रिया के लिए लिखो.’
‘जरूर लिखूंगा.’
‘तुम अपनी सांसें सुनाना... मैं तुम्हें कवितायें सुनाऊँगा...’
‘तो फिर इजाजत दो अभी... रात को ठीक साढ़े दस बजे मैसेज करूंगी...’
‘जाते-जाते एक नखशिख चुंबन तो कर लूँ चारुशीले!’...नीलिमा जा चुकी थी.

नीलिमा के प्यार से आप्लावित मिथिलेश वाचस्पति शाम की चाय के साथ लिखने की मेज पर था. खुद से मुखातिब उसने सोचा-‘कहाँ से आई है यह सुंदरी...? किस आकाश से...? किस नक्षत्र से...? ऐसी शब्दप्रिया तो आजतक मुझे कोई नहीं मिली... अबतक जो भी मेरे जीवन में आईं, सब कुछ न कुछ चाहतीथीं... किसी को नौकरी चाहिए थी... किसी को मनचाही जगह पोस्टिंग... खुद मैंने भी बढ़कर किसी को फ़ेलोशिप दिलाई, किसी को पुरस्कार दिलवाया... कुछ की पाण्डुलिपियों की अनुशंसा की तो  कुछ की कवितायें सुधारी...  और बदले में आकंठ रस से डूबा रहा... लेकिन नीलिमा को मुझसे कुछ नहीं चाहिए... यह तो मेरी मदद की पेशकश पर भी चुप रही. यह मुझ तक सिर्फ मेरी कविताओं के रास्ते चल कर आई है...’नीलिमा के इस व्यवहार से वह जितना खुश और विस्मित था, उतना ही भारहीन भी... जीवन की संध्या में प्रेम के इस अद्भुत आस्वादन की संभावनाओं में डूबे कवि ने उस शाम जाने कितने पन्नों पर कुछ शब्द लिखे, काटे और कचरा पेटी में फेंक दिया. जाने यह उसकी उत्तेजना का प्रभाव था या नीलिमा जैसी अभूतपूर्व प्रेमिका के वैभव का दबाव, अपनी भाषा में एक समर्थ प्रेम कवि के रूप में वर्षों से ख्यात मिथिलेश वाचस्पति आज अपनी प्रेमिका को उपहार देने के लिए एक कविता लिखने में खुद को असमर्थ पा रहा था.

बहुत देर की मशक्कत के बाद मिथिलेश वाचस्पति ने एक कविता लिखी. नीलिमा की नीली आभा में आपादमस्तक डूबा खुद को ही बोल-बोल कर कई बार उस कविता को सुनाया और आश्वस्त होने के बाद नीलिमा को याद करते हुये कागज के उस टुकड़े को अपनी पलकों से लगाकर रात के साढ़े दस बजे तक के लिए मेज की दराज में सुरक्षित रख दिया.

रात्रि भोजन के तुरंत बाद मिथिलेश वाचस्पति ने आज भी रघुवर शरण को आउट हाउस में भेज दिया. ठीक साढ़े दस बजे उसकी मोबाइल का दिल धड़का–‘दृगम्बु आ दुकूल में!’
कविप्रिया के विलक्षण व्यंजनाबोध पर कवि एक बार फिर मुग्ध था. कोई आँसू की तरह अपनी आँखों में बुलाये, प्रेम में आमंत्रण का इससे ज्यादा स्पर्शी व भावप्रवण तरीका और क्या हो सकता है. कवि ने कविप्रिया के संदेश की कलात्मकता का पूरा सम्मान करते हुये उत्तर लिखा-  

‘घड़ी दो घड़ी मुझको पलकों पे रख
यहाँ आते-आते जमाने लगे.‘

पिछले कुछ महीनों में प्रेम कवितायें पढ़ते हुये नीलिमा को बशीर बद्र की जाने कितनी गज़लें जुबानी याद हो गई थीं. एक बार उसका मन हुआ कि वह उत्तर में उनकी इसी गजल का दूसरा शेर लिख दे- ‘हुई शाम यादों के इक गाँव में / परिंदे उदासी के आने लगे’ लेकिन ‘कुत्ता-कवि’ की कुपात्रता ने उसे ऐसा करने से रोक दिया और उसने लिखा- “बहुत हुई तुम्हारी शायरी... जल्दी कॉल करो. बाथरूम में हूँ. और हाँ, याद है न समय सिर्फ दस मिनट हैं मेरे पास. जिसमें तीन मिनट बीत चुके हैं.‘ नीलिमा के शब्द में परिहास से ज्यादा तल्खी थी.

मिथिलेश वाचस्पति का दिल बहुत तेज गति से धड़क रहा था. अपनी साँसों को सम पर लाने की असफल कोशिश करते हुये उसने नीलिमा को फोन लगाया. अभी एक भी रिंग पूरी नहीं हुई थी कि दूसरी तरफ से फोन उठ गया...
मिथिलेश वाचस्पति ने अपनी आवाज़ में एक खास तरह की लरज़ घोलते हुये कहा- ‘नीलिमा! कैसी हो प्रिये? कहाँ रही इतने दिनों?’

जवाब में जब नीलिमा ने कुछ गहरी सांसें भेजी तो कवि को याद आया कि उसे तो कविता सुनानी थी और नीलिमा को सिर्फ सांसें... हड़बड़ी में उसने मेज की दराज से अपनी कविता निकाली और बहुत ही नाटकीय अंदाज़ में पढ़ने लगा...

‘अपने ऊपर औंधे पड़े आकाश की छाया में
हरित धरती ने ओढ़ ली है उसकी नीलिमा
धरती की सम्पूर्ण काया को अनावृत्त करते हुये
आकाश खोजता है
नक्षत्रों की तरह दीप्त गोलार्द्ध
एक पर्वत उतर रहा है हरी उपत्यका में
आकाश की नीलिमा गहराती है
उत्तेजित हो काँपती है हवा
आकाश द्रवित होता है
और कुछ देर के लिए सो जाता है.’

कवि ने महसूस किया कि उसकी कविता ने नीलिमा की साँसों को उत्तेजित कर दिया है और वह उसकी ऊष्मा में पिघला जा रहा है... ‘यह उपहार कैसा लगा प्रिये, जरूर बताना.’
‘नीलिमा, तुम्हारी सांसें मुझे ही पुकार रही हैं न?’

‘तुम्हारी हर सांस पर मैं अपने चुंबन टाँक रहा हूँ, इसे महसूस करो नीलिमा! इस वक्त मेरा  अणु-अणु तुम्हें ही पुकार रहा है.  मैं सिंगरौली को पुकारता हूँ... रिहंद डैम के विस्तार को पुकारता हूँ... रीवा के किले के कंगूरे को पुकारता हूँ... उन सभी जगहों को पुकारता हूँ जहां-जहां तुम जा चुकी हो, रह चुकी हो... तुम्हारे वक्षों में फुदकती नन्ही गौरैयों को पुकारता हूँ... तुम्हारे कुचों के खट्टेपन को पुकारता हूँ... तुम्हारे श्यामल चिकुर-जालों को पुकारता हूँ... नीलिमा! मेरी रतिप्रिया! कवि के शब्दों को आज कविप्रिया ने अपनी सांसें दी हैं... यह पल इतिहास में अमर हो गया...’

दो चार और गहरी तथा तेज सांसें सुनाने के बाद नीलिमा ने फोन काट दिया. मिथिलेश वाचस्पति को इसका इल्म तब हुआ जब उसके हाथ में कैद मोबाइल ने संदेश प्राप्त होने की सूचना दी... ‘कमरे में जा रही हूँ. अब कोई मैसेज मत भेजना. कल बात होगी. शुभरात्रि! 

नींद जैसे मिथिलेश वाचस्पति की आँखों का रास्ता भूल गई थी. कभी करवटें बदलते तो कभी कमरे में चहलकदमी करते कवि को लग रहा था जैसे वह  नीलिमा की साँसों से विनिर्मित किसी वाष्पागार में पहुँच गया हो. उसकी साँसों की आवाज़ जैसे उसके कानों से गुजरती हुई उसके सीने मैं कैद हो गई थी. उसे सूझ नहीं रहा था कि क्या करे... फ्लैट से नीचे उतर कर सोसायटी के लॉन में टहलने चला जाये...एफ एम पर पुराने फिल्मी गीत सुने या कि मेघदूतम का सस्वर पाठ करे... कुछ देर अलग-अलग विकल्पों पर सोचने के बाद वह बाथरूम में घुस गया. कोई पंद्रह मिनट बाद जब वह शावर ले कर कमरे में लौटा उसके पैरों में बिरजू महाराज की थिरकन शामिल हो आई थी. उसने म्यूजिक सिस्टम पर बहुत ही धीमी आवाज़ में पंडित हरि प्रसाद चौरसिया की बांसुरी लगा दी और पिछले दिनों आई पत्रिकाओं के पन्ने पलटने लगा... उसकी नज़रें एक कविता  पर ठिठक गईं-

‘सारी रात
सोया पड़ा रहा चाँद
मेरे सिरहाने
भोर तक जागती रही मैं...
कितने सारे पंख उड़े
कितनी नदियां भर गईं लबालब
पुराने गाढ़े शहद से भर गया मुख
मेरी देह धरती की गोलाई में सिमट गई
असंख्य दिल हवा में धड़के
हमने पाया एक दूसरे को वैसे ही 
जैसे आसमान...  जैसे मेघ...
जैसे तुम्हारे चुंबनों से भीगे मेरे होठ...’

कवि ने गौर किया यह निवेदिता की कविता थी... उसे लगा जैसे निवेदिता की जगह अनायास ही नीलिमा का नाम उग आया है... तो क्या सुदूर सिंगरौली के अपने शयन कक्ष में नीलिमा भी अभी उसी की तरह जाग रही होगी...? 
अगले दिन नीलिमा का संदेश देर से आया- ‘कल बड़ी मुश्किल से बची... उन्होने कमरे में आते ही मोबाइल मांग लिया था. वो तो अच्छा हुआ कि बाथरूम से मैं सारे संदेश मिटा कर आई थी.’
‘थैंक गॉड! मैं तो कहने ही वाला था कि सारे संदेश हाथ के हाथ मिटा दिया करो, नहीं तो डैंजरस हो सकता है. वैसे भी तुम्हारे उत्कट साहस पर मैं चकित हूँ. जो सुरक्षित है वही करो.’
‘हाँ. मैं आज बगल के एक लड़के से कह कर नया सिम मँगवा रही हूँ. इस नंबर से ज्यादा बात करना ठीक नहीं..’
‘तुमने सही सोचा है. जितनी जल्दी हो सके नया सिम ले लो.’ .
‘खैर, रात नींद अच्छी आई? नीलिमा ने जैसे मिथिलेश वाचस्पति को मीठी-सी चिकोटी काटी थी.‘
‘नींद ही कहाँ आई कि अच्छी या बुरी कह सकूँ... तुमने ऐसी प्यास जगा दी कि...’
‘मेरे बूढ़े कवि! कभी इस भूख-प्यास से कुछ इतर भी सोच पाते हो क्या तुम?’
मिथिलेश वाचस्पति को अपनी उम्र का पूरा अंदाजा था लेकिन नीलिमा के मुंह से बूढ़े कवि  सुनकर उसे बहुत बुरा लगा. उसने बातचीत की दिशा बदलनी चाही- ‘तुमने मेरे उपहार के बारे में कुछ नहीं कहा. कैसी लगी कविता?’
‘सोचा था कुछ नहीं कहूँगी. पर जब तुमने पूछ ही लिया है तो झूठ नहीं कह पाऊँगी...वह कविता कम तुम्हारी कुंठाओं का वमन ज्यादा लग रही थी...’ नीलिमा ने कवि को ज़ोर का झटका ज़ोर से ही दिया था.
मिथिलेश वाचस्पति ने अपने पाँच दशकीय कवि जीवन में  अपनी कविताओं की ऐसी सीधी आलोचना कभी नहीं सुनी थी. वह आहत था. उसे कुछ सूझ नहीं रहा था कि क्या कहे. नीलिमा ने उसकी चुप्पी को पढ़ते हुये उसे पुचकारा- ‘लेकिन तुमने मेरे लिए कुछ लिखने की कोशिश की इस बात की प्रशंसा करती हूँ. काश तुम समझ पाते कि मेरे भीतर एक बौद्धिक पिपासा भी है.’
नीलिमा के इन शब्दों ने कवि को थोड़ी राहत दी थी... ‘दरअसल तुम्हारा मिलना इतना अकस्मात और सुन्दर है कि तुम्हारे सिवाइन दिनों कुछ और सूझता ही नहीं.’
‘जो सुन्दर है उसे सहेज कर रखो कवि! इतनी व्यग्रता शीघ्र ऊब का कारण बनेगी.’
‘तुम लिखती भी हो? तुम्हारी भाषा मुझ शब्दविपुल कवि को भी चकित करती है.’
‘काश मैं भी कुछ लिख पाती! लेकिन पढ़ने का सुख भी कुछ कम नहीं होता.‘
कृति : Egon Schiele

‘लिखा भी करो... और अब तो तुम्हारा कवि भी तुम्हारे साथ है. तुम एक सफल लेखक बन सको इसके लिए मुझसे जो भी संभव होगा करूंगा.’ मिथिलेश वाचस्पति ने सोच समझ कर उस फार्मूले का इस्तेमाल किया था, जिसके जाल में अमूमन नई यशाकांक्षिणी लेखिकाएं आसानी से आ जाती हैं.
‘शुक्रिया मेरे कवि!’ नीलिमा ने थोड़ी देर पहले मिथिलेश वाचस्पति को दिये घाव पर जैसे मरहम का लेप लगाया था.
मिथिलेश वाचस्पति नीलिमा के व्यवहार से किंचित परेशान था. उसे वह बहुत अप्रत्याशित लग रही थी. जाने कब चिकोटी काट ले और कब रुई के नरम फाहे-सी हो जाये. मन ही मन नीलिमा के व्यक्तित्व व व्यवहार की समीक्षा करता कवि अपने भीतर संचित सारे साहसों को बटोरते हुये एक बार फिर कविप्रिया से मुखातिब था- ‘हम कब मिल रहे हैं? कितनी जल्दी और कहाँ?
तुम्हारी इस व्यग्रता के कारण जितना मैं तुमसे प्यार करती हूँ. उतना ही मुझे भय भी होता है... ‘काश तुम समझा पाते कि मैं साहित्य की राजधानी दिल्ली में रहनेवाली कोई लेखिका नहीं जिसके लिए कहीं भी आना-जाना बहुत सुलभ होता है. मैं मध्य प्रदेश के छोटे से जिले में रहने वाली एक मध्यवर्गीय गृहिणी हूँ, मेरे कवि!’
‘समझा सकता हूँ. कोई बहाना चाहिए तो सोचें?’
‘बहाना?’
‘हाँ, बहाना ही... कोई सेमिनार या कल्पित आयोजन...  इस तरह तुम्हारे आने-जाने और ठहरने की व्यवस्था भी हो जाएगी.’
’यह गुड्डे-गुड़िया का खेल नहीं है मेरे नखदंतविहीन कवि! तुम्हारी दिल्ली तक आना मेरे लिए संभव नहीं.’
नीलिमा के सम्बोधन से एक बार फिर मिथिलेश वाचस्पति तिलमिला गया था. पर तिलमिलाने के सिवा वह कर भी क्या सकता था?  बस इतना ही कह पाया- ‘तो जबतक उचित अवसर खुद ही चलकर आए, हम शब्दों से ही काम चलाते हैं.‘ कवि के शब्दों में तंज़, खीज और कुंठा के भाव समवेत रूप से शामिल थे.
कविप्रिया ने अपना जवाब उसी शिल्प में भेज दिया- ‘तुम्हारे शब्द-सामर्थ्य से पूरी तरफ वाकिफ हूँ मेरे कवि! बोलो और क्या चाहते हो इन शब्दों के माध्यम से?’
‘चारुशीले! तुम्हारा जलाभिषेक करने को मेरे शब्द व्यग्र हुये जा रहे हैं... ये तुम्हारे अंतरतम को, गर्भ की अतल गहराइयों तक छूना चाहते हैं.’
‘तुम जो चाहो कहो, करो... तुम्हें किसने रोका है कवि?’
‘रोका नहीं, पर आमंत्रित भी तो नहीं किया मेरी रतिप्रिया!’
‘तुमने आमंत्रण की प्रतीक्षा ही कब की है...  संकोच का केंचुल तुमने कब से धारण कर लिया मेरे वृद्ध कवि?’
वृद्ध कवि के सम्बोधन को किसी गरल घूँट की तरह पीकर मिथिलेश वाचस्पति ने अपनी अमृत-कामना प्रकट की थी- ‘मैं अभी तुम्हारी नाभि के नीचे चूम रहा हूँ.... ठीक इसी वक्त तुम क्या कर रही हो नीलमप्रिये?’
‘बुरा मत मानना मेरे कवि! अभी तो बहुत ज़ोर की बाथरूम लग रही है... अपना मुंह हटाओ... जाने दो मुझे,वर्ना अनर्थ हो जाएगा...’ कविप्रिया के संदेश के संकेतार्थों ने कवि का जायका बिगाड़ दिया था... जीवन में जाने कब-कब और कितनी तरह की अवमानाएँ उसे झेलनी पड़ी थी, पर अपमान का इतना कड़वा घूंट वह पहली बार पी रहा था....

कदम-दर-कदम किसी कुशल सेनापति की तरह ब्यूह रचना करती नीलिमा मिथिलेश वाचस्पति के लिजलिजेपन से हतप्रभ थी.... जीवन मेँ कभी उसका साहित्य से अनुराग नहीं रहा, पर पिछले कुछ महीनों में कविताओं की खूबसूरत दुनिया से गुजरते हुये उसने खुद को नए सिरे से आविष्कृत किया था... साहित्य के अपरिमित खजानों को देख कई बार वह भीतर तक उदास हो जाती... जीवन के कितने सारे कीमती वर्ष उसने यों ही गुजार दिये... कविता उसकी नज़र में सबसे बड़ी पाठशाला का दर्जा ले चुकी थी.  पर कवियों की जिस सुदीर्घ परंपरा ने साहित्य के प्रति उसके पूर्वाग्रहों को ध्वस्त कर उसे ज़िंदगी की नई अर्थ-छवियों से परिचित कराया उसके आगे  मिथिलेश वाचस्पति का नाम देख वह गहन तकलीफ से भर जाती थी... वर्तिका की निर्दोष बातें अक्सर उसका रास्ता रोक खड़ी हो जातीं...’`जरूर मुझी में कोई कमी होगी... उनसे बात करते हुये मेरे शब्दों का चयन ही गलत रहा होगा कि उन्होने मेरे लिए ऐसा सोच लिया...’ नीलिमा ने मिथिलेश वाचस्पति की रंगीनीयों के कई किस्से सुन रखे थे. पर वर्तिका के लिए तो वह किसी दूसरी दुनिया से उतर कर आया कोई दिव्य पुरुष था... संवेदनाओं का शास्वत पुंज! जिसकी आभा के आगे वह ठीक से आँखें भी न खोल पाती थी... नीलिमा ने सोचा वर्तिका इस तरह की अकेली लड़की नहीं है... कविताओं की रौशन दुनिया से गुजरते हुये कई बार किसी सर्जक की वैसी ही प्रतिमा उसके मन में भी तो बन उठती है... और तब मिथिलेश वाचस्पति की कुंठाओं पर एक बार जैसे उसे ही भरोसा करने को जी नहीं चाहता... पर जो सच दिन की रोशनी की तरह साफ है उससे मुंह भी कैसे फेरा जा सकता है? एक कवि की इस तरह अवमानना करना खुद उसे भी अछा नहीं लगता, लेकिन मिथिलेश वाचस्पति की लपलपाती अधीरताएं उसे गुस्से और नफरत से भर देती हैं...

मिथिलेश वाचस्पति की चुप्पी को महसूस करते हुये नीलिमा ने यह समझ लिया था कि परिहास के लिबास मेँ लिपटी अपमान की ध्वनियाँ शब्दविपुल कवि तक ठीक से संप्रेषित हो चुकी हैं. अपमान की तीखी धूप से झुलसे कवि के चेहरे पर कविप्रिया ने केवड़े का जल छिड़का था- ‘अगले महीने की तेईस तारीख को किसी शादी मेँ शामिल होने के लिए जबलपुर जा रही हूँ.‘

मिथिलेश वाचस्पति के मुंह मेँ अनायास ही घुल आया अविश्वास का शहद उसके शब्दों तक उतर आया था... ‘तुम कोई परिहास तो नहीं कर रही हो चारुशीले?’
‘शंका मत करो मेरे कवि!’

‘तो क्या कवि और कविप्रिया नर्मदानगरी में मिल सकते हैं?’ कुछ ही पल पहले के अपमान को भूल मिथिलेश वाचस्पति एक बार पुनः उम्मीद और नाटकीयता से भरे कौतूहल सिरजने लगा था.
‘चाहती तो मैं भी हूँ ... दो-चार घंटे शॉपिंग वगैरह के बहाने निकल भी सकती हूँ, लेकिन डर लगता है. कहीं किसी को पता चल गया तो....’
‘मेरे रहते तुम्हें डरने की कोई जरूरत नहीं है. मैं आ जाऊंगा... किसी अच्छे और सुरक्षित होटल मेँ रुकूँगा...’

‘इधर मैं सोच कर ही भय से कांप रही हूँ और तुम हो कि होटल तक पहुँच गए...’मिथिलेश वाचस्पति ने टेबल कैलेंडर का पन्ना पलटा... अगले महीने की तेईस तारीख पर गोल घेरा लगाते हुये उसने मन ही मन गणना की... आजसे ठीक 29 दिन और...

‘इस बुढ़ापे मेँ ऐसी आतुरता...’ नीलिमा आगे लिखना चाहती थी- ‘शोभा नहीं देती’, पर रहने दिया.
कवि एक बार फिर तिलमिलाया, लेकिन अभी इसमें उलझ कर वह समय नहीं गंवाना चाहता था... ‘तुम्हारी चिंता समझ सकता हूँ नीलिमा...पर यकीन करो निराश नहीं करूंगा, प्रिये!’
उस शाम नीलिमा जा कर भी जैसे नहीं गई थी... कवि अपनी कल्पनाओं में देर तक उससे बतियाता हुआ कब नींद के आगोश मेँ समा गया उसे पता भी नहीं चला...
29 दिन जैसे पंख लगा कर उड़ गए थे...
‘दरस परस को तरस रही हूँ...’ जब नीलिमा का संदेश आया मिथिलेश वाचस्पति होटल में चेक इन कर रहा था.
‘कह रहा जग वासनामय हो रहा उद्गार मेरा... होटल समदड़िया, रसेल चौक...आने से पहले फोन कर लेना, मैं रिसेप्शन तक आ जाऊंगा.’
कमरे में आने से लेकर अबतक के बीच मिथिलेश वाचस्पति ने एक के बाद एक चार बार चाय बनाई...  अनपियी चाय हर बार प्याली में ठंडी होती रही... उत्तेजना और प्रतीक्षा के तीन घंटे उसके लिए जैसे तीन युग हो गए थे कि तभी मोबाइल की धड़कन कमरे में दाखिल हुई... टेक्नोसेवी महाकवि ने आज के दिन को खास बनाने के लिए मोबाइल में एक खास रिंगटोन सेट कर लिया था... ‘मुझे माफ कर देना कवि, मैं नहीं आ पाऊँगी... मेरे पति अपने साथ ही बाज़ार चलने को कह रहे हैं... मैं डरी हुई हूँ... कहीं उन्हें कोई संदेह तो नहीं हो गया...’

मिथिलेश वाचस्पति के लिए नीलिमा का यह संदेश लहलहाती बालियों पर ओले गिरने जैसा था... उसे काठ मार गया... उसकी नसों का व्यग्र तनाव जैसे अचानक से ढीला पड़ गया था... कुछ मिनटों तक जड़वत बैठे होने के बाद बुझे हुये मन से उसने उत्तर लिखा –‘कोई बात नहीं, मेरा इंतज़ार और दो दिन बरवाद... पर फिर इंतज़ार...’ सेंड का बटन दबाते हुये उसने गौर किया कि यह नीलिमा का पुराना नंबर है... उसे आशंका हुई, फोन कहीं उसके पति के हाथ में न हो... उसने तुरंत ही दूसरा संदेश भजा- ‘सॉरी फॉर द रोंगली सेंट मैसेज.‘

होटल समदड़िया के सबसे खूबसूरत और महंगे सूट का सौंदर्य जैसे अचानक से फीका पड़ गया था... बेड के ठीक पीछे लगी मोनालिसा की पेंटिंग जैसे किसी शोक पत्र में बदल गई थी... मिथिलेश वाचस्पति का दम घुटा जा रहा था... कमरे में एक पल भी रुकना उसके लिए मुश्किल हुआ जा रहा था... उसने घड़ी पर नज़र दौड़ाई, एक घंटे बाद गोंडवाना एक्स्प्रेस का समय है... उसने अपने सामान समेटने शुरू कर दिये... लगेज में पड़े जापानी तेल की शीशी तथा वियाग्रा और फ्लेवर्ड कंडोम के पैकेट जिसे उसने खास इस अवसर के लिए खरीदा था, उसका मुंह चिढ़ा रहे थे... वात्स्यायन द्वारा वर्णित तमाम रति आसानों की कल्पनाओं से उसके मन में उठने-गिरने वाली तरंगे जैसे अचानक से निष्प्राण हो गई थीं... भरी आँखें और भारी हृदय के साथ मिथिलेश वाचस्पति ने उस पैकेट को अभी डस्टबिन के हवाले किया ही था कि उसके मोबाइल की घंटी बज उठी... नीलिमा कॉलिंग...उसे लगा नीलिमा रिसेप्शन पर पहुँच कर फोन कर रही  है और वह मैसेज उसने उसे जानबूझ कर परेशान करने के लिए भेजा था... उसे याद आया कैसे वह पल में चिकोटी काटती है और कैसे अगले ही पल रुई के नर्म फाहे बन जाती है... एक बार पुनः वह उम्मीदों से भर गया था. मोबाइल की घंटी लगातार बज रही थी... उसने डस्टबिन से वह पैकेट निकाला और फोन रिसीव करते ही बोल पड़ा... ‘मुझे विश्वास था तुम जरूर आओगी...’

उधर से किसी पुरुष की आवाज़ गूंजी थी- ‘मैं नीलिमा का पति हूँ. उसने मुझे सबकुछ बता दिया है... हम आपसे मिलने आ रहे हैं.’
‘अब इसके लिए वक्त नहीं. मैं अभी गोंडवाना से दिल्ली लौट रहा हूँ. ऑल द बेस्ट!’ मिथिलेश वाचस्पति के हाथ कांप रहे थे, उसने फोन काट दिया.
अपने पति की आवाज़ के साथ ही नीलिमा नीलेश के बाने में लौट आई थी...
दूसरे दिन नगर भवन पुस्तकालय के उद्यान में नीलेश ने वर्तिका के हाथ में अपना मोबाईल दिया- ‘लो, देख लो अपने महाकवि का असली चेहरा.‘

मिथिलेश वाचस्पति और नीलेश की चैट पढ़ते हुये वर्तिका गहरे आश्चर्य में थी... उसे भरोसा नहीं हो रहा था कि नीलेश इतनी सफाई से नीलिमा बन सकता है... उसे ज़ोर की हंसी आई... वर्तिका और नीलेश देर तक समवेत हँसते रहे... कि तभी अचानक से वर्तिका रुकी, अपनी पर्स से मिथिलेश वाचस्पति की प्रतिनिधि कविताओं का संकलन निकाला... पुस्तक के आवरण पर प्रकाशित कवि की छवि को आग्नेय नेत्रों से देखा और देखते ही देखते उस किताब की चिंदी-चिंदी कर दी... आक्रोश से भरी वर्तिका अब रोए जा रही थी...नीलेश इस दृश्य को देख पहले भयभीत हुआ फिर एक गहरे संतोष से भर आया... वह खुश था कि नीलिमा एक अनावश्यक अपराधबोध से उबर आई है...  लेकिन अगले ही पल वह एक नई चिंता से भर उठा... अब वर्तिका का कहीं कविताओं से ही मोहभंग न हो जाये... मिथिलेश वाचस्पति की बैंड बजाने के लिए प्रेम कवितायें तलाशते हुये स्वप्न, उम्मीद और आस्वाद की जिस दुनिया से उसका परिचय हुआ था, वह नहीं चाहता था कि दुनिया का कोई भी व्यक्ति उससे दूर चला जाये, वर्तिका तो कतई नहीं...




(इस कहानी में प्रयुक्त कविताओं के लिए क्रमशः अशोक वाजपेयी, तुलसीदास, नरेश सक्सेना, शमशेर बहादुर सिंह,जयशंकर प्रसाद, हरिवंश राय बच्चन’,कालिदास, मैथिलीशरण गुप्त, बशीर बद्र और निवेदिता का हृदय से आभार!) 
____________________

राकेशबिहारी

प्रकाशन:       प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में कहानियां एवं लेख प्रकाशित
वह सपने बेचता था, गौरतलब कहानियाँ (कहानी-संग्रह)
                केन्द्र में कहानी (आलोचना) 
                समालोचन के लिए कहानी केन्द्रित लेखमाला भूमंडलोत्तर कहानी 

सम्पादन :       स्वप्न में वसंत (स्त्री यौनिकता की कहानियों का संचयन)
                पहली कहानी : पीढ़ियां साथ-साथ (निकट पत्रिका का विशेषांक)
                समय,समाज और भूमंडलोत्तर कहानी (संवेद पत्रिका का विशेषांक)
                बिहार और झारखंड मूल के स्त्री कथाकारों पर केन्द्रित 'अर्य संदेश'का विशेषांक
                अकार 41 (2014 की महत्वपूर्ण पुस्तकों पर केन्द्रित)
                रचना समय- कहानी विशेषांक दो खण्डों में (जनवरी-फरवरी तथा मार्च 2016)

समपर्क:         मोबाईल:09425823033        ईमेल   :brakesh1110@gmail.com

सबद - भेद : दलित कविता : बजरंग बिहारी तिवारी

$
0
0
By The News Minute








आधुनिक दलित साहित्य की पहली दस्तक कविता के माध्यम से सुनी गयी, १९१४ में सरस्वतीमें हीरा डोम  की कविता अछूत की शिकायतप्रकाशित हुई थी. तब से अबतक लगभग सौ वर्षो की यह यात्रा हमारे सामने है. इन वर्षों में दलित साहित्य शिकायत और शोक से आक्रोश और चेतना की ओर बढ़ा है.

बाबासाहेब आंबेडकर की वैचारिकी और संघर्षशील व्यक्तित्व ने दलित साहित्य को एक तार्किक और मजबूत आधार प्रदान किया है.

आलोचक बजरंग बिहारी तिवारी पिछले कई वर्षों से दलित- साहित्य का विवेचन विश्लेषण कर रहे हैं. इस आलेख में उन्होंने विस्तार से दलित कविता की यह यात्रा  प्रस्तुत की है.


दलित कविता : प्रश्न और परिप्रेक्ष्य

बजरंग बिहारी तिवारी




(क)
विगत 6 दिसंबर (2017) को जब देश बाबासाहेब आंबेडकर को उनके परिनिर्वाण दिवस पर याद कर रहा था, राजस्थान के राजसमन्द जिले में एक बेहद शर्मनाक घटना हुई. शंभूलाल नामक व्यक्ति ने एक मजदूर मोहम्मद अफराजुल की गैंती से मारकर और जलाकर हत्या कर दी. बंगाल से मजदूरी करने आए अफराजुल की शंभूलाल से कोई निजी दुश्मनी नहीं थी. उसे इस्लाम से नफरत की घुट्टी पिलाई गई थी. उसने हत्या के समूचे कुकृत्य की अपने नाबालिग भतीजे से वीडियो रिकार्डिंग करवायी. यह वीडियो निहायत घिनौना था लेकिन मानसिक रूप से बीमार लोगों ने बड़े पैमाने पर इसे साझा किया. कुछ लोगों ने उसे अपना नायक माना. कलालवटी मुहल्ले का शंभूलाल रैगर जाति से है. इस मुहल्ले में रैगर जाति के अतिरिक्त खटीक जाति के लोग रहते हैं. ये दोनों जातियां दलित मानी जाती हैं. तमाम बुद्धिजीवियों और दलित कार्यकर्ताओं ने उचित ही इस व्यक्ति को दलित समुदाय से जोड़कर देखने का विरोध किया. फिर भी, चाहे-अनचाहे व्यापक समाज में यह संदेश तो गया ही कि एक दलित ने ‘लव जिहाद’ से खफा होकर यह कदम उठाया है. वैसे भी इस साल का छः दिसंबर बाबरी मस्जिद ध्वंस की पचीसवीं बरसी के रूप में था. फेसबुक पर सक्रिय शंभू ने ‘दुनिया भर में फैले इस्लामी जिहाद’ को रोकने का संकल्प व्यक्त किया था. शंभूलाल रैगर का फेसबुक पेज ‘शंभू भवानी’ के नाम से है. नाम में यह परिवर्तन असल में शंभू की समझ के विरूपीकरण का परिणाम है. व्यक्तित्वांतरण का यह उदाहरण उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार बेशक अपवादस्वरूप हो लेकिन वस्तुस्थिति इससे भिन्न हो सकती है. ‘मेटामॉरफोसिस’ की यह प्रक्रिया दलित साहित्य के समक्ष विकट चुनौती की तरह है.

क्या दलित रचनाकार इस चुनौती को स्वीकार करने को तैयार हैं? इस प्रश्न के परिप्रेक्ष्य में दलित कविता का अध्ययन करते हुए पता चला कि दलित कवि न केवल इस चुनौती के समक्ष खड़े हैं वरन वे उस पूरी प्रक्रिया को पहचान भी रहे हैं. जो प्रक्रिया एक सामान्य मनुष्य को संवेदनारहित बना देती है, उसे खूंखार दरिन्दे में तब्दील कर देती है उसका संज्ञान लिया जाना अपेक्षित ही नहीं अपरिहार्य भी था. दलित कवियों ने जाति संरचना में निहित हिंसा की, उसकी आविष्ट करने की यानि अपनी गिरफ्त में ले लेने की क्षमता की पहचान अपनी प्रखर सहज प्रज्ञा के बल पर प्रारंभ में ही कर ली थी. पहले आधुनिक दलित कवि के तौर पर माने गए देवेन्द्र कुमार बंगाली (1933-1991) की कविता ‘भेड़िया’ व्यक्तित्वांतरण की प्रक्रिया को कुछ इस तरह पेश करती है-

रात के उन्हीं उन्हीं पहरों में
जिसमें नींद अपनी जवानी पर होती है
वह आता है
और बगल में सोये हुए
बच्चों को उठा ले जाता है.
इससे पहले कि
लोग उसे जाने-सुनें देखें
उसका पीछा करें
एक को छोड़कर ‘वह’
दूसरे गाँव की ओर मुड़ चुका होता है.
फिर लौटकर आये न आये
इससे कोई अंतर नहीं पड़ता
बल्कि उसका आतंक बराबर बना रहता है.
...      ...      ...

उसकी भनक पाते ही
जलती हुई लालटेनों की रोशनी
कहाँ चली जाती है?
या आदमी और उसकी चारपाई के बीच
इतना लंबा फासला कहाँ से आ जाता है?
कि एक अकेला घर पूरा देश बन जाता है
और देश अज्ञात जंगलों का विस्तार
जहाँ से पक्ष-प्रतिपक्ष
किसी भी प्रकार की कोई आवाज
हिचक भी सुनाई नहीं पड़ती.
...      ...      ...

जब तक वह दुबारा लौटकर
आये-आये
तब तक हम या तो उसे पूरी तरह
भूल गए होते हैं
या हमारे हथियारों में
इतने जंग लग चुके होते हैं
या हम इतने परमुखापेक्षी हो चुके होते हैं
कि कोई दूसरा ही उसे मारे तो मारे
वरना हमारे बस का नहीं रहता!

और बच्चे भी
आदमी की शक्ल में
भेड़िया बन चुके होते हैं
किसी और की तलाश में.

(देवेन्द्र कुमार बंगाली,  पृ. 277-8)

अपनी निरंतरता बनाए रखने के लिए हिंसक संरचना कई तरह के जतन करती है. अपने अनुकूल चरित्रों का पुनरुत्पादन, मेटामॉरफोसिस इसी का हिस्सा है. संरचना के हित-चिंतकों को भलीभांति पता होता है कि समूचे समाज को सांचे में नहीं ढाला जा सकता. ढांचे की उत्तरजीविता के लिए न्यूनतम बानगियों का प्रबंध करते रहना उनके लिए ज्यादा मुश्किल नहीं होता.  समाज का जो तबका अपने को अधिकारसंपन्न समझता है वह तो ढाँचे की रक्षा में सन्नद्ध रहता है लेकिन जो अधिकारविहीन, संपदावंचित और (प्रत्यक्ष हिंसा से) उत्पीड़ित तबका होता है उसमे से भी कुछ लोग छाँट लिए जाते हैं. ‘प्रयोगशाला’ में डाले गए ऐसे लोग एक स्थिर और समरूप हिंदू अस्मिता में विश्वास करने लगते हैं. हिंदुत्व की संकल्पना के प्रति निपट अनालोचनात्मक बना दिए गए लोग सुदूर अतीत में स्वर्णकाल का दर्शन करते हुए वर्तमान को संकटग्रस्त मानते हैं. संकट का कारण हमेशा बाहरी हुआ करता है. कभी ईसाई, कभी इस्लाम तो कभी कम्युनिज्म. धर्म और राष्ट्र को एकमेक कर चुके ये लोग संकटनिवारण में अपनी भूमिका तलाशते हुए आसान शिकार की खोज करते हैं. अफराजुल ऐसा ही आसान शिकार बना.

संरचना को निरंतरता प्रदान करने वाली दूसरी श्रेणी अधिक परिष्कृत, सूक्ष्म और अनपहचानी है. इस श्रेणी के लोग प्रयोगशाला के नहीं, परिवेश के उत्पाद होते हैं. यह बाहरी नहीं, अंदरूनी मामला होता है.  इसमें धर्म नहीं, जाति की सक्रियता होती है. जाति-संरचना का उत्पाद बन गए इस श्रेणी के लोग अविचारित घृणा करते हैं. उनकी घृणा का तापक्रम जाति के पदानुक्रम के अनुरूप आरोही क्रम में बढ़ता जाता है. इस प्रतिक्रियात्मक घृणा से सवर्ण अपनी घृणा को औचित्य प्रदान करते हैं. सवर्णसत्ता या ज्यादा सटीक तरीके से कहें तो ब्राह्मणसत्ता का घोर विरोधी व्यक्ति यह नहीं समझ पाता कि वह वास्तव में उस ढाँचे को वैध ठहराने में अपना योगदान दे रहा है!

संतमत के अध्येता वरिष्ठ दलित कवि डॉ. एन. सिंह ने अपनी एक कविता ‘कबूतर और बहेलिया’ में उक्त मेटामॉरफोसिस को बड़े सलीके से उकेरा है. पूरी कविता यों है-

“पंख फड़फड़ाते हुए
कबूतर ने कहा
माफ़ करो
आँख तरेरते हुए
अहेरी
गुस्से में चिल्लाया
तुम नहीं जानते
इन दूर तक फैले
जंगलों पर ही नहीं
खुले आकाश पर भी
मेरा साम्राज्य है
यहाँ पेट भरना ही नहीं
खुले आम घूमना भी
अपराध है
 
चूँकि यहाँ
लोकतंत्र है
इसलिए मैं तुम्हें
एकदम नहीं मारूँगा
फिर भी
सजा तो तुम्हें मिलेगी
अहेरी कबूतर पर झपटा और उसे पकड़कर
पिंजरे में बंद कर दिया

फिर शुरू हुआ
भूख और यातना का लंबा दौर
इस दौर से गुजरकर
बाहर आया कबूतर
बाज था.”
(डॉ. एन. सिंह, पृ. 21-22)

तीसरी श्रेणी उन लोगों की है जो अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए कायांतरण करते हैं. ये लोग अपनी चेतना को स्वयं ही आगे बढ़कर उनके हवाले कर देते हैं जिनके विरुद्ध अब तक संघर्ष करते आए हैं. चेतना सौंपते ही इनका रंग-ढंग बदल जाता है. भाषा बदल जाती है. मौन और मुखरता का स्थान परिवर्तन हो जाता है. जिस तेवर की कमाई से कामना-पूर्ति का सौदा किया गया था उसे बरकरार रखने की पूरी कोशिश की जाती है. जिस तेवर की धार पहले ही भोथरी हो चुकी थी उसे ऐसी कोशिशें उत्तरोत्तर हास्यास्पद बनाती जाती हैं. कायांतरण से महत्वाकांक्षी व्यक्ति जितना अर्जित करता है उसका दुगुना उसके उत्पीड़ित समुदाय को चुकाना पड़ता है और उसका कई गुना उस आंदोलन को जिसमें वह कल तक सम्मिलित था. आंदोलन की अगुआई करने वाले अन्य लोग भी ऐसी सौदेबाजी से संदेह के घेरे में आ जाते हैं. यथास्थिति के प्रहरी इस स्थिति का लाभ उठाते हैं. अविश्वसनीयता का माहौल दीर्घावधि तक परिवर्तनकामी आंदोलनों की अकूत क्षति करता है. स्वार्थ और संरचना की सौदेबाजी में फायदा अनिवार्य रूप से संरचना का होता है. यही कारण है कि आंदोलन की रहनुमाई करने वाले (प्रच्छन्न) स्वार्थियों को चीन्हने और जो बिकने को तैयार नहीं हैं उनमें महत्त्वाकांक्षा जगाने का काम प्रमुखता से किया जाता है. जय प्रकाश लीलवान ने इस कोटि के मेटामॉरफोसिस को अपनी कई कविताओं का विषय बनाया है. उनकी कविता ‘नए क्षितिजों की ओर’ का यह अंश देखिए-
“यह
सही है
कि इतनी
गहरी रात में
किसी के भी
पैर लड़खड़ा सकते हैं..
इस आतंक की
रेत को
दिन-रात
मापता हूँ मैं
और
पाया है मैंने
कि
इस रेत की
बाँसुरी से
किसी भी
सुकून की
धुन/ नहीं
बजाई जा सकती है..
मैं
पूछता हूँ
कि
इन खण्डहरों को
क्यों
अपने सिरों पर
उठाए
फिरते हो तुम
बौनों की
तरह
जबकि
तुम्हारी पीढ़ियाँ
अपने
जलते पाँवों के
जूतों के लिए
संघर्ष के
मैदान में
मारी जा रही हैं..”

(‘नए क्षितिजों की ओर’,2009 , जय प्रकाश लीलवान, भारतीय दलित अध्ययन संस्थान, नई दिल्ली, पृ. 98-99) 

कहने की जरूरत नहीं कि मीडिया ऐसे रहनुमाओं को फोकस करती है, सत्ता संचालक उन्हें सार्वजनिक स्मृति में बिठा देने की जुगत भिड़ाते हैं और इनके पिछलग्गू इनकी वाचाल आक्रामक अभिव्यक्तियों को बार-बार दुहराते हैं. अपनी एक अन्य कविता ‘समय की लदान’ में लीलवान ने पीड़ित जनों के सपनों के सौदागरों को इस तरह प्रस्तुत किया है-
सब कुछ
ठीक हमारी नाक के नीचे
निरंतर चल रहा है
जिसके
वीभत्स शोर में
हमारी बराबरी के
अरमानों को
समाज के नकली रहनुमाओं ने
अपने नाश्तों में
तलकर खा लिया है..
(जय प्रकाश लीलवान, पृ. 30)

दलित कवियों की यह अंतर्भेदी अंतर्दृष्टि परिवर्तनकारी आंदोलन के लिए बहुत मूल्यवान है. दलित कविता का यह पक्ष भरोसा जगाता है.
पेंटिग : Sunil Abhiman Awachar 

(ख)
साहित्य की अन्य विधाओं की अपेक्षा हिंदी की दलित कविता ज्यादा विविधतापूर्ण और समृद्ध है. वरिष्ठ पीढ़ी से लेकर युवतर पीढ़ी तक सर्जना के इस क्षेत्र में सक्रिय है. हिंदी के धाकड़ प्रकाशनगृहों से दलित काव्यसंग्रहों का छपना इस बात का सबूत है कि पाठकीयता में परिवर्तन से लेकर प्रकाशन बाजार तक स्थिति निरंतर बेहतर होती जा रही है. प्रस्तुत आलेख में हाल-फिलहाल आए कुछ प्रमुख काव्यसंग्रहों का अध्ययन इस लिहाज से किया जाएगा कि दलित कविता के साथ अस्मितावादी विमर्श की दिशा समझी जा सके और नई पीढ़ी से पुरानी पीढ़ी का अंतर स्पष्ट हो सके.

डॉ. सी.बी. भारती (1957) की गणना हिंदी दलित साहित्य के संस्थापकों में होती है. उनका पहला काव्य संग्रह ‘आक्रोश’ 1996 में छपा था. इस संग्रह ने दलित कविता का भावबोध सुनिश्चित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. दो दशकों के अंतराल के बाद वर्ष 2017 में उनका नया संग्रह आया- ‘लड़कर छीन लेंगे हम’. संग्रह का शीर्षक भले ही अकाव्यात्मक प्रतीत होता हो लेकिन यह डॉ. सी.बी. भारती के आक्रामक तेवर और उनकी कविता की बनावट का उद्घोषक है. इस संग्रह की भूमिका वरिष्ठ कवि डॉ. एन. सिंह ने   लिखी है. भूमिका में दलित कविता पर उठाए जाने वाले सवालों की चर्चा है और उन सवालों की रोशनी में प्रतिरक्षात्मक विश्लेषण किया गया है. यह आरोप प्रमुखता से आया है कि “दलित साहित्यकारों की अनुभूतियाँ समान हैं जिसके कारण उनमें एकरूपता आ गई है.”डॉ. एन.सिंह ने उचित ही संकेत किया है कि दलित कविता के शीर्ष हस्ताक्षरों ओम प्रकाश वाल्मीकि, मलखान सिंह, जय प्रकाश कर्दम आदि कवियों का अपना-अपना काव्य-वैशिष्ट्य है. इनमें उतनी ही एकरूपता है जितनी किसी भी काव्यधारा के कवियों में होती है. भूमिका में डॉ. सी.बी. भारती की खासियत बताने के सिलसिले में यह गौरतलब बात भी नोट की गई है, “जब दलित कवि कविता के नाम पर नारे गढ़ रहा हो तब डॉ. सी.बी. भारती दलित उत्पीड़न की जड़ तक जाकर उसके कारण और निदान तक की योजना प्रस्तुत करते हैं.” करीब सवा सौ कविताओं वाले इस संग्रह में डॉ. भारती ने अनुभवजनित व्यथा को आगे न रखकर उससे उपजे आक्रोश को केन्द्रीयता दी है. उनकी आक्रोशजन्य अभिव्यक्ति की एक बानगी है- ‘अब हम उतार सकते हैं तुम्हारी भी खाल.’ (‘होगी जूतम पैजार’ पृ.121) संग्रह की पहली कविता ‘चिन्तन का समय’ बहुजनों की गुलामी पर लीक से हटकर विचार करने का आह्वान करती है. आखिर क्या वजह है कि ठग भेस बदल-बदल कर आते रहे और बहुजन हर बार ठगे जाते रहे\ अपनी दुर्दशा पर उन्हें कभी क्रोध नहीं आया, कभी उन्होंने अपनी संगठित शक्ति का प्रदर्शन नहीं किया. कविता का समापन अंश है-

“कैसे हड़प ली गई तुम्हारी अस्मिता?/ कैसे गँवा बैठे तुम अपना सारा वजूद?/ बताओ बहुजन!/ यह वक्त पिष्टपेषण का नहीं/ यह वक्त चिंतन का है.” (पृ.19)

जातिभेद का खंडन करते हुए जो कविताएं इस संग्रह में हैं वे बौद्ध कवि अश्वघोष की याद दिलाती हैं. प्रकृति से उदाहरण देते हुए अश्वघोष ने ‘वज्रसूची’ में गूलर और कटहल जैसे फलों की तरफ ध्यान खींचा था और इस आधार पर जातिभेद को अप्राकृतिक बताया था. डॉ. भारती कहते हैं- “सभी गायें/ गायें हैं जैसे/ सभी शेर/ शेर हैं जैसे/ सभी मनुष्य/ मनुष्य हैं/ वैसे ही.” (‘जाति’, पृ.20)

इस देश का सांस्कृतिक इतिहास घृणा की अनवरत शृंखला से आबद्ध है. यह घृणा अपने उद्देश्य वर्चस्व-स्थापन में सफल रही है. ‘घृणा’ और ‘नफरत’ शीर्षक कविताएं इस चिरकालिक रोग की पहचान कराती हैं. ‘गाली’ शीर्षक कविता में कवि स्वयं को ‘चमार’ कहे जाने पर फख्र का अनुभव करता है. एक जिम्मेदार कवि के रूप में अपनी भूमिका की पहचान कराते डॉ. भारती लिखते हैं- “तुमने जब जब फैलाई है दुर्गंध/ तब-तब मैंने बिखेरी है खुशबू.” (पृ. 31) ‘भूख’ कविता में रोटी और सम्मान दोनों की जरूरत को एक-सा माना गया है. ‘आरक्षण’ कविता में कवि विरोधियों को शिड्यूल कास्ट बनकर गाँव जाने की बात करता है. व्यवस्था की असलियत तभी समझ में आएगी. ‘जोंक’, ‘परजीवी’ और ‘साजिश’ शीर्षक कविताएं सवर्ण सत्ता का यथार्थ प्रस्तुत करती हैं. इस सत्ता ने धर्म और ईश्वर की खोज अपने को शीर्ष पर बनाए रखने के लिए की थी. इसे समझाते हुए कवि कहता है- “ईश्वर कुछ लोगों के स्वार्थ की उपज है.” (पृ. 57) वर्तमान राजनीतिक-सामजिक परिदृश्य को डॉ. भारती ने ‘भेड़िये’ नामक कविता में पेश किया है-
“सावधान!
भेड़िये आ रहे है-
चुपचाप,
बिना किसी आहट के
करने को शिकार
अब वे लहूलुहान ही नहीं करते-
 सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का जहर घोलते हैं.
क्रूरता व असहिष्णुता का प्रशिक्षण देते हैं
घृणा व नफरत के बीज बोते हैं.”

डॉ. सी.बी. भारती ने अपना यह काव्यसंग्रह ‘सामाजिक परिवर्तन के महान नायक संत सुकईदास परमहंस साहेब को’ समर्पित किया है. इस संग्रह में स्वामी अछूतानंद पर कविता है मगर संत सुकईदास पर कोई कविता नहीं है. भूमिका में भी उनका नामोल्लेख भर है. उनके जीवन-परिचय के संबंध में कुछ नही कहा गया है. संत परंपरा से कवि का यह जुड़ाव बहुत अर्थपूर्ण है. इससे उनकी कविता एक अजस्र ऊर्जा-स्रोत से जुड़ जाती है और दलित कविता की धारा सुदीर्घता प्राप्त कर लेती है.

डॉ. एन. सिंह (1956) के काव्यसंग्रह ‘अंधेरों के विरुद्ध’ (2016) की भूमिका में जय प्रकाश कर्दम ने बताया है कि हिंदी में दलित साहित्य का वह स्थान नहीं बन पाया है जैसा मराठी में दलित साहित्य का बना है. इसके कारणों पर कोई संतोषजनक चर्चा उन्होंने नहीं की है. एन. सिंह की कविताओं में उन्होंने ‘अनुभूति की गहराई और संवेदना का ताप’ देखा है. इस गहराई और ताप को मापने का जिम्मा पाठकों पर छोड़ दिया गया है. कर्दम जी ने यह बात बड़ी शिद्दत से रेखांकित की है कि कवि (डॉ. एन. सिंह) की कल्पना का भारत ‘असमानता मुक्त भारत’ है. यह बात ख़ास तौर पर गौर करने की है कि दलित कवियों के यहाँ देश की चिंता बार-बार प्रकट होती है. जय प्रकाश लीलवान की कविताएं तो इस मामले में बहुत बढ़ी हुई हैं. डॉ. एन. सिंह भी अपने प्रखर राजनीतिक बोध के कारण देश की वर्तमान दशा को बहुत स्पष्टता से चित्रित करते हैं. उन्होंने अपना संग्रह ‘बौद्धिक आतंकवाद से लड़कर शहीद हुए रोहित वेमुला को’ समर्पित किया है. डॉ. एन. सिंह ने बेलौस तरीके से अपनी काव्य-यात्रा के विविध पड़ावों का जिक्र संग्रह की प्रस्तावना में किया है. वे मंचीय कविता से होते हुए दलित कविता तक पहुँचे. ‘सारिका’ के दलित साहित्य पर केंद्रित अंकों ने उन्हें राह दिखाई. संत कवि रैदास का अध्ययन कर उनकी वैचारिकी समृद्ध हुई. कविता संबंधी उनकी समझ में जो गहराई आई उसका असर उनके काव्य-संग्रह ‘सतह से उठते हुए’ (1991) की भूमिका में इन शब्दों में प्रकट हुआ-

“मैं मानता हूँ कि सामाजिक परिवर्तन में कविता तत्काल प्रभावी नहीं होती और ना ही कोई बहुत बड़ी क्रांति ही कर सकती है किंतु वह जन क्रांति के लिए लोकशिक्षण और लोकजागरण के द्वारा पृष्ठभूमि तैयार करने में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है.”डॉ. एन. सिंह की वैचारिकता मार्क्सवादी संगठनों में काम करते हुए बननी शुरू हुई. इसके बाद वे आरएसएस की तरफ मुड़ गए और वहाँ से मोहभंग होने पर वे दलित चिंतन की तरफ आए. बाबरी मस्जिद ध्वंस को ‘भारतीय इतिहास का सबसे काला दिन’ मानने वाले डॉ. एन. सिंह की साम्प्रतिक भावदशा उनके ही शब्दों में : “रैदास-काव्य के विचारपक्ष को समझने की प्रक्रिया से गुजरते हुए मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि इस सड़े-गले समाज की शल्यक्रिया कर यदि हम मरहमपट्टी करना चाहते हैं तो मार्क्स और आंबेडकर के रास्ते पर ही चलना होगा.”

डॉ. एन. सिंह का यह संग्रह अपनी प्रबोधनपरक कविताओं के कारण विशेष रूप से याद किया जाएगा. समाज जिन हालातों से होकर गुजर रहा है, जो मुश्किलें रचनाकारों के सामने हैं उन सबका सटीक शब्दांकन उनके यहाँ है. वे दलितों के ठगे जाने का रहस्य समझना चाहते हैं. इसके लिए वे अतीत की छानबीन करते हैं. आर्यावर्ती भूगोल की, उसके मानस की सांस्कृतिक ‘मैपिंग’ करते हैं. मोहपाश से छूटने के लिए उसे पहचानना होता है. एन. सिंह इस मोहपाश को पहचानते हैं और तब वे बंधनमुक्ति की ओर बढ़ते हैं. ज्ञानप्रसार करने वाली सरस्वती और धनवर्षा करने वाली लक्ष्मी के होते हुए दलित अनपढ़ और निर्धन क्योंकर रह गए? यह प्रश्न करने के बाद एन. सिंह कहते हैं- “वे हमें छलती रहीं और/ हम उन्हें पूजते रहे/ क्यों?”एन. सिंह इस प्रश्न को विचार हेतु और आगे बढ़ाते तो अवश्य ही कहते कि सरस्वती और लक्ष्मी जैसी ‘देवियाँ’ पितृसत्तात्मक संरचना की उत्पाद हैं. ये स्वयं ही छली गई स्त्रियाँ हैं. ज्ञान और संपदा से सिर्फ दलित ही वंचित नहीं रहे हैं, स्त्रियाँ भी वंचित रखी गई हैं.

डॉ. एन. सिंह ने कभी हिंदूवादी संगठन में काम करके उनकी कार्यपद्धति समझी तो कभी बसपा से जुड़कर उसकी सोशल इंजीनियरिंग से मुतास्सिर रहे. इस सोशल इंजीनियरिंग के प्रभाव से उपजी एक कविता उनके आलोच्य संग्रह में भी है-

“दुकान
हमारी भी है और
तुम्हारी भी
ये बात और है कि
हमारी दुकान पर बिकता है
जूता
और तुम्हारी दुकान पर
रामनामी
हमारे लिए जूते का वही
महत्त्व है
तुम्हारे लिए जो है
रामनामी का
आओ समानता का यह
तार पकड़ें
एकता के सूत्र गढ़ें
साथ बढ़ें.” 
(‘आओ साथ बढ़ें’, पृ. 35)

शायद अच्छा कहा जाएगा कि समानता का यह ‘तार’ जल्दी ही उनके हाथ से छूटा और उन्होंने अपने और अपनों को इस तरह चेताया,

“सावधान!
आ रहे हैं भेड़िये
गाय के वेश में
उनकी वाणी में जो अमृत है
दरअसल वह
विष है!
जो कान से
दिल तक पहुँच कर
धीरे-धीरे करता है असर!
वे तुम्हारे अस्तित्व का सौदा करने आ रहे हैं,
बड़ी विनम्रता से
कुछ देने का वायदा करके
वे बहुत कुछ बहुमूल्य ले जाएँगे
फिर लौटकर
नहीं आएँगे.” 
(‘पहचान लो’, पृ. 41)

ये वही हैं’ शीर्षक कविता में कवि ने पुनः लिखा, “समरसता की/ रामनामी ओढ़कर/ वे फिर आ गए हैं/ अब तुम्हें ही तय करना है कि-/ यह मनुवादी समरसता/ कहाँ ले जाएगी तुम्हें?”‘असहिष्णुता’ कविता में एन. सिंह ने एकलव्य शंबूक से लेकर रोहित वेमुला, कलबुर्गी, कामरेड पानसरे, अख़लाक़, पादरी स्टीफेंस की हत्याओं को याद करते हुए कविता का अंत इन शब्दों में किया- “सावधान!/ सांस्कृतिक आतंकवाद/ शिविरों में/ शस्त्र संचालन का/ प्रशिक्षण ले रहा है.” (पृ. 50) संग्रह की कई अन्य कविताओं ‘श्रद्धा के व्यापारी’, ‘हिंदू’ आदि में इस प्रबोधन-भाव की आवृत्ति मिलती है. ‘मुझे देवता न बनाओ’ में उन्होंने डॉ. आंबेडकर को ईश्वर बनाए जाने का निषेध किया है. ‘शहर : एक जंगल’ कविता में एन. सिंह ने नगरीय सभ्यता के चारित्रिक स्खलन पर जैसी चिंता व्यक्त की है वह इस संग्रह के ‘टेम्परामेंट’ के अनुकूल नहीं पड़ती- “वह देखो!/ उस गली के मोड़ पर वह/ सेंडिल ठीक करने के बहाने झुकी है/ लगता है किसी पत्र की आशा में रुकी है!/ जिसमें जिक्र होगा उसकी ख़ूबसूरती का/ और याचना होगी कल कहीं मिलने की!” (पृ. 101) एक वरिष्ठ कवि को कोई सुझाव देना अनपेक्षित-अवांछनीय है मगर इतना निवेदन किया जा सकता है कि अपनी वैचारिक यात्रा के चौथे पड़ाव के रूप में उन्हें स्त्री आंदोलन और लेखन से जुड़ने की बात सोचनी चाहिए.

हिंदी दलित कविता के समूचे परिदृश्य में जो कवि अपनी साधना और सर्जनात्मकता के दम पर सबसे भिन्न नज़र आता है उसका नाम जगदीश पंकज (1952) है. जगदीश वय के हिसाब से तो वरिष्ठतम हैं ही, अपनी अभिव्यक्ति-क्षमता में भी वे अपने समकालीनों की अगुवाई करने लायक हैं. संत परंपरा में जो स्थान सुन्दरदास का है, दलित काव्य परंपरा में वही स्थान जगदीश पंकज का माना जा सकता है. बेहद चयनधर्मी जगदीश के अब तक दो काव्य संग्रह छपे हैं- ‘सुनो मुझे भी’ (2015) और ‘निषिद्धों की गली का नागरिक’ (2015). दोनों को नवगीत संग्रह कहा गया है. प्रस्तुत आलेख में उनके दूसरे संग्रह ‘निषिद्धों की गली का नागरिक’ की चर्चा की जाएगी. इसमें उनकी परवर्ती रचनाएं रखी गई हैं. संग्रह की भूमिका गुलाब सिंह ने लिखी है. संग्रह नवगीत के पुरोधा देवेन्द्र शर्मा ‘इन्द्र’ को समर्पित है. गुलाब सिंह ने जगदीश पंकज को इस अर्थ में कि ‘अंधकार के बाद प्रकाश की संभावना कभी ख़त्म नहीं होती’ ऋक् परंपरा के ऋषि कवियों का वंशधर माना है. अपने ‘आत्मकथ्य’ में जगदीश पंकज ने 1965 के भारत-पाक युद्ध के बाद कवियों में छाई देशभक्ति के परिपार्श्व में अपनी गीत-रचना की मनोभूमि का संकेत किया है. उस दौरान उन्होंने जो गीत रचे वे बकौल कवि साहित्यिकता से रहित थे. इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्री काल में जैसा राजनीतिक माहौल था उससे संवाद करते हुए कवि की समझ बनी. जगदीश ने लिखा है कि निर्धन दलित परिवार में पैदा होने के कारण उन्हें बहुधा उनकी पृष्ठभूमि का अहसास कराया जाता रहा. उनकी रचनाओं में आक्रोश की उपस्थिति का यही कारण है. जगदीश पंकजका मानना है- “मेरी रचनाओं में आक्रोश केवल दलित के लिए ही नहीं है बल्कि शोषण पर आधारित व्यवस्था में न्यायपूर्ण प्रतिकार के लिए समान परिस्थितियों में जीने वाले सभी शोषित, पीड़ित, तिरस्कृत और बहिष्कृत आम नागरिकों की पक्षधरता के लिए सर्जना को मैंने अपना लक्ष्य माना है.”उनकी इस प्रतिबद्धता को दर्शाती पंक्तियाँ हैं-

“भीड़ में भी
तुम मुझे पहचान लोगे
मैं निषिद्धों की
गली का नागरिक हूँ
 ... मैं प्रवक्ता वंचितों का,
पीड़ितों का
यातना की
रुद्ध-वाणी को कहूँगा
शोषितों को शब्द
देने के लिए ही
हर तरह प्रतिरोध में
लड़ता रहूँगा
पक्षधर हूँ न्याय
समता बंधुता का
मानवी विश्वास का
अविचल पथिक हूँ.” 
(पृ. 63-64)

आत्मकथ्य’ में कवि ने भारत की वर्तमान राजनीतिक अवस्था को 1975-77 के मध्य लगाए गए आपातकाल से जोड़कर देखा है. सामूहिक नेतृत्व का एक व्यक्ति में केंद्रित होना तब लोकतंत्र का संकट बना था और वह संकट नए रूप में ज्यादा गहराकर पुनः लौटा है. वैचारिक असहिष्णुता बढ़ी है और “असहमति के स्वरों को दबाने तथा असहमत लोगों पर आक्रमण की घटनाएं लगातार हो रही हैं.” सरकार और शासनसत्ता न केवल असामाजिक ताकतों को रोकने में अक्षम प्रतीत हो रही है “बल्कि उनका संरक्षण भी कर रही है.” ऐसे भयावह वातावरण में कवि प्रतिकार के स्वर में बोल उठता है- “इन हवाओं में भरा आतंक/ खिड़की बंद कर दें/  अब नहीं उठती कहीं/ कोई लहर/ जिंदगी है, एक कर्फ्यूग्रस्त-सा/ कोई शहर/  हादसों से टूटते, इस मौन को/ समवेत स्वर दें/  यह नहीं संभव, सुरक्षित/ रह सकें घर में/ अब उठें, बाहर चलें/ प्रतिकार के स्वर में/  वेदना संचेतना की आग में/ आकार भर दें.” (पृ. 78)

अस्मितावादी राजनीति के अटपटे पहलुओं का प्रश्नांकन, इस राजनीति के दम पर कॅरियर की सीढ़ियाँ चढ़ते ‘रहनुमाओं’ से जिरह एक जिम्मेदार रचनाकार का जरूरी दायित्व है. जगदीश पंकज इस दायित्व को बखूबी समझते हैं. वे भग्न जनाकांक्षा को स्वर देते हुए बोल उठते हैं- “हताशा हँस रही, चिपकी/ अवश, निरुपाय/ चेहरों पर./ ... विमर्शों में नहीं कोई/ कहीं मुद्दा कभी बनता/ विरोधाभास में जीती/ विफल, असहाय-सी जनता/ असहमत मूक निर्वाचन/ खड़ा है व्यर्थ/ पहरों पर.” (पृ. 37) सरल समीकरणों से बनती कविताओं वाले सपाट समय में जगदीश अपने लिए मुश्किलों भरा रास्ता चुनते हैं. दूसरों को कसौटी पर कसने से पहले वे स्वयं को सख्ती से जांचते हैं. अन्य की रचनाओं पर टिप्पणी करने से पूर्व वे अपने रचे हुए का औचित्य तलाशते हैं- “मैं स्वयं निःशब्द हूँ, निर्वाक् हूँ/ भौंचक, अचंभित/ क्यों असंगत हूँ/ सभी के साथ में चलते हुए भी/ ...भव्य पीठासीन, मंचित/ जो विमर्शों में/ निरापद उक्तियों से/ मैं उन्हें कैसे कहूँ अपना/ सतत गलते हुए भी/  मैं उठाकर तर्जनी/ अपनी बताना चाहता/ संदिग्ध आहट/ किस दिशा, किस ओर/ खतरा है कहाँ/ अपने सगों से/ जो हमारे साथ/ हम बनकर खड़े/ चेहरा बदलकर/ और अवसरवाद के/ बहुरूपियों से, गिरगिटों से,/ या ठगों से/  मैं बनाना चाहता हूँ/ तीर शब्दों को तपाकर/ लक्ष्य भेदन के लिए/ फौलाद में ढलते हुए भी.” (पृ. 59-60) कवि ‘तेवरबदल-बदल कर/ बिना वजह चीखते’ रहने से बचना चाहता है. सार्थक अभिव्यक्ति को शब्दों की गरिमा से जोड़कर देखता कवि विषादपूर्ण वाणी में कहता है- “सतही नारे लेकर/ खुद को ही टेरते रहे/ वादों में बिंध गया स्वयं/ दर्शन अनुताप में सना.” (पृ. 23)

कवि की संवेदनशीलता और प्रतिबद्धता मौलिक धुन का आविष्कार करना चाहती है. ऐसी धुन जो उसके आक्रोश का वहन कर सके, जो पीड़ित समुदाय के सपनों को व्यक्त कर सके- “हमने तो खिले लक्ष्य चुन लिए/ पर उदास स्वप्न खड़े सामने/ ...गाते हम स्वामियों की धुन लिए/ किंतु दास स्वप्न खड़े सामने.” (पृ. 36)

प्रश्नाकुलता मौलिकता की पूर्वशर्त होती है. कवि प्रश्नों का परिमाण नहीं घटाना चाहता. वह अपने अंतस के कोने में रखे चिरसंचित विद्रोह-भाव को स्वर देना चाहता है. दिक्कत यह है कि मुक्ति का नया प्रांगण यंत्रचालित है. यहाँ मुक्ति विभ्रम का नवीन पर्याय बनकर आई है. यंत्र-जगत पुराने वर्चस्वधारियों के नियंत्रण में है. उन्होंने जीवित मनुष्यों को निस्पंद आंकड़ों में बदल दिया है. यह नई दासता है- “और कसता जा रहा है/ सांस का बंधन/ जियें हम बेबसी में/  हैं स्वचालित यंत्र जैसे/ हम नियंत्रित/ संगणक की भांति/ गणना कर रहे हैं/ आंकड़ों में बस/ हमारा नाम ही है/ तथ्य सूखे फूल जैसे/ झर रहे हैं/  पारदर्शी आईना है/ क्रूर आवर्तन/ समय है बेकसी में.” (पृ. 26) मुक्ति और दासता का लुभावना घालमेल करके नई बाजार व्यवस्था ने अपने पाँव पसारे हैं. इस ‘बाजार’ को लेकर दलित कविता ज्यादा चिंतित नहीं दिखती. जय प्रकाश लीलवान के बाद जगदीश पंकज ऐसे दूसरे कवि हैं जो इसे अपनी रचना का विषय बनाते हैं. उनकी आलोचनात्मक निगाह से गुजरकर यह मसला दलित साहित्य के सरोकारों में शामिल होता है. विश्वग्राम का हिस्सा बनता ‘न्यू इंडिया’ सिर्फ आश्वासन दे रहा है- “मुक्त-व्यवस्था में संवेदी/ सूचकांक ही निर्णायक है/ प्रतियोगी अवसाद, घुटन भी/ अब कितनी पीड़ादायक है/ ...हर आयातित राजमार्ग से/ पहले देशी पगडंडी है/ सबकुछ लाकर बेच रहे हैं/ सजी हुई कचरा मंडी है.” (पृ. 48)

पुराने बाजार की पहुँच सीमित थी. नए बाजार ने देहरी से लेकर शयनकक्ष तक और विचार से लेकर सपनों तक सबको अपनी पहुँच के भीतर कर लिया है- “आ गया बाजार/ घर की देहरी को लांघ/ जागृति से शयन तक/ ... इस व्यवस्था में प्रबंधन के/ नियम काफी कड़े हैं/ हम किसी उत्पाद के ही/ लक्ष्य बनकर आँकड़े हैं/  हम इकाई बन रहे बस/ लाभ से लेकर/ निरर्थक अध्ययन तक.” (पृ. 74)
     दलित कवि कथ्य को आत्यंतिक महत्त्व देते हैं. भाषा पर वे विचार करते कम ही दिखाई देते हैं. जगदीश पंकज इस मामले में भी सबसे अलग हैं. वे भाषा पर, कथ्य के संवाहक पर उतनी ही गंभीरता से मनन करते हैं. माध्यम के प्रति असावधानी अंतर्वस्तु का क्षरण कर सकती है. जलते हुए शब्द तापरहित हो जा सकते हैं- “जल रहे हैं/ शब्द कुछ/ चिंगारियों के साथ/ लेकिन अर्थ गायब” (पृ. 44) इसीलिए कवि आह्वान करता है- “आइये अब करें/ नवभाषा सृजन हम/ नयी आस्था का/ सुलगता व्याकरण ले.” (पृ. 83)

माध्यम की परवाह करने वाला कवि हिंदी की चिंता भी करता है. अस्मितावादी काव्य-परिदृश्य में यह विरल प्रसंग है- “अब जरा अपने क्षितिज को/ दें नए विस्तार/ भाषा से, सृजन से/  सिर्फ शब्दों से नहीं/ व्यवहार से भी/ अस्मिता के भाल की/ बिंदी बचाएं/ अब प्रदूषण के/ प्रहारों से घिरी जो/ मधुमयी वह शाश्वती/ हिंदी बचाएं/  मित्र भाषा से मिलें जो शब्द/ स्वागत कर मिलें/ अब मुक्त मन से.” (पृ. 73)

श्यौराज सिंह बेचैन (1960) कई विधाओं में सक्रिय हैं. पत्रकारिता, शोध, आलोचना, साहित्येतिहास, आत्मकथा, कहानी आदि क्षेत्रों में उन्होंने उल्लेखनीय योगदान दिया है. उनका तीसरा कविता संग्रह ‘चमार की चाय’ (2017) अपने आकार में पूर्ववर्ती संग्रहों से बड़ा और अपनी वैचारिकता में तुलनात्मक रूप से परिपक्व है. यह संग्रह उन्होंने गुरु रैदास को समर्पित करते हुए उन्हें कार्ल मार्क्स से पहले का साम्यवादी अर्थात् सबके सुख की कामना करने वाला बताया है. इस संग्रह के प्रारंभ में ओम प्रकाश वाल्मीकि, राजेन्द्र बड़गूजर और स्वयं कवि द्वारा लिखित तीन भूमिकाएं हैं. वाल्मीकि जी की भूमिका वस्तुतः वह समीक्षात्मक टिप्पणी है जो उन्होंने बेचैन के पहले काव्य संग्रह ‘क्रौंच हूँ मैं’ पर लिखी थी. इसमें वाल्मीकिजी ने बेचैन की काव्यकर्म की विशेषताओं को स्पष्ट करते हुए उन्हें ‘रोजमर्रा के शब्दों से सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक सरोकारों को अभिव्यक्त’ करने वाला कवि कहा है. इस संदर्भ को आगे बढ़ाते हुए वाल्मीकि जी यह भी कहते हैं कि “दलित साहित्य का उन्मेष संवेदनात्मक अभिव्यक्ति है जो कलात्मक पैतरेबाजी पर विश्वास नहीं करती.”अपनी भूमिका में राजेन्द्र बड़गूजर का निष्कर्षात्मक कथन है, “बेचैन जी आज तक लिखे गये तमाम साहित्य को भोंथरा सिद्ध करते हैं.”उनकी स्थापना है कि “भारत में द्विजों द्वारा लिखा गया साहित्य एक छलावा है.” यह भी कि द्विज कवियों ने अपनी रचनाओं से “वैमनस्य, दकियानूसी और फूट का ही निर्माण किया है. जार कर्म को बढ़ावा दिया है. द्विज कवि की कविता कामोद्दीपक बनी है.” बेचैन को आजीवक परंपरा का कवि बताते हुए राजेन्द्र बड़गूजर कहते हैं, यदि आजीवक संस्कृति का प्रचार-प्रसार होता, हर व्यक्ति काम में विश्वास रखता तो संभव है हम पूरे विश्व में सर्वश्रेष्ठ होते.”यह ‘भूमिका’ दलित कविता के बारे में हमारी समझ बनाती है या नहीं, इस पर बहस हो सकती है मगर इतना निश्चित है कि यह आलोच्य संग्रह को सृजन-संदर्भ से बढ़ाकर विमर्शात्मक क्षेत्र में रख देती है.

अपनी भूमिका ‘हाय रे! चमार, वाह रे! चमार’ में श्यौराज सिंह बेचैन ने काव्यसंग्रह के शीर्षक ‘चमार की चाय’ पर विचार किया है. शीर्षक के पहले पद ‘चमार’ के औचित्य-निरूपण के सिलसिले में उन्हें निराला, अदम गोंडवी और डॉ. धर्मवीर की रचनाओं क्रमशः ‘चतुरी चमार’, ‘चमारों की गली’ ‘चमार की बेटी रूपा’ की याद आई है. आशय यह कि शीर्षक हेतु इस शब्द के चयन की एक साहित्यिक परंपरा बन चुकी है. नयापन दूसरे पद ‘चाय’ में है. इसका संबंध समकालीन राजनीति से है. ‘एक चाय वाले’ के प्रधानमंत्री बनने के बाद इस शब्द को चर्चा के केंद्र में आना ही था. ‘चाय पर चर्चा’ मार्का राजनीति तो इतनी जल्दी अप्रासंगिक होती हुई पीछे जा चुकी है लेकिन अस्मितावादी विमर्श के अनुकूल होने के कारण इसे शीर्षक के चुना गया है. श्यौराज जी ने लगे हाथ राष्ट्रीय शिक्षा नीति के लिए यह सुझाव भी दिया है कि यू.के., अमेरिका की तर्ज़ पर पढ़ाई के साथ कुछ घंटे शारीरिक श्रम करना अनिवार्य बना देना चाहिए. ‘श्रम संतुलन’ बनाना असल में ‘राष्ट्रोन्नति’ पर ध्यान देना है. “बच्चा किसी का भी हो राष्ट्रपति का या एक आम नागरिक का, उसे पढ़ाई के साथ कुछ घंटे काम करना अनिवार्य होना चाहिए. उन कामों में चाय बेचना भी एक काम है. मानव संसाधन मंत्रालय व्यवस्था करे कि विश्वविद्यालय किसी भी छात्र को स्नातक डिग्री देने से पहले श्रम सम्पन्न करने के प्रमाणपत्र प्रदान करें. उनके बगैर कोई भी पढ़ाई पूरी नहीं मानी जानी चाहिए.”

बौद्ध धम्म से श्यौराज सिंह बेचैन को कोई लगाव नहीं है. यह बात वे अन्यत्र भी लिख चुके हैं. इस भूमिका में भी उन्होंने यह मुद्दा उठाया है. वे बताते हैं कि भिक्षु “बुद्ध विहार में रैदास और कबीर की बात करना पसंद नहीं करते. बुद्ध विहार में रैदास की तस्वीर नहीं टाँगी जा सकती. जबकि सौ में सत्तर भिक्षु पूर्व के चमार हैं, रैदासी हैं और कबीरपंथी हैं.” मा. कांशीराम, मायावती, ‘डेंजर चमार’ की अठारह वर्षीया गायिका गिन्नी माही आदि का उल्लेख करते हुए वे खीझभरे स्वर में पूछते हैं- “पंजाब में चमार मानवतावादी चेतना (वाले) सतगुरु रविदास के साथ बाबा साहेब अम्बेडकर को लेकर चल रहे हैं. इधर के चमार बुद्ध को लेकर और सबको छोड़ने के उपक्रम कर रहे हैं. यहाँ तक कि अपनी पहचान को भी. प्रश्न परेशान करता है कि आखिर बेटा अपने बाप को बाप क्यों नहीं कह पा रहा है?”

भूमिका में उठाए गए मुद्दों की अनुगूँज संग्रह की कविताओं में सुनी जा सकती है. लोकधुन पर आधारित उनकी लंबी कविता ‘इकतारा’ में कहा गया है कि कोई बुद्ध, ईसा या संत दलित की गरिमा नहीं लौटा पाया. इस कविता में तुलसीवादियों से सवाल करते हुए कई पंक्तियाँ हैं. एक प्रसंग देखिए- “तुलसीदास का काव्य-कर्म/ क्यों झूठा साबित करता है/ रामराज बस राज राम का,/ निष्कासन सीता का है./ राज खुला ‘श्यौराज’ आज अब/ अविरल तर्कों के द्वारा/ तुन-तुन...तुन-तुन-तुनन...एकतारा.” (पृ.59) इस अविरल तर्क पर तुलसीवादी शायद ही कुछ बोलें क्योंकि यह प्रसंग तुलसी रचित है नहीं. विमर्शकार को भाषण में नहीं पर लेखन में सावधानी बरतनी चाहिए.

देश को आजादी मिलने के बाद भी दलित उत्पीड़न का सिलसिला थम नहीं रहा. बेचैनजी ने भूमिका में इस सवाल को बहुत शिद्दत से उठाया है और अपनी तमाम कविताओं में भी इसे रखा है. ‘जारी है’ शीर्षक कविता में वे दलितों के अनवरत संघर्ष को रेखांकित करते है. संघर्ष के सफल न होने के कारणों पर विचार करते हुए वे यह भी कह जाते हैं कि दलित स्त्री के साथ न देने से ऐसा हुआ है- “सत्तर साल/ हो गये स्वराज को/ अब तक दलित को/ दला था/ अब क्रूरता से कुचल रहा है./ और मुक्ति युद्ध/ दलित स्त्री को साथ-/ साथ न रहने से/ विफल रहा है.” (पृ.80) जब राजनीति को हर बदलाव की कुंजी माना जा रहा हो उस समय यह कहना ध्यान देने लायक है- “समाज/ बदलेगा/ तो/ बदलेगा देश भी/ सियासत/ बदलने से बहुत-/ कुछ कम बदलता है.” (पृ. 87) ‘गुरु गुड़ चेला शक्कर’ कविता में गुरु-शिष्य का बड़ा रोचक संवाद रचा गया है. इस संवाद का एक अंश देखिए- “चेला बोला-/ “गुरु मैं इसे/ रखूंगा जैसे/ ‘कामरेड’/ जाति को रखकर/ उसमें/ लिप्त नहीं होते हैं./ अथवा जैसे न्यासी/ धन के-/ संरक्षक होते हैं बेशक/ पर आसक्त नहीं होते हैं.” (पृ. 98-99) ‘चमार की चाय’ कविता आत्मकथात्मक शैली में है. नैरेटर का बचपन मुर्दा-मवेशी उठाने में, बूट पालिश करने में, होटल पर बरतन धोने में, अखबार बाँटने में और कृषि-मजदूर बनकर मजदूरी करने में गुजरा. इसके बावजूद पढ़ने की ललक ने उसे शिक्षा के दरवाजे तक पहुँचा दिया. उसके एक दलित मित्र ने उसे चाय की दुकान खुलवा दी. एक ओबीसी मित्र ने इस दुकान पर उसकी अनुपस्थिति में लिख दिया कि यहाँ ‘चमार की चाय’ मिलती है. इस सूचना ने उसकी दुकान के ग्राहक तोड़ दिए. कवि को ये सब बातें तब याद आईं जब प्रधानमंत्री मोदी ने ओबामा को अपने बचपन की कहानी सुनाई. चाय से जुड़े हुए ये दोनों बचपन एक-से होकर भी अलग-अलग हैं-
“हालाँकि वे-
कहाँ हैं और मैं कहाँ हूँ
फिर भी कवि होने के नाते मैं
प्रधानमंत्री जी के हालातों से
अपने हालातों की तुलना कर लेता हूँ.”  
(पृ. 116-19)

‘बुरा किया बंटवारों ने’ कविता में बेचैन पुनः बुद्ध से सवाल करते हैं कि क्या उन्हें अपने समय के भंगी, चमार, धोबी, कुम्हार का जीवनवृत्त मालूम था? क्या उन्हें इन लोगों से सहानुभूति थी? यह प्रश्न उन्हें बाबा साहेब तक ले जाता है. वे अपना मंतव्य देते हैं- “इसलिए बाबा साहेब की/ सब शिक्षाएँ शिरोधार्य हैं/ पर बुद्ध की शरण में जाना/ ... और ब्राह्मण स्त्री से/ अछूत नायक के विवाह का/ अनुकरण करना लगता है बेकार.” (पृ. 121-22)

इस संग्रह पर मोदी और ओबामा का गहरा असर है. ‘ओबामा’ शीर्षक कविता में यह उद्गार दर्ज है- “ ‘चाय बेचने वाला’/ भारत का प्रधानमंत्री है/ लोकतंत्र के संविधान का चमत्कार है/ ओबामा का विचार है.” (पृ. 141) ‘गंगा का नाती अछूत’ में ओबामा फिर लाए गए हैं- “और तुमने कहा-/ मोदी जी चाय बेचने वाले का बेटा है/ और मेरे ग्रांडफादर बावरची थे. सोचने लगा कि मैं क्या हूँ-/ गंगी चमार का नाती-/ भारत का अछूत?” (पृ. 152) एकता का सूत्र कविता के अंत में भी है-
“उनचास की वय में/ ओबामा की आत्मकथा/ ‘पिता से मिले सपने’/ और पचास की वय में/ मेरी आत्मकथा-/ ‘मेरा बचपन मेरे कंधों पर’/ प्रकाश में आयी और/ दोनों एक साथ दो हज़ार नौ में/ अछूत और अश्वेत जोड़ते हैं हमें.” (पृ. 153)

‘गंगी बब्बा चोखामेला’ कविता में पुनः ओबामा उपस्थित हैं- “ओबामा के दादा-/ रसोइया थे ब्रिटिश आर्मी में/ और मेरे बब्बा/ गुलाम भी थे और अछूत भी.” (पृ. 159) ‘संवाद कविता’ में गाँधी आंबेडकर का संदर्भ पति-पत्नी की अंतरंग बातचीत में बड़े अनूठे और चुटीले अंदाज में प्रस्तुत हुआ है- “सवाल- सो क्यों नहीं जाते,/ रात आधी जा चुकी है./ जवाब- अगर मैं/ सो जाऊँगा तो?/ तो/ गाँधीजी नहीं हो जाऊँगा?/ तो मुझे जागते/ रहना है/ मुझे तो डॉ. अम्बेडकर/ का नक़्शे-कदम होना है./ सवाल- मैं जानती हूँ/ तुम सो नहीं सकोगे/ गाँधी जी नहीं/ तुम अम्बेडकर ही बनोगे/ मैं मर गई तो किसी/ ब्राह्मणी से पुनर्विवाह करोगे.” (पृ. 160)

एक और समान नाम वाली ‘संवाद’ शीर्षक कविता संग्रह के लगभग आख़िरी हिस्से में दी गई है. इसमें आंबेडकर नहीं, मार्क्स मतानुयायी लोगों को निशाने पर लिया गया है- “चिंतन के स्तर पर/ व्यावहारिक/ प्रयोग के रूप में/ और सामाजिक/ स्वीकृति के धरातल पर/ मार्क्स-मत/ बुरी तरह पराजित है.”बेचैन सवाल करते हैं कि कि क्या वामपंथी जाति की गंभीरता समझ सके हैं? क्या वे संविधान-पथ को, अम्बेडकर-मत के अनुयायियों को सही मानकर उनका अनुसरण प्रारंभ कर सके हैं? क्या इन मार्क्सवादियों ने दलित साहित्यकारों का नेतृत्व स्वीकार कर लिया है? इन सभी प्रश्नों का उत्तर नकारात्मक है क्योंकि- “वे इंसानियत/ से सर्वोपरि/ ऊपर उठे हुए देवत्व की/ कोटि के लोग हैं.” (पृ. 181)

संग्रह की अंतिम कविता ‘समय लगेगा’ में बेचैन जी का प्रशांत स्वर इस तरह गूँजा है- “फूँक मारकर-/ अस्पृश्यता भी/ उड़ाई नहीं जा सकती./ समय लगेगा/ सुलझने-समझने में/ जाति धर्म/ अलगाव की गुत्थी-/ यूँ ही नहीं सुलझाई जा सकती.” (पृ. 184)

संगघोष (1962) वरिष्ठ पीढ़ी के युवा हस्ताक्षर हैं. यहाँ विवेचित अन्य दलित कवियों की तुलना में उनके काव्य संग्रहों की संख्या सबसे अधिक है. उन्होंने काव्य रचना का अपना मार्ग पा लिया है. वे अपनी अभिव्यक्ति में स्पष्ट बहिर्मुखी प्रकृति के कवि हैं. सत्य की पहचान कर लेने के बाद असमंजस की कोई जगह नहीं बचती. असंगघोष न कभी दुविधा में पड़ते हैं और न ही अपने पाठकों को ऊहापोह में डालते हैं. ‘खामोश नहीं हूँ मैं’ संग्रह से उनकी मुखर काव्ययात्रा की शुरुआत हुई थी. ‘हम ही हटाएंगे कोहरा’ से होती हुई उक्त यात्रा ‘ईश्वर की मौत’ (2017) तक पहुँची है. यह उनका छठा काव्यसंग्रह है. प्रस्तुत आलेख में इसी की चर्चा की जाएगी. सरोकार और शैली की एकसूत्रता उनके समस्त संग्रहों को एक जिल्द के भीतर रखती है.

अनुभव और कहन के बीच की पेचीदगियों में ठेठ अस्मितावादी कविता नहीं उलझती. बहुपरतीय यथार्थ के गुत्थमगुत्था जोड़ों और दराजों से होकर लिपिबद्ध हो पाने की राह निकालती भाषा यहाँ निर्बाध बहती है. कविता की काया के विभिन्न पक्ष लय, छंद, आवृत्ति और अन्विति की परवाह सत्य के साथ समझौते की तरह देखे जाते हैं. असंगघोष के काव्य-विस्तार में अस्मितावाद द्वारा मुहैया कराया गया सच अपनी पूरी चमक के साथ मौजूद है. अंधेरा होने से पहले मशाल जला लेने का आह्वान कवि के चौकन्नेपन का सबूत है और शोषकों के शिकस्त की शुरुआत है- “हमारी मशालों की रोशनी में/ जग के सामने नंगा होने से/ कब तक बचेगा/ यह नर पिशाच?” (पृ. 23)

‘ईश्वर की मौत’ संग्रह का आगाज़ ‘जाति की बू!’ कविता से हुआ है. इसमें पुरानी हायरार्की के समांतर नई हायरार्की दिखाई देती है. पुराना पदानुक्रम चेतना में है जबकि नया ठोस रूप में सामने. ‘मैं’ शैली की इस कविता का ‘मैं’ अफसर है और उसका चपरासी पुरानी हायरार्की का ‘कलक्टर’. सवर्ण-दलित और चपरासी-अफसर का यह उलटफेर सवर्णता को सांसत में डाले हुए है. अफसर जब भी अपने इस भृत्य से पानी लाने को कहता है तब-तब उसका चोटिल जात्याभिमान उसके रंग-ढंग में झलक जाता है. अफसर चाहे तो इसके लिए उसे दण्डित कर सकता है मगर, “उसकी इस उद्दंडता पर/ मैं उसे दण्डित भी नहीं करता/ ताकि मेरे हर बार पानी पिलाने को कहते ही/ इसकी श्रेष्ठता पर/ लगती रहे चोट/ कचोटता रहे उसका मन/ कि उसे यह दिन भी देखने थे.” (पृ. 11)

यह सवर्ण सब समय एक-सा नहीं रहता. वह गिरगिट की तरह रंग भी बदलता है जैसे ‘अवसरवादी’ कविता का ‘सफेदपोश त्रिपुंडी’. चुनाव के वक्त वह अपनी ‘देवभाषा’ भूलकर बूट पालिश करने वाले की भाषा बोलने लगता है. इस पहेली को बूट पालिश करने वाला जब तक समझता तब तक वह “चकाचौंध की उस लौ में/ मर्चुरी में लगी/ शव-शीतलन पेटिका के/ उद्घाटन का फीता काटने/ दौड़ पड़ा.” (पृ. 12-13) त्रिपुंडी का मर्चुरी की तरफ दौड़ पड़ना कवि का अर्थपूर्ण संकेत है. इस संकेत को कवि ‘कब्र’ शीर्षक कविता में इस तरह खोल देता है- “ऐसे ही तुम्हारी कब्र भी/ मैं ही खोदूंगा जल्दी/ तुम बस/ अपने कफन का इंतजाम करो.”(पृ. 34) अपनी इस कामना को नैरेटर ने ‘चमगादड़’ कविता में इस तरह रखा है- “मैं/ तुम्हें लटकते देखना चाहता हूँ/ चमगादड़ की तरह उल्टा/ यूकेलिप्टस के पेड़ की/ ऊँची डालियों पर.” (पृ. 76) बरगद और गूलर जैसे पेड़ों की डालियों पर लटकने वाले वास्तविक चमगादड़ यूकेलिप्टस की ऊँची डालियों की तरफ (अगर उसमें लटकने लायक डालियाँ होती हों!) शायद ही कभी रुख करें. ‘ताक धिना धिन’ (पृ.24) का दलित भले ही ताउम्र ‘उनके’ तबले के लिए खाल मढ़ता रहा हो पर उसका बेटा अब उस तबले को बजाने लगा है. ‘समय के साथ वर्चस्व’ इसी तरह टूटता है. इस कविता में संगीत की भाषा का इस्तेमाल उल्लेखनीय है.

ईश्वर का नकार दलित आंदोलन की मूल संकल्पनाओं में है. तमाम दलित कवियों जिनमें मलखान सिंह संभवतः सबसे आगे हैं, ईश्वर को संबोधित कविताओं की खूब रचना की है. इन कविताओं में आस्तिकता पर चोट है, अंध आस्था का उपहास है और ईश्वर की मृत्यु की घोषणा है. वैश्वीकरण के इस युग में जबकि शोषकों ने अपना कायापलट कर लिया है, ईश्वर को ख़ारिज करने वाली कविताएं लिखना ‘सेफ जोन’ में विचरण करना है. आज जिस दमनतंत्र से लोकतांत्रिक शक्तियों को जूझना है वह ईश्वर-विश्वासी नहीं है. वह भी आपके स्वर में अपना स्वर मिलाकर कह सकता है कि ईश्वर, “अरे! वह तो/ कभी का मर गया है!” (पृ. 63) तब इस तरह की सलाहें कितनी प्रासंगिक रह जाती हैं- “उस कमजर्फ ईश्वर को/ जोर से गरियाओ!” (पृ. 55) धर्मसत्ता ने दलित समुदाय पर जो हीनता थोपी है, इतिहास के इतने लंबे दौर में उसे दबाकर रखा है उसकी इतनी उग्र प्रतिक्रिया अस्वाभाविक नहीं कही जा सकती- “इस आसमान को गहरे से जोतकर/ उस (ईश्वर) का सिंहासन ध्वस्त करेंगे/ ख़त्म करेंगे उसकी सत्ता/ उसका कुटिल राज.” (पृ. 122) कवि का विश्वास कितना भोला है कि ईश्वर की सत्ता का ध्वस्त होना समतापूर्ण समाज की गारंटी है! वह प्रदत्त भाषा की छानबीन किए बगैर उसका प्रयोग करता है और अपने आक्रोश को संग्रह के बिलकुल अंत में इस ऊँचाई पर ले जाकर विस्फोटक अंदाज में व्यक्त करता है- “अब चीखने की बारी/ तेरी है/ तू चीख स्साले!” (पृ.128)
पेंटिग : Sunil Abhiman Awachar 


(ग)
युवतर पीढ़ी के दलित रचनाकारों में दलित स्त्री कवियों की उपस्थिति विशेष रूप से उल्लेखनीय है. मूल्यबोध, सरोकार, गुणवत्ता और विशिष्ट पीढ़ीगत अंतर के लिहाज से दलित स्त्री कविता को अस्मितावादी विमर्श से कुछ भिन्न और स्वायत्त मानते हुए उस पर अलग से विचार किया जाना उचित रहेगा. यहाँ दलित अस्मितावादी काव्यधारा के कुछ नए हस्ताक्षरों तक लेख को सीमित रखा जाएगा. नए रचनाकारों को हम कुछ अपेक्षाओं के साथ पढ़ते हैं. ये अपेक्षाएं उस काव्यधारा-विशेष की परंपरा और समकालीन परिस्थितियों के आग्रह के योग से बनती हैं. परंपरा में नवता का सन्निवेश करते रहना जरूरी होता है. यह काम रुक जाए तो परंपरा रूढ़ि बनने लगती है. रचना पिष्टपेषण-भर न हो इसके लिए अभिव्यक्ति के माध्यम अर्थात भाषा प्रयोग के संबंध में सावधानी बरती जाती है. अंतर्वस्तु और अभीष्ट बहुत-कुछ समान होते हुए भी कविता की प्रभाव-क्षमता तथा ग्राह्यता में जो अंतर आता है वह मुख्यतः भाषा को बरतने के ढंग के कारण. भाषा-बर्ताव का एक सिरा पुरखा-कवियों को जानने और उनके भाषा-व्यवहार के अधिगम से जुड़ता है. ‘अपनी’ परंपरा के कवियों को पढ़ना जरूरी है तो ‘विरोधी’ परंपरा के रचनाकारों को जानना भी उपयोगी हो सकता है. पुराने काव्य-संसार को साझी विरासत मानना इस अर्थ में समृद्धिकारक है कि इससे परंपरा पर दावेदारी का दायरा बढ़ता है और मजबूत भी होता है. परंपरा के नकार पर प्रारंभिक पीढ़ी का बल था. आज जरूरत है उसके साथ विवेकपूर्ण आलोचनात्मक संबंध बनाने की. अद्यतन वैश्विक ज्ञान-संपदा और सृजन से गहरी वाकफियत आवश्यक है. सोशल मीडिया पर हो रही गतिविधियाँ विश्व साहित्य के प्रति नए दलित रचनाकारों की बढ़ती जिज्ञासा का साक्ष्य देती हैं. इस जुड़ाव के नतीजे आने वाले दिनों में दिखाई देंगे.  

नई पीढ़ी के हीरालाल राजस्थानी (1968) पेशे से मूर्तिकार हैं. वे दलित कार्यकर्ता और संगठनकर्ता भी हैं. कविता उनकी अभिव्यक्ति का प्राथमिक माध्यम नहीं है. अपने पहले काव्यसंग्रह ‘मैं साधु नहीं’ (2017) की भूमिका में उन्होंने स्वीकारा है, “मेरी रुचि का क्षेत्र मूर्तिकला है. लेकिन जब मेरी अभिव्यक्ति वहाँ पूरी नहीं होती तो मैं उसे लेखन में पूरी करने का प्रयास करता हूँ.”अभिव्यक्ति की पूरक विधा के तौर पर कविता कभी कवि के मनोगत को निखार-संवार कर प्रकट कर देती है तो कभी फिसलकर अनचाहा भी घटित कर देती है. कविता को पूरा वक़्त चाहिए, जीवन का हर क्षण चाहिए, यह बात हर नवागत सृजनोन्मुख व्यक्ति को समझनी है. हीरालाल राजस्थानी अपने अनुभवों और सरोकारों को बड़े दायरे में रखकर देखते हैं. वे जातिभेद के साथ वर्गभेद से मिले दंश को भी रेखांकित करते हैं. उन्होंने अपने इस कविता संग्रह को दलित लेखक संघ की उपलब्धि के रूप में देखा है. उनके संग्रह की प्रस्तावना शीलबोधि ने लिखी है. शीलबोधि स्वयं कवि हैं. उनका कहना है कि हीरालाल के सृजन से “आशाओं के झरने निकलते” हैं. यह भी कि उनकी “कविताओं में परिवार और समाज समान महत्त्व के साथ” आए हैं. कलावादी लोग हीरालाल की कविताओं से ‘बहुत-कुछ सीख’ सकते हैं, शीलबोधि ने यह मंतव्य भी जाहिर किया है.

आंबेडकरवादी विचार से सम्बद्धता के कारण हीरालाल राजस्थानी की कविताओं का तेवर पूर्वपरिचित है. वे गाँव को रहने लायक नहीं मानते. संग्रह की पहली कविता में वे कहते हैं- “गाँव से शहर भले/ जहाँ न ठाकुर का कुआँ,/ न मनुवादी मुंडेरें.”‘मनुवादी मुंडेर’ एक ध्यानाकर्षक बिंब है. आज से आधी शताब्दी पहले यह स्थापना निरापद-सी थी कि शहर रहने के लिए भले हैं. आज जब निगम की पाइपलाइन अक्सर सूखी रहती है और आटे-दाल का बजट रोज बीस लीटर पानी का पीपा खरीदने में खर्च होता है तो शहर की हिमायत में कवि की वर्गीय स्थिति भी शामिल हो जाती है.

विचार की संकरी गलियों को पहचानकर हीरालाल ‘मानवता’ के विचार को ही सर्वश्रेष्ठ मानते हैं. ‘सर्वश्रेष्ठ’ नामक कविता में वे कहते हैं कि स्त्री और पुरुष दोनों को इंसान बनाने की जरूरत है. ‘इच्छा’ शीर्षक कविता में वे परिवार की रूढ़ आदर्श धारणा का अनुमोदन करते हैं. ‘सौंदर्य’ कविता में वे वास्तविक सौंदर्य को मन व विचार के स्वस्थ होने में देखते हैं. ‘सकारात्मकता’ कविता में वे स्त्री के ‘गृहणी’ होने की सार्थकता को इस तरह रेखांकित करते हैं- “एक स्त्री/ जो सूरत से बदसूरत/ लेकिन उसके चेहरे पर/ गर्व के भाव हैं/ क्योंकि वह गृहणी है/ घर को संभालती/ परिवार को पालती है.” (पृ. 29) इस कविता का उलट भाव दूसरी कविता में है- “स्त्रियाँ तो अब वे हैं/ जो घरों की चारदीवारी में सड़ रही हैं/खेतों की फसलों में खप रही हैं/ रिश्तों के तानो-बानों में उलझ गयी हैं” (पृ. 30) माँ पर लिखते हुए वे पुनः दिल की गहराइयों से चिर-परिचित शैली में महिमागान करते हैं- “तुम जननी/ सृष्टि-सृजन के लिए/ साक्षात् शक्ति रूप/ तुम्हारा जन्म देना/ दुनिया का सबसे/ सुंदर भाव है/ इसके लिए तुम/ सम्मान की अधिकारणी हो/ ये आनन्द सहज बनाए रखना/ क्योंकि/ इसके आगे पूरा ब्रह्माण्ड/ तुच्छ और नत-मस्तक है.” (पृ. 33)

शायर को लीक छोड़कर चलने वाला कहा गया है. यह कथन आलंकारिक है. ऐसे अवसर बहुत कम होते हैं जब शायर बे-लीक होता हो. विमर्शपरक कविता की अपनी लीक बनी है. कवि इस लीक पर चलता है और चलने की सलाह भी देता है- “अनुभवों का प्रकाश लेकर/ तुम रोशन करते रहना/ हर दीये को/ ... अपने जीवन का सारांश बाँटते रहना/ अपनी कौमी संतानों को.”(पृ. 34) कुछ कविताओं में हीरालाल जीवन की बिडंबनाओं को निरायास व्यक्त करते नज़र आए हैं. उनकी ऐसी एक कविता है ‘ईमानदारी’- “ईमानदारी/ बैसाखियों के सहारे/ वफादारी की/ चौखट पर/ दासता की बेड़ियों में/ छटपटाती/ दम तोड़ती/ साँसों के समंदर में डूब/ अपना वजूद/ खोजती हुई/ लाश बनकर/ ऊपर तैर आती है!!” (पृ. 22) कबीर के सन्दर्भ से लिखी उनकी लघु कविता ऐसी ही है. भाषा व्यवहार के मामले में हीरालाल कई बार असावधान दिखते हैं और कई बार कुछ अबूझ-सा रच जाते हैं- “मन जब/ आकार की/ प्रक्रिया में होता है/ तो वह व्यवहार में/ तब्दील हो/ अच्छा या बुरा होने लगता है.”(पृ. 15)

भाषा का ऐसा ही प्रयोग उन्होंने काव्य-संग्रह के समर्पण वाली पंक्ति में किया है- “उन/ महानुभवों/ को समर्पित/ जो मानवीय/ मूल्यों के/ सरोकार रहे/ हैं!” संत काव्य परंपरा में ‘साधु’ शब्द बार-बार प्रयुक्त हुआ है. कबीर तो बहुधा साधु को ही संबोधित करते हैं. यह साधु अकर्मण्य प्राणी नहीं है. वह जीवन को सहज जीता हुआ, सारे सामाजिक और पारिवारिक दायित्वों का निर्वाह करता हुआ चिंतनशील आचरणशुद्ध व्यक्ति है. अपने संग्रह का शीर्षक ‘मैं साधु नहीं’ तय करते हुए हीरालाल ने अर्थ-विपर्यय कर दिया है. इस शीर्षक से लिखी कविता में उनका कथन है- “मैं साधु नहीं/ क्योंकि/ मुझे मोह है उनसे/ जो नहीं टूटते कभी मेहनत से!” (पृ. 68) ‘मेरी कलम’ नामक कविता में वे इसे (कोष्ठक में अर्थ देकर)और स्पष्ट करते हैं- “मेरी कलम/ ...मेरी उँगलियों को/ संगठित होना सिखा/ मुझे साधु (निकम्मा)/ होने से भी बचाती है.”
उल्टा चोर’ और ‘नीला सलाम’ जैसी कविताओं में हीरालाल राजस्थानी संभावनाशील कवि के
रूप में दिखाई पड़े हैं. उनका आक्रोश जितना विस्तृत, समावेशी, सांद्र, अंतर्मुखी अर्थात् काव्योचित होता जाएगा, यह संभावना उतनी ही मूर्त होती जाएगी.

कर्मानन्द आर्य (1984) के स्वभाव में कविता रची-बसी है. आलोचक बिना कोई जोखिम उठाए उनकी कविताओं की मुक्तमन से सराहना कर सकते हैं. अपने पहले संग्रह ‘अयोध्या और मगहर के बीच’ (2016) में वे विविध रुचियों वाले कवि के रूप में दिखाई पड़ते हैं. इस वैविध्य में अन्विति है, विरुद्धों का सामंजस्य नहीं. अस्मितामूलक चेतना उनके सृजन की नियामक शक्ति है. प्रस्तुत संग्रह का केन्द्रीय भाव प्रेम है. अस्मिता का मेल आक्रोश से बैठता है परंतु यहाँ प्रेम से उसकी सहज संगति बन गई है. इस रसायन में आक्रोश जज्ब हो गया है. आत्मचेतस प्रेम स्त्री-स्वत्व के प्रति खासा संवेदनशील है. नई बनती स्त्री की छवियाँ उनके यहाँ अपेक्षाकृत कम हो सकती हैं मगर स्त्री-व्यक्तिसत्ता के प्रति सजग-सचेत नए बनते ‘पुरुष’ का चित्र उन्होंने बखूबी खींचा है- “इसी धरती के किसी कोने पर/ कोई मेरी तरह जिद्दी है/ कोई तेजवान, अकेला इन दिनों/ देखता है तुम्हारे ख्वाब/ बिलकुल मेरी तरह/  मुझे अच्छा लगता है/ कोई चाहता है तुम्हें/ मेरी सतृष्ण चाहतों के साथ/  ओ मेरी प्रिया! ओ मेरी पत्नी/

एक विचित्र अर्थ में धर्मशास्त्र अस्मितावादी कविता के लिए उपजीव्य होते हैं. मिथकों, पुराण-कथाओं और शास्त्रीय वचनों से ईंट-गारा लेकर यह कविता आकार ग्रहण करती है. अस्मितावादी कविता चाहकर भी शास्त्र के सन्दर्भों से असम्पृक्त नहीं रह सकती है. अपनी कविताओं के लिए कर्मानन्द भी ‘शास्त्र’ की तरफ जाते हैं. उनकी खूबी यह है कि वे राजनीतिक संदर्भ देकर ‘शास्त्र’ से ली गई सामग्री को समकालिक बना देते हैं. उनके संग्रह का शीर्षक इसकी पुष्टि करता है. संग्रह की भूमिका में नंद भारद्वाज ने लिखा है- “एक तरफ अयोध्या, जो कि तुलसी विरचित राम की जन्मभूमि के रूप में सनातनी आस्था का केन्द्र मात्र था, वह धर्म और वोट की सतही राजनीति के चलते एक संवेदनशील मुद्दा बनता गया, वहीं दूसरी तरफ तुलसी के ही समकालीन संत कवि कबीर की पुण्यस्थली मगहर और उसी सनातनी रूढ़ परंपरा के विरुद्ध उनकी धर्मनिरपेक्ष सोच सत्ता-व्यवस्था की उपेक्षा का शिकार होती गई है.” (पृ. 9) गाय की राजनीति और गौ रक्षकों के आतंक के समय में एक कवि की प्रतिक्रिया आलोच्य संग्रह में इस तरह दर्ज है-“गाय नहीं, बकरी माँ है/ न किसी से ईर्ष्या न द्वेष/ न वैतरणी पार कराने की जहमत/ वे नहीं चाहती थीं सांस्कृतिक बगावत.” (पृ.67)

संस्कृति को विद्रूप करके उपजी राजनीति शासन के सेकुलर ताने-बाने को अपदस्थ करती चलती है. इस राजनीति से मुकाबला करने के लिए चाहे-अनचाहे उसी संस्कृति-कोष से सामग्री लेनी पड़ती है. कर्मानन्द की कविता यह जिम्मा ठीक से निभाती है- “रामलला, समझते हैं राजनीति का व्याकरण/ बूढ़ी आस्थाओं के डूब जाने से पहले/ रोते हैं कभी-कभी अपने कृत कर्मों पर/ थरथराती है दीपक की लौ भीत एवं मद्धम/ दूरियों को पाटने वाली राहें/ पोंछती हैं पसीना/ छांह बरसाती धूप के लिए ढूंढते हुए आसरा/ सुखी हैं अयोध्यावासी/  मगहर चर्चा में नहीं रहता/ खुद से डरा सहमा पहुँचता है राजधानी/ एक डरे हुए दलित की तरह/ जिसका खेत छीन लिया है दबंगों ने/ थाने में जिसकी रपट नहीं लिखता दरोगा/ उल्टा चोरी के आरोप में कैद करता है उसकी आत्मा/  हर बार विडंबना की राह चलता/ मगहर अयोध्या के आईने में अपना अक्स देखता है/ जैसे दाढ़ी का सफ़ेद बाल देखता है बूढ़ा युवा.” (पृ. 60)

चोरी के आरोप में कैद की जाती आत्मा, दाढ़ी के सफ़ेद बाल देखता बूढ़ा युवा जैसे कथन सामान्य अनुभव को व्यंजक बना देते हैं. ऐसी ही व्यंजकता उनकी ‘जनरल डायर’ कविता में दिखाई देती है- “सोचता हूँ तुम्हारा होना कितना प्रासंगिक है/ जब देश के सत्तर प्रतिशत नागरिक स्वतंत्रता का हठ किए बैठे हों.” (पृ. 114) जनरल डायर की प्रासंगिकता की कई वजहें कविता में चित्रित हैं. उनमें एक वजह यह भी है- “तुम्हारा सीना तो नहीं नापा मैंने/ लेकिन प्रधानमंत्री के सीने से बिल्कुल कम नहीं होगा/ तुम्हारे सीने का आयतन”. कविता की आत्मपरक शैली ऊधम सिंह का स्मरण कराती है. ऊधम से कवि का नाता जुड़ता तो है!

अपने दो पुरखों- बाबा साहेब आंबेडकर और नामदेव ढसाल को कवि ने बहुत शिद्दत से याद किया है. बाबा साहेब पर हिंदी के अन्य दलित कवियों ने भी लिखा है पर उनमें श्रद्धा का तत्व ज्यादा और कविताई कम है. कर्मानन्द ने इनके मध्य संतुलन बनाने की कोशिश की है. आंबेडकर पर लिखी उनकी कविता इस तरह शुरू होती है- “इससे पहले न ऐसी धरती थी न ऐसी मिट्टी/ न कोई कला थी न ऐसा कलाकार/ न ऐसी नफरत थी न ऐसा प्रेम/ फिर तुमने मिट्टी को छुआ/ कला पैदा हुई/ कलाकार पैदा हुआ/ प्रेम पैदा हुआ”. (पृ. 115)

ढसाल पर लिखी कविता में वे इस ‘पैंथर’ कवि का महत्त्व रेखांकित करते हैं- “तुम्हारी कविता का एक शब्द/ खोल रहा है सदियों से रुंधा हुआ गला/ ...हर नदी के पानी से जुड़ी हुई है/ तुम्हारी आवाज”. (पृ. 110)

तथागत बुद्ध का उल्लेख उनकी कविता ‘कोई लाश जलती है मेरे भीतर’ में इस तरह हुआ है- “जब यशोधरा को छोड़कर गए थे बुद्ध, बहुत रोये थे/ ध्यानमग्न होते हुए उभर आती थी एक तस्वीर.” (पृ. 51) नियमगिरि की पहाड़ियों की मृत्यु से संदर्भित शोकगीत की तरह है यह कविता. बहुराष्ट्रीय निगमों के उजाड़चक्र में फंसकर कटते, सूखते, नष्ट होते जंगल-बगीचे, नदी-नाले और गिरि-प्रांतर के साथ अपनी चिता को जलती देखना कवि की पराभूत मनोवृत्ति का सूचक नहीं अपितु उसकी द्रावक प्रतिबद्धता का प्रमाण है- “मुझे सुकून है/ उन्हीं पहाड़ियों पर जल रही है मेरी चिता/ मैंने मृत्यु से पलायन का समझौता नहीं किया.” (पृ. 52)

‘जेंडर सेंसिटिव’ कवि के रूप में कर्मानन्द एक तरफ एक्टिविस्ट की तरह दिखाई देते हैं तो दूसरी तरफ गझिन अनुभूतियों वाले सर्जक के रूप में. ‘तेलू ठकुराइन की अचकन’ (पृ. 57) में उनकी कविता की स्त्री थोपी गई जिंदगी से विद्रोह करती है तो ‘लज्जा तुम्हारा आभूषण नहीं है’ में वे दलित स्त्रियों से कहते हैं- “तुम्हारे खून में आ रहा है उबाल/ तुम आक्रोश को गीत में बदल रही हो/... दलिताओं! लज्जा तुम्हारा आभूषण नहीं है/ तुम्हारा आभूषण है ज्ञान, विवेक, विद्रोह.” (पृ. 56) प्रेम कवि के रूप में कभी वे संलग्नता की मनःस्थिति में और कभी विषाद की भावदशा में दिखाई देते हैं. ‘यादों के डाकिये’ कविता में उनकी अनुभूति इस तरह शब्दबद्ध हुई है- “तुम्हारी याद आ रही है/ जबकि यह यादों का मौसम नहीं है/ पारंपरिक प्रेम जा चुका है/ आदतों में बदलाव और बेचैनी बढ़ रही है/ जिधर देखता हूँ उधर/ और जिधर नहीं देखता वहाँ सब ओर सन्नाटा है. (पृ. 77) स्मृतियाँ प्रेम के तंतुओं को पुनर्नवा करती प्राणवान बनाए रखती हैं. कर्मानन्द की कई प्रेम कविताओं में यादों को पृष्ठभूमि से अग्रभूमि तक रखा गया है- “जब बहुत उदास और बोझिल रातों में/ यादों का डाकिया/ डाल जाता है तुम्हारी डाक/ जब आरती के दिए की तरह/ एक मद्धिम लौ/ उन अक्षरों पर बेहोश हो जाती है/ जब काली रातो का अंत शुरू में ही हो आता है/ तब मैं बहुत देर/ बहुत वक़्त तक/ पढ़ता हूँ तुम्हारे वे लब/ जो लिखे नहीं जा सके/ कहे न जा सके/ जिए न जा सके/ पिछली कई सदियों के पहले.” (पृ. 98) प्रेम काव्य के प्रसंग में कर्मानन्द ने एक कविता में बाणभट्ट को याद किया है. ‘उत्तर बाणभट्ट’ शीर्षक से लिखी यह कविता सातवीं सदी के कादंबरीकार को सलाह देने के खयाल से रची गई लगती है- “लिखो बाणभट्ट/ प्रेम केवल राजाओं की विरासत नहीं/ वह कवियों को भी मिलता है/ यथावसर.”(पृ. 79)

बाण को अगर उत्तर देने का मौका मिलता तो वे कहते कि किसी अन्य लेखक (आ. हजारी प्रसाद द्विवेदी) के जरिए संवाद करने या सलाह देने की बजाए सीधे मुझसे मुखातिब होते तो क्या ही अच्छा होता! बाण ने लिखा है कि उनके समय में प्रेम में डूबे कवि लोक में खूब दिखाई देते हैं- ‘प्रायः कुकवयो लोके रागाधिष्ठित दृष्टयः.’ प्रेम में डूबे होना और प्रेम में डूबे दिखना दो भिन्न या उलट स्थितियाँ हैं. बाण ऐसे पाखंडी प्रेम कवियों को ‘कुकवि’ कहते हैं. इनकी संख्या में कमी आई हो, ऐसा नहीं लगता. तीन जन्मों में प्रेमकथा ‘कादंबरी’ में संभवतः पहली बार भारतीय साहित्य में कोई चांडाल कन्या पूरे स्वाभिमान के साथ राजभवन में प्रवेश करती है और पहली बार सती प्रथा का संज्ञान लेकर उसके विरुद्ध किसी कवि की आवाज सुनाई पड़ती है! जो हो, एक नए रचनाकार का प्राचीन कवि से यह संवाद प्रीतिकर है.
पेंटिग : Sunil Abhiman Awachar 

(घ)
दलित कविता की अंतर्धारा में युयुत्सा मुख्य है. युयुत्सा युद्धैषणा= युद्ध करने की इच्छा है. वागीश शुक्ल की किताब ‘शहंशाह के कपड़े कहाँ हैं?’ (2006) के पहले निबंध ‘साहित्य क्या है?’ के शुरुआती वाक्य में कहा गया है- ‘साहित्य मृत्यु का सामना करने की विधि है.’ प्रस्तुत प्रसंग में इस कथन को कुछ इस तरह रखना चाहूँगा : दलित कविता हत्या का सामना करने की तरकीब है. दलित कविता एक अनचाहे युद्ध से जूझते हुए रची जाती है. मृत्यु अवश्य ही अजेय है और उसके आगमन का देशकाल भी पूरी तरह अज्ञात होता है लेकिन दलित कविता जिस युद्ध और हत्या का मुकाबला करती है उसका पता-ठिकाना अक्सर पहले से मालूम रहता है. विवाह में दलित दूल्हे का घोड़े पर बैठना हो या किसी दलित का प्रधानी के इलेक्शन में खड़े होना ये सब हत्या को आमंत्रित करने वाले कारण बन जाते हैं. मगर, ये नए कारण हैं और मात्र इनके उल्लेख से यह भ्रम हो सकता है कि जाति आधारित हत्या कोई नया फेनोमिना है. सचाई यह कि हमलों और हत्याओं का विधान वर्णवादी अपसंस्कृति के मूल में है. सर उठाकर चलता हुआ दलित ‘प्रभु-नेत्रों’ के लिए असह्य रहा है. दलित कविता इन्हीं हत्यारी निगाहों का सामना करने के क्रम में विकसित हुई है. वह इसीलिए युयुत्सा की नहीं, प्रति-युयुत्सा की कविता है. उसकी आक्रामकता प्राथमिक नहीं, प्रतिरोधी है. उसमें आक्रमण की कला नहीं, प्रत्याक्रमण की मजबूरी है.

दलित अनुभव हिंसा झेलने के अनुभव हैं. दलित स्मृति हत्या, लूटपाट, आगजनी और निर्वासन के अनुभवों से भरी हुई है. स्मृतियों की यह दुनियां दलित कवि को विरासत में मिलती है. हिंसापूरित वर्तमान इसे हीनता, हताशा और अवसादबोध से संवलित करता चलता है. दलित कविता को ऐसे माहौल में अपनी भूमिका पहचाननी और निभानी पड़ती है. दलित कवि भीतरी सीमा पर घनीभूत हताशा से टकराता है और बाहरी सीमा पर प्रतिरक्षा के तरीकों की खोज में लगा रहता है. वह खामोश रहने के नतीजों से वाकिफ है. स्वयं बोलता कवि औरों का मौन भी तोड़ना चाहता है-

“जितना रहोगे चुप
मारे जाओगे बेदर्दी से उतना ही
उनके हाथों में होंगे
तमंचे, बंदूक, लाठी, डंडे, हथगोले
साथ होगी पुलिस, सेना, शक्ति
और तुम निहत्थे
मारे जाओगे
बचकर भागने से पहले ही
तुम्हारी चुप्पी ही हो जाएगी खड़ी
तुम्हारा रास्ता रोककर.”
(ओम प्रकाश वाल्मीकि, पृ. 97)

वे किसी अपरिहार्य कारण से ही हत्या करते हों, यह कतई आवश्यक नहीं है. सीधे खड़े होने, आसमान ताकने, हँसने, गुनगुनाने और बिना डरे बोलने-भर से वे चिढ़ सकते हैं और हत्या करने पर उतर सकते हैं- “जब जब तुम कोशिश करते हो/ आदमी बनने की/ वे चौकन्ने होकर/ लग जाते हैं तैयारी में/ एक और युद्ध की.” (वही, पृ. 47) कर्मानन्द उन स्थलों को चिन्हित करते हैं जहाँ हत्याएं हुई हैं- “दिल्ली, पटना, झाबुआ, गोहाना, बाथे/ वर्णवादी फौजें रोज मारती हैं जिन्हें/ उनके कपड़े उतारती हैं रोज/ जिस देश में सबको पिटने की आदत हो/ वहां जज वाली अदालत खामोश बैठी रहती है.” (पृ. 47) सतत, संगठित और सुनियोजित हत्याओं से डरे-सहमे समुदाय में आत्म-विश्वास पैदा करते देवेन्द्र कुमार बंगालीका स्वर मुक्तिबोध के स्वर से मिलता है. ‘भूल गलती’ का काव्य-नायक हार का बदला चुकाने आता है. यह नायक कोई और नहीं ‘हृदय का गुप्त स्वर्णाक्षर’ है जिसे मुक्तिबोध ने ‘संकल्प-धर्मा चेतना का रक्तप्लावित स्वर’ कहा है. देवेन्द्र की कविता ‘कोठ का बाँस’ का नायक दलित जन के द्रवीभूत आक्रोश का साकार होता रूप ही है जिसका साथ देने के लिए पूरी प्रकृति तैयार हो गई है-

“कल तक का गुस्सा
जो रात एक जगह जम गया था
सुबह होते ही पिघलकर चारों तरफ फैलने लगा
देखते-देखते आसमान लाल हो उठा
उसने मुड़कर देखा
वह अकेला नहीं था और न निहत्था
हवा के तेज झोंके से
शाख और पत्तियों में ठन गई थी
पौधे अगल-बगल में खड़े थे
कमर की सीध में बन्दूक की तरह तने हुए
झाड़ियाँ तरकश के तीर की तरह
गर्दन निकालकर टाक रही थीं मौके की ताक में
एक इशारे पर बाहर निकलने के लिए
किनारे की कोठ का बाँस झुक आया था
नीचे जमीन तक
गोया कह रहा हो कि देखो मुझमें
कितनी लाठियाँ निकल सकती हैं?
मैं ख़त्म होने को नहीं
काटने के बाद अगली बरसात में फिर कोंपल फूटेगी
नये नये बाँस होंगे मुझसे भी ऊँचे
मजबूत और सलीके के
आने वाले सूरज का स्वागत करने के लिए
मेरी पैदाइश ही है जुर्म के विरोध में.”(पृ. 276)
 ________________________


संदर्भ ग्रंथ-सूची

असंगघोष, ‘ईश्वर की मौत’(2017), सान्निध्य बुक्स, गाँधीनगर, दिल्ली.
ओमप्रकाश वाल्मीकि, ‘अब और नहीं...’ (2009), राधाकृष्ण प्रकाशन प्रा.लि., दरियागंज, नयी दिल्ली.
डॉ. एन. सिंह, ‘अँधेरों के विरुद्ध’ (2016), वाणी प्रकाशन, दरियागंज, नयी दिल्ली.
कर्मानन्द आर्य, ‘अयोध्या और मगहर के बीच’ (2016), करतारपुरा इंडस्ट्रियल एरिया, जयपुर.
जगदीश पंकज, ‘निषिद्धों की गली का नागरिक’ (2015), अनुभव प्रकाशन, साहिबाबाद, गाजियाबाद.
जय प्रकाश लीलवान, ‘समय की आदमखोर धुन’ (2009), भारतीय दलित अध्ययन संस्थान, नई दिल्ली.
देवेन्द्र आर्य, ‘आधुनिक हिन्दी कविता के पहले दलित कवि : देवेन्द्र कुमार बंगाली’ (2017), ऑथर्स प्राइड पब्लिशर प्रा.लि., मयूर विहार, नई दिल्ली.
वागीश शुक्ल, ‘शहंशाह के कपड़े कहाँ हैं?’ (2006), वाणी प्रकाशन, दरियागंज, नयी दिल्ली.
श्यौराज सिंह बेचैन, ‘चमार की चाय’ (2017), वाणी प्रकाशन, दरियागंज, नयी दिल्ली.
डॉ. सी. बी. भारती, ‘लड़कर छीन लेंगे हम’ (2017), वाणी प्रकाशन, दरियागंज, नयी दिल्ली.
हीरालाल राजस्थानी, ‘मैं साधु नहीं’ (2017), कदम प्रकाशन, रोहिणी, दिल्ली.
 _______________________

bajrangbihari@gmail.com

सहजि सहजि गुन रमैं : पंखुरी सिन्हा

$
0
0




































पंखुरीसिन्हा की कविताएँ


__________________________
पंखुरी सिन्हा
18जून 1975


'कोई भी दिन' , कहानी संग्रह, ज्ञानपीठ, 2006. 'क़िस्सा-ए-कोहिनूर', कहानी संग्रह, ज्ञानपीठ, 2008
'प्रिजन टॉकीज़',अंग्रेज़ी में पहला कविता संग्रह, एक्सिलीब्रीस, इंडियाना, 2013, ‘डिअर सुज़ानाअंग्रेज़ी में दूसरा कविता संग्रह, एक्सिलीब्रीस, इंडियाना, 2014

'रक्तिम सन्धियां', साहित्य भंडार इलाहाबाद से पहला कविता संग्रह, 2015. २०१७ में बोधि प्रकाशन से दूसरा कविता संग्रह, बहस पार की लंबी धूप, प्रकाशित

कविता के लिए राजस्थान पत्रिका का २०१७ का पहला पुरस्कार, राजीव गाँधी एक्सीलेंस अवार्ड 2013 में
पहले कहानी संग्रह, 'कोई भी दिन' , को 2007का चित्रा कुमार शैलेश मटियानी सम्मान. 'कोबरा: गॉड ऐट मर्सी', डाक्यूमेंट्री का स्क्रिप्ट लेखन, जिसे 1998-99के यू.जी.सी., फिल्म महोत्सव में, सर्व श्रेष्ठ फिल्म का खिताब मिला.

कवितायेँ मराठी, बांग्ला, पंजाबी, स्पेनिश  में अनूदित,कहानी संग्रह के मराठी अनुवाद का कार्य आरम्भ,
उदयन वाजपेयी द्वारा रतन थियम के साक्षात्कार का अनुवाद,रमणिका गुप्ता की कहानियों का हिंदी से अंग्रेजी में अनुवाद

सम्प्रति :
पत्रकारिता सम्बन्धी कई किताबों पर काम, माइग्रेशन और स्टूडेंट पॉलिटिक्स को लेकर, ‘ऑन एस्पियोनाज़’, एक किताब एक लाटरी स्कैम को लेकर, कैनाडा में स्पेनिश नाइजीरियन लाटरी स्कैम,
और एक किताब एकेडेमिया की इमीग्रेशन राजनीती को लेकर, ‘एकेडेमियाज़ वार ऑफ़ इमीग्रेशन’,
साथ में, हिंदी और अंग्रेजी में कविता लेखन, सन स्टार एवम दैनिक भास्कर में नियमित स्तम्भ एवम साक्षात्कार


संपर्क :A-204, Prakriti Apartments, Sector 6, Plot no 26, Dwarka, New Delhi 110075
ईमेल : nilirag18@gmail.com / 9968186375

कथा - गाथा : अगिन असनान : आशुतोष

$
0
0
(Suttee by James Atkinson, 1831)












समकालीन हिंदी कथा-साहित्य पर आधारित स्तम्भ, भूमंडलोत्तर कहानीके अंतर्गत आशुतोष की कहानी – ‘अगिन असनान’ की विवेचना आप आज पढ़ेंगे.  यह कहानी ‘सती’ के बहाने समाज के उस हिंसक सच से आपका परिचय कराती है जिसपर व्यवस्था के सभी अंग पर्दा डालना चाहते हैं. युवा आलोचक राकेश बिहारी ने इस कहानी के सामाजिक, आर्थिक आयामों को ध्यान में रखते हुए इसका विश्लेषण किया है. यह स्तम्भ अब पूर्णता की ओर अग्रसर है और शीघ्र ही पुस्तकाकार प्रकाश्य है.



अगिन असनान                                       
आशुतोष



मेशा से चुहुलगुल बहावलपुर में अब सन्नाटा था. आस्था, भय और रहस्य में लिपटी एक अजीब किस्म की खामोशी पूरे गाँव में फैली हुई थी. दिन तो जैसे तैसे कट जा रहे थे पर रातें इतनी भयावह हो रहीं थी कि जैसे सब कुछ को निगल कर ही मानेंगी. ऐसे में तीन दिन और तीन रात बीत गए, पर कुछ हो नहीं रहा था. कुछ नहीं होने से गाँव वाले और अधिक डरे हुए थे. लोरिक का पूरा परिवार फरार था, कहाँ? ये किसी को मालूम नहीं. उनके दरवाजे पर बंधी गाय भूखी-प्यासी रम्भाती रही, पर रात में किसी ने गाय का पगहा काट दिया, वो भी पता नहीं कहाँ चली गयी. अब लोरिक के परिवार के बारे में बताने वाला कोई नहीं था. वैसे गाय होती भी तो क्या बताती.

चौथे दिन एक बड़े अखबार का एक क्षेत्रीय पत्रकार बहावलपुर में पहुँचा. और पाँचवें दिन पूरे जनपद की सुबह इस खबर से हुई कि 'बहावलपुर में हुआ सती कांड.'पहली बार उस अखबार में उस क्षेत्रीय पत्रकार के नाम से कोई खबर छपी थी इसीलिए उसने उस खबर को लिखने में अपनी कलम तोड़ दी थी. कलम तोड़ना मुहावरे में नहीं है, उसने सचमुच में तोड़ दी थी. खैर! खबर का सार यह था कि 'बहावलपुर के लोरिक पुत्र जियावन के बड़े बेटे मगरु की तबियत काफी दिनों से दिक् थी. घर वाले उनका दवा-दारू करा कर आजिज आ चुके थे. पर रोग ठीक नहीं हुआ. उसी रोग के कारण चार दिन पहले वे शांत हो गए. मगरु की मृत्यु से दुखी उनकी पत्नी सुनैना देवी ने सती होने की घोषणा के साथ कि अपने पति मगरु की लाश को अपने गोद में लेकर अग्नि स्नान कर लिया.’

फिर क्या था, एक साथ पूरा जनपद जाग गया. कुछ आस्था में, कुछ आक्रोश में तो कुछ नौकरी की महज औपचारिकता में.

दोपहर होते-होते पूरा बहावलपुर गर्दा-गर्दा हो गया. बहावलपुर में सबसे पहले पहुँचने वालों में थाने के दारोगा और सिपाही थे. दारोगा जी केस से जुड़े हुए सभी मामलों की जाँच-पड़ताल कर चुके थे. उनकी जाँच रिपोर्ट और अखबार में छपी खबर में कहन के लहजे के अलावा कोई विशेष फर्क नहीं था. सती कांड के अपने बारह मिनट के ब्यौरे में दारोगा जी ने चौदह बार यह कहा कि 'साहिब इते पैले नम्बर हम आये ते.'बहावलपुर में सबसे पहले पहुँचने वाली बात पर दारोगा जी को इतना जोर देते देख कप्तान साहब चिढ़ गए. नौकरी होती ही ऐसी है बड़ा से बड़ा ओहदेदार अपने मातहतों को कभी किसी बात का श्रेय नहीं लेने देता. मातहत श्रेय लेने की नहीं, नाकामियों की जिम्मेदारी लेने की नौकरी करते हैं. देश की सबसे बड़ी परीक्षा पास कर पुलिस अधीक्षक बने साहब को उस दिन दारोगा ही सबसे बड़ा प्रतियोगी नजर आने लगा. कप्तान ने दारोगा को पुलिस की आवाज में घुड़क़ा'ये क्या लगा रखा है, सबसे पहले पहुँचे?'

दरोगा जी ऐसे ही नहीं कई वर्षों से दरोगा थे, वे तुरन्त समझ गए 'मनो आप आये, पाछे से हम पहुँचे.'कप्तान साहब अभी थोड़ा आश्वस्त होते कि कलेक्टर साहब भड़क़ गए 'तुम लोगों ने ये क्या ड्रामा फैला रखा है? आयं, सारी खबर तुम्हीं लोगों की थी, मुझे तो जैसे कुछ पता ही नहीं. मैं कल रात को ही गृह सचिव साहब के साथ एक पार्टी में था, मुझे तभी पता लग गया था.'कलेक्टर साहब को रात में ही इस घटना की खबर हो गयी थी, इस बात का तो नहीं पर गृह सचिव साहब के जिक्र का पर्याप्त असर कप्तान साहब पर हुआ. वे लपक कर बोले 'एस एस सर! पहले आप आये और उसके तुरन्त बाद मैं पहुँचा.'दरोगा जी को लगा कि कहीं उनकी आमद की बात दब न जाय, उन्होंने अपनी उपस्थिति दर्ज करायी 'और आप के पिछारे से हम पौंचे.'सिपाहियों ने भीड़ को हटाने की गरज से डंडा फटकारा, उन लोगों ने शब्दों में तो नहीं पर डंडे की भाषा में बता दिया कि 'हमौरे सोई आये ते.'

सारे हाकिम-हुक्काम आ तो गए थे, पर एक मुश्किल यह आ रही थी कि बहावलपुर का कोई आदमी सुनैना देवी के सती होने पर कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं था. जिससे पूछते वो खुद को मासूम और अंजान बता भीड़ में जाकर खड़ा हो जाता. आस-पास के गाँवों से ट्रैक्टर-ट्राली, जीप, बलेरो, मोटर साइकिलों से भर-भर कर लोग आते जा रहे थे. दोपहर से शाम हो गयी. पर सुनैना देवी सती कांड के बारे में सही वस्तु स्थिति का कुछ भी पता नहीं चल पा रहा था. जहाँ सुनैना देवी सती हुई थीं, उस जगह को पुलिस ने बाँस की बल्लियों से घेर दिया था. वहाँ पुलिस के दो जवान तैनात थे. किसी को भी वहाँ जाने की अनुमति नहीं थी. प्रशासन को डर था कि सती स्थान पर कोई पूजा आदि न करने लगे. भीड़ बढ़ती जा रही थी. जैसे पूरे जिले की सडक़ों का रूख बहावलपुर की ओर हो गया था. सुरक्षा के मद्देनजर कलेक्टर साहब ने मुख्यालय से एक बड़ा जनरेटर मगवा लिया. मामला इतना संवेदनशील था कि दोनों अधिकारियों को बहावलपुर में ही कैम्प करने का निर्णय लेना पड़ा. साहबों का यह कार्यक्रम ए.डी.एम., एस.डी.एम. पटवारी से होते हुए पंचायत सचिव तक संक्रमित हुआ. सरकारी वाहन बहावलपुर से जिला मुख्यालय तक चीखते हुए दौड़ रहे थे. सरकारी धन के गबन में निलम्बित पंचायत सचिव के तो जैसे चार जोड़े हाथ-पैर उग आये. उसने मन ही मन सुनैना देवी सती मैया से मन्नत माँगी कि 'बहाली करा दो मैया, तुमाओ बलिदान व्यर्थ ने जान देहें.'इस तरह सुनैना देवी से माँगी गयी वह पहली मन्नत थी. वो भी एक निलम्बित सरकारी कर्मचारी द्वारा. उसने आनन-फानन में अधिकारियों के लिए दो शानदार टेंट लगवा दिए. तय हुआ कि दिशा फरागत के लिए साहब लोग सरपंच जी का शौचालय इस्तेमाल करेंगे. इतना सुनते ही सरपंच और सरपंचाइन जो खाने-धोने के अलावा कभी कोई काम अपने हाथ से नहीं करते थे, शाम से ही बाल्टी झाड़ू लेकर शौचालय चमकाने लगे. कलेक्टर और कप्तान बरसों बाद किसी गाँव में आये थे. 


टेंट में बैठते ही उनकी ए.सी. पालित देह त्राहि-त्राहि करने लगी. कलेक्टर-कप्तान देहों की वह आर्त पुकार मुख्यालय शहर के सबसे बड़े बिल्डर ने सुनी. आये होंगे कभी भगवान गजराज की आर्त पुकार सुनकर, पर उस दिन तो घंटे भर के भीतर शहर का नामी बिल्डर कम्पनी का कसा हुआ दो ए.सी. लेकर बहावलपुर में अवतरित हुआ. कोई और समय रहा होता तो वह हर बार की तरह अपने साथ जयकारा लगाने वालों को भी लाया होता. पर बहावलपुर की हालात में ये संभव नहीं था. कलेक्टर-कप्तान देहें ए.सी. देखते ही इठलाने लगीं. ठेकेदार की श्रद्धा पर मुदित कलेक्टर साहब ने कहा 'इसकी क्या जरूरत थी.'बिल्डर मन ही मन अधिकारियों के चरण कमलों में लोट-पोट होते हुए बोला 'कैसी बात कर रहे हैं साहब, आपका यह स्वर्ण तन....'तब तक कप्तान साहब ने संकेत कर उसे चुप करा दिया. बिल्डर अपनी चिचचिप भाषा में बहुत कुछ बहुत देर तक बोल सकता था, इसकी पूरी संभावना थी. क्योंकि बिल्डर-जीवन के इतिहास के कुछ हर्फ आसाराम बापू की भक्ति में रंगे हुए थे, ऐसा वो कई बार कप्तान साहब की महफिल में विलायती पेय के आचमन के बाद बता चुका था. बिल्डर के चुप होते ही कलेक्टर साहब आराम करने का संकेत कर टेंट में चले गए.

रात आधी ही गयी थी और आधी ही नीद में गए थे कलेक्टर-कप्तान कि बहावलपुर के उस नवोदित सती चौरा पर कई सारी विचित्र प्रकार की गाडिय़ाँ आ धमकीं. थोड़ी ही देर में स्थिति साफ हो गयी. सती कांड को कवर करने आठ सौ सरसठ किलोमीटर दूर देश की राजधानी से चैनलों के बड़े-बड़े पत्रकार बड़ी-बड़ी ओ.वी. वैन के साथ आ धमके थे. फिर तो लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ शेष तीनों स्तम्भों को बिना पानी पिये कोसने लगा. पत्रकार सती कांड को लेकर अपने-अपने दावे कर रहे थे. बहावलपुर की वादियों में स्त्री-विमर्श, पितृसत्ता, विमेन्स वायलेंस, लार्ड विलियम बैंटिंग, राजाराम मोहन राय जैसे बिल्कुल अपरिचित शब्द गूँजने लगे. इस पूरे हो हल्ले में लोरिक और उनके परिवार की गुमशुदगी और सुनैना देवी के सती होने का सच सिरे से गायब था. बात सिर्फ इतनी थी कि बहावलपुर के सती चौरा से लाइव प्रसारण शुरू हो चुका था.

छठवें दिन की सुबह सती स्थान पर आरती-भजन के साथ हुई. प्रशासन की तमाम पहरेदारी के बावजूद किसी ने सती स्थान पर सिन्दूर, चूड़ी और श्रृंगार के अन्य सामान चढ़ा दिया था. दूसरी ओर भजन, कीर्तन और भंडारा भी शुरू हो चुका था. कुछ लोगों का मानना था कि इलेक्ट्रानिक चैनलों के लिए ऐसे कैमरा प्रिय दृश्य रचना कोई बड़ी बात नहीं थी. कुछ एक चैनल और अखबारों के पत्रकार उस घटना के तह में जाने की नाकाम कोशिश कर चुके थे. कहीं से कुछ सुराग नहीं मिल रहा था. सातवें दिन देश की संसद में बहावलपुर कांड पर विपक्षी दल की ओर से सवाल भी पूछे गए. पर वहाँ हो रहे हो हल्ले में सब कुछ ऊब डूब जा रहा था.

आठवें दिन तो बहावलपुर में दूसरे जिलों और पड़ोसी राज्यों से भी श्रद्धालु आने लगे. कलेक्टर-कप्तान ने अपनी सरकारी भाषा और लहजे में कहना शरू कर दिया था 'जाँच चल रही है, दोषियों को किसी भी सूरत में बक्शा नहीं जायेगा. धैर्य रखिए कानून अपना काम कर रहा है.'बहावलपुर के लोग खुश थे 'सब सती मैया की कृपा है, उनके आने से ही गाँव में पहली बार कानून आया है, वह भी काम करने.'

नवें से तेरहवें दिन के बीच में बहावलपुर के मानचित्र में व्यापक परिवर्तन हुए. सती स्थान पर मेला लग गया. होटल खुल गए. एक छोटा सा सर्कस आ गया था. शहर से आये पाकेटमारों ने भी अपना काम संभाल लिया था. सती चौरा के बगल वाले खेत के मालिक ने अपना खेत प्रोजेक्टर पर फिल्म दिखाने वाले को दे दिया. किसान को किराये में लगभग तीन सालों की फसल के बराबर का धन मिल चुका था. बहावलपुर वालों को विकास का यह नया अर्थशास्त्र जंच रहा था. मंत्रियों, नेताओं और अधिकारियों के लगातार दौरे हो रहे थे. जिला प्रशासन ने जिला मुख्यालय से बहावलपुर तक पक्की सडक़ बनवा दिया. गाँव में पहली बार बिजली के खम्भे गड़े और तेइस घंटे की बिजली आपूर्ति शुरू हो गयी. शहर के सबसे बड़े बिल्डर ने अपने दादा के नाम पर बहावलपुर में धर्मशाला बनवाने की न सिर्फ घोषणा की बल्कि काम भी शुरू करा दिया. बहावलपुर वालों के लिए ये सब किसी सपने के साकार होने जैसी था. वे इन सबको सती मैया का आशीर्वाद मान रहे थे.

चौदहवें दिन दो महत्त्वपूर्ण घटनाएँ हुईं. पहली-सरकार ने एक रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में एक समिति बनाकर बहावलपुर की पूरी घटना की न्याययिक जाँच के आदेश दे दिए. और दूसरी, लोरिक अपनी पत्नी, दोनों बेटों-बहुओं और बेटी के साथ डरे सहमें से बहावलपुर में प्रकट हुए. टी.आर.पी. के लिहाज से दूसरी घटना पहली घटना पर भारी पड़ गयी. सती मैया के परिवार वालों के आने की खबर मिलते ही भक्तों की श्रद्धा और उत्साह चरम पर पहुँच गया. खबरिया चैनलों ने लोरिक परिवार को घेर लिया. सारे चैनल यही पूछ रहे थे कि इतने दिन तक आप लोग कहाँ थे? सामने क्यों नहीं आ रहे थे? पहले लोरिक परिवार कुछ घबराया किन्तु चारों ओर गूँजते जयकारे और चढ़ावे ने उन्हें रास्ता दिया, और लोरिक ने धीरे से कहा 'जो कछु भओ, ओ में सती माई की ही मंशा थी.'मझले बेटे ने जोड़ा 'हमाओ पूरा परिवार सती माता की इच्छा अनुसार एकांत में तपस्या करने गओ तो.'मझली बहू ने बताया कि 'हमें अपने देवर मगरू कीं तेरईं (श्राद्ध) भी करनी थी, येई लिए हम तेरह दिन तक गांव से दूर रहे.'एक स्त्रीवादी पत्रकार ने मझली बहू से प्रति प्रश्न किया कि 'केवल मगरू का ही क्यों, श्राद्ध तो सुनैना देवी का भी होना चाहिए था.'इस प्रश्न पर मझली बहू अचकचा गई. उसको तुरन्त कुछ सूझ नहीं रहा था. तब उसके देवर ने पूरे भक्ति भाव से कहा 'तेरईं केवल मनुष्यों को होत है, देवताओं को नहीं. सुनैना देवी तो माता रानी थीं, ऐसी देवियाँ जन्म नहीं अवतार लेत हैं और उनको मरन नहीं होत, वे तो बस चोला बदल लेत हैं. सती माता ने अगिन असनान से पहले हमें यही बताया था, और तेरईं करने से मना करी थी.'अभी कुछ और सवाल होते तब तक भक्तों के एक जत्थे ने पूरे परिवार की आरती, पूजा करने की घोषणा कर दी.

जाँच समिति ने अपना काम प्रारम्भ कर दिया था. हजारों लोगों के बयान लिए गए. बहावलपुर के सरपंच और लगभग सभी ग्रामीणों ने अपना बयान दर्ज कराया. जाँच समिति के सदस्यों ने लोरिक उनकी पत्नी, दोनों बेटे, बहुएँ और बेटी सभी से कई-कई बार पूछ-ताछ की. लोरिक से जांच समिति के सदस्यों ने कई तरह से पूछ-ताछ की. पर लोरिक ने हर बार एक ही बयान दिया. लोरिक ही नहीं उनके पूरे परिवार ने भी एक भाषा और एक शब्दावली में बिल्कुल एक सा बयान दर्ज कराया. 

'मगरू की तबियत काफी दिनों से खराब थी. सुनैना के साथ पूरे घर वाले तन मन धन से उनकी सेवा कर रहे थे. लेकिन कुछ दिन पहले सुनैना ने घर वालों को बताया कि मगरू को छूत का रोग है, इसलिए वह उनको लेकर सबसे अलग खेत पर बने घर में रहेगी. मगरू की भी यही इच्छा थी. रोगी की इच्छा जान कर लोरिक और उनके परिवार वाले भारी मन से सुनैना और मगरू के अलग रहने पर तैयार हो गए. खेत वाले घर पर जाकर मगरू धीरे-धीरे ठीक हो रहे थे. घटना के एक दिन पहले मगरू और सुनैना गाँव वाले घर पर आये थे और सबके साथ रात का खाना भी खाया था. खाने के बाद थोड़ी देर तक सबके साथ बातचीत कर मगरू और सुनैना खेत वाले घर पर चले गए. लगभग तीन से चार के बीच लोरिक लघुशंका के लिए उठे तो देखा कि खेत वाले घर की ओर कुछ हलचल हो रही है. लोरिक के मन में कुछ शंका हुई उन्होंने आनन-फानन में अपने बेटों का जगाया, और मगरू के घर की ओर चल पड़े. पीछे-पीछे घर की महिलाएँ भी आ गई. वहाँ का दृश्य देख सब सन्न रह गए. सुनैना खेत में चिता साज कर चिता के बीच में बैठी है. सुनैना की गोद में मगरू की मृत देह थी. उसके एक हाथ में मगरू का सिर और दूसरे हाथ में रखे मटके में अग्नि जल रही है. घर वाले यह दृश्य देखकर घबड़ा गए. महिलाएँ तो चीख-पुकार मचाने लगीं. सुनैना ने बताया कि 'मगरू ने तो उसको विधवा बना दिया पर वह अपने तप से मगरू का परलोक सुधारने के लिए अगिन असनान करने जा रही है.


लोरिक और उनके घर की स्त्रियाँ रोने लगीं. सबने हजार मन्नते कीं पर वह नहीं मानी. पास जाने की कोशिश करने पर वह सबको अगिन असनान कराने की धमकी देने लगी. वह केवल यही कहती रही कि 'हम अपने पति के साथ अगिन असनान करेंगे. यहीं तक हमारी इस दुनिया की यात्रा रही है. हमारा देह नहीं रहेगा पर हम रहेंगे इसी स्थान पर, इसी गाँव में. हमारे बाद इसी स्थान पर हमारा मंदिर बनवाना और हमारी पूजा करना. इससे पूरे गाँव का समय बदलेगा.'इतना कह कर सुनैना ने हाथ में लिया हुआ आग का मटका अपने सिर पर पलट लिया. किसी को कुछ सोचने-विचारने का मौका मिलता तब तक चिता भभक उठी. घटना के समय वहाँ उपस्थिति लोरिक और उनके परिवार के दूसरे सदस्य सुनैना द्वारा निर्मित दैवी वातावरण में सम्मोहित हो गए थे. सुबह होते-होते सुनैना देवी ने अपने पति की लाश के साथ अगिन असनान कर लिया था.'

गाँव के दूसरे लोग चीख-पुकार सुन कर वहाँ पहुँचे थे, तब तक चिता की आग विकराल हो चुकी थी. वह पूरी घटना जिस तरह से घटित हुई थी, उसको लेकर गाँव वालों के मन में पहले कुछ संदेह भी था, किन्तु लोरिक और उनके परिवार वालों के बयान का नाटकीय रूपान्तरण चैनलों ने इतनी बार दिखाया कि सबके मन का संदेह धुल गया. अब उस घटना के सन्दर्भ में सबके पास मीडिया द्वारा रचित रंग-बिरंगे नाटकीय दृश्य ही सबसे बड़े सच थे. गाँव वालों ने उस घटना के सन्दर्भ में जाँच समिति के समक्ष जो अपने बयान दर्ज कराये वह सब चैनलों में दिखाये गए उस नाटकीय रूपान्तरण की भाषायी प्रस्तुति मात्र थी. लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ ने उस घटना को जिस तरह से प्रसारित किया, उसका गहरा प्रभाव लोक और तंत्र दोनों पर पड़ा. बहावलपुर वाले अपने ही गांव में घटी घटना के बारें में अब मीडिया को ही सबसे विश्वसनीय माने लगे थे. अब सती कांड के बारे में सब कुछ मीडिया से तय हो रहा था. उसका स्वर भले आलोचनात्मक था पर बहावलपुर से सीधा प्रसारण के नाम पर उसने सती कांड को इतने तरह से दिखाया कि उसका देश भर में खूब प्रचार हुआ. दीन बदलते गए, मजमा लगता गया. मीडिया किस तरह जनरुचियों को बनाता है इसका बेजोड़ नमूना लोरिक का परिवार था. इधर के दो-एक दिनों में लोरिक के परिवार को भी यह विश्वास हो गया कि सुनैना सचमुच की सती थी और सब कुछ सती मैया की ही इच्छा से हुआ है.

वैसे तो लोरिक के घर वाले और दूसरे गाँव वालों ने बहुत सारी बातें भी बतायी थी, लेकिन जाँच समिति और सरकारी काम-काज की मर्यादा के कारण वह सब सरकारी रिकार्ड में तो नहीं, पर गाँव के प्रत्येक व्यक्ति के जुबान पर वह सब दर्ज था. मसलन कि 'जलते वक्त सुनैना देवी मुस्कुरा रहीं थीं.', 'चिता के ऊपर धुआँ गोल-गोल घूम रहा था', 'ऊपर आसमान में एक तेज रोशनी हो रही थी', 'चारों ओर से ढोल, मजीरे और शहनाई की आवाज आ रही थी', 'सब कुछ सती मैया की ही इच्छा से हुआ.'कुछ ने तो यहाँ तक कहा कि 'रोशनी से बना हुआ एक रथ ऊपर आसमान से में बहुत देर तक खड़ा था, सबका ध्यान उधर जाता तब तक वह गायब हो गया.'

जाँच समिति द्वारा तमाम बयानों, अखबारों के कतरन, चैनलों के कुछ विजुअल्स आदि सब एकत्रित किये जा रहे थे. पर सारे गवाह, सारे सबूत यही कह रहे थे कि 'सब कुछ सती मैया की इच्छा से ही हुआ है. उसमें किसी जीवित मनुष्य की कोई भूमिका नहीं है.'जाँच समिति कानून से बंधी थी. तथ्य और सबूत ही उसके नाक, कान और मुँह थे. समिति ऐसे ही किसी निष्कर्ष तक पहुँचने से पहले उस पत्रकार का बयान लेना चाहती थी, जिसने सबसे पहले इस घटना को प्रकाशित किया था. चैनलों के हो हल्ले के बीच उसने अखबार में बहावलपुर कांड से संबंधित दो और खोज रिपोर्ट प्रकाशित किया. उन दोनों खबरों में सुनैना देवी सती कांड पर कुछ बुनियादी सवाल उठाये गये थे. उन खबरों को बहुत ही कम लोगों ने पढ़ा. जिनने पढ़ा उनमें शहर का मशहूर बिल्डर भी था. जो अपने दादा के नाम पर बहावलपुर में धर्मशाला बनवा रहा था. वह उस अखबार को कभी अपने तो कभी अपने बच्चों के जन्मदिन के बहाने बड़े-बड़े शुभकामना विज्ञापन देता था. उन विज्ञापनों से अखबार को ठीक-ठाक पैसा मिलता था. बिल्डर के वे सारे विज्ञापन वह पत्रकार ही ले आता था. उसके एवज में पत्रकार को मिलने वाली कमीशन की रकम बहुत ज्यादे थी. लेकिन सती कांड को हत्या साबित करने वाली खबर पढ़ कर बिल्डर नाराज हो गया. क्योंकि बहावलपुर में उभरते धार्मिक पर्यटन का भविष्य देखकर तो उसने वहाँ इतना अधिक इन्वेस्टमेंट किया था. यदि बहावलपुर में हुए सती कांड को लेकर किसी तरह का कोई किन्तु-परन्तु का माहौल बना तो सबसे ज्यादा उस बिल्डर का नुकसान होता.

इसी के चलते बिल्डर ने अखबार के संपादक को और फिर संपादक ने अखबार के मालिक को फोन किया. दूसरे दिन पत्रकार जब दफ्तर आया, तो संपादक ने उसे उसके अब तक के कार्य का अनुभव प्रमाण-पत्र और सेलरी के हिसाब-किताब के साथ कुल सात हजार चार सौ पैंतीस रुपये का लिफाफा देकर माफी मांग ली. पत्रकार हैरान था. उसने संपादक से पूछा 'यह क्या है सर?'संपादक ने अपना सिर बिना उठाये अंगुली से ऊपर की ओर इशारा किया. पत्रकार समझ नहीं पा रहा था कि ऊपर वाला कौन मालिक, भगवान या कि वही सती मैया? वह धीरे से उठा और चुपचाप अखबार के दफ्तर से चला आया. पहली बार उसे खुद के एक पुर्जा मात्र होने का एहसास हुआ.

जाँच समिति ने पत्रकार को पूछ-ताछ के लिए हाजिर होने के लिए पत्र भेजा. नियत समय पर पत्रकार हाजिर हो गया. एक सदस्य ने पत्रकार से यह जानना चाहा कि वह इतने दिनों तक कहाँ गायब था. पत्रकार ने बताया कि वह गायब नहीं हुआ था, बल्कि वह चुपचाप इस मामले की छानबीन कर रहा था. छानबीन का नाम सुनकर समिति के सदस्य थोड़े से खीझे ‘तो महान पत्रकार साहेब, क्या छान और क्या बीन कर लाये हैं आप?'उनके इस व्यंग्यात्मक लहजे से पत्रकार को थोड़ा गुस्सा आया, पर उसने संयम बरता 'छान-बीन तो आप लोग कर हैं साहेब, हम तो सिर्फ यह पता लगा रहे थे कि सच क्या है?'इस पर जज साहब झल्लाते हुए बोले 'हां तो बताइए कि सच क्या है? समिति के समक्ष पत्रकार ने जो कुछ बताया वह गुस्सा, आक्रोश, भय, संवेदना, भावुकता और तथ्यों से भरी हुई एक लम्बी कहानी थी. जिसका सारांश यह था कि 'सुनैना देवी सती नहीं हुई हैं बल्कि उनकी हत्या की गयी थी.'

बहावलपुर के लोरिक का भरा-पूरा परिवार था. परिवार के पास बारह एकड़ जमीन थी. लोरिक गाँव में महतो का दर्जा रखते थे. वे अपने माँ-बाप के एकल संतान थे. इसीलिए बच्चों के जन्म के मामले में काफी उदार रहे. उनकी पत्नी के कुल आठ बच्चों में पाँच पुत्रियाँ और तीन पुत्र थे. चार पुत्रियाँ बड़ी थीं, जो जन्म के एकाध साल में चल बसी थीं. जब चौथी बच्ची की मृत्यु हुई तब तक लोरिक अपने अगातम को लेकर उदास हो चुके थे. उनको बार-बार यह लगता कि वे लावारिस मरेंगे, और कोई आग देने वाला भी नहीं रहेगा. तमाम देवी-देवताओं के समक्ष अरदास लगा चुके थे. पूजा-प्रार्थना के बीच उनकी पत्नी को पाँचवीं बार गर्भ ठहरा. पूरा गर्भकाल सकुशल बिताने के बाद लोरिक की पत्नी ने एक बच्चे को जन्म दिया. मंगलवार के दिन बच्चे का जन्म हुआ था इसलिए उसका नाम मंगरू रखा गया. वारिस मिलने की खुशी में लोरिक का तन-मन सब उछाह में था. उसी उछाह में उनकी पत्नी को तीन बार और गर्भ ठहरा. दो बार बेटे और तीसरी बार लड़क़ी हुई. अब लोरिक बाहर से भीतर तक आबाद हो गए थे. धीरे-धीरे बच्चे बड़े होने लगे और उनके साथ ही बढ़ने लगा लोरिक का रुतबा भी. मगरू सबसे बड़े थे, कुल दीपक. उनका ख्याल सबसे ज्यादा रखा जाता था. 


लेकिन मगरू जैसे-जैसे बड़े होते गए, उनके हाव-भाव में एक भिन्न प्रकार का परिवर्तन आने लगा. घर-गाँव के लिए मगरू में आ रहा वह परिवर्तन भय और उत्सुकता का सबब बनता जा रहा था. मगरू को बाहर लड़क़ों के साथ खेलने में कम, घर में रहना ज्यादा अच्छा लगता था. उनकी रुचियाँ भी अपने हम उम्र लडक़ों से भिन्न थीं. उनसे छोटे दोनों भाइयों की देह समय के साथ गठीला होती गयी. पर मगरू का देह-मन नाजुक और कमनीय बना रहा. घरवाले पहले तो लोगों से मगरू में हो रहे इन परिवर्तनों को छुपाते रहे. पर मन ही मन मगरू को अपने खानदान पर एक धब्बा मानने लगे थे. गाँव में मगरू अब चर्चा का विषय बन रहे थे. लोरिक के डर से कोई खुले आम कुछ नहीं कहता. किन्तु मगरू को देखकर लोगों की ईशारेबाजी लोरिक से छुपी न थी. मगरू अब गैर मर्द ही नहीं, अपने बाप-भाइयों के सामने भी असहज हो जाते थे. पर अपनी माँ के साथ उनकी खूब छनती थी. दौड़-दौड़ कर अपनी माँ के काम-काज में हाथ बटाते, पर अपने पिता और भाइयों को देख कर सहम जाते. मगरू को देखते ही लोरिक जल-भुन जाते. उनको और कुछ नहीं सूझता तो अपनी पत्नी के हाथ-पैर बाँध कर मारते.

लोगों की जुबान कब तक कोई रोक सकता है. बहावलपुर में धीरे-धीरे दबी जुबान से ही सही यह चर्चा आम हो गयी थी कि मगरू नपुसंक हैं. यह बात मगरू को कैसी लगती थी इसके ठीक-ठीक साक्ष्य नहीं मिलते, पर मगरू की नपुंसकता की चर्चा लोरिक के लिए बोझ बनती जा रही थी. पर महतो का रुतबा, सच्चाई को स्वीकारने की जगह लोरिक ने मगरू के विवाह का मन बना लिया. मगरू के विवाह करने के पीछे दो कारण थे, पहला यह कि इससे मगरू की नपुंसकता को लेकर फैला लोकोपवाद खत्म होगा और दूसरा कि औरत के संसर्ग से मगरू का सुप्त पड़ा पौरुष लहलहा उठेगा. इसी योजना के तहत लोरिक ने एक दिन बगल गाँव से अपने पुरोहित जी को बुलवाया और उनके प्रति अपना आदर निवेदित कर कहा ‘महाराज! हमाई इच्छा है कि, हम पन्द्रह दिनों के भीतर तुमाअे और पंडिताइन के लानें दो सेट कपड़ा, घर के लानें जरूरत के सबरे बर्तन और ऊपर से एक्कइस सौ रुपैया रख के प्रणाम करहें.'दक्षिणा की सामग्री और रकम सुनकर पंडित जी के रोम-रोम से लार चूने लगा.

पंडित जी विवाह जोड़ुआ की अपनी महान भूमिका में जुट गए. जल्दी ही उन्होंने दूर के एक गाँव की एक निर्धन किन्तु लोरिक की स्वजातीय कन्या सुनैना से मगरू का विवाह पक्का करा दिया. लोरिक नहीं चाहते थे कि विवाह के पहले सुनैना के घर वालों को मगरू की सच्चाई का पता चले. इसलिए विवाह पूर्व तक सुनैना के गाँव-घर के बारे में किसी को कुछ नहीं बताया गया. सुनैना ने अपने माता-पिता को नहीं देखा था, होश सम्भालते ही उसने अपने भइया-भाभी को ही सब कुछ माना. सुनैना के भाई भूमिहीन दिहाड़ी मजदूर थे. बहन का विवाह उनके लिए पहाड़ सरकाने जैसा था. ऐसे में लोरिक के पुत्र मगरू का विवाह प्र्रस्ताव उनको किसी ईश्वरीय कृपा जैसा लगा.

बहुत धूम-धाम से मगरू-सुनैना का विवाह हुआ. लोरिक ने मगरू के तन की कमी को अपने मन के उछाह से ढंक दिया. गाजा-बाजा, खाना-पीना और खातिरदारी के जोर पर मगरू-प्रसंग कुछ दिनों के लिए दब गया.

पर विवाह के तीन साल के बाद भी सुनैना और मगरू के दरमियान कुछ नया नहीं हुआ. वैसे तो मगरू की सच्चाई को सुनैना ने विवाह के पहले हफ्ते में ही जान लिया था. किन्तु औरत का धैर्य धरती की तरह होता है. सुनैना ने मगरू के पौरुष का बहुत दिनों तक इन्तजार किया. पर मगरू का मन-मेघ रह-रह कर उमड़-घुमड़ आता पर तन की अनासक्ति के कारण बिना बरसे लौट जाता. सुनैना का मन मगरू की इस पराजय से खिन्न रहने लगा था. धीरे-धीरे उसके मन की खिन्नता पहले आक्रोश और बाद में दु:ख में बदल गयी. सुनैना अपने ससुराल में मौजूद खाने-पहनने के सुख और अपने पति के दु:ख में कैद थी. स्त्रियों के सुख अजब होते हैं और दु:ख उससे अजीब. सुनैना न तो अपने सुख को लेकर इतरा सकती थी और न अपने दु:ख को किसी से कह पा रही थी. वह समझ नहीं पा रही थी कि अपने दु:ख के बारे में किसी से कैसे कहे, और क्या कहे. वह सदेह एक आतुर पुकार बन गयी थी और मगरू पलटे हुए गवाह. सुनैना अपने साथ हुए इस धोखे से हार गयी थी. नैहर में भी भाई-भौजाई के पास उसके लिए क्या रखा था कि वहाँ चली जाती. दूसरे वहाँ जाकर कहती भी क्या? एक बार संकोच के साथ आपनी भौजाई से कुछ-कुछ इशारे में कहा भी तो, भौजाई ने यह कहते हुए बात खत्म कर दी कि 'उते कौन बात की कमी है, अच्छो खावे और पहरवे ओढवे खों तो मिलतई है.'अब इसके बाद भाई से कहने के लिए कुछ बचा ही नहीं था.

बाद के दिनों में मगरू को देखते ही सुनैना का मन घृणा और आक्रोश से भर उठता. वह मगरू की छाया से भी बचना चाहती थी. पर मगरू किसी कोने-अतरे से चुपचाप सुनैना को देखते रहते. सुनैना को अपनी सखी सहेलियों के साथ का वो हँसी-मजाक भी खूब याद आता है. सभी सखियां अपने विवाह और अपने भावी दुल्हें के बारे छुप-छुप कितनी बातें करती थीं. सुनैना ने अपनी शादी और दूल्हे के बारे में जैसा सोचा था वैसा नहीं मिला तो कोई बात नहीं पर मगरू मिले इसकी कल्पना भी सुनैना तो क्या कोई भी लडक़ी नहीं करना चाहेगी. आज उन सारी बातों को याद कर सुनैना रात-रात भर रोती है. जैसाकि स्त्रियों का होता है, वैसे ही सुनैना का भी रात और रूलाई से बचपन का नाता था. अब तो उसकी रूलाई में और उसकी रातों में कोई फर्क नहीं बचा था. उसकी रूलाई रात की तरह अंधेरी और गहरी होती और रातें उसकी रूलाई की तरह तन्हा और उदास. मर्द अपनी जिस प्यास के बूते पर मर्द माना जाता है, औरत अपनी उसी प्यास को जाहिर करते ही चरित्रहीन ठहरा दी जाती है. सुनैना इसी लोकलाज के डर से अपना दु:ख किसी से कह नहीं पाती. नियति, समाज और मगरू द्वारा प्रदत्त दु:ख से खुद को बरी करने के लिए वह स्वयं को घर के कार्यों में उलझाये रहती. इससे भीतर के टूट-फूट को ज़माने की नजरों से बचाये रखने का उसे सुभीता मिल जाता था.

कुछ दिन बीतते लोरिक के दोनों छोटे बेटों का भी ब्याह हुआ. सुनैना ने अपनी सास और ननद के साथ दो-दो देवरानी उतारा. पहले तो देवरानियों का बात-व्यवहार उसके प्रति ठीक था, किन्तु धीरे-धीरे वे देवरानियों की परपंरागत भूमिका में उतर आयीं. सुनैना मुँहअंधेरे उठती और सबके सोने के बाद काम से फुर्सत पाती. फुर्सत काम से पाती दु:ख से नहीं. दिन यदि बक्श देते तो उसे उदास और तन्हा रातें डस लेतीं, और रात से बचती तो उसे दिन निगल लेते.

सास-ससुर, देवर-देवरानी और ननद के लिए सुनैना लौड़ी बन गयी थी. कहीं थोड़ी सी भी चूक होने पर सास, ननद, देवरानी की गालियां सुनती. किसी को उसकी कोई परवाह नहीं थी, शिवाय मगरू के. मगरू उसे देखते और सब समझते. पर कर कुछ नहीं पाते. उन्होंने कई बार चाहा कि सुनैना को इतना काम करने और सबकी सेवा करने से बरज दें, पर..., पर सुनैना ने तो तीन बरस से अबोला ठान रखा था. जब वे सुनैना को मुक्ति नहीं दिला सके तो खुद को बाहर के कार्यों में लगा लिया. अब वे भी मुँहअंधेरे उठ कर मवेशियों के लिए दाना-पानी लाते, और मिल जाने पर कुछ कलेवा कर खेतों की ओर चले जाते. दिन भर खेतों में खटते. लोरिक के परिवार में अब सबकी मौज ही मौज थी. घर का सब कुछ सुनैना के और बाहर का सब कुछ मगरू के भरोसे चल पड़ा.

एक दिन सुनैना आँगन में बैठ कर सिल-बट्टे पर मसाला पीस रही थी कि दरवाजे पर कुछ शोर सुनाई पड़ा. बाहर आकर देखा तो मगरू को कुछ लोग चारपाई पर लिटाए चले आ रहे हैं. मगरू को इस हालत में देखकर गाँव के कई सारे लोग जुट गए. उनकी बातों से पता चला कि मगरू खेत में पड़े कराह रहे थे, उनका पूरा शरीर बुखार में तप रहा था. उधर से गुजरने वाले चरवाहों ने देखा और उठा कर ले आये. उनका शरीर चारपाई पर पड़ा काँप रहा था. मगरू को उस हालत में देखकर सुनैना का मन पता नहीं कैसा तो हो गया. मगरू को खाना-पानी उनकी माँ ही देती थीं. माँ के अलावा वे न किसी से कुछ माँगते थे और न कोई उन्हें कुछ देता था. मगरू की माँ यानी सुनैना की सास को तो अपने मायके गए दो दिन हो गए. तो क्या मगरू दो दिन से..... यह ख्याल आते ही सुनैना भीतर तक हिल गयी. उसको लग रहा था कि वह सबके सामने चोरी करते हुए रंगे हाथ पकड़ ली गयी है. मगरू की कराह से उसकी आत्मा छिल रही थी. जाने वो कौन सा आवेग था कि उसके हाथ अपने आप जुड़ते चले गए 'हे दुर्गा माई! हे माता बाई! रच्क्षा करिओ.'

वो सुनैना की दुख भरी पुरानी रात्रि का तीसरा पहर था, जब वह दबे पाँव सहमते हुए अपनी कोठरी से बाहर निकली. दरवाजे पर बाहर की ओर बने खपरैल के बैठक में दवा खिलाकर मगरू को सुलाया गया था. सुनैना मगरू के चारपाई के पास पहुँच तो गयी पर समझ नहीं पा रही थी कि आगे क्या करे. क्या कह मगरू को बुलाये. मगरू को सम्बोधित करने के लिए कोई संज्ञा-सर्वनाम उसका साथ नहीं दे रहे थे. उसे यह भी ध्यान आया कि तीन बरस से ऊपर हुआ उसने मगरू को पुकारा नहीं है. पल भर को उसका मन अपनी इस बेरूखी से आहत हुआ, पर तुरन्त ही वह मान कर बैठी कि इतने दिन बीते मगरू ने भी तो उसे आवाज नहीं दी. सुनैना को लग रहा था कि उसके पाँवों के नीचे कोई दलदल है और वह उसमें धंसी जा रही है. मन अपने उस प्राचीन अंधेरे में लौटने को कह रहा था तो तन मगरू की कराह से खिंचा जा रहा था. अजीब चिकने पल थे कि हर भाव फिसल कर गुम हुए जा रहे थे. 


उसने मन कड़ा किया. उसे अपने साथ हुए सारे छल याद आने लगे. उसमें मगरू की खामोश सहभागिता का ख्याल आते ही उसके भीतर का अंधेरा और बढ़ गया. वह बिना देरी किए उस अंधेरे का छोर पकड़ वापस अपने कोठरी की ओर मुड़ी ही थी कि मगरू ने करवट लिया और किसी सहरा में भटके बेबस राही की तरह आर्त स्वर में पुकारा 'को आये?'पता नहीं उस आवाज में कितनी आतुरता, कितनी बेधकता और कितनी निरीहता थी कि एक झटके के साथ सुनैना पलटी और मगरू के बिलखते शब्दों को अपनी अंजुरी में संभाल लिया. औरतें होती ही ऐसी हैं कि वे चाह कर भी आतुर और निरीह आवाजों को अनसुना नहीं कर पातीं.

रात के एक परिंदे ने अपने प्रेम की खुशबू में सुवासित एक शब्द उचारा 'मगरू', तो दूसरे परिंदे ने उसे अपनी आँसुओं का अघ्र्य दिया 'सुनैना.'फिर तो गहरे आवेग वाली उस रात्रि के तीसरे पहर में जब चिरई-चुरुंग, रोगी, भोगी और योगी सब सो चुके थे, तब खपरैल के उस पुराने छाजन के तले दो परिंदे, एक अनलिखी प्रार्थना की इबारत मुकम्मल कर रहे थे.

बाद के दिनों में लोरिक के परिवार में बहुत कुछ बदल गया था. उनका मझला बेटा दो बच्चों का पिता बनने के बाद पंचायत के चुनाव में भाग्य आजमाने की फिराक में लगा रहता और छोटा बेटा एक बच्ची के जन्म के बाद लडक़ी होने के गम में शराब के ठेके पर बैठा रहता था. इन सबके बावजूद लोरिक के महतोपन में कहीं कुछ कमी नहीं आयी थी. घर में सबसे बड़ा बदलाव तो सुनैना में हुआ था. हमेशा गुमसुम रह कर काम में उलझी रहने वाली सुनैना अब साज-श्रृंगार करने लगी थी. रोटियां सेंकते हुए या कपड़े धोते हुए अक्सर कुछ न कुछ गुनगुनाती रहती. वह सबके सामने पूरे अधिकार पूर्वक मगरू से बात ही नहीं हँसी ठिठोली भी करने लगी थी. वह खाना बनाती तो मगरू को चौके में बैठा कर उन्हें गर्म-गर्म रोटियां सेंक कर खिलाती. 


सुबह के समय में वह खाना बनाती और शाम का खाना उसकी देवरानियां बनाती. पहले दोनों समय सुनैना को ही खटना पड़ता था. पर इधर कि दिनों में सुनैना ने ही खाना बनाने को लेकर यह नई व्यवस्था बना दिया था. पहले तो देवरानियों ने इस नई व्यवस्था को स्वीकार नहीं किया, किन्तु मगरू ने कड़े शब्दों में कहा कि 'सुनैना तो बस भिन्सारे को कलेवा बनेहें.'देवरानियों ने पहली बार अपने जेठ को किसी मामले में इतने निष्कर्षात्मक लहजे में बोलते सुना था, सो वे कुछ अपने जेठ का लिहाज और कुछ उनकी उस आवाज के ताप से उस नई व्यवस्था को स्वीकार कर लिया. जिस दिन मगरू ने सुनैना के हक में बोला था, उस दिन सुनैना खुशी के पंख लगाए उड़ती रही. इस नई व्यवस्था के तहत सुनैना सुबह उठ कर चौका-बर्तन करती, खाना बनाती, मगरू को खिलाती, कुछ अपने खाती और कपड़े के टुकड़े में चार रोटियां अचार के साथ बाँध कर मगरू के साथ खेतों की ओर चल देती. मगरू के साथ वाले सुनैना के वे सुहाने दिन थे. मगरू और सुनैना खेतों में काम करते, खेतों में आराम करते, खेतों में बड़े बन जाते और खेतों में ही बच्चे बन खेलने लगते. सुनैना गेहूँ की बालियां बन जाती और मगरू उजास बन उन बालियों से लिपट जाते. दोनों खेतों से मुँहअंधेरे उजले हो लौटते. अब सुनैना के हिस्से में गुनगुने दिन ज्यादे थे. रातें भी थीं, पर पहले की तरह उदास और तन्हां नहीं; बल्कि महकती और बोलती हुईं.

लोरिक के दोनों छोटे बेटों ने घर के काम-काज से खुद को पूरी तरह से अलग कर लिया. मझले को अपनी नेतागिरी से और छोटे को अपनी शराबखोरी से फुर्सत नहीं थी. खेती-खलिहानी का काम मगरू और सुनैना के भरोसे पहले से बेहतर चल रहा था. इससे मगरू का आत्मविश्वास भी बढ़ता जा रहा था. अब वे घर के मुआमले में अपनी राय भी देने लगे थे. घर वाले मन मार कर उनकी बातों को सुनने भी लगे थे. धीरे-धीरे मगरू-सुनैना की अहमियत और उनके छोटे भाइयों और उनकी पत्नियों की कुंठा बढे लगी थी. इसी कुंठा में देवरानियाँ घर के बर्तन फोड़ती और पति उनका सिर. सुनैना के देवर-देवरानियों की कुंठा से उपजा कलह अब रोज की बात थी. अपनी पत्नियों को उनकी छोटी सी भी गलती पर मैली धोती की तरह कचारना लोरिक के परिवार का आनुवंशिक गुण था. इसमें कोई पीछे नहीं था. दाल में नमक कम हो जाने पर बूढ़े लोरिक कुछ कहते नहीं, अपने कांपते हाथों से पूरी गर्म दाल अपनी बुढिय़ा के ऊपर फेंक देते. उनकी मर्दानगी ऐसे कई सारे अभिलेख उनकी पत्नी की बूढ़ी पीठ और पर अंकित है. आज भी. बुढ़ापे में लोरिक का शरीर उस तरह साथ नहीं देता, इसलिए वे अपने पुरुषत्व का इजहार अपनी पत्नी के मुँह पर थूक कर करते हैं. अब लोरिक का मझला और छोटा बेटा अपनी पत्नियों की देह पर पिता की ही भाषा में मर्दानगी की रोज नई कहानियाँ लिखने लगे थे. 


यह सब करते हुए वे खुद को लोरिक महतो की मर्दानगी के असली उत्तराधिकारी सिद्ध कर रहे थे. पर पारिवारिक उत्तराधिकार के हर मुआमले में मगरू ने तो जैसे पंक्ति भेद करने की कसम खा रखी थी. बच्चे पैदा कर नहीं सकते थे तो नहीं किया पर पत्नी को तो पीट तो सकते थे. पर नहीं, मगरू ने कभी अपनी पत्नी को अपने पिता और भाइयों की तरह पीटा नहीं; बस प्यार किया. तीन बरस के अबोले के बाद जब मगरू और सुनैना के तार जुड़े तबसे जितना प्यार और सम्मान सुनैना मगरू को देती, उसमें कुछ न कुछ मिला कर मगरू उसे लौटा देते. मगरू के उसी स्नेह की छाँव में सुनैना को यह विश्वास हो गया था कि 'मर्द वह नहीं है जो अपनी मर्दानगी से औरत की कोख हरा कर दे, बल्कि वह है जिसके प्यार और सम्मान से समूचा औरतपन अपने आप हरा हो जाय.'इसीलिए इन 'दुधो नहाई, पूतों फलीं'स्त्रियों की देह पर हाथ-लात और डंडे से अपने पौरुष की गाथा लिखते देवर सुनैना को पूरे नामर्द लगते.

उस दिन लोरिक का मझला बेटा अपने पिता के साथ किसान क्रेडिट कार्ड बनवाने बैंक गया था. मगरू गाय के दाना-पानी में जुटे हुए थे. अचानक आँगन से चीखने की आवाज आयी. सब भागे हुए घर में दाखिल हुए. वहाँ वही पुरानी कहानी नये सिरे से दुहरायी जा रही थी. लोरिक का छोटा बेटा दारू के लिए पैसा नहीं देने पर अपनी पत्नी को आँगन में घसीट-घसीट कर मार रहा था. वह बेतहाशा चिल्ला रही थी. उसकी बच्ची डरी सहमी सी कोने में खड़ी थी. जेठानी के बच्चे डर के मारे बाहर भाग गए और जेठानी चारपाई पर बैठी पैर हिला रही थी. सास-ननद छुड़ाने की असफल कोशिश कर रही थी. भावज से देह न छुआने के लोकाचार से बँधे होने के कारण मगरू दूर से ही भाई को बरज रहे थे. पर उस दिन छोटका पर जैसे भूत सवार था. उसके हाथ में जो कुछ आ रहा था, उसी से अपनी पत्नी को मार रहा था. देवरानी की आवाज बैठती जा रही थी. मगरू को जब और कुछ नहीं सूझा उन्होंने सुनैना को हांक लगाई. मगरू की आवाज सुन सुनैना भागी हुई आयी और देवर का हाथ पकड़ कर रोक दिया. देवर गुस्से से फटा जा रहा था 'तू माँयें भग भौजाई, आज हम इखों जिंदा ना छोड़ हैं.'सुनैना ने उसे डपटा 'अरे, कैसे मार दे हो, तुमाअे बाप को राज है का के जो मन में आये वो करहो?'

देवर और भडक़ गया 'हओ, हमाअे बापई को राज है इते, जा हमाई घरवारी आये और हम ईके मरद.’सुनैना ने उसको ललकारा 'हूँ, लुगाई जनी पे हाथ चलात तोय लाज नईं आत और बड़ो आओ है मर्द बनवे.'देवर बौखला गया था 'तू का बतै हे मरद का होत, तोय तो मिलोई नईयां.'छोटे भाई से अपने बारे में ऐसा सुन कर मगरू पर तो जैसे घड़ो पानी पड़ गया. वे अपना माथा पकड़ कर वहीं भहरा कर बैठ गए. पति का ऐसा अपमान देखकर सुनैना पार्वती की तरह क्षुब्ध हो गयी. उसने सीधे हाथ से देवर का बाल पकड़ कर खिंचा और उल्टे हाथ से एक भरपूर तमाचा उसके मूँह पर जड़ दिया. सुनैना से इस प्रतिक्रिया की उम्मीद देवर तो क्या किसी को नहीं थी. गुस्से में उसने भी सुनैना पर हाथ छोड़ा पर सुनैना तो सिंहनी में बदल गयी थी. बड़ी मुश्किल से सास-ननद, जेठानी ने सुनैना को पकड़ा. सुनैना गुस्से और अपमान में चीख रही थी 'हओ, सुन ले नासमिटे, तुमाई ठठरी बंधे, नईं मिलो हमे मरद, मनों तोरे जैसे नीच मरद से हमाओ नामरद अच्छो है.'इतना सुनते ही देवर दौड़ा आया और सुनैना को पकड़ उसका सिर दीवार में टकरा दिया. सुनैना का माथा फूट गया. वह वहीं आँगन में गिर पड़ी. सुनैना की चीख सुन कर मगरू को जैसे होश आया, वे अपने छोटे भाई को पकड़ते तब तक वह कूद कर बाहर भाग गया. भाई का पीछा करना छोड़ मगरू ने सुनैना को उठाया और उसका सिर गोद में रखकर बिलख-बिलख कर रोते रहे. रोती रही सुनैना भी.

थोड़ी रात गये छोटे बेटे के अलावा लोरिक का पूरा परिवार आँगन में बैठा था. छोटा बेटा दोपहर का भागा अभी भी नहीं लौटा था. सब कुछ सुन कर लोरिक ने गम्भीर आवाज में कहा 'आन दे ऊखों, हम समझात हैं.'

'तुम समझात रहिओ, हमें हमाओ हिस्सा दे दो; हम सुनैना के संगे अलग रैहैं.'मगरू का स्वर एकदम स्थिर था. लोरिक को तो काटो खून नहीं. पहले वाले मगरू होते तो अब तक लोरिक उनको डपट कर चुप करा चुके होते किन्तु ये वाले मगरू लोरिक के बेटे ही नहीं सुनैना के पति भी हैं. इसलिए वे बेबस आवाज में बोले 'अइसों नईं सोचत बेटा, तुम हमौरों से अलग हो जेहो तो गाँव के का कैहें ? खानदान की तो नाकई कट जे है.'
'तुमाओ खानदान तो हमसें आगे बढ़ने नइयां, ईसें तुम और तुमाअे मोड़ा रओ संगे, और बढ़ात रओ खानदान, जित्तो बढ़ाने होय.'मगरू ने तो जैसे फैसला कर लिया था.
यह सुन लोरिक मौन हो गए, लेकिन उनके मझले बेटे ने मगरू को घुड़क़ते हुए कहा 'जो अच्छो नईं कर रअे बड्डे! कहे देत हैं, तुमाअे संगे बहौत गलत हो जेहै.'

मगरू ने मझले भाई की बात को अनसुना कर लोरिक से कहा 'सोच लो दद्दा, हमाओ हिस्सा हमें दे दो, नईं तो कल हम पंचात बुलाहैं. फिर तुम बचइयो अपने खानदान की इज्जत.'
मझला बेटा कुछ कहने को हुआ किन्तु लोरिक ने उसे रोक कर हारे हुए जुआरी के स्वर में कहा 'ठीक है बेटा, जैंसी तुमाअी इच्छा.'

बाद के दिनों में एक नई व्यवस्था के तहत सुनैना और मगरू खेत पर बने घर में रहने चले गए. लोरिक के तीन बेटों के बीच बारह एकड़ की खेती थी. लोरिक अपने हिस्से के चार एकड़ लेकर अलग जोतने-बोने लगे. सुनैना और लोरिक की जिंदगी के वो सबसे उर्वर दिन थे. खेत में घर था और घर में खेत था. दोनों दिन रात घर से खेत तक उमड़ते रहते. मगरू और सुनैना अपने निश्छल श्रम से सुख की नई कथा लिख रहे थे. मगरू ने खेत के एक ओर जमीन से पाँच हाथ ऊपर एक मचान बना लिया था. जो लकड़ी के चार खंभों पर चारों ओर से खुला हुआ एक ढाँचा था. वही उन दोनों का नया रिहाइश बना. चारों ओर से दरवाजे, दीवारों और छतों में कैद घर का इस्तेमाल वे खेती के औंजार, बर्तन और अनाज रखने के लिए करते थे. दिन भर खेतों में काम करते और संध्या के समय मचान के नीचे दोनों मिल कर गाकड़ पकाते, खाते और मचान के ऊपर, आसमान के नीचे एक दूसरे को ओढ़ कर सो जाते. वे दोनों अपने परिश्रम से चार एकड़ में जितना अनाज उपजा रहे थे उतना लोरिक के आठ एकड़ में कभी नहीं हो पाया. लोरिक के बेटों और उनकी पत्नियों में आपसी कलह बढ़ता जा रहा था. पुराने घर से इस नए घर पर अब कोई नहीं आता. मगरू की माँ भी नहीं. लोरिक ने उसे अपनी कसम दे रखी थी कि 'मगरू से मिलहौ तो हमाऔ मरो मुंह देख हो.'मगरू जब कभी अपनी माँ के बारे में सोच कर उदास हो जाते, तब सुनैना उनका सिर अपने गोद में लेकर उनकी माँ बन जाती.

मगरू और सुनैना का सुख देखकर मगरू का पूरा परिवार जला-भूना हुआ था. लोरिक इन सबकी जड़ सुनैना को मानते कि 'उसी ने उनके गऊ समान बेटे को बागी बना दिया.'पर कर कुछ नहीं पा रहे थे. सुनैना के प्रति बदले की भावना से भरा हुआ लोरिक-परिवार उसको अपमानित कराने के लिए योजनाबद्ध ढंग से बाँझ कह कर प्रचारित करने लगा. इन वर्षों में सुनैना ने बहुत सारा छल-प्रपंच देखा-सहा था, किन्तु बाँझ वाली बात पर वह बिफर पड़ती 'कमी हममें नइयां, तुमईंरे खून में आहे, जा तुमौरें सोई खूब जानत हौ, और हम भी. सब कछु जानत भए हमने कबहूं मगरू में कछु कमी नईं निकारी. मनो तुमौरे हो के अपनी कमी हमाअे माथे मुड़ रअे. हमनें तो बस प्यार-इज्जत चाही है और कछु नहीं. हम जानत हैं कि मगरू मरद भले नइयां, मनो मानुष सबसे बड़े आयें.'मगरू मर्द भले नहीं हैं पर मनुष्य सबसे बड़े हैं, यह सुनैना की अपनी निजी कमायी थी. पर लोरिक के खून में कमी है, सुनैना की इस सार्वजनिक घोषणा से लोरिक की बूढ़ी और उनके बेटों की जवान हड्डियों का ताप बढ़ने लगा था. 


सुनैना तो ऐसी ही थी, एक का जवाब चार से देती. लोरिक-परिवार का मन सुनैना के प्रति खट्टा तो पहले से ही था पर उनको इस बात का दु:ख सबसे ज्यादा था कि मगरू भी सुनैना का ही साथ दे रहा है. दोनों परिवारों के बीच का खट्टापन उस दिन से ज़हर में बदलने लगा, जबसे सुनैना ने अपने भाई के बच्चे को अपने पास बुला लिया. भतीजे को साथ रखने का तात्कालिक कारण तो सिर्फ इतना था कि सुनैना की भौजाई एक बार फिर पेट से थी. भाई के यहाँ खाने-पहनने की दिक्कत तो पहले से थी, ऊपर से भौजाई का चढ़े हुए दिन. इसलिए सुनैना ने मगरू को भेज भतीजे को अपने पास बुलवा लिया. भतीजे के आने के बाद सुनैना और मगरू के दिन रात थोड़े और सुहाने हो चले थे. मगरू बच्चे को जब अपने कंधे पर बैठाकर घूमते तब उन्हें देख सुनैना निहाल हो जाती और लोरिक-परिवार बेहाल.

ऐसे ही एक दिन मगरू बच्चे को कंधे पर बिठाये खेत से आ रहे थे कि सामने उनका मझला भाई पड़ गया. मझले ने गुस्से में मगरू को टोका 'काय दद्दा! सुनैनिया खों मूड़ पर चढ़ाकें जी नईं भरो, सो अब वा की भतीजे खों....'मगरू ने पलट कर जबाब दिया 'हओ, हम एखों भी मूड़ पे चढ़ैहें, और सुनो! जोई हमाओ मोड़ा आये, हम हमाओ सब कछु एई खों देहें.'यह सुन महरू का मझला भाई सन्न रह गया. मगरू ने जो कुछ अपने भाई से कहा, उस पर न तो वे और न ही सुनैना ने कभी विचार किया था. बस उस दिन क्रोध में या यूँ ही वह सब उनके मूँह से निकल गया.

मगरू की उस बात ने लोरिक-परिवार को सकते में डाल दिया. मगरू के हिस्से में चार एकड़ की खूब लगनहार खेती थी. जो लोरिक के बाप-दादा की कमाई थी. अपनी पुस्तैनी जमीन को सुनैना के भतीजे के पास चले जाने की कल्पना मात्र से लोरिक-परिवार नफरत और हिंसा की आग में जल उठा. जमीन की भूख होती ही ऐसी है. लोग-बाग उसकी एवज में कुछ भी कुर्बान करने से नहीं हिचकते. मगरू और सुनैना की बिसात ही क्या थी. एक दिन लोरीक का छोटा बेटा शराब के नशे में खेत पर चढ़ आया. सुनैना और मगरू के सामने ही सुनैना के भतीजे को जान से मार देने की धमकी देता रहा. सुनैना भतीजे को गोद में लेकर सोयाबीन के खेतों की तरफ भाग गयी. थोड़ी देर तक वह गाली-गलौज कर वापस चला गया. उसकी बातें सुन कर सुनैना को पहली बार डर लगा. रात में मचान पर दोनों के बीच भतीजा सोया हुआ था, और वे उदास बैठे भतीजे को एकटक देख रहे थे.

मगरू ने सुनैना को गुमसुम देख पूछा 'काय सुनैना, का सोचत हौ.'सुनैना ने बहुत धीरे से कहा 'चलो कल, इखों भइया के इते छोड़ आयें. दूसरे को धन; हम कबलौं रखवारी करहैं.'दूसरे ही दिन सुनैना मगरू के साथ भतीजे को लेकर अपने मायके चली गयी. जैसे ही सुनैना मायके की चौखट पर पहुँची, उसी समय भौजाई ने एक गोल-मटोल बच्ची को जन्म दिया. उसके भइया बेटी और बहन को एक साथ पाकर निहाल हुए. भतीजी को देख कर सुनैना अपना सारा दु:ख भूल गयी. उसने पूरे उत्साह से बधाई के गीत गाया और भौजाई की सेवा की. इसी राजी-खुशी में तीन दिन बीत गए. न चाहते हुए भी उन्हें वापस अपने खेतों के बीच लौटना पड़ रहा था. भाई-भौजाई ने बहुत मनुहार किया पर मगरू-सुनैना ने अगले सावन में आने का वादा कर लौट आये.

इन तीनों की गैर हाजिरी के बाद जब मगरू-सुनैना घर लौटे तब वहाँ की फिजा बदली हुई थी. लोरिक के परिवार से जुड़ा हर आदमी उन्हें बहुत ही सशंकित नजरों से देख रहा था. इन्हीं सब बातों को सोचते हुए वे दोनों मचान पर लेटे थे. बहुत सारी पुरानी बातें याद आ ही थीं. उन्हीं बातों के बीच दोनों रो रहे थे, दोनों जाग रहे थे, कि अचानक मगरू के सिर पर एक मोटा डंडा आकर लगा. मगरू उछल कर मचान से नीचे आ गिरे. सुनैना कुछ समझ पाती तब तक उसके दोनों देवर मगरू के घायल देह पर चढ़ बैठे. सुनैना मगरू को छुड़ाने के लिए लपकी किन्तु ससुर ने उसे बीच में ही पकड़ कर उसका मुँह दबा दिया. मगरू के सिर से खून बहकर उनकी आँखों में समा रहा था. जिससे अनकी आँखों के सामने का अंधेरा और अधिक गाढा हो गया था. क्रोध से बिलबिलाता हुआ मझला बोला 'काय बड्डे, लिख दऔ खेत भतीजे खों. अब हमाअे मोंड़ा-मोंड़ी का खैहैं.'छोटे भाई ने मगरू की गर्दन को डंडे से दबा रखा था. मगरू छटपटा रहे थे. उनके गले से गो,.गों की आवाज निकली. 


मझले चीखा 'मजाल तो देखो इस पींदा की, हाँ, कै रओ है.'सुनैना लोरिक के हाथों में छटपटाती रही. उनके छोटे बेटे ने मगरू के गर्दन पर रखे डंडे को अपने पैर से दबा दिया. लोरिक के देह में हल्की सी जुम्बिश हुई, और सब कुछ ठहर सा गया. कोई कुछ समझ पाता इससे पहले लोरिक का छोटा बेटा भागते हुए अंधेरे में गुम हो गया. लोरिक और उनका मझला बेटा हक्के-बक्के रह गए. शायद यह करने की उनकी योजना नही थी. पर जो होना था, वह हो चुका था. लोरिक का मझला बेटा धीरे से उठा और उनके छोटे बेटे की तरह ही अंधेरे में गुम हो गया. दोनों बेटों को इस तरह साथ छोड़ते देख लोरिक क्रोध से उबल पड़े. उसी बीच उनके के हाथों से छूट कर सुनैना मगरू की मृत देह पर गिर पड़ी.

इसके बात की कथा ठीक-ठीक लोरिक को मालूम है. वे अपना बयान दर्ज करा चुके थे. इसके बाद की घटना को एक समकालीन कथाकार कई तरह से दर्ज कर सकता है. जैसे जब लोरिक के दोनों बेटे उनको छोड़ कर भाग गए. तब इस वारदात में खुद को फंसा देख वे घबरा गए हों. उसी घबराहट में उन्होंने हर सबूत मिटाने की गरज से सुनैना की हत्या कर दी हो. यहाँ एक सवाल यह है कि लोरिक जैसा बूढ़ा आदमी क्या सुनैना की हत्या कर सकता है? क्या सुनैना ने कोई प्रतिक्रिया नहीं की होगी? इसके बारे में कथाकार कह सकता हैं कि सुनैना मगरू की मृत देह पर गिर कर अचेत हो गयी होगी, जिससे लोरिक ने आसानी से उसकी हत्या कर दी होगी. अगर यही हुआ होगा जैसा कथाकार कह रहा है तो इसका अर्थ है कि अचेत रहने के कारण स्वयं सुनैना भी नहीं जान पायी होगी कि उसकी हत्या किसने की है. दूसरा कथाकार इस घटना को इस रूप में भी बता सकता है कि मझले बेटे के बाद लोरिक भी वहाँ से भाग कर घर आये होगें, दोनों बेटों को खोज कर साथ लिया होगा. वापस खेत पर पहुँच कर सुनैना को सबने मिल कर मारा होगा. फिर एक साथ मिल कर दोनों की एक ही चिता पर रख जला दिया होगा. यहाँ एक और सवाल है कि यदि ऐसा हुआ होगा तो सुनैना के सती होने वाली कथा का जन्म कैसे हुआ? इस सम्बन्ध में पहले वाला कथाकार कह सकता है कि सुनैना को सती बनाने वाला आइडिया निश्चित ही लोरिक के मझले बेटे ने दिया होगा. 


क्योंकि चार-पाँच वर्षों से वह कई सारे नेताओं के साथ दिल्ली, भोपाल, लखनऊ आदि राजधानियों की यात्रा कर रहा है. इस बात पर दूसरा कथाकार पहले वाले से सहमत हो सकता है. क्योंकि कथाकारों का समकालीन राजनीति के सन्दर्भ में लगभग एक सा दृष्टिकोण हो सकता है. दूसरा वाला कथाकार इस प्रसंग को थोड़ा और आगे तक ले जा सकता है, जैसे कि लोरिक और उनके पुत्रों को मगरू के मृत्यु के बाद सुनैना से डर लगने लगा हो, कि वह इन लोगों के खिलाफ थाने भी जा सकती है. लोरिक के छोटे बेटे को तो पूरा विश्वास था कि, वह थाने जायेगी ही, और उसको ही नामजद करेगी. या फिर सुनैना अचेत न हुई हो, उसने खुद ही उन लोगों से कहा कि वह मगरू की लाश को लेकर जिले के कप्तान के यहाँ धरना देगी या हाइवे जाम करेगी. जितना वे लोग सुनैना को जानते थे, उस हिसाब से सुनैना वो सब करती है, जो वो कहती है. इसलिए उसकी हत्या जरूरी हो गयी हो. हत्या के बाद उसे सती कांड में बदल दिया गया होगा. सती कांड को आस्था का रंग देने के लिए सिकटार से बाजा वालों को बुला लिया गया होगा.

कथाकारों की बातें कथाकार जाने. मैं तो सिर्फ इतना जानता हूँ कि आदमी अपनी अज्ञानता में एक गलती करता है, चतुराई में उसे छिपाता है और अहंकार में उस गलती को अपराध में बदल देता है. हो सकता है कि लोरिक-परिवार ने भी इसी तरह गलती से अपराध तक का सफर पूरा किया हो. दूसरे यह कि सुनैना-लोरिक की मौत एक असामान्य घटना थी. और असामान्य घटनाओं का अंत अक्सर रहस्य, राजनीति या फिर आस्था में होता है.

पत्रकार का सच जाँच समिति के रिपोर्ट से बिल्कुल भिन्न था. चार हजार रूपए की नौकरी वाले पत्रकार का सच लाख रूपए वाले सरकारी अधिकारी के सच से बड़ा कैसे हो सकता है. जाँच समिति के सदस्यों के मुँह का स्वाद बिगड़ गया. एक सदस्य ने पत्रकार से पूछा 'आप पत्रकारिता के साथ कहानी ओहानी भी लिखते हो क्या?'पत्रकार ने प्रतिप्रश्न किया 'क्यों, आपको ऐसा क्यों लगा?'सदस्य ने कहा 'लगना क्या है, आप जिस तरह इस घटना को कहानी बना कर पेश कर रहें है, उसी से यह विचार आया.'पत्रकार ने प्रतिवाद किया 'किन्तु यह कहानी सच्ची है.'दूसरे सदस्य ने घुडक़ते हुए टोका 'क्या इन्होंने यह कहा कि कहानियाँ झूठी होती हैं, कहा क्या?'पत्रकार ने सहमते हुए कहा 'नहीं.''तो, जितना पूछा जाय उतना ही बोलिए.'

पत्रकार कुछ और कहता तब तक जज साहब ने पूछा 'ये सारी बातें आपको पता कैसे चलीं, हम इतने दिनों से जाँच कर रहे हैं, हमें तो ये सारी बातें यहाँ किसी ने नहीं बताया.'पत्रकार ने सफाई दी 'ये सारी बातें मुझे सुनैना देवी की भाभी ने बताया, वो यहाँ नहीं सुनैना देवी के मायके में रहती हैं, उन्हीं का बच्चा सुनैना के पास रहता था. पर लोरिक और उनके बेटे की नियति देख कर सुनैना को अपनी या भतीजे की हत्या की आशंका हो गयी थी. इसीलिए वे भतीजे को जब अपने मायको पहुँचाने गयी थीं, तब ये सब उन्होने अपनी भाभी से बताया था.'

थोड़ी देर की चुप्पी के बाद जज साहब ने पूछा 'चलो मान लेते हैं कि जो कुछ आप कह रहे हैं वो सब सच है, पर इससे यह कैसे साबित होता है कि मगरू और सुनैना की हत्या हुई थी, सुनैना स्वयं सती नहीं हुई थी. कोई सबूत कोई गवाह हैं आप के पास?'पत्रकार ने थोड़ी देर सोचा और कहा 'आप चाहें तो बशरूदीन, लियाकत, रमई और झड़ेला से पूछ सकते हैं.'एक अन्य सदस्य ने टोका 'अब ये सब कौन हैं?''ये बगल के गांव के लोग हैं जो चिता जलाने के समय बाजा बजा रहे थे.''बाजा बजा रहे थे,'जज साहब ने आश्चर्य व्यक्त किया. फिर कुछ सोचते हुए उन्होंने पत्रकार को विदा कर बशरूदीन, लियाकत, रमई और झड़ेला को हाजिर करने का हुक्म दिया.

बशरूदीन, लियाकत, रमई और झड़ेला बहावलपुर के पड़ोसी गाँव सिकटार में रहते थे. वैसे तो सिकटार के मूल निवासी बशरूदीन और झड़ेला ही थे. रमई और लियाकत बहुत पहले छिन्दवाड़ा एक कार्यक्रम में मिले थे. बशरूदीन और झड़ेला बैंड लेकर छिन्दवाड़ा गए थे. लियाकत और रमई बारात में रोड लाइट लेकर चल रहे थे. दूसरे दिन सुबह बारात की विदाई के समय रात की रोशनी के स्रोत बने लियाकत और रमई, बशरूदीन के पास आये और उनके साथ चलने का आग्रह करने लगे. वे दोनों खानाबदोश थे. जब जैसा काम मिलता उसी से अपना जीवन चला रहे थे. कभी स्टेशन पर तो कभी किसी पुलिया में सोकर रात बिता लेते. उस रात बशरूदीन और झड़ेला का करतब देख इन दोनों ने अपना भविष्य तय कर लिया था. 


अपने घर परिवार के बारे में न उन दोनों ने बताया और न ही किसी ने पूछा कि वे रहने वाले कहाँ के हैं? फिर तो वापसी के समय सिकटार में दो जन और लौटे थे. सिकटार में बशरूदीन की एक टूटी-फूटी झोपड़ी थी, पत्नी काफी पहले गुजर गयी थी. दूसरी शादी नहीं की, बैंड को ही अपनी जीवन संगिनी बना लिया था. रमई और लियाकत का भी बशरूदीन की झोपड़ी में गृह प्रवेश हो गया. झड़ेला परिवार वाले थे किन्तु उनका परिवार उनकी लुगाई रामदेई से ही शुरू और रामदेई पर ही खत्म होता था. बाल-बच्चे नहीं हुए. ढोल-मजीरे को ही अपनी औलाद की तरह स्नेह करते रहे. कुछ दिनों के संगत के बाद रमई और लियाकत भी बजाने में पक्के हो गए. अपने समय में इन चारों ने खूब बैंड बजाया और खूब नाम कमाया.

लोग बताते हैं कि बशरूदीन, झड़ेला, लियाकत और रमई एक समय था जब इनके बैंड की बड़ी प्रतिष्ठा थी. पर समय की मार इनकी कला पर तो नहीं इनके बैंड पर खूब पड़ी. समय के साथ लोगों के मनोरंजन के मजहब बदलने लगे थे. अब डी.जे. पर तूफानी फिल्मी गानों पर कमरतोड़ू नृत्य करती अधनंगी लड़कियाँ सबको भाने लगी थीं. धीरे-धीरे बशरूदीन के बैंड को काम मिलना बंद हो गया. उनके बैंड के दूसरे साथी भुखमरी से बचने के लिए लुधियाना, पंजाब, दिल्ली आदि शहरों में जाकर मजदूर बन गए. बशरूदीन, लियाकत, रमई और झड़ेला कहाँ जाते. ये चारों भूमिहीन थे. इनके पास न तो बी.पी.एल कार्ड बनवाने की संसारिक सामथ्र्य थी और न ही कहीं बाहर जाने का किराया. इसलिए ये गाँव में रहकर कभी मिल जाने पर मजदूरी आदि कर अपना जीवन चलाते रहे. एक बात इनमें खास थी. वह यह कि ये चारों जब भी खाली रहते गाँव के बाहर वाले तालाब के किनारे बैठ कर अपने टूटे-फूटे बाजों के साथ रियाज करते रहते. शादी-ब्याह जैसे मांगलिक अवसरों पर इनकी की कोई उपयोगिता नहीं थी, बस अब कभी-कभी कोई इन्हें गमी में बाजा बजाने के लिए बुला लेता था. इसमें भी वे लोग खुश थे. ऐसे में कोई इनके पुराने दिनों की याद दिलाता तो ये कहते 'बहौत ब्याओ करा लअै मालक! अब गमी में बजा रये हैं, ब्याओ हो या गमी, हमें तो बस बाजो बजाने हैं.'

स्थानीय पुलिस ने फौरन से पेश्तर बशरूदीन, लियाकत, रमई और झड़ेला को जज साहब के सामने हाजिर कर दिया. इन कलाकारों की उम्र पैंतालीस से पचास के बीच की थी. पर ये अपनी उम्र से दस-पन्द्रह साल ज्यादे दिख रहे थे. पहली बार इतने बड़े साहब को सामने आकर वे लोग भय से दुहरे हुए जा रहे थे.

जज साहब ने पूछा 'तुममें सरगना कौन है.'
बशरूदीन ने कहा 'हम कलाकार हैं मालक, कोऊ राज-पाठ को काम हम नई जानत, हमौरों में सरगना कोई नई होत. जौन खों जो कला आवत है, ओयी ओमें आगे रेत है.'
'अच्छा ठीक है, तुम लोगों का नाम क्या है, और कौन सा बाजा बजाते हो?'जज साहब ने प्रश्न किया. एक सदस्य ने उन्हे हिदायत दी 'एक-एक कर बताना.'
सबसे पहले लियाकत ने जबाब दिया 'हमाओ नाम लियाकत है, हम मृदंगिया आयें.'
'हम झड़ेला डोम हैं साब, हम अलगोजा खूबई बजा लेत हैं.'
'रमई हुजूर! ऊँसें तो हम नगडिय़ा बजात हैं, मनो सेनाई बजावे में खूब मजा आत है.'
आखिर में बशरूदीन ने अपना परिचय दिया 'हम बशरूदीन आयें मालक!, हम झूला और मजीरा बजात हैं.
जज साहब को संदेह हुआ 'क्या ये सब वाद्य-यंत्रों के नाम हैं?'
झड़ेला बोले 'नई साब, जे बाजे आयें.'
जज : 'मैंने तो कभी इनका नाम नहीं सुना?'
बशरूदीन ने कारण बताया 'सुन हो कैसे साब, आप तो जूड़े कोठा में रेत हो, जे सब हमाये गाँव देहात के बाजे आयें. जे इतईं मिलत हैं.'
जज ने समिति के एक सदस्य से पूछा 'जूड़े कोठा?'
सदस्य ने जज साहब को बताया 'जूड़े कोठा मिन्स ए.सी. कूल्ड रूम'
जज : 'ओ एस.'
जज साहब ने आगे पूछा 'तुम लोग लोरिक को जानते हो?'
बशरूदीन ने बताया 'हओ साब! इतईं बहौलपुर के आयें, जौन की बहू अभईं सती भईं.'
सदस्य ने डांटा 'जितना पूछा जाय, उतना ही बताओ.'
'गलती हो गई मालक! माफी दे दो.'लियाकत मियां बोले.
जज साहब ने आगे पूछा 'तुम लोग उस दिन कहां थे,?'
रमई ने कहा 'हमौरें तो उतईं बाजे बजा रए ते.'
दूसरे सदस्य ने पूछा 'वहां तुम लोगों ने क्या-क्या देखा?'

बशरूदीन ने बताया कि 'साब हमौरें हते तो उतईं, मनो मुतके दिनों में बाजे बजावे को मौका मिलो तो, एई सें हमौरों को धियान बाजों की धुन में हतो. सांची कएँ तो हमौरों ने इत्तोई देखों की चिता श्रृंगारी गयी और बा में मगरू और वा की घरवारी सुनैना की लाश खों लिटा के दाग दौ गओ तो. हमौरें मरघटा पे दूर खों बैठे 'वैष्णव जन जेते कहिए, पीर पराई जान रे'की धुन निकार रये ते.'

कुछ देर तक वहां खामोशी फैली रही. फिर कुछ सोचते हुए जज साहब ने बशरूदीन, रमई, झड़ेला और लियाकत को जाने की अनुमति दे दी, पर इस हिदायत के साथ कि वे लोग अपना गाँव छोडक़र कहीं नहीं जायेंगे.
सुनैना देवी सती कांड में पत्रकार के सच ने संदेह उत्पन्न कर दिया था. दूसरे बशरूदीन, नौबत और लियाकत ने अपने बयान में कहा कि चिता सजाने के बाद मगरू और सुनैना की लाश का चिता में लिटाया गया. जबकि लोरिक परिवार और दूसरे बहावलपुर वाले कह रहे थे कि मगरू की मृत्यु के बाद सुनैना देवी ने अपने सती होने की घोषणा की और पति की लाश को गोद में लेकर अगिन असनान कर लिया. बहुत उम्मीद से जांच समिति ने सुनैना के भाभी को बुला कर उसका भी बयान दर्ज कराया. पर पता नहीं वह डर गयी कि किसी ने उसको कुछ समझा दिया था कि वह उस पत्रकार को ही पहचानने से मुकर गयी. सुनैना देवी के मायके की ओर से भी लोरिक-परिवार के प्रति कोई शिकायत नहीं दर्ज करायी गयी थी. इस पूरे घटनाक्रम में अपराध भी था सुनैना देवी की हत्या, मोटिफ भी था मगरू-सुनैना की जमीन का लालच, पर सबूत कुछ भी नहीं था. किन्तु न्याय होते तो दिखना ही चाहिए. इसी गरज से जांच समिति ने रिपोर्ट पेश कर दी.

सुनैना देवी सती कांड के ठीक पन्द्रहवें दिन की बहुत सुबह बशरूदीन, रमई, झड़ेला और लियाकत गाँव के बाहर तालाब के किनारे बैठकर अपने-अपने साज के साथ रियाज कर रहे थे. ये उनका रोज का कार्यक्रम था. उनके लिए सारे दिन एक समान थे, उदास, बेरंग और बेजान. हवा में हल्की सी ठंड थी. गांव अभी ठीक से जगा नहीं था. ये चारों कलाकार गांधी जी का प्रिय भजन, जो अब उनकी जीविका का बचा-खुचा साधन था, 'वैष्णव जन जेते कहिए, पीर पराई जान रे'बजा रहे थे.

उस सुबह आखिरी बार वे चारों गाँधी जी के प्रिय भजन के साथ सिकटार में देखे गए थे.

घटना के सोलहवें दिन तक आते-आते सती स्थान एक सिद्ध पीठ में बदल चुका था. हजार से ज्यादा लोग रोज दर्शन कर रहे थे. लोरिक उस पीठ के महंत बन गए थे. वे अब सचमुच के भक्त हो गए थे. जन आस्था, व्यावसायिक आवश्यकता और मीडिया के प्रभाव वश वे घंटो सती स्थान के समक्ष साष्टांग पड़े रहते. उसी भक्ति के सहारे उन्होंने खुद को माफ कर दिया था और यह मान लिया था कि उन्होंने जो कुछ किया-कराया, वो सब सती मइया की लीला थी. वे तो बस उसकी लीला के निमित्त मात्र थे. सुनैना सचमुच की सती थी, जो कुछ हुआ वह सब सती मइया की इच्छा से ही हुआ. उनके परिवार के अन्य लोग यथायोग्य उसी पीठ से जुड़े गए थे. सिद्ध पीठ के कोठार का देख रेख सुनैना के भाई-भाभी के पास था.

बहावलपुर एक तीर्थ में और बहावलपुर की प्रत्येक चीज बिक्रय की वस्तु में बदल गयी थी. निलम्बित पंचायत सचिव को उस पर लगे गबन के सारे आरोपों से मुक्त कर बहाल कर दिया गया था. अखबार के बाहर के बेरोजगार दिनों में पत्रकार को नौकरी में बने रहने का महान ज्ञान प्राप्त हो चुका था. अब वह इस कोशिश में था कि अखबार किसी तरह उसको एक मौका दे दे तो वह उस सती सिद्ध पीठ के बारे में एक शानदार झूठ लिखेगा.

सुनैना देवी सती कांड के ठीक अठरहवें दिन की सुबह से ही अखबारों, चैनलों में हंगामा मचा हुआ था कि 'अब तक का सबसे बड़ा खुलासा.', 'सुनैना देवी सती कांड की जांच रिपोर्ट पेश.', 'सती हुईं थी सुनैना देवी.', 'सुनैना देवी को अगिन असनान के लिए प्रेरित करने और घटना के समय बाजा बजा कर उनको उत्साहित करने वाले चार लोग गिरफ्तार. 'मौके से वारदात में इस्तेमाल बैंडबाजा बरामद.', 'आरोपियों को ताजिराते हिन्द की धारा 107, 299, 300, 305, 307, 308 के तहत जेल भेज दिया गया.'

उस गिरफ्तारी और आज के बीच बहुत लम्बा समय गुजर चुका है. सिकटार में बाजा बजाना तो दूर, अब कोई किसी बाजा का नाम तक नहीं लेता. तब से आज तक बेगुनाहों की गिरफ्तारी का सिलसिला जारी है. गिरफ्तार लोगों के बारे में बोलने-सोचने पर भी एक अघोषित-अदृश्य पहरा है. बहुत दिन हो गए बेगुनाही के पक्ष में कोई बयान दर्ज नहीं हुआ है.

हाँ, कुछ दिन पहले एक बुढिय़ा के बारे में सुना था, जो सिकटार के आस-पास घूम-घूम कर लोगों से पूछती रहती थी 'काय मालक, 'वैष्णव जन....'गावे बारो हमाओ डोकरा कबे आ है.'
____________________
संपर्क:
हिंदी विभाग,
डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय
सागर-470003 (म.प्र.)/ मो. 09479398591

भूमंडलोत्तर कहानी – १९ : अगिन असनान - आशुतोष : राकेश बिहारी

$
0
0







समकालीन हिंदी कथा-साहित्य पर आधारित स्तम्भ –‘भूमंडलोत्तर कहानी’ के अंतर्गत आशुतोष की कहानी – ‘अगिन असनानकी विवेचना आप आज पढ़ेंगे.  यह कहानी सतीके बहाने समाज के उस हिंसक सच से आपका परिचय कराती है जिसपर व्यवस्था के सभी अंग पर्दा डालना चाहते हैं. युवा आलोचक राकेश बिहारी ने इस कहानी के सामाजिक, आर्थिक आयामों को ध्यान में रखते हुए इसका विश्लेषण किया है. यह स्तम्भ अब पूर्णता की ओर अग्रसर है और शीघ्र ही पुस्तकाकार प्रकाश्य है.




भूमंडलोत्तर कहानी  १९
गति और ठहराव की अभिसंधि पर निर्वासित  गांधी  की प्रतीक्षा

(संदर्भ: आशुतोष की कहानी अगिन असनान)





चनासमय (जनवरी-फरवरी, 2016) मेंप्रकाशितआशुतोषकीकहानीअगिनअसनानसेगुजरतेहुयेरामचन्द्रछत्रपतिकीयादलगातारबनीरहतीहै.रामचन्द्रछत्रपतिहरियाणाकेसिरसासेनिकलनेवालेअल्पज्ञातअखबारपूरासचकेसंपादकथे.डेरासच्चासौदाकेप्रमुखगुरमीतरामरहीमसिंहकोजेलकेसलाखोंकेपीछेपहुंचानेमेंउनकीऔरउनकेअखबारकीबड़ीभूमिकारहीहै.गौरतलबहैकिगुरमीतसिंहकीकरतूतोंकाखुलासाकरनेवालीखबरकेछपनेकेकुछदिनोंबादहीरामचन्द्रछत्रपतिकीहत्याकरदीगईथी.

टीआरपीकेतेजरफ्तारमीडिया-मानकोंकेबीचझूठ, सनसनीऔरअंधविश्वासकेव्यावसायिकमाहौलकीरचनाकरतेहुयेआमनागरिकोंकेसोचने-समझनेकीशक्तिऔरविवेककोक्षतिग्रस्तकरनेवालेसूचनासमयमेंमूल्योंऔरसरोकारोंकीबातकरनेवालेरामचन्द्रछत्रपतियोंकायहहश्रअबएकआमबातहोचुकीहै.ऐसेमेंअगिनअसनानसेगुजरतेहुयेइसकहानीकेएकपात्र  क्षेत्रीयपत्रकारकेलिएमनदुआओंसेभरारहताहै, जिसकेनामसेपहलीबारकिसीबड़ेअखबारमेंकोईखबरछ्पीथी.हालांकिउसपहलीखबरमेंसुनैनाकेसतीहोनेकीबातहीकहीगईथी, परबादमेंउसनेदो-एकऔरखोजीरिपोर्टप्रकाशितकरवाएथेजिसमेंसिर्फसुनैनादेवीसतीकांडपरकुछबुनियादीसवालउठाएगएथेबल्किउसमेंइसबातकेभीपर्याप्तसंकेतदियेगएथेकिसतीकांडकीतरहप्रचारितवहघटनादरअसलएकहत्याकांडथी.हालांकिसतीकांडभीएकतरहकीसांस्थानिकहत्याहीहोतीहै, जिसकेमहिमामन्डनकेलिएधर्म, परंपराआदिकाकुत्सितसहारालियाजाताहै.इसबातकोयहकहानीजिससंवेदनाकेसाथरेखांकितकरतीहै, उसेदेखतेहुयेदोमहत्वपूर्ण  प्रश्नसामनेआतेहैं.

पहलाप्रश्नउसधर्म-सत्ताऔरराजनैतिक-सत्ता  कीपरस्परपोषितसंरचनासेजुड़ाहुआहै, जहांकिसीहत्याकांडकोबाकायदाएकसांस्कृतिकअनुष्ठानकेरूपमेंस्थापितकरनेकीहरकवायदकीजातीहैतो  दूसराप्रश्नउसन्यायव्यवस्थासेजुड़ाहुआहैजोअपनेहरसंभवजतनसेसिर्फएकहत्याकांडकोसांस्कृतिकअनुष्ठानमेंतब्दीलकरदियेजानेकीजघन्यघटनाकीआधिकारिकपुष्टिकरतीहै, बल्किउसझूठकोविश्वसनीयताप्रदानकरनेकेलिएकिसीबेगुनाहतककोदोषीकरारदेनेमेंलेशमात्रभीसंकोचनहींकरतीहै.

इसतरहयहकहानीजितनीसुनैनाकीहै, उतनीहीउसकीअन्त्येष्टिकेसमयबाजाबजानेवालेबशरुदीन, लियाकत, रमईऔरझड़ेलाकीभीहै, जोबिनाकिसीदोषकेजांचकमिटीकीभेंटचढ़गए.परिस्थितियोंकीयहविद्रूपभयावहतारामचन्द्रछत्रपतियोंकीहत्यासेभीएककदमआगेकामामलाहै, जिसेआशुतोषअपनीइसकहानीमेंबखूबीपहचानतेहैं.किस्सागोईकेसहजशिल्पमेंरची-बुनीगईयहकहानीअलग-अलगसत्ताप्रतिष्ठानोंकेसूक्ष्मसंजालोंकेपरस्परसम्बन्धोंकोसमझनेकाएकजरूरीअवसरप्रदानकरतीहै.समाजकेहाशियेपरखड़ेदीनतमव्यक्तिकोउसकेनिवालेसेदूरकरनेवालेदूरगामीनिर्णयोंकोमजमेबाजीऔरगणेशजीकीसूंढकेबहानेशल्यचिकित्साकीवैज्ञानिकताकोवेद-पुराणोंमेंढूंढ़नेवालेप्रहसनोंकीआड़मेंछुपालेजानेकीशासकीयधूर्तताओंकेबीचविकासकाछद्ममॉडलरचनेमेंव्यस्तशाहोंऔरसाहबोंकेसांस्कृतिकराष्ट्रवादीलोकतन्त्रवालेसमयमेंइसकहानीकोबहुतगौरऔरधैर्यसेपढेजानेकीजरूरतहै.

लोरिककेज्येष्ठपुत्रमगरूकीपत्नीसुनैनाकीहत्या, जिसेभय, रहस्यऔरआस्थाकीखोलमेंलपेटकरएकदैवीघटनाकीतरहआरोपितकरदियागया, कीपृष्ठभूमिमेंलिखीगईयहकहानीएकसाथकईपरतोंऔरकोने-अंतरोंकोखोलती-खंगालतीचलतीहै.हमारेजेहनमेंपल-पल  दर्जहोरहीसूचनासमयकीतेजगतिकेबरक्सविकासकेठहरावकोयहकहानीजिससमय-बोधकेसाथपुनराविष्कृतकरतीहै, वहउल्लेखनीयहै.सबसेतेजऔरसबसेपहलेकीहोड़मेंएकदूसरेकोपीछेधकेलेनेकोआतुरमीडियाप्रसूतगतिधर्मिताकेबीचस्वप्नऔरविकासकीतमामअवधारणाएँकिसमुकामपरठहरीहुईहैंउसेसमझनेकेकईजरूरीउपक्रमइसकहानीमेंमौजूदहैं.साथही, श्रम, सौहार्दऔरसहकारकेसंयुक्तउद्यमकोपूंजीसंचयकीसांघातिकलिप्साकिसतरहछिन्न-भिन्नकरदेतीहै, उसेसमझनेकेभीकईसूत्रोंकापतायहकहानीदेतीहैं.भ्रष्टपूंजीऔरव्यवस्थाकाअवसरवादीगठजोड़गतिशीलतामेंपरिसीमितप्रगतिकामुखौटालगाकरजहांएकतरफधर्मभीरुताकेसुनियोजित  व्यवसाय  केलिएखाद-पानीसहेजनेकाकामकररहाहै, वहींदूसरीतरफलैंगिकपक्षपातकासनातनखेलभीजारीहै.यहकहानीपूंजी, व्यवस्थाऔरब्राह्मणवादीपितृसत्ताकेइसअपवित्रगठजोड़कोबिनाकिसीलागलपेटकेएक्सपोजकरतीहै.यहअनायासनहींहैकिसतीकांडकोहत्याकांडसाबितकरनेवालीखबरसेसबसेज्यादा  विचलितवह  बिल्डरहोताहैजिसनेबहावलपुरमेंउभरतेधार्मिकपर्यटनकाभविष्यदेखतेहुयेवहाँभरपूरनिवेशकियाथा.

इसबातपरभीगौरकियाजानाचाहिएकिउसबिल्डरकीनाराजगीबरास्ताउसबड़ेअखबारकेसंपादकउसपत्रकारकोनौकरीसेनिष्काषितकरनेतककासफरतयकरतीहै.धर्म, राजनीति,पूंजीऔरमीडियाकोसत्ताकेन्द्रमें  बदलकरइनसभीकीसंयुक्तऔरसुनियोजितरणनीतिकेतहतसमूचेलोकतन्त्रकोबंधकबनालेनेकीयहप्रक्रियाआजकेसमयकाबड़ासचहै.कार्यपालिकाऔरविधायिकामेंपतन  कीशुरुआततोसत्तरकेदशकसेहीदिखनेलगीथी, लेकिन  न्यायपालिकाऔरमीडियाकाभीउसीराहपरचलपड़नापिछलीसदीकेआखिरीदशकमेंखुलकरसामनेआयाहै.लोकतंत्रकेइनचारोंस्तंभोंकेआपसीटकरावऔरसांठगांठकेबीचधर्म-सताकीसक्रियभागीदारीसेबनापंचमेलभूमंडलोत्तरसमयकीखासविशेषताहैजिसेयहकहानीबहुतबारीकीसेउजागरकरतीहै.

गतिसूचना-सभ्यताकीपरिकल्पनाकेमूलमेंहैं.औद्योगिकक्रान्तिऔरसूचनाक्रान्तिकेबीचसमय, समाजऔरसभ्यताकेविभिन्नआयामों  मेंजोसबसेबड़ाअंतरआयाहै, वहगतिकाहीहै.तेजसम्प्रेषण, तेजआवागमन, तेजखबर, तेजजीवनशैली, तेजउत्पादन, तेजआपूर्ति, तेजउपकरण... तेजविशेषणसेयुक्तसंज्ञाऔरक्रियाओंकीइसअंतहीनफेहरिस्तमेंभूमंडलोत्तरसमयकीसामर्थ्यऔरसीमादोनोंहीनिहितहै.इसमेंकोईदोमतनहींकिगतिशीलताकीअवधारणानेसभ्यताऔरविकासकीरफ्तारकोतेजकरतेहुयेहमारेसमक्षसुविधाओंकेसंसारकीएकनईदुनियाकादरवाजाखोलदियाहै.लेकिनदौड़मेंपीछेछूटजानेवालोंकी  श्रृंखलागति आधारितसभ्यताकाएकऐसाअनिवार्यउपोत्पादहोतीहै, जिसकीसंख्यामुख्यउत्पादसेकहींज्यादाहोतीहै.नतीजतन, दौड़मेंअसफलयागतिकीअवधारणासेअनभिज्ञव्यक्तियाव्यक्ति-समूहएकऐसेहाशियेकानिर्माणकरतेहैं  जहांजीवनऔरसभ्यताकाविकासअतीतकेकिसीमुकामपरआकरठहरजाताहै.

अगिनअसनानकहानीइसलिएभीमहत्वपूर्णहैकियहइससमयकीदोनोंविशेषताओंगतिऔरठहरावकोसमानसंवेदनाकेसाथथाहतीहै.उल्लेखनीयहैकिबहावलपुरजोकहानीकामुख्यघटनास्थलहैअपनेजिलामुख्यालयसेकुछकिलोमीटरकीदूरीपरस्थितएकपंचायतहैजहांएकदंपत्तिकीहत्याकरकेफरारहोचुकेपरिवारकीखबरतीनदिनोंतककहींनहींछपतीप्रसारितहोतीहै.घटनाकेचौथेदिनएकक्षेत्रीयपत्रकारवहाँपहुंचताहैऔरपांचवेंदिनकीसुबहपहलीबारइसकीखबरछपतीहैऔरवहभीझूठी.न्यूजब्रेककरनेऔरसबसेपहलेपहुँचनेकीहोडकाशोरकरतेइसमीडिया-समयकायहसचहमारेसमयकीबड़ीविडम्बनाहै.गतिकेशोरकेबीचठहरावकासाक्षीयहकौनसासमाजहै? क्याडिजिटलऔरकैशलेसइंडियाकीचमकदारप्रस्तावनाकोयेनकेनप्रकारेणझूठे-सच्चेआंकड़ोंसेप्रतिपादितकरतीसत्ताओंकोभारतदेशमेंस्थितइनबहावलपुरोंकापता-ठिकानामालूमहै? गतिऔरठहरावकीअभिसंधिपरपल्लवितसबसेतेजकेदावों-प्रतिदावों  कानतीजायहहोताहैकिजिसगाँवकीघटनाचारदिनोंतकखबरभीबनसकीवहाँछठेदिनकीसुबहआरती-भजनकेसाथहोतीहै, सातवेंदिनसंसदमेंविपक्षीदलसरकारसेप्रश्नपूछलेताहै, आठवेंदिनबहावलपुरमेंपड़ोसीराज्योंसेश्रद्धालुआनेलगतेहैं, नवेंसेतेरहवेंदिनकेबीचतथाकथितसतीस्थानपरमेलालगजाताहै, चौदहवेंदिनएकअवकाशप्राप्तजजकीअध्यक्षतामेंसरकारजांचसमितिकागठनकरदेतीहै, सोलहवेंदिनतकवहसतीस्थानसिद्धपीठमेंबदलजाताहैऔरअठारहवेंदिनजांचसमितिकीरिपोर्टकेआधारपरसमाजकेहाशिएपरकिसीतरहगुजर-बसरकररहेचारनिरीहनिर्दोषलोगोंकोदोषीकरारदेकरजेलभेजदियाजाताहै.


गतिकेसमकालीनस्वरूपकाइससेबड़ाउदाहरणऔरक्याहोसकताहै? भूमंडलोत्तरसमयमेंफल-फूलरहेसबसेतेजकीस्पर्धाआजजिसतरहकामाहौलतैयारकररहीहैउसकेदोप्रत्यक्षप्रभावहमदेखसकतेहैं- एकलोककेमनमेंपलरहेसंदेहकोखारिजकरतेहुयेझूठकोहीसचकीतरहस्थापितकियाजानाऔरदूसरा, अपनेद्वारानिर्मितसचकेप्रभावकाएकऐसादबावक्षेत्रतैयारकरनाजिसकेअहातेमेंन्यायऔरनियंत्रणकीमहानसंस्थाएंभीसमर्पणकरदें.ठहरकरसोचनेकेसारेअवसरोंकोसोखकरसिर्फऔरसिर्फरफ्तारकोहीतमाममूल्योंमेंश्रेष्ठमानालेनेकाहीयहनतीजाहैकिबहावलपुरजैसेगाँवकीघटनाकेआगेजस्टिसडिलेड, जस्टिसडिनायडकासूत्रवाक्यभीअपनीअर्थवत्ताखोदेताहै.एकतरफगतिकीयहआक्रामकताऔरदूसरीतरफसभ्यताकाठहराव, जहांनपुंसकताकीबीमारीतथाकथितआधुनिकसमाजकेएकहिस्सेकोआजभीचिकित्सकोंकेबजायपंडितोंकेदरवाजेतकलेजातीहै, जहांसंतानोत्पत्तिहीस्त्रीकेअस्तित्वकाअकेलापहचानमानलियाजाताहै, जहांखानदानीसंपत्तिपरअनाधिकारआधिपत्यकीलालसाआजभीकिसीव्यक्तिकोअपनेहीपरिवारजनोंकीहत्याकीनृशंसनियतितकपहुँचजातीहै... ‘अगिनअसनानकहानीकामर्मगतिशीलताऔरठहरावकीसंयुक्तउपस्थितिसेउत्पन्नइन्हींविडंबनाओंकेउदघाटनमेंनिहितहै.


लोकतन्त्र  केचारोंस्तंभोंकेबीचकीसुनयोजितसाँठगाठ,जोअंततःलोकतन्त्रकीहत्याकरनेपरहीआमादाहै, कोउद्घाटितकरतीयहकहानीसंयुक्तपरिवार, उसकीजटिलताओं, उसकेटूटन, उसकेभीतरबनते-बिगड़तेस्त्री-पुरुषसम्बन्धोंकीसूक्ष्मताओंऔरपरंपरासेचलेरहेसम्बन्धोंकीरूढ़होचुकीपारस्परिकताओंकेबीचपारिवारिक-सामाजिकव्यवहारोंमेंहोरहेसूक्ष्मपरिवर्तनोंकोभीएकखासकिस्मकीभावप्रवणताकेसाथरेखांकितकरतीचलतीहै.पतिकेनपुंसकहोनेकेकारणबांझहोनेकेआरोपकादंशझेलतीसुनैनाकेभीतरपलरहेदुख, आक्रोश, अवसाद, औरममत्वकोआशुतोषएककुशलशिल्पीकीतरहरेशारेशाजोड़तेहैं.कुछेकअपवादोंकोंछोड़देंतोनारीमनकोसमझनेकीऐसीकोशिशइधरकेपुरुषकथाकारोंकीकहानियोंमेंअमूमननहींदिखती.लेकिनइसक्रममेंसुनैनाकेपतिमंगरुकेमानसिकभूगोलतककहानीकानहींपहुँचपानाखटकताहै.इसकाअंदाजाखुदलेखककोभीहैजिसकासंकेतकहानीमेंहीमौजूदहैबहावलपुरमेंधीरे-धीरेदबीजुबानसेहीसहीयहचर्चाआमहोगईथीकिमगरूनपुंसकहै.यहमगरूकोकैसीलगतीथीइसकेठीक-ठीकसाक्ष्यनहींमिलते.

इसबातपरगौरकियाजानाचाहिएकिसमयऔरसमाजमेंजोअप्रकटहैयानीनंगीआँखोंसेजिनयथार्थोंकोनहींदेखाजासकता, एकरचनाकारउसीकोतोअपनीरचनाओं  मेंप्रकटकरताहै.क्याहीअच्छाहोताकिआशुतोषइसतरहकीसफाईपेशकरनेकेबजाएमंगरुकेमनकीथाहलेनेकीकोशिशभीकरते.हाँ, यहाँइसबातकाभीजरूरजिक्रकियाजानाचाहिएकिऊपरसेबहुतहदतकपारंपरिकमूल्योंकेअहातेमें  खड़ीदिखनेकेबावजूदयहकहानीस्त्री-पुरुषकेपरस्परव्यवहारकीकईरूढ़ियोंकाप्रगतिशीलप्रतिलोमभीरचतीहै.मंगरूऔरसुनैनाकापरस्परसंबंधइसबातकासबसेबड़ाउदाहरणहै.अमूमनपितृसत्ताकेसंस्कारोंकेसाथपला-बढ़ापुरुषअपनीनपुंसकतासेवाकिफहोनेबादभीअपनीस्त्रीपररोबगाँठनेसेबाजनहींआता.लेकिनयहाँमंगरूकेव्यवहारमेंऐसेकोईसंकेतनहींमिलतेबल्किवहमनहीमनसुनैनाकेप्रतितमामसदाशयताओंसेभराहोनेकेबावजूदउसकीउपेक्षा, आक्रोशऔरअबोलेकोसहजस्वीकारलेताहै.उनदोनोंकेसम्बन्धोंकाव्याकरणतबबदलताहैजबतनावऔरआक्रोशसेभरीसुनैनाकोएकदिनमंगरुकेलिएअपनेउपेक्षाभावकाअहसासहोताहै.उसकेबादउनदोनोंकेबीचपरस्परप्रेम, सौहार्द्रऔरसाहचर्यकाएकऐसावातावरणनिर्मितहोताहै, जिसमेंपुरुषऔरस्त्रीमालिक-नौकरकीपितृसत्तात्मकआचार-संहिताकोनकारकरएकदूसरेकेसाथआत्मीयमित्रकीतरहपेशआतेहैं.

सुनैनाअपनेपतिकेमर्द (पुंसत्वकेलिहाजसे) होनेकेआगेउसकेबेहतरमनुष्यहोनेकोतरजीहदेतीहै.पितृसतात्मकमाहौलमेंपलेबढ़ेमंगरूकोअपनीपत्नीकेसखा  केरूपमेंविकसितकरआशुतोषनेएकऐसेआदर्शपुरुषकीसंरचनाकीहैजिसकासपनाहरस्त्रीकेमनमेंपलताहै.देहकेविरुद्धपरस्परसाहचर्यआधारितप्रेम, वंशबेलसींचनेकीपितृसत्तात्मकअवधारणाकेविरुद्धअपनीपत्नीकेभतीजेकोअपनावारिसबनानेकीअभिलाषारखनेकीउदारता... येकुछऐसेविरलसंयोगहैंजोमंगरूकोआमपुरुषोंसेअलगकरतेहैं.

पिछलेकुछवर्षोंमेंप्रकाशितकथाकृतियोंकीसंरचनापरगौरकरेंतोपाएंगेकिउपन्यासोंकीलंबाईजहांपहलेकीतुलनामेंकमहुईहैवहींआजकीकहानियाँअपनीपूर्ववर्तीकहानियोंकीतुलनामेंदीर्घहुईहैं.जिनकुछकथाकारोंनेअपनीसुदीर्घकहानियोंसेपाठको-आलोचकोंकाध्यानखींचाहै, उनमेंनिःसन्देहआशुतोषभीशामिलहैं.लंबीकहानियोंकीसफलतामेंजिनदोअवयवोकाखासयोगदानहोताहैवेहैंकिस्सागोईऔरवर्णनात्मकता.आशुतोषकीकहानियाँइनदोनोंहीमोर्चोंपरसमृद्धहैं.किस्सागोईऔरवर्णनात्मकताकेइससंयुक्तउपक्रममेंलोककीतरलउपस्थितिआशुतोषकीकहानियोंकोएकखासतरहकीपठनीयताप्रदानकरतीहै.इसबातकोरेखांकितकियाजानाचाहिएकिआशुतोषकीअन्यकहानियोंकीयेविशेषताएँअगिनअसनानमेंभीमौजूदहैं.

भूमंडलोत्तरकथापीढ़ीकीनिर्मितिपरजिनवरिष्ठकथाकारोंकीभाषा-शैलीकास्पष्टप्रभावदिखाताहै, उनमेंनिर्मलवर्मा, उदयप्रकाशऔरविनोदकुमारशुक्लप्रमुखहैं.बुन्देलीलोककीअलहदामौजूदगीऔरअपनेपात्रोंकोलेखकीयस्नेहऔरसंवेदनाकाउष्णस्पर्शदेनेकेकारणअलगहोनेकेबावजूदकथासूत्रऔरकथासमयकेबीचउल्लेखनीयआवाजाहीऔरलेखकीयउपस्थितियुक्तउदयप्रकाशीयकथाशैलीकाकुछप्रभावअगिनअसनानपरभीदेखाजासकताहै.इसक्रममेंकहानीकेलगभगउत्तरार्धमेंहत्याकांडकेअंतकेसंभावितविकल्पोंकीतलाशमेंलेखकीयउपस्थितिकहानीकेपाठमेंकुछअवरोधउपस्थितकरताहै, जिससेबचाजानाचाहिएथा.

अगिनअसनानजहांअपनीवर्णनात्मकताकेकारणविशिष्टहै, वहींइसकहानीकी  कुछसांकेतिकतायेँभीइसेउल्लेखनीयऔरबहुपरतीयबनातीहैं.जिनसहजसंकेतोंकेमाध्यमसेयहकहानीगांधीकोसुनियोजितरूपसेनिष्काषितकिएजानेकीसाजिशकीतरफइशाराकरतेहुयेउनकीपुनःवापसीकीजरूरतोंकोरेखांकितकरतीहैवहकलाऔरवैचारिकीकेसहजसंयोगकाविरलउदाहरणहै.उल्लेखकियाजानाचाहिएकिबशरुदीन, लियाकत, रमईऔरझड़ेला, जिन्हेंतेजन्यायव्यवस्थानेजेलभेजकरधार्मिकसत्ताऔरराजनैतिकसत्ताकीसाज़िशोंकोसांस्थानिकस्वीकृतिदिलाई, सुनैनादेवीकीअन्त्येष्टिकेसमयअपनेबाजेपरवैष्णवजनतोतेनेकहिएजेपीरपराईजानेरे...’ कीधुननिकालरहेथे.


‘वैष्णवजन’कीधुनबजानेवालेइनचारनिर्दोष, निरीहोंकोबंदीबनानासुनियोजिततरीकेसेगांधीकेविचारोंकोकालकोठारीमेंभेजदेनेकाप्रतीकहीतोहै.कहानीकेअंतमेंएकबुढ़ियाघूम-घूमकरलोगोंसेयहपूछतीहैकिकायमालिक, वैष्णवजन...’ गावेबारोहमाओडोकराकाबेहै.बुन्देलीमेंबूढ़ेकोडोकराकहतेहैं.इनपंक्तियोंतकआते-आतेयहकहानीजिसतरहगोडसेकेमन्दिरनिर्माणकोमौनसहमतिदेकरचरखाचलानेकाअभिनयकरतेहुयेहमारीस्मृतियोंसेगांधीकीउपस्थितिकोपोंछदेनेकीकुटिलसाजिशकरनेवालेसमकालीनसत्ताधीशोंकीराजनीतिकारूपकबनकरखड़ाहोजातीहैवहइसेएकमहत्वपूर्णऔरयादगारकहानीमेंबदलदेताहै.
--

brakesh1110@gmail.com

परख : वृद्धत्व की विवेचनाएं : अविनाश मिश्र

$
0
0










अविनाश मिश्र का यह लेख गोविन्द मिश्र के उपन्यास ‘शाम की झिलमिल’ तक अपने को सीमित नहीं रखता, साहित्य में  उम्रदराज पीढ़ी और उनके लेखन में ढलती उम्र की  इच्छाएं  और विवशताएँ भी यहाँ दृश्य में हैं.  यह विवेचना दिलचस्प और कारुणिक एक साथ है.




वृद्धत्व की विवेचनाएं                             
{गोविंद मिश्र के नए उपन्यास ‘शाम की झिलमिल’ के उजाले में } 


अविनाश मिश्र 





क उम्र में आकर अतीत बहुत हो जाता है. वह आज और आगामी दोनों पर ही हावी प्रतीत होता है. मैं इस उम्र से गुजर रहा हूं, लेकिन मैं अतीत के जाल और आगामी की जकड़ दोनों से ही बचना चाहता हूं. आज का आकर्षण मुझमें खूब है, और कोई भी ऊब इस खूब को कम नहीं कर पाती.

आज को समझने के लिए अतीत मुझे अरुचिकर लगता है.

कृष्ण बलदेव वैद अपनी डायरी ‘जब आंख खुल गई’ में बुढ़ापे को बुरी बला कहते हैं, बवासीर से भी ज्यादा बुरी. मैं इस बुरी बला के बीच हूं और मेरे आस-पास मेरे सिवा दूसरा कोई नहीं है. बहुत सारी निर्जीवता के बीच मैं अकेला हूं. मेरी देह एक जर्जर मकान-सी हो चुकी है. इस अकेलेपन में मेरी उम्र के दूसरे क्या सोचते हैं या क्या सोचते रहे होंगे, यह जानने के लिए मैं पढ़ना चाहता हूं. मैं वरिष्ठ उपन्यासकार गोविंद मिश्र के हाल ही में आए उपन्यास को पढ़ना शुरू करता हूं. इसका शीर्षक मुझे आकर्षित करता है‘शाम की झिलमिल’. शाम यहां जीवन में मृत्यु के अंधकार (अगर वह अंधकार ही है तो) से पहले का पहर है. 

पाठकवादी आलोचना के कोण से देखूं तो यह उपन्यास मुझे अपने बहुत नजदीक लग रहा है, क्योंकि इसमें कुछ प्रकार का बुढ़ापा है जिसका काम स्मृतियों से नहीं चल रहा है. अतीत यहां एक ऐसा स्टेशन है जिसका नाम बदल गया है और जिसके बारे में सोचते हुए यों लग रहा है कि जैसे गुजरने वाला कभी इससे होकर गुजरा ही नहीं. आज में जीने की कामना इस उपन्यास के केंद्रीय किरदार में सब कुछ को जी लेने के बावजूद बाकी है :

‘‘जिस रास्ते से यहां तक आया, वह आगे जाता नहीं दीखता. आस-पास कोई अलग रास्तादूसरा-तीसरा, दाएं-बाएं भी नहीं कि उसे पकड़कर चलूं, चलता चला जाऊं... देखूं कि वह कहां ले जाता है आखिर. वैसे अब चलना कोई जरूरी भी नहीं, कहीं पहुंचना तो कतई नहीं. जीवन में जो हो सकता था वह हो लियाप्रेम, नौकरी, तरक्की, धनोपार्जन, गृहस्थी... इन सबके तनावों, उनके गली-कूचों से गुजर लिया. नए तनावों को ढूंढ़ने, उन्हें जीवन में लाने की तरफ भी निकला... थोड़ा दूर चले तो बोर्ड लगा दिखा‘आगे रास्ता बंद है.’ तो अब किधर?’’

[ शाम की झिलमिल, पृष्ठ : 111 ]

मैं इस उपन्यास के केंद्रीय किरदार-सा महसूस कर रहा हूं. प्रश्न और राग मुझसे भी छूट नहीं रहे हैं. अंत की आहटों का संगीत समीप है, लेकिन रागाकुलता नित्य का नियम होती जा रही है. इसे समाज लार बहाना भी कह सकता है और आकर्षण जो अब तक शेष हैं, उनकी वास्तविकता और ईमानदारी पर शक किया जा सकता है. लेकिन मैं ही जानता हूं कि वे मुझे किस कदर बेचैन करते हैं. यह उपन्यास मेरी इस तरह की बेचैनियों का तर्क है. इस तार्किकता में कृष्ण बलदेव वैद की डायरी ‘जब आंख खुल गई’ पर एक बार और नजर जाती है :

‘‘असली बुढ़ापा शायद सत्तर के बाद ही उतरता है. मुझ पर उतर रहा है. अब हर कदम कठिन होना शुरू हो गया है, हर काम बेकार नजर आना, हर रोग अंतिम, हर कोशिश अनावश्यक, हर उपलब्धि अकारथ.’’

‘शाम की झिलमिल’का बूढ़ा सत्तर बरस की उम्र के आस-पास पहुंचा हुआ लगता है, लेकिन उसकी स्थिति कृष्ण बलदेव वैद की डायरी के बूढ़े से बिल्कुल अलग है. वह कम लाचार, कम बेकार, कम बीमार नजर आता है. इस बूढ़े के सारे कदम एक आसक्ति की उत्तेजना की तरफ बढ़े हुए लगते हैं. निराशाएं कितनी ही निश्चित क्यों न हों, वह विचलित नहीं है. समय को काटने के लिए एक मकसद की चाह में वह बराबर भटक रहा है. इस राह में उसके संघर्ष और उसकी लड़ाइयां उसे लगातार अकेला करती जा रही हैं. लेकिन वह अंत तक सब कुछ भोगते हुए जाना चाहता है. निरासक्त होना उसकी कार्य-सूची में नहीं है. वह लिप्त है और लिप्त रहना चाहता है. उसमें मृत्यु का भय नहीं है. वानप्रस्थ उसके लिए नई वर्जनाएं लेकर आया है, जिन्हें वह बहुत सलीके से तोड़ना चाहता है. कहीं-कहीं वह उंगलियों में फंसे उस अखरोट-सा नजर आता है जिसे किसी दरवाजे के जोड़ के बीच दबाकर तोड़ा जाएगा. इस प्रक्रिया में उंगलिया आहत न हों, इसके लिए पर्याप्त सावधानी बरतनी पड़ती है, लेकिन इस सावधानी के बावजूद अक्सर उंगलियां भी चोटिल होती हैं और अखरोट भी अयोग्य निकलता है :

‘‘पूर्व प्रेमिका से संबंध का खात्मा एक तरह का संदेश है... प्रकृति की ओर से, जैसे वह देती रहती है समय-समय पर, एकाएक खंभे की तरह ला गाड़ती है हमारे जीवन में. मैं चाहूं तो खंभे पर लिखी इस इबारत को पढ़ लूं कि बड़े भाई तुम्हारे लिए अब स्त्री के साथ वाला रास्ता बंद है. तुम स्त्री से कितनी तरह की अपेक्षाएं रखते हो... पर वह बेचारी दे ही क्या सकती है?’’
[ शाम की झिलमिल, पृष्ठ : 127 ]

स्त्री-विमर्श के बीच बदलती नई स्त्री-स्थिति को मैं कुछ इस दृष्टि से देख रहा हूं कि जैसे इसने वे सारी संभावनाएं समाप्त कर दी हैं, जो इस वृद्धत्व में अकेलेपन से थोड़ी राहत दे सकती हैं. ‘शाम की झिलमिल’ में एक स्त्री है जिस पर ससुराल छोड़ने का कलंक ढोने के साथ-साथ कमाने, घर का काम-काज करने और अपनी संतान का भविष्य बनाने का बोझ है. एक और स्त्री है, इसे भी कमाना है और दो बच्चों के साथ-साथ अपनी सास को भी देखना है. एक और स्त्री भी है जिसे लड़का-बहू और उनके बच्चों की चाकरी करते हुए उनकी नजर में ऊंचा भी बने रहना है. एक स्त्री और भी है जो एक रोज अंतरंगता से मिलती है और दूसरे रोज भूल जाती है, जिसे अपने आपको ही ढोना भारी पड़ता है... इन स्त्रियों के संग राग के रोग से ग्रस्त इस उपन्यास का वृद्ध नायक कह उठता है :

‘‘ये बेचारियां क्या दे सकती हैं किसी को. वे अपना देखें या तुम्हें संभाले! तो अब तुम अपनी पुरानी उम्र वाले संबंध या वैसे किसी साथ के सपने न देखो. वे लोग, वह समय गए... अब न तुम, न वह... न कोई उस समय के जैसे हैं.’’
[ शाम की झिलमिल, पृष्ठ : 128 ]

मेरे अपने टूट चुके परिवार से निकले एक परिवार में चार दिन या ज्यादा से ज्यादा एक सप्ताह के लिए जाऊं तो वहां अपने बेटे की पत्नी यानी अपनी बहू को देखकर भी मेरा ‘लिबिडो’ गुदगुदाता है. बेटा उदासीन-सा प्रतीत होता है, लेकिन बहू में उत्फुल्लता नजर आती है. मुझे लगता है कि वह मेरी सारी जरूरतें समझ रही है :

‘‘वह कभी किसी वक्त अकेले कमरे में आ टपकती, रात दस बजे भी... लैंप की मद्धिम रोशनी में तब आकर्षक लगती, बहुत मीठा बोलती...

...वह जितना मेरा ख्याल रखती थी, जितना मेरे लिए करती थी... पत्नी ने कभी नहीं किया, पहली उम्र में भी.’’
[ शाम की झिलमिल, पृष्ठ : 81 ]
गोविन्द मिश्र

मैं ख्याल रखवाने की इच्छा से इस कदर भरा हुआ हूं कि कहीं-कहीं मुझमें स्त्री के प्रति भय छलकने लगता है. सब तरफ एक से बढ़कर एक विकृतियों की खबरें फैली हुई हैं. बलात्कार बराबर बढ़ते जा रहे हैं. समूह के समूह इस बात पर एकमत हैं कि स्त्री अगर स्वतंत्र और अकेली है, तब वह बलात्कार के लिए आमंत्रित कर रही है. ‘गैंग रेप’ शीर्षक से एक चर्चित कविता की रचनाकार कवयित्री शुभा का कहना है कि दस पुरुषों को किसी एक बात के लिए, किसी एक काम के लिए राजी करना आसान नहीं है. इसमें कभी-कभी महीनों लग जाते हैं... आप करके देख लीजिए. सबके अपने-अपने काम और बहाने निकल आएंगे, लेकिन सामूहिक बलात्कार करना हो तो देखिए सब कैसे एक झटके में तैयार हो जाते हैं. यह कौन-सा प्राचीन उत्तेजक विचार है? यह कौन-सी बहुत भीतर दबी हुई नफरत है स्त्रियों के लिए जो अलग-अलग दिमाग रखने वाले पुरुषों को एक झटके में स्त्रियों को रौंदने के लिए एकमत कर देती है? 

‘‘लिंग का सामूहिक प्रदर्शन
जिसे हम गैंग रेप कहते हैं
बाकायदा टीम बनाकर
टीम भावना के साथ अंजाम दिया जाता​ है

एकांत मे स्त्री के साथ
जोर-जबरदस्ती तो खैर
सभ्यता का हिस्सा रहा है
युद्धों और दुश्मनियों के संदर्भ में
वीरता दिखाने के लिए भी
बलात्कार एक हथियार रहा है’’

ऊपर उद्धृत कविता-पंक्तियां शुभा की ‘गैंग रेप’ शीर्षक कविता से ही हैं. वैसे यह सब विषयांतर-सा प्रतीत हो रहा होगा, लेकिन है नहीं क्योंकि ‘शाम की झिलमिल’ का वृद्ध नायक स्त्रियों पर यौन-आक्रमण और यौन-उत्पीड़न की खबरों से सहमा-सिमटा हुआ है. इसलिए उसकी खोद-खोज जरूरी है. वह कहीं विशाखा गाइडलाइंस की वजह से तो खौफजदा नहीं है? खाट से लगकर अकेलेपन को भोगने वाली अवस्था तक आ चुकने के बाद भी उसकी स्त्रियों में दिलचस्पी न तो सीमित हुई है, न समाप्त. पुरुषों को लेकर स्त्रियों में इस प्रकार की दिलचस्पियां एक उम्र में आकर स्वत: समाप्त हो जाती हैं, वे पुरुषों को कामना की दृष्टि से नहीं, सुरक्षा की दृष्टि से देखने लगती हैं. यह सुरक्षा अगर संभव नहीं है और चाहे-अनचाहे स्वतंत्रता और अकेलापन उन पर आ गिरा है, तब भी वे प्रेम-प्रभाव और यौन-आक्रमण या यौन-उत्पीड़न की दृष्टि से सुरक्षित ही रहती हैं. दैहिक संपत्ति खो चुकने के बाद आर्थिक संपत्ति (अगर वह उनके पास है तो) ही उन पर हमलों या उनके शोषण की वजह बन सकती है. भारतीय समाज में आसानी से यह देखा जा सकता है कि वृद्धप्राय या वृद्ध-स्त्रियां और विधवाएं घर-परिवार में खुद को सहजता से समायोजित कर लेती हैं. अगर वह चल-फिर सकने योग्य हैं तो इस उम्र में भी उनके पास करने को पर्याप्त काम होते हैं. बाकी सारे संदर्भों की अपवाद स्थितियां तो होती ही हैं, इसलिए इनके निष्कर्ष नारी मुक्ति केंद्रों, विधवा-आश्रमों और विडो-होम्स से लेकर उम्र की चोट से घायल सर्वत्र भटकती हुई स्त्रियों में देखे जा सकते हैं.

लेकिन वृद्धत्व तक आ चुके पुरुष में स्त्री को भोगने की विवक्षा विलुप्त ही हो जाएगी, यह मानकर चलना गलत है. ‘शाम की झिलमिल’ के वृद्ध नायक में भी यह विवक्षा शेष है, लेकिन इस विवक्षा की भूलभुलैया में फंसकर नष्ट हो जाने के अज्ञात भय से भी वह ग्रस्त है. खबरें और नए कानून इस भय के उत्प्रेरक हैं, लेकिन फिर भी खुद के साथ किए जा रहे नए-नए प्रयोगों के बीच उसकी यात्रा जारी है और इस यात्रा में सहयात्री और साहचर्य की तलाश भी. उसे लगता है कि अब भी उस पर भरोसा किया जा सकता है. अब भी वह किसी लायक है.

‘शाम की झिलमिल’ से बहुत बरस पहले अपने अंत की ओर बढ़ती हुई उम्र क्या-क्या सोच सकती है, इसे हिंदी में एक और उपन्यास में बताया गया है. यह उपन्यास हैकृष्ण बलदेव वैद का ‘दूसरा न कोई’. बुढ़ापे पर केंद्रित उपन्यास में बीमारियों का बखान तो होगा ही, लेकिन यह बखान उबाऊपन की हदें न छू ले, इसके लिए के. बी. यानी कृष्ण बलदेव वैद ह्यूमर का सहारा लेने को जरूरी मानते हैं. बुढ़ापे का आख्यान लिखने से पहले के. बी. इससे खासे जूझते रहे, उनकी डायरी ‘जब आंख खुल गई’ पढ़कर यों लगता है :

‘‘बुढ़ापा अगर उपन्यास पर हावी होगा तो बीमारी और लाचारी का चित्रण अनिवार्य होगा, लेकिन जरूरी नहीं कि वह यथार्थवादी ही हो. जरूरी क्या है? एक ऐसा उपन्यास जिसमें बुढ़ापे की वीभत्स बेहूदगी भी हो, भव्यता भी. घर, बाहर, बाजार, सड़क, पार्क, अस्पताल, क्लब, मंदिर, पहाड़, आश्रम....’’

‘दूसरा न कोई’ का केंद्रीय किरदार और स्थितियां के. बी. की उस महत्वाकांक्षा को एक सीमा तक ही स्पर्श कर पाती हैं जिसे उन्होंने ‘बुढ़ापा अगर उपन्यास पर हावी होगा...’ यह कहते हुए अपनी डायरी में दर्ज किया है. इस अर्थ में देखें तो देख सकते हैं कि ‘शाम की झिलमिल’ का बूढ़ा ‘दूसरा न कोई’ के बूढ़े का विस्तार है. इस यात्रा के बीच में एक और उपन्यास है बुढ़ापा जिस पर हावी है निर्मल वर्मा कृत ‘अंतिम अरण्य’. यहां आकर इस प्रकार एक त्रिकोण पूरा होता है. वृद्धत्व के जिस आख्यान को के. बी. अपनी भाषा-शैली की बुनावट-बनावट और दृष्टि-वैभिन्न्य के चलते एक ऊंचाई पर ले गए, उसके आस-पास आवाजाही के लिए अब दो उपन्यास और हैं.

इन तीनों उपन्यासों के केंद्र में वृद्धत्व है. केंद्रीय किरदार सत्तर बरस के आस-पास के हैं. यहां यह भी ध्यान देने योग्य है कि इन्हें लिख रहे लेखकों की उम्र भी लगभग यही है. इन तीनों उपन्यासों पर किए गए किसी विवेचनात्मक उपक्रम का उद्देश्य बस यही समानता हो सकती है, जो गोविंद मिश्र की नवीनतम औपन्यासिक कृति उपलब्ध करवाती है.

‘शाम की झिलमिल’ से पहले इस त्रिकोण को एक बिल्कुल सीधी रेखा की तरह देखा जा सकता है, विषय की एकरूपता के बावजूद जिसके दो बिल्कुल विपरीत छोर हैं. वृद्धत्व का मध्यवर्ती बिंदु इन्हें परस्पर संबद्ध करता है, लेकिन प्रकटीकरण के प्रयत्न इन्हें पृथक भी करते हैं. यह पृथकता ‘शाम की झिलमिल’ तक आकर भी जारी है.     

‘अंतिम अरण्य’ में वर्तमान में गतिमान अतीत की अधिकता है :
‘‘कभी-कभी मैं सोचता हूं कि जिसे हम अपनी जिंदगी, अपना विगत और अपना अतीत कहते हैं, वह चाहे कितना यातनापूर्ण क्यों न रहा हो, उससे हमें शांति मिलती है. वह चाहे कितना ऊबड़-खाबड़ क्यों न रहा हो, हम उसमें एक संगति देखते हैं. जीवन के तमाम अनुभव एक महीन धागे में बिंधे जान पड़ते हैं. यह धागा न हो, तो कहीं कोई सिलसिला नहीं दिखाई देता, सारी जमापूंजी इसी धागे की गांठ से बंधी होती है, जिसके टूटने पर सब कुछ धूल में मिल जाता है. उस फोटो अलबम की तरह, जहां एक फोटो भले ही दूसरी फोटो के आगे या पीछे आती हो, किंतु उनके बीच जो खाली जगह बची रह जाती है, उसे भरने वाला ‘मैं’ कब का गुजर चुका होता है. वे हमारे वर्तमान के नेगेटिव हैं... सफेद रोशनी में पनपने वाले प्रेत... जिन्हें हम चाहें तो बंद स्मृति की दराज से निकालकर देख सकते हैं. निकालने की भी जरूरत नहीं... एक दृश्य को देखकर दूसरा अपने आप बाहर निकल आता है, जबकि उनके बीच का रिश्ता कब से मुरझा चुका होता है.’’
[ अंतिम अरण्य, पृष्ठ : 10-11 ]

‘दूसरा न कोई’ में वर्तमान में व्याप्त भविष्य का भय है :
कृष्ण बलदेव वैद 

‘‘दरअसल, मैं चाहता यही हूं कि मेरे बाद मेरा नाम हो, इसलिए होगा नहीं. लेकिन मैं चाहता यही हूं. एक खाम ख्याल कभी-कभी यह आता है कि मरूं नहीं, लेकिन अपनी मौत की अफवाह फैला दूं और देखूं कि मेरा क्या हश्र होता है. यह ख्वाहिश हर खाकी को होती है, जानता हूं. इसी ख्वाहिश ने भूत-प्रेतों को जन्म दिया है. लेकिन इस ख्याल पर अमल अब असंभव हो गया है. कहां छिपता फिरूंगा. इस मकान से बाहर निकलते ही निहत्था हो जाऊंगा.’’
[ दूसरा न कोई, पृष्ठ : 88 ]

‘शाम की झिलमिल’ में अतीत-मोह और भविष्य-भय दोनों से ही मुक्त वर्तमान ही वर्तमान है :

‘‘मैं अकेला हूं... क्या करूं, जीवन से सटना मेरी प्रकृति है.

सटना कहां बुरा है, मैं क्या तुम लोगों से सटता नहीं था... लेकिन ऐकांतिक सटना नहीं. जिस वय, अवस्था में तुम हो, उसमें पहले जैसा सटना नहीं हो सकता. हर उम्र की एक लय होती है, उसके हिसाब से खुद को ढालना हो जाए तो एकलयता आती है जीवन में. स्थिर करो स्वयं को... जहां हो वहीं, अकेले हो तो किताबों को अपना साथी बनाओ. वे तुम्हें स्वयं में स्थिर करेंगी.’’
[ शाम की झिलमिल, पृष्ठ : 116 ]

यह एक द्वंद्वात्मक संवाद है जो एक विषय के सिलसिले में एक उम्र के आखिरी मुकाम पर आकर खुद से होता है. आपने जिनसे दगा की, आप खुद को उनकी जगह रखकर देखने लगते हैं. वार्द्धक्य का एक वैभव इसमें भी है कि अक्सर आप दूसरों के नजरिए से भी सोचने लगते हैं. हालांकि ‘देह और दृष्टिकोण से बाहर निकलना आसान नहीं.’ (देखें : ‘दूसरा न कोई’)

वृद्धत्व जब एक जीवन में घर बनाता है, तो उसमें दरवाजे और खिड़कियां नहीं होती हैं.इस घर में प्रवेश करने की प्रविधि सामान्य नहीं है, इसलिए बहुत सारे संबंध इस प्रवेश-प्रक्रिया से बचने लगते हैं. बहुत सारे प्रसंगों में उन्हें वृद्धत्व को देखना-सुनना एक सजा की तरह लगता है. समग्र अनुशासनों को क्षीण करते हुए इस वक्त तक आते-आते सब कुछ बेवक्त हो जाता है. अनुपस्थिति की तरफ बढ़ती हुई यह अवस्था अनुपस्थितियों को भोगने के लिए अभिशप्त है. यह स्थिति संसार की सारी स्थानिकताओं में लगभग समान है. 
*

अनुपस्थितियों से आक्रांत मेरे आज में स्वप्न अतीत का अंग हो चुके हैं. लेकिन कुछ राग मुझमें अब भी शेष हैं. मैं उन्हें गाता हूं, जबकि सुनने वाला कोई नहीं. मेरे गान बहुत अर्थदरिद्र लग सकते हैं, लेकिन मैं चाहता हूं कि मैं जब तक हूं... वे भी रहें....

यह अंत की आहट है. उन सब शुभकामनाओं के प्रति अब अंतिम तौर पर कृतज्ञ होने का वक्त आ गया है, जो मुझे जीवन भर दी गई हैं. ‘दूसरा न कोई’ में उपस्थित विनोदप्रियता, ‘अंतिम अरण्य’ में उपस्थित अध्यात्म, ‘शाम की झिलमिल’ में उपस्थित जिजीविषा... मैं सब कुछ से गुजर चुका हूं. इस पढ़त के पश्चात अर्थग्रहण के आलोक में देखूं तो देख सकता हूं कि ‘शाम की झिलमिल’ में समाज एक सुविधाजनक अमूर्तन भर नहीं है, जैसा कि वह ‘दूसरा न कोई’ और ‘अंतिम अरण्य’ में नजर आता है. वृद्धत्व के साथ नत्थी अकेलापन आपको समाजविमुख बहुत सहजता से कर सकता है. लेकिन ‘शाम की झिलमिल’ इस मायने में वृद्धत्व-केंद्रित हिंदी उपन्यासों की परंपरा में कुछ आगे का उपन्यास प्रतीत होता है, कि इसका केंद्रीय किरदार उम्र के चौथेपन में भी अपनी यात्राओं का रुख भीतर की तरफ नहीं बाहर की तरफ रखने के यत्न में संलग्न है. ‘अंतिम अरण्य’ में सुख पर जो अविश्वास है, ‘दूसरा न कोई’ में जो दिशाहीनता है उसका प्रतिवाद ‘शाम की झिलमिल’ के द्वंद्व बहुत तर्कालोकित ढंग से करते हैं :

‘‘अगर हमें दस लोगों से अविश्वास मिलता है, बाहर अविश्वास ही अविश्वास फैला हुआ है... तो भी क्या सब पर अविश्वास किया जाए. चारों तरफ बुराइयां ही बुराइयां हैं, पर अच्छाई भी कहीं होगी, भले ही अंशमात्र...’’
[ शाम की झिलमिल, पृष्ठ : 160 ]

‘शाम की झिलमिल’ में दिवंगत प्रदेश की यात्रा से पहले राग एक विधेयात्मक तत्व है जीवन का. अंत की आहटें यहां व्यक्तित्व को निर्विषय नहीं कर रही हैं. वृद्धत्व यहां एकांत और अरण्य की शरण्य नहीं चाहता. वह स्थिति के आगे नतमस्तक नहीं है. वार्द्धक्य की आदर्श अवधारणाएं यहां तेल लेने चली गई हैं. ‘दूसरा न कोई’ में जो बात चेतना का हिस्सा थी, ‘शाम की झिलमिल’ तक आते-आते व्यवहार में उतर आई है. बीच में ‘अंतिम अरण्य’ का ‘अर्थगर्भ’ है जिसने कुछ विशेष जन के नहीं दिया है :

‘‘हवा चली, तो पेड़ की पत्तियां खड़खड़ाने लगीं. एक ठंडी-सी ठिठुरन अंदर सिहरने लगी. मेरे भीतर एक अजीब-सा विषाद आ जमा था... लगता था, जैसे बीच के बरसों की एक अदृश्य छाया-सी हम दोनों के बीच आकर बैठ गई है... और हम उसका कुछ नहीं कर सकते.’’
[ अंतिम अरण्य, पृष्ठ : 79 ]

*

इस पाठ के पश्चात मैं इस प्रश्न के आगे प्रस्तुत हो गया हूं कि इन तीन उपन्यासों से गुजरकर मुझे क्या शिक्षा मिलती है?

मेरी उम्र के कई दूसरे जब मैं अध्ययन में रत हूं स्त्रियों और बच्चों के यौन-शोषण में व्यस्त हैं, और व्यापार और राजनीति में भी. मेरी उम्र के कई दूसरेसाहित्य, संगीत, चित्रकारी, रंगमंच और सिनेमा में भी सक्रिय हैं. कुछ भूमिकाएं समय ने उन्हें सौंप दी हैं और कुछ भूमिकाएं समय से उन्होंने छीन ली हैं. कुछ जगहों पर सत्ता उनके काम आई है और कुछ जगहों पर सभ्यता. वे तमाम तरकीबों और दवाओं की मदद लेकर काल से होड़ लेने में लगे हुए हैं. मेरी उम्र के कई दूसरे अविवाहित और विधुर संस्कृतिकर्म, धर्म, ध्यान, योग और अध्यात्म में भी लगे हुए हैं.मेरी उम्र के कई दूसरेमयखानों और तीर्थस्थानों को बार-बार बदल रहे हैं. मेरी उम्र के कई दूसरेभयभीत, उद्विग्न, अतीतग्रस्त घर और संसार सबसे उपेक्षित कोनों में पड़े खांस रहे हैं. मेरी उम्र के कई दूसरे वृद्ध और वृद्धप्राय समाज की तेज और तेजतर होती रफ्तार में रोज कुचले जा रहे हैं. मेरी उम्र के कई दूसरे मौसम और भूख की मार सेसारे मौसमों में बेइलाज मर रहे हैं. उनकी लाशें सड़कों, पार्कों, ट्रेनों, बस अड्डों और धार्मिक स्थलों से लेकर कारावासों, अस्पतालों और ओल्ड एज होम्स तक फैली हुई हैं.उनकी लाशों पर दावा करने कोई नहीं आ रहा है. मेरी उम्र के कई दूसरे इस वक्त जब यह तथ्य दर्ज हो रहा है दफनाए और जलाए जा रहे हैं. इस अंतिम-क्रिया के फैलाव में मैं अपने अंत को देखते हुए एक वृक्ष के नीचे खड़ा हूं और जीवन एक परीक्षक की तरह मेरे आस-पास मौजूद है. हवा बहुत भारी है. अंधेरा धीरे-धीरे गोधूलि के दृश्य पर चढ़ रहा है. मुझ पर पीले-पीले पत्ते झर रहे हैं. देह अभी और जर्जर होगी, चाल अभी और मद्धम होगी, रोग अभी और घेरेंगे, अकेलापन अभी और सताएगा... यह सब और कुछ नहीं, अंत की चेतावनियां हैं. लेकिन मृत्यु से पहले मरना नहीं है. जीवन-राग को अटूट रखना है. बस यही इस पाठ से प्राप्त हुई शिक्षा है.
_______________
संदर्भ :
प्रस्तुत आलेख में किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित गोविंद मिश्र के उपन्यास ‘शाम की झिलमिल’ के प्रथम संस्करण (2017), वाग्देवी प्रकाशन, बीकानेर से प्रकाशित कृष्ण बलदेव वैद के उपन्यास ‘दूसरा न कोई’ के पॉकेट बुक्स संस्करण (1996) और राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित निर्मल वर्मा के उपन्यास ‘अंतिम अरण्य’ के प्रथम संस्करण (2000) को आधार बनाया गया है. कृष्ण बलदेव वैद की डायरी ‘जब आंख खुल गई’ राजपाल एंड संस, नई दिल्ली से साल 2012 में प्रकाशित हुई. शुभा की कविता ‘गैंग रेप’ से ली गईं पंक्तियां सोशल नेटवर्किंग साइट ‘फेसबुक’ की उनकी टाइमलाइन से हैं और उनसे बातचीत का संदर्भ व्यक्तिगत है. प्रस्तुत आलेख लिखते हुए न जाने क्यों शमशेर बहादुर सिंह की कविता ‘काल तुझसे होड़ है मेरी’ बार-बार जेहन में गूंजती रही.    
--
अविनाश मिश्र का कविता संग्रह'अज्ञातवास की कविताएँ'साहित्य अकादेमी से प्रकाशित है. 
darasaldelhi@gmail.com       

परिप्रेक्ष्य : भारत भवन : मनीष पुष्कले

$
0
0

























भोपाल में जब कोई पहली बार भारत भवन जाता है तब उसकी पहली प्रतिक्रिया यही होती है कि भारत में ऐसी जगहें हैं ?

इस फरवरी में भारत भवन अपनी स्थापना के ३५ वर्षों का सफर पूरा कर रहा है. क्या यह  भवन अब भी अपनी परम्परा  में आगे बढ़ते हुए अपने उद्देश्यों के प्रति समर्पित है.

क्या भारतीय समाज  संस्था-भंजक समाज है. क्यों शानदार संस्थाएं कुछ दशकों तक ही जीवित रह पाती हैं.

लेखक – चित्रकार मनीष पुष्कले का भारत भवन की स्थापना और उसके विचलन पर व्यथित करने वाला यह आलेख आपके लिए.  


३५ वर्षों के बाद  :  भारत-भवन                               
(भारतीय कलाओं और विचारों का प्रज्ञा-परिसर और राजनैतिक प्रायश्चित का प्रजातांत्रिक अवसर)

मनीष पुष्कले 





स्सीके दशक को कला-संस्कृति के क्षेत्र में भारत सरकारके द्वारा किये गए एक बेहद महत्वपूर्ण उपक्रमसे भी याद किया जा सकता है. यह प्रसंग क्रमशः केंद्र सरकार, राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन केसमवेत अवदान का एक उत्कृष्ट उदहारण भी है. इस प्रसंग का सम्बन्ध इंदिरा गाँधी से, शान्तिनिकेतन में हुईउनकी शिक्षा और वहाँ के प्रभावों से बने उनके मानस से और गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर के सानिध्य में मिली उस स्नेहिल दृष्टी से है जिन्होंने उन्हें प्रियदर्शिनी नाम दिया था. 

यह १९८० का वह समय था जब इंदिरा गाँधी चौथी बार देश की प्रधानमंत्री बन चुकी थीं.अर्जुन सिंहमध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री थे और उन दिनों प्रदेश के संस्कृति विभाग की कमान उत्सवधर्मी कवि, आलोचक और बिरले प्रशासक अशोक वाजपेयीके हांथों में थी. इतिहास अब हमारे सामने है और हम यह जानते हैं कि सन १९७५ से १९८० तक, इंदिरा गाँधी पांच वर्षों के इस समय में अपने आत्मिक और नैतिक संघर्षों के बीच, अपने राजनैतिक जीवन के सबसे ज्यादा अन्धकार और अहंकार भरे क्षणों में थीं. आजाद भारत के इतिहास में आपातकाल का समय प्रजातांत्रिक उहापोह के मध्यनैतिक मूल्यों कीपराजय और प्रतिघात का समय बन चुका था. राष्ट्रपिता महात्मागांधीऔर गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोरके निर्मल सानिध्य में पली-बड़ी प्रियदर्शिनी इंदिरा अराजकता के इसी काल-खंड में अंततः तानाशाह भी कहलायीं. लेकिनक्या पांच वर्षों के इसी समय में, १९७७ का चुनाव हारने के बाद इंदिरा गांधी संभवतः अपने आत्म-चिंतन में,पूर्व में घट चुकीं राजनैतिक गलतियों के शोधन और सत्ता में अपनी वापिसी की छटपटाहट के साथ वे कोई अन्य स्वप्न भी बुन रहीं थीं ? वह स्वप्न, जिसका एक सिरा शान्तिनिकेतन में बने उनके मानस में लिप्त है तो वहीँ दूसरी ओर उसी स्वप्न का दूसरा छोर गाँधी-दर्शन में पगा है. भारतीय परंपरा में जिस प्रकार से संस्कारों को सबसे उच्च स्थान दिया जाता है यहउनके उन्ही संस्कारों से बने रुझानों से उपजा स्वप्न था. वे १९७२ से यह चाहतीं थीं कि उनके सत्ता काल में भारत में कहीं परएक ऐसा सांस्कृतिक केंद्र बने जिसकी एक छत के नीचे भारतीय लोक-चिंतन, उसके विमर्श और विभिन्न कलाओं का पूर्ण वितान स्थापित हो सके. ऐसा स्थान जिसे 'भारत-भवनकहा जा सके (हालांकि यह नामकरण अशोक वाजपेयी ने किया था).
अशोक वाजपेयी

गौरतलब तथ्य यह है कि आपातकाल के अंत और इंदिरा गाँधी की हत्या के मध्य मात्र ७ वर्षों का अंतराल है. आपातकाल और १९७७ ही हार के बादवे १९८० में जब फिर से प्रधानमन्त्री बनीं तो उसके ठीक दो वर्षों के बाद, १३ फरवरी १९८२को भारत-भवन लोकार्पित कर दिया था. यह अशोक वाजपेयीकी सलाह और उस पर मुख्यमंत्री अर्जुन सिंहकी तत्परता से बना दुर्लभ संयोग था जिसने इंदिरा जी के उस अधूरे स्वप्न को भारत के केंद्र में, उसकी ह्रदय-स्थली मध्यप्रदेश में स्थाई स्थानदिला दिया था. इस अभूतपूर्व काम के लिए मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल को उपयुक्त स्थान माना गया.१९८२ में जब इंदिरा जी ने भारत-भवन का उद्घाटन किया था तो उसकी भव्यता के साथ उसकी सादगी के वैभव को देख कर वे चकित थीं. जल्दी ही भारत-भवन भारतीय कलाओं और विचारों का अद्भुत प्रज्ञा-परिसर बन गया था. यह कलाओं के सन्दर्भ, आधुनिक भारत की छवि के सन्दर्भ और प्रदेश की नयी सांस्कृतिक पहचान के सन्दर्भ में एक बड़ी घटना तो थी ही लेकिन साथ ही यह एक प्रकार से दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों के बरक्स संस्कृति के माध्यम से उनके विकेंद्रीकरण की पहली प्रादेशिक कोशिश भी थी.

जगदीश स्वामीनाथन
भारत-भवन ने समझौतों की प्रवृत्तियों से दूर रह करसिर्फ गुणवत्ता के आधार पर जल्दी ही पूरे देश ही नहीं बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर अपनी कीर्ति-ध्वजा को स्थापित कर लिया था. देखते ही देखते भारत-भवन कलाओं और भारतीय विमर्श का एक समकालीन मंदिर बन गया था. निश्चित ही भारत-भवन जैसी संस्था रातों-रात नहीं बनतीं. एक इमारत तो २ सालों में खड़ी हो सकती है लेकिन एक ठोस-विचार को विश्वास में बदलने में समय लगता है. हम जानते हैं कि भारत-भवन की प्राण-प्रतिष्ठा में, उसकी उड़ान में अशोक वाजपेयीऔर जगदीश स्वामीनाथनके युग्म ने अभूतपूर्व काम किया था. लेकिन अभी इस लेख का उद्देश्य भारत-भवन से इस अतुलनीय युग्म के योगदान को याद करने का न होकर इंदिरा गाँधी के द्वारा १९७२ में देखे अपने स्वप्न को सच्चाई में ढालने पर केन्द्रित है.क्या १९७७ से १९७९ के बीच उन दो वर्षों की छटपटाहट में, संताप की इस अवधि में इंदिरा गाँधी को वह बोध नहीं हुआ होगा जब वे सत्ता से उखाड़ फेंक दी गयीं थीं ? आखिर, तब उनके पास आपातकाल की कालिख के अलावा और क्याबचा था ? वहकालिख, जिसेक्षमायाचना के रूप में सिर्फ भारत-भवन जैसी संस्था की विभूति ही भस्म कर सकती थी. यह भी संयोग है कि इसके दो वर्ष बाद, १९८४ में इंदिरा गाँधी की नृशंष हत्या कर दी जाती है. यह अपने आप में एक शोध का विषय हो सकता है कि क्या भारत-भवन इंदिरा गांधी के प्रायश्चित का परिणाम था?

अपने शासन काल में आपातकाल को लागू करने से जिस लोकतंत्र की हत्या उनके हांथों से हुई थी क्या उसका पश्चाताप उन्होंने 'भारत-भवन'नाम के सांस्कृतिक पुष्प को वापिस लोकतंत्र में चरणों में अर्पित करके किया था ? लेकिन हम यह न भूलें कि भारतीय सन्दर्भ में पश्चाताप, आत्म-बोध से आत्म-शुद्धि का मार्ग प्रशस्त करता है. यहाँ हमें उसे ईसाई धर्म के सन्दर्भ से आत्म-ग्लानी से अलग रखना होगा.


मैं यह बात साफ़ कर दूं कि मेरे मन में भारत-भवन के रूप में इंदिरा जी के प्रायश्चित की संभावना का विचार ७० के दशक में घटी राजनीति से उपजा है. अब, जब न इंदिराजी जीवित हैं और न ही भारत-भवन उस तरह से प्रासंगिक बचा है तो यह मुझे उस समय की घटनाओं के आधार पर यह सोचने को बाध्य करता है कि आखिर क्यों एक ऐसी अभूतपूर्व संस्था को हम नहीं बचा पाए? भारत-भवन को तोड़ने में, उसके ओज को तहस-नहस करने में उस समय मध्य-प्रदेश की राजनीति ने कोई कसर नहीं छोड़ी. शुरुआत से भारत-भवन की दीवारें बाहर से तो राजनैतिक परछाइयों से घिरीं ही रहीं लेकिन जब तक अशोक वाजपेयी वहाँ रहे उन्होंने उन्हें भीतर नहीं आने दिया. अशोक वाजपेयी के जाते ही और सत्ता के बदलते ही जैसे बाहर खड़े भुतवा साए भारत-भवन के गलियारों में प्रविष्ट कर गए. इन राजनैतिक प्रविष्टियों को साफ़-साफ़ देखा जा सकता था. इसी कारण से मेरे मन में इंदिरा जी के प्रायश्चित का यह विचार आया और मैंने उसे राजनैतिक प्रायश्चित कहा है अन्यथा भारत-भवन जैसी संस्था को राजनैतिक-रण बनाए की क्या आवश्यकता थी ? वैसे भी सांस्कृतिक संस्थानों के प्रति सरकारों का जो रवैया रहा आया है वह हम सभी जानते हैं. ऐसे में म.प्र. में सत्ता के बदलते ही सिर्फ इसी संस्था के प्रति सरकार के मन में आक्रोश या बदले की भावना क्यों जागी ?

इस बिंदु पर आकर मुझे यही लगता है कि वह इंदिरा जी की हत्या के पहले एक प्रकार से उनका अंतिम और बेहद सफल सामजिक योगदान थाजिसके पीछे उनका १९७२ से पाला हुआ दिव्य-स्वप्न था जिसे तहस-नहस करने में नयी सरकार ने बड़ी चुस्ती दिखाई. जाहिर है अगर नयी सरकार की दिलचस्पी संस्कृति में होती तो ऐसा नहीं होता. लेकिन सरकार की दिलचस्पी संस्कृति में न होकर इंदिरा गांधी के काल में हुई इस मौलिक उपलब्धि को नेस्तनाबूत करने में थी, उसने वैसा कर दिया. जैसा भारत-भवन के साथ हुआ वैसी किसी अन्य संस्था के साथ नहीं हुआ था. यह एक सरकार का एक संस्था के निमित्त से एक व्यक्ति से बदला था. एक व्यक्ति, जिसने संभवतः उसी संस्था के निम्मित से पूर्व में हुयीं गलतियों का राजनैतिक प्रायश्चित किया होगा (विशेषकर आपातकाल). यह व्यक्तिगत रूप से मेरे लिए व्यथित करने के लिए काफी है,चूँकि, मैं अपने आप को भारत-भवन का परिणाम मानता हूँयह देख कर दुःख होता है कि हमारी बाद की युवा पीड़ी को अब उसके खँडहर और इतिहास के अलावा कुछ नहीं मिल सकता.क्या यह एक राजनेता के जीवन में आत्म-बोध से अपने संस्कारों की पृष्ठभूमि में की गयी आत्म-शुद्धि का अभूतपूर्व उदहारण को भी खोने जैसा नहीं होगा ?
________________
मनीष पुष्कले चित्रकार है और दिल्ली मेंहौज़ खास में रहते हैं. जन्म १९७३ म.प्र. के भोपाल में हुआ. मनीष कभी-कभी अपने रंगों से बिदक कर अपनी कलम से शब्दों को तराशते हैं. अपनी शिक्षा से मनीष भूगर्भ शास्त्री हैं.
प्रख्यात चित्रकार रज़ा के प्रिय शिष्य रहे और और उन्ही के द्वारा स्थापित रजा न्यास के आप न्यासी भी हैं. मनीष ने यशस्वी कथा-शिल्पी कृष्ण बलदेव वैद को समर्पित वैद सम्मान की स्थापना की है जिसके अंतर्गत अभी तक ५ लेखकों को समानित किया जा चुका है ! मनीष ने इसके अलावा 'सफ़ेद-साखी' (पियूष दईया के साथ चित्र-तत्व चिंतन), "को देखता रहा' (विभिन्न विषयों पर लिखे लेखों का संकलन)अकथ'(अशोक वाजपेयी को लिखे पत्रों का संपादन ) और हाल ही में "आगे जो पीछे था "नाम का एक उपन्यास भी लिखा है.
manishpushkale@gmail.com

भाष्य : दूधनाथ सिंह की कविता : सदाशिव श्रोत्रिय

$
0
0










आलोचक–कथाकार दूधनाथ सिंह (1936-2018) को तो हम सब जानते हैं पर कवि दूधनाथ के विषय में अल्प चर्चा  देखने को मिलती है.

उनकी स्मृति में सदाशिव श्रोत्रिय ने अर्थगर्भित आलेख लिखा है.  दूधनाथ सिंह की एक लम्बी कविता है ‘कृष्णकान्त की खोज में दिल्ली-यात्रा’ जो कवि श्रीकांत वर्मा को केंद्र  में रख कर लिखी गयी है और क्षोभ और गुस्से में लिखी गयी कविता है. सदाशिव श्रोत्रियने इस कविता का रेशा – रेशा खोल दिया है.                            
इससे बेहतर दूधनाथ सिंह को याद करने का और क्या तरीका हो सकता है.



दूधनाथ सिंह

कृष्णकान्त की खोज में दिल्ली-यात्रा                             
सदाशिव श्रोत्रिय 



मुझे अफ़सोस है कि मैं यह लेख  दूधनाथ सिंह जी के जीवनकाल में  नहीं लिख  पाया. मुझे हमेशा यह महसूस होता रहा कि दूधनाथ जी की काव्य-उपलब्धियों पर जितनी चर्चा होनी चाहिए उतनी शायद  हुई नहीं.  उनकी कुछ कविताएँ  मुझे सचमुच बेजोड़  लगती हैं.

दूधनाथ जी से मेरा सम्बन्ध मोटे तौर पर लेखक-पाठक का ही रहा. धर्मयुग  में 1964 में प्रकाशित उनकी एक कविता युवा खुशबू  की कतरन को मैं लम्बे समय तक अपने पास सम्हाल कर रखे रहा. मैं जब भी उनसे पूछता कि वह कविता उनके किस संग्रह में है तो वे उनके 1977 में प्रकाशित उनके काव्य-संग्रह एक और भी आदमी है  का नाम लेते थे. पर जब कई वर्षों बाद उसमें भी न पाकर वह कविता मैंने उनके पास भेजी तो वे कहने लगे कि यदि यह बात मैंने उन्हें न बताई होती तो वे उसे किसी अन्य कवि की ही  एक उत्कृष्ट प्रेम कविता  समझते. उनके रचना-चयन अपनी शताब्दी के नाम  में संकलित है. मेरी धरती  को भी मैं एक अद्भुत काव्य-रचना पाता हूँ. यही बात मैं  उनके काव्य-संग्रह एक और भी आदमी है   की तैमूरलंग,  कृष्णकान्त की खोज में दिल्ली यात्रा  तथा युवा खुशबू और अन्य रचनाएँ  में संकलित युवा खुशबू , नौहा, संगम पर गंगा, प्रजाकाम, आत्मा में ,पूर्वजआदि कई अन्य कविताओं के बारे में भी कह सकता हूँ .    

अपने जीवन काल में  दूधनाथ सिंह जी की पहली प्रतिबद्धता शायद  साहित्य के प्रति ही रही.  उनके तमाम जीवनानुभव  भी शायद  उनके लिए साहित्य-लेखन के लिए आवश्यक कच्चा मसाला बन कर रहे.  रचनात्मकता के क्षणों में उनकी स्मृति में संचित ये  अनुभव ही उन्हें किसी  साहित्यिक रचना के लिए आवश्यक सामग्री उपलब्ध करवाते थे.  लगता है कई बार अपने इस अनुभव-संसार को अधिक समृद्ध बनाने के लिए वे स्वयं प्रयत्न करते थे और इसके लिए आवश्यक जोखिम भी उठाते थे. 

दूधनाथ सिंह की कविता कृष्णकान्त की खोज में दिल्ली-यात्रा को मैं न सिर्फ़ हमारे समय की बेहतरीन लम्बी कविताओं में गिनता हूं बल्कि इसे हिंदी की एक श्रेष्ठ व्यंग्य काव्य–रचना (satire) के रूप में भी देखता हूँ . यदि एलेग्जेंडर पोप की व्यंग्य-रचना रैप ऑफ द लॉक  को अंग्रेज़ी साहित्य में एक महत्वपूर्ण रचना समझा जा सकता है तो कोई कारण नहीं कि दूधनाथ सिंह की इस रचना का शुमार  भी हिन्दी साहित्य की उत्कृष्ट व्यंग्य –रचनाओं में न  किया जाए. इस कविता का कोई भी पाठक महसूस कर सकता है कि यह कविता  अन्तःप्रेरणा के उस तीव्र आवेग में लिखी गई होगी  जो किसी भी काव्य-रचना को एक उम्दा  रचना बनाता ह. इस कविता के आरंभ से अंत तक यह रचनात्मक आवेग कहीं शिथिल नहीं होता और इसीलिए कविता की दीर्घता के बावजूद इसकी अन्विति पूरी तरह बनी रहती है. इसका कोई भाग बाद में  जोड़ा हुआ नहीं लगता और एक बार शुरू करने के बाद आप जब तक इसके अंत तक नहीं पहुँच जाते आपके मन में इसे पूरी करने की इच्छा बनी रहती है. यह अनुभूति किसी अत्यंत रोचक नाटक को मंच पर देखने जैसी है जिसमें दर्शक नाटक के अंत तक अपनी सीट से नहीं हिलता.


जैसा कि इस कविता के कलेवर और  भाषा से प्रकट है यह समूची कविता कवि द्वारा  अपने किसी  मित्र के प्रति  गुस्से  के भाव से  लिखी गई है.  इस कविता में वर्णित कृष्णकान्त कवि का ही कोई ऐसा मित्र लगता  है जिसने (कवि के दृष्टिकोण से ) उसके साथ किसी तरह का विश्वासघात किया है .
पाठक जब इस कविता को ध्यान से पढ़ता है तो उसे जल्दी ही इस बात का अनुमान हो जाता है कि इसमें वर्णित कृष्णकांत वास्तव में कौन है क्योंकि उस समय के बहुचर्चित कवि श्रीकांत वर्मा के काव्य-संग्रहों  भटका मेघ,दिनारम्भ और मायादर्पण   से, जिनका उल्लेख इस कविता में परोक्ष रूप से  निम्नांकित पंक्तियों में हुआ है, उस समय का कोई भी काव्य-पाठक अपरिचित नहीं था :

कृष्णकान्त – जो कविता की घाटी में
एक श्यामकर्ण बछेड़े की तरह भटक आया था
जिसका दिनारम्भ चारमीनार के धुएँ से होता था
जो अपने मायादर्पण में घुटता, बुड़बुड़ाता, किटकिटाता था
कृष्णकान्त, जो महिलाओं से क्षमा माँग
सड़क पर नंगा निकल जाता था
................
कविता के आरंभ में नॉर्थ एवेन्यू का ज़िक्र भी इस  कृष्णकांत की पहचान में मदद करता है क्योंकि श्रीकांत वर्मा का  दिल्ली में कुछ समय संसद सदस्या मिनिमाता अगम दास गुरु के नॉर्थ एवेन्यू स्थित फ्लैट में रहते हुए बीता था .

जो लोग श्रीकांत वर्मा के हुलिए से, उनकी कद-काठी से, और उनकी आदतों से परिचित थे उनके लिए भी  यह जानना मुश्किल नहीं था कि इस कविता की निम्नलिखित पंक्तियों में तंज़ किस व्यक्ति  पर किया जा  रहा है :

चाहे कृष्णकान्त चिंघाड़े भले नहीं
गुर्राता ज़रूर था
झूठ ही सही, पर अपने होने का
उसे कितना ख़ूबसूरत गु़रूर था !
कृष्णकान्त असभ्य था – पर मुझे पसंद था
कृष्णकान्त बौना था  - पर कटखौना था
वह सलाम का जवाब न देकर
धुएँ का लम्बा कश् छोड़ता था
लेकिन सामने वाले को जगह-जगह से तोड़ता था .

एक अच्छी व्यंग –रचना के लिए किसी कवि या लेखक का चरित्र-चित्रण में कुशल होना निहायत ज़रूरी है.  उसे  वर्णित  व्यक्ति की ख़ामियों के साथ साथ उसके चरित्र की  अन्य रोचक  विशेषताओं को देख पाने में भी समर्थ होना चाहिए. व्यंग का पात्र पाठक को विश्वसनीय भी  लगना चाहिए ; उसे लगना चाहिए कि हर मनुष्य में अच्छाइयों के साथ कुछ बुराइयाँ  भी होती हैं  और प्रलोभन व कमज़ोरी के क्षणों में हर आदमी कुछ  आलोच्य काम कर सकता है. भावों का वैविध्य भी किसी रचना को एक अच्छी रचना बनाने में रचनाकार की मदद करता है. इस कविता में कवि/पर्सोना  का स्वर लम्बे समय तक अपने मित्र के प्रति विश्वास और अविश्वास के बीच झूलता रहता है, और यह इस कविता को काफ़ी नाटकीय बना देता है.
अपने मित्र पर इस  व्यंग-कविता  के लिए दूधनाथ सिंह एक नकल (mock) यात्रा का रूपाकार  (form) चुनते हैं. इसका पर्सोना ग्रामीण परिवेश से आया कोई  ऐसा व्यक्ति  है जो मैत्री, विश्वसनीयता, आतिथ्य जैसे हमारे पारंपरिक मूल्यों में आस्था रखता है. दिल्ली के नॉर्थ एवेन्यू में रहने वाले अपने एक मित्र से उसके यहाँ टिकने का ठिकाना मिलने का भरोसा पाकर ही शायद वह दुबारा  दिल्ली आया है.  अपने इस मित्र को पिछली बार दिल्ली की सर्दी में ठिठुरते देख कर वह उसके लिए इस बार गाढ़े की  एक नई रज़ाई भी  ले  कर लाया है जिसे उसने शायद एक लट्ठ से बांध कर अपने कंधे पर टांग लिया है. अपने मित्र को खुश करने के लिए वह  उसकी पसंद की चारमीनार सिगरेट का एक पैकेट भी खरीद कर लाया है. पर  वह अपने इस दोस्त के यहाँ पहुंचने पर पाता है कि उसका दोस्त बगैर उसे कोई सूचना दिए यह घर छोड़ कहीं अन्यत्र चला गया है :

कुछ दिनों बाद जब दोबारा मैं नॉर्थ एवेन्यू गया
मेरी जेब में चारमीनार का एक पैकेट था
और कंधे पर गाढ़े की नयी रज़ाई थी.
लेकिन कृष्णकान्त वहाँ नहीं था.
अचानक एक औरत हरजाई
झुटपुटे में
         आँख मार
         बगल से निकल गई .

उपर्युक्त पंक्तियों में एक हरजाई औरत के झुटपुटे में आंख मार कर बगल से निकल जाने का ज़िक्र संभव है  कविता की रोचकता एवं नाटकीयता में कुछ वृद्धि के लिए ही किया गया हो.

अपने मित्र के बगैर किसी सूचना के इस तरह अचानक गायब हो जाने से कवि/पर्सोना  का विचलित होना स्वाभाविक है  क्योंकि  शाम का वक़्त है और लगता है  कवि के लिए दिल्ली में अपने टिकने के लिए  इस मित्र के अलावा  कोई अन्य ठिकाना नहीं है :

वह खिड़की बंद थी
जिसकी सलाखों के बीच से
कृष्णकान्त थूकता था ;
वह बरामदा सन्नाता था
जिसमें गड़ा हुआ-वह
              अपना दिल
              फूंकता था .

मैंने सोचा –कहाँ गई
कृष्णकान्त की वह टेलचट् रज़ाई
जिसकी रूई का फाहा
वह दुनिया के घावों पर रखता था
( जब –जब उसका नन्हाँ माथा दुखता था )
कहाँ गया चारमीनार का वह ख़ाली पैकेट
जिसमें वह अपनी बीमार नफ़रत
                    की राख़
                    झाड़ता था . 

कृष्णकांत के हालात का यह वर्णन उसकी मध्यवर्गीय पृष्ठभूमि और उसके  ग़रीबों और वंचितों का पक्षधर होने का आभास देता है. किन्तु उसके इस तरह बिना सूचना इस तरह अचानक गायब हो जाने ने पर्सोना को परेशानी में डाल दिया है और इसीलिए उसका स्वर कृष्णकांत के प्रति तीखा होता  जाता है :

कहाँ चला गया कृष्णकान्त !
दिल्ली के चमकते नाबदान
से बाहर- वह
आखिर कहाँ
चला गया !
तार-तार फटी रज़ाई में
दिल की थिगलियाँ लगाता
चिमनी की तरह दिन-रात
धुआँ उगलता
सनसनाता
वह किन आसमानों में
जाकर अचानक
फट गया

कवि के मन  का उद्वेग  जैसे जैसे बढ़ता है वैसे वैसे ही उसका  स्वर  और अधिक क्रोधपूर्ण और  बेधक  हो जाता है :

कृष्णकान्त –जिसकी आँखों में तेज़ाब था
जो सारे दोस्तों पर शक की पेशाब करता था
और पैन्ट के बटन तक नहीं बंद करता था
कृष्णकान्त- जो सूअर की चर्बी की तरह
गर्मियों में टिघलता था
और सर्दियों में मैल की तरह गुड़ी-मुड़ी
दिल्ली की आँतों में जम जाता था

पर जैसे जैसे  रात गहराने लगती है  कविता के पर्सोना  का गुस्सा निराशा, अनिश्चितता और  भय में तब्दील होने लगता है :

तभी सड़कें रोशनी के पानी में डबडबाने लगीं
दिल्ली के जगमगाते अँधेरे का खेल शुरू हो गया
अपनी सदियों की नैतिक गठरी उठाए – थका
मैं उदास हो गया .
कृष्णकान्त को ढूँढना असंभव है
रास्ते अपरिचित हैं – ठण्ड है
हर जगह आदमी के गह्वर हैं
आखिर कहाँ चला गया यह साला कृष्णकान्त !

कविता के इस बिंदु से कवि इसमें फैंटेसी का एक नया तत्व जोड़  देता है जो इसे यथार्थ से ऊपर उठा कर स्वप्न और कल्पना की सुर्रेअलिस्टिक  दुनिया में  ले जाता है :

सड़क-दर-सड़क रोशनी के फफूँद हटाता उदास
मैं चला जा रहा था कि तभी –अचानक
वह आदमी दिखा –
संसद –भवन का तेज़ – तेज़ चक्कर लगाता हुआ
मैंने पुकारा –‘कृष्णकान्त, कृष्णकान्त, कृष्णकान्त’
वह घूमा और फिल्ल- से हँस दिया .
मैंने कहा, ‘क्षमा करें, ग़लती हुई ,आप
कृष्णकान्त नहीं हैं .’

फैंटेसी का यह नया  तत्व  कविता की अगली पंक्तियों में और अधिक गहरा  हो जाता है :

...उस आदमी ने कहा  – ‘मैं
कृष्णकांत को जानता हूँ – पर उसे
संसद-भवन के आसपास ढूँढना बेकार है .’
‘ क्यों ‘, मैंने कहा .
उसने कहा – ‘आज इतवार है .’
मैंने कहा ,‘आइए , फिर सोमवार तक यहीं इंतजार करें .’
लेकिन तभी मैंने सोचा वह सोमवार ! मान लो अगर
न आये , अगर कभी न आये
और हम अपने खोये हुए भाई के लिए
चोर की तरह यहाँ मडरायें
दिल्ली के पत्थर-दिल में
सेंध लगायें , और धर लिये जायँ ....
नहीं ,यहाँ नहीं – यहाँ एक अमूर्त पहरा है
समय यहाँ गूंगा है – बहरा है .
चलिए उसे कहीं और ढूंढें –
कहाँ घुस गया वह !
इतनी हवा क्यों पी ली
उस दुनिया के दुश्मन और ब्रह्माण्ड के दोस्त ने
कि गुब्बारे की तरह फुस्स हो गया  !

श्रीकांत वर्मा
मित्र की इस दगाबाज़ी के बावजूद पर्सोना का उसमें विश्वास कविता के इस बिंदु तक पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है. उसे लगता है उसका भटका हुआ दोस्त उसे अंततः वापस मिल जाएगा.  पर्सोना और कृष्णकान्त के  मित्रों के बीच हुए संवाद की  विचित्र  प्रकृति से स्वप्नलोक और फैंटेसी के  प्रभाव को जारी रखते हुए कवि इस कविता को कुशलता से आगे बढ़ाता है और साथ ही परोक्ष रूप से उस आत्मकेंद्रितता, अवसरवादिता  और  साथियों के हालात के प्रति उदासीनता पर भी व्यंग करता है  जो किसी महानगर में  कैरियर तलाशते व्यक्तियों  में आम तौर पर देखी जा सकती है :

हमने योगेश गुप्त से पूछा , ‘कृष्णकांत कहाँ है ?’
‘मेरी आँतों में अल्सर है .’
हमने राजीव सक्सेना से पूछा , ‘कृष्णकांत कहाँ है ?’
‘कोई भी यहाँ क्या अनश्वर है ?’
हमने मोहन राकेश से पूछा , ‘कृष्णकांत कहाँ है ?’
‘छोड़ यार, होगा रघुवीर सहाय की कार में !’
हमने रघुवीर सहाय से पूछा - ‘कृष्णकांत कहाँ है ?’
‘ भारत जी के साथ मझधार में ’
..........
...........
किसी ने कहा –अकबर रोड –फिर औरंगज़ेब
फिर पंचशील फिर बहादुरशाह ज़फर मार्ग ,
फिर चाणक्यपुरी, कुतुबमीनार –
बाप रे बाप –इतिहास में इस तरह
आगे और पीछे और आगे और पीछे और आगे
शंटिंग – दर –शंटिंग –दर –शंटिंग –दर –शंटिंग
धुँआए हुए काले इंजन की तरह हमारा कृष्णकांत
            दिल्ली के किस तहख़ाने के
            किस काले यार्ड में चुपचाप
            खड़ा होगा ?    
  
प्रेरणा और रचनात्मकता के क्षणों में कोई कवि अपने पास के कच्चे मसाले को किस तरह एक रोचक कविता की रचना के लिए इस्तेमाल करता है इसे उपर्युक्त पंक्तियों में भली भांति देखा जा सकता है. विश्वास, अविश्वास, संदेह, चिंता, अनिश्चितता, भय ,उद्वेग आदि अनेक भावों का खेल इनमें और कविता की  अगली कुछ पंक्तियों में देखा जा सकता है .  कवि/पर्सोना को अब भी विश्वास है कि उसका मित्र उसके साथ धोका नहीं कर सकता. उसे अब भी अपने इस मित्र की  सुरक्षा की चिंता है. उसे लगता है किसी ने उसके दोस्त को बरगला दिया है और उसे ग़लत किस्म की विचारधारा और जीवन –मूल्यों को स्वीकार करने के लिए राज़ी कर लिया है .

नहीं , ये सब लोग हमें टरका रहे हैं
किसी रहस्यमय सत्य को ताश के पत्तों की तरह
सड़क-दर-सड़क-मकान-दर –मकान
चिकने शब्दों में सरका रहे हैं
जैसे भाई से भाई के मौत की दारुण खबर
नहीं ,कृष्णकांत को इस तरह का
नृत्य-नाट्य कभी नहीं आया
उसने दूसरों का दिल और दिमाग कभी नहीं चबाया
वह तो रोज़ –रोज़ अपने को खाता था
और घायल सिपाही की तरह एक खंदक से कूदकर
दूसरी खंदक तक जाता था .
............
वह भूख लग आने पर डंड पेलता था
और सिग्रेट ख़त्म होने पर नज़फ़गढ़ का नाला हेलता था .
नहीं ,कृष्णकांत ऐसी जगहों में नहीं होगा
वह – वहीं कहीं , वहीं कहीं ,वहीं कहीं होगा
जहाँ वह पहले था – सही –सलामत .
कुढ़ता ,तड़पता ,लजाता ,बुदबुदाता
दिल्ली के सड़े तालाब में
       झख् मारता .

दूधनाथ सिंह को शायद कविता में वर्णित अपने अनुभवों के इस मोड़ पर पहुँचने तक भी यह विश्वास नहीं हुआ होगा  कि अब तक साहित्य,दर्शन और प्रगतिशील विचारधारा  का दम भरने वाला उनका दोस्त श्रीकांत अब राजनीतिक दृष्टि से   किसी दूसरी ही  विचारधारा  के खेमे में चला गया  है :

मैंने उस आदमी से कहा , ‘सुनिए, मुझे मालूम है
मैं अपने भाई की आदतों से बचपन से परिचित हूँ –
वह पराठेवाली गली में होगा
वह जहाँ भी होगा , एक दार्शनिक चलाचली में होगा
वह जमुना के कगार पर होगा
या ग़ालिब की मज़ार पर होगा
कृष्णकांत रोशनारा रोड के कबाड़ख़ाने में होगा
या जी० बी० रोड के सड़े जनानखाने में होगा
वह जामा मस्जिद के पीछे कबाब खा  रहा होगा
और कुल्हड़ में सौंफिया पी रहा होगा
कृष्णकांत सरदार जी के होटल में आग ताप रहा होगा
और मैली रज़ाई में थर-थर काँप रहा होगा
............
वह त्रिवेणी –कला –संगम की घास पर ऐंठा होगा
वह सप्रू –हाउस के कैन्टीन में होगा
और मुक्तिबोध की अंतरात्मा की गहरी छानबीन में होगा
................
वह शहडोल में डोल रहा होगा
या दमोह के मोह में नर्मदा को घँघोल रहा होगा .
सुनिए – कृष्णकांत वहीं कहीं , वहीं कहीं
अपने पुराने हौज़ –ख़ास से निकलकर
रहीम ख़ानख़ाना के मक़बरे के आसपास
कहीं अपना दुख
सूखे पत्थरों की तह में
दबा रहा होगा
और आत्महीन दिल्ली को –
आत्मा का रहस्य
बता रहा होगा .

हम अनेक कविताओं को इस वजह से याद करते हैं कि तीव्र रचनात्मकता के क्षणों में उन कविताओं को रचते हुए एक से एक अद्भुत किन्तु एक दूसरे  से परस्पर संयुक्त अनेक बिम्ब उनके रचनाकारों के मन में एक साथ उभरे थे. यह बात यदि नज़ीर अकबराबादी की सुप्रसिद्ध नज़्म बन्जारानामा  पर लागू होती है तो भवानीप्रसाद मिश्र की सतपुड़ा के घने जंगल   और अज्ञेय की असाध्य वीणा  पर भी. दूधनाथ सिंह की इस कविता में भी परस्पर जुड़े हुए बिम्बों का इस तरह का संयोजन उपर्युक्त पंक्तियों में  देखते ही बनता है .
कविता में इस बिंदु से एक नया मोड़ आता है जो इसे भ्रमनिवृत्ति ( disillusionment), निराशा और दुःखान्तिका (tragedy) की दिशा में ले जाता है :

मेरे इस हठ से वह साथ का आदमी चकराया
फिर हँस दिया . ‘महाशय , आप किस ख़ब्त में हैं
आपका भाई कहाँ है और आप किस वक़्त में हैं
लट्ठ में रज़ाई टाँगे आप दिल्ली हेल रहे हैं !
आपके वक्तव्यों से लगता है – आप
इंडिया-गेट पर गुल्ली-डंडा खेल रहे हैं .

बताइए , आपकी यात्रा का उद्देश्य क्या है ?
दिल्ली लोग यों ही नहीं आते
कि आयें और बेलगाम सच्चाई का हठ दिखलायें
और अपनी नैतिकता का कूड़ा जहाँ-तहाँ
खोलकर सरे-राह पसर जायें...

आप क्यों नहीं समझते
दिल्ली दरअसल एक ख़ूनी दरवाज़ा है
दिल्ली वक़्त की प्रेतात्मा है
दिल्ली मृतात्माओं की चमकती सल्तनत है .

इसी चमकती सल्तनत में बैठा है आपका
वह –कृष्णकांत !

हम कल्पना कर सकते हैं कि 1976 में कांग्रेस पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ कर जब श्रीकांत वर्मा राज्य सभा के सदस्य बने होंगे तो इस बात ने वामपंथी सोच वाले दूधनाथ सिंह जैसे उनके साथियों को काफ़ी निराश  किया होगा. इन साथियों को कभी यह उम्मीद नहीं रही होगी कि सत्ता का लोभ श्रीकांत जी को एक ऐसे  राजनीतिक दल का प्रवक्ता बना देगा जिसकी नीतियों में उनकी अब तक कोई आस्था नहीं रही थी. उनका ऐसा करना कवि के लिए किसी वैचारिक  विश्वासघात से कम नहीं रहा होगा .

पर दिल्ली सल्तनत का इतिहास सत्ता के लिए अपनों के साथ  विश्वासघात की अनेक घटनाओं से भरा पड़ा है, अतः कवि के लिए  इस विश्वासघात को भी उसी ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में व्याख्यायित करना  इस कविता को अपने स्वाभाविक अंजाम की ओर ले जाने जैसा था. कविता के अंत में पर्सोना का साथी उससे कहता है :

कृष्णकांत शासन के
कामता प्रसाद गुरु का नया व्याकरण है
कृष्णकांत , सत्ता के दिनकर का गुटका संस्करण है
देखिये – अपने कृष्णकांत को ध्यान से देखिये –
           गर्दन अब नहीं है
           चेहरा अब पीठ की तरफ़ घूम गया है .
           अतः अब हमेशा वह
           उल्टी दिशा में चलता है
           अपने नक़ली तख्ते-ताऊस पर बैठा
           हवा में नंगी तलवार भाँजता है
           अपने भाइयों को क़त्ल करता है
           और अपने को शहंशाह
                          कहता है .’ 

दूधनाथ सिंह ने  इस कविता द्वारा  श्रीकांत वर्मा पर जिस तरह का व्यंग किया उसने निश्चय रूप से श्रीकांतजी की छवि को उनके साहित्यप्रेमियों के बीच काफ़ी ख़राब किया होगा.  संभव है अपने पूर्व मित्र के प्रति उनके इस अनियंत्रित क्रोध और बेरहमी ने स्वयं दूधनाथ जी की छवि को उनके कुछ मित्रों के लिए काफ़ी भयजनक बना दिया हो. पर दूधनाथ सिंह की एक लेखकीय  विशेषता शायद यह भी थी कि क्रोध की स्थिति में उनकी रचनात्मक प्रतिभा औसत से अधिक तीव्र और सक्रिय  हो उठती थी.

संभव है  दूधनाथ सिंह को कभी  आगे चल कर स्वयं अपने  इस आक्रोश के लिए किसी किस्म का पछतावा रहा हो. इस सन्दर्भ में मैं उनके काव्य-संग्रह युवा खुशबू और अन्य कविताएँ  की अंतिम कविता १ जनवरी ,२००१ (पृष्ठ 120) से कुछ पंक्तियाँ यहाँ  उद्धृत करना चाहूँगा :

अभी कुछ दिन और रहूँगा तुम्हारे साथ, तुम्हारी ख़बरों के साथ
अभी कुछ दिन और बूढ़ा और धूमिल होऊँगा
अभी इधर के उजाले को ओट देकर देखना पड़ेगा
अभी और इंतज़ार करना होगा , नफ़रत को झेलना
और गुस्से को दबाने की कला सीखनी होगी .
..................
कुछ लोगों से कहना होगा , आपको पहचानता हूँ मैं थोड़ा-थोड़ा
दुनिया से दुनिया का अर्थ पूछना पड़ेगा
श्रीकांत वर्मा से बात करनी होगी .


श्रीकांत वर्मा की मृत्यु , जैसा सभी जानते हैं , 1986 में हो चुकी थी . अतः अब, जबकि दूधनाथ सिंह भी श्रीकांत वर्मा के पीछे पीछे इस  दुनिया से जा चुके हैं ,संभव है उन्होंने अपने इस पुराने मित्र से इस कविता के बारे में भी  कुछ बात कर ही ली हो.

__________

सदाशिव श्रोत्रिय
 (12 दिसम्बर 1941 को बिजयनगर, अजमेर) 
एंग्लो-वेल्श कवि आर. एस. टॉमस के लेखन पर  शोध कार्य.
राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालयनाथद्वारा के प्राचार्य पद से सेवा-निवृत्त (1999)

1989 में प्रथम काव्य-संग्रह प्रथमा तथा 1915 में दूसरा काव्य-संग्रह बावन कविताएं प्रकाशित
2011 में लेख संग्रह ‘मूल्य संक्रमण के दौर में’ तथा2013 में दूसरा निबंध संग्रह सतत विचार की ज़रूरत’ प्रकाशित. 
2014 में आचार्य निरंजननाथ विशिष्ट साहित्यकार सम्मान

स्पिक मैके से लगभग 15 वर्षों से जुड़े हुए हैं आदि
सम्पर्क:
आनन्द कुटीरनई हवेलीनाथद्वारा -313301
मोबाइल: 8290479063, 9352723690/ ईमेल: sadashivshrotriya1941@gmail

सबद भेद : कात्यायनी : मीना बुद्धिराजा

$
0
0






वे
हमें
हमारे वजूद की
याद दिलाते है.
अहसास कराते हैं.
एक वजूद वाली औरत को
प्यार करने का,
उस पर क़ाबू पाने का
मज़ा ही कुछ और है.
(जादू नहीं कविता : कात्यायनी)



देवी प्रसाद मिश्र की कविता पर मीना बुद्धिराजा के लिखे आलेख की प्रशंसा हुई है. यह आलेख आप समालोचन पर पढ़ सकते हैं.

समकालीन महत्वपूर्ण कवयित्री कात्यायनी की कविताओं पर प्रस्तुत यह आलेख भी लगन से तैयार किया गया है. कात्यायनी ने हमारे समय के हिस्र, बर्बर, जन विरोधी'और कुटिल चेहरे को जिस तरह से अपनी कविताओं में प्रत्यक्ष किया है वैसा और किसी ने नहीं किया है. जीवट और उनकी जिद उन्हें प्रतिबद्धता से विचलित नहीं होने देती है.




प्रतिबद्धता और संघर्ष के मोर्चे पर स्त्री-कविता : कात्यायनी              

मीना बुद्धिराजा







नुष्य की अनंत स्वप्न-आकांक्षाओं की विविधतापूर्ण अभिव्यक्ति के रूप में कविता हर समय और हर समाज में अपनी आमद दर्ज कराती रहती है.मायकोव्स्कीके शब्दों में  -

कवि हमेशा संसार का देनदार रहता है
व्यथाओं में ब्याज और जुर्माने अदा करता हुआ
और उन सबका
जिनके बारे मेंवह नहीं लिख सका

कवि के शब्द तुम्हारा पुनर्जीवन हैं.

कविता हमेशा वास्तविक दुनिया में रहते हुए भी इसे एक चुनौती के रूप मे स्वीकार करती है. प्रत्येक व्यवस्था में विसंगतियां हो सकती हैं, अपने को बहुत आदर्शवादी माननेवाली पंरपरावादी व्यवस्था में, पूंजीवादी व्यवस्था में और समाजवादी व्यवस्था में भी. बाह्य यथार्थ में कई बार जो दिखायी देता है वह वास्तविक नहीं होता और जब आंतरिक सतहों से उसका टकराव होता है तो एक नया गहन अर्थ सामने आता है. वास्तव मे कवि या लेखक ही उस अर्थपूर्ण जीवन की खोज और समीक्षा करता है और उससे साक्षात्कार करता है. अपनी प्रतिबद्धता के कारणवह व्यवस्था की विकृतियों को, अन्याय, शोषण, विडंबनाओं  और यातनाओं को पहचान पाता है.जीवन की सार्थकता को खोजे बिना एक रचनाकार की तरह वह कभी नहीं जी  सकता. हिंदी कविता के वर्तमान परिदृश्य में अब वैचारिक प्रतिबद्धता, प्रगतिशीलता और जनवादी सरोकारों को लेकर कवि और रचनाकार अपने अनुभवों, सूक्ष्म अतंर्दृष्टि और निज़ी ईमानदारी पर ज्यादा भरोसा करता है, किसी दल या संगठन विशेष पर नहीं. कविता किस तरह अपनी वास्तविक अस्मिता और संघर्षशील भूमिका को पुन:अर्जित कर पायेगी और अपने समय के अधिकार- तंत्र व सत्ता संरचना की आलोचक बन सकेगी, यह प्रश्न आज कविता में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है.


इक्कीसवीं सदी में सत्ता, राजनीति, समाज,संस्कृतिऔर शक्ति तंत्र की संरचनाओं के सम्मुख मानव की नियति को अभिव्यक्त करने वाले जो कठिन प्रश्न और मुद्दे उठे हैं, उनकी सबसे सार्थक, ज्वलंत और सशक्त अभिव्यक्ति करने में समर्थ और सक्षम कवयित्रियों मेंकात्यायनीका नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है. समकालीन कविता में नि:संदेह वह  अकेली ऐसी रचनाकार हैं जो बदलाव के कई मोर्चों पर सक्रिय हैं. उन्होने इस समय और समाज का भयावह, निर्मम,त्रासद और क्रूर यथार्थ देखा है इसीलिये उनमें अपनी कविता के औचित्य,उपादेयता और उत्तरदायित्व को लेकर ऐसा आत्मसघंर्ष है जो मुक्तिबोध के बाद विरल कवियों में मिलता है. हिंदी के सुप्रसिद्ध और वरिष्ठ कवि विष्णु खरेजी ने उनकी कविता के विषय में कहा है- 


समाज उनके सामने ईमान और कविता कुफ्र है,लेकिन दोनों से कोई निजात नहीं है- बल्कि हिंदी कविता के रेआलपोलिटीकसे वे एक लगातार बहस चलाये रहती हैं. यह दिलचस्प है कि उनकी चौंतीस कविताओं के शीर्षक में ही कविता शब्द आया है.’

चेहरों पर आंच,सात भाइयों के बीच चम्पा,जादू नहीं कविता, इस पौरूषपूर्ण समय में, फुटपाथ पर कुर्सी, राख अंधेरे की बारिश में जैसे महत्वपूर्ण कविता-संग्रहों में जहां एक तरफ कविता और उसमें क्रांतिधर्मी बदलाव के लिये संघर्ष के बीच तनावपूर्ण संबधो को लेकर वे कथ्य और कला- शिल्प को भी जोखिम में डाल देती हैं. वहीं आत्मसंघर्ष को रचना का केंद्रीय विचार मानते हुए व्यवस्था की विसंगतियों,कलावाद और कला की आत्मतुष्ट तटस्थता पर भी चोट करती हैं. निर्विवाद रूप से कात्यायनी हिंदी की समूची जुझारु,प्रतिबद्ध स्त्री-कविता में अपनी जागरूक और बेमिसालउपस्थिति बना चुकी हैं-

इस पौरूषपूर्ण समय में
संकल्प चाहिये
अदभुत-अन्तहीन
इस सान्द्र,क्रूरता भरे
अँधेरे में
जीना ही क्या कम है
एक स्त्री के लिये
जो वह
      रचने लगी
कविता !

दरअसल विचारधारा और इतिहास के अंत की घोषणा के इस समय में सामाजिक न्याय की अवधारणा,विकल्प के स्रोतों की तलाश, जनतंत्र मे उत्पीड़ितों के अधिकार,स्त्री-अस्मिता,सांस्कृतिक-साम्राज्यवाद और बाज़ारवाद का वर्तमान संकट, नवउदारवाद और भूमडंलीकरण तथा दुनिया के भविष्य के साथ मानवता से जुडे‌ गंभीर प्रश्नों पर भी कात्यायनी की कवितायें यथार्थवाद का एक नया रूप प्रस्तुत करती हैं. जो सिर्फ एक देश में ही सच्चे समाजवाद की सीमा से आगे बढ़कर पूरे विश्व में समाजवाद की परिकल्पना को विस्तृत करते हुए हिंदी के पाठकों को वहां तक ले जाती हैं. उनकी कविताओं में प्रखर राजनीतिक चेतना है और व्यापक सामाजिक चिंताएं भी. कात्यायनी अपनी रचनाशीलता में प्रतिरोध और विचार का जो नैरेटिव तैयार करती हैं,उसमें उनकी मूल चिंता वर्चस्ववादी शक्तियों के हाथों वैचारिक प्रतिबद्धता के बिक जाने की त्रासद नियति की विडंबना और अंतर्विरोध हैं.

समकालीन कविता में चिंतनविरोधी-अमूर्तता,सरोकार विहीन शैली,वैचारिक प्रतिक्रिया रहित प्रवृत्ति,सुविधापरस्त लेखन,अन्याय के प्रति तटस्थता, आत्ममुग्धता और विकल्पहीन रचनाशीलता के प्रति मुखर विद्रोह उनकी कविताओं का मुख्य केंद्र बिंदु है. सत्ता तंत्र के तमाम छ्द्म सिद्धातों, क्रूरताओं, प्रंपचोषड्यत्रों और कुटिल नृशंसताओं के सम्मुख वह मनुष्य की बुनियादी अस्मिता को बचा लेना चाहती हैं. जब तक व्यवस्था कमजोर, शोषित और पीड़ित मानव के अस्तित्व को उसका आत्मसम्मान नहीं देतीतब तक एक कवि के रूप में कात्यायनी मानती हैं कि कवि-कर्म उनके लिए जीवन युद्ध है और जीवन जीना किसी अथक संघर्ष से और किसी योद्धा के जीवन से कम नहीं है

यदि यह कविता बन सकी एक
थकी हुई मगर अजेय स्त्री की
पहचान तो यह कविता रहेगी
असमाप्त और यह दुनिया जब
तक रहेगी,चैन से नहीं रहेगी.

कात्यायनी अपनी रचना-प्रक्रिया के बारे मे कहती हैं कि- 

कविता जो स्वंय मानवीय जरूरत रही है मानवीय जरूरतों की तड़प पैदा करती हुई, वह प्रकृति से वर्चस्व विरोधी होती है और एक औजार भी होती है ,राज्य के शक्तिशाली रहस्य को भेदने-समझने का,जैसे कि जीवन के तमाम भेदों को जानने- समझने का.’

आगे वे कहती हैं-

 कविता को रहस्य बनाना उसे राज्यसत्ता के पक्ष मे खड़ा करना है. कविता को कर्मकाण्ड बनाना उसे कर्मकाण्ड के पक्ष मे खड़ा करना है, जैसे कि कविता को विद्रोही बनाना उसे विद्रोह के पक्ष मे खड़ा करना है.पर आज कविता एक माल है और माल के रूप मे कविता के अंत का संघर्ष भी समाजवाद के लिये संघर्ष का एक एजेंडा है.’   
स्मृति स्वप्न नहीं
    आशाएं भ्रम नहीं
    जगत मिथ्या नहीं
    कविता जादू नहीं
    सिर्फ कवि हम नहीं.

कात्यायनी ने कविता की पारंपरिक संस्कृति को बदला हैकविता में भाषिक वर्चस्व और आभिजात्यपन को तोड़ कर उसके लोकतांत्रिक स्वरूप को बनाए रखने का अनथक प्रयास किया है. एक विद्रोही कवयित्री के रूप में उन्होनें अभिजातपूर्ण और तथाकथित सभ्रांत भाषा की स्थापित व्यवस्था पर शक्तिशाली प्रहार किया है.कविता सहित समस्त रचनाशीलता के लिये इतिहास का कोई भी समय सरल या निरापद नहीं रहा,यह समय भी जटिल है और उतना ही कठिन भी. जबसे बाज़ारवाद और उदार पूंजीवाद ने बहुत सी जन-आकांक्षाओं के स्वपनों पर आघात किया है, तब से स्थितियां बहुत बदल गई हैं.

मानवता के दीर्घ विकासक्रम मे जो मूल्य हमने अर्जित किये थे, आज उन पर सबसे बड़ा संकट है. इसीलिये मानव-मूल्यों के पक्ष में चाहे रचनाकार हो या कविता, दोनो ही चुनौतियों से घिरे हैं. ऐसे में कविता लिखना और साधारण मनुष्य के पक्ष में निर्भीक और निष्पक्ष खड़े होना कात्यायनी की कविताओं की विश्वसनीयता और जनप्रतिबद्धता का प्रमाण है. विवेक का सहचर होना  कवि को आत्मनिर्णय का अधिकार देता है जो अपने आप में एक चुनौती है. ऐसी विकट स्थितियों में कोई सच बोलने का जोखिम उठा रहा है और अपने समय के सरोकारोंको ठीक से पहचान रहा है , जटिलताऑ से जूझ रहा है तो सामाजिक परिवर्तन की दिशा मे यह रचनाधर्मी शक्तियों का सबसे ज्यादा योगदान हो सकता है. कात्यायनी इसलिये कविता को बदलाव के हथियार के रूप में ,निर्मम यथार्थ से संघर्ष करने की एक बहुत बड़ी उम्मीद मानती हैं. विचारशून्यता के इस कठिन समय में भी वे उन सभी के प्रति आशान्वित हैं जिन्होने-
 
धारा के विरुद्ध तैरते उन तमाम लोगों को
जिन्होंने इस अँधेरे दौर में भी
न सपने देखने की आदत छोड़ी है
और न लड़ने की.
                      
सम्यक विवेक और संवेदनशीलता के अभाव में मनुष्य होने की जो पहचान और सार्थकता आज हमने खो दी है.संवादहीनता के इस युग में कात्यायनी की कवितायें अपने क्रांतिधर्मी अभियान से यही आश्वस्त करती हैं कि उपभोगवाद और सत्ता के वैभव और चकाचौंध के पीछे जो सघन अंधेरा है,वह जरूर छंटेगा. सभी प्रतिकूल सामाजिक,राजनीतिक, आर्थिक व्यवस्था की आँधियों मे भी उनकी कविता उम्मीद और स्वपनों की लौ निरंतर जलाये रखती हैं-

आ रही है ताप
जल रही है कहीं कोइ आग
चिनगियाँ उड़ती-चिटखती हैं
लगेगी क्या आग जंगल में?
आंच चेहरों पर चमकती है !

वैचारिक आंदोलन की इस प्रक्रिया में उनका मूल उद्देश्य मानव मात्र को बचाने और उसकी अस्मिता को केंद्र में प्रतिष्ठित करने का है. अकादमिक विमर्शों और चिंतन- लेखन के काल्पनिक रोमानी आकाश से उतरकर दुख:, शोषण, अन्याय और हर तरह के दमन के खिलाफ विचार और कर्म की ईमानदारी को कात्यायनी अनिवार्य मानती हैं. जड़ीभूत काव्य रूढ़ियों को तोड़कर वे अपनी राह स्वंय बनाती हैं और नयी-नयी अभिव्यक्तियों का अविष्कार करती हैं . अपनी कविता 2010 में निराशा, प्रेम , उदासी और रतजगे की कविता के बारे में कुछ राजनीतिक नोट्समें उनकी यह चिंतायें और जन सरोकारों के प्रति उनकी जवाबदेही स्पष्ट दिखाई देती है-

चीज़ें बहुत बदल चुकी हैंपर इतना निश्चय ही नहीं
कि राज्यसत्ता , पूंजी,श्रम,उत्पीड़न, रक्त,मृत्यु,बदलाव
और उम्मीदों के अर्थ बदल चुके हों.
अभिव्यक्ति अपने नए रूपों का संधान करती हुई
कहीं यथार्थ के उदगम से ही दूर हो गई है.
और हम ठोस तर्कों के साथ यह कहना चाहते हैं
कि शब्द अगर अपने कर्तव्यों से किनाराकशी करने लगें
तो पियानो पर कोई संगीत-रचना भी
राजनीतिक घोषणा पत्र की भूमिका निभा सकती है.


कात्यायनी हिंदी मे एकमात्र कवयित्री हैं जिन्होने एक नई वर्ग-चेतना अर्जित करते हुए अन्याय ग्रस्त,संघर्षरत,सर्वहारा समाज को कविता से जोड़ा है. वे कविता में और अपने जीवन में सिर्फ नारी मुक्ति ही नहीं,मानव मुक्ति के सक्रिय आंदोलन से भी जुड़ी हैं . इस अर्थ में उनकी कवितायें काव्य सौंदर्य के चातुर्य के लिये नहीं, बल्कि जन सरोकारों के लिये पढ़ी और याद रखी जायेंगी .

यह समय है
या राख और अँधेरे की बरसात
बेहतर है
आग लगे
जंगलों की ओर मुड़ जाना !

उनकी बहुत सी कवितायें जैसे सहिष्णु आदमी की कविता, आशावादी नागरिक की कविता,निराशा की कविता,एक असमाप्त कविता की अति प्राचीन पाण्डुलिपि,शोक- गीत, क्या स्थगित कर दें कविताएक फैसला फौरी तौर पर कविता के खिलाफ  मुख्यत: अपनी रचनात्मकता में समसामयिक तौर पर तमाम राजनीतिक और सामाजिक पक्षों के अतंर्विरोधों और जटिल यथार्थ की विडंबनाओंका सशक्त बयान हैं. कला, साहित्य और बुद्धिजीवियों मे वैचारिक प्रतिबद्धता के विचलन पर ईमानदार आत्मचिंतन और समय से मुठभेड़ करने  मेंउनकी कवितायें अप्रतिम हैं

एक बर्बर समय के विरुद्ध युद्ध का हमारा संकल्प
अभी भी बना हुआ है और हम सोचते रहते हैं कि
इस सदी को यूं ही व्यर्थ नहीं जाने दिया जाना चाहिये
फिर भी यह शंका लगी ही रहती है कि
कहीं कोई दीमक हमारी आत्मा में भी तो
प्रवेश नहीं कर गया है.
अपनी शंकाओं, आशंकाओं,भय और आत्मालोचन को
अगर बेहद सादगी और साहस के साथ
बयान कर दिया जाये
तो कला और शिल्प की कमजोरियों के बावज़ूद
एक आत्मीय और चिंतित करने वाली
काम चलाऊ, पठनीय कविता लिखी जा सकती है
भले ही वह महान कविता न हो.

एक रचनाकार के रूप में कात्यायनी में अपनी कवितामात्र के दायित्व और वैचारिक प्रासंगिकता को लेकर ऐसा जोखिम भरा आत्मसंघर्ष है ,जो वरिष्ठ कवि विष्णु खरे जी के शब्दों में मुक्तिबोध और धूमिल के बाद उन्ही में दिखाई देता है .कात्यायनी स्वीकार करती हैं कि ईमानदारी एक बार फिर से कविता की बुनियादी शर्त बनायी जानी चाहिये. उनकी कविता विचार शून्यता, संवेदनहीनता और शुष्कता के  यातना-शिविर में  उम्मीदों और स्वप्नों को बचाकर अपने वक्त की तमाम सरगर्मियों और जोखिम के एकदम बीचोबीच खड़ी है. कठिन से कठिन शर्तों पर भी आदमी बने रहने का प्रश्न हमेशा उन्हें तभी निरुत्तर कर देता है, जब भी वे कविता को स्थगित करने के बारे मे सोचती हैं. वर्तमान दौर के महत्वाकांक्षी, अवसरवादी,आत्ममुग्ध और सुविधा के नियमों से परिचालित समय में उनकी कवितायें अपनी वास्तविक अस्मिता, संघर्षशील और समझौता विहीन भूमिका के साथ भविष्य के लिये आश्वस्त करती हैं

ऐसा किया जाये कि
एक साज़िश रची जाये.
बारूदी सुरंगे बिछाकर
उड़ा दी जाये
चुप्पी की दुनिया.

कात्यायनी मानती हैं कि कविता मे एक उद्विग्न भावाकुल निराशा घुटन से भरे दु:स्वपन सरीखे दिनों से हमे बाहर लाती है और जीवित होने का अहसास कराती है.समय का इतिहास सिर्फ रात की गाथा नहीं,उम्मीदें यूटोपिया नहीं .आम सहमति पर पहुंचे हुए तथाकथित उच्च बुद्धिजीवी वर्ग पर वे कलावाद और उनकी आत्मतुष्ट तटस्थता पर निरंतर चोट करते हुए  एक  जुझारु और जागरूक कवयित्री के रूप मे बेमिसाल बनकर उपस्थित होती हैं.कविता के लिये संकट के समय में मुक्तिबोध की तरह वे इसे आवेग त्वरित काल-यात्रीमानती हैं और नेरुदा,नाज़िम हिकमत ,लोर्काब्रेख्त  जैसे कवियों की परंपरा से जोड़ते हुए इसे जनता के संघर्ष का प्रतिनिधि मानती हैं

दुनिया के तमाम देशों के तमाम आम लोगों तक
पहुंचेगी कविता
अलग अलग रास्तों से होकर
अलग अलग भेस में
और बतायेगी उस सबसे सुंदर दुनिया के बारे में
जो अभी भी हमने देखी नहीं है .

एक स्त्री कवि के रूप में स्त्री विमर्श का मामला उनके लिये व्यक्तिगत नहीं सामाजिक है. कात्यायनी मे यह विमर्श सतही ढ़ंग से नहीं , बल्कि स्त्री की अस्मिता, पह्चान, स्त्री का संघर्ष और पुरुषसत्तात्मक समय में तमाम स्तरों पर स्त्री-आबादी की जटिल संरचना से जुड़े सवालों  को लेकर भी है. उनकी कविताओं मे विद्रोह की आकांक्षा की ऐसी अभिव्यक्ति है,जो नये सिरे से स्त्री के स्वाभिमान और स्वाधीनता को स्थापित करती है. घोषित नारीवाद से अलग उनमें हमेशा समाज के बीच एक जीती-जागती संघर्ष करती स्त्री है. पुरुष मात्र को शत्रु या स्त्री विरोधी मानने के विपरीत वे स्त्री को भी पुरुष के समकक्ष मनुष्य का दर्ज़ा देने की बात कह्ती हैं . उनका मानना है कि इस समाज में कोई अंतिम सर्वहारा है तो वह नारी ही है. कात्यायनी ने स्त्री के अस्तित्वपरक और नियति संबधी प्रश्नो को सामाजिक- राजनैतिक चेहरों में पह्चाना है और उसे शेष संपूर्ण समाज से जोड़ा,जो उनकी एक अभूतपूर्व कोशिश है-

देह नहीं होती है
एक दिन स्त्री
और
उलट-पुलट जाती है
सारी दुनिया
अचानक !

इसी बीच उनकी कविता निरंतर विस्तृत और बुनियादी होती गई है और उसने नारी विमर्श के बंधेऔर स्वीकार्य ढ़ाचे को तोड़ा है . उनमें स्त्री गरिमा और संवेदना के रिश्ते और भी गहरे हुए हैं. कात्यायनी की अनेक कवितायें जैसे सात भाइयों के बीच चम्पाहाकी खेलती लड़कियां,इस स्त्री से डरोस्त्री का सोचना एकांत में,अपराजिता,देह ना होना, वह रचती है जीवन, भाषा मे छिप जाना स्त्री का  विविध स्तरों परनैतिकताओं  और पंरपराओं की आड़ मे स्त्री की मेधा, श्रम और शक्ति को अनदेखा करने वाली वर्चस्ववादी पौरुषपूर्णसत्ता की मानसिकता और विचारों से लगातार टकराती हैं

चैन की एक सांस लेने के लिये
स्त्री
अपने एकान्त को बुलाती है .
संवाद करती है उससे.
जैसे ही
वह सोचती है
एकान्त में
नतीजे तक पहुंचने से पहले ही
खतरनाक
       घोषित
         कर दी जाती है !

हिंदी के सुप्रसिद्ध और अप्रतिम कवि मंगलेश डबरालजी नें उनके जादू नहीं कवितासंकलन के बारे में कहा है-

कात्यायनी नारीवाद और मार्क्सवाद के बीच एक जटिल रचनात्मक रिश्ता कायम करती हैं , इसीलिये वह मूल रूप से एक स्त्री स्वर हैं लेकिन उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता और समाज को बदलने की बेचैनी भी उतनी ही सच्ची है और इसीलिये यह एक प्रतिबद्ध आवाज़ हैं लेकिन उनमें एक स्त्री की पीड़ा भी उतनी ही मूलभूत है.

उनमें एक उत्पीड़ित मनुष्यता का संघर्ष है जिसे एक स्त्री के शिल्प मे व्यक्त किया गया है और इस शिल्प मे एक गहरी लोकतांत्रिक चेतना है जो स्मृति और स्वपन के पारम्परिक बिंबों को भेदती हुई , कविता को ज़्यादा आमफहमज्यादा सामाजिक बनाती है .

समकालीन स्त्री कवियों में कात्यायनी की कवितायें एक अलग और विशिष्ट पह्चान रखती हैं. हमारे समय की त्रासदियों-विसंगतियों से भरे अँधेरे में निरंतर संघर्ष करते हुए वे यथास्थिति की निर्मम आलोचना और प्रतिगामी शक्तियों का कड़ा प्रतिरोध करती हैं, लेकिन उनके व्यापक दायरे  में प्रेम,दुख, उदासी और रोज़मर्रा के मानवीय जीवन के बहुविध रंगों की उपस्थिति भी है

प्यार है फिर भी
जीवित हठ की तरह
जैसे इतने शत्रुतापूर्ण माहौल में कविता
जैसे इतनी उदासी में विवेक.

उनकी कविता उनका अपना अविष्कार है. वह लिखती हैं

“हम रोज़ रोज़ के अपने जीवन में अपने समय के संकट से टकराते हैं,इसकी चुनौतियों को स्वीकारते हैं और उनसे जूझते हैं,एक कवि के आत्मसंघर्ष की व्याख्या मै इसी रूप मे करती हूं. यह दुर्निवार आत्मसंभवा अभिव्यक्ति की एक साहसिक खोजी यात्रा है . इसमें हताशा और थकान के कालखण्ड भी आते हैं तथा आह्लाद और उपलब्धियों के क्षण भी आते हैं.कभी एक कविता जन्म लेती है तो कभी सहसा सब कुछदृश्य पटल से ओझल हो जाता है और हमारे भीतर कभी तो एक कविता शुरू हो जाती है और कभी त्रासद विफलताओं के खाते में कुछ नयी प्रविष्टियाँ दर्ज़ हो जाती हैं .यूं जीवन चलता रहता है और कविता भी.

वे जो भाषा को बदलकर , शब्दों को मनमाने अर्थ देकर हमसे चीज़ों की पहचान छीनने की कोशिश कर रहे हैं,इतिहास उन्हे भीषण शाप देगा .कविता तो फिर भी हमेशा रहेगी .सच्ची कविता निजी स्वामित्व के खिलाफ है और सच्चा कवि भी . इसीलिये कवि को कभी कभी लड़ना भी होता है , बंदूक भी उठानी पड़ती है और फौरी तौर पर कविता के खिलाफ लगने वाले कुछ फैसले भी लेने पड़ते हैं . ऐसे दौर आते रहे हैं और आगे भी आयेगें.”


कात्यायनी की कवितायें तनाव , दुविधा,जोखिम और चुनौती से भरी सभी बीहड़ स्थितियों में अपने सृजन-कार्य को जीवन के सघन- सान्द्र दबावों के बीचों- बीच ही पूरा करती हैं. उनके जीवननुभव उनकी राजनीतिक- सामाजिक सक्रियता की देन हैं और उनकी कवितायें भी. वे अपनी कविता का कच्चा माल स्मृतियों और कल्पना की खदानों से लाती हैं, जिसके लिये उन्हीं के शब्दों मे उस खौलते हुए तरल धातु की नदी में उतरना होता है जो हमारी आसपास की ज़िंदगी है. अपूर्ण कामनाओं ,विद्रोहों,हार- जीत से भरी हुई,  सुंदर-असुंदर के द्वद्वांत्मक संघातों से उत्तप्त और गतिमान,यही हमारी उर्जा जैसी होती है .’  

कात्यायनी की कवितायें न केवल विषय-वैविध्य की दृष्टि से,बल्कि क्षितिज के विस्तार, संवेदना एवं चिंतन की गहराई तथा समाज के संश्लिष्ट भौतिक -आत्मिकयथार्थ के कलात्मक पुनर्सृजन की दृष्टि से भी हिंदी की समकालीनकविता मे विशिष्ट और सशक्त उपस्थिति हैं.
______

मीना बुद्धिराजा
हिंदी विभाग
अदिति महविद्यालय, बवाना , दिल्ली विश्वविद्यालय

स्पिनोज़ा : नीतिशास्त्र - ४ - (अनुवाद : प्रत्यूष पुष्कर, प्रचण्ड प्रवीर)

$
0
0


















महान दर्शनिक स्पिनोज़ा (24 November 1632 21 February 1677) की प्रसिद्ध कृति 'नीतिशास्त्र'(1677) के हिंदी अनुवाद का चुनौतीपूर्ण और गुरुतर कार्य  दो प्रतिभाशाली लेखक - प्रत्यूष पुष्कर और प्रचण्ड प्रवीर लगन से कर रहे हैं.
यह जटिल ग्रन्थ पांच खंडो में विभक्त है. अब पहले खंड Concerning God’ के अनुवाद का कार्य पूरा हुआ है.
इस में कितना श्रम लग रहा है यह आप इस अनुवाद को पढ़ कर समझ सकते हैं. इसका प्रकाशन हिंदी और दर्शन दोनों के लिए मूल्यवान है.

Part I.
Concerning God.
______________________________________ 

भाग
  
ll      ईश        के       बारे     में   ll
(चौथा हिस्सा)


PROP. XXVIII. Every individual thing, or everything which is finite and has a conditioned existence, cannot exist or be conditioned to act, unless it be conditioned for existence and action by a cause other than itself, which also is finite, and has a conditioned existence; and likewise this cause cannot in its turn exist, or be conditioned to act, unless it be conditioned for existence and action by another cause, which also is finite, and has a conditioned existence, and so on to infinity.


प्रस्तावना २८-  प्रत्येक चीज़, और वो सभी चीज़े जो परिमित हैं, सीमित हैं, जिनका अनुकूलित अस्तित्व है, वो कार्य करने या सत्ता में होने के लिए बाध्य नहीं की जा सकती, जबतक कि वह अनुकूलन किसी ऐसे कारण से ना हुआ हो, जो उनसे इतर हो, और ठीक उसी तरह से वह कारण भी तबतक अस्तित्व में नहीं हो सकता या कार्य नहीं कर सकता, जबतक कि वह स्वयं से इतर किसी कारण से अनुकूलित नहीं किया गया हो, वह कारण जो फिर से परिमित होगा, जिसका अपना एक अनुकूलित अस्तित्व होगा, आदि, आदि.


Proof. — Whatsoever is conditioned to exist and act, has been thus conditioned by God (by Prop. xxvi. and Prop. xxiv., Coroll.).
But that which is finite, and has a conditioned existence, cannot be produced by the absolute nature of any attribute of God; for whatsoever follows from the absolute nature of any attribute of God is infinite and eternal (by Prop. xxi.).


प्रमाण.- वह सबकुछ जो अस्तित्व में होने के लिए या कार्य करने के लिए अनुकूलित है, इसीलिए ईश के द्वारा अनुकूलित की गयी हैं (प्रस्तावना २६ और प्रस्तावना २४, उपप्रमेय से).

लेकिन वह जो परिमित है, और जिसका अनुकूलित अस्तित्व है, वह ईश के किसी गुणधर्म की नितांत प्रकृति द्वारा निर्मित नहीं हो सकता, क्यूंकि वह जो ईश के किसी गुणधर्म की नितांत प्रकृति से अवधारित है वह अपरिमित और शाश्वत है (प्रस्तावना २१से).


It must, therefore, follow from some attribute of God, in so far as the said attribute is considered as in some way modified; for substance and modes make up the sum total of existence (by Ax. i. and Def. iii., v.), while modes are merely modifications of the attributes of God. But from God, or from any of his attributes, in so far as the latter is modified by a modification infinite and eternal, a conditioned thing cannot follow. Wherefore it must follow from, or be conditioned for, existence and action by God or one of his attributes, in so far as the latter are modified by some modification which is finite, and has a conditioned existence. This is our first point. Again, this cause or this modification (for the reason by which we established the first part of this proof) must in its turn be conditioned by another cause, which also is finite, and has a conditioned existence, and, again, this last by another (for the same reason); and so on (for the same reason) to infinity. Q.E.D.

इसीलिए, अनिवार्यत:, यह ईश का ही कोई गुणधर्म होगा जो अबतक कही गयी बातों के अनुसार उपांतरित हो सकता है, कि सत्त्व और उसकी प्रणालियाँ मिलकर अस्तित्व का संगठन करती हैं (स्वयंसिद्ध १और परिभाषा ३ और ५ से), जहाँ प्रणालियाँ केवल ईश के गुणधर्मों का उपांतरण मात्र हैं. लेकिन ईश से या ईश के किसी गुणधर्म से, गुणधर्म जो कि किसी उपांतरण द्वारा उपांतरित है, जो अनंत और शाश्वत है, से किसी अनुकूलित चीज़ का अनुसरण असंभव है. इसीलिए वह अनुसरित या अनुकूलित की जा सकती है, अगर ईश के गुणधर्म, किसी ऐसे उपांतरण से उपान्तरित हो जो सीमित हो और जिसका अस्तित्व अनुकूलित हो. यह हमारी पहली बात है. फिर, यह कारण या यह उपांतरण (जिस तर्क से हमने इस प्रमाण का पहला हिस्सा यहाँ निर्धारित किया है) अपने में भी किसी दूसरे कारण से अनुकूलित होना होगा, जो फिर से सीमित होगा, या जिसका अनुकूलित अस्तित्व होगा,और वह कारण या वह उपांतरण फिर किसी दूसरे से अनंत तक दुहराता हुआ होगा.


Note. — As certain things must be produced immediately by God, namely those things which necessarily follow from his absolute nature, through the means of these primary attributes, which, nevertheless, can neither exist nor be conceived without God, it follows:— 1. That God is absolutely the proximate cause of those things immediately produced by him. I say absolutely, not after his kind, as is usually stated. For the effects of God cannot either exist or be conceived without a cause (Prop. xv. and Prop. xxiv. Coroll.). 2. That God cannot properly be styled the remote cause of individual things, except for the sake of distinguishing these from what he immediately produces, or rather from what follows from his absolute nature. For, by a remote cause, we understand a cause which is in no way conjoined to the effect. But all things which are, are in God, and so depend on God, that without him they can neither be nor be conceived.

नोट-कुछ चीज़ों का निर्माण सीधा ईश के द्वारा ही हुआ होगा, वो चीज़ें जो ईश के नितांत प्रकृति से अवधारित है, उसके प्राथमिक गुणधर्मों के माध्यम से, जो, किसी भी तरीके से, बिना ईश के ना तो सत्ता या अस्तित्व में हो सकती है, ना ही अवधारित ही की जा सकती है. इसके अनुसार,
            १. ईश उन सभी चीज़ों का समीपस्थ कारण है जो उसके द्वारा निर्मित हैं. ईश के प्रभाव चूँकि बिना किसी कारण के ना तो अवधारित है ना ही प्रभाव में है, इसीलिए मैं मैं उपरोक्त बात से पूर्णतया सहमत होऊंगा (प्रस्तावना १५और प्रस्तावना २४ उप प्रमेय से)


            २. ईशको प्रत्येक चीज़ का दूरस्थ कारण कह देना यथोचित नहीं होगा, तबतक जबतक कि उन्हें उन चीज़ों से पृथक ना किया जा रहा हो जो ईश ने तत्काल निर्मित की हो, या जो उसके नितांत प्रकृति से अवधारित हो. दूरस्थ कारण से हमारा मतलब उस कारण से है जो प्रभाव से किसी भी रूप में जुड़ा हुआ नहीं है. लेकिन जो भी चीज़े हैं, वो ईश में है, और ईश पर आश्रित हैं, और बिना उसके ना तो हो सकती हैं, ना ही अवधारित ही की जा सकती है.


PROP. XXIX. Nothing in the universe is contingent, but all things are conditioned to exist and operate in a particular manner by the necessity of the divine nature.


प्रस्तावना २९. ब्रह्माण्ड में कुछ भी आकस्मिक नहीं है, जबकि सभी चीज़ों को अस्तित्व में होने के लिए अनुकूलित किया गया है, दैवीय प्रकृति की अनिवार्यतों से एक विशेष रूप में संचालित होने के लिए. 

अंग्रेजी शब्दों के समानार्थक हिन्दी शब्द
contingent = आकस्मिक/ अनिश्चित/ दैववश


Proof. — Whatsoever is, is in God (Prop. xv.). But God cannot be called a thing contingent. For (by Prop. xi.) he exists necessarily, and not contingently. Further, the modes of the divine nature follow therefrom necessarily, and not contingently (Prop. xvi.); and they thus follow, whether we consider the divine nature absolutely, or whether we consider it as in any way conditioned to act (Prop. xxvii.). Further, God is not only the cause of these modes, in so far as they simply exist (by Prop. xxiv, Coroll.), but also in so far as they are considered as conditioned for operating in a particular manner (Prop. xxvi.).

प्रमाण. वह सब कुछ जो है, ईश में है (प्रस्तावना १५). लेकिन ईश को आकस्मिक नहीं कहा जा सकता. क्योंकि (प्रस्तावना ११ से) वह अनिवार्यत: अस्तित्व में है, ना कि आकस्मिक. आगे, दैवीय प्रकृति की प्रणालियाँ अनिवार्यत: हैं, आकस्मिक रूप से नहीं (प्रस्तावना १६); और वो उसी रूप में अनुगमन भी करती है अब चाहे हम इसे नितांत दैवीय प्रकृति माने, या यह माने कि वह ऐसे कार्य करने को बाध्य या अनुकूलित है (प्रस्तावना २७), और ईश इन प्रणालियों का कारण केवल इसीलिए नहीं है ताकि वो केवल अस्तित्व में हो सके, लेकिन इसलिए भी ताकि वो एक अनुकूलित निश्चित रूप  में कार्य भी कर सके (प्रस्तावना २६)


If they be not conditioned by God (Prop. xxvi.), it is impossible, and not contingent, that they should condition themselves; contrariwise, if they be conditioned by God, it is impossible, and not contingent, that they should render themselves unconditioned. Wherefore all things are conditioned by the necessity of the divine nature, not only to exist, but also to exist and operate in a particular manner, and there is nothing that is contingent. Q.E.D.

अगर वो ईश के द्वारा अनुकूलित नहीं की गयी हो तो (प्रस्तावना २६), यह असंभव है और आकस्मिक नहीं है कि वो स्वयं को अनुकूलित कर सके, इसके ठीक विपरीत, अगर वो ईश के द्वारा अनुकूलित की गयी हो तो यह असंभव है और आकस्मिक नहीं कि वह स्वयं को इस अनुकूलन या बाध्यता से मुक्त कर सके. जिस कारण से, सभी चीज़े दैवीय प्रकृति की आवश्यकताओं के द्वारा अनुकूलित की है, इसीलिए नहीं ताकि वो केवल अस्तित्व में हो सके, बल्कि इसीलिए भी ताकि वो अस्तित्व में होने के साथ-साथ कार्य भी कर सके, और कुछ भी ऐसा नहीं हो जो आकस्मिक हो.


Note. — Before going any further, I wish here to explain, what we should understand by nature viewed as active (natura naturans), and nature viewed as passive (natura naturata). I say to explain, or rather call attention to it, for I think that, from what has been said, it is sufficiently clear, that by nature viewed as active we should understand that which is in itself, and is conceived through itself, or those attributes of substance, which express eternal and infinite essence, in other words (Prop. xiv., Coroll. i., and Prop. xvii., Coroll. ii) God, in so far as he is considered as a free cause.



नोट. आगे कहीं भी जाने से पहले, मैं यह व्याख्या करना चाहता हूँ कि हमें ईश के सक्रिय रूप में देखे जाने से (नेचुरा नेचुरंस) और ईश के निष्क्रिय रूप में देखे जाने से क्या समझना चाहिए. मैं इस तरफ ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा कि, जो कहा गया है, उससे यह बात स्पष्ट है कि, ईश को सक्रिय रूप से देखे जाने से हमें यह समझना चाहिए कि वह जो स्वयं में है, स्वयं से अवधारित है, या सत्त्व के वो गुणधर्म जो, अपरिमितता और शाश्वतत्व को अभिव्यक्त करते हैं, दूसरे शब्दों में (प्रस्तावना १५, उप प्रमेय १, और प्रस्तावना १७, उपप्रमेय २ से) जिसे ईश कहते है, तबतक जबतक कि वह एक स्वतंत्र कारण के रूप में देखा जाए.


By nature viewed as passive I understand all that which follows from the necessity of the nature of God, or of any of the attributes of God, that is, all the modes of the attributes of God, in so far as they are considered as things which are in God, and which without God cannot exist or be conceived.

प्रकृति को निष्क्रिय रूप में देखने से मैं समझता हूँ कि वह जो ईश की प्रकृति की अनिवार्यताओं से अनुगमित है, या ईश के किसी गुणधर्म के,मतलब, ईश की गुणधर्मों की सभी प्रणालियों में, विद्यमान वो सभी चीज़े जो ईश में है, और जो बिना ईश के ना तो अस्तित्व में हो सकती है, ना अवधारित ही की जा सकती है.


{अनुवादक की टिप्पणी: हम यहाँ फिर याद दिलाना चाहेंगे कि काश्मीर शिवाद्वय और बौद्ध आचार्य धर्मकीर्ति कारणकार्यवादको जड़ वस्तुओं के अनुमान के संदर्भ में ही लेते हैं. हालांकि स्पिनोजा यहाँ जड़ और चेतन का भेद नहीं कर रहे है, लेकिन यहाँ तर्कों का साम्य सांख्य दर्शन जैसा बन रहा है, जिसमें जड़ चीजों को, यहाँ तक कि मन, बुद्धि और अहंकार को भी प्रकृति से उत्पन्न माना जाता है. वहाँ प्रकृति एक भिन्न तत्त्व इसलिए है कि उसकी उत्पत्ति नहीं मानी जाती. स्पिनोज़ा अपने ईश द्वारा सृष्टि के विचार में योगजनित सृष्टि को नकारने का प्रयास कर रहे हैं. परन्तु हम इस विचार करेंगे कि क्या यह उनके तर्कों से भी निगमित हो रहा है? शिवाद्वयवाद में और अन्य तांत्रिक शाखाओं में योगसृष्टि योगी द्वारा की गयी सृष्टि जिसमें बिना बीज के फूल पैदा कर देना, शून्य से कुछ उत्पन्न करने देना जैसे सिद्धियाँ वर्णित हैं. स्वामी विवेकानंद ऐसी योगसृष्टि के बारे में तर्क देते हैं कि यह सृष्टि भी किसी नियम से ही हुयी होगी, जिसे लौकिक रूप में सुलभ तरीके से नहीं जाना जाता. अगर यह सृष्टि किसी एक मनुष्य के द्वारा सम्भव है, तो दूसरे मनुष्य के द्वारा किसी न किसी विधि से उत्पन्न किया जा सकता ही होगा, अतैव योगसृष्टि को चमत्कार समझ करउससे बहुत प्रभावित होने की आवश्यकता नहीं है.

यह विचारणीय है कि क्या स्पिनोज़ा के सिंद्धातों से योगसृष्टि का आधार ईश की सक्रिय प्रकृति से लिया जा सकता है? या स्पिनोज़ा इस अवधारणा का पुरजोर खण्डन करते}



PROP. XXX. Intellect, in function (actu) finite, or in function infinite, must comprehend the attributes of God and the modifications of God, and nothing else.


प्रस्तावना ३०. मति, सीमित या असीमित रूप से कार्यरत, ईश के गुणधर्मों या उपान्तरणों में अभिसारित है, और किसी के नहीं.

Proof. — A true idea must agree with its object (Ax. vi.); in other words (obviously), that which is contained in the intellect in representation must necessarily be granted in nature. But in nature (by Prop. xiv., Coroll. i.) there is no substance save God, nor any modifications save those (Prop. xv.) which are in God, and cannot without God either be or be conceived. Therefore the intellect, in function finite, or in function infinite, must comprehend the attributes of God and the modifications of God, and nothing else. Q.E.D.


प्रमाण. एक सत्य विचार हमेशा अपने प्रयोजन/विषय वस्तु से सहमति में होता है (स्वयंसिद्ध ६), दूसरे शब्दों में (स्पष्टत:), वह जो मति में ग्राह्य है, उसका प्रकृति में आवश्यक रूप से प्रतिनिधित्व है. लेकिन प्रकृति में (प्रस्तावना १५, उपप्रमेय १ से) ईश के अलावा कोई सत्त्व, या ईश में अन्तर्निहित उपान्तरणों के अलावा कोई उपांतरण नहीं है, और बिना ईश के अवधारित भी नहीं की जा सकती. इसीलिए मति, सीमित या सीमित रूप से कार्यरत, ईश के गुणधर्मों और उपान्तरणों को अभिसारित करती है, किसी और के नहीं.
 

PROP. XXXI. The intellect in function, whether finite or infinite, as will, desire, love, &c., should be referred to passive nature and not to active nature.


प्रस्तावना ३१.सक्रिय मति, सीमित या असीमित, जैसे संकल्प, इच्छा, प्रेम, आदि, को निष्क्रिय प्रकृति से सन्दर्भित किया जाना चाहिये, सक्रिय से नहीं.

Proof. — By the intellect we do not (obviously) mean absolute thought, but only a certain mode of thinking, differing from other modes, such as love, desire, &c., and therefore (Def. v.) requiring to be conceived through absolute thought. It must (by Prop. xv. and Def. vi.), through some attribute of God which expresses the eternal and infinite essence of thought, be so conceived, that without such attribute it could neither be nor be conceived. It must therefore be referred to nature passive rather than to nature active, as must also the other modes of thinking. Q.E.D.

प्रमाण. मति (बुद्धि) से हमारा अर्थ केवल विचार मात्र से नहीं है, जबकि सोचने की एक प्रणाली से है, दूसरी प्रणालियों से इतर, जैसे प्रेम, इच्छा, इत्यादिऔर इसीलिए (परिभाषा ५), जिसकी अवधारणा केवल विचार मात्र से हो. इसकी अवधारणा ईश के किसी भी ऐसे गुणधर्म से अवधारित हो सकती है जो विचार की असीमितता और शाश्वतत्व को अभिव्यक्त करते हो, कि बिना ऐसे किसी गुणधर्म के, (प्रस्तावना १५और परिभाषा६ से) विचार ना ही, हो सकता है, ना ही अवधारित ही किया जा सकता है. इसीलिए इसका सन्दर्भ प्रकृति के निष्क्रिय रूप से है ना कि सक्रिय, जैसे कि विचार के अन्य प्रणालियों का भी.

Note. — I do not here, by speaking of intellect in function, admit that there is such a thing as intellect in potentiality: but, wishing to avoid all confusion, I desire to speak only of what is most clearly perceived by us, namely, of the very act of understanding, than which nothing is more clearly perceived. For we cannot perceive anything without adding to our knowledge of the act of understanding.

नोट. मैं यहाँ, मति (बुद्धि) के कार्य के बारे में बात करते हुए, ऐसा नहीं कह रहा कि, मति संभाव्यता में नहीं है, जबकि, सभी भ्रमों को अलग कर, मैं केवल उसकी बात कर रहा हूँ जो, हमारे द्वारा स्पष्ट रूप से ग्राह्य है, समझने की प्रक्रिया जैसा, जिससे बेहतर कुछ भी संकल्पनीय नहीं है. क्योंकि हम बिना अपने समझने की क्रिया के ज्ञान को बढ़ाये हुएकुछ भी नहीं ग्रहण कर सकते.

PROP. XXXII. Will cannot be called a free cause, but only a necessary cause.

प्रस्तावना ३२.संकल्प को मुक्त कारण नहीं कहा जा सकता, केवल एक आवश्यक कारण कहा जा सकता है.


अंग्रेजी शब्दों के समानार्थक हिन्दी शब्द
Will = इच्छाशक्ति / संकल्प/ निश्चय/ क्रतु
Volition = इच्छाशक्ति


Proof. — Will is only a particular mode of thinking, like intellect; therefore (by Prop. xxviii.) no volition can exist, nor be conditioned to act, unless it be conditioned by some cause other than itself, which cause is conditioned by a third cause, and so on to infinity. But if will be supposed infinite, it must also be conditioned to exist and act by God, not by virtue of his being substance absolutely infinite, but by virtue of his possessing an attribute which expresses the infinite and eternal essence of thought (by Prop. xxiii.). Thus, however it be conceived, whether as finite or infinite, it requires a cause by which it should be conditioned to exist and act. Thus (Def. vii.) it cannot be called a free cause, but only a necessary or constrained cause. Q.E.D.


प्रमाण. संकल्प केवल एक सोचने की प्रणाली है, जैसे मति, इसीलिए (प्रस्तावना २८ से) , कोई इच्छाशक्ति नहीं हो सकती, ना ही यह कार्य करने के लिए बाध्य किया जा सकती है, तबतक जबतक की यह स्वयं से इतर किसी कारण से अनुकूलित या बाध्य ना किया गया हो, जो कारण फिर किसी तीसरे कारण से.. आदि आदि... लेकिन अगर संकल्प को असीमित मान लिया जाए,तब भी वह अस्तित्व में होने या कार्य करने के लिए ईश के द्वारा ही अनुकूलित होगा, इस गुण से नहीं कि वह सत्त्व नितांत असीमित है, बल्कि इससे कि उसके पास वह गुणधर्म है, जो विचार के असीमित और शाश्वत सार को अभिव्यक्त करता है (प्रस्तावना २३ से). इसीलिए, अब चाहे यह जैसे भी अवधारित किया जाए, सीमित या असीमितइसे एक कारण चाहिए, जिससे कि वह अस्तित्व में होने या कार्य करने करने लिए अनुकूलित किया जा सके. इसीलिए (परिभाषा ७ से) यह एक मुक्त कारण नहीं हो सकता,यह केवल एक अनिवार्य या परिमित कारण ही हो सकता है.


{अनुवादक की टिप्पणी–‘Will’ का अनुवाद इच्छा (desire) या कामना करने के बजाय संकल्प या क्रतु करना ठीक रहेगा. बृहदारण्यकोपनिषद में क्रतु शब्द का प्रयोग कामना और कर्म के बीच के निश्चय या संकल्प के रूप में प्रयोग हुआ है. यह विचारणीय है कि हिन्दी में इस शब्द का प्रयोग क्या किया गया है?

अथो खल्वाहु: काममय एवायं पुरुष इति स यथाकामो भवति तत्क्रतुर्भवति यत्क्रतुर्भवति तत् कर्म कुरुते यत् कर्म कुरुते तदभिसम्पद्यते ..

कोई कोई कहते हैं कि यह पुरुष काममय ही है, वह जैसी कामना वाला होता है, वैसा ही संकल्प करता है, जैसा संकल्पवाला होता है, वैसा ही कर्म करता है और जैसा कर्म करता है वैसा ही फल पाता है.
- बृहदारण्यकोपनिषद् - अध्याय ४, ब्राह्मण ४, श्लोक ५}

Coroll. I.-Hence it follows, first, that God does not act according to freedom of the will.

उप-प्रमेय. इसीलिए यह प्रमाणित होता है कि ईश इच्छा (संकल्प) की स्वतंत्रता का अनुसरण करते हुए कार्य नहीं करता.

Coroll. II.-It follows, secondly, that will and intellect stand in the same relation to the nature of God as do motion, and rest, and absolutely all natural phenomena, which must be conditioned by God (Prop. xxix.) to exist and act in a particular manner. For will, like the rest, stands in need of a cause, by which it is conditioned to exist and act in a particular manner. And although, when will or intellect be granted, an infinite number of results may follow, yet God cannot on that account be said to act from freedom of the will, any more than the infinite number of results from motion and rest would justify us in saying that motion and rest act by free will. Wherefore will no more appertains to God than does anything else in nature, but stands in the same relation to him as motion, rest, and the like, which we have shown to follow from the necessity of the divine nature, and to be conditioned by it to exist and act in a particular manner.

उप-प्रमेय २ इससे इस बात का अनुगमन है कि इच्छा(संकल्प) और मति ईश से एक ही सम्बन्ध में आते है, जैसे, गति, विश्राम और बाकी सभी प्राकृतिक घटनाएँ, जो ईश के द्वारा अनुकूलित की गयी हो, अस्तित्व में होने या कार्य करने के लिए (प्रस्तावना २९) इच्छा (संकल्प) के लिए भी बाकी सभी की तरह, एक कारण का होना अनिवार्य है, जिससे वह अस्तित्व में होने या एक विशिष्ट रूप से कार्य करने को अनुकूलित किया गया हो. और, जब भी, मति या इच्छा (इच्छा) दी गयी हो, तो उससे असीमित परिणाम निकल सकते है, निकाले जा सकते है, लेकिन इस बात को मानकर ऐसा नहीं मान लिया जा सकता है कि ईश मुक्त-इच्छा से कार्य कर सकता है. ठीक वैसे ही जैसे गति और विश्राम से अनगिनत परिणाम निकाले जा सकते है, इसका मतलब यह नहीं कि गति और विश्राम मुक्त-इच्छा से कार्य कर रहें है, इसीलिए इच्छा, प्रकृति में उपस्थित सभी चीज़ों की तरह ही ईश से सम्बंधित है, ठीक उसी सम्बन्ध में जिस सम्बन्ध से उससे गति, विश्राम, और बाकी चीज़ें जुड़ी है, जिनके बारे में हम यह प्रदर्शित कर चुके हैं कि वे दैवीय प्रकृति के अनिवार्यताओं/आवश्यकताओं का अनुगमन करती है, और अस्तित्व में होने और एक विशिष्ट तरीके से कार्य करने के लिए अनुकूलित की गयी है.


PROP. XXXIII. Things could not have been brought into being by God in any manner or in any order different from that which has in fact obtained.


प्रस्तावना ३३. चीज़े अस्तित्व में किसी भी और तरीके से नहीं ला जा सकती थी, जिस तरीके (क्रम) से वे अस्तित्व में लायी गयी हैं.


Proof-All things necessarily follow from the nature of God (Prop. xvi.), and by the nature of God are conditioned to exist and act in a particular way (Prop. xxix.). If things, therefore, could have been of a different nature, or have been conditioned to act in a different way, so that the order of nature would have been different, God’s nature would also have been able to be different from what it now is; and therefore (by Prop. xi.) that different nature also would have perforce existed, and consequently there would have been able to be two or more Gods. This (by Prop. xiv., Coroll. i.) is absurd. Therefore things could not have been brought into being by God in any other manner, &c. Q.E.D.

प्रमाण- सभी चीज़े ईश की प्रकृति से अनुसरित हैं, (प्रस्तावना १६), और ईश के द्वारा ही अस्तित्व में होने या एक विशिष्ट रूप से कार्य करने के लिए अनुकूलित की गयी हैं (प्रस्तावना २९). इसीलिए अगर चीज़े किसी दूसरी प्रकृति की होती, या किसी दूसरे रूप में कार्य करने के लिए अनुकूलित की गयी होती, तो उनका क्रम भी अलग होता, और ईश की प्रकृति भी, जो अभी है उससे इतर होती, और इसीलिए (प्रस्तावना ११ से), अलग प्रकृतियाँ होती, और परिणामस्वरूप दो या दो से ज्यादा ईश होते, जो, (प्रस्तावना १४, उपप्रमेय १ से) असंगत होता. इसीलिए चीज़े अस्तित्व में किसी दूसरे या अलग क्रम/तरीके से नहीं लायी जा सकती थी.


Note I.—As I have thus shown, more clearly than the sun at noonday, that there is nothing to justify us in calling things contingent, I wish to explain briefly what meaning we shall attach to the word contingent; but I will first explain the words necessary and impossible.
A thing is called necessary either in respect to its essence or in respect to its cause; for the existence of a thing necessarily follows, either from its essence and definition, or from a given efficient cause. For similar reasons a thing is said to be impossible; namely, inasmuch as its essence or definition involves a contradiction, or because no external cause is granted, which is conditioned to produce such an effect; but a thing can in no respect be called contingent, save in relation to the imperfection of our knowledge.
A thing of which we do not know whether the essence does or does not involve a contradiction, or of which, knowing that it does not involve a contradiction, we are still in doubt concerning the existence, because the order of causes escapes us,such a thing, I say, cannot appear to us either necessary or impossible. Wherefore we call it contingent or possible.


नोट १जैसा मैंने दिखाया है, दोपहर में सूरज से कहीं अधिक साफ, कि ऐसा कुछ नहीं है जिससे चीजों को आकस्मिक कह कर न्यायसंगत ठहराना, मैं संक्षिप्त रूप में यहाँ आकस्मिक के लिये गये अर्थ की व्याख्या करना चाहूँगा, पर मैं आवश्यक और असम्भव शब्दों की व्याख्या करना चाहूँगा.

कोई वस्तु या तो अपने सार में या अपने कारण में आवश्यक कही जा सकती है, जिससे उस वस्तु के अस्तित्व आवश्यक रूप से होने के लिये या तो उसके सार या परिभाषा से, या फिर किसी दिये गये दक्ष कारण से अनुसरित किया जा सके.  इन्हीं तरह के समान कारणों से एक वस्तु असम्भव कही जा सकती है, उदाहरण के तौर पर, जबतक कि उसके सार और परिभाषा में कोई अंतर्विरोध हो, या इसलिये कि ऐसे बाह्य कारण के दिये जाने से  जो कि ऐसा कार्य देने के लिये अनुकूलित हो, पर एक वस्तु किसी भी रूप में आकस्मिक नहीं कही जा सकती, हमारी अपूर्ण ज्ञान के सम्बन्ध को ध्यान में रखते हुए.

कोई ऐसी वस्तु जिसके बारे में हमें पता नहीं कि कि उसके सार में अंतर्विरोध है या नहीं, या उसके, यह जानते हुये कि इसमें कोई अंतर्विरोध नहीं है फिर भी हम उसके अस्तित्व के विषय में सशंकित हो, क्योंकि कारणों का क्रम हमसे कहीं छूटा जाता हो, ऐसी वस्तु को, मैं कहता हूँ, हमें आवश्यक या असम्भव जैसी प्रतीत नहीं होगा. यहाँ हम उसे आकस्मिक या सम्भव कहेंगे.

Note II.—It clearly follows from what we have said, that things have been brought into being by God in the highest perfection, inasmuch as they have necessarily followed from a most perfect nature. Nor does this prove any imperfection in God, for it has compelled us to affirm his perfection. From its contrary proposition, we should clearly gather (as I have just shown), that God is not supremely perfect, for if things had been brought into being in any other way, we should have to assign to God a nature different from that, which we are bound to attribute to him from the consideration of an absolutely perfect being.


नोट २–  जो हमने कहा है उससे यह स्पष्ट रूप से अनुसरित है कि वस्तुएँ जो ईश के द्वारा सर्वोच्च उत्कृष्टता में अस्तित्व में लायी गयी हैं, इतना कि वे अवश्य रूप से सबसे अधिक उत्कृष्ट प्रकृति से अनुसरित हुये हैं. इससे किसी तरह ईश की किसी अनउत्कृष्टता (अपूर्णता) सिद्ध नहीं होती, क्योंकि यह हमें उनकी उत्कृष्टता को मानने को बाध्य करता है. इसके विरोधी प्रस्ताव से, हमें यह स्पष्टतया समझ सकते हैं (जैसा कि मैंने दिखाया है), कि ईश पूरी तरह से उत्कृष्ट नहीं है, क्योंकि चीजें किसी और तरह से अस्तित्व में लायी गयी हैं, उस स्थिति में हमें ईश को एक भिन्न प्रकृति की अवधारणा देनी पड़ेगी, जो हम उसे सर्वोत्तम उत्कृष्ट होने के कारण कहते हैं.

I do not doubt, that many will scout this idea as absurd, and will refuse to give their minds up to contemplating it, simply because they are accustomed to assign to God a freedom very different from that which we (Def. vii.) have deduced. They assign to him, in short, absolute free will. However, I am also convinced that if such persons reflect on the matter, and duly weigh in their minds our series of propositions, they will reject such freedom as they now attribute to God, not only as nugatory, but also as a great impediment to organized knowledge. There is no need for me to repeat what I have said in the note to Prop. xvii. But, for the sake of my opponents, I will show further, that although it be granted that will pertains to the essence of God, it nevertheless follows from his perfection, that things could not have been by him created other than they are, or in a different order; this is easily proved, if we reflect on what our opponents themselves concede, namely, that it depends solely on the decree and will of God, that each thing is what it is.


मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है कि बहुत से लोग इस विचार को अनर्थक पायेंगे, और अपने दिमाग को उस ओर सोचने से मना कर देंगे, केवल इसलिये क्योंकि वे ईश को जिस स्वतंत्रता देने के आदी रहें हैं वह हमसे (परिभाषा ७) कहीं अलग है. वे ईश को, संक्षिप्त रूप में, संपूर्ण स्वतंत्रता देते हैं. हालांकि, मैं इस बात से भी सहमत हूँ कि यदि ये व्यक्ति वस्तुस्थिति पर विचारें और हमारी सभी प्रस्तावनाओं पर ध्यान दें, वे ईश को दिये हुये उन सभी स्वतंत्रता को नकार देंगे, केवल निरर्थक कह के ही नहीं, बल्कि हमारे सम्यक ज्ञान के लिये बड़े अवरोध के कारण भी. मैंने जो प्रस्ताव १६ के नोट में कहा है, उसे मुझे फिर से दोहराने की कोई आवश्यकता नहीं है, पर फिर भी मेरे विरोधियों के लिये, मैं आगे दिखाउँगा कि यद्यपि यह माना गया है कि संकल्प (इच्छा) ईश के सार से सम्बन्धित है, यह उस तरह से उसकी उत्कृष्टता से कहीं अनुसरित नहीं होती कि वस्तुएँ जो उसके द्वारा बनायी गयीं हैं, इनके अलावा किसी और तरीके से बनायी जा सकती हैं. यह आसानी से सिद्ध किया जा सकता है, यदि हम यह विचारें कि हमारे विरोधी स्वयं में क्या सोचते हैं, उदाहरण के तौर पर, यह केवल उस पर निर्भर है कि ईश का आदेश और उसका संकल्प यही है कि हर वस्तु वही है जो वह है.

If it were otherwise, God would not be the cause of all things. Further, that all the decrees of God have been ratified from all eternity by God himself. If it were otherwise, God would be convicted of imperfection or change. But in eternity there is no such thing as when, before, or after; hence it follows solely from the perfection of God, that God never can decree, or never could have decreed anything but what is; that God did not exist before his decrees, and would not exist without them. But, it is said, supposing that God had made a different universe, or had ordained other decrees from all eternity concerning nature and her order, we could not therefore conclude any imperfection in God. But persons who say this must admit that God can change his decrees.

यदि यह किसी और तरह से होता तो ईश हर चीजों का कारण नहीं होते. आगे, ईश के सारे आदेश ईश के द्वारा ही शाश्वतत्व के लिये पुष्टिकृत किये गये हैं. यदि ऐसा किसी और तरह से होता तो ईश अनउत्कृष्ट सिद्ध होते या परिवर्तनशील कहे जाते. किन्तु शाश्वतत्व में ऐसा कुछ नहीं है जहाँ पहले या बाद में कहा जा सके, इसलिये केवल ईश्वर की उत्कृष्टता से ही अनुगमित होता है कि ईश ऐसा कुछ आदेश नहीं देते या नहीं दे सकते कि जो कि है कि ईश अपने आदेश पहले उपस्थित नहीं थे और उसके बिना नहीं होंगे. पर, यह कहा गया है कि माना जाये कि ईश ने कोई और ब्रह्माण्ड बनाया, या जहाँ बाकी प्रकृति और उसके क्रम के आदेशों को नियुक्त किया गया है, हम किसी तरह भी ईश में कोई अनउत्कृष्टता नहीं निगमित नही कर सकते. पर जो लोग ऐसा कहते हैं उनको यह मानना पड़ेगा कि ईश अपना आदेश बदलते रहते हैं.

For if God had ordained any decrees concerning nature and her order, different from those which he has ordained—in other words, if he had willed and conceived something different concerning nature—he would perforce have had a different intellect from that which he has, and also a different will. But if it were allowable to assign to God a different intellect and a different will, without any change in his essence or his perfection, what would there be to prevent him changing the decrees which he has made concerning created things, and nevertheless remaining perfect? For his intellect and will concerning things created and their order are the same, in respect to his essence and perfection, however they be conceived.


यदि ईश ने अपने आदेशों के इतर प्रकृति और उसके क्रम सम्बन्धी आदेशों को नियत किया है दूसरे शब्दों में उन्होंने प्रकृति के सम्बन्ध में कुछ इतर संकल्पित या अवधारित किया है उस स्थिति में उन्हें एक दूसरी तरह की मति (बुद्धि) और दूसरे तरह के संकल्प भी विवशतापूर्वक बनाने पड़ेंगे. लेकिन अगर ईश में दूसरे तरह के मति और संकल्प (इच्छा) की कल्पना बिना उनके उत्कृष्टता या सार में परिवर्तन की जा सके तो, क्या फिर उन्हें सृष्टि से जुड़े सभी आदेशों को परिवर्तन से कौन रोक सकता है और उसके बाद भी उत्कृष्ट रहा जाये? क्योंकि सृष्ट वस्तुओं और उनके क्रम के सम्बन्ध में उनकी मति और संकल्प (इच्छा) उनके सार और उत्कृष्टता के सम्बन्ध में एक ही हैं, चाहे वो किसी तरह अवधारित किये जायें.

Further, all the philosophers whom I have read admit that God's intellect is entirely actual, and not at all potential ; as they also admit that God's intellect, and God's will, and God's essence are identical, it follows that, if God had had a different actual intellect and a different will, his essence would also have been different ; and thus, as I concluded at first, if things had been brought into being by God in a different way from that which has obtained, God's intellect and will, that is (as is admitted) his essence would perforce have been different, which is absurd.


आगे, सभी दार्शनिक, जिन्हें मैंने पढ़ा है, ये स्वीकार करते कि ईश की मति (बुद्धि) पूरी तरह वास्तविक है और केवल सम्भाव्य नहीं है, क्योंकि वे यह भी स्वीकार करते हैं कि ईश की मति (बुद्धि) और ईश का संकल्प (इच्छा) और ईश का सार एक ही हैं, इस तरह यह अनुसरित होता है कि यदि ईश के पास यदि किसी और तरह का वास्तविक मति (बुद्धि) या दूसरी तरह का संकल्प (इच्छा) होते तो उनका सार भी अलग होता, और इस तरह से, जैसा मैंने पहले अनुगमित किया था कि यदि वस्तुएँ ईश के द्वारा किसी और तरह लाये गये होते, तो ईश की मति और संकल्प, और (जैसा स्वीकार किया गया है) उनका सार विवशतापूर्वक किसी और तरह का होता, जो कि अनर्थक है.

As these things could not have been brought into being by God in any but the actual way and order which has obtained; and as the truth of this proposition follows from the supreme perfection of God ; we can have no sound reason for persuading ourselves to believe that God did not wish to create all the things which were in his intellect, and to create them in the same perfection as he had understood them.

चूँकि ये वस्तुएँ ईश के द्वारा किसी और तरह अस्तित्व में नहीं लायी जा सकती बल्कि केवल वास्तविक तरीके से और प्राप्त हुए क्रम से, और इस प्रस्तावना का सत्यता से ईश की सर्वोत्तम उत्कृष्टता सिद्ध होती है. हमारे पास अपने को समझाने को इससे अधिक कोई और सुस्पष्ट तर्क नहीं है कि ईश ने सब कुछ उसी तरह से सृष्ट किया है जो उनकी मति में थी और सृष्टि के समय उसी उत्कृष्टता से थे जिस तरह ईश ने समझा था.

But, it will be said, there is in things no perfection nor imperfection; that which is in them, and which causes them to be called perfect or imperfect, good or bad, depends solely on the will of God. If God had so willed, he might have brought it about that what is now perfection should be extreme imperfection, and vice versâ. What is such an assertion, but an open declaration that God, who necessarily understands that which he wishes, might bring it about by his will, that he should understand things differently from the way in which he does understand them? This (as we have just shown) is the height of absurdity. Wherefore, I may turn the argument against its employers, as follows:—All things depend on the power of God. In order that things should be different from what they are, God's will would necessarily have to be different. But God's will cannot be different (as we have just most clearly demonstrated) from God's perfection.

पर, यह कहा जायेगा कि इन वस्तुओं में न उत्कृष्टता है और न ही अनउत्कृष्टता,इस तरह से कि जिनकी वजह से उत्कृष्ट या अनउत्कृष्ट, अच्छा या बुरा कहा जाये, केवल ईश के संकल्प (इच्छा) पर निर्भर करता है. यदि ईश ने इस तरह का संकल्प (इच्छा) किया है, वे उत्कृष्ट को अनउत्कृष्ट के रूप में भी ला सकते थे और इसी तरह से ठीक उल्टा भी. इस तरह का कथ्य कुछ और नहीं बल्कि ईश के बारे में कुछ वक्तव्य है कि ईश जो अपने संकल्प (इच्छा) के बारे में अवश्य ही समझते हैं और अपनी इच्छा से ही उसे ला सकते हैं कि वह वस्तुओं को किसी और तरह से समझें जिस तरह से वे समझते हैं? यह (जैसा कि हमने दिखाया है) अनर्थकता की पराकाष्ठा है. जहाँ मैं इस तर्क को तर्क देने वालों के विरुद्ध मोड़ता हूँ सारी वस्तुएँ ईश के शक्ति पर निर्भर है. इस तरह वस्तुएँ अपने होने में किसी और तरह से होने के लिये, ईश को किसी और तरह का होना पड़ेगा, और ईश का संकल्प (इच्छा) भी किसी और तरह का होगा. पर ईश की इच्छा (संकल्प) ईश के उत्कृष्टता से अलग नहीं हो सकता (जैसा हमने स्पष्ट रूप से दिखा दिया है).


Therefore neither can things be different. I confess, that the theory which subjects all things to the will of an indifferent deity, and asserts that they are all dependent on his fiat, is less far from the truth than the theory of those, who maintain that God acts in all things with a view of promoting what is good. For these latter persons seem to set up something beyond God, which does not depend on God, but which God in acting looks to as an exemplar, or which he aims at as a definite goal. This is only another name for subjecting God to the dominion of destiny, an utter absurdity in respect to God, whom we have shown to be the first and only free cause of the essence of all things and also of their existence. I need, therefore, spend no time in refuting such wild theories.

अत: वस्तुएँ किसी और तरह से अलग नहीं हो सकती. मैं संस्वीकार करता हूँ कि वह प्रमेय जिसमें सभी वस्तुओं को एक तटस्थ देव की इच्छा (संकल्प) के अंतर्निहित किया जाता है और कहता है कि वे सभी उनके आज्ञा पर निर्भर है, वह उस सत्य से कहीं हम दूर है कि उन लोगों को प्रमेय के जिसमें यह मानते हैं कि ईश सभी वस्तुओं में अच्छाको बढ़ावा देते हैं. क्योंकि दूसरे तरह के प्रमेय मानने वाले ईश के सिवा कुछ और भी कल्पना करते हैं जो ईश से अतिरिक्त है, पर जिसमें ईश के कार्यआज्ञा की तरह लगते हैं या फिर जिसमें वह कुछ निश्चित लक्ष्य की ओर लक्षित करते नज़र आते हैं. यह केवल ईश को नियति के अधीन मानने का दूसरा नाम है, जो कि ईश के सम्बन्ध में अनर्थक है, जैसा कि हमने दिखाया है कि वे सभी के सार और अस्तित्व का पहला और स्वतंत्र कारण हैं. इस तरह मैं इस तरह के बेबुनियाद प्रमेयों को गलत सिद्ध करने में और समय व्यतीत नहीं करूँगा.


{अनुवादक की टिप्पणी:हम देख सकते हैं कि स्पिनोज़ा के तत्त्वमीमांसा सम्बन्धित तर्क बाइबिलऔर तोराके पौराणिक कहानियों में वर्णित ईश्वर के चमत्कार की सत्यता का खण्डन करते हैं. पर उनके विचार किसी भी तरह भारतीय दर्शनों में वर्णित (जैसे कि न्याय दर्शन और काश्मीर शिवाद्वय दर्शन) योगज्ञान, योग प्रत्यक्ष या योग सृष्टि का खण्डन नहीं करते. योगसृष्टि योगी के सामर्थ्य से होती है, जिसमें कुछ भी आकस्मिकता नहीं है. हालांकि पौराणिक कहानियों में विवेचित विभिन्न चमत्कारों और वरदानों का स्पिनोज़ा पुरजोर खण्डन करेंगे, ऐसा समझा जा सकता है.
आचार्य उत्पलदेव की ईश्वरप्रत्यभिज्ञा कारिका पर अपनी टीका में आचार्य अभिनवगुप्त ने ईश्वरप्रत्यभिज्ञा विमर्शिनी में इसकी विवेचना की है. देखें योगी अपनी इच्छा शक्ति से बिना बीज या मिट्टी आदि के घड़ा आदि बनाने में समर्थ है, जो अपना प्रयोज्य कार्य करने में समर्थ हैं- 
श्लोक १०, आह्निक ४, क्रियाधिकार, ईश्वरप्रत्यभिज्ञा कारिका }



PROP. XXXIV. God’s power is identical with his essence.
प्रस्तावना ३४:ईश की शक्ति और उसका सार एक ही है.

Proof. — From the sole necessity of the essence of God it follows that God is the cause of himself (Prop. xi.) and of all things (Prop. xvi. and Coroll.). Wherefore the power of God, by which he and all things are and act, is identical with his essence. Q.E.D.


प्रमाण. ईश के सार से यह अनिवार्यत: अनुसरित है कि वह स्वयं ही अपना कारण है (प्रस्तावना ११) और सभी चीज़ों का भी (प्रस्तावना १६ और उपप्रमेय). इसीलिए ईश की शक्ति, जिसके द्वारा वह और सभी चीज़े कार्यरत है, उसके सार के समान है.


PROP. XXXV. Whatsoever we conceive to be in the power of God, necessarily exists.

प्रस्तावना ३५. वो सब कुछ जो हम ईश की शक्ति के अंतर्गत अवधारित करते है, अनिवार्यत:  है.

Proof. — Whatsoever is in God’s power, must (by the last Prop.) be comprehended in his essence in such a manner, that it necessarily follows therefrom, and therefore necessarily exists. Q.E.D.

प्रमाण. जो कुछ भी ईश की शक्ति में है, वो उसके सार में भी इस तरह से अभिसारित है कि, वहां से यह अनुसरित है कि वो अनिवार्यत: अस्तित्व में हैं.



PROP. XXXVI. There is no cause from whose nature some effect does not follow.

प्रस्तावना ३६.ऐसा कोई भी कारण नहीं है जिससे किसी कार्य का अनुगमन ना हो.

Proof. — Whatsoever exists expresses God’s nature or essence in a given conditioned manner (by Prop. xxv., Coroll.); that is, (by Prop. xxxiv.), whatsoever exists, expresses in a given conditioned manner God’s power, which is the cause of all things, therefore an effect must (by Prop. xvi.) necessarily follow. Q.E.D.

प्रमाण. जो कुछ भी अस्तित्व में है, वह ईश की प्रकृति या उसके सार को इस रूप में अभिव्यक्त करता है(प्रस्तावना २५, उप प्रमेय), कि, (प्रस्तावना ३४ से) जो कुछ भी अस्तित्व में है, एक अनुकूलित रूप में ईश की शक्ति को अभिप्रेषित करता है, जो सभी चीज़ों का कारण है, इसीलिए उससे एक प्रभाव का अनुगमन निश्चित है.


___________ 
Appendix (परिशिष्ट)

In the foregoing I have explained the nature and properties of God. I have shown that he necessarily exists, that he is one: that he is, and acts solely by the necessity of his own nature; that he is the free cause of all things, and how he is so; that all things are in God, and so depend on him, that without him they could neither exist nor be conceived; lastly, that all things are predetermined by God, not through his free will or absolute fiat, but from the very nature of God or infinite power. I have further, where occasion afforded, taken care to remove the prejudices, which might impede the comprehension of my demonstrations. Yet there still remain misconceptions not a few, which might and may prove very grave hindrances to the understanding of the concatenation of things, as I have explained it above. I have therefore thought it worth-while to bring these misconceptions before the bar of reason.


इसके आगे मैंने ईश की प्रकृति और गुणों की व्याख्या की है. मैंने अबतक यह दिखाने की कोशिश की है कि ईश है, एक है, एक सत्व है, और वह केवल अपने प्रकृति की आवश्यकतानुसार कार्य करता है, वह सभी चीज़ों के पीछे का एक मुक्त कारण है, और सभी चीज़ें उस ईश में समावेशित है, उसपर निर्भर है, और बगैर उसके ना किसी चीज़ का अस्तित्व है, ना ही अवधारित की जा सकती हैं, और अंत में, सभी चीज़े उसी ईश के द्वारा पूर्वनिर्धारित हैं, इसके पीछे ईश की कोई स्वेच्छा या उसके किसी आदेश जैसा कुछ भी नहीं,केवल उसकी प्रकृति है, और उसकी अनंत शक्ति.आगे बढ़ते हुए मैंने, जिन जिन अवसरों पर आवश्यकता हुई है, मैंने किसी भी तरह के पूर्वाग्रह को हटाने की भरसक प्रयास किया है, जो मेरे प्रतिपादित सिद्धांतो को उनके मूलस्वरूप में समझ पाने में अड़चन का काम करें, लेकिन फिर भी कुछ गलतफहमियां है, जो जैसा मैंने समझाने या श्रृंखलाबद्ध करने की कोशिश की है, उसमें बाधा बन सकें. इसीलिए मैंने प्रयत्न कर इन सभी भ्रांतियों को एक तर्क के घेरे में लाकर समझाने की कोशिश की है.

All such opinions spring from the notion commonly entertained, that all things in nature act as men themselves act, namely, with an end in view. It is accepted as certain, that God himself directs all things to a definite goal (for it is said that God made all things for man, and man that he might worship him). I will, therefore, consider this opinion, asking first, why it obtains general credence, and why all men are naturally so prone to adopt it?


ये भ्रांतियां साधारणत: यह मान लेने से पैदा होती है कि प्रकृति में सब कुछ ठीक वैसे ही कार्य करता है जैसे मनुष्य एक नतीज़ा (अंत) को ध्यान में रख कर करते हैं. ऐसा आसानी से निश्चित मान लिया जाता है कि ईश स्वयं सभी घटनाओं कों एक निर्धारित अंत तक पहुँचाने का कार्य करते हैं (और चूँकि ईश ने मनुष्य के लिए सभी साधनों का निर्माण किया है, और मनुष्य का निर्माण इसलिये ताकि मनुष्य उनकी आराधना कर सके). इसीलिए मैं, इस विचारधारा को ध्यान में रखकर,सबसे पहले यह प्रश्न खड़ा करूँगा कि यह सोच कैसे एक साधारण दृढ विश्वास सा बन जाता है, और क्यूँ सभी मनुष्य इतनी आसानी से इसको अपनाने पर बाध्य हो जाते है?


Secondly, I will point out its falsity; and, lastly, I will show how it has given rise to prejudices about good and bad, right and wrong, praise and blame, order and confusion, beauty and ugliness, and the like. However, this is not the place to deduce these misconceptions from the nature of the human mind: it will be sufficient here, if I assume as a starting point, what ought to be universally admitted, namely, that all men are born ignorant of the causes of things, that all have the desire to seek for what is useful to them, and that they are conscious of such desire.

दूसरा, मैं इस अवधारणा के छद्म को इंगित करूँगा, और आखिरकार, यह दिखलाने की कोशिश करूँगा कि कैसे इस अवधारणा ने समाज को पक्षपात से पाट दिया है, जैसे, अच्छा और बुरा, सही और गलत, प्रशंसा और दोष, क्रम और संभ्रम, सुन्दरता और भद्दापन आदि. हालांकि यह वह जगह नहीं है जहाँ इन भ्रांतियों का मानव मन की प्रकृति से निगमित किया जाए:यहाँ यही पर्याप्त होगा अगर मैं सीधा यह मान लूँ, और जो एक सार्वभौमिक घटना भी है,कि मनुष्य वस्तुओं के उत्पत्ति के कारण से अनभिज्ञ पैदा होता है,सभी की यह इच्छा होती है कि उन चीज़ों कों ढूँढने की जो उसके लिए उपयोगी हो और वे इस इच्छा के बारे में सचेत तो होते हैं.


Herefrom it follows, first, that men think themselves free inasmuch as they are conscious of their volitions and desires, and never even dream, in their ignorance, of the causes which have disposed them so to wish and desire. Secondly, that men do all things for an end, namely, for that which is useful to them, and which they seek.Thus it comes to pass that they only look for a knowledge of the final causes of events, and when these are learned, they are content, as having no cause for further doubt.

यहाँ पर यह निगमित किया जाता है, पहला, यह कि लोगों को लगता है कि वो इन इच्छाओं और इन इच्छाओं के पीछे कार्यरत इच्छाशक्ति में स्वयं को स्वतंत्र और सचेत महसूस कर रहें होते हैं, और अपने अनभिज्ञता से संकुचित होकर स्वप्न में भी, इस इच्छा और इच्छाशक्ति के पीछे कारकों के बारे में नहीं सोचते. दूसरा, यह कि लोग सभी कार्य एक अंत या नतीज़ा को ध्यान में रखकर करते है, एक ऐसा अंत जो उनके लिए उपयोगी सिद्ध हो और जो वे ढूंढ रहे हों. इसीलिए सभी घटनाओं से एक ऐसा विचार निकलकर सामने आता है कि लोग केवल घटनाओं के अंत की जानकारी और केवल उस अंत पीछे के कारण को ढूंढते है, पूरी प्रक्रिया की नहीं, और जब उन्हें इस अंत का पता चल जाता है, वो संतुष्ट हो जाते है, और इससे आगे या पहले के शंकाओं के प्रति अबोध रह जाते हैं या अबोध रह जाना चुनते है.

If they cannot learn such causes from external sources, they are compelled to turn to considering themselves, and reflecting what end would have induced them personally to bring about the given event, and thus they necessarily judge other natures by their own. Further, as they find in themselves and outside themselves many means which assist them not a little in the search for what is useful, for instance, eyes for seeing, teeth for chewing, herbs and animals for yielding food, the sun for giving light, the sea for breeding fish, &c., they come to look on the whole of nature as a means for obtaining such conveniences.


और जब वे इन कारणों के बारे में बाह्य श्रोत से भी नहीं सीख पाते तो वे फिर से स्वयं को केंद्र मंक रखकर, फिर से घटनाओं के उस अंत के बारे में सोचना शुरू कर देते है, जिनमें उनका अहम् समावेशित हो, और इसीलिए वो किसी घटना से जुड़े दूसरों के चरित्र या प्रकृति का निर्धारण अपने हिसाब से करना शुरू कर देते है. आगे, जैसा वे खुद में और आपने बाहर वो उन साधनों को पाते हैं जो उनकी उपयोगी वस्तुओं की खोज में कोई सहायता न करे, जैसे देखने के लिये चक्षु, चबाने के लिये दाँत, भोजन के लिये पौधे-पशु, रोशनी के लिये सूर्य, मछलियों के लिये सागर आदि, वे सारी प्रकृति को अपनी उपयोगिता के लिये साधन मात्र मान लेते हैं.


Now as they are aware, that they found these conveniences and did not make them, they think they have cause for believing, that some other being has made them for their use. As they look upon things as means, they cannot believe them to be self-created; but, judging from the means which they are accustomed to prepare for themselves, they are bound to believe in some ruler or rulers of the universe endowed with human freedom, who have arranged and adapted everything for human use. They are bound to estimate the nature of such rulers (having no information on the subject) in accordance with their own nature, and therefore they assert that the gods ordained everything for the use of man, in order to bind man to themselves and obtain from him the highest honor.

अब जब इस तरह सचेत हो जाते हैं कि उनकी उपयोगिता प्राप्त हो गयी है जिन्हें उन्होंने नहीं बनाया, वे ये सोचने लगते हैं कि उनके पास यह सोचने का कारण है कि और भी चीजें उनकी उपयोगिता के लिये ही बनी हैं. जब वे वस्तुओं को साधन के रूप में देखते हैं, वे यह विश्वास कर पाते कि यह स्व-कृत हैं, बल्कि उन साधनों से यह निश्चय करने लगते हैं जैसा वे करते आये हैं कि संसार में कोई शासक या कई शासक हैं जिन्होंने मानव को स्वतंत्रता दी है, जिसने मनुष्य के उपभोग के लिये सारी चीजें सिलसिलेवार बनायी और दी हैं. वे इस तरह शासक की प्रकृति का निर्धारण अपनी प्रकृति से करते हैं (जिस विषय में उनकी कोई जानकारी नहीं है) और इस तरह कहते हैं कि देवताओं ने सभी कुछ मनुष्य के उपयोग के लिये बनाया है, जिससे वे मनुष्य से जुड़ जायें और उनसे ही सर्वोच्च आदर पायें.


Hence also it follows, that everyone thought out for himself, according to his abilities, a different way of worshipping God, so that God might love him more than his fellows, and direct the whole course of nature for the satisfaction of his blind cupidity and insatiable avarice. Thus the prejudice developed into superstition, and took deep root in the human mind; and for this reason everyone strove most zealously to understand and explain the final causes of things; but in their endeavor to show that nature does nothing in vain, i.e. nothing which is useless to man, they only seem to have demonstrated that nature, the gods, and men are all mad together. Consider, I pray you, the result: among the many helps of nature they were bound to find some hindrances, such as storms, earthquakes, diseases, &c. : so they declared that such things happen, because the gods are angry at some wrong done to them by men, or at some fault committed in their worship.


अत: यह भी निगमित होता है कि हर किसी ने अपने लिये अपनी क्षमता के अनुसार ईश के पूजन का अलग तरीका सोचा है, ताकि ईश उसे उसके साथियों की तुलना में ज्यादा प्रेम करें और प्रकृति की समस्त प्रक्रिया उसकी अंधी वासना और कभी न तृप्त होने वाले लालच की पूर्ति के लिये लग जाये. इसलिये ऐसा पूर्वाग्रह अंधविश्वास में विकसित हो कर मानव मन में गहरे बैठ गया, और यही कारण है कि हर किसी ने पूरे उत्साह से केवल चीजों के अंत को समझने और व्याख्या करने के लिये प्रयत्न किया, लेकिन यह दिखाने की कोशिश में कि प्रकृति कुछ भी बिना मतलब के नहीं करती, मतलब ऐसा कुछ भी नहीं है को मानव के लिये पूर्णत: अनुपयोगी है, वे यही दिखा पाते हैं कि प्रकृति, देवता और मानव सारे एक साथ पागल हैं. मैं आपसे विनती करता हूँ, इसका नतीजा विचारिये, प्रकृति के बहुत से उपकारों में, जिसमें वह कुछ भी बाधाजनक पाते हैं, जैसे तूफान, भूकम्प, व्याधि आदि, वे ये कहते हैं कि ऐसा इसलिये हुआ क्योंकि देवता मानव की किसी गलती से क्रोधित थे, या उनके पूजन में कोई दोष था.


Experience day by day protested and showed by infinite examples, that good and evil fortunes fall to the lot of pious and impious alike; still they would not abandon their inveterate prejudice, for it was more easy for them to class such contradictions among other unknown things of whose use they were ignorant, and thus to retain their actual and innate condition of ignorance, than to destroy the whole fabric of their reasoning and start afresh. They therefore laid down as an axiom, that God's judgments far transcend human understanding. Such a doctrine might well have sufficed to conceal the truth from the human race for all eternity, if mathematics had not furnished another standard of verity in considering solely the essence and properties of figures without regard to their final causes. There are other reasons (which I need not mention here) besides mathematics, which might have caused men's minds to be directed to these general prejudices, and have led them to the knowledge of the truth.


अनुभवों ने दिन प्रतिदिन इसका विरोध किया और अनगिन उदाहरणों से दिखाया कि अच्छी और बुरी होनी, बहुत से श्रद्धालु और नास्तिकों पर समान रूप से पड़ती है, पर फिर भी वह अपने हठी पूर्वाग्रहों को नहीं छोड़ते, क्योंकि यह उनके लिये अंतर्विरोधों को वर्गीकृत करना अपेक्षाकृत आसान होता है उन सभी अज्ञात चीजों की तुलना में जिसके उपयोग के बारे में वह अज्ञानी हैं, और इस तरह वे अपने वास्तविक और सहज अज्ञान की अवस्था को बनाये रखते हैं, बजाय अपने तर्कों की जाल को विनष्ट कर के नयी शुरुआत करने के. वे, इस तरह एक स्वयंसिद्ध प्रतिपादित करते हैं, कि ईश का न्याय मानव की समझ के परे हैं. ऐसा मत शायद पूरी मानव जाति के लिये सत्य को शाश्वत के लिये ढँक सकता था, यदिगणित सत्यता की जाँच पड़ताल के लिये सार और आकृतियों के गुण धर्मों को उनकी अंतिम परिणति से मुक्त नहीं घोषित किया होता. हालांकि गणित के अलावा अन्य कारण हैं (जिन्हें मैं यहाँ उद्धृत की आवश्यक नहीं समझता), जो मानव के मन को ऐसे सामान्य पूर्वाग्रहों से ले कर सत्य के ज्ञान तक ले जाते.

I have now sufficiently explained my first point. There is no need to show at length, that nature has no particular goal in view, and that final causes are mere human figments. This, I think, is already evident enough, both from the causes and foundations on which I have shown such prejudice to be based, and also from Prop. xvi., and the Corollary of Prop. xxxii., and, in fact, all those propositions in which I have shown, that everything in nature proceeds from a sort of necessity, and with the utmost perfection.

मैंने अब तक पर्याप्त रूप से अपना पहला बिन्दु स्पष्ट कर दिया है. इससे अधिक कोई आवश्यकता नहीं है कि प्रकृति के पास कोई विशेष लक्ष्य नहीं दिखता है, और ऐसे सारे नतीज़े केवल मनुष्य की कल्पना है. यह, मैं सोचता हूँ, कि प्रस्ताव १६ से, और उप प्रमेय ३२ सेपर्याप्त रूप से प्रमाणित हो चुका है, इनके कारण और बुनियाद से जिसपर ऐसे पूर्वाग्रह बनते हैं, और, वस्तुत: ऐसे सभी प्रमेय जो मैंने दिखलायें हैं, कि प्रकृति में जो कुछ भी है वह किसी आवश्यकता से है और पूरी उत्कृष्टता से है.


However, I will add a few remarks, in order to overthrow this doctrine of a final cause utterly. That which is really a cause it considers as an effect, and vice versâ: it makes that which is by nature first to be last, and that which is highest and most perfect to be most imperfect. Passing over the questions of cause and priority as self-evident, it is plain from Props. xxi., xxii., xxiii. that the effect is most perfect which is produced immediately by God; the effect which requires for its production several intermediate causes is, in that respect, more imperfect. But if those things which were made immediately by God were made to enable him to attain his end, then the things which come after, for the sake of which the first were made, are necessarily the most excellent of all.


हालांकि मैं कुछ टिप्पणी जोड़ना चाहूँगा, जिससे यह एक अंतिम परिणति वाला मत पूरी तरह जड़ से उखड़ जाये. वह सचमुच में एक कारण है जिसका कोई कार्य होता है और ठीक उसका उल्टा भी: जो यह बनाते  है कि जो अपनी प्रकृति से पहले से अंत तक हैं और जो सर्वोच्च है ओर सर्वोत्कृष्ट से निकृष्टतम हैं.  कारण और उसकी वरीयता के प्रश्न से गुजरते हुये जो कि स्वयं-प्रामाण्य हैं, यह प्रस्ताव २१, २२ और २३ से साफ है कि वह कार्य सबसे अधिक उत्कृष्ट है जो सीधे ईश से बना हो; और वह कार्य जो बहुत से मध्यवर्ती कारणों से गुजरते हुये बनता है, पहले कि तुलना में कम उत्कृष्ट है. पर यदि वे वस्तुएँ जो कि ईश के द्वारा तुरंत बनाये गये हैं वह किसी अंत को प्राप्त करने के लिये बनाये गये हैं, तब वे चीजें जो इसके बाद आती हैं, पहले बन गयी वस्तुओं के लिहाज से,अवश्य ही अधिक उत्कृष्ट हैं.


Further, this doctrine does away with the perfection of God: for, if God acts for an object, he necessarily desires something which he lacks. Certainly, theologians and metaphysicians draw a distinction between the object of want and the object of assimilation; still they confess that God made all things for the sake of himself, not for the sake of creation. They are unable to point to anything prior to creation, except God himself, as an object for which God should act, and are therefore driven to admit (as they clearly must), that God lacked those things for whose attainment he created means, and further that he desired them.


आगे, इस मत से ईश की उत्कृष्टता का निषेध होता है: क्योंकि यदि ईश एक वस्तु की तरह काम करते हैं, तो वह निश्चित तौर पर कुछ चाहेंगे जो उनके पासनहीं होगा. निश्चित रूप से धर्मशास्त्री और तत्वमीमांसक इच्छा की वस्तु और समावेश की वस्तु में फर्क करते हैं, फिर वह स्वीकार करते हैं कि ईश ने सारी चीजें अपने लिये ही बनाये हैं, सृष्टि की इच्छा से नहीं. वे सृष्टि से पहले किसी चीज की ओर इंगित करने में असमर्थ हैं, सिवा ईश के, एक वस्तु के रूप में जिस पर ईश कोई क्रिया करना चाहेंगे और इस तरह वे स्वीकार करने के लिये बाध्य हो जाते हैं (जैसा कि स्पष्टतया उन्हें होना चाहिये) कि ईश ल सभी चीजों में हीन थे जिसकी प्राप्ति के लिये उन्होंने संसाधन बनाये और आगे उसकी कामना की.


We must not omit to notice that the followers of this doctrine, anxious to display their talent in assigning final causes, have imported a new method of argument in proof of their theory—namely, a reduction, not to the impossible, but to ignorance; thus showing that they have no other method of exhibiting their doctrine. For example, if a stone falls from a roof on to someone's head, and kills him, they will demonstrate by their new method, that the stone fell in order to kill the man; for, if it had not by God's will fallen with that object, how could so many circumstances (and there are often many concurrent circumstances) have all happened together by chance?


हमारे ध्यान से यह नहीं निकलना चाहिए कि इस मत के समर्थक,अंतिम कारण को निर्धारित करने के लिए अपने उतावलेपन में अपनी प्रतिभा सेएक नया तर्क का तरीका अपनाया है जिससे उनका मत सिद्ध हो जाये- वह है अपचयन, जो असंभव के लिये नहीं उनकी अज्ञानता के लिये है, जिससे यह दीखता है कि उनके पास अपने मत को दर्शाने का कोई तरीका नहीं है. उदहारण के लिए, अगर एक पत्थर किसी छत से किसी के सर पर गिरता है, और उसकी मृत्यु हो जाती है, वो अपनी नयी पद्धति से यह दिखाएँगे कि वह पत्थर उस व्यक्ति को मारने के लिए गिरा था, क्यूंकि अगर इसमें ईश की इच्छा ना हो तो इतनी सारी संभावनाएं एक साथ ऐसे कैसे घटित हो सकती हैं?


Perhaps you will answer that the event is due to the facts that the wind was blowing, and the man was walking that way. "But why," they will insist, "was the wind blowing, and why was the man at that very time walking that way?" If you again answer, that the wind had then sprung up because the sea had begun to be agitated the day before, the weather being previously calm, and that the man had been invited by a friend, they will again insist: "But why was the sea agitated, and why was the man invited at that time?" So they will pursue their questions from cause to cause, till at last you take refuge in the will of God—in other words, the sanctuary of ignorance. So, again, when they survey the frame of the human body, they are amazed; and being ignorant of the causes of so great a work of art, conclude that it has been fashioned, not mechanically, but by divine and supernatural skill, and has been so put together that one part shall not hurt another.


हो सकता है कि आप इस घटना का कारण यह उत्तर कहते हुए देंगे कि हवा बह रही थी और वह व्यक्ति उस दिशा में जा रहा था, लेकिन वह जिद्द करते हुए पूछेंगे कि क्यों? कि क्यों हवा उस दिशा में चल रही थी और वह व्यक्ति ठीक उसी समय उसी दिशा में जा रहा था? अगर आप फिर से यह उत्तर दें कि हवा की उत्पत्ति बीते दिन से समुद्र की उत्तेजना के कारण बही और चूँकि बीते दिन तक उस जगह मौसम शांत था और इसीलिए उस व्यक्ति के मित्र ने उसे आने का निमंत्रण दिया, तो वो आपसे फिर पूछेंगे कि समुन्द्र उत्तेजित क्यों हुआ? और उस व्यक्ति को उसी दौरान क्यों आमंत्रित किया गया?मतलब वो अपने सवाल एक कारण से दूसरे कारण तक खीचेंगे, तबतक जबतक हारकर आप ईश की शरण ना ले लें, दूसरे शब्दों में अज्ञानता के अभ्यारण्य में.तो, फिर से, जब वो मानव शरीर की आकृति का निरीक्षण करते हैं तो वे चौंक जाते है, और उन सभी महान कारणों से अनभिज्ञ होकर जो इस कलात्मक शरीर के निर्माण के कार्य करती हैं, यह निष्कर्ष निकाल लेते हैं कि इसका निर्माण दैवीय और अलौकिक के द्वारा किया गया है, और इसीलिए ऐसे किया गया है ताकि एक हिस्सा दूसरे हिस्से को चोट नहीं पहुंचाएं. 

Hence anyone who seeks for the true causes of miracles, and strives to understand natural phenomena as an intelligent being, and not to gaze at them like a fool, is set down and denounced as an impious heretic by those, whom the masses adore as the interpreters of nature and the gods. Such persons know that, with the removal of ignorance, the wonder which forms their only available means for proving and preserving their authority would vanish also. But I now quit this subject, and pass on to my third point.


इसीलिए कोई भी जो चमत्कारों के पीछे के सत कारणों को ढूंढता है, और प्राकृतिक घटना को एक मतिमान मनुष्य की तरह समझने की कोशिश करता है, उन्हें किसी मूर्ख सा घूरते रहने के विपरीत, वह हतोत्साहित किया जाता है, दोषी और पाखंडी के रूप में उसकी निंदा की जाती है, उनके द्वारा जिन्हें जनता इश्वर और प्रकृति के व्याख्या-कर्ता के रूप में मानती है. ऐसे लोगों को यह मालूम है कि अज्ञानता को हटा देने से, वो आश्चर्य जो उनकी सत्ता बताते और बचाते हैं, समाप्त हो जायेंगे. लेकिन मैं अब इस विषय को यहीं छोड़ता हूँ और अपने तीसरे बिंदु की और बढ़ता हूँ.

After men persuaded themselves, that everything which is created is created for their sake, they were bound to consider as the chief quality in everything that which is most useful to themselves, and to account those things the best of all which have the most beneficial effect on mankind. Further, they were bound to form abstract notions for the explanation of the nature of things, such as goodness, badness, order, confusion, warmth, cold, beauty, deformity, and so on; and from the belief that they are free agents arose the further notions of praise and blame, sin and merit.
I will speak of these latter hereafter, when I treat of human nature; the former I will briefly explain here.

जब मनुष्य ने यह मान लिया कि वह सब कुछ जो बनाया गया है वह उनके लिए बनाया गया है, तो फिर वो उन चीज़ों को जो उनके लिए सबसे ज्यादा उपयोगी हैं, सर्वोत्तम मानने के लिए बाध्य हो गए, उन सभी चीज़ों को सर्वोत्तम मानने के लिए जिनका मानवजाति पर सबसे अधिक फायदेमंद प्रभाव पड़ता है.फिर, चीज़ों की प्रकृति की निर्धारण करने के लिए भावत्मक विचार निर्माण करने के लिए वो  बाध्य हुए, जैसे, भलाई, बुराई, व्यवस्था, भ्रम, गर्मी, ठंडी, सौन्दर्य, कुरूपता आदि; और ऐसा मानने के कारण कि उपरोक्त सभी मुक्त कारक है, आगे चलकर, पाप-पुण्य, दोष-प्रशंसा जैसे विचार उभरे.


मैं जब मानवीय प्रकृति की बात करूँगा तो बाद में लिखें इन विचारों की भी बात करूँगा, अभी मैं पहले के बिंदु पर जाता है.

Everything which conduces to health and the worship of God they have called good, everything which hinders these objects they have styled bad; and inasmuch as those who do not understand the nature of things do not verify phenomena in any way, but merely imagine them after a fashion, and mistake their imagination for understanding, such persons firmly believe that there is an order in things, being really ignorant both of things and their own nature. When phenomena are of such a kind, that the impression they make on our senses requires little effort of imagination, and can consequently be easily remembered, we say that they are well-ordered; if the contrary, that they are ill-ordered or confused. Further, as things which are easily imagined are more pleasing to us, men prefer order to confusion-as though there were any order in nature, except in relation to our imagination—and say that God has created all things in order; thus, without knowing it, attributing imagination to God, unless, indeed, they would have it that God foresaw human imagination, and arranged everything, so that it should be most easily imagined. If this be their theory, they would not, perhaps, be daunted by the fact that we find an infinite number of phenomena, far surpassing our imagination, and very many others which confound its weakness. But enough has been said on this subject.


हर कुछ को स्वास्थ के लिये लाभदायक हो और ईश की उपासना से सम्बद्ध हो उसे अच्छाकहा गया है और हर कुछ जो इनकी बाधा है बुराकहा गया है. जो चीजों की प्रकृति को नहीं समझते और विभिन्न घटनाओं की भली-भाँति जाँच-पड़ताल नहीं करते, बल्कि उन्हें किसी तरीके से कल्पित करते हैं और अपनी ही कल्पना को अपनी समझ कहने की गलती कर बैठते हैं. ऐसे लोग यह पक्का विश्वास करते हैं कि चीजों का निश्चित क्रम (व्यवस्था या अनुशासन) में है, पर वस्तुत: वे चीजों और उनकी प्रकृति के बारे में अनभिज्ञ ही होते हैं. जब ऐसे कोई ऐसी घटना होती है जो हमारी इंद्रियों पर ऐसी छाप छोड़ती है जिसमें कल्पना की बहुत कम ही गुंजाइश बची है और बाद में आसानी से याद की जा सकती , हम यह कहते हैं कि यह व्यवस्थित है या क्रम में है; वही यदि इसका उल्टा होता है उन्हें अव्यवस्थित और भ्रमजनित कहते हैं. आगे, ऐसी चीजें जो हम आसानी से कल्पित सकते हैं हमें अधिक प्यारी लगती है और यह भी कहते हैं कि ईश सभी चीजें व्यवस्थित रखी हैं, और इस तरह नहीं जानते हुये हम कल्पना को ईश में संबोधित करते हैं जब तक कि, यह सच है, कि वे यह भी मान लें कि ईश ने मानवीय कल्पना को भी पहले ही भाँप लिया था और हर कुछ व्यवस्था में लाये ताकि चीजें आसानी से कल्पित की जा सके.अगर यही उनका सिद्धांत है, वे इस तथ्य से शायद निरुत्साहित नहीं होगें कि हम ऐसी अनंत घटनाओं को देखते हैं जो हमारी कल्पना के परे चली जाती है और ऐसे कई हैं जो इसकी कमजोरी जता देती है. लेकिन इस विषय पर बहुत कहा जा चुका है.


The other abstract notions are nothing but modes of imagining, in which the imagination is differently affected: though they are considered by the ignorant as the chief attributes of things, inasmuch as they believe that everything was created for the sake of themselves; and, according as they are affected by it, style it good or bad, healthy or rotten and corrupt. For instance, if the motion which objects we see communicate to our nerves be conducive to health, the objects causing it are styled beautiful; if a contrary motion be excited, they are styled ugly.Things which are perceived through our sense of smell are styled fragrant or fetid; if through our taste, sweet or bitter, full-flavored or insipid; if through our touch, hard or soft, rough or smooth, &c.


अन्य अमूर्त अवधारणाएँ कुछ और नहीं बल्कि चिंतन का उपांतर है, जिसमें कल्पना भिन्न तरीकों से कार्याभूत हुयी है : यद्यपि वे अज्ञानियों द्वारा चीजों के प्रमुख गुण के रूप में समझी जाती है, जब तक कि वे यह विश्वास करते हैं कि सभी चीजें उनके लिये बनायी गयीं है और जैसे वह प्रभावित होते हैं वे अच्छेयाबुरे’, स्वास्थ्यवर्द्धक या हानिकारक और भ्रष्ट समझे जाते हैं. उदाहरण के लिये यदि हमारी आँखों की तंत्रिकाओं को किसी वस्तु के गति से स्वास्थ्य के लिये अच्छी मानी जाये, तो वैसी वस्तुयें सुंदर कही जाएँगी और यदि विपरीत गति को प्राप्त होती हैं तो वे भौंडी कहलाएँगी. जिन चीजों को हमारी इंद्रियाँ जैसा निर्धारित करती हैं उस हिसाब से कही जाती हैं, जैसे सूँघने की दृष्टि से खुशबूदार और बदबूदार, चखने की दृष्टि से मीठा या कड़वा, रसभरा या बेस्वाद, छूने के हिसाब से कठोर या मुलायम, रुखड़ाया चिकना आदि.

Whatsoever affects our ears is said to give rise to noise, sound, or harmony. In this last case, there are men lunatic enough to believe, that even God himself takes pleasure in harmony; and philosophers are not lacking who have persuaded themselves, that the motion of the heavenly bodies gives rise to harmony-all of which instances sufficiently show that everyone judges of things according to the state of his brain, or rather mistakes for things the forms of his imagination. We need no longer wonder that there have arisen all the controversies we have witnessed, and finally skepticism: for, although human bodies in many respects agree, yet in very many others they differ; so that what seems good to one seems bad to another; what seems well ordered to one seems confused to another ; what is pleasing to one displeases another, and so on. I need not further enumerate, because this is not the place to treat the subject at length, and also because the fact is sufficiently well known. It is commonly said: "So many men, so many minds; everyone is wise in his own way ; brains differ as completely as palates." All of which proverbs show, that men judge of things according to their mental disposition, and rather imagine than understand: for, if they understood phenomena, they would, as mathematicians attest, be convinced, if not attracted, by what I have urged.


जो कुछ भी हमारे कानों को प्रभावित करता है, उसी हिसाब से हम उसे शोर, ध्वनि या लय का नाम देते हैं. इस आखिरी उदाहरण में कुछ ऐसे लोग हैं जो इतने पागल है कि यह मानते हैं कि ईश स्वयं लय में ही आनंद लेते हैं और ऐसे दार्शनिक भी कम नहीं है जिन्होंने अपने आप को समझा लिया है कि अंतरिक्ष के पिण्डों की गति एक लय की उत्पत्ति करती है यह सब कुछ पर्याप्त रूप से यही दिखलाता है कि हर कोई अपने मस्तिष्क की अवस्था के अनुरूप निर्धारण करते हैं या फिर अपनी कल्पना आरोपित कर के चीजों को ग़लत समझते हैं. हमें अब अधिक विचारने की आवश्यकता नहीं है कि वे सारे विवाद जो हमने देखे और अंतत: में संशयवाद : वह यह कि यद्यपि मानव शरीर बहुत से अर्थों में आपसे में मिलते जुलते हैं, मगर फिर भी वे सभी इस बात पर अलग हो जाते हैं कि वे क्या सही और क्या ग़लत समझते हैं, क्या किसी को व्यवस्थित लगता है क्या किसी को बिखरा-भ्रमित सा लगता है, क्या किसी को अच्छा लगता है और क्या किसी को बुरा लगता है, आदि. मैं आगे और इनकी गणना नहीं करना चाहता क्योंकि यह उन विषयों पर विस्तार से चर्चा करने लायक जगह नहीं है, और यह भी क्योंकि यह तथ्य तो सर्वविदित है ही. यह आमतौर पर कहा ही जाता है: इतने सारे आदमी और इतने सारे मन, हर कोई अपनी तरह से बुद्धिमान है, मस्तिष्क अपनी अभिरुचियों के अनुसार झुका हुआ होता है.ऐसी सारी कहावतें यही दिखलाती हें कि मानव अपनी मानसिक स्थिति से चीजों का निर्णय लेता है और उसे समझने के बजाये कल्पना करता है,क्योंकि यदि वह घटना को समझ गया, वह वैसे ही मान जाएँगे, जैसा गणितज्ञ सहमति देंगे, जैसी मैंने व्याख्या की है.

We have now perceived, that all the explanations commonly given of nature are mere modes of imagining, and do not indicate the true nature of anything, but only the constitution of the imagination; and, although they have names, as though they were entities, existing externally to the imagination, I call them entities imaginary rather than real; and, therefore, all arguments against us drawn from such abstractions are easily rebutted.


हम लोग ने यह देख लिया है कि आमतौर पर दी जाने वाली प्रकृति की सारी व्याख्या केवल कल्पना पर आश्रित है और वे चीजों के सही रूप का निर्धारण नहीं करती, क्योंकि वे केवल कल्पना का ही आधार है और यद्यपि सबके नाम हैं, जैसे कि वे सभी भिन्न तत्त्व हों जो केवल हमारी कल्पना में अस्तित्व में हों, मैं उन सभी तत्त्वों को कल्पित ही मानता हूँ न कि वास्तविक और इसलिये इन अमूर्त कल्पनाओं से हमारे प्रति दिये गये सभी तर्क आसानी खारिज किये जाते हैं.

Many argue in this way. If all things follow from a necessity of the absolutely perfect nature of God, why are there so many imperfections in nature? such, for instance, as things corrupt to the point of putridity, loathsome deformity, confusion, evil, sin, &c. But these reasoners are, as I have said, easily confuted, for the perfection of things is to be reckoned only from their own nature and power; things are not more or less perfect, according as they delight or offend human senses, or according as they are serviceable or repugnant to mankind. To those who ask why God did not so create all men, that they should be governed only by reason, I give no answer but this: because matter was not lacking to him for the creation of every degree of perfection from highest to lowest; or, more strictly, because the laws of his nature are so vast, as to suffice for the production of everything conceivable by an infinite intelligence, as I have shown in Prop. xvi.

Such are the misconceptions I have undertaken to note; if there are any more of the same sort, everyone may easily dissipate them for himself with the aid of a little reflection.


बहुत से लोग इस तरह तर्क देते हैं. यदि हर कुछ ईश के सम्पूर्ण उत्कृष्टता की आवश्यकता से निगमित होता है, फिर प्रकृति में इतनी अनउत्कृष्टताएँ क्यों हैं? जैसा कि, उदाहरण के तौर पर, कुछ चीजें जो सड़ने के कगार पर हैं, जो घृणास्पद भौंडी हैं, भ्रम हैं, बुराई है, पाप है आदि. पर ऐसा तर्क देने वाले, जैसा मैंने कहा है कि आसानी से खारिज़ किये जा सकते हैं क्योंकि चीजों की उत्कृष्टता केवल उनकी प्रकृति से और शक्ति से निर्धारित होती हे; वस्तुएँ कुछ कम या ज्यादा उत्कृष्ट नहीं होती जैसा कि वे हमारी इंद्रियों को आनंद देने में या व्यथित करने में लगती हें, या इस तरह कि वे मानव जाति के लिये किस तरह उपयोगी या वितृष्णीय होंगी. उनके लिये जो यह पूछते हैं कि ईश ने सारे मनुष्यों को ऐसा ही क्यों नहीं बनाया कि वे सभी तर्क से ही चलें, इसके लिये मेरे पास इसके अलावा कोई और जवाब नहीं है कि: जैसा मैंने प्रस्ताव १६ में दिखाया है - क्योंकि यह वस्तु उनके पास अभाव जैसी नहीं कि वे सभी कुछ हर कोटि की उत्कृष्टता के साथ बनाते जैसे उच्चतम से निम्नतम, या अधिक सावधाणी से, क्योंकि उनकी प्रकृति के नियम इतने विस्तृत हैं कि हर कुछ जो अवधारित है उस की सृष्टि के लिये अनंत मति (बुद्धि) से पर्याप्त होते हैं.


इस तरह की ग़लत अवधारणाएँ हैं, जैसा कि मैंने नोट किया है; यदि ऐसी कुछ और इसी तरह की अवधारणाएँ हैं तो सभी उसको अपनी आसानी से थोड़े से ही चिंतन से खारिज़ कर सकते हैं.
_______

{अनुवादक की टिप्पणी:  स्पिनोज़ा के नीतिशास्त्रका पहला अध्याय ईश के बारे मेंकुछ और नहीं उनकी दार्शनिक प्रणाली की विशिष्ट तत्त्वमीमांसिक दृष्टि का परिचायक है. इनके अध्याय से दार्शनिक पद्धतियों के बारे हम कुछ महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं को समझ सकते हैं

तत्त्वदर्शन का चिंतन (स्पैकुलेटि मेटाफिज़िक्स) या तत्त्वमीमांसा की विशिष्ट दृष्टि के लिये महत्त्वपूर्ण घटक इस तरह से हैं

•          दार्शनिक पदावली की परिभाषावे किन अर्थों में प्रयुक्त हो रही हैं
o          अस्तित्वक्या यह बाह्यरूप में स्थित वस्तुओं की सत्ता को निगमित करने के लिये है?
o          सार
o          स्वातन्त्रय 
o          शक्ति
o          सम्बन्ध
o          भेद

•          द्वन्द्वात्मक पदों पर दृष्टि - प्रकृति-पुरुष या विस्तार-विचार या मूर्त-अमूर्त या मनुष्य-जगत या व्यष्टि-समष्टि या चैतन्य-विषय या आत्म-अनात्म जैसी सुपरिचित युग्मों पर मौलिक तथा विशिष्ट दृष्टि किस तरह से है
•          ज्ञानमीमांसिक दृष्टिकिसे ज्ञान और किसे प्रमा समझा जा रहा है? किस तरह के प्रमाणों से प्रमेय की सिद्धि हो रही है? प्रमाता कौन है? ज्ञाता, ज्ञेय और ज्ञान के विषय में किस तरह की अवधारणाएँ हैं?
तत्त्वमीमांसा और ज्ञानमीमांसा की विशिष्ट युग्मित दृष्टियों से प्रमुख चिंतनधाराएँ इस तरह की बन जाती हैं:
•         विचारवाद या आदर्शवाद या प्रत्ययवाद (Idealism) - उन विचारों और मान्यताओं की समेकित विचारधारा है जिनके अनुसार इस जगत की समस्त वस्तुएं विचार (Idea) या चेतना (Consciousness) की अभिव्यक्ति है. सृष्टि का सारतत्त्व जड़ पदार्थ (Matter) नहीं अपितु मूल चेतना है. आदर्शवाद जड़ता या भौतिकवाद का विपरीत रूप प्रस्तुत करता है.

•          भौतिकवाद (Materialism) - इसका यह मत है कि प्रकृति में पदार्थ ही मूल द्रव्य है, और साथ ही, सभी दृग्विषय, जिस में मानसिक दृग्विषय और चेतना भी शामिल हैं, भौतिक परस्पर संक्रिया के परिणाम हैं.
•          अनुभववाद(Empiricism) - इसमें इंद्रियों को ज्ञान का माध्यम माना जाता है. इस वाद के अनुसार प्रत्यक्षीकरण संवेदनाओं और प्रतिमाओं का साहचर्य हैं. अनुभववादियों ने स्थापना की कि मन स्थिति जन्मजात न होकर अनुभवजन्य होती हैं.
•          परतावादी प्रत्ययवाद (Transcendental Idealism) - इस दर्शन में ज्ञानशक्तियों की समीक्षा प्रस्तुत की गई है. इस मत में विचारसामग्री के अर्जन में इन्द्रियों की माध्यमिकता की स्वीकृति मेंइंद्रियवादियों (अनुभववादियों) से सहमत हैं; उक्त सामग्री को विचारों में परिणत करने में बुद्धि की अनिवार्यता का समर्थन करने में यह बुद्धिवादियों (प्रत्ययवादियों) से सहमत हैं; किंतु वह एक का निराकरण कर दूसरे का समर्थन करने में किसी से सहमत न था. कांट के मत में बुद्धि और इंद्रियाँ ज्ञान संबंधी दो भिन्न संस्थान नहीं हैं, बल्कि एक ही सस्थांन के दो विभिन्न अवयव हैं.
पारम्परिक तत्त्वमीमांसा और ज्ञानमीमांसा की दृष्टियों को लगभग नकारते हुये आधुनिक चिंतनधाराएँ इस तरह की बन जाती हैं:
•         वस्तुनिष्ठावाद या ऐन्द्रिय प्रत्यक्षवाद (Positivism) - इसमें अनुभवातीत तत्व वैज्ञानिक अटकलों तथा पूर्व धारणाओं का परित्याग कर अनुभवप्रदत्तों तक सीमित रह सभी अनुभववादी दर्शनों पर लागू होता है. विभिन्न संदर्भों में प्रयुक्त होकर "वस्तुनिष्ठावाद"यथार्थ, निश्चित एवं शुद्ध के अतिरिक्त उपयोगी, सापेक्ष, नियमबद्ध तथा सहानुभूतिपूर्ण भी बन गया.

•          तार्किक भाववाद  (Logical Positivism) - सत्यापन की प्रक्रिया को ही किसी प्रस्तावना का अर्थ मानकर तार्किक वस्तुनिष्ठावादी परंपरागत दार्शनिक प्रश्नों को निरर्थक मानते हैं क्योंकि इस नवीन व्याख्या के अनुसार इंद्रियातीत विषयों से संबंधित होने के कारण वे कोई अर्थ नहीं रखते. उद्गमन को "कार्य करने का नियम"तथा वैज्ञानिक नियमों को "एकवचनीय प्रस्तावनाओं की योजनाएँ"मानकर तार्किक अनुभववादी विज्ञान का वह संगत चित्र प्रस्तुत करता है जिसके अनुसार तत्ववैज्ञानिक परिकल्पनाएँ पूर्णतया बहिष्कृत हैं. इस के अनुसार तत्वमीमांसा ने भाषा के नियमों का उल्लंघन किया है. इसलिए उसका विश्लेषण करना आवश्यक है. "प्रमाणीकरण"की पद्धत्ति से तत्वमीमांसा का अध्ययन करने के बाद कहा गया कि उसके सारे वाक्य "अर्थहीन"हैं. ईश्वर, आत्मा, अमरता आदि को प्रमाणित नहीं किया जा सकता. दर्शन का काम वास्तविकता की खोज करना नहीं, बल्कि वैज्ञानिक वाक्यों का अध्ययन करना हे. इस प्रकार कोई भी वाक्य प्रमाणीकरण के सिद्धांत पर खरा उतरता है तो उसे सार्थक कहा जा सकता है, नहीं उतरता तो वह अर्थहीन है.
•         प्रतिभासवाद या भातिवाद  (Phenomenology) - यह व्यक्‍तिनिष्‍ठ अनुभवों और चेतना के संरचनाओं का दार्शनिक अध्ययन है. प्रतिभास से अर्थ है, जो भी प्रदत्त वस्तु प्रत्यक्षानुभूति का विषय बनती हो. प्रतिभासवाद, ज्ञानमीमांसा से अध्ययन प्रारंभ नहीं करता. दूसरी विशेषता यह है कि प्रतिभासवाद सारतत्वों को विषयवस्तु के रूप में चुनता है. ये सारतत्व प्रतिभासी आदर्श एवं बोधगम्य होते हैं. ये प्रत्याक्षानुभूति की क्रिया में मन में छूट जाते हैं इसीलिए इसे सारतत्वों का दर्शन भी कहते हैं.

•         अस्तित्ववाद (Existentialism) - अस्तित्ववाद में मृत्यु को दर्शन का आरंभिक बिंदु माना गया है. यास्पर्स के अनुसार दार्शनिकता का अर्थ है यह सीखना कि हम कैसे मृत्यु को प्राप्त हों. इसी को कहते हैं कि अस्तित्ववाद की समस्या आदमी की अस्तित्वपरक समस्या है. "अस्तित्व"ही इस स्कूल के अनुसार अध्ययन की मूल वस्तु है. अस्तित्व की परिभाषा प्राय: लोगों ने अलग-अलग दी है. किंतु इन सबके अनुसार, अस्तित्व आदमी के अस्तित्व के अतिरिक्त कोई दूसरी वस्तु नहीं है. आदमी स्वयं अपना निर्माण करता है और यह निर्माण उसकी स्वतंत्रता सिद्ध करता है.
(प्रचण्ड प्रवीर, अरुण देव, प्रत्यूष पुष्कर )

अन्यत्र : किन्नौर और स्पीति में कुछ दिन : कल्पना त्रिपाठी पंत

$
0
0
(buddha at langza)











किन्नौर और स्पीति का यह यात्रा-वृतांत जिजीविषा और जीवट की भी यात्रा है. दुर्गम जगहों को इसी जीवट ने  मनुष्य की बस्तियों में बदल दिया है. कल्पना पंत ने  बड़े सधे ढंग से इस यात्रा को लिखा है.
नीरज पंत द्वारा खींची गयीं तस्वीरों से यह और भी मोहक लगता है.




अन्यत्र

किन्नौर और स्पीति में कुछ दिन                       

कल्पना त्रिपाठी पंत 
_______________________


न् दो हजार चौदह मई का अंतिम सप्ताह. सूरज का ताप चरम पर है, पारा पैंतालीस पार कर चुका है  बच्चों की परीक्षाएँ समाप्ति की ओर थीं और  अपने आवास के वातानु्कूलित कक्ष में दुबके रहने की अपेक्षा  सपरिवार  हिमालय के किसी  शीतल, शान्त  और  जनाकुलता से मुक्त  अपेक्षाकृ्त  मुक्त  क्षेत्र की तलाश कर ही रहे थे कि लगा क्यों न इस बार  इन सभी तत्वों से  लगभग परिपूर्ण किन्नर भूमि का दीदार किया जाय.

ऋषिकेश से सोलन, सरहां होते हुए शिमला. शिमला से किन्नौर की ओर बढ़ने पर पहले देवदार और बाँज के घने जंगलों से होते हुए  संजोली , ढल्ली ,चैल, ठियोग, कुफ्री, ज़ुर फिर सेब के बागानों के बीच से नारकण्डा रामपुर बुशहर से सतलज के किनारे -किनारे होते हुए किन्नौर में स्थित कल्पा.

कल्पा जाते समय हमने दोपहर का भोजन टापरी नामक जिस स्थान पर किया, उस भोजनालय की स्थानीय ताजा दाल-चावल का स्वाद और भोजनालय के मालिक का स्वयं खाने के लिए आग्रह एवं बार-बार आवश्यकता पूछना अभी तक मन में बसा हुआ है.

यहाँ से आगे करछम नामक स्थान पर बसपा और सतलज के संगम में बाँध बना हुआ है, करछम से आगे एक ओर सांगला घाटी है और दूसरी ओर किन्नौर के मुख्यालय रिकांगपिओ होते हुए कल्पा.  रिकांगपिओ में पिओ स्थानीय निवासी का बोधक है, यहाँ से बौद्ध पताकाएँ और पूजास्थल दिखाई देने लगते हैं. यह नाम तिब्बती -चीनी भाषाओं से आया लगता है.

(kalpa)
रिकांगपिओ से हमारी यात्रा का अत्यंत खूबसूरत पड़ाव  था कल्पा.  सतलज नदी से ऊपर  स्थित हरी- भरी वादियों, सेब के बागानों से सुशोभित कल्पा 2758 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है, मार्ग में कई गोम्पा और छोटे मंदिर भी विद्यमान हैं यहाँ हम जिस आवास में रुके वहाँ से किन्नर कैलाश का दृश्य अत्यंत नयनाभिराम प्रतीत हो रहा था.कैलाश के समान ही मान्य किन्नर कैलाश या किन्नौर कैलाश. किन्नौर कैलाश 6050 मीटर है, इसके शिखर पर एक 70 मीटर ऊँची शिवलिंगाकृति सी  है. ,स्थानीय निवासियों  के अनुसार अनुसार  शिव कुछ समय तक किन्नर के रूप में इस स्थान पर रहे ( प्राचीन ग्रन्थों के अनुसार किन्नौर के वासी को किन्नर कहा जाता है. जिसका अर्थ है- आधा नर और आधा ईश्वर .महाकवि भारवि ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ किरातार्जुनीय महाकाव्य के हिमालय वर्णन खण्ड (पांचवा सर्ग, श्लोक १७) में किन्नर, गन्धर्व, यक्ष तथा अप्सराओं आदि देव-योनियों के किन्नर देश में निवास होने का वर्णन किया है ) और अब भी उनके चरणचिह्न इस स्थान पर विद्यमान हैं  यही तो कालिदास के यक्ष  ने मेघ को बताया था :

"तत्र व्यक्तं दृषदि चरणन्यासमर्धेन्दुमौले:
शश्वत्सिद्वैरूपचितबलिं भक्तिनम्र:परीया:
यस्मिन् दृष्टा करणविगमादूर्ध्वमुदधूतपापा:
कल्पिष्यन्ते स्थिरगणपदप्राप्तये श्रद्दधाना:

(उस हिमालय की किसी एक शिला में भगवान शंकरका चरणचिन्ह स्पष्ट दिखाई देता है जिसकी सिद्ध लोग निरन्तर पूजा करते है और जिसका दर्शन होनेपर श्रद्धालु भक्तजन मरनेके बाद पाप रहित होकर स्थायी रुपसे शिवजीके पार्षद होनेके लिये समर्थ हो जाते है. तुम भी उसकीभक्तिपूर्वक प्रदक्षिणा करना-मेघदूत पूर्वमेघ छन्द (59)

किन्नर कैलाश में एक गोम्पा के पास हमारी मुलाकात संगीता और उनकी माँ से हुई वे दोनों एक गोम्पा के पास दीवार पर सुस्ताने के लिए रुके हुए थे. संगीता सलवार कुर्ते और किन्नौरी  टोपी  धारण किए हुईं थीं  जबकि  उनकी माँ ने किन्नौर का  पारंपरिक  परिधान पहन रखा था. उन्होंने हमें स्थानीय परिधानों और परम्पराओं के बारे बताते हुए एक किन्नौरी टोपी अपनी स्मृति के तौर पर भेंट में दी.

शिमला से जिस वाहन  में हम चले थे उसके चालक कुकी भाई को इस सम्पूर्ण क्षेत्र के भूगोल,  जन-जीवन, रीति -रिवाज और परम्पराओं का विशद ज्ञान था, कुकी भाई इस बात से अत्यंत प्रसन्न थे  कि हम लोग केवल जरूरी सामान लेकर ही इस यात्रा में चले थे, उनका कहना था कि कई बार लोग इतने साजो सामान के साथ आते जाते हैं कि पूरे समय सामान ही सहेजते रह जाते हैं. कुकी भाई ने बताया कि पारिवारिक कठिनाईयों के कारण मात्र नौ वर्ष की अवस्था में वे यात्रियों को लेकर लद्दाख चले गए थे, साथ ही कारगिल और अन्य मार्गों पर भी वे निरन्तर वाहन चलाते रहते हैं, उनका कहना था कि उन्हें कहीं भी आम जिन्दगी में किसी प्रकार का साम्प्रदायिक वैमनस्य नहीं दिखा.उनकी माता मुस्लिम और पिता हिन्दू हैं,किन्तु माँ का बचपन में ही देहावसान हो चुका था, हमारे साथ नौ  वर्षीय हमारा सुपुत्र भी था, मैं कुकी भाई की कहानी सुन रही थी और यकींन नहीं कर पा रही थी कि उसी उम्र का बच्चा और इतनी दुष्कर यात्रा!! खैर ज़िन्दगी की कठिनाईयाँ सब सिखा देती हैं.

कल्पा में एक दिन ठहरने के बाद अगली सुबह हम ताबो मठ के लिए निकले ,यहाँ से हम रिकांगपिओ, पीओ के बाद कांसग नाला व खारो पुल आता है.(खारो पुल के सामने लगे हुए एक सूचना पट्ट  पर लिखा था कि आप इस समय विश्व के सबसे दुर्गम मार्ग पर यात्रा कर रहे है.)
(kaza)

रिकांगपिओ से उनहत्तर किमी. की दूरी पर खाब  में स्पीति और सतलज नदी का संगम है. कुकी भाई ने बताया कि खाब सुई को कहते हैं .यहाँ से आगे नाको की ओर घुमावदार चढ़ाई वाला रास्ता है. रास्ता दुष्कर था लेकिन पर्वतीय अंचल की खूबसूरती बेमिसाल थी नाको की समुद्र सतह से ऊँचाई लगभग तीन हजार छ: सौ बासठ मीटर है ,नाको का प्रमुख आकर्षण नाको झील है, जिसके किनारे पत्थरों पर तिब्बती लिपि में  ओम नमो मणिपद्मोहं में  लिखा हुआ है, अत्यंत सरल पहाड़ी जीवन और नीले आसमाँ के नीचे नीली झील का  अनुपम दृश्य! नाको चीन की सीमा के पास है, और यहीं से नांबिया छिपकिला का पुराना ट्रैक भी है. नाको गाँव में हमने रुककर दोपहर का भोजन किया चटपटी चटनी के साथ मोमोज, थुप्पा और स्थानीय तरीके से बने हुए चाउमीन का ,झील के चारों ओर घर बने हुए थे, उनकी छतों पर संरक्षित किया हुआ अनाज था.

नाको में एक दो घंटे विचरण करने के पश्चात खतरनाक मलिंग नाला पार कर हमने ताबो की ओर चलना प्रारंभ किया, यहाँ धूसर रेतीले पहाड़ो की तलहटी में यदा- कदा बमुश्किल उग पाई वनस्पति और वनस्पतिहीन  पथ से गुरजती स्पीति की धारा सूरज की रोशनी में चाँदी की तरह चमकती हमारे  विपरीत बह रही  थी.

यहाँ से हम खुरदांगपो, चाँगो, शलखर होते हुए सुमदो पहुँचे, यहीं आगे हुरलिंग और चंडीगढ़ नामक दो स्थान नाम भी मिले. सुमदो स्पीति की ओर को किन्नौर का अंतिम गाँव है. सुमदो में हमें कुकी भाई ने गीयू गाँव की प्रसिद्ध ममी के बारे में बताया जो किन्हीं बौद्ध भिक्षु की ममी मानी जाती है. यहाँ की ममी के बारे में किंवदंती भी हमने सुनी कि ममी के नाखून और बाल भी बहुत समय तक बढ़ते रहे.
(tabo monastery)

हमारे सफर का अगला मुकाम था ताबो मठ , यह मठ एक हजार साल पुराना है, इस मठ के स्थापना रिचेन जंगपो द्वारा नौ सौ साठ ईसवी में बौद्ध धर्म के साध -साथ  वैविध्यपूर्ण शिक्षा के उद्देश्य से की  गयी थी, मिट्टी और ईंट से निर्मित ताबो मठ काफी बड़ा है, यहाँ मे मिट्टी से निर्मित कई स्तूप भी हैं साथ ही यहाँ अत्यंत सुन्दर चित्रवीथी से अलंकृत मंदिर विद्यमान है.  मंदिर के भीतर अमिताभ बुद्ध, पद्मसंभव, ग्रीनतारा सेर लेखांग इत्यादि के चित्रों से अलंकृत चित्रवीथी है, चित्रों में चटख रंगों का प्रयोग है, मंदिर की छत भी चित्रों से सुशोभित है, इनके रंगों की चमक बनाये रखने के लिए मंदिर का निर्माण इस भाँति किया गया है कि वहाँ अंधकार रहे,  रंग प्राकृतिक वस्तुओं से निर्मित हैं और उनका संयोजन अद्भुत है. यहां बुद्ध की एक मूर्त्ति भी स्थापित है. यह मूर्ति कश्मीरी शैली में बनी हुई है. अनेकानेक धर्मग्रन्थ भी विद्यमान है. तुस्लांग यहां का प्रमुख मठ है. इस स्थल में अभी भी बौद्ध शिक्षाएँ दी जाती हैं, शाम को हम जब वहाँ पहुँचे तो बौद्ध भिक्षुओं की कोई सभा चल रही थी, धूसर  मटमैली प्रकृति ,जीवन में सादगी और अपराजेय जिजीविषा. एक स्थानीय निवासी ने बताया कि सेबों के बागानों से प्रतिवर्ष वहाँ करोड़ों की आय होती है, यह उनके जीवट और सुनियोजित विकास का नतीजा है कि मरूस्थल में भी धरती जीवन से भरपूर है और हम हरी-भरी धरती को मरुस्थल में तब्दील कर दे रहे हैं.

ताबो मठ के सामने पहाड़ी पर प्रकृति निर्मित गुफाएँ हैं, शांति और ज्ञान की तलाश में बौद्ध भिक्षु इन गुफाओं में एकांतवास करते थे. हमारे सहयात्री नीरज पंत फोटोग्रैफी के लिए इन गुफाओं के भीतर गए. उन्होंने बताया कि बाहर से भले ही ये गुफाएँ अलग -अलग दिखतीं हैं, लेकिन सब अंदर से जुड़ी हुई हैं, गुफाओं की दीवारों पर चित्राकृतियाँ सुशोभित हैं. ये सारी गुफाएँ अलग -अलग भागों में विभाजित हैं,कहीं ध्यान कक्ष तो कहीं भोजन के लिए.
(DANKHAR MONASTERY)
ताबो से दोपहर में चलकर हम बारह सौ साल पुरानी धनकर मॉनेस्ट्री में पहुँचे,जो काजा जाने के मार्ग में पड़ती है, यह मठ अपरदन से बनी हुई विलक्षण संरचनाओं के बीच अवस्थित है,यहाँ से स्पीति और पिन नदी अविरल बहती हुई दिखाई देतीं हैं, लेकिन यह मठ एक खतरनाक भू संरचना पर अवस्थित है, जिसका धीरे-धीरे क्षरण हो रहा है. इसे विश्व की सौ लुप्तप्राय धरोहरों के अंतर्गत रखा गया है. मठ में अन्दर घुसते ही बाँयी ओर बने मिट्टी की सीढ़ियों से होकर ऊपर जाना होता है. इस रास्ते से बालकनी में पहुँच हमने पिन व स्पीति नदी के संगम का दीदार किया. पिन घाटी में नेशनल पार्क है,  यहाँ स्नो लैपर्ड मिलता है. पिन घाटी में ही मुद गाँव है, जहाँ नन मॉनेस्ट्री है. हम इस यात्रा में पिन घाटी नहीं जा पाए. खैर अगली बार सही. पिन नदी, पिन- पार्वती दर्रे से निकलती है और काज़ा से कुछ ही किलोमीटर पहले रंगती गांव में , स्पीति नदी में मिल जाती है.

बालकनी के बाद वापस आकर मुख्य मठ देखा वहाँ अत्यंत पुरानी वस्तुएँ रखी हुई थी. किंवदंती है कि पुराने समय में जब कभी स्पीति घाटी में बाहरी आक्रमण होता था तो यहाँ किले में विद्यमान सैनिक या मठ में लामा आग जलाकर धुआँ कर देते थे. धुआँ देखकर घाटी में संदेश पहुँचने में देर नहीं लगती थी कि हमला हो गया है. नीचे स्पीति से मठ तक पैदल पथ से भी आया जा सकता है. सत्रहवीं शताब्दी में यह छोटा सा गांव स्पीति की राजधानी हुआ करता था.

धनकर मठ से ऊपर की ओर चढ़ाई चढ़कर धनकर झील  दिखाई देती है, हमने दोपहर में धनकर झील की ओर चढ़ाई प्रारंभ की, निरंतर आठ महीने बर्फ से ढके रहने वाले वनस्पतिहीन, भूरे मटियाले इस इस शीत मरुस्थल में दिन का ताप प्रचंड लग रहा था .गला प्यास से सूख रहा था और पानी की बॉटल की रिक्ति देख कलेजा मुँह को आ रहा था मुझे वर्षों पहले की राजस्थान की अपनी उन यात्राओं की स्मृति हो आई, जिन दिनों घुमक्कड़ी का जुनून होने की वजह से मैं अरावली में विद्यमान छोटी -छोटी गढ़ियों और टीलों पर भी गर्मी के कारण प्यास से गला सूखते हुए भी चढ़ कर ही दम लेती थी. इस भाव ने मुझे साहस दिया और हम धनकर झील तक पहुँच गए, धनकर से एक बिसलरी की बॉटल में हम पानी भी लेकर आए. किन्तु उसको धनकर मठ में ही भूल आने का अफसोस हमें बहुत समय तक रहा.

धनकर मठ से जाते समय एक लामा ने हँसते हुए हमारे पुत्र को लामा बनने का आमंत्रण दिया और  वह इस बात के लिए तैयार होकर हमारे साथ आने में आनाकानी करने लगा. काजा की ओर शिचलिंग, लालुंग, लिंगटी ,अत्तरगु, रिदांग(लिदंग) ,शेगो होते हुए काजा में 'स्नो लायन'नामक जिस स्थान पर हमने पड़ाव डाला,वहाँ के मालिक छेरिंग शाक्य के आत्मीय व्यवहार ओर विशद ज्ञान ने हमें अभिभूत कर दिया,  वे स्पीति के राजाओं के वंशजों में से एक  हैं. उन्होंने बताया कि जिन महीनों में समस्त स्पीति घाटी बर्फ से ढक जाती है, और बाहर कोई कार्य करना संभव नहीं होता,  उन दिनों में वे निरन्तर अध्ययन करते हैं. यहाँ स्पीति में यह मई जून का यह मौसम खेती का होता है, इन दिनों ज्यादातर स्कूलों में भी अवकाश रहता है, सर्दियों में स्कूल खुले रहते हैं. यहाँ हम तीन दिवस तक रुके. अगली सुबह हमने काजा से चालीस किमी0 दूर की मठ के लिए प्रस्थान किया, मार्ग में की की ओर जाते हुए हर  सात, आठ किमी. पर गाँव पड़ते हैं, इन गाँवों में पचास-साठ घर हैं,  रांगरिक पहले स्पीति का सबसे बड़ा गाँव था इसकी ऊँचाई 3800 मी0 है. 
komic monastery and village


काजा  से 14 किलोमीटर दूर खुरिक पंचायत रंगरिक गाव की आबादी 640 है .की मठ हिमाचल का सबसे बड़ा मठ है, यह लगभग नौ सौ वर्ष प्राचीन है, सभी मठों में एक बात एक सी थी बीच में अलाव और चारों तरफ रखी लकड़ी की अल्मारियों में ताँबे काँसे और पीतल के चमचमातेे हुए पात्र सजे हुए थे, यहाँ हमारी नवांग छेरिंग लामा से मुलाकात हुई उन्होंने बताया कि वे पन्द्रह बरस से वहाँ हैं, उनके साथ ही उनकी शिष्या केसंग से भी हम मिले जिनकी जीवन्त मुस्कुराहट ने हमारी यात्रा की सारी थकान हर ली, वहाँ हर्बल चाय पीने से ताजगी और स्फूर्ति का आभास हुआ सच में किसी का व्यक्तित्व ही ऐसा होता है कि  उसके आसपास का समस्त परिवेश खुशनुमा हो जाता है. केसंग ने हमें अपने नाम का अर्थ भी बताया -खुशनसीब, खुशनसीब तो नहीं पता पर वे खुशियाँ देने वाली अवश्य हैं. मेरी बेटी ने केसंग के साथ उनकी ताजगी देने वाली मुस्कुराहट को याद  रखने के लिए तस्वीर खिंचवाई. छेरिंग का अर्थ स्पीति की भाषा में लम्बी उम्र है. यही, यहाँ हमने सात सौ साल पुराने लिखे हुए भोजपत्र भी देखे. इस मठ में चाम उत्सव मनाया जाता है मठ में हथियार भी रखे हुए है. मठ के ऊपर यहाँ से दूर -दूर तक फैले हुए खेत दिखाई देते हैं. वहीं से पहाड़ के रास्ते गेते गाँव से नीचे उतरते एक दो लोग भी दिखाई दिए. यह पगडंडी सड़क बनने से पूर्व यहाँ के निवासियों के आवागमन का मार्ग रही होगी.

की’ मठ से  हम चार हजार दो सौ पचास मीटर की ऊंचाई पर विद्यमान गेते गाँव को चले, यहाँ केवल छ: परिवार और कुल तीस -चालीस लोग रहते हैं. यहाँ की प्रधान फसल आलू, जौं और मटर है, घरों की छतों पर शीतकाल के लिए जौं ,चौलाई इत्यादि अनाज  संरक्षित करके रखा गया था, घर मिट्टी  और  पत्थर से निर्मित हैं, घरों की खिड़कयों पर काले पेंट की पट्टियाँ हैं, ये पट्टियाँ समस्त स्पीति की पहचान हैं, किन्नौर से स्पीति की ओर जब हम बढ़े तो वहाँ सभी स्थानों में मकानों में इसी तरह की पट्टियाँ नजर आईं.

(volleyball at langza)
गेते गाँव में हम सिड.डुमा से मिले, जिस समय हम वहाँ पहुँचे वे अपने खेतों में काम कर रहीं थीं, वहीं खेत के पास याक का एक बच्चा बँधा हुआ था. बच्चे याक के साथ खेलने लगे और मुझे सिड.डुमा ने अपने घर के भीतर बुला लिया, घर की छत पर जाड़ों के लिए संरक्षित किया हुआ अनाज रखा था, यहाँ पर हमने चोटियों के समीप की बर्फ को भी छुआ. बर्फीली चोटियों के बीच विद्यमान वह घर अंदर से कुनकुना गर्म था. सीढ़ियों के ऊपर छोटे कमरे में चातप था, उन्होंने मुझे बताया  कि स्पीति भाषा के चातप का अर्थ हिन्दी में तंदूर है.सिड.डुमा ने मुझे चाय थुंग-थुंग का अर्थ भी बताया, -चाय पीयेगा? गन मन -नहीं पीयेगा? उनकी उम्र साठ-इकसठ साल थी, उनका कहना था कि वे गेते गाँव से कभी बाहर नहीं गयीं, यहाँ तक कि काज़ा भी नहीं, जहाँ उनका बेटा रहता है, उनकी एक पुत्री खेतों में काम करती है और दूसरी सड़क मजदूर है, गेते जाते समय हमें सड़क निर्माण के काम में लगे स्थानीय लोग दिखे, शायद उनकी मेहनत और जीवट का ही नतीज़ा है कि इस ऊँचाई तक स्पीति में सब जगह सड़कें विद्यमान हैं, भले ही ऊपर जाते हुए नीचे देखने पर भयमिश्रित रोमांच होता है, (यहाँ मार्ग में हमने रतनजोत के पौधे भी उगे हुए देखे.)


गेते से हम किब्बर गाँव की ओर चल दिए. पहले केवल किब्बर गाँव तक ही सड़क थी, इसलिए किब्बर को ऐशिया का सबसे ऊँचा गाँव माना जाता था, किन्तु अब कॉमिक गाँव तक सड़क बन चुकी है. यहाँ हर गाँव में गाँव की ऊँचाई और जनसंख्या लिखी हुई है, किब्बर की ऊँचाई चार हजार दो सौ सत्तर मीटर और जनसंख्या सौ है किब्बर का मुख्य आकर्षण यहाँ के लोक नृत्य हैं, कुकी भाई ने हमें बताया कि किब्बर में दक्कांग मेला लगता है जिसमें युवतियाँ मनमोहक परिधानों में नृत्य करतीं हैं चुस्त पायजामा, ल्हम (एक विशेष प्रकार का जूता) शमो (फर की टोपी) इत्यादि यहाँ के मुख्य परिधान हैं. विवाह लड़के-लड़कियों की परस्पर सहमति से होते हैं.


पुन: हम काजा लौटे शाम को मैं काज़ा के बाजार में घूम कर आई, जहाँ यद्यपि जरूरत का सारा सामान मिल रहा था, पर कई वस्तुओं और कुछ दवाओं के बारे में पूछने पर स्थानीय दुकानदारों ने बताया कि यहाँ सामान की उपलब्धता आसान नहीं है.
(langza village life)

अगली सुबह काजा़ मठ जाते समय हमें मार्ग में कई स्तूप मिले, साथ ही एक पहाड़ी पगडंडी जो घरों के बीच से होकर गुजर रही थी, वहाँ हमें एक पेड़ के नीचे बड़ी-बड़ी पूड़ियाँ जो हमारे घरों में विवाह आदि अवसरों पर बनने वाले रोट जैसी लग रहीं थीं, और साथ में थुप्पा बना रहीं थीं,बहुत सी स्त्रियाँ जीम रहीं थीं. पूछने पर पता चला कि उस घर में किसी की मृत्यु हो गयी थी, यह मृत्यु भोज था, उन्होंने भोजन ग्रहण करने के लिए हमसे भी आग्रह किया. उनसे विदा लेकर हमने मठ का अवलोकन किया, उनसे विदा लेकर हमने काजा में विद्यमान स्तूपों और मठ का अवलोकन किया. यह मठ अत्यंत भव्य है.

अगले दिन हम हिक्किम लांग्जा और  कॉमिक गाँव  गए. लांग्जा चार हजार चार सौ मीटर ऊँचा है, यह कनामो पर्वत की तलहटी पर बसा हुआ है. यहाँ की जनसंख्या एक सौ अड़तालीस है. यहाँ बुद्ध की एक विशाल प्रतिमा है जो दूर-दूर से दिखाई देती है, लांग्जा में हमने देखा कि ऊपर चारों ओर से पहाडियों पर विद्यमान घरों के बीचों -बीच नीचे एक स्कूल के मैदान में लड़के-लड़कियाँ वालीबॉल खेल रहे थे.लांग्जा में हमें कुछ फॉसिल भी मिले. -भूगर्भविज्ञानियों के अनुसार यहाँ फॉसिल मिलने का कारण यह है कि स्पीति घाटी का निर्माण भारतीय और यूरेशियन प्लेटो के टकराने से हुआ था, ये जीवाश्म टैथिस सागर के अवशेषों में से हैं. लांग्जा से से दुनिया के सबसे ऊँचे सड़क मार्ग से जुड़े गाँव कॉमिक की ओर जाते समय हमने बर्फ से ढकी चोटियों के नीचे  हरे -भरे घास के मैदान में याक  और चँवर  गाय के  चरते हुए झुंड देखे. 


वहीं एक चट्टान पर चरते हुए भरल  (ब्लू शीप) के  झुंड दिखाई दिए. छोटे बच्चों को पीठ पर बाँधे कर ले जाती हुई तीन चार युवतियों ने बताया कि ऊपर कोई नहीं मिलेगा, क्योंकि वहाँ किन्ही बौद्ध गुरु की मृत्यु हो गयी है,  कॉमिक में उस दिन कोई व्यक्ति नहीं दिखा, शव को मठ के भीतर रख वहाँ कुछ धार्मिक क्रियाएँ चल रहीं थीं,किन्तु अपनी इस यात्रा में यह पहला मठ मैंने देखा, जहाँ महिलाओं का जाना निषिद्ध था.  कॉमिक के पश्चात हमने वापसी की यात्रा प्रारंभ की,  काजा, ताबो होते हुए कल्पा लौटे. अब सांगला घाटी हमारा अगला आकर्षण थी, यहाँ एक जल सुरंग है इसका एक सिरा करछम में है और दूसरा वांगतू में.
(yak in spiti)

करछम में सांगला घाटी से आती हुई बास्पा नदी सतलुज में मिल जाती है. करछम सांगला घाटी का अत्य़ंत सुंदर द्वार है. करछम से सांगला की ओर की यात्रा में चारों ओर बर्फ से ढकी चोटियाँ, हरे-भरे पर्वत, घास के मैदान, झरने, घने जंगल और, लकड़ी के बने खूबसूरत शिखरों वाले घर दिखाई देते हैं.  कुकी भाई ने  बताया कि अब  लकड़ी के खूबसूरत शिखरों वाले मकानों को बनाने वाले कारीगर बहुत  थोड़े से ही रह गये हैं, नई पीढ़ी इस परंपरा को  छोड़ रही है, सुनकर मन उदास हुआ सांगला की ओर से लमखगा दर्रे से जाने पर दूसरी ओर हरसिल में उतरते हैं. हमने रात्रि रकछम में व्यतीत की. रकछम.

सात जून को हम किन्नौर के रकछम गाँव में थे. देर शाम मै और मेरा बेटा हम दोनों एक झरने के किनारे थे.वह पानी में उतरने की जिद करने लगा. मैने उसे समझाया कि पहाड में मान्यता है कि शाम होने के बाद नदी और गाड़ -गधेरों के पानी में नहीं उतरते . इसका कारण यह है कि शाम होने के साथ-साथ नदियों नालों में पानी बढने लगता है.इसलिये यात्रा में यह सावधानी जरूरी है कि कभी भी शाम होने के समय और अनजान जगह में नदियों में ,  पहाडी गधेरों में न उतरें
Nako Lake

काजा से छितकुल जाकर हमने शमशेर देवता का लकड़ी का बना हुआ भव्य मंदिर देखा, यहाँ के दरवाजों और खिड़कियों में लकड़ी  पर अत्यंत कलात्मक  नक्काशी है ,सांगला से लेकर छितकुल तक घरों और मंदिरों के शिखर एक ही शैली के हैं. छितकुल से तिब्बत की ओर किन्नौर का अंतिम गाँव है, यहाँ से तिब्बत बस थोड़ा ही दूर है, मुझे राहुल साकृत्यायन की तिब्बत यात्रा के संस्मरण फिर से पढ़ने का मन हो रहा था, और कुकी भाई हमें खाम्पाओं के बारे में बता रहे थे, खेतों में आलू बोए जा चुके थे, कुछ किसान  खेतों में हल जोत रहे थे, कुछ महिलाएँ हैरो ( Harrow-खेती का एक उपकरण) लिए हुए खेतों की ओर जा रहीं थीं, और कुछ गुड़ाई कर रहीं थीं,और कुछ मिट्टी के ढेले तोड़ रहीं थीं. यहाँ  भी पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं के हिस्से  अधिक काम है. हमने छितकुल से नीचे गुजरती हुई बसपा नदी को देखा एक ओर तिब्बत और दूसरी ओर गढवाल हिमालय.


प्रकृति ने कितनी धरोहरों से नवाज़ा है हमें, पर हमने तो उसे ही समेटना प्रारंभ कर दिया है, यह सोचते हुए मैं चल रही थी कि नन्ही भतीजी को पीठ पर बाँधे खिलंदड़ी नदी की तरह बहती अदिति की चाची से मुलाकात हुई,जो अपनी सहज मुस्कुराहट के साथ शीघ्र ही हमारी मित्र बन गयी, उन्हें यह वचन देकर की हम जल्दी ही छितकुल दोबारा आएंगे, हमने वापसी की यात्रा प्रारंभ की, और चंडीगढ़  मार्ग होते हुए वापस ऋषिकेश  लौटे.

आज पूरे तीन वर्ष के उपरांत अपनी स्मृतियों को  लिपिबद्ध करते हुए भी मै  स्पीति और किन्नौर के विलक्षण सौन्दर्य, वहाँ के निवासियों के जीवट, प्रकृति के साथ एकमेक होकर चलने की उनकी लगन को महसूस कर रही हूँ , इच्छा है कि ऐसा ही विकास उत्तराखंड का भी हो. उन्होंने वहाँ प्रकृति को नुकसान पहुँचाए बिना रोजगार पैदा किए हैं और पलायन को रोका है, स्पीति के ठंडे मरुस्थल की दुर्गम परिस्थितियों के निवासी प्रसन्न होकर जीने का हौसला रखते हैं, वे रेगिस्तान को नखलिस्तान में तब्दील करने की जुगत में लगे हुए हैं और हम आधुनिकता की अंधी दौड़ में प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं,  किन्नौर जाते हुए स्थान-स्थान पर रेन शैल्टर दिखाई देते हैं, और किन्नौर और स्पीति में कहीं भी  पान गुटखा के खोमचे नहीं दिखाई देते, हिमाचल की यात्रा फलों से आपका स्वागत करती है. 


पर्वतीय अंचल की बीहड़ कठिनाइयों के मध्य सामंजस्य करते हुए जीने के अवसर तलाशना मनुष्य की जीवनी शक्ति का सच्चा प्रतिबिम्ब है.
_____________________


kalpanapnt@gmail.com

परख : प्रेम में डर (कविता संग्रह ): निवेदिता

$
0
0




















निवेदिता का रंगमंच से जुडाव है. पत्रकारिता का लंबा अनुभव रहा है. महिला मुद्दों पर सक्रिय रहती हैं.
निवेदिता का पहला कविता संग्रह –‘ज़ख़्म जितने थे’ २०१४ में प्रकाशित हुआ था. ‘प्रेम में डर’ इसी वर्ष वाणी से प्रकाशित हुआ है.


प्रेम में डर : निवेदिता                                        
सुनीता गुप्ता



फरत से खौलते एक ऐसे समय में जब प्रेम करना अपराध हो गया है और प्रेम की बात करना देशद्रोह, निवेदिता अपनी कविताओं के साथ प्रेम के पक्ष में मजबूती से खड़ी होती हुई न केवल प्रेम का अनहद राग रचती हैं बल्कि अपने समय से टकराती भी हैं.ऐसे में इसे कबीर के ढाई आखर का सामयिक विस्तार कह सकते हैं. राजेन्द्र यादव ने एक बार लिखा था कि हर प्रेम अपने समय से एक विद्रोह है. निवेदिता के नवीनतम कविता संग्रह प्रेम में डरकी कविताओं को इस संदर्भ में देखते हुए सहज ही इसकी पुष्टि हो जाती है.  स्त्री कविता की परम्परा में रखते हुए इस धारदार तेवर का सहज ही अभिज्ञान किया जा सकता है. जिस प्रेम के लिए मीरा लिखती हैं कि जो ऐसा मैं जानती प्रेम किये दुख होय, नगर ढ़िंढ़ोरा पीटती रे प्रेम न कीजै कोयऔर जिस प्रेम को महादेवी वर्मा तुम मुझ में प्रिय फिर परिचय क्याकहकर रहस्य के अभेद्य आवरण में छुपा ले जाती हैं, निवेदिता उसीका अकुंठ भाव से गान करती हुई उसे प्रसाद की तरह मेरे क्षितिज उदार बनोकी उंचाई तक ले जाती हैं.

प्रेम में डरनिवेदिता का दूसरा कविता संग्रह है. कोई आश्चर्य नहीं कि प्रेम इस संग्रह का मूल स्वर है जो पूरे संग्रह में परिव्याप्त है. कविता एक अंतर्मुखी विधा होती है. यह पाठकों से सीधा साक्षात है. यही कारण है कि अपने आपमें संकुचित स्त्री व्यक्तित्व को इसमें खुलने में वक्त लगा. स्त्री ने कविता में अपने को व्यक्त करने के लिए कभी भक्ति का आश्रय लिया, कभी राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष का तो कभी प्रकृति का, कविता में तो वह मुक्त भाव से आयी नब्बे के बाद पर यहां भी वह अपनी सदियों से प्रदत्त यातना और प्रताड़नाओं के साथ आयी. अपनी अस्मिता की गहन, सांद्र अभिव्यक्ति को निवेदिता की इन कविताओं में देखा जा सकता है. प्रेम यहां गहन अनुभूति के साथ मांसल और ठोस रूप में उपस्थित होता हुआ स्त्री कविता में प्रेम को भावलोक से मुक्त करता है. मेरे प्यारशीर्षक कविता इसका श्रेष्ठ उदाहरण है. जगह जगह प्रेम के इस नितांत व्यक्तिगत उद्याम आवेग को महसूस किया जा सकता है –

तुम्हीं थे जिसने
मेरी देह पर मन रख दिया था
मेरी जिस्म पर बैंगनी फूल खिले
मेरे तन के कोने कोने से बहती रही नदी."

पर यह उनकी कविताओं का एक पक्ष है, निवेदिता का प्रेम अपनी सीमाओं में आबद्ध नहीं है. यह प्रेम है जो उन्हें अपने चतुर्दिक के परिवेश से जोड़ता है और अपने समय को समझने की दृष्टि और जूझने की ताकत देता है. इसीलिए वे आगे बढकर प्रस्तुत होती हैं –

‘‘उठो मेरे प्रिय
मेरे साथ चलो
कि हम चलें
जहां प्रेम सर झुकाये खड़ा है
जहां प्रेम डरा है."

कोई आश्चर्य नहीं कि शीर्षक के अनुरूप संग्रह की कविताएं प्रेम से लबालब हैं, जैसे स्वयं कवयित्री सराबोर हैं! पर कवयित्री के इस प्रेम को व्यक्तिगत परिधि में कैद नहीं है. निवेदिता की कविताओं में प्रेम हवा की तरह परिव्याप्त, जल की तरह जीवनदायिनी और घास की तरह उर्वर है –

‘‘प्यार खेतों में धान रोपने की तरह है
प्यार हरी घास है जो हर भीगी
सतह पर उग आती है.”

प्रेम यहां कई कई रूपों में उपस्थित होकर जीवन को समृद्ध करता है. निवेदिता इसे परिभाषित करती हुई आगे बढ़ जाती हैं और फिर वह नवीन रूपों में उपस्थित हो जाता है. कभी प्रेम जीवन के संरक्षक के रूप में उपस्थित होता हैं-  प्रेम ही है, जो बचा लेता है, हमें बार बार , कभी दलदल की तरह पीड़ा में गहरे धंसा ले जाता है, यह कभी कुआं बन जाता हैकभी लम्बी कविताबन जाता है, यह सीमाओं का अतिक्रमण करता है.प्रेम सरहदों के पार जाता है, यह मौत से भी मुकाबला करता है, अद्भुत है प्रेम, धड़कता है कसाईघर में भी, यह बिखरने से बचाताहै और धूप की तरहखिलना सिखलाता है.
(निवेदिता)

निवेदिता की कविताओं में जब यह भूख और रोटीबनकर आता है तो किसी भी प्रकार की रुमानियता को भंग करता हुआ जीवन की आदिम जरूरत बन धमनियों में प्रवाहित हो जाता है. कह सकते हैं कि निवेदिता का प्रेम अपारिभाषित है, बार बार परिभाषाओं की परिधि में बांधने के बावजूद कुछ ना कुछ छूट ही जाता है. निवेदिता का यह प्रेम अपरिभाषित ही नही है, असीमित भी है - कई कई रूपों यह अपनी उपस्थिति दर्ज करता है. यह जीवन का रसमय तो करता ही है, उसे उर्जावान भी करता है, उसके प्रति मोह भी पैदा करता है और उससे भी बड़ी बात कि यह जगत के प्रति संवेदनशील बनाता है और उससे भी आगे बढ़कर यह कवयित्री में वह प्रतिरोध की ताकत भरता है जिसके बूते पर वे हर प्रकार के अन्याय के विरुद्ध साहस के साथ खड़ी हो पाती हैं. निवेदिता की कविताएं बताती हैं कि साहस के बिना प्रेम व्यर्थ है - इसके अभाव में हम प्रेम के अस्तित्व की रक्षा नहीं कर सकते. ये कविताएं यह भी बताती हैं कि प्रेम से भरा हुआ हृदय ही एक सुंदर दुनिया रच सकता है. प्रेम के बल पर ही यह दुनिया टिकी हुई है –

प्रेम है जो बचाता है देश को
लोगों को.'

यह प्रेम ही है जो कवयित्री को अन्याय के प्रतिवाद में प्राण त्यागने वाले अपने मित्र चन्द्रशेखर के निकट ला खड़ा करता है, बांग्लादेश के अभिजीत रॉय, सागर किनारे मृत पड़े बच्चे अयलान के माध्यम से हिंसक हो रही धरती के प्रति चिंता से भर देता है. मारे गये पत्रकारों पर  भी निवेदिता की कविता है. ऐसे में दुनिया को बचाने के लिए वे प्रेम का आह्वान करती हैं.

प्रेम व्यक्ति को संवेदनशील बनाता है. यह अनायास नहीं है कि कवयित्री जहां कहीं भी कोई अन्याय का शिकार है, उसके पक्ष में खड़ी हो जाती हैं. उनकी संवेदनाओं की परिधि बहुत विस्तृत है जिसमें हिंसक हो रही धरती, प्रदूषित हो रहा पर्यावरण, सूख रही नदी, छूट रहा गांव - बहुत कुछ शामिल है.

निवेदिता का प्रेम एकांगी नहीं है. वह व्याप्त है धरती से लेकर अम्बर, झीलों, नदी, सागर तक. यही कारण है कि इन सब पर जहां कहीं खतरा दीखता है तो कवयित्री दुख से भर जाती हैं और उसे बचाने के लिए गुहार लगाती हैं. निवेदिता की कविताएं प्रेम का राग ही नहीं, एक गुहार भी है जो धरती को बचाने के आर्तनाद से भरी हुई हैं.

यह प्रेम है जो कवयित्री को विध्वंस के विपक्ष में खड़ा करता है और उनमें अपार साहस बढ़ता है. प्रेम उनकी कविताओं में उम्मीद बनकर भी आता है. प्रेम यदि जीवन का र्प्याय है तो इस रूप में कि प्रेम ही सर्जना है और हर ध्वंस के बाद उम्मीद बनकर एक बार फिर जीवन का पुनःसृजन करता है - कौन अस्वीकार कर सकता है कि शिव के तांडव और लास्य के पीछे यही प्रेम की शक्ति प्रेरक नहीं थी!

क्हा जा सकता है कि प्रेम में डरकी कविताएं वह बीज हैं जिनसे प्रेम का महाकाव्य रचा जा सकता है. प्रेम के विविध आयाम होते हैं. यह बीज बनकर जीवन को रचता है, वृक्ष बनकर पल्लवित होता है, पुष्प् के रूप् में  सुन्दर बनकर खिलता है और फलों में भविष्य की नवीन उम्मीद बनता है. निवेदिता की कविताएं प्रेम के इन विविध रूपों को स्पर्श करती हैं. वे प्रेम की आत्ममुग्धता से बाहर निकलकर अपने समय की विडबनाओं से भी टकराती हैं. साहस और उम्मीद उनकी कविताओं का मूल स्वर हैं जो कवयित्री के दीप्त व्यक्तित्व की ही प्रतिछाया हैं. स्त्री अस्मिता की गहन अनुगूंज से निनादित ये कविताएं स्त्री कविता का नया भाष्य रचती हैं, इससे इनकार नहीं किया जा सकता.  

नदी का बिम्ब निवेदिता की कविताओं में बार बार आया है. इस नदी के आधार पर निवेदिता की कविताओं का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया जा सकता है. नदी को कवयित्री के अंतर्मन में प्रवाहित उस रस स्रोत के रूप में देखा जा सकता है जो उनके जीवन के साथ उनकी कविताओं को भी रससिक्त करता है और जिसकी प्रत्यक्ष और गौण उपस्थिति को पूरे संग्रह में महसूस किया जा सकता है. नदी की तरह ही अपने ही आवेग से प्रवाहित ये कविताएं जीवन को सींचती हैं.
________________
सुनीता गुप्ता
मो: 947324299
sunitag67@yahoo.com

सबद भेद : कविता क्या है : अच्युतानंद मिश्र

$
0
0









अच्युतानंद मिश्र कवि हैं और सैद्धांतिक आलोचना के क्षेत्र में भी सक्रिय हैं. आधार प्रकाशन से उनकी किताब ‘बाज़ार के अरण्य में’इस वर्ष प्रकाशित हुई है. 


कविता क्या है ? यह जिज्ञासा पुरानी है. कवियों आलोचकों ने इसे तरह–तरह से समझा है. अच्युतानंद मिश्र मानते हैं कि वह मनुष्यता के स्पंदन का जीवित इतिहास है






कविता मनुष्यता के स्पंदन का जीवित इतिहास है              
अच्युतानंद मिश्र



गर हम आरम्भ से शुरू करें तो उसके अंत तक पहुँच सकेंगे. बहुत हुआ तो मध्य के आरम्भ तक पहुँच पायेंगे. बात इसके आगे नहीं बढ़ पाएगी.किसी चीज़ के आगे बढ़ने के लिए यह जरुरी है कि अंत दूर हो, लेकिन अगर अंत पास आ जाये तो आगे बढ़ना मुमकिन न होगा.ऐसीस्थिति में बेहतर यही होगा कि हम आरम्भ, मध्य और अंत के सपाट विभाजन को दरकिनार कर थोड़ा-थोड़ा सबको मिलाकर कहीं बीच में पहुँचने की कोशिश करें. कविता इसमें हमारी मदद कर सकती है. वह मनुष्यता के आरम्भ से आज तक साथ रही है.


बीसवीं सदी के अधिकांश दार्शनिकों का संकट यह था किवे उन्नीसवीं सदी से शुरू कर बीसवीं सदी तक समाप्त करना चाहते थे.वे खुद को अंत के बेहद करीब महसूस कर रहे थेजाहिर है ऐसे में उनके लिए बहुत आगे बढ़ना मुमकिन नहीं था. ऐसे में जिस दार्शनिक आपाधापी का वे शिकार हुए उसमें कविता का प्रश्न थोड़ा पीछे छूटता गया. एडोर्नो से लेकर बौद्रिया तक कविता की उम्मीद खो चुके थे .लेकिन कवितायेँ लिखी जा रही थी और कवि गर्म दिनों की कल्पना में भीतर और बाहर एक शीतयुद्ध लड़ रहे थे.


यह अनायास नहीं है कि अंत की घोषणा करनेवाले बहुत से चिंतकों ने इक्कीसवीं सदी में फिर से आरम्भ करने पर बल दिया. पहले वे पाठ और पाठक के अंत की बात कर चुके थे अब वे पाठ किस तरह करें, इस पर पुनर्विचार करने लगे. बीसवीं सदी विचार के अंत और पुनर्विचार के प्रारंभ दोनों के सह-अस्तित्व की सदी रही.इन तमाम अंत और शुरुवात के बीच बीसवीं सदी की कविता सतत प्रवाहमान रही.हालाँकि, कविता के अंत की घोषणाएं भी किन्हीं और संदर्भों और अर्थों में होती ही रही. ऐसे में यह जरुरी हो उठता है कि कविता के संदर्भ में हम आरम्भ, मध्य और अंत को ओझल करते हुए समाज में कविता की भूमिका और प्रासंगिकता पर बात करें .


चीजें जब टूटती हैं या टूटने की प्रक्रिया में होती हैं तो उनका वस्तुपक्ष अधिक प्रभावी नज़र आने लगता है.कविता इसका निषेध करती है. हम सबका आत्म एक मुक्कमिल कविता है, जिसकी जड़ें हमारे सुदूर अतीत में फैली है. जहाँ हम अपने आत्म के द्वारा सीमाओं का लगातार अतिक्रमण करते रहते हैं, वहीँ वस्तुगतताउसे एक पुख्ता ज्यामितिक सीमा में बदल देना चाहती है.कविता अपने स्वरूप में, अपनी चेतना में, अपने अर्थ ग्रहण में मूर्तन का अतिक्रमण करती है औरअमूर्तन का निषेध.अभिव्यक्ति का कोई भी स्वरुप अंततः अमूर्तन से संघर्ष ही है.


हम भक्तिकाल की श्रेष्ठ कविताओं को देखें तो उनके विश्लेषण में यह बात शिद्दत से महसूस की जा सकती है कि जिसे हम निर्गुण समझ रहे होते हैं वह हमारी चेतना में एक सगुणउपस्थिति दर्ज़ करती है और इसी तरह सगुण के विस्तार को समझने के लिए हम निर्गुण के रास्ते अप्रकट संभावनाओं पर विचार करते हैं. ऐसे में यह स्पष्ट है कि कविता वस्तुकरण की समस्त प्रक्रियाओं को चुनौती देती है.


कविता और समाज के सम्बन्धों पर बात करने का अर्थ यह है कि अव्वल हम इस पर ध्यान केन्द्रित करें कि कविता क्या इंगित करती है? उसका लक्ष्य कौन है?वह व्यक्ति और समाज के मध्य किन अंतरालों से होकर गुजरती है? सबसे अहम् यह कि अगर किसी समाज में कविता की संभावना न रह जाये तो उस समाज के विषय में हम क्या निष्कर्ष निकाल सकते हैं? द्वितीय विश्वयुद्ध ने मनुष्यता के समक्ष जो चुनौती प्रस्तुत की थी उसके आलोक में कविता और मनुष्यता के अस्तित्व का संकट अलग अलग नहीं रह गया था.


कविता भाषा की वांछित शक्ति है

कविता भाषा का सबसे अधिक प्रभावी रूप है. भाषा के मूर्त और अमूर्त दोनों तरह के प्रभावों को कविता अपने में समाहित किये रहती है. इसलिए वह भाषा के उस उच्च शिखर की तरह है जहाँ हर वक्ता जाने की आकांक्षा रखता है. यही वह आदिम चेतना है कि दुनिया का हर मनुष्य कलाकार के रूप में कभी न कभी कवि होने की आकांक्षा रखता है.

जब हम यह कहते हैं कि ‘मुझे वह पुस्तक लाकर दो’ तो भाषा का मूर्त उद्देश्य उसमें अंतर्निहित होता है, जो श्रोता के समक्ष प्रकट होता है. श्रोता इसे सुनकर क्रियाशील हो जाता है. वह अपने विवेक अनुसार तय करता है कि उसे क्या करना है. उसके पास दो विकल्प रह जाते हैं. दोनों ही एक तरह से क्रिया हैं. स्पष्ट है कि भाषा का यह रूप हमें प्रकट रूप से क्रियाशील बनाता है. यहाँ वक्ता और श्रोता दोनों मिलकर एक द्वैत का निर्माण करते हैं. लेकिन संवाद या भाषा के इस रूप कीएक सीमा है. वह इस द्वैत के परे अर्थ का निर्वाह नहीं करती. यानि तीसरे या चौथे की उपस्थिति पर यह प्रभाव नहीं डालती. इस अर्थ में देखें तो कविता का दायरा इस द्वैत का अतिक्रमण करता है.

तुम मेरे पास होते हो गोया
जब कोई दूसरा नहीं होता

ऐसे में यह दिलचस्प है कि कविता की भाषा व्यक्तिगत संवाद की संभावनाओं को विस्तृत कर उसे सामाजिक संवाद में बदल देती है.कविता में यह सब किस तरह होता है? कविता की भाषा निजता से आरम्भ होकर निजता के परे किस तरह चली जाती है? वह किसी एक को संबोधित होकर भी हर किसी को संबोधित होती है. उदाहरण के लिए टी.वी पर समाचार पढ़ती उस स्त्री से हम चाहे जो भी कोण बनायें, हम पायेंगे कि वह हमें ही देखकर समाचार पढ़ रही है. यही बात कविता पर भी लागू होती है. उदाहरण के तौर पर हम निराला की बेहद चर्चित कविता तोड़ती पत्थर को लें

वह तोड़ती पत्थर;
देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर-
वह तोड़ती पत्थर

स्पष्ट है कि इस कविता के आरम्भ की ये पंक्तियाँ हमें इस बात से वाकिफ कराती हैं कि कवि इलाहबाद की सड़कों पर है, दिन गर्मी का है और वह एक श्रमशील स्त्री को देखता है. कविता का बाह्य इन्हीं छवियों से निर्मित है .यह दरअसल कविता का प्रवेश द्वार है. कोई भी पाठक किसी भी शहर, सभ्यता, संस्कृति और समय से सम्बद्ध क्यों न हो, वह इस दरवाजे से प्रवेश कर सकता है . इस प्रवेश के पश्चात भाषा की जिस आरंभिक क्रियाशीलता की बात हमने की वह समाप्त हो जाती है. कविता में आगे बढ़ने से पूर्व हर पाठक अपनी कल्पना और चेतना के संधि स्थल से निर्मित इलाहाबाद शहर की सड़कों पर पहुँच जाता है. जिसने सिर्फ चंडीगढ़ देखा हो उसके लिए इलाहाबाद चंडीगढ़नुमा हो जाएगा,दरभंगा में रहने वाला पाठक इसे दरभंगा में बदल देगा. इस तरह हर पाठक अपने-अपने शहर के रास्ते इलाहाबाद में पहुँच जाएगा .यहाँ ध्यान देने की जरुरत है कि कविता निजता के दायरे का अतिक्रमण कर एक विस्तृत सामाजिक संवाद में बदल चुकी है. जो भी इन पंक्तियों से गुजरेगा उसकी चेतना उसी अनुरूप क्रियाशील होगी .वह स्वयं को इन पंक्तियों का संबोध्य मानकर व्यवहार करेगा. एक बार जब पाठक इस दरवाजे से प्रवेश कर लेगा फिर वह इन वस्तुगत स्थितियों को एक आत्मगत परिस्थितियों में बदलता हुआ महसूस करने लगता है.दुःख, करुणा और विषाद के स्थायी मूल्य हमारी चेतना को घेरने लगते हैं.

देखते देखा मुझे तो एक बार
उस भवन की ओर देखा, छिन्नतार;
देखकर कोई नहीं
देखा मुझे उस दृष्टि से
जो मार खाई रोई नहीं

वह स्त्री कवि को देखती है. इसतरह नहीं कि वह महज उसे देख रही हो. वह इस तरह देखती है कि उसके देखने में एक कहना है. एक भाषिक संवाद.इसके उपरांत वह उस भवन की ओर देखती है. लेकिन क्या यह देखना सिर्फ उस स्त्री का अकेले का देखना है. इसबार उसके देखने में कवि भी शामिल है और इस तरह शामिल है कि वह स्त्री की निगाह से उस भवन की ओर देखता है. यह जो पंक्तियाँ है यह काव्यभाषा की उपलब्धि है. जब भी पाठक  इस कविता को पढ़ता है वह कवि के स्थान पर खुद को पाता है. उसकी चेतना में पहले से मौज़ूद दुःख करुणा और विषाद कविता की स्त्री की दुःख, करुणा और विषाद से जा मिलते हैं. यही मिलना एक काव्यात्मक प्रतिक्रिया है. कविता यही करती है.वह हमें बदलती है. कविता का उद्देश्य यही है. हर महान कविता अपनी वस्तुगतता का अतिक्रमण कर पाठक की आत्मगतता को विस्तृत करती है. कविता हमें अधिक मनुष्य बना देती है. 


इस कविता को पढने के बाद हमारा आत्म बदल जाता है. हमारे भीतर पहले से मौजूद संवेदना पुनर्जीवित हो उठती है. फलस्वरूप हम कुछ बेहतर मानवीय क्रियाओं की ओर उन्मुख होने लगते है जैसे यह संभव है कि इसे पढने के बाद कोई व्यक्ति बस से उतरने में किसी बूढ़े व्यक्ति की मदद करने लगे, कोई किसी को पानी का बोतल थमा दे आदि आदि. यहाँ यह देखना कठिन नहीं है कि कविता में भाषिक संवादपरकता वस्तुगत स्थितियों को आत्मगत स्थितयों में बदल देती है. इस तरह कविता का एक उद्देश्य यह होता है कि वह हमें आत्मविस्तार की ओर उन्मुख करती है. कहने का तात्पर्य यह कि कविता के मूल में एक बेहतर समाज की परिकल्पना अंतर्निहित होती है. संवाद का यह काव्यात्मक स्वरुप भाषा की संभावनाओं को विस्तार देता है फलस्वरूपभाषा अपनी भौतिक संभावनाओं का अतिक्रमण करती हैं. काव्य भाषा का यह अतिरिक्त भाषा के नये दरवाजे खोलता है. कविता में ध्वनि ,क्रिया आदि के साथ- साथ यह जो सतत आत्मविस्तार की बात अंतर्निहित होती है, वह कविता को हर दौर में समाज के लिए अनिवार्य बनाती है. इस तरह कविता के रास्ते हम मनुष्यता की नई संभावनाओं का संधान करते हैं .



कविता सभ्यता का आलोचनात्मक विवेक है

जो है, कविता उसके विरुद्ध है. वह सत्ता के विरुद्ध है. वह शक्ति के विरुद्ध है. वह स्थापित चेतना के विरुद्ध है. जब कोई कविता पढता है,वह जाने-अनजाने सत्ता के विरुद्ध षडयंत्र में शामिल हो जाता है. कविता ठहराव और गति दोनों को चुनौती देती है. नीत्से ने कहा था जब हम धीरे-धीरे कविता पढ़ते हैं तो हम आधुनिकता को चुनौती दे रहे होते हैं. यांत्रिकता एकायामी गति को ही सर्वोच्च समझती है.इस गति में जिससे भी और जिस तरह भी व्यवधान हो वह सभ्यता के लिए चुनौती है. कविता यही करती है.

अगर हम आरम्भ की ओर नज़र डालें तो हम देख सकते हैं कि ग़ुलामों को युद्धों द्वारा जीता जाता था और मुक्त किया जाता था. लेकिन स्वतंत्र व्यक्ति को वाक्पटुता (rhetoric) मुक्त करती थी. भाषा का महत्व सर्वोपरि था. कविता, मनुष्य और प्रक्रति के मध्य संवाद की भाषा थी. लेकिन प्रकृति के साथ मनुष्य का यह संवाद एकायामी था. प्रकृति को वह अपने भीतर, अपने बाहर दोनों ही जगह महसूस करता था. वह भिन्न मुद्राओं, संकेतों और रूपों के द्वारा इस अंतः बाह्य प्रकृति को संबोधित करता था.परन्तु यह एक आयामी संवाद ही था, इसीलिए अरस्तु इसे द्वंद्व के समानांतर स्वीकार करते हैं. अरस्तु के अनुसार रेटोरिक मनुष्य और प्रकृति के मध्य द्वंद्व का आदिम रूप है. यहाँ यह ध्यान देने योग्य तथ्य है कि आरम्भ में रेटोरिक भाषा के महज़ ध्वन्यात्मक स्वरुप तक महदूद नहीं था, बल्कि वह भाषा की सभी संभावनाओं में मौजूद था और इसलिए कविता मनुष्य के जीवन के हर व्यापार में शामिल थी.

प्रकृति मनुष्य को भी स्वतंत्र सत्ताके रूप में चिन्हित करती थी. कविता मनुष्य कीस्वतंत्र चेतना का परिचायक थी. सत्ता को कविता की यह स्वतंत्रता चुनौती देती थी .कविता का यह आदिम रूप मनुष्य की स्वतंत्र सत्ता और चेतना को इंगित करता था.

मध्यकाल तक आते-आते यह रेटोरिक जीवन व्यापर से दूर जाता गया. संस्थाओं के उदय ने जीवन को अधिकऔपचारिकताओं में बदल दिया. ऐसे में संस्थाओं ने भाषा, जीवन और साहित्य बोध के बीच फांक पैदा कर दी. वेद और वेदों की ब्राह्मणवादी व्याख्याएं और उनकी समाज अनुकूलित परिभाषाएं दरअसल इसी फांक को उजागर करती हैं.वास्तविक जीवन- व्यापार से कविता को बाहर कर उसे कर्मकांड से जोड़ दिया गया. हमारे आदि ग्रन्थों को, उनकी भाषा को नये अर्थों और नये संदर्भों के साथ जोड़ा गया. धीरे-धीरे समाज उनके अनुकूलित होता गया. इस अनुकूलन का बड़ा परिणाम था काव्यभाषा बनाम सामाजिक व्यवहार की भाषा के बीच फांक.जिन संस्थाओं ने इस फर्क को विकसित किया, वे ही साहित्य के स्वरुप औरउसके शास्त्र की रचना भी करने लगे. सामान्य तर्क , व्यवहारिकता ,कार्यकुशलता ने जीवन विवेक को आच्छादित करना आरम्भ कर दिया.मध्य काल से पुनर्जागरण के युग तक यह बात देखी जा सकती है.

रेटोरिक पूरी तरह कविता और कलाओं में इस्तेमाल होने वाली चीज़ बनकर रह गयीऔर कविता जीवन से बाहर. यह देखना कठिन न होगा कि जीवन में इस तरह साहित्य और कलाओं की स्वाभाविकता को नष्ट कर, उसे विशेष परिस्थितियों और समयों के अनुकूल बनाया गया. गीतों के लिए अवसर निर्धारित किये गये. इस तरह उनकी सहजता और स्वाभाविकता नष्ट होती गयी.

युद्धों के युग में एक बार फिर विस्तारवाद का वर्चस्व बढ़ा. प्रभावशाली राजनीतिक एवं ओजपूर्ण वक्ताओं की भूमिका बढ़ी. उन्हें धीरे-धीरे जनता के अस्वाभाविक मनोविज्ञान का हिस्सा बनाया गया. लोगों को यह समझ में आने लगा कि कविता या काव्य भाषा किन्हीं विशेष घटनाओं और परिस्थितियों के लिए होती है. उन परिस्थितियों से बाहर उनके जीवन में कविता की भूमिका लगभग नहीं रही. जाहिर है यह कविता को और काव्य विवेक को जीवन विवेक से अलगाने की बेहद धीमी मगर ऐतिहासिक प्रक्रिया का निर्णायक मोड़ रहा. जीवन यथार्थ और काव्यात्मक यथार्थ में धीरे-धीरे दूरी बढ़ने लगी. आरम्भ में कविता, जीवन संस्कार से जुडी हुयी थी.जीवन में कविता और धर्म के बीच अलगाव इस तरह का नहीं था. धर्म केउद्दात भावों का दूसरा नाम कविता था. इसलिए धर्म के रास्ते साहित्य बोध जीवन में गहरे तक धंसा था. इस बात को बहुत से आरंभिक ग्रंथों की सामाजिक भूमिका से पुष्ट किया जा सकता है. लेकिन ज्यों-ज्यों जीवन और कविता के बीच दूरी बढती गयी ,काव्यात्मक उपकरण इजाद होने लगे. प्रतीकों और बिम्बों में कविता की जटिलता, जीवन की वास्तविक जटिलता से अलग राह इख़्तियार करने लगी. काव्यात्मक विवेक का जीवन विवेक से अलग होना मनुष्यता के इतिहास की बड़ी परिघटना थी.

प्रबोधन के युग में काव्य भाषा का अलग स्वरुप विकसित होने लगा. वह संवादपरक और जीवन संवेदना में पगी भाषा नहीं रह गयी. वह जीवन बोध से इतर एक नये रेटोरिक में ढलने लगी. व्यवहार-वादियों और तर्क-वादियों ने इस बात पर बल दिया कि भाषिक सक्रियता हमें वास्तविक सक्रियता से अलग करती है .यह वह युग था जब सिद्धांत और व्यवहार का संघर्ष दर्शन में तीव्र हो चला था. कहना न होगा कि कविता को दर्शन के खाते में जगह दी जा रही थी. इस अलगाव के बावजूद यह स्वीकार किया जाना चाहिए कि कविता जीवन से पूरी तरह बाहर नहीं हुयी थी. वस्तुतः यह अलगाव कविता और सामाजिक विवेक का ही अलगाव था और यह प्रक्रिया आज तक जारी है. आधुनिकता-जनित यांत्रिकता ने मनुष्य के काव्यात्मक विवेक को ही निशाना बनाना आरम्भ कर दिया. ऐसे में कविता का संघर्ष मनुष्यता के संघर्ष से बाहर नहीं रह गया था.



कविता संगीत और सामाजिकता के आधुनिक आयाम

बीसवीं सदी की काव्य-चेतना पर बात करने के क्रम में यह जरुरी है कि मनोविज्ञान और समाजशास्त्र के साथ हम कविता के सम्बन्धों पर, खासकर कविता की रचना प्रक्रिया पर विचार करें.किसी कवि के मन में यह विचार किस तरह आता है कि वह अमुक विषय पर कविता लिखे? बाह्य सत्य या परिघटनाएं काव्यात्मक संवेदना में किस तरह बदलती हैं? कविता की अंतर्वस्तु और बाह्य दुनिया के अन्तर्सम्बन्धों को हमारा चेतन किस तरह अलगाता है?कल्पनाशीलता के विविध आयाम काव्यात्मक कल्पनाशीलता में किस तरह बदलते हैं? हम यह तो मानेंगे ही कि हर मनुष्य स्वप्न देखता है, हर मनुष्य कल्पनाएँ करता है ,फिर उसकी कल्पना या स्वप्न को हम कविता के रूप में स्वीकार नहीं करते तो ऐसा किस तरह होता है? आधुनिक कविता पर बात करने का अर्थ इन प्रश्नों से होकर गुजरना है. ये प्रश्न कविता के संदर्भ में किसी वस्तुगत बोध से नहीं बल्कि व्यापक आत्मगत बोध से जुड़े हैं. इसलिए इन प्रश्नों के उत्तर सही और गलत के बजाय विश्लेषण के विविध दायरों का एक समुच्चय हो सकते हैं.

कविता की वस्तु महज़ व्यक्तिगत आवेग और अनुभव को इंगित नहीं करती. कोई चीज़ कविता की वस्तु तब बनती है, जब वह किसी सार्वभौमिक प्रवृत्ति का हिस्सा बनकर सौन्दर्यात्मक बोध को उजागर करे. हालाँकि यह तो तय है कि हर पाठक अपने जाग्रत विवेकानुसार ही उस काव्य बोध को  ग्रहण करेगा. किसी कविता के संदर्भ हर पाठक अपनी स्वतंत्र राय कायम करता है.ऐसी स्वतंत्रता मनुष्य प्रकृति के संसर्ग में ही पाता है. काव्यबोध की यह भिन्नता कविता को संवाद की एकायामी प्रक्रिया से अलगाती है. कविता इस अर्थ में भी बहु-आयामी होती है.कविता व्यक्तिगत अनुभव में मौजूद सार्वभौमिक तत्वों को उजागर करती है. यह स्वीकार किया जाना चाहिए कि कविता का संवाद से अभिन्न सम्बन्ध है लेकिन वह एक ऐसी संवाद प्रक्रिया है जो एक साथ बहुतों को लक्षित करती है. ऐसे में कविता की इस संवाद प्रक्रिया के विश्लेषण से हम कविता की रचना प्रक्रिया के पहलुओं को समझ सकते हैं. कविता अपने आरंभिक स्वरुप में आत्म संवाद की प्रक्रिया से होकर गुजरती है. आत्म संवाद कविता की रचना प्रक्रिया का वह क्षण है जब कवि विषय को अपने भीतर आरोपित करता है.

एडोर्नो के अनुसार कविता जिस सार्वभौमिकता का निर्माण करती है ,वह मनुष्य के अन्तःकरण का भावात्मक और आध्यात्मिक पहलू होता है. समाज से उसके सम्बन्ध और अस्तित्व के प्रश्न, व्यक्ति को लगातार काव्यात्मक अभिव्यक्ति की ओर आकृष्ट करते हैं.काव्यात्मक विवेक के भीतर छद्म सार्वभौमिकताओं का निषेध भी अंतर्निहित होता है. इसी काव्य चेतना के समानांतर सौन्दर्यबोध के श्रोत भी हमारी चेतना में सक्रिय रहते हैं. रचना प्रक्रिया के मूल श्रोतों को समझने के क्रम में यह जरुरी है कि हम सौंदर्य-अनुभूति  की प्रक्रिया को समझें.

हमारे बाहर जो दुनिया है, जिसके भौतिक अस्तित्व को हम स्वीकार करते हैं उसकी निर्मिती में एक अद्भुत समरूपता देखी जा सकती है. इस समरूपता को हम सौंदर्य-अनुभूति  के मूल श्रोत के रूप में चिन्हित कर सकते हैं ,लेकिन यहाँ यह भी स्वीकार किया जाना चाहिए कि इस भौतिक समरूपता के साथ प्रकृति में मौजूद अमूर्त समरूपतायें भी होती हैं.सौंदर्य-अनुभूतिकी प्रक्रियामें ये दोनों मौजूद होते हैं. जिसे हम सौंदर्य-अनुभूति कहते हैं वह कोई स्थूल या जड़ वस्तु नहीं होती बल्कि वह सतत गतिमान होती है. उसकी गातिशिलता के सम्बन्ध की तलाश कर ही उसे मुक्कमल तौर पर समझा जा सकता है. इस गतिशीलता के मूल में है मनुष्य की सतत जिज्ञासा. उसके भीतर का कौतुहल. मनुष्य की जिज्ञासा और कौतुहल उसे सौंदर्य-अनुभूति को पुनर्रचना के लिए प्रेरित करती है. लेकिन यहाँ यह नहीं भूलना चाहिए कि सौंदर्य-अनुभूति हर किसी के लिए एक सी नहीं होती. 


हर कोई अलग स्थितियों में अपनी चेतना निर्मित करता है. ऐसे में एक सी स्थिति पर वह भिन्न भिन्न रूप से प्रतिक्रिया करता है. सहज रूपों में यह भिन्नता सूक्ष्म होती है. इस व्यापक अनुभूति से जो समग्र चेतना निर्मित होती है, वही काव्य आस्वाद की प्रक्रिया निर्मित करती है. काव्यानुभव हमारे मन:स्थितियों से बाहर निकलकर हमारे सामाजिक विवेक और संवेदना के सहचर बन जाते हैं. जैसे कि रात. रात सुहावनी भी हो सकती है और डरावनी भी.यह भिन्न प्रतिक्रिया ही सौन्दर्य के प्रतिमानों को मानवीय संवेदना से एवं जीवन अनुभूतियों से संपृक्त करती है. लेकिन चांदनी रात का सौंदर्य हमारे मन:स्थितियों के साथ-साथ हमारे सामाजिक विवेक और संवेदना के अनुकूल ही सौन्दर्य निर्मित करता है.


कविता मनुष्य के सौन्दर्यबोध का सर्वाधिक सहज एवं निश्चल रुप है. साथ ही यह अनिश्चयात्मकता ही मनुष्य को कल्पनाशील एवं स्वप्नजीवी बनाती है. दृष्टि का वैविध्य एवं देखने सोचने के ऐतिहासिक अनुभवों का समुच्चय हमारी काव्य चेतना बनती है. इस अर्थ में कहें तो कविता में मौजूद कल्पनाशीलता एवं उसकी अनिश्चयात्मकता मनुष्य के विवेक का सर्वाधिक उर्वर अंश है. ज्ञान का जो रास्ता निश्चयात्मकता की ओर मुड़ता है, उसे हम वैज्ञानिक बोध कह सकते हैं. विज्ञान प्रकृति के नियमों की व्याख्या करता है. वह सौन्दर्य को एक स्थिर अवधारणा में बदलता है. विज्ञान प्रकृति की व्याख्या करता है पर उसे बदलता नहीं. कविता मनुष्य की अन्तः प्रकृति का निर्माण भी करती है और उसे सतत बदलती भी है. इसलिए कविता क्या है,जैसे प्रश्नों की बजाय कविता क्या नहीं है जैसे प्रश्न अधिक संगत जान पड़ते हैं. फिर भी अगर सरलीकरण का सहारा लिया जाये, तो हम यह कह सकते हैं कि कविता में जो सौन्दर्यात्मक पहलू हैं जो कि उसकी वस्तु से अभिन्न हैं, वे मूलतः मनुष्य के आंतरिक संसार का सामाजिक पक्ष है. यानि हमारे अन्तः करण में समाज का जो अंश मौजूद है, उसका सौन्दर्यात्मक पक्ष कविता है. इस पूरी व्याख्या में सौन्दर्यात्मकता और कविता के बीच कोई लकीर खींचने की बजाय भाषा में मौजूद उनके विभाजन को अपर्याप्त मानने की चेतना ही प्रमुख जान पड़ती है. ऐसे में अगर वे एक दूसरे के स्थान पर प्रयुक्त हों, तो वह भाषा और चिंतन के अमूर्त पक्षों की व्याख्या से जुड़ी समस्या है.


कवि प्रकृति की निर्मिती के समानांतर अपने अन्तःकरण में सामाजिक छवियों का निरूपण करता है. कविता हमारी अन्तः चेतना के इसी सौन्दर्यात्मक पहलू का नाम है. स्पष्ट है कि ऐसे में यह स्वीकार करना चाहिए कि कविता तो हर मनुष्य के भीतर होगी ही लेकिन उस भीतरी सौन्दर्यबोध को बाह्य अभिव्यक्तियों में बदलने का काम कवि को करना होता है. यहाँ स्पष्ट रूप से कवि की दो भूमिकायें नज़र आती हैं. पहला वह जिसमें उसे अपने सौन्दर्यात्मक पहलुओं का निर्माण करना होता है.दूसराजिसमें उन पहलुओं को बाह्य अभिव्यक्ति में बदलना होता है. उदाहारण के लिए हम संगीत को देख सकते हैं. संगीत की आवश्यकता हर किसी को होती है. हर कोई संगीत को अपने जीवन में महसूस करता है.हमारे अन्तः करण में संगीत मौजूद रहता है लेकिन संगीतकार उसे अभिव्यक्ति में बदलकर गायन में बदलता है.


सौन्दर्यात्मक बोध के ये दो पहलू हैं. एक वह जो बाह्य संरचना के समानांतर एक भीतरी संरचना की निर्मिती करता है. जो कि कहीं न कहीं प्रकृति में मौजूद समरूपता द्वारा विकसित होती रही है. यह अनायास नहीं है कि मनुष्य अपनी कल्पना में, अपने स्वप्नों में इसी दुनिया में देखी गयी छवियों, घटनाओं, परिघटनाओं का पुनर्निर्माण करता है. मनुष्य का सौन्दर्यात्मक बोध सिर्फ इन बाह्य छवियों द्वारा ही नहीं निर्मित होता है, वह अपने इन्द्रियानुभव से प्रकृति की सूक्ष्म छवियों की कल्पना भी विकसित करता है. सौन्दर्यबोध का दूसरा पहलू वह है, जिसके तहत वह इन छवियों को अपने विवेकानुसार बाह्य अभिव्यक्ति में शब्दों ,रेखाओं आदि चिन्हों द्वारा अंकित करता है. सामान्य तौर पर पाठक, कविता के इस दूसरे पहलू पर ही ध्यान केन्द्रित करते हैं. संरचनावाद की मूल समझ कविता की सौन्दर्यात्मकता के इसी पक्ष से टकराती है. ऐसे में वह काव्य अनुभव के व्यापक दायरे से अलग हो जाती है.


संगीत और कविता लम्बे समय तक मनुष्य के बोध में एक साथ रहे होंगे. उनके बीच का अलगाव इधर की परिघटना है. आधुनिक  समाज में संगीत और कविता के इस अलगाव को औद्योगिक क्रांति के परिणामस्वरूप समझा जा सकता है.संगीत की मूल प्रवृत्ति हमारे चेतन को बाह्य समरुपों से जोड़ने की होती है. जैसे झरने का संगीत. हम देखेंगे किइसमें निश्चित अन्तराल के बाद दुहराव है. दुहराव संगीत सुनने की प्रक्रिया का अनिवार्य अंग होता जाता है.यह सुनना हमे बदलता है. संगीत की यहचेतना हमें बाह्य प्रकृति की समरूपता का सतत बोध कराती है. जैसे निश्चित अवधि पर दिन और रात का दुहराव. मौसमों के बदलाव.लेकिन समाज और जीवन की इन बाह्य कोटियों से इतर सौन्दर्यात्मकताका दूसरा पहलू ज्यादा सूक्ष्म है. वह निश्चयात्मकता और अनिश्चयात्मकता के द्वंद्व से निर्मित है. वहां दुहराव की बाह्य परिघटना के अतिरिक्त सूक्ष्मता का ऊबड़-खाबड़पन भी है. कविता की अन्तः लय इसी द्वंद्व से निर्मित होती है. आरम्भ में बाह्य और अन्तः के बीच का फासला इतना अधिक नहीं रहा होगा. कविता और संगीत एक दूसरे के पूरक थे. लेकिन औद्योगिक क्रांति ने समाज को एक जटिलता में बदल दिया. यांत्रिक दुहराव ने समाज में संगीत और कविता की भूमिका को अलग कर दिया. उसने प्रकृति के समानांतर एक नई समरूपता का विश्व बना दिया. अनुभव और गति दोनों ही अर्थों में. सवाल है कि नये समकालीन विश्व और उसकी गैर-प्राकृतिक समरूपता के साथ हमारे आत्म का तादात्म्य किस तरह हो. यांत्रिकीकरण की प्रक्रिया ने हमारे इर्द गिर्द को पूरी तरह निर्जीव और स्पंदनहीन वस्तुओं से भर दिया है.कविता की मुख्य भूमिका इसी के विरुद्ध है. यही वजह है कि तमाम कलाओं के मध्य कविता की भूमिका अधिक सामाजिक है. उसका मुख्य संघर्ष समाज की छद्म चेतना से है. यही भूमिका कविता को विचारधारा से अलग करती है. विचारधारा जहाँ समाज को एक निश्चित दायरे में व्याख्यायित करने पर बल देतेहैं,वहीँ कविता समाज की विविध भूमिकाओं के अन्तः सूत्रों को तलाशती है. वह समाज को अधिक उन्मुक्त और स्वछन्द करती है.


कविता में भाषा और शब्द एक जीवित सत्ता होते हैं. जब हम किसी की आपबीती सुनते हैं तो हमारी चेतना (विवेक और संवेदना) के तार झंकृत होते हैं. हम कह सकते है जीवित व्यक्ति के सम्पर्क में आने पर हमारी चेतना स्पंदित होती है. क्या कविता के सम्पर्क में जब हमआते हैं तो यही स्पन्दन महसूस नहीं करते? कविता संवेदनात्मक विवेक का निर्माण करती है.यह स्वीकार करते हुए कि विवेक एक व्यक्तिगत अवधारणा नहीं है बल्कि वह सामाजिक प्रक्रिया है. कविता के साथ मनुष्य का सम्बन्ध जीवित मनुष्यों की दुनिया से निर्मित सम्बन्ध के समानांतर है.कविता इस अर्थ में हमें जीवित मनुष्य की दुनिया का नागरिक बनाती है.


कविता की विषयपरकता अन्य चीज़ों से इस अर्थ में भिन्न है कि यहाँ विषयपरकता का निर्माण वस्तुपरकता के विरोध में नहीं, बल्कि उसी के रास्ते होता है. कवि किन्हीं खास वस्तुपरक स्थितियों को अपने भीतर संयोजित करता है.वह वस्तु ,उसके आत्म में घुल मिलकर एक नये विषय को रचती है.कवि के समक्ष वस्तुगत यथार्थ कविता में पाठक को किसी नई विषयगत भावभूमि पर ला खड़ा करता है. घटनाएँ, पात्र, स्थितियां, तारीख सब भाषा और संकेतों में धीरे-धीरे घुलकर पाठक के समक्ष एक नई विषयगत स्थितियों का निर्माण करती हैं. यह रूपांतरण ही कविता की शक्ति है. इसलिए जो बात जिस तरह कविता में कही गयी है, वह कविता के बाहर अपना प्रभाव खो देती है. जो बात कविता में कही गयी है, वह अन्य किसी रूप में उसी प्रभाव के साथ नहीं कही जा सकती. तो क्या यह कहना सार्थक न होगा कि कविता में भाषा, संवाद का चरम रूप है?जिससे संवेदित एक या दो व्यक्ति नहीं समूचा समाज होता है.


कवि की वस्तुपरकता भाषा के रास्ते पाठक को रूपांतरित करती है. हर पाठक कविता पढने के बाद बदल जाता है.कविता का मूल लक्ष्य पाठक के आत्मजगत को बदलना ही है. यह आत्मजगत का रूपांतरण बड़ी सामाजिक परिघटनाओं को जन्म देता है. कविता का मुख्य उद्देश्य सामाजिक रूपांतरण है. यहाँ तक कि जिसे हम कविता की राजनीतिक भूमिका कहते हैं, वह भी वास्तव में सामाजिक भूमिका ही है. सामाजिक का अर्थ यहाँ व्यापक है,जिसमें मनुष्यता का इतिहास, संस्कृति, मनोविज्ञान,स्मृति और कल्पनाशीलता सब शामिल हैं.


कविता वास्तव में एक जादू है. वह मनुष्यता का एक उच्च शिखर है. कविता में वह भी शामिल है जो कहीं दर्ज नहीं, जो किसी भाषा में अब तक नहीं ढल सका.  धूप, बादल और मनुष्य ये कविता के ही अलग-अलग नाम हैं.
_______________________
(पहल में प्रकाशित)

anmishra27@gmail.com


सबद - भेद : कृष्णा सोबती : ‘पहले दिल- ए-गुदाख्ता पैदा करे कोई’ : रवीन्द्र त्रिपाठी

$
0
0

















(कृष्णा सोबती के साथ क्रमश: असद जैदी, रवीन्द्र त्रिपाठी और मंगलेश डबराल )

2017 के लिए साहित्य का प्रतिष्ठाप्राप्त सम्मान ज्ञानपीठहिंदी की महत्वपूर्ण लेखिका कृष्णा सोबती को  कल प्रदान किया गया जिसे उनकी तरफ से अशोक वाजपेयी ने ग्रहण किया. अस्वस्थ होने के कारण वह समारोह में उपस्थित नहीं हो सकी थीं. सोबती को  साहित्य अकादमी, पद्मभूषण, व्यास सम्मान, शलाका सम्मान आदि से भी सम्मानित किया जा चुका है. उनका रचना संसार विस्तृत है जिसमें डार से बिछुड़ी’, ‘मित्रों मरजानी’,  ‘सूरजमुखी अँधेरे के’, ‘दिलोदानिश’, ‘ज़िंदगीनामा’, ‘ऐ लड़की’, ‘समय सरगम’,  ‘जैनी मेहरबान सिंह’ , ‘हम हशमत’, ‘बादलों के घेरेआदि शामिल हैं. इस वर्ष राजकमल से उनकी दो किताबें प्रकाशित हुई हैं –‘मुक्तिबोध : एक व्यक्तित्व सही की तलाश मेंतथा गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान

18 फरवरी 1925 में जन्मी कृष्णा सोबती ने बड़ा जीवन जिया है. वह भारत ही नहीं विश्व की बड़ी लेखिका हैं. यह अवसर है  उनके कार्यों के  आकलन का, उन्हें समझने और प्रसारित करने का.



रवीन्द्र त्रिपाठी ने इस अवसर पर कृष्णा जी के लेखन का विस्तृत विवेचन किया है. उनकी रचनाशीलता को समझने की एक गम्भीर कोशिश यहाँ दिखती है.



कृष्णा सोबती : 'पहले दिल- -गुदाख्ता पैदा करे  कोई’                          
रवीन्द्रत्रिपाठी




कृष्णा सोबती के उपन्यास दिलो दानिशमें एक प्रसंग आता है जिसमें इस रचना की मुख्य चरित्र महक बानो से एक जगह उसकी मां कहती है-

जानती हो, मेरे गुरु, तुम्हारे पिता क्या कहा करते? कहते नसीम बानो, दुनिया की एक ही राह पर दिल जमाए रखोगी तो क्या देखोगी? गवैये के लिए एक राग की, एक तान की, एक सुरताल की फिदाई  काफी नहीं. ऊपरवालों को देखो उसके हजार जलवों में. हर मौसम में नया दौर, नया शोर, नया रंग, नया रंग. हजारों तो फल और हजारों ही पात. सूरज है तो चांद भी. चांद है तो सितारे भी. आसमान है तो बादल भी. बादल है तो बिजुरी भी. धूप है तो बरखा भी. धरती है तो समुद्र भी. पर्वत है तो नदियां भी. हरियाली है तो रेतीला भी. रेत है तो कटीला भी. तपिश है तो बर्फ भी. नसीम बानों, इतने ही सुरों में हम अपनी उम्र को क्यों न गा लें.

मोटे तौर पर यही बात कृष्णा सोबती के रचना संसार पर लागू होती है. उन्होंने अपने उपन्यासों और कहानियों में जिंदगी को हजार जलवों में देखा और दिखाया है. उनके यहां किसिम किसम के चरित्र हैं. सिर्फ जिंदगीनामाको लीजिए. कितने प्रकार के लोग हैं वहां और कितनी स्मृतियां? इतिहास के कितने किस्से  और कैसे कैसे  वाकयेकितनी किंवदंतियां? पूरा उपन्यास एक मेला  लगता है. ऐसा मेला जिसमें किसी एक खास चीज या शख्सियत की प्रमुखता नहीं. इसमें बच्चों की किलकारियां हैं, तो जवानों का इश्क भी. डकैती है तो अदालती दांवपेंच भी. साहूकारों की मौज है तो किसानों का दर्द भी. अंग्रेजी राज का जुल्म है तो उससे विद्रोह और आजादी की आवाजें भी.  दूसरी रचनाओं की तरफ बढ़ें तो  दिलो दानिशकी महक है जो बरसों  वकील कृपानारायण से रिश्ता रखने के बाद उनसे अलग होकर अपनी शख्सियत पाती है. महक से भिन्न  मित्रो मरजानीकी मित्रो है जो अकुंठ शारीरिकता को अभिव्यक्त करती है. डार से बिछुड़ीकी पाशो  है जिसके थिरकनेपर पाबंदी है मगर विडंबना है कि थिरकने के लिए उसकी जिंदगी में कुछ है ही नहीं. सूरजमूखी अंधेरे केकी रत्ती भी कृष्णा जी की बनाई एक चरित्र है जो बचपन में ही ऐसे हादसे से गुजरी है कि उसकी  अंधेरी छाया से निकल नहीं पाती.

कृष्णा सोबती के उपन्यासों में सनातनी हिंदू भी है, और मुसलमान एवं सिख भी. उनके यहां गांव भी है और शहर भी. वहां पाकिस्तान में चला गया गुजरात भी और भारत का गुजरात भी. उनके उपन्यासों की भाषा हिंदी है. हालांकि उर्दू और पंजाबी का भी साथ है. वे हिंदी की एक ऐसी बड़ी लेखक हैं जिन पर पंजाबी और उर्दूवाले भी अपना दावा ठोक सकते हैं और कह सकते हैं कि ये तो हमारी हैं. उनका भाषाई वेश (जिसे अंग्रजी में लिग्विस्टिक रजिस्टर कहते हैं) भी एक नहीं है. जिंदगीनामाकी भाषा में खेतिहरों की पंजाबी है तो दिलो दानिशमें पुरानी दिल्ली वाली उर्दूपन वाली हिंदी.  समय सरगमजैसी  कुछ रचनाओं में संस्कृतनिष्ठ तत्समता   है. कह सकते हैं कि कृष्णा सोबती की हिंदी में कई तरह की हिंदियांहैं. हिंदी भी हजार जलवों में है. उनके यहां कहानी है तो कविता भी.   वाक्यों में बीच बीच में चुप्पियां भी हैं. उनको पढ़ते हुए ठहरना पड़ता है और सोच के अनुमान लगाना पड़ता है कि क्या इंगित किया जा रहा है.  उनके यहां प्रकट प्रेम भी है और प्रकट भी. इन अप्रकटों में कई तरह की अर्थ-ध्वनियां है. बुल्ले शाह और शाह लतीफ से लेकर गजाजन माधव मुक्तिबोध तक उनके यहां मौजूद हैं.


मित्रो मरजानी : देह का अध्यात्म

मित्रो मरजानी’ 1966में प्रकाशित हुआ और इसी के साथ हिंदी और उत्तर भारतीय समाज का साबका एक ऐसे चरित्र से पड़ा जिसने उसके संस्कारी मन को झकझोर दिया. भारतीय पारिवारिक नैतिकता के ढांचे में मित्रो जैसी चरित्र सहज स्वीकार्य नहीं थी. मित्रो (जिसका पूरा नाम मूल रचना में सुमित्रावंती है) एक जगह अपनी भाभी से कहती हैं- देवर तुम्हारा मेरा यह रोग नहीं पहचानता.. बहुत हुआ हफ्त पखवाड़े और मेरी इस देह में इतनी प्यास है, इतनी प्यास है कि मछली सी तड़पती हूं’. यौनिकता (सेक्सुअलिटी) से स्पर्शित इस तरह के कई और संवाद  मित्रो मरजानीमें हैं.

ऐसी बहू घर में आ जाए तो परिवार का क्या हो? परिवार के सदस्य असहज हो जाएंगे. मित्रो के ससुराल में यही होता है. और यही हिंदी साहित्य में भी हुआ. पर धीरे धीरे मित्रो हिंदी रचना संसार में स्वीकार कर ली गई. आज वह हिंदी कथा संसार की सबसे धाकड़ चरित्रों में है.  एक  कथाकार का आकलन इस बात से भी होता है कि उसने किस तरह के नए पात्र साहित्य को दिए. ऐसे पात्र जो सामूहिक चेतना के हिस्सा बन जाएं. आज मित्रो के बिना हिंदी कथा साहित्य की कल्पना की ही नहीं जा सकती. मित्रो में नयापन है ये तो सर्वस्वीकृत हो चुका है. पर इस नएपन का ऐतिहासिक सारतत्व .या उसकी सैद्धांतिकी क्या है? क्या उसका वृहत्तर परिप्रेक्ष्य भी है. या वह शारीरिकता भर है?

विश्लेषण करें तो मित्रो का व्यवहार मनोविज्ञान के नजरिए से असामान्य नहीं है.  सुधीर कक्कड़ ने कामसूत्रके रचयिता पर जो औपन्यासिक कृति लिखी है उसमें कहा है कि कामशास्त्रियों में वात्स्यायन पहले थे जिन्होंने ये कहा और पहचाना कि स्त्रियों में भी कामेच्छा होती है. पहले के कामशास्त्री ऐसा नहीं मानते थे. ये वात्स्यायन की क्रांतिकारी अवधारणा थी यौनिकता के बारे में. उन्होंने  समाज को वह दृष्टि दी जिस पर परदा पड़ा था.  फिर भी समाज में तो क्या साहित्य में भी औरतों को कामेच्छा व्यक्त करने की आजादी नहीं रही. आज भी नहीं है.  मित्रो मरजानीहिंदी में पहली कथा-रचना है जिसमें एक ऐसी औरत दिखी जो अपनी शारीरिक आकांक्षा और चाहत को सहज ढंग से अभिव्यक्त करती है. ये भी ध्यान में रखना चाहिए कि वह सिर्फ कल्पित पात्र भर नहीं है. वह समाज में है.  कृष्णा जी ने एक जगह कहा भी है कि  जिस शख्स को देखकर उन्होंने मित्रो का चरित्र गढ़ा वह सचमुच की एक औरत थी. राजस्थान की. ये प्रकरण इस तरह आता है-

बरसों पहले एक झलक में मित्रो को राजस्थान में देखा था. डूंगर के पास, सिर पर बोझा उठाए वह जीती जागती काया हरियाली क्यारी-सी दीखी थी. आंखों में ललक, आंचल तले उभार, लहंगे और ओढ़नी में मढ़ा हुआ गेहुंआ गदराया बदन- हाड़ मांस की अनोखी देह, रूपहले धूपिया पानी से कसी हुई. तनिक गर्दन घूमी. ठेकेदार को आते देखा तो कांकरी मार दी. हंस हंस कर कहा- इधर तो देखना मति  ठेकेदारजी. लहंगड़ूं की मांद में अट गए तो गए काम से

अर्थात् मित्रो अपनी पूरी समग्रता, जीवंतता और अल्हड़ता के साथ हमारे बीच थी.  अपने नैतिक मानदंडों के साथ. सदियों से. बस हिंदी साहित्य ने उसे  देखा या महसूस नहीं किया था.  कृष्णा सोबती का योगदान ये है कि  उसे साहित्य के प्रवेशद्वार से भीतर लाया. इस बोध के साथ कि जो वह कर रही हैं  उसमें किसी तरह की अतिरिक्त साहसिकता नहीं है. बल्कि लेखक का सहज कर्म है. आखिर जो समाज में है, मानव मन की चेतना में है, उसके लिए साहित्य में नो इंट्रीका बोर्ड क्यों टांगा जाए? हां, उन्होंने अपने किए की एक वैचारिकता भी सृजित की और मित्रो के व्यवहार को देह का अध्यात्मकहा. उनकी  स्थापना इस तरह है - 


धर्म है देह का, देह का अध्यात्म भी और  देह और से उभरा शास्त्र भी.’ 


ये हिंदी कथा साहित्य में एक नई स्थापना थी कि देह का भी अध्यात्म होता है. ये अध्यात्म की अवधारणी की परिधि का भी विस्तार था और देह के प्रति नए दृष्टिकोण की प्रस्तावना भी. आकस्मिक नहीं कि मित्रो अपने में एक परिघटना यानी फेनोमेना भी बन गई है. कई साल पहले  जब रंगकर्मी बीएम शाह ने मित्रो मरजानी’  नाटक किया तो दर्शकों ने उसे सराहा. नाटक के कई शो हुए और ये राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के रंगमंडल की बेहद लोकप्रिय प्रस्तुतियों में मानी जाती है. मित्रो अब कथाकृति से निकलकर समाज में पहुंच चुकी है. उसके कई संस्करण हो गए हैं और जो कहानियों, टीवी सीरियलों और हिंदी फिल्मों मे दिखते है. मित्रो एक थी और अब अनेक हो गई है.




ज़िंदगीनामाएक वृहत्कथा है


ज़िंदगीनामाकृष्णा सोबती की सबसे बड़ी रचना है.  इसमें एक गांव डेराजट (तब के पश्चिमी पंजाब के गुजरात जिले का, जो अब पाकिस्तान में है) में घट रही घटनाओं  का वृंतात है.  उपन्यास में कोई केंद्रीय चरित्र नहीं है. नायक या नायिका नहीं है. साहूकार शाहजी  का घर है जो गांव के कार्यकलाप का केंद्र है. मगर शाहजी या उनके परिवार के दूसरे लोग भी इसके मुख्य चरित्र नहीं है. कई चरित्रों में से हैं. एक पंजाबी शब्द का उपयोग करें तो कह सकते हैं कि पूरा पिंडही इसका नायक है. कई तरह के चरित्र यहां हैं. हिंदु और मुसलिम. खत्री और सिख. जाट. गूजर, पंडित. औरतें, पुरुष और बच्चे. इसमें कोई एक केंद्रीय कथा भी नहीं है.  दरअसल ये एक वृहत्कथा है. कई कथाएं हैं और आपस में गुंथी हुई. ज्यादातर छोटी और अधूरी. पर अपने भीतर विस्तार की संभावना लिए हुए. मिसाल के लिए चाची महरी की कथा.

चाची महरी  सिख परिवार में जन्मी और ब्याही थी. लेकिन विधवा हो जाने के बाद उसका प्रेम शाहों को खत्री परिवार के एक सदस्य के साथ होता है. वह उससे शादी भी करती है. यानी विधवा विवाह का मामला है. ये शादी आसान नहीं थी. सामाजिक बाधाओं से भरी थी. जिंदगीनामाका कालखंड 1902से 1915  के आसपास का है. यानी आज के एक सौ सोलह-सत्रह साल पहले का.

चाची महरी अदालत में जाकर कहती है कि वह अपनी इच्छा से दूसरी शादी कर रही है और उस पर किसी तरह का दबाव नहीं है.  ये बड़ा साहस है. लेकिन चाची महरी मात्र साहस भर नहीं है. वह कुछ और भी है. उसका पहली शादी के वक्त के सबसे छोटे देवर साहिब सिंह से भी गहरा स्नेह  है. अदालत के उस फैसले के बाद जो उसके पक्ष में दिया गया, जब चाची महरी शाहों के घर जाने लगती है तब भी छोटी उम्र का साहिब सिंह उसे रोकता है और कहता है उसके बिना घर सूना सूना लगेगा इसलिए मत जाओ. चाची महरी के मन में भूचाल जैसा आता है. उथलपुथल कि क्या करे



आखिरकार वह शाह परिवार के कहने पर  उनके घोड़ों पर सवार हो जाती है. कई साल बीत जाते हैं और चाची महरी को एक दिन मालूम होता है कि साहिब सिंह बेहद बीमार है. लंबे समय से बिछावन पर है. उसके मन में फिर से बेचेनी होती है साहिब सिंह के लिए. और वह इतने बरसों के बाद अपने छोटे देवर की खैरियत जानने उसके घर जाती है. जिस देहरी को वह लांघ गई थी उसके अंदर फिर से जाती है. साहिब सिंह के प्रति उसके मन में विशेष तरह का वात्सल्य है जो दूसरी शादी के बाद भी बना रहता है. मानव मन की जटिलता! चाची महरी संबंधित ये दो अहम प्रसंग ही इस उपन्यास में हैं पर स्मरणीय हैं. चाची महरी की याद पाठक में खूब जानेवाली है. ये अपने तरह का एक प्रेमाख्यान है. मगर इस उपन्यास अकेला प्रेमाख्यान नहीं है. दूसरा प्रेमाख्यान भी इसमें है.

वह है बड़ी उम्र के शाहजी और बहुत कम उम्र की राबयां के बीच. राबयां एक मुसलिम गरीब परिवार की. वह बहुत अच्छा गाती है. ज्यादातर समय शाहजी के घर ही रहती है. शाहजी के बेटे लाली का लालन पालन वही करती है. धीरे धीरे उसके भीतर शाहजी के प्रति एक लगाव भी पनपता है जो क्रमश: गहराता जाता है. शाहजी के मन में भी उसे लेकर एक गहरा आकर्षण है. जब भी देखते हैं भीतर प्रेमघटा घहराने लगती है. उपन्यास के अंत में इतना आता है कि जब राबयां की शादी उसका पिता अधेड़ उम्र एक आदमी  से तय करता है तो वह अपने भीतर के झंझावात को रोक नहीं पाती.  वह शाहजी को कह देती है- 



शाह साहब, मैंने आपको दिल में ऐसे धार लिया जैसे भगत मुरीद अपने साईं को धार लेते हैं.’  


ये प्रसंग उपन्यास में यहीं खत्म हो जाता है. लेकिन बाद में कृष्णा सोबती ने उत्तरार्धशीर्षक से जो एक रचना लिखी (जो उनके संग्रह शब्दों के आलोक मेंसंकलित है) जिसमें ये प्रेमाख्यान आगे बढ़ता है. (शायद ये ज़िंदगीनामाके उस दूसरे भाग का हिस्सा है जो पूरी तरह से लिखा नहीं गया.) 

होता है ये है कि शाहजी एक दिन अपने घोड़े पर निकलते हैं और बारिश-बिजली और बवंडर में नदी में गिर जाते हैं.  राबयां ये देखती है. वह भी पीछे नदी में कूद जाती है. शाहजी को बचाने के लिए. पर दोनों मझदार में फंस जाते हैं. शाहजी के भाई काशीशाह और गांव के लोग दोनों को बचाकर लाते हैं. शाहजी की तबीयत बिगड़ जाती है. राबयां की भी. हकीम के कहने पर राबयां को शाहजी घर में रखा जाता है इस आशा के साथ कि शायद उसे देखने- पुकारने से शाहजी बच जाएं. किंतु शाहजी नहीं बचते. अब राबयां क्या करे? शाहजी के बिना जीना कैसा? साईं के बिना भगत कैसे जिए?उनको याद करते हुए राबयां भी नदी छलांग लगा देती है और अपने साईं से जा मिलती है. उत्तरार्धका ये अंतिम अंश राबयां और शाहजी के इस रिश्ते को अमर प्रेमाख्यान बना देता है.

पूरे चांद की रात होनी अनहोनी दोनों ने मिलकर पुराना कथा प्रसंग रचया और राठी को घेर वह उसे पुराना खेल खिला दिया जिसकी गंध आदम के लहू में बहती आई है. अराइयों की कंवार राबयां जाने किस होश बेहोशी में अडोल पलंग पर से उठी और कच्ची राह मापती दरिया के किनारे जा पहुंची. शाहों के घर की सुच्ची ओढणी उतार कंडे पर रखी और उस पर टिका दिए सोने के दो कंगन. ऊपर चांद को निरख, ‘शाहजी, पहुंचती हूं आपके पास’.

फिर बांहे फैलाकर कहा, आप पकड़िए मेरा हाथ. क्यों डरूंगी, आप हैं मेरे साथ’.रेत से पांव उखड़े- छप्प और खेल ही ओझल हो गया. ऊपर चांद ने पलक न झपकी. चमकता रहा. नीचे चनाब बहता रहा और राबयां कंवार सब झगड़े-झमलों से दूर पुराने किस्सों में जा मिली.
(कृष्णा जी ने ही बताया कि इस अंश में जो राठीशब्द आया है पहाड़ी में उसका अर्थ इतिहास होता है.)

किन किस्सो में जा मिली राबयां? अलग से कहने की जरूरत नहीं कि वह हीर-रांझा, लैला-मजनूं और सोहणी-महिवाल जैसे किस्सों में जा मिली. ये एक ऐसा प्रेमाख्यान है जिसमें सूफीपन भी है.

ज़िंदगीनामाका क्या कोई सांस्कृतिक- राजनैतिक आशय भी है? बेशक.  लेकिन ऊपर से जितना दिखता है  उससेअ अधिक ध्वनित होता है. ध्वन्यालोकमें आनंदवर्धन ने ध्वनि का अर्थ अणुरणन बताया है. यानी जब कविता  मन के भीतर लगातार गुंजित  होती रहती है, उसे ही ध्वनि समझना चाहिए. ज़िंदगीनामासे क्या ध्वनित होता हैउसके भीतर क्या चीज है जो पाठक के अंदर लगातर बजती रहती हैँ? क्यों हिंदी उपन्यास जगत में उसका लगातार उल्लेख होता हैक्या उसके चरित्र मन में बैठ जाते हैं? या   उसकी औपन्यासिक बनावट ऐसी है जो आज भी नई लगती है  ये भी कारण भी हैं. शिल्प के लिहाज से ये एक अनूठी रचना है. पर जो प्रमुख आवाज उसके भीतर से आती है वह ये है- कि कई जातियों और धर्मों के लोग हिंदुस्तान में कभी साथ रहते थे; हिंदू और मुसलमान, अपनी अपनी विभिन्नताओं को लिए हुए.  मतभेदों के बावजूद वे एक जीते मरते थे. उल्लास के साथ. 


एक साक्षात्कार में कृष्णा सोबती उस दौर के बारें कहती हैं- 


'सामाजिक और सांस्कृतिक धरातल पर दोनों समुदाय एक दूसरे के बेहद करीब थे. मैं एक बार फिर दोहराना चाहूंगी कि इस सियासी शोर के बावजूद हिंदुओं और मुसलमानों, दोनों ने ख्वाजा खिदर, बाबा फरीद और दूसरे संतों के प्रति आदर दिखाना जारी रखा. ख्वाजा खिदर को ज़िंदगी के पीर समझा जाता था. ऐसा कहा जाता था कि उनकी शाश्वत नाव, हालांकि वह अदृश्य थी, हमेशा नदी में बहती रहती है और नदी पार करने में लोगों की मदद करती है. हमारा परिवार बाबा फरीद पर बहुत श्रद्धा रखता था और उनके आशीर्वाद के बिना कुछ भी नहीं किया जाता था.... आशीर्वाद लेने के लिए हिंदू हमेशा ही मुसलमानों के पवित्र स्थल पर जाते थे. गर्भवती स्त्रियां पीरों के मजार पर जाती थीं.

ज़िंदगीनामापढ़ने के बाद मन में ये प्रश्न  लगातार गूंजता रहता है कि हिंदु और मुसलमान एक वक्त में ऐसा कर सकते थे तो आगे क्यों नहींये सामासिक भारतीय संस्कृति की पक्षधरता का  उपन्यास है. ये भारत के विभाजन के बाद की त्रासदी पर नहीं है. ये भारत के विभाजन के पीछे की राजनीति और विचारधारा का अस्वीकार है. यही इसका ध्वनित अर्थ है.

पश्चिम में ही नहीं अब भारत के अकादमिक जगत में, यानी  विश्वविद्यालयो में, स्मृति- अध्ययन शुरू हो गया है. स्मृतियां किस तरह बनती बिगड़ती रहती है ये एक जटिल मामला है.  हम कुछ चीजें याद रखते हैं और कुछ भूल जाते हैं. क्यों भूल जाते हैं? जानबूझकर या परिस्थितियां ऐसी हो  जाती हैं कि हम भूलने की तरफ जाने-अनजाने  बढ़ते रहते हैं. स्मृति को लेकर चेक उपन्यासकार मिलान कुंदेरा का एक वाक्य अक्सर उद्धृत किया जाता है जो अंग्रेजी में इस तरह है – द स्ट्रगल ऑफ मैन अगेंस्ट पॉवर इस द स्ट्गल ऑफ मेमेरी एगेंस्ट फोरगेटिंग’  (‘द बुक ऑफ लॉफ्टर एंड फोरगेटिंगसे). हिंदी में इसे इस तरह कह सकते  हैं-  ताकत के खिलाफ मनुष्य का संघर्ष विस्मृति के खिलाफ स्मृति का संघर्ष है.  कुंदेरा यहां सर्वसत्तावादी ताकतों की ओर संकेत कर रहे हैं और उनका एक आशय ये भी है कि सत्ता कई बातें भुलाने के लिए दबाव बनाती है और मनुष्य को  इसके विरुद्ध लड़ना पड़ता है. सत्ताएं कई तरह की होती हैं. राजनैतिक भी और सांस्कृतिक भी. सामाजिक और धार्मिक भी. एक लेखक इन सभी तरह की सत्ताओं के विस्मृति अभियानके विरुद्ध खड़ा होता है. ज़िंदगीनामाभी उस विस्मृति अभियान के प्रतिपक्ष में है.

ज़िदगीनामाकी भाषा पर भी निगाहें उठी हैं. इसकी भाषा वह पंजाबीपन लिए हुए है जो  पंजाबी किसानों की होती है. इसमें शहरी पंजाबी नहीं है. इसलिए सामान्य हिंदीभाषी पाता है कि कुछ शब्दों के मायने समझने के लिए मशक्कत करनी पड़ती है. पंजाबी शब्दकोश का सहारा लेना जरूरी लगता है.  इस कृति को एक तरफ काफी सराहा गया तो दूसरी तऱफ कुछ लेखकों और आलोचकों को ये  लगा कि ये तो हमारी हिंदी नहीं है.ऐसे लोगों को मिर्जा गालिब के इस शेर का मर्म समझनी जरूरी है-

हुस्न- ए- फरोग़- ए- सुखन दूर है, असद
पहले दिल- ए- गुदाख्ता पैदा करे कोई

(‘हुस्न-ए-फरोग़ ए सुखनका मतलब है- काव्य के दीपक की प्रभा और दिल-ए-गुदाख्ताका मतलब है -पिघला हुआ दिल.)

निश्चित रूप से  जिंदगीनामाका भरपूर आस्वाद करने के लिए एक अलग तरह की तैयारी करनी पड़ती है. ये बात और भी बड़ी कृतियों पर लागू होती है. साहित्य का आस्वाद एक साधना भी है. हिंदी के ज्यादातर पाठकों के लिएजिंदगीनामाका रसास्वाद बिना इस साधना के संभव नहीं. पहले दिल ए गुदाख्तापैदा कीजिए फिर ज़िंदगीनामापढिए. तब लगेगा एक अपूर्व रस का पान कर रहे हैं.




नारीवाद भी है यहां

मित्रो मरजानीसे लेकर डार से बिछुड़ी और अन्य रचनाओं को नारीवादी नजरिए से भी देखा गया है और ऐसी व्याख्याएं भी की गई है. ये स्वाभाविक भी है. कृष्णा जी ने जितने तरह के अपनी शख्सियत और शारीरिकता  को लेकर सजग, खुद मुख्तार, आत्म विश्वास से भरी, पितृसत्ता को चुनौती देनेवाली, समाज में लांछित, शारीरिक शोषण का शिकार बनी- स्त्री-चरित्र  में हिंदी में दिए हैं वैसे हिंदी में किसी और लेखक ने नहीं.  ऐसे चरित्रों को सिरजनेवाली की रचनाओं का नारीवादी विश्वेषण न हो तो आश्चर्य होगा. वैसे भी नारीवाद का जन्म  खास ऐतिहासिक  कारणों से हुआ है और उसने नारी मुक्ति के साथ साथ  दूसरी स्वतंत्रताओं के लिए भी दरवाजें खोले हैं. नारीवाद सिर्फ औरतों को मुक्त नहीं करता पुरुषों को भी इतिहास और समाज की नई समझ देता है. संवेदनशीलता भी. इसलिए उसके महत्त्व को कमतर करके नहीं आंका जा सकता.

लेकिन ये मानना भी सही नहीं होगा कि कृष्णा सोबती नारीवादी हैं. वे खुद भी ऐसा नहीं मानतीं. वे खुद को महिला लेखिका भी नहीं कहलवाना चाहती. ये उनके कृति व्यक्तित्व का अन्य पक्ष है और उसकी गंभीर चर्चा होनी चाहिए. सिर्फ इसलिए नहीं कि वे  ऐसा चाहती है. बल्कि इसलिए भी कि साहित्य और कला की दुनिया में लेखकीय पहचान कैसे निर्धारित हो ये भी एक गंभीर मसला बनता जा रहा है. क्या लता मंगेशकर और किशोरी अमोनकर को स्त्री गायकी की परंपरा में रखकर देखा जाता है


क्या अमृता शेरगिल और अर्पिता सिंह का अवदान मात्र स्त्री कलाकार के रूप में ही. है? फिर क्यों हिंदी आलोचना में किसी महिला लेखक को महादेवी वर्मा की परंपरा में रख कर एक अलग श्रेणी बनाई जाती है? क्या कृष्णा सोबती भी प्रेमचंद और फणीश्वर नाथ रेणु की परंपरा में नहीं हैबेहतर होगा कि अब हम लेखक (या कवि को) पुलिंग समझना छोड़े और उसमें स्त्रीलिंग और उभयलिंग को भी समाविष्ट करे. इसलिए कृष्णा सोबती या दूसरी महिला लेखिकाओंको भी लेखक ही कहा जाना चाहिए.   यहां हमें कुंवरनारायण की इस पंक्ति को भी याद करना चाहिए जो उन्होंने कृष्णा जी के बारे लिखीं थी- वह पारंपरिक अर्थ में स्त्री-लेखन नहीं है, स्त्री के अर्थ को नई तरह सामाजिक प्रतिष्ठा देता हुआ लेखन है.




कृष्णा सोबती और कविता


कृष्णा जी के लेखन और संवेदना में कविता की केंद्रीय उपस्थिति है. वे हिंदी की अकेली कथाकार हैं जिनमें काव्यात्मकता भी है और दूसरों की लिखी कविताओं के प्रति  लगाव भी. काव्यात्मक कथाएं और भी लेखकों ने लिखी हैं पर कविता के प्रति इस का उत्कट प्रेम किसी और में नहीं हैं. एक  लोकप्रिय मुहावरे का प्रयोग करें तो कह सकते हैं कि कृष्णा सोबती के यहां कविता का डबल रोलहै. यानी एक ओर तो उनका गद्य काव्यात्मक है.  बादलों के घेरे सेलेकर ए लड़कीऔर  समय सरगममें तो अनेक ऐसे अंश हैं जहां  पाठक को ठिठककरमन ही मन, कहना पड़ता है – ‘क्या कविता है!’ ‘यहां बादलों के घेरेका एक छोटा-सा अंश दिया जा रहा है जो इस बात की पुष्टि करता है-

कैसे सरसते दिन थे. तन-मन को सहलाते-बहलाते उस एक रात को मैं आज के इस शून्य में टटोलता हूं. सर्दियों के एकांत मौन में  एकाएक किसी का आदेश पाकर मैं कमरे की ओर बढ़ता हूं. बल्ब के नीले प्रकाश में दो अधखुली थकी थकी पलकें जरा-सी उठती हैं और बांह के घेरे तले सोये शिशु को देखकर मेरे चेहरे पर ठहर जाती हैं. जैसी कहती हों तुम्हारे आलिंगन को तुम्हारा ही तन देकर सजीव कर दिया है. मैं उठता हूं, ठंडे मस्तक को अधरों से छूकर सोचते सोचते उठता हूं कि जो प्यार तन में जगता है.  तन से उपजता है. वही देह पाकर दुनिया में जी भी उठता है. पर कहींएक दूसरा प्यार भी होता है जो पहाड़े के सूखे बादलों की तरह उठ उठ आता है और बिना बरसे ही भटक भटक कर रह जाता है.

ये भी याद रहे कि ज़िंदगीनामाकी शुरुआत ही कविता से होती है. और वह कविता मूल रचना में इस तरह विन्यस्त है कि उसके बिना रचना का संपूर्ण स्वाद असंभव है.

और डबल रोलवाला का दूसरा रोल ये है कि वे हिंदी और विश्व कविता की घनघोर मगर आलोचनात्मक पाठक हैं. हिंदी और विश्व के कई कवियों को उन्होंने विधिवत पढ़ा है. सूर्यकांत त्रिपाठी निराला’, नरेंद्र शर्मा प्रवासी, नजीर अकबराबादी, फिराक गोरखपुरी की रचनाएं उनके लेखों में कई बार आई है. बर्टोल्ट बेष्ट और पाब्लो नेरूदा से लेकर फर्नांदो पेसोवा की कविताएं  भी हिंदी अनुवाद में उनके लेखों में उद्धृत होती है. उनकी कई कथेतर रचनाओं में प्रयाग शुक्ल, लीलाधर जगूड़ी, मंगलेश डबराल, असद जैदी जैसे हिंदी कवियों और उनकी रचनाओं  के उल्लेख होते हैं.  पर इस प्रसंग में सबसे अहम बात ये है कि  उन्होंने हिंदी कवि गजानन माधव मुक्तिबोध पर एक किताब ही लिखा डाली है.  और हैं, त्रिलोचन शास्त्री पर एक लंबी कविता भी, जो कवि के देसीपन और साधारणत्व में निहित असाधरणत्व को तो रेखांकित करती ही है. उस कविता में एक बहस तलब सवाल भी उठा है-


ऐसे में त्रिलोचन जैसा भारतीय
मुख्यधारा का कवि अंतरराष्ट्रीय स्वरूप कैसे धारण करे!
यह सोचते हुए एकाएक दिल्ली की दीवानगी सवार हो गई.
अगर त्रिलोचन साफ-सुथरा हो तो
उसका सजीला सयाना चेहरा लेखकीय भेंट के लिए
किसी भी बढ़िया क्लब में किसी भी शाम प्रस्तुत किया  जा सकता है
सोच सोच कर दिल में खीज उठने लगी कि
कविता लिखने के लिए
घिस्सी घिसाई चप्पल पहननी क्यों जरूरी है
अगर त्रिलोचन डेनिम की पैंट पहने तो
एक पूरी पीढीं उसके साथ सद्भाव कायम कर सकेगी.
पर नहीं.
उसके जैसा कवि अपनी पोशाक
और अदा में काफी फक्कड़ होता है
क्योंकि वह अख्कड़ होता है
वह जल्दी जल्दी बदलता नहीं
उनकी तरह जो अपने को तेजी से बदलते हैं
हर मौसम में, हर हाल में
हर मंच पर फड़फड़ाते रहते हैं
पर त्रिलोचन लंबे दशकों को लादे
अपनी ऊनी पट्टी में डटोनी
मुद्रा में डटा रहता है..




वात्सल्य बोध

बतौर कथाकार कृष्णा जी के एक और कृति व्यक्तित्व की तरफ हमारा ध्यान जाना चाहिए. अब तक हिंदी आलोचना का ध्यान इस तऱफ गया नहीं है. वह पक्ष है वात्सल्य भाव या वात्सल्य बोध. उनके उपन्यासों में बच्चों और बचपन की सजीव उपस्थिति है. उन्होंने अलग से बच्चों के लिए तो नहीं लिखा है लेकिन बच्चे उनके उपन्यासों में अहम स्थान रखते हैं. ज़िंदगीनामाके शुरूआती हिस्से में  बच्चों को कहानियां सुनाई जा रही है और वे इनको सुनते हुए तरह के सवाल और शरारते करते हैं. फिर आगे चलकर जब शादी के बहुत समय बाद  शाह और शाहनी को एक बेटा होता है जिसका नाम लाली रखा जाता है, तो उसके बढ़ने और मदरसे जाने के अलग अलग दौर की घटनाएं विस्तार से बखानी गई हैं.. 


वह प्रसंग याद कीजिए जिसमें लाली शाह अपनी पढाई शुरू करने के पहले अपने इलाके के रिवाज के मुताबिक अपने आसपास के घरों में भिक्षा मांगने जाता है. ऐसे में उसका नटखटपन जिस अंदाज में सामने लाया गया है वह भी यही प्रमाणित करता है कि क्यों ज़िंदगीनामाएक वृहत्कथा है. बड़ों के ही नहीं बच्चों के कार्यकलापों को कृष्णा जी बारीकी से पकड़ती हैं और चित्रित करती हैं.  ऐसा सिर्फ ज़िंदगीनामामें नहीं है. दिलो दानिशमें  सालगिरह वाला प्रकरण याद कीजिए जिसमें  कृपा नारायण के घर पर उनके बड़े बेटे राज नारायण का जन्मदिन मनाया जा रहा है. वहां वकील कृपानारायण की पत्नी कुटुंब से जन्मे बच्चे भी हैं और बाद में साथी बनी महक से जन्मे बदरू और मासूमा भी. इस मौके पर बच्चो में ल़ड़ाई भी होती है और सुलह भी. जिस तरीके से ये सब दिलो दानिशमें आया है वह बाल हरकतों के सूक्ष्म पर्यवेक्षण के बिना संभव नहीं है.

ये भी आकस्मिक और संयोग नहीं है कि  बच्चों के बीच लोकप्रिय  कविताएं   ज़िंदगीनामा और दिलो दानिशमें कई जगहों पर आती है. आइए, जरा दिलो दानिशमें शामिल नजीर अकबराबादी इस कविता पर निगाह डालिए जो बदरू और मासूमा बहुत प्यार से पढ़ते हैं


कल राह में जाते जो मिला रीछ का बच्चा
ले आए वही हम भी उठा रीछ का बच्चा
सौ नेअमतें खा खा के पला रीछ का बच्चा
जिस वक्त बड़ा रीछ हुआ रीछ का बच्चा
जब  हम भी चले साथ  चला रीछ का बच्चा
था हाथ में इक अपने सवा-मन का जो सोंटा
लोहे की कड़ी जिसपे खड़कती थी सरापा
कांधे के पड़ा झोलना और हाथ मे प्याला
बाजार मे ले आए दिखाने को तमाशा
आगे थे हम और पीछे था रीछ का बच्चा
हशमत और कृष्णा सोबती

हम हशमतके बिना कृष्णा सोबती की चर्चा हो नहीं सकती. हशमतउनका ही गढ़ा एक चरित्र है.हम हमशत’  नाम से दो पुस्तकें आ चुकी हैं और तीसरी आनेवाली है. कौन है ये हशमत? जाहिर है-कृष्णा जी का ही एक अन्य व्यक्तित्व. पर इसे क्यों सृजित किया गया हैहशमत लेखकों के बारे में भी बताता है और उनकी रचनाओं पर कभी मीठे तो कभी नमकीन कटाक्ष भी कर देता है. निर्मल वर्मा  भीष्म साहनी, कृष्ण बलदेव वैद और प्रयाग शुक्ल से लेकर असद जैदी जैसे कई लेखकों को हशमत मियां अपने तराजू पर तौल चुके हैं. किस लेखक के साथ किस रेस्तरां में हशमत ने कॉफी पीते हुए क्या बातें की और किसकी पत्नी से किस अंदाज में मिले ये सब रोचक और दिलचस्प है. हशमत-श्रृंखला की रचनाओ में तिरछे वार भी कई जगह हैं. हशमत कैरम के उस खिलाड़ी की तरह हैं जो अपने स्ट्राईकर से   टैंजेंटमारकर दो या तीन गोटियां एक ही बार में पिला देता है.  यानी हमशत ने जिस व्यक्तित्व को तौला उस पर बलिहारी भी गए और लगे हाथ चिकोटी भी काट ली.

कृष्णा जी एक जबरदस्त प्रयोगवादी है. हिंदी में ऐसा अनूठा प्रयोग सिर्फ उन्होंने ही किया है. हशमत मिया के कारनामें पढ़ते हुए ये सवाल तो झटका देता ही है कि आखिर कृष्णा जी ने इस पात्र को क्यों रचा? मेरे मन में भी ये सवाल उठा और उनसे पूछ भी लिया. उनका जवाब कुछ इस तरह था- मैंने अनुभव किया है कि जहां औरतें पुरुषों के साथ काम करती हैं वहां उनकी भाषा भी कुछ कुछ पुरुषों जैसी हो जाती है. इसी प्रतीति के बाद मेरे भीतर ये चरित्र जन्मा.’  इस तरह हशमत सिर्फ एक चरित्र भर नहीं है. बल्कि सामाजिक- सामुदायिक विकास की उस प्रक्रिया के बारे में भी बताता है जिसमें भाषा-व्यवहार बदलता रहता है.



नागरिक कृष्णा सोबती


कृष्णा सोबती हिंदी की नहीं समकालीन भारतीय साहित्य की एक बड़ी लेखक है इसमें संदेह नहीं है. पर उनका एक दूसरा पक्ष भी है जो उनको और बड़ा बना देता है. वह है उनके द्वारा निभाया गया नागरिक धर्म. कई कुछ बरसों में कई ऐसे मौके आए जब उन्होंने निर्भीकता और विनम्रता के साथ वें आवाजें उठाई जो हर उस नागरिक को उठानी चाहिए जो भारत के संविधान में निष्ठा रखता है और स्वतंत्रता को एक मूल्य मानता है. और उस लेखक को भी जो लेखकीय आजादी और नागरिक आजादी के बीच कोई फर्क नहीं समझता है. दोनों उनके लिए एक ही दायित्व की तरह है. कृष्णा सोबती किसी राजनैतिक दल या लेखक संगठन से कभी जुड़ी नहीं है.  पर जब भी भारतीय नागरिक के किसी अधिकार को अतिक्रमित करने का प्रयास हुआ कृष्णा जी ने उस अतिक्रमण का विरोध किया.  कमाल अहमद के साथ हुई एक बातचीत के इस अंश को याद करें-

लोकतांत्रिक भारत का नागरिक होने के नाते मैं अपने होने में न सिर्फ हिंदू हूं, न मुसलमान, न ईसाई, न सिक्ख, न पारसी. मुझमें, मेरे अस्तित्व और मेरी चेतना से जुड़े हैं लोकतांत्रिक देश के मूल्य और सिद्धांत भी जो मुझमें भारतीय होने का एहसास कराते हैं. एक स्वस्थ समाज की पहचान उसके इतिहास, संस्कृति और साहित्य से होती है. परंपरा और परिवर्तनों के फलस्वरूप उन पुराने की पड़ताल से भी उभरती है जो रूढियों और परिवर्तनों को फलस्वरूप जनमानस के राष्ट्रीय की सोच में लगातार बने रहते हैं और उसके स्वभाव, रूचि, और सोच के अटूट अंग बन जाते हैं. भारत जैसे लोकतात्रिक धर्मनिरपेक्ष देश में यही मूल्य हमारे राष्ट्रीय जीवन को प्रतिबिंबित करते हैं.


वसंतपुत्री कृष्णा सोबती


कृष्णा सोबती का जन्म वसंत ऋतु में हुआ.  कहना चाहिए कि वे वसंतपुत्री हैं. उनको ज्ञानपीठ सम्मानभी वसंत के मौसम में  ही दिया जा रहा है. ये सुखद संयोग हो सकता है. लेकिन इस बात से शायद ही कोई इनकार करेगा कि  साहित्य में चिरस्थायी मधुमास की तरह हैं. हमेशा नया सिरजती हुई.  

93  साल की उम्र में भी वे लिख रही हैं और भारतीय साहित्य को नई कृतियां दे रही हैं. वे ऐसी लेखक हैं जिसके रचे किस्से हर ऋतु में, भविष्य के हर दौर में, दुनिया की कई भाषाओं में, पढ़े जाते रहेगें.
____________________

रवीन्द्र त्रिपाठीटीवी और प्रिट मीडिया के वरिष्ठ पत्रकार,फिल्म-,साहित्य-रंगमंच और कला के आलोचकव्यंग्यकार हैं. व्यंग्य की पुस्तक `मन मोबाइलिया गया है' प्रकाशित. राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की पत्रिका `रंग प्रसंग' और और केंद्रीय हिंदी संस्थान की पत्रिका `मीडिया का संपादन किया है. कई नाट्यालेख लिखे हैं. जनसत्ता के फिल्म समीक्षक और राष्ट्रीय सहारा के कला समीक्षक. वृतचित्र- निर्देशक. साहित्य अकादेमी और साहित्य कला परिषद के लिए वृतचित्रों का निर्माण. आदि
tripathi.ravindra@gmail.com

नव बसंत : राहुल राजेश

$
0
0








ऋतुओं का नायक बसंत साहित्य में भी अपने नायकत्व के साथ उपस्थित है. वह सुन्दर, सबल और शुभ है. वह पोषक है. वह प्रकृति में नव जीवन भरता है. वह साक्षात उर्वरता है.  पृथ्वी पर यह वसंत है और मनुष्यों में यह प्रेम.
प्रेम दिवस पर राहुल राजेश का यह रम्य आलेख.




नव बसंत                                                                                                           

राहुल राजेश






संत !!!

अहा! बसंत यानी उल्लास का महीना! उमंग का महीना! सौंदर्य का महीना! मधुमास का महीना! प्रेम का महीना! मोहब्बत का महीना!! बसंत यानी ऋतुओं में सबसे चमकदार नगीना!!



मीठो, मादक, रंगीलो बसंत आयो रे!

जैसे फलों का राजा आम है, वैसे ही ऋतुओं का राजा बसंत है! इसलिए तो बसंत को ऋतुराज ‌बसंत कहा जाता है! जैसे प्रेम सबसे मीठा होता है, सबसे मादक होता है, वैसे ही बसंत सबसे मीठा होता है, सबसे मादक होता है! जैसे आम सबसे रसीला होता है, वैसे ही बसंत भी सबसे रसीला होता है, सबसे रंगीला होता है!!

इसलिए तो बसंत का नाम सुनते ही मन कह उठता है- बसंत एशे छे! बसंत एशे छे!! बसंत आयो रे! मीठो, रंगीलो बसंत आयो रे! मोहक, मादक, मलंग बसंत आयो रे! सबपे मस्ती छायो रे!!

सचमुच, बसंत का नाम सुनते ही मन उल्लास से भर जाता है! उमंग से भर जाता है! आवेग से भर जाता है! प्रेमोल्लास से, प्रेमावेग से अंग-अंग थिरकने लगता है! मन में, तन में, आँखों में, मुस्कुराहटों में मादकता भर जाती है,मस्ती भर जाती है! बसंत का महीना होता ही ऐसा है!! 





फरवरी बोले तो फुल्लटुस्स बसंत!

आप कहेंगे, बसंत तो ऋतु है, मौसम है! तो इसे मैं महीना क्यों कह रहा हूँ?

आप जरा वर्ष के महीनों पर गौर करें! आधुनिक चलन के अनुसार दिसंबर साल का आखिरी महीना होता है और जनवरी में नया साल शुरू होता है. तो दिसंबर जहाँ साल को अलविदा कहने का महीना होता है, वहीं जनवरी नए साल के मुबारकबाद देने का महीना होता है!

और जनवरी के बाद जो महीना आता है, वह फरवरी का महीना होता है! फरवरी यानी जनवरी और मार्च के बीच का महीना. यानी हेमंत-शिशिर और ग्रीष्म की संधि का महीना! यानी बसंत का महीना!

जनवरी बीतते-बीतते सर्दी अपनी रजाई समेटने लगती है. और मार्च के आते ही गर्मी अपने पाँव पसारने लगती है!

तो बस फरवरी का ही एक ऐसा महीना होता है, जब सर्दी और गर्मी दोनों की छुट्टी होती है! और बसंत बड़े ठाठ से फरवरी के महीने को अपना महीना बना लेता है!!





बसंत बोले तो बिंदास मोहब्बत का महीना!

अमूमन फरवरी में बसंत अपने पूरे शबाब पर रहता है.

पूरी प्रकृति भी शीत की ठिठुरन से बाहर निकल कर, अंगड़ाइयाँ भरने लगती है! नई कोंपलें फूटने लगती हैं. सारे पेड़-पौधे फिर से, नए सिरे से हरियाने लगते हैं. यहाँ तक कि जर्जर ठूँठ भी हरियाने लगता है! पुराने पीले पत्ते झरने लगते हैं और उनकी जगह नए हरे पत्ते उगने लगते हैं. घर की बगिया में पतली-पतली डंठलों पर तितली की तरह पीले-पीले गेंदे के फूल खुलकर झूमने-नाचने लगते हैं. और खेतों में सरसों के पीले-पीले फूल से लेकर जंगलों में पलाश के अग्निपुष्प तक दहकने लगते हैं! घर-आँगन से लेकर वन- प्रांतर तक नव्यता की भव्यता से चमकने लगते हैं! और इसके साथ ही चहुंओर नवीनता का, नूतनता का संचार भी करते जाते हैं! कि उठो, अपने पुरानेपन को उतार फेंको. खुद को मांजो. खुद को नया करो! नवीनता धारण करो!

सिर्फ रंग-रूप में ही नहीं बल्कि विचारों में भी, आचरण में भी, रिश्तों में भी, प्रेम में भी, मुस्कान में भी नवीनता धारण करो! हाव-भाव-स्वभाव - सबमें नूतनता लाओ! और यह नवीनता, यह नूतनता तब आएगी, जब हम बिंदास होकर अपना मन खोलेंगे, बेलौस होकर मोहब्बत में डूब जाएंगे! मुहब्बत पूरी दुनिया से, मुहब्बत पूरी कायनात से!

मुहब्बत जर्रे-जर्रे से! इस कदर मोहब्बत हो जाए खुद से और सबसे कि आपका रोम-रोम, आपका कण-कण बेलौस,बिंदास कह उठ्ठे- हाँ, हमको मोहब्बत है! हाँ, हमको मोहब्बत है!!




बाजार के लिए बसंत माने वैलेंटाइन डे! पर आपके लिए?

मोहब्बत की बात चली है तो जरा बाजार की बात भी कर ही लें!

बाजार के लिए बसंत माने वैलेंटाइन डे! वैलेंटाइन डे माने फेस्टिवल ऑफ लव! पर जरा ठहरिए! इस प्रेम के पर्व को बाजार के उकसावे पर नहीं, अपने मन के उकसावे पर मनाइए! बाजार की भाषा में नहीं, बसंत की भाषा में मनाइए! इस प्रेम के उत्सव को, इस प्रेम के उल्लास को, इस प्रेम के रास को बाजार के रंग-ढंग में नहीं, अपने रंग-ढंग में मनाइए!!

हरेक आदमी बिल्कुल अलग, बिल्कुल अनूठे ढंग से प्रेम करता है! बिल्कुल अपनी तरह से प्रेम जताता है, प्रेम पाता है! प्रेम जताने, प्रेम पाने का उसका यह ढंग बिल्कुल अनोखा होता है; हरेक से सबसे अलग, अद्वितीय होता है! और आपके प्रेम की यह अद्वितीयता, आपके प्रेम का यह अनोखापन, आपके प्रेम का यह अलहदापन आपको तब महसूस होगा, जब आप अपने प्रेम को बाजार में नहीं, बसंत में घटित होने का अद्भुत अवसर देंगे!!

यकीन मानिए, यदि आपका प्रेम बाजार में नहीं, आपके अंदर घटित होता है; बाजार में नहीं, बसंत में घटित होता है तो इस प्रेम की आभा, इस प्रेम की चमक, इस प्रेम की ऊष्मा, इस प्रेम की ऊर्जा कुछ अलग, अनूठी ही होगी, जो बाजार में लाख ढूँढने पर भी नहीं मिलेगा!

और यह भी यकीन मानिए, यदि बसंत सिर्फ बाहर नहीं, सिर्फ प्रकृति में नहीं; वरन आपके अंदर, आपके विचार में,आपके वाणी-व्यवहार में घटित हो जाता है; बसंत आपके तन-मन में उतर आता है तो प्रेम का यह अद्भुत उत्सव आपको ताउम्र बसंत का, ताजगी का, उल्लास का, उमंग का एहसास कराता रहेगा और आप ताउम्र इस प्रेम के प्रकाश से प्रकाशमान होते रहेंगे! बाजार का क्या है! उसे तो इस दिन भी कार्ड ही बेचना है! जैसे ब डे कार्ड, वैसे वैलेंटाइन डे कार्ड!!



पूरा बसंत ही प्रेम का उत्सव है!

सच कहें तो पूरा बसंत का महीना ही उत्सव का महीना होता है! बसंत पंचमी से लेकर रंग पंचमी तक! वैलेंटाइन डे उर्फ़ प्रेमोत्सव से लेकर बसंतोत्सव तक! केवल पूरी प्रकृति ही नहीं, हम सब भी पूरे बसंत, बासंती रंग-ढंग में डूब जाते हैं! बसंत यानी फरवरी! फरवरी यानी माघ-फागुन! और माघ-फागुन यानी सरस्वती पूजा और होली!

बसंत में आम के पेड़ों पर आम के ‌मंजर आने लगते हैं. कोयल आम की डालियों पर कूकने लगती हैं. बेर के फल हाट-बाजारों में बिकने लगते हैं. बस यह बसंत का महीना ही होता है, जब बेर जैसे मामूली फल भी थोड़ी ठसक और ठाठ से हाट-बाज़ारों से लेकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के चमचमाते मॉल में सज जाते हैं! हर घर की पूजा की थाली में सज जाते हैं! बसंत में ही पीले रंग की आभा और महत्ता कुछ और बढ़ जाती है!! 


यह बसंत का महीना ही होता है जब बसंत पंचमी के दिन घर से लेकर स्कूल-कॉलेजों तक, घर से लेकर बाज़ारों तक,गलियों से लेकर चौबारों तक खासकर नन्ही-नन्ही बच्चियाँ और लड़कियाँ साड़ी पहनकर बिंदास निकाल आती हैं और अपने बालसुलभ सौंदर्य और नवयौवन की आभा से पूरे परिवेश को उत्सवी और उल्लसित कर देती हैं! बसंत इस दिन उनको इधर से उधर उड़ती-तैरती रंग-बिरंगी तितलियों में तब्दील कर देता है!!

सचमुच, बसंत ही एकमात्र ऐसी ऋतु है, बसंत ही एकमात्र ऐसा महीना है जिसमें एक साथ विद्या, प्रेम और रंगों के इतने उन्मुक्त उत्सव मनाए जाते हैं! इसका गूढ़ आशय यही है कि बसंत ही जीवन का एकमात्र ऐसा उत्सव है, जिसमें जीवन के राग और रंग सबसे मीठे और मुखर होते हैं! जिसमें प्रेम के रंग सबसे गहरे चढ़ते हैं! जिसमें प्रेम का रंग सबसे गाढ़ा होता है! जिसमें बच्चे, बूढ़े, जवान- सब पर एक साथ, एक समान नयेपन और प्रेम का रंग चढ़ता है! इसलिए इस बसंत वैलेंटाइन डे नहीं, पूरा महीना प्रेम का उत्सव मनाइए!!




सिर्फ इक तारीख में क्यों बंधे?

बाजार ने प्रेम के लिए बस एक तारीख मुकर्रर कर रखी है. पर प्रकृति ने तो हमें पूरा एक मौसम ही सौंप दिया है! बसंत का मौसम! मधुमास का मौसम! पर भला हम सिर्फ इक तारीख में क्यों बंधे? सिर्फ एक महीने में क्यों बंधे?आइए, इस बार हम पूरा महीना, पूरा साल, पूरी उम्र, पूरा जीवन ही प्रेम के नाम कर दें, बसंत के नाम कर दें! और हरदम के लिए, उम्र भर के लिए  हरा हो जाएँ, जवां हो जाएँ, नवा हो जाएँ!!!

बसंत

धरती जब रजस्वला होती है 
वर्षा ऋतु आती है 
और
पूरी प्रकृति हरी-भरी हो जाती है
जब धरती यौवन धारण करती है 
श्रृंगार करती है
बसंत उतरता है!

(राहुल राजेश)
_____________________________________


राहुल राजेश, बी-37, आरबीआई स्टाफ क्वाटर्स, 16/5, डोवर लेन गड़ियाहाट, कोलकाता-700029 ( प. बंगाल)
मो. 9429608159 /ईमेल- rahulrajesh2006@gmail.com

सबद - भेद : साहित्य और पदमावत : रवि रंजन

$
0
0







महाकवि मालिक मुहम्मद जायसी का महाकाव्य ‘पदमावत’ इधर चर्चा में रहा है. इस (कु)चर्चा में ‘पदमावती’ रही है, जायसी की कृति के मन्तव्य, प्रासंगिकता और सौष्ठव की चर्चा नदारत थी.

इस महान रचना को यह आधा-सामन्ती और आधा-पूंजीवादी समाज किस तरह विकृत कर सकता है यह भी प्रत्यक्ष है.

‘पदमावत’ कवि के साहस, राजनीतिक सत्ता और धार्मिक कट्टरता के गठजोड़ की हृदयहीनता तथा प्रेम के पथ पर सबकुछ तज कर चलने वालों की मार्मिक कथा है.

सत्ता की धार्मिकता से उपजी  कट्टरता से भारत ही नहीं उसके आस-पास की दुनिया भी हलकान है और प्रेमियों की हत्याओं का सिलसिला आज भी जारी है.

आज पदमावत को पढने, समझने और समझाने की जरूरत है. प्रो. रवि रंजन ने मध्यकाल के भक्ति साहित्य को ध्यान में रखते हुए सच्चे बुद्धिजीवि की ज़िम्मेदारी का परिचय देते हुए ‘पदमावत’ की विगत सार्थकता और समकालीन अर्थ पर प्रकाश डाला है.  
  

साहित्य  और पदमावत                                  
रविरंजन


इक्कीसवीं शताब्दी के लगभग डेढ़-दो दशक बाद इस अकाल वेला में भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में धर्मोन्माद और आतंक का जो माहौल दिखाई दे रहा है, उसे नजरअंदाज करना मुश्किल है. कहने की ज़रूरत नहीं कि इस मानव-विरोधी लहर की बुनियाद विश्व बाजारवाद एवं भूमंडलीकरण की प्रक्रिया है. कई विचारकों ने हमारे समय की धार्मिक मूलगामिता को औद्योगिक पूंजी के बजाय वित्तीय पूंजी के विश्वव्यापी सर्वग्रासी प्रसार से उत्पन्न बाजारवादी मूलगामिता(मार्केट फंडामेंटलिज्म) का पुनरुत्पाद बताया है.

डॉ. राममनोहर लोहिया ने लिखा है कि राजनीति अल्पकालिक धर्म है और धर्म दीर्घकालीन राजनीति.आज की राजनीति भविष्य का धर्म है और आज का धर्म अतीत की राजनीति. सच तो यह है कि संसार का कोई भी धर्म तात्विक दृष्टि से किसी दैवी सिद्धांत के बजाय एक ऐसी आध्यात्मिक चेतना है, जो लगातार परिवर्तित होते रहने वाले अनुभव से निष्पन्न होती है. इसलिए यह कहना अयुक्तियुक्त न होगा कि धार्मिक प्रश्न मूलतः सामाजिक प्रश्न के अलावा कुछ नहीं होते और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों में बदलाव से कालान्तर में धर्म का स्वरुप भी स्वभावतः बदलता है. जिस प्रकार इतिहास के प्रत्येक कालखंड में उदीयमान एवं पतनशील सामाजिक शक्तियों के बीच प्रायः रस्साकशी की स्थिति हुआ करती है, जिसके फलाफल पर ही सामाजिक विकास की प्रक्रिया का भविष्य टिका होता है, उसी प्रकार संसार के विभिन्न धर्मों के भीतर भी उदारवाद एवं कट्टरवाद के बीच तनाव देखा जा सकता है. गौरतलब है कि इस पंथगत रस्साकशी के कुरुक्षेत्र में दोनों ही पंथों के अगुआ अपने-अपने पक्ष को धर्मयुद्ध घोषित करने से कदापि नहीं चूकते और ऐसे तथाकथित धर्मयुद्ध में कट्टरपंथी पतनशील ताकतों के मुकाबले उदीयमान शक्तियों की विजय के लिए यह बहुत जरूरी होता है कि उसे समर्थन देने वाली सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक ताकतें उस युग-विशेष में विकास के एक निश्चित सोपान पर पहुँच चुकी हों.

भक्ति आंदोलन के आविर्भाव को एक ऐतिहासिक-सामाजिक शक्ति के रूप में रेखांकित करते हुए मुक्तिबोध ने ठीक ही इसे मूलतः तद्युगीन आम जनता के दु:खों और कष्टों से निष्पन्न माना है. उन्होंने लिखा है कि भक्ति-काल की मूल भावना साधारण जनता के कष्ट और पीड़ा से उत्पन्न है.असल बात यह है कि मुसलमान संत-मत भी उसी तरह कट्टरपंथियों के विरुद्ध था, जितना कि भक्ति- मार्ग.दोनों एक-दूसरे से प्रभावित भी थे, किंतु इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि भक्ति-भावना की तीव्र आर्द्रता और सारे दु:खों और कष्टों के परिहार के लिए ईश्वर की पुकार के पीछे जनता की भयानक दु:स्थिति छिपी हुई थी.

मुक्तिबोध ने भक्ति आंदोलन की निर्गुण एवं सगुण धारा के बीच अधिरचना के स्तर पर दिखाई देने वाले अंतर्विरोधों की पृष्ठभूमि में मौजूद तद्युगीन आधारगत अंतर्विरोधों की गहरी छानबीन के बाद जो निष्कर्ष प्रस्तुत किया है, उसे नजरअंदाज कर पाना असंभव है : जो भक्ति आंदोलन जनसाधारण से शुरू हुआ और जिसमें सामाजिक कट्टरपन के विरुद्ध जनसाधारण की सांस्कृतिक आशा-आकांक्षाएँ बोलती थीं,....उसी भक्ति आंदोलन को उच्चवर्गियों ने आगे चलकर अपनी तरह बना लिया.उनके अनुसार इसका मूल कारण यह है कि भारत में पुरानी समाज-रचना को समाप्त करने वाली पूंजीवादी क्रांतिकारी शक्तियाँ उन दिनों विकसित नहीं हुई थीं.निर्गुण-शाखा एवं कृष्णभक्ति-शाखा के बरअक्स रामभक्ति-शाखा को रखकर उन्होंने सवाल खड़ा किया है कि क्या यह एक महत्वपूर्ण तथ्य नहीं है कि कृष्णभक्ति-शाखा के अंतर्गत रसखान और रहीम - जैसे ह्रदयवान मुसलमान कवि बराबर रहे आये, किंतु रामभक्ति-शाखा के अंतर्गत एक भी मुसलमान और शूद्र कवि प्रभावशाली और महत्वपूर्ण रुप से अपनी काव्यात्मक प्रतिभा विशद नहीं कर सका? जबकि यह एक स्वतःसिद्ध बात है कि निर्गुण शाखा के अंतर्गत ऐसे लोगों को अच्छा स्थान प्राप्त था.

कहना न होगा कि भक्तिकाव्य के किसी अध्येता के लिए उपरोक्त सवाल से मुँह चुराना संभव नहीं है, पर इस संदर्भ में मुक्तिबोध की तर्क-पद्धति से शत-प्रतिशत सहमति से एक महत्वपूर्ण सवाल का जवाब पाने की बजाय समस्या के सरलीकरण के खतरे से इनकार नहीं किया जा सकता. वस्तुतः मुक्तिबोध द्वारा खड़ा किया गया प्रश्न एक अत्यंत महत्वपूर्ण समाजशास्त्रीय प्रश्न है, जिसका संतोषजनक उत्तर प्राप्त करने हेतु साहित्य की दुनिया से थोड़ा बाहर जाकर मध्ययुगीन भारतीय समाज की संरचना का समाजशास्त्रीय विवेचन-विश्लेषण अपरिहार्य है. दीगर बात यह है कि निर्गुण और सगुण के बीच जैसी द्विभाजकता हिंदी के भक्तिकाव्य में है,वह अन्य भारतीय भाषाओं में रचित भक्तिकाव्य के प्रसंग में बहुत हद तक लागू नहीं होती.

यह ठीक है कि समाजशास्त्रीय दृष्टि से मध्ययुगीन भारत की सामाजिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक शक्तियों के विश्लेषण के बगैर भक्तिकाव्य पर कोई सार्थक बातचीत आज असंभव है, किंतु, इस महान काव्य की केवल ऐतिहासिक अथवा स्थूल समाजशास्त्रीय व्याख्या के अपने ख़तरे हैं. जिस प्रकार मनुष्य की समाजशास्त्रीय व्याख्या एवं मनोवैज्ञानिक व्याख्या नाभिनालबद्ध होनी चाहिए, उसी प्रकार भक्तिकाव्य का विवेचन-विश्लेषण भी दोनों पद्धतियों की परस्पर संबद्धता के अभाव में यदि एक ओर यांत्रिक समाजशास्त्रीयता का शिकार हो सकता है, तो दूसरी ओर आत्ममुग्धता की हद तक अध्यात्मवाद के रंग में रँग जाने को अभिशप्त. इन अतिवादी, अतिरेकी एवं एकांगी पद्धतियों की अपेक्षा भक्तिकाव्य के संतुलित मूल्यांकन के लिए एक ऐसी समावेशी पद्धति काम्य है, जिसे मोटे तौर पर समाजशास्त्रीय सौन्दर्यशास्त्रया सौन्दर्यशास्त्रीय समाजशास्त्रकहा जा सकता है.

याद रहे कि जेने उल्फ नामक विदुषी की पुस्तक सौंदर्यशास्त्र और कला का समाजशास्त्र’ (1983) में इसी अभिगम को अपनाने पर बल दिया गया है. इसके बगैर यह समझ पाना असंभव है कि भक्तिकाव्य ने सौन्दर्यशास्त्र को किस प्रकार नया आयाम दिया. इसमें कलात्मकता और ऐतिहासिकता का जैसा रोचक और रसात्मक संवाद है, साहित्य, संगीत और कला की जो त्रिवेणी है, वर्ग-संघर्ष और वर्ग-सहयोग के जो द्वन्द्वात्मक दृश्य दिखाई पड़ते हैं तथा सर्वप्रमुख लोकप्रिय जातीय संस्कृति की जो छवियाँ दृष्टिगोचर होती हैं, उनकी मानवीय अर्थवत्ता एवं सार्थकता क्या है. भक्तिकाव्य के समाजशास्त्रीय विश्लेषण के क्रम में यह बात ध्यान देने योग्य  है कि भक्त कवि वर्णव्यवस्था के विरुद्ध केवल वहीं खड़े नहीं होते, जहाँ वे उसकी खुलकर निंदा करते हैं. गहराई से विचार करने पर भक्तिकाव्य में जगह-जगह व्यक्त भगवान के स्पर्श की कामना के भी सामाजिक निहितार्थ ढूंढे जा सकते हैं :

पद कमल धोइ चढ़ाइ नाव न नाथ उतराई चहौं l
मोहि राम राउरि आन दसरथ सपथ सब साची कहौं ll
वरु तीर मारहुँ लखनु पै जब लगि न पाय पखारिहौं l
तब लगि न तुलसीदास नाथ कृपाल पारु उतारिहौं ll

कृष्णभक्ति-काव्य में रासलीलाके प्रसंग में ऐसे अनेकानेक चित्र मिलते हैं, जिनमें नृत्य के दौरान गोपियाँ कृष्ण के और कृष्ण गोपियों के आलिंगन में बद्ध दिखाये गये हैं :

अरुझी कुंडल लट, बेसरि सौं पीत पट, बनमाल
बीच आनि उरझे हैं दोउ जन l
प्रननि सौं प्रान, नैन नननि अंटकि रहे, चटकीली
छबि देखि लपटात स्याम घन
होड़ा-होड़ी नृत्य करें, रीझि-रीझि अंक भरैं,
ता-तार थेई-थेईउछटत हैं हरखि मन l
सूरदास प्रभु प्यारी, मण्डली जुवति भारी, नारि कौ
आँचल लै-लै पोंछत हैं श्रमकन l

सूरदास की कविता में आये उल्लास के इस अपूर्व चित्र पर रीझकर डॉ. रामविलास शर्मा ने लिखा है : कृष्ण के कुंडलों में राधिका की लट, राधा की बेसर में कृष्ण का पीत पट उलझे (उलझा) हैं (हैं). नृत्य  घनीभूत है न! बनमाल में दोनों ही उलझ गये हैं.होड़ करके नाचते हैं. सामंती निषेधों की बेड़ियां पैरों में नहीं हैं, इसलिए प्राक् सामंती समाज की स्वछंदता के ताल पर नाच रहे हैं.प्राणों से प्राण, नैनों से नैनों का मिलना...रीझ-रीझ कर अंक भरना; ता ता थई-थई उछटत पर जब मृदंग पर थाप पड़े, तब नाद की नसेनी पर मन सुन्न महल पर पहुँच जाए.मंडली-जुवती है; अनेक नाचने वाले हैं.सामूहिक उल्लास है.फिर समग्र क्रिया की पूर्ति के फलस्वरूप आँचल के श्रमकन पोंछना रस निष्पत्ति की पराकाष्ठा है.

जिस समाज में आबादी का एक बड़ा हिस्सा छुआछूत जैसी अमानवीय प्रथा का शिकार हो, उसमें संत-भक्त कवियों की रचनाओं में भगवान को स्पर्श करने की कामना की अभिव्यक्ति वाले चित्रों को केवल सौंदर्यशास्त्र की आँख से देखना काफ़ी नहीं है.

उल्लेखनीय है कि जिस वेदांत दर्शन को विवेकानंद ने मानव जाति द्वारा अब तक हासिल उच्चतम ज्ञान का संग्रहतथा शास्त्रों का शास्त्रघोषित किया है, वह बहुत हद तक भक्तिकाव्य की सर्वप्रमुख विचारधारा (नोर्मेटिव आइडियोलोजी) है. विवेकानंद के अनुसार एक आदमी दूसरे आदमी से ऊंचा पैदा हुआ है, इस विचार का वेदांत में कोई स्थान नहीं है.इसलिए भक्त कवियों द्वारा मनुष्य-मनुष्य के बीच बराबरी की भावना की कलात्मक अभिव्यक्ति स्वाभाविक है.

निर्मला जैन ने भक्तिकाव्य की सौन्दर्य-दृष्टि के निर्माण में दार्शनिक विचारधारा की केंद्रीय भूमिका को स्वीकार करते हुए लिखा है कि इस काव्य की मूलवर्ती दृष्टि ठेठ भौतिकवादी भले ही न हो, वस्तुवादी अवश्य है. वस्तु और आत्म, पदार्थ और चेतना के आपसी संबंध के बुनियादी सवाल को सुलझाने की यह केंद्रीय दृष्टि ही जीवन-मूल्यों और तदनुसार सौंदर्य-मूल्यों के विकास की दिशा और प्रकृति का निर्धारण करती है.जो दृष्टि वस्तुजगत को मिथ्या,गौण या नगण्य घोषित करती है, वह कहीं न कहीं समाज में व्याप्त अन्याय और शोषण की मददगार होती है. वह समाज के सुविधा-संपन्न वर्ग की मानसिकता और हितों का प्रतिनिधित्व करती है. इसके विपरीत वस्तुजगत में आस्था रखने के कारण भौतिकवादी दृष्टि का ध्यान मनुष्य और समाज पर केंद्रित रहता है. परिणामतः उसमें सामाजिक अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने की गुंजाइश बराबर बनी रहती है.भक्तिकाव्य का आराध्य तत्वतः अवतार होते हुए भी जीवन की भौतिक आवश्यकताओं से जुड़ा था. जगत को यथार्थ और नित्य मानने वाले ये कवि इंसान के पक्षधर थे.

भक्तिकाव्य के समाजशास्त्रीय अध्ययन की समस्याओं पर विचार करते हुए यह बात भी काबिलेगौर है कि भक्त कवियों ने उपनिषद-काल से चली आ रही ब्रह्म की अवधारणा (कंसेप्शन) को संवेदना के स्तर पर तत्वान्तरित करके उसे (परसेप्शन) में तब्दील किया.इस क्रम में उन्होंने ब्रह्मकी अमूर्त अवधारणा को पहले एंद्रियगोचर रूप प्रदान किया और तब उसे राग का विषय बनाया. गौरतलब है कि भक्त कवियों के ऐन्द्रियबोध की अनेकस्तरीयता के चलते उनकी अभिव्यक्ति-पद्धति में भी स्पष्ट अंतर दिखाई देता है. दूसरे शब्दों में प्रत्येक महत्वपूर्ण भक्त कवि की एक निजी व विशिष्ट अभिव्यक्ति की संरचना है,जिसके मूल में उसकी एक विशिष्ट एवं वैयक्तिक अनुभूति की संरचना निहित है. स्पष्ट ही मनुष्य की निजी एवं वैयक्तिक ऐन्द्रियबोधीय विशिष्टता के चलते बाह्यबोध को लेकर उसकी प्रतिक्रिया को जो एक भिन्न व विशिष्ट आयाम प्राप्त होता है, वह मोटे तौर पर दो प्रकार का हो सकता हैआवेगात्मक और संवेदनात्मक.इनमें आवेगात्मकता का जहाँ तात्कालिक महत्त्व होता है, वहीं संवेदनशीलता का दीर्घकालिक और इसका संबंध संयम,सुरुचि एवं संस्कृति से होता है. सच तो यह है कि जो कवि जितना ज्यादा संवेदनशील होगा, वह उतना ही बड़ा सौंदर्य-पारखी भी.भक्तकवियों की संवेदनशीलता की व्यापकता और गहराई की द्वंद्वात्मकता को रेखांकित करते हुए निर्मला जैन ने सही लिखा है कि जो संवेदनशीलता समाज में व्याप्त अन्याय से चोट खाकर व्यंग और फटकार की तीव्रता में, अन्याय का विरोध करने में प्रकट होती है, वही प्रेम की पीरसे उत्पन्न व्याकुलता में.

पदमावतके रचयिता मालिक मुहम्मद जायसी का वैशिष्ट्य कवि की आवेगशीलता के बजाए संवेदनशीलता में निहित है, जिसके परिणामस्वरुप उसकी अभिव्यक्ति पाठक के भीतर अपेक्षाकृत स्थिर, व्यापक एवं गहरी संवेदनात्मक अनुगूंज उत्पन्न कर सकने में सक्षम है.यह अनुगूंज पदमावतमें जगह-जगह पर जायसी द्वारा प्रयुक्त अनूठी शब्दावली व मुहावरों में सुनी जा सकती है, जिसके माध्यम से वहाँ पूरी कायनात को शब्दमें उतार दिया गया है. प्रसंगवश पदमावतमें सिंहलगढ़-वर्णन के प्रसंग में आया एक दोहा द्रष्टव्य है, जो अभिव्यक्ति की सादगी के बावजूद एक अर्थवान बिम्ब-सृष्टि का अन्यतम उदाहरण है :

मुहमद जीवन जल भरन रहेंट घरी की रीति l
घरी सो आई ज्यों भरी ढरी जनम गा बीति ll

गौरतलब है कि यहाँ रहँटके चलने की वजह से पानी भरने और खाली होने का जो बिम्ब बनता है, वह प्रकारांतर से जिंदगी और मौत की निरंतर चलने वाली चाक्रिक प्रक्रिया को भी व्यंजित करता है. इस अतिरिक्त व्यंजना की कुंजी छोटे-से क्रिया-प्रयोग गामें निहित है, जो ठेठ अवधी का क्रिया-पद है और ऊपर कथित चाक्रिक प्रक्रिया में हर्ष या विषाद जैसे भाव के बजाय चलने की प्रक्रिया पर बल देता है.इसी प्रकार सिंहलद्वीप के पक्षियों का वर्णन करने के दरम्यान जायसी ने लिखा है :

जाँवत पंखि कहे सब बैठे भरि अँबराउँ l
आपनि आपनि भाषा लेहिं दइअ कर नाउँ॥

ऊपर उद्धृत पंक्तियों में निहित रचनात्मक तनाव पर प्रकाश डालते हुए रामस्वरुप चतुर्वेदी लिखते हैं कि इस दोहे के अभाव में वृक्षों पर बैठे दर्जनों पक्षियों की एक सूची बन जाती, पर उस अमराई का कोई काव्यात्मक बिंब न बन पाता. अपनी-अपनी शाखा पर बैठकर अपनी-अपनी भाषा में प्रभु का नाम-स्मरण करते हुए पक्षियों का यह रूप-वर्णन एक सीमा तक प्रस्तुतपरक होते हुए भी बिम्ब की छवि प्राप्तकर लेता है. इस बिम्ब-प्रक्रिया में अवधि के एक बहुप्रचलित शब्द – ‘दइअके प्रयोग से उत्पन्न वैशिष्ट्य की ओर इंगित करते हुए डॉ. चतुर्वेदी कहते हैं कि यदि दइअका स्मरण करते मनुष्य चित्रित होते तो इस शब्द में अर्थ के इतने विस्तार की संभावना न होती. परंतु छोटे, विनम्र पर आकर्षक पक्षियों के संदर्भ में दइअ कर नाउँप्रभु की भाँति ही विराट हो जाता है. पंखिकी निरीहता और दइअकी विराटता के रचनात्मक तनाव से यहाँ अर्थ का संश्लिष्ट विकास संभव होता है. दीगर बात यह है कि ईश्वरऔर अल्लाहसे अलग अवधी का बहुप्रचलित दइअप्रयोग इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि वह हिंदू, मुसलमान या किसी भी धार्मिक परंपरा से अलग प्रभु की उपस्थिति का सीधा साक्षात्कार करा पाता है. ईश्वरया अल्लाहजैसे शब्दों के साथ अनेक धार्मिक-सांप्रदायिक संस्कार जुड़े हुए हैं. दइअग्रामीण जन-जीवन में धर्म से उतना नहीं, जितना विनम्र आस्था से जुड़ा हुए है. इस तरह जायसी का यह शब्द-प्रयोग एक पंक्ति या एक दोहे को नहीं, वरन् एक पूरे अंश को वर्णन के धरातल से उठाकर काव्य-अनुभव बना देता है.

 ‘पदमावतऐसे ही अनेकानेक अनोखे काव्य-अनुभवों का जीवंत समुच्चय होने के कारण अन्य भक्त कवियों की कृतियों से न केवल भिन्न है, बल्कि विशिष्ट भी. ऐसे भी किसी रचना की श्रेष्ठता का निर्धारण केवल इस आधार पर करना औचित्यपूर्ण नहीं माना जा सकता कि वह पूर्ववर्ती या परवर्ती रचनाओं की तरह है या नहीं, जो श्रेष्ठ मानी जाती है. बर्तोल्त ब्रेष्ट के शब्दों में कहें तो हर दिशा में किसी कलाकृति में व्यक्त की गयी ज़िंदगी का व्यक्त की जा रही ज़िंदगी से मिलान करना चाहिए, बजाय इसके कि उसकी दूसरी वर्णित ज़िंदगी से तुलना की जाए. इस तरह देखें तो जायसी मध्ययुगीन सामंती समाज में व्याप्त केवल संकीर्णता ही नहीं, बल्कि उसके विरुद्ध उत्पन्न अत्यधिक उदारता के खतरे को लेकर भी सचेत दिखाई पड़ते हैं. इसीलिए पदमावतमें इतिहास-चेतना के साथ-साथ अंतस और बाह्य की द्वंद्वात्मकता के अलावा जन-जीवन की मार्मिकता के ऐसे अनेकानेक अछूते पहलू उजागर हुए हैं, जिनके अभाव में बड़े से बड़े कलाकार की रचना अपने दायित्व व लक्ष्य से च्युत हो जाती है.

आहत भावनाओं, पूर्वाग्रहों एवं अस्मितावाद की राजनीति की साहित्यिक-सांस्कृतिक क्षेत्र में कैसी परिणतियाँ हो सकती हैं, इसका उदाहरण यदि एक ओर दलित विमर्श के नाम डॉ. धर्मवीर की कबीर संबंधी पुस्तकें हैं, तो दूसरी ओर डॉ. रामविलास शर्मा सरीखे प्रगतिशील आलोचक का तुलसीदास विषयक मंतव्य. सच तो यह है कि

साहित्य-क्षेत्र में युधिष्ठिरों की फुसफुसाहटों और शिखंडियों की ललकारों के बीच जन-जीवन के द्वंद्व को समझ-बूझकर द्वंद्वमुक्त सोच-विचार रखने वाले लोग हर ज़माने में अल्पसंख्यक रहे हैं और पदमावतका रचयिता भी उन्हीं में से एक है.

इसमें जायसी अपने पात्रों को कुछ इस तरह छूते हैं कि मनुष्य को अतिमानव बनाने वाली इतिहास की प्रवृत्ति तथा कई बार सामंती रसोपलब्धि के सूफीकरण के प्रयास के बावजूद वहाँ इतिहास की विडंबना के चित्रण के दौरान कवि और पाठक के बीच काल का व्यवधान नहीं रह जाता. पदमावतमें ऐसे कई सामान्य चरित्र भी हैं, जिनकी आम भारतीय तटस्थता और दार्शनिकता के बरअक्स ही तद्युगीन इतिहास की विडम्बना को उसके व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है. वस्तुतः जायसी का लक्ष्य मध्ययुगीन सामंती समाज के उन तमाम अंतर्विरोधों का संवेदनात्मक रेखांकन है, जिसकी क्रूरता का ज्वालामुखी फूटकर अंततः सबको तहस-नहस कर देता है :

जौंहर भई इस्तिरी पुरुख भए संग्राम l
पातसाहि गढ़ चूरा चितउर भा इसलाम॥

कहना न होगा कि साहित्य का समाजशास्त्रके क्षेत्र में अपने अप्रतिम योगदान के लिए विश्वप्रसिद्ध विचारक लूसिएँ गोल्डमान की शब्दावली का इस्तेमाल करते हुए विजयदेव नारायण साही ने जायसीपुस्तक में पदमावतमें निहित विषाद-दृष्टि’(ट्रैजिक विज़न) की सामाजिकता को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में भलीभांति उजागर किया है. अपने विवेचन-विश्लेषण के क्रम में साही ने इसी प्रसंग पर रचित अमीर खुसरो का एक फारसी छंद भी उद्धृत किया है जिसमें अलाउद्दीन खिलजी पर व्यंग्य करते हुए खुसरो कहते हैं कि तुमने अपने घमंड की तलवार से ह्रदय के देश को वीराना बना दिया और अब तू इस पर सुलतान बनकर बैठा है.

पदमावतमें जगहजगह सूफीमत की शब्दावली, मुहावरे एवं प्रतीक-विधान के इस्तेमाल तथा सामंती रसोपलब्धि के सूफीकरण के बावजूद जायसी की काव्यानुभूति की संस्कृति एकायामी नहीं है. वस्तुतः यह कृति उस ज़माने में प्रचलित तमाम तरह की धार्मिक प्रणालियों व अधिरचनाओं का छोटा-मोटा विश्वकोश प्रतीत होती है, जिसकी रचना के मूल में कवि की सर्वसमावेशी प्रकृति है. चूँकि जायसी के यहाँ अपवर्जन के लिए कोई जगह नहीं है, इसलिए उनसे वैसी धर्मनिरेपक्षता की माँग करना एक प्रकार से ज्यादती होगी, जो राष्ट्रीयता एवं संस्कृति में धर्म के एक संघटक अवयव के रुप में समावेश किये जाने का विरोध करती है.

यह सही है कि धर्मनिरपेक्षता का अर्थ सर्वधर्म समभाव’  कदापि नहीं होता और इसकी अवधारणा शुरु से यह रही है कि प्रत्येक नागरिक के धार्मिक विश्वास (या नास्तिकता) की स्वाधीनता बरकरार रखने के बावजूद राजकीय एवं प्रशासनिक क्रियाकलापों में धार्मिक मान्यताओं के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए. किंतु, स्मरणीय है कि धर्मनिरेपक्षता विषयक इस मंतव्य का स्वरुप सिद्धांततः आधुनिकता व आधुनिकीकरण की प्रक्रिया के साथ निर्मित हुआ है और ऐसी धारणाओं को सर्वधर्म समभावरूपी बीज से अंकुरित परवर्ती तर्कसम्मत चिंतन कहा जा सकता है.

जाहिर है कि मध्यकाल में ऐसे वैज्ञानिक एवं तार्किक भावबोध और चिंतन सरणि के अभ्युदय, विकास तथा प्रसार के लिए कोई अवकाश नहीं था. इसलिए आज चेतना व चिंतन के विकसित धरातल पर खड़े होकर भक्तिकालीन कलाकृतियों में निहित उदार मानववाद को कमतर समझना एक श्रेष्ठ रचना के साथ ग़ैर-रचनात्मक तरीके से पेश आना ही कहा जायेगा और यह नज़रिया न केवल कला-विरोधी होगा, बल्कि अनैतिहासिक भी. वस्तुतः पदमावतके पाठ को भक्तिकालीन सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों में रखकर ही जायसी के रचनात्मक अभिप्राय एवं प्रभाव की पड़ताल करना तथा उनकी रचनात्मक उपलब्धियों एवं संभावनाओं का जायज़ा लेना संभव है. कहने की ज़रुरत नहीं कि
पदमावतधार्मिक संवेदना एवं धर्मनिरेपक्ष संवेदना के घनिष्ठ और जटिल संबंध की समझ पैदा करने वाली महान कालजयी कृति है.

अतीत एवं परम्परा के प्रति अपने नज़रिये का खुलासा करते हुए राल्फ फाक्स ने लिखा है कि अतीत हमारे लिए कोई शौकिया वस्तु नहीं है, हम उसका उपयोग वर्तमान में बेहतर तरीके से ज़िंदा रहने के लिए करना चाहते हैं. यह बात जिस हद तक अतीत पर लागू होती है, उसी हद तक अतीत की रचनाओं पर भी, किंतु इसके लिए अतीत में रचित कृतियों को उनकी गतिशीलता और परिवर्तनों के रुप में, उनके पारस्परिक संबंधों और घात-प्रतिघातों के रुप में देखकर गहरी छानबीन अपरिहार्य है. यह देखे बगैर कि साहित्यिक कृतियाँ किन ऐतिहासिक, सामाजिक, सांस्कृतिक संकटों से पैदा हुए संवेदनात्मक आलोड़न के तहत रची जाती हैं और दूसरी कृतियों के साथ उनकी क्रिया-प्रतिक्रिया कैसी होती है, यदि कोई अध्ययन किया जायेगा तो स्वभावतः उससे अनेकानेक भ्रमोत्पादक निष्कर्ष निकेलेंगे और समझ पाना असंभव होगा कि कैसे भक्त कवि तद्युगीन दुनियावी सच्चाइयों से जुझती अपनी लहूलुहान आत्मा की पीड़ा को धार्मिक चेतना जैसा एब्सोल्यूटरुप प्रदान करते हैं.

रघुवीर सहाय का कहना है कि
कविता जिन चीज़ों को बचा सकती है, उनको पहचानने के लिए आप मुक्त हैं, पर अंततः वे वहीं होंगीजो कि आदमी को कहीं न कहीं आज़ाद करती हैं.

इस दृष्टि से विचारने पर स्पष्ट होता है कि जायसी की कविता भले ही तद्युगीन समाज को बनाने या बिगाड़ने वाले सत्ता-संघर्ष में कोई सार्थक हस्तक्षेप न कर पायी हो, पर वह अपने समय का एक ऐसा संवेदनात्मक साक्ष्य ज़रुर है, जिससे गुज़रना आज भी हमें किसी सीमा तक अवश्य मुक्त करता है. याद रहे कि आज के पाठक की यह मुक्ति किसी भी अर्थ में अपने समय की वास्तविकता की विस्मृति का ज़रिया नहीं हो सकती. हिंसा की सभ्यताएवं क्रूरता की संस्कृतिके इस उपभोक्तावादी युग में पदमावतसे गुज़रना खुद को लगभग याद दिलाने जैसा है कि हमारे अपने समय-समाज की वास्तविकता क्या है.

वस्तुतः जायसी अपने कविता में जगह-जगह पर शब्दों के चारों ओर वह स्पेसरचते दिखाई पड़ते हैं, जिनमें तथाकथित आधुनिक जीवन की विसंगतियों व विड़ंबनाओं के चलते अवसन्न पाठक शिरकत करके एक हद तक संतृप्त महसूस कर सकता है. यह इसलिए संभव है, क्योंकि सूफ़ी मतवाद से संबंधित दार्शनिक वागाडम्बर व दिखावे के बजाय कवि का मकसद तद्युगीन औसत भारतीय जीवन में मौजूद बुनियादी रागात्मकता का उद्घाटन रहा है. स्पष्ट ही जायसी के प्रेम की पीरका स्वरुप नारद-भक्ति-सूत्र के अनिर्वचनीयं प्रेमस्वरुपम. मूकास्वादनवत्.से न केवल गुणात्मक रुप में भिन्न है, बल्कि कहीं ज्यादा मानवीय भी. ठेठ अवधी का ठाठको मध्यकाल में काव्य-सृजन के शिखर पर पहुँचाने में सफल महाकवि जायसी को विजयदेव नारायण साही ने ठीक ही हिन्दी का पहला विधिवत कविऔर उनके पदमावतको सुविख्यात पश्चिमी भारतविद थॉमस डी.ब्रुइज्न ने रूबी इन द डस्टकहा है

स्पष्ट ही पदमावतजैसी किसी कलाकृति को आधार बनाकर निर्मित फिल्म अपने तमाम तामझाम के बावजूद उसकी कला-चेतना की ऊँचाई का स्पर्श नहीं कर सकती, क्योंकि कवि अपने पाठकों की कल्पनाशीलता को जहाँ उद्वेलित करता है, वहीं फिल्म उसे मूर्त रूप प्रदान करके सीमित कर देती है. नतीजतन, कालजयी रचनाएँ इतिहास की प्रक्रिया से गुजरने के बावजूद इतिहास का अतिक्रमण करती हुईं अक्सर फिल्म के मुकाबले में बाजी मार ले जाती हैं.
_______ 
प्रोफ़ेसर एवं पूर्व अध्यक्ष,हिन्दी विभाग,हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय,हैदराबाद -500046
विजिटिंग प्रोफ़ेसर,वारसा विश्वविद्यालय,पोलैंड
इ.मेल : raviranjan@uohyd.ac.in 

सबद - भेद : मित्रो मरजानी का मर्म: नंद भारद्वाज

$
0
0












कृष्‍णा सोबती के  लेखन पर समालोचन पर आपने रवीन्द्र त्रिपाठी  का आलेख पढ़ा - 'पहले दिल-ए-गुदाख़्ता पैदा करे  कोई. इसी क्रम में आज प्रस्तुत है नंद भारद्वाज का आलेख – ‘मरजानी मित्रो की मर्म-कथा’.

नंद भारद्वाज ने इस चर्चित उपन्यास पर लेखकों-आलोचकों के मतान्तर को दृष्टि में रखये हुए इस कृति के मन्तव्य को सलीके से उद्घाटित किया है.  

फरवरी  कृष्णा सोबती के जन्मोत्सव का महीना है.



मरजानी मित्रो की मर्म-कथा                  
नंद भारद्वाज





कृष्‍णा सोबती के अधिकांश समानधर्मा रचनाकारों, समालोचकों और हिन्‍दी के बड़े पाठकवर्ग ने जहां अपने समय-समाज में उनकी रचनात्‍मक भूमिका को मुक्‍त मन से सराहा है, वहीं उनके कुछ समकालीन रचनाकारों और भिन्‍न सोच रखनेवाले आलोचकों ने उनके स्‍त्री चरित्रों की वैयक्तिक छवि, उन्‍मुक्‍त आचरण और उनकी बेबाक बयानी पर सनातनी शंकाएं उठाते हुए उन पर मनमाने आरोप भी लगाए हैं. 

मसलन, लेखक-संपादक राजेन्‍द्र यादव को जहां
‘सूरजमुखी अंधेरे के’ में कृष्‍णा सोबती की नारी एक खतरनाक दिशा की ओर मुड़ती दिखाई दी और उन्‍हें यह लिखना जरूरी लगा कि ‘डार से बिछुड़ी’ में आदमी ने औरत को ‘चीज’ की तरह इस्‍तेमाल किया था, यहां औरत आदमी को एक दूसरी दृष्टि से इस्‍तेमाल करती है. (औरों के बहाने, पृष्‍ठ  43) 
वहीं कृष्‍णा सोबती के इन्‍हीं उपन्‍यासों को हवाले में लेते हुए उन पर अपनी तंजभरी टिप्‍पणी ‘कौन-सी जिन्‍दगी कौन-सा साहित्‍य’में अमृता प्रीतम यह कहती दिखीं कि “आधुनिक हिन्‍दी साहित्‍य के यौन आचरण का एक बड़ा खूबसूरत हवाला कृष्‍णा सोबती के उपन्‍यास ‘सूरजमुखी अंधेरे के’ में मिलता है."इसी क्रम में हिन्‍दी कथाकार और लेखक कमलाकान्‍त त्रिपाठी ने ‘दस्‍तावेज’ पत्रिका के अंक 138 में प्रकाशित अपने एक लेख में हिन्‍दी की स्‍त्री कथाकारों में मुक्‍त-यौनवाद का मसला उठाते हुए कृष्‍णा सोबती, मृदुला गर्ग, और मैत्रेयी पुष्‍पाके कुछ उपन्‍यासों की कथावस्‍तु और उनके नजरिये को निशाने पर लेते हुए काफी तीखी टिप्‍पणियां की हैं. 


कृष्‍णा सोबती के दो लघु उपन्‍यासों ‘सूरजमुखी अंधेरे के’ और ‘मित्रो मरजानी’ के प्रमुख स्‍त्री-चरित्रों की चीर-फाड़ के बहाने उन्‍होंने लेखिका के मंतव्‍य (नीयत) पर ही सवाल उठा दिये हैं.

‘मित्रो मरजानी’ की पूरी कथा की अपनी मनमानी व्‍याख्‍या करते हुए कमलाकान्‍त त्रिपाठी लिखते हैं-  “ऐसे घोर व्‍यक्तिवादी, बल्कि  देहवादी, दांपत्‍य-विरोधी और समाज-विरोधी पात्र को उपन्‍यास का केन्‍द्रीय चरित्र बनाने के पीछे लेखिका का क्‍या मंतव्‍य हो सकता है. अंत के बेहद नाटकीय दृश्‍य का निहितार्थ बहुत गोलमोल है. कोई संकेत नहीं है कि पति को लेकर मां से भय और असुरक्षा का क्षणिक बोध रातों-रात उसमें कोई दिव्‍यांतर ला देता है और वह अपने स्‍वभाव से ऊपर उठकर घर-परिवार के प्रति अनुरक्‍त हो जाती है. इस दृश्‍य को छोड़ दें तो मित्रो में कहीं कोई मानवीय स्‍पंदन नहीं है." (दस्‍तावेज 138, पृष्‍ठ 9) और इसी रौ में उनके दूसरे उपन्‍यास ‘सूरजमुखी अंधेरे के’ पर ‘सॉफ्‍ट पॉर्न’ की चत्‍ती लगाते हुए अपनी मनोगत व्‍याख्‍या में वे लिखते हैं – “पूरी कथा घोर दैहिकता पर टिकी होने के बावजूद एक अयथार्थ, स्‍वप्निल दुनिया में विचरती है, जहां आर्थिक-सामाजिक विसंगतियां, जीवन की आपा-धापी, ऊहापोह सिरे से गायब है." (वही, पृ 10) और अंत में वही खीझ-भरा निष्‍कर्ष कि “उपन्‍यास स्‍त्री–चेतना और स्‍त्री-विमर्श को एक सूत भी आगे बढ़ाता नहीं लगता." (वही, पृ 11)

जहां तक राजेन्‍द्र यादव और अमृता प्रीतम की टिप्‍पणियों का सवाल है, उन पर महिला एवं बाल कानून के विशेषज्ञ और नारी-लेखन के समाजशास्‍त्रीय अध्‍येता अरविन्‍द जैन ने कृष्‍णा जी के लेखन पर इस तरह की आपत्ति उठाने वालों को अपनी पुस्‍तक ‘औरत :अस्तित्‍व और अस्मिता’ में विस्‍तार से सटीक जवाब दिया है. ऐसे सभी आक्षेपों का तार्किक और शालीन उत्‍तर देते हुए वे लिखते है - “मैं इसे दुर्भाग्‍य ही कहूंगा कि उपन्‍यास को सिर्फ ‘मांसल धरातल’ पर ही पढ़ा और ‘पूजा’ गया. ‘सूरजमुखी अंधेरे के’ मुख्‍य पात्र रत्‍ती के बचपन में बलात्‍कार से जुड़ी कहानी है, जिसमें रत्‍ती एक लंबी लड़ाई लड़ती है. हारती है, पर हार मानती नहीं. हर बार सिर उठा आगे बढ़ती है. रत्‍ती के लिए भविष्‍य वह अंधी आंखोंवाला वक्‍त बना रहा, जिससे रत्‍ती ने कभी साक्षात्‍कार नहीं किया, मगर रत्‍ती का बार-बार सिर उठा आगे बढ़नादेखना ही रत्‍ती की ताकत हैहिम्‍मत है."(औरत : अस्तित्‍व और अस्मिता, पृ 29)

बहरहाल, राजेन्‍द्र यादव और अमृता प्रीतम की टिप्‍पणियों पर अपनी बात फिर कभी. यहां जरूरत फिलहाल इस बात की है कि ‘मित्रो मरजानी’ के संबंध में कमलाकान्‍त त्रिपाठी की इन आपत्तियों को इस कथा-कृति की अंतर्वस्‍तु, मूल संरचना और कृष्‍णा सोबती की कथा-संवेदना के साथ मिलान कर जांचा-परखा जाना चाहिए, ताकि ऐसी भ्रान्त धारणाओं का निराकरण किया जा सके. बेहतर है कि पहले हम इस कथा-कृति की कथावस्‍तु को उसके मूल स्‍वरूप और निहितार्थ में ठीक से जान-समझ लें.  

‘मित्रो मरजानी’ शहरी निम्‍न-मध्‍यवर्ग के काम-काजी परिवार की ऐसी कथा है, जिसमें एक भिन्‍न वातावरण (रमणी की हवेली) में जन्‍मी-पली उन्‍मुक्‍त मिजाज वाली युवती मित्रो के बहू रूप में आ जाने से पारिवारिक वातावरण और घरेलू रिश्‍तों में जो नई स्थितियां और टकराव पैदा होते हैं और घर के बड़े किस तरह संतुलन बनाये रखने की कोशिश करते हैं, यह इसी जद्दोजहद की कहानी है. दिलचस्‍प बात यह है कि यहां खुद मित्रो भी अपने खुले मिजाज के बावजूद उसी बदले हुए वातावरण में ढलने का प्रयास करती है. जिन बातों का उसे अभ्‍यास नहीं है, उन्‍हें  अंगीकार करने का प्रयत्‍न करती है, परिवार और रिश्‍तों की मर्यादा समझने लगती है और इस तरह हिन्‍दी का पाठक पहली बार रूप में एक ऐसे स्‍त्री-चरित्र से रूबरू होता है, जो सामाजिक दायरे में वर्जित समझी जाने वाली दैहिक आकांक्षाओं और बुनियादी मानवीय भाव-वृत्तियों को बहुत सहज ढंग से अभिव्‍यक्‍त करती है. यह उपन्‍यास ऐसे ही घर में रहने-जीने वाले चरित्रों की मार्मिक कहानी के रूप में आगे बढ़ता है. इस घर के सदस्‍य हैं - मुखिया गुरूदास, उनकी पत्‍नी धनवंती, बड़ा बेटा बनवारीलाल, मंझला सरदारीलाल और एक छोटा गुलजारी. तीनों शादीशुदा हैं, जिनकी पत्नियां हैं – सुहागवंती (सुहाग), समित्रावंती (मित्रो) और फूलावंती (फूलां). मित्रो की मां बालो अपनी हवेली और रसूख के भुलावे में इस मध्‍यवर्गीय परिवार में अपनी बेटी मित्रो की शादी करवा तो देती है, लेकिन  जब उसका पति सरदारीलाल इस असलियत को जान लेता है तो पति-पत्‍नी के बीच का रिश्‍ता सहज नहीं रह पाता. उन दोनों के बीच तकरार बढ़ने लगती है और घर का वातावरण अशान्‍त होने लगता है, जिसे घर के बड़े (सास-ससुर, जेठ-जेठानी) किसी तरह संतुलित बनाए रखने का प्रयास करते हैं. 

पति-पत्‍नी के बीच की इसी आपसी तकरार के बाद रात में धीमे स्‍वभाव वाली जिठानी सुहाग देवरानी मित्रो को समझाने का प्रयास करती है तो वह कह उठती है - “जिठानी, तुम्‍हारे देवर सा बगलोल कोई और दूजा न होगा. न दुख-सुख, न प्रीत प्‍यार, न जलन-प्‍यास – बस आए दिन धौल-ध्‍प्‍पा --- लानत मलामत."  फिर एकाएक अपनी ओढ़नी, कुरता और सलवार उतार हंसते हुए सुहाग से बोलती है – “बनवारी कहता है, मित्रो तेरी देह क्‍या, निरा शीरा है शी-रा."इस बात पर सुहाग का चेहरा स्‍याह पड़ जाता है. वह कानों पर हाथ रख कहती है – “हाथ जोड़ती हूं देवरानी, मेरे सिर पाप न चढ़ा."मित्रो को उसी तरह अनावृत्‍त लेटी देख उसके बदन में सुइयां-सी चुभने लगती हैं और सोचती है - ‘इस कुलबोरन की तरह जनानी को हया न हो तो नित-नित जूठी होती औरत की देह निरे पाप का घट है.'कपड़े उतारकर पास बैठी मित्रो अपने हाथों से छातियां ढक मगन हो कहती है – “सच कहना जिठानी, क्‍या ऐसी छातियां किसी और की भी हैं?"  

अपना सिर पीटते हुए सुहाग उसे फटकारती है – “दिन-रात घुलती इस औरत की देह पर तुझे इतना गुमान? अरी, लानत तुझ पर! घर-घर तेरे जैसी काली-मकाली औरतें हैं, उनके तुझ जैसे ही हाथ-पांव हैं, आंखें हैं और यही तुझ जैसी दो छातियां!क्‍या तू ही अनोखी इस जून पड़ी है?”जिठानी का गुस्‍सा देख मित्रो ने हंसते-हंसते लीड़े पहन लिये, जिसे देख सुहाग अपने से ही कहती चली – ‘ऐसा पाप वरत गया है कि डोले में लाई, परणायी बहू के ये हाल-हीले!हे जोतोंवाली देवी, इस घर की इज्‍जत-पत रखना.'फिर मित्रो से कहती है – “देवरानी, तेरी किस्‍मत बुरी थी जो तू आज इन भाइयों के हाथों से बच निकली. मर-खप जाती तो इस जंजाल से छूटती और वे भी सुर्खरू हो जाते ! फिर अचरज से पूछती है – “सच सच कह देवरानी, तू इस राह-कुराह कैसे पड़ी?” 
इस पर मित्रो बेझिझक बोल उठती है – “सात नदियों की तारू, तवे-सी काली मेरी मां, और मैं गोरी-चिटृी उसकी कोख पड़ी. कहती है, इलाके बड़भागी तहसीलदार की मुंहादरा है मित्रो. अब तुम्‍ही बताओ, जिठानी, तुम जैसा सत-बल कहां से पाऊं–लाऊं ? देवर तुम्‍हारा मेरा रोग नहीं पहचानता. --- बहुत हुआ हफ्‍ते पखवारे --- और मेरी इस देह में इतनी प्‍यास है, इतनी प्‍यास है कि मछली सी तड़पती हूं."सुहागवंती फटी आंखों से देवरानी को तकती रहती है, जैसे पहली बार देखा हो, फिर सिर हिला फीके गले से कहती है – “देवरानी, इन भले लोगों को भुलावा दे, तुम्‍हारी मां ने अच्‍छा नहीं किया !” 

इस पूरी कथा में स्‍त्री देह और यौनिकता को लेकर कुल जमा इन्‍हीं संवादों को लेकर सनातनी लोगों में जो कुहराम मचा है, वह वाकई आश्‍चर्यजनक है. वे यह तक मानने को तैयार  नहीं कि दो हमउम्र पारिवारिक स्त्रियों (देवरानी-जिठानी) के बीच अकेले में इस तरह के हंस-बोलों अनैतिक या अस्‍वाभाविक कहना, एक तरह से अपनी कुंद-जेहनी और तंगदिली का ही इज़हार करना है. क्‍या इतने मात्र से मित्रो जैसी नवयौवना ‘निर्लज्‍ज’, ‘कामुक’, ‘कामोद्मादिनी’ या ‘स्‍वैरिणी’ स्‍त्री हो गई? और वह भी उस हमउम्र जिठानी के सामने जो बराबर उसके बेलिहाज बोलों और उन्‍मुक्‍त दैहिक हास-परिहास पर आत्‍मीय लगाव और चिन्‍ता के साथ उसे डांट-फटकार तक लगाने में कोई संकोच नहीं करती.

देवरानी-जिठानी के बीच हुए इस हास-परिहास भरे संवाद के बाद अगली सुबह जब सास धनवंती उन्‍हें यह बताने के लिए जगाती है कि छोटी बहू फूलावंती की तबियत ठीक नहीं, उसके लिए कुछ दवा-पानी का इंतजाम करना है, तो वही पारिवारिक वातावरण फिर से सजीव हो उठता है. यही मुंहफट मित्रो एक संजीदा गृहस्थिन की तरह अपनी सास से कहती है कि उसकी देवरानी बहाने कर रही है, उसे कुछ भी नहीं हुआ, बस घर के बाकी लोगों से उसका तालमेल नहीं बैठ रहा, इसलिए ऐसे हालात पैदा कर रही है. इतना ही नहीं, फूलावंती ने जब सीधे-सरल स्‍वभाव वाली जिठानी सुहाग पर यह आरोप लगाया कि वह उसके गहने दबाए बैठी है तो इस झूठे आरोप के कारण सुहाग के मन को भारी ठेस लगती है. मित्रो सुहागवंती का पक्ष लेते हुए फूलावंती को समझाने का पूरा प्रयत्‍न करती है कि उसकी ऐसी धारणा न परिवार के हित में है और न खुद उसके. जबकि देवर गुलजारी इस विवाद में अपनी बीबी फूलां को कुछ भी समझाने में असमर्थ रहता है. विवाद के दौरान जब परिवार के और लोग बीच में आ गए तो वह सुलझने की बजाय और उलझ गया. परिवार के प्रति ऐसी दूरन्‍देशी और व्‍यापक सोच रखने वाली मित्रो पर अगर कोई ‘घोर व्‍यक्तिवादी और ‘समाज विरोधी’ होने का आक्षेप लगाए तो ऐसी मनोगत धारणा रखने वालों की मानसिकता पर तरस ही खाया जा सकता है.   

उधर मित्रो और पति सरदारी के बीच की तकरार को सुलझाने के लिए घर के मुखिया गुरूदास अपने दोनों बेटों और बहुओं को बुलाते हैं. तकरार की मूल वजह यही थी कि जब मित्रो की पारिवारिक पृष्‍ठभूमि और उसके चाल-चलन को लेकर कुछ अवांछित बातें सरदारी के कानों तक पहुंची तो उसने परिवार में इसकी चर्चा कर दी. बड़े भाई और पिता सचाई जानने के लिए मित्रो से ही इसका खुलासा करना उचित समझते थे, इसी मकसद से जेठ बनवारी ने अपने मां-बाप और छोटे भाई की मौजूदगी में उसी से पूछ लिया – “बहू, मालिक को हाजर-नाजर जान के कह दो कि जो तुम्‍हारे घरवाले ने देखा सुना है वह झूठ है."लेकिन मि‍त्रो ने इसका तुरंत कोई सीधा उत्‍तर नहीं दिया तो थोड़ी तीखी जुबान में वही सवाल फिर दोहरा दिया गया.

आखिर मित्रो ने इस का जवाब कुछ यों दिया – “सज्‍जनो यह सच भी है और झूठ भी.जब और पूछा तो खुलासा करते हुए कहा – “सच तो यूं जेठ जी कि दीन-दुनिया बिसरा मैं मनुक्‍ख की जात से हंस-बोल लेती हूं. (इसमें काहे की लाज-शरम और किस बात की नाराजगी?)  झूठ यूं कि खसम का दिया राजपाट छोड़ मैं कोठे पर तो नहीं जा बैठी?” मित्रो के इस बेबाक उत्‍तर पर गुरूदास की प्रतिक्रिया काबिले गौर थी, जिन्‍होंने बहू की जगह लड़कों को डांटकर कहा – “बोधे जवानो, बेमतलब तिल का ताड़ बना रखा है."जबकि इस पर सरदारी की प्रतिक्रिया कुछ इस तरह की रही. वह चीखकर बोला – “तू छिनालों की भी छिनाल !आज न माने बापू, पर एक दिन इसके यार और याराने……

इस बात पर मित्रो ने ससुर की ओर उलाहने से ताका और मनुहार से कहा – “सुन लिया न बापू? कोई मां-जाई ऐसी गालियां सुन चुप रहेगी?”

जवाब में गुरुदास ने ही अपने बेटे को फटकारते हुए कहा – “लानत है, सरदारीलाल !तेरी मत को सधाने का ढंग-अकल नहीं और ऊपर से यह गुनहगारी !

ससुर से ऐसी तरफदारी पाकर मित्रो ने उनके पांव छू लिये और कहा – “पांव पड़ती हूं बापू जी !आज जो ओट आपसे पाई है, वह मित्रो के लिए सुरगों से बढ़कर है !कहना न होगा कि इस नये पारिवारिक माहौल में मित्रो के लिए बड़ों की ओट और उनका स्‍नेह कितनी अहमियत रखता है, इसे वही समझ सकता है जो मित्रो जैसी परिवार-सुख से वंचित युवती के प्रति सच्‍ची सहानुभूति रखता हो. 

गुरूदास के बेटे मंडी में व्‍यापार का काम देखते थे. वे बाजार के कर्जे के कारण परेशान थे. उधर छोटा गुलजारी दुकान की जो भी उधारी उगाह कर लाता, वह दुकान के खाते में जमा करने की बजाय खुद ही हजम कर जाता. बनवारी और सरदारी इस बात से परेशान थे. घर में फूलावंती ने अलग तनाव का वातावरण बना रखा था, मित्रो ने बीच-बचाव कर उसे हर तरह से  समझाने की कोशिश की, लेकिन बात नहीं बनी. मित्रो ने जब बाजार के कर्जे के कारण पति के चिंतित होने की बात जानी तो उसने मदद के लिए पेशकश की, अपनी बचत में से पति को कुछ देना चाहा, इस सरदारी ने सवाल किया कि वह कहां से मदद कर देगी? यही सोच कर वह बोला, क्‍यों सिर खपाने बैठी हो, मर्दों के फिकर मर्दों के लिए. तेरे बस का नहीं है." 

मित्रो को बुरा तो लगा, लेकिन अपने पर काबू रख इतना ही बोली – “महाराज जी, न थाली बांटते हो, न नींद बांटते हो, दिल के दुखड़े ही बांट लो."

और जब यह जाना कि उन्‍हें तीन हजार की तुरंत जरूरत है तो अपनी पेटी से निकाल कर पति के सामने कर दिये. सरदारी हक्‍का-बक्‍का देखता रह गया. फिर जब मित्रो से पूछा कि ये धन कहां से आया, तो मित्रो ने सहजता से उत्‍तर दिया – “अम्‍मा के भोले भुलक्‍कड़, आपकी धन्‍नो सास की मैं इकलौती बिटिया हूं."जब सरदारी कुछ और कहने को हुआ तो उसने अपने शरबती होठों से मुंह पर सांकल लगा दी. यह प्रसंग और संवाद अपने आप में मित्रो के चरित्र में आए सकारात्‍मक बदलाव और परिवार के प्रति उसकी जिम्‍मेदारी की भावना को बेहतर ढंग से व्‍यक्‍त करता है. आश्‍चर्य है त्रिपाठी जी के लिए मित्रो के इस पारिवारिक अनुराग और मानवीय गुण की कोई कीमत नहीं !   
कथा में गुरूदास की शादीशुदा बेटी जनको के पहली जचकी के बाद पीहर आने का रोचक प्रसंग है, जो प्रकारान्‍तर से मित्रो के उस चारित्रिक पक्ष को ही उभारता है, जहां एक अलग तरह के माहौल से बहू के रूप में आई मित्रो कितनी सहजता से अपनी ननद के प्रति गहरा लगाव व्‍यक्‍त करती है, जिसे पारिवारिक रिश्‍तों को जीने-बरतने का कोई अनुभव नहीं है. इसी तरह गुरूदास के छोटे बेटे गुलजारी और उसकी तुनक-मिजाज स्‍वार्थी पत्‍नी फूलावंती की अलगाववादी प्रवृत्ति को ही उजागर करती है, जबकि मित्रो फूलावंती को भी समझा-बुझाकर परिवार के साथ बनी रहने की ही सलाह देती है.

मित्रो के समझाने-बुझाने के बावजूद फूलावंती आखिर ससुराल में तनाव के हालात पैदा कर पति के साथ अपने पीहर पहुंच ही गई, जहां उसकी मां ने अपनी बहुओं के सामने पहले ही बेटी के पक्ष में माहौल बना रखा था. लेकिन भाभियां उसकी हकीकत पहले से जानती थीं, पर खुलकर किसी ने कुछ भी नहीं कहा. खुद गुलजारी को भी ससुराल में कुछ दिन गुजारने के बाद अपनी भूल का अहसास हो जाता है, लेकिन उसे तुरंत सुधार लेने का कोई संभव रास्‍ता उसे नहीं नजर आता. यही वह निम्‍नमध्‍यवर्गीय पारिवारिक माहौल है, जिसमें स्त्रियां अपने छोटे-छोटे स्‍वार्थों के लिए आपसी मन-मुटाव, जोड़-तोड़ और खींच-तान में पूरी उम्र गुजार देती हैं.

सास धनवंती को एक सुबह जब रसोई में मित्रो को चूल्‍हा सुलगाते देखती है तो सुखद आश्‍चर्य होता है, क्‍योंकि मित्रो इस तरह के पारिवारिक काम की आदत नहीं थी, लेकिन उसी के मुंह से जब यह जानकारी मिलती है कि उसकी जिठानी सुहागवंती गर्भवती है, ऐसे में चूल्‍हे–चौके के काम में उसका हाथ बंटाना अब जरूरी हो गया है. सास धनवंती मित्रो के मुंह से यह खबर सुनकर फूली नहीं समाती, जा इन शब्‍दों में व्‍यक्‍त होता है - “तेरा ही मुंह मुबारक हो समित्रावंती, तेरे मुंह में घी-शक्‍कर.”और फिर दोनों बहुओं को आशीष देने लगती है.

सुहाग के गर्भवती होने की जितनी खुशी थी धनवंती को, मित्रो और सरदारी की अनबन से उतनी ही चिंतित. वह अपने बड़े बेटे बनवारी को मित्रो की खुशी के लिए उसे उपहार स्‍वरूप झुमके बनवाने का सुझाव देती है, ताकि परिवार में सौहार्द्र का माहौल बना रहे. जब मित्रो को अपने लिए झुमके बनवाने की बात पता लगी तो वह अचरज से भर गई. उसने यही कहा कि यह सब करने की क्‍या जरूरत है, यह तो जेठानी सुहाग के लिए करना चाहिये, जिसकी कोख खुलनेवाली है.

धनवंती ने अपनी मंझली बहू का मन रखने के लिए यह भी सुझाव देती है कि वह दो-महीने अपनी मां के पास रहकर व्रत-उपवास करे, जिससे विधाता खुश होंगे और उसके मन की मुराद पूरी करेंगे. मित्रो को सास का यह सुझाव पसंद आया. वह खुशी से सास के आगे माथा टेक इठलाकर कहती है – ‘बड़ी सरकार, तुम्‍हारा कहा सिर माथे. जो कहोगी, वैसा ही करूंगी. अपने कान्‍त से आनंद पाने महीना-दो क्‍या, मैं पूरे चौबीस पख व्रती रह लूंगी.' 

मित्रो की पीहर रवानगी के बाद सास धनवंती और सुहागवंती के बीच जो दिलचस्‍प संवाद हुआ, उसमें मित्रो के प्रति उनका गहरा लगाव ही प्रकट हुआ है. धनवंती को मित्रो अच्‍छी तो लगती है, लेकिन उसके बेबाक बरताव और इधर-उधर की चर्चाओं के कारण वह तय नहीं कर पाती कि दुनिया जिस तरह उसके बारे में अलाय-बलाय बात करती है, क्‍या उसमें कुछ सचाई भी है? यही बात जब वह अपनी बड़ी बहू से पूछती है तो सुहाग का ईमानदार जवाब होता है – “हम बिचके जन अपनी छोटी बुद्धि से दूसरों के छल-छिद्र, दोष-विचार क्‍या पड़तालें अम्‍मा? खुली-डुली देवरानी एक घड़ी स्‍याह, दूसरी घड़ी सफेद. उसके मन में क्‍या है, वही जाने, पर तन उसके तो ऐसी प्‍यास व्‍यापती है कि सौ घट भी थोड़े."  

सुहाग सास के पूछने पर कहने को तो यह बात कह बैठी, लेकिन उसके मन को तसल्‍ली  नहीं हुई. इसलिए रवाना होती सास को रोककर उसने अपनी बात और साफ करके कहा – “कहने को तो कह बैठी हूं पर एक बात मेरे चित्‍त में आती है अम्‍मा, कि मंझली को तौलने-परखने वाली मैं कौन?”सुहाग की इस निर्मल बात पर धनवंती भी रीझ गई, उस पर ऐसा प्‍यार उमड़ा कि आंखें छलछला आई. उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोली – “तेरे मन में कोई द्वैत मैल नहीं सुहागवंती, मालिक तुझे बड़े भाग लगाए !” 

घर में मित्रो के व्‍यवहार और घर के प्रति उसके दायित्‍वबोध को लेकर धनवंती और सुहाग ही नहीं, ससुर गुरूदास के मन में भी मित्रो के प्रति गहरा लगाव है. धनवंती से बात करते हुए आखिर उन्‍हें कहना पड़ा – “सच पूछो तो इस घर की रौनक है मंझली बहू!भले बोली-ठोली में तेज-तर्रार, पर उठते-बैठते चहकती-कहकती तो है ! 

मित्रो अपने पति सरदारीलाल के साथ जब अपने पीहर नूर महल पहुंची तो चारों तरफ हलचल-सी मच गई. मित्रो की मां ने बेटी और दामाद का जी खोलकर स्‍वागत किया. दामाद ने भी सास के पांव छुए तो बालो ने आशीष बरसाए. मित्रो और उसकी मां के संवाद इतने बेतकल्‍लुफ और बेबाक कि जैसे दोनों मां-बेटी नहीं कोई सहेलियां हों. तभी तो मित्रो ने मां की ओर हंसकर कहा था – ‘अपने कबूतर से दिल को किस कैद में रखोगी बीबो, यह तो नित नया चुग्‍गा मांगेगा.'और इस पर मां का यह जवाब – ‘तेरी यही शीरीं बातें सुनने को मैं तरस गई मित्रो !'रात को जब वही सास सज-धज कर जमाई को भोजन परोसने बैठी तो ‘सरदारी को मित्रो की मां अपनी सास-सी नहीं कोई धंधेवाली व्‍यापारिन-सी लगी.

मां-बेटी के बेतकल्‍लुफ संवादों को सुनकर सरदारीलाल शर्म से पानी-पानी हुआ जा रहा था – एक दूसरे को उखाड़ती-पछाड़ती ये कैसी मां-बेटियां !बाहर जाते सरदारी का बांका लाचा देख बालो के मन में जो मरोर उठी तो मित्रो ने आंखों से ही समेट ली और गेंदे के फूल-सी घुटी-घुटी आवाज में बोली – “बीबो, मुझ गरीबनी से क्‍या होड़? तुम्‍हें तो नित नए रास-रंग और मित्रो बेचारी हर दिन अपने इसी एक निठल्‍ले के संग !” 

खसम पर घमंड करनेवाली की बात से बालो के पपोटे जल उठे, पर ऊपर से लाड का फन फैलाकर बोली – “मेरी भोली मित्रो, मुझे तो अंग-अंग प्‍यासी तिरसाई जापती है!अरी, लहर हो तो बुलाऊं तेरी बगीची के लिए कोई माली?”

मित्रो के मुंह पानी भर आया. घरवाले के मान-गुमान सब उड़न-छू हो गए. सजरी आंखें चमकने लगी और ओढ़नी तले दो पंछी मचलने लगे. मां पर आंख गड़ा हौले से कहा – “अह-हय बीबो, तुम्‍हारे मुंह गुलाब. पर घोड़े-से लद्धड़ तुम्‍हारे इस जमाई का क्‍या करूं?” 

बालो ने हमजोलियों की नाईं लड़की को चिकोटी काटी – “ये झमेला तू छोड़ मुझ पर. अरी, तेरी मां खिलाड़िन ने बड़े बड़े बाघ छका डाले !दरअसल यही वह पारिवारिक माहौल था, जिसमें पलकर मित्रो बड़ी हुई थी और उसकी मां की यही इच्‍छा थी कि उसकी बेटी किसी इज्‍जतदार घर में ब्‍याही तो जाए, लेकिन वहां से इज्‍जत और कुछ सुख-सुविधाएं बटोर कर वापस उसी माहौल में लौट आए.

और फिर इस खिलाड़िन मां ने अपने बुढ़ापे और अकेलेपन से उबरने के लिए बेटी मित्रो को फिर से अपने धंधे में खींच लाने के लिए आखिरी दांव खेला – उसने मित्रो को बना-संवारकर सरदारी लाल के पास इस हिदायत के साथ भेजा कि वह उसे रिझाकर इतनी शराब पिला दे, जिससे वह बेसुध हो जाए. फिर वह उसे अपने जाने-परखे डिप्‍टी बग्‍घा के पास रंगरेलियां मनाने भेज देगी और इस तरह मित्रो वापस उसी के धंधे में लौट आएगी.

मित्रो मां के इस जाल में फंसकर उस ग्राहक के पास जाने ही वाली थी कि अचानक मां बालो का मन पलट गया, उसे यह अच्‍छा नहीं लगा कि ‘जो डिप्‍टी सौ-सौ चाव कर उसकी शरणी आता था, आज वही इस लौंडिया से रंगरेलियां मनाएगा. थू री बालो, तेरी जिन्‍दगी पर !’ और उसने रोने का स्‍वांग कर मित्रो को वापस बुला लिया.

जब मित्रो ने मां से पूछा कि ‘बीबो, खैर तो है? धुर दहलीज से बुला लिया?’ लेकिन बार-बार पूछने पर भी जब बालो कुछ न बोली और रोती रही तो उसी ने फिर दिलजोई की – ‘बीबो, डिप्‍टी अगर तेरा इतना ही प्‍यारा है तो इस घुग्‍घुचिया को क्‍यों उससे मेल-ठेल करने भेजा?’ 

वह बड़ी मुश्किल से इतना ही कह पाई – तेरी मां के जमाने लद गये री मित्ती !अब कौन उसका मित्र-प्‍यारा और कौन संगी-साथी !

भौंचक्‍की मित्रो ने रुककर कहा – ‘तेरे दिलगारों की गिनती तो सैकड़ों में थी, बीबो!’ इस पर बालो ने रोते हुए कहा – “न न री, अब इस ठठरी ठंडी भट्टी का कोई वाली-वारस नहीं!"वह आख्रिर अपनी मूल बात पर आते हुए लड़की को अपनी ओर खींचकर बोली – ‘बेटी !अब अकेले छोड़कर मत जाना !मैं सरदारीलाल को मना लूंगी.‘

अंधेरे में दमदमाते नीले पपोटोंवाले मां के काले चेहरे पर दो चील की-सी आंखें देखीं तो चीख मार मित्रो परे जा छिटकी. - “क्‍यों री, क्‍यों?” गहरा फुंकार भर मां को अपनी ओर बढ़ते देख पहले तो मित्रो की घिग्‍घी बंध गई. फिर जाने किस जोर-जाम से संभली और तड़पकर चीखी – “तू सिद्ध भैरों की चेली, अब अपनी खाली कड़ाही में मेरी और मेरे खसम की मछली तलेगी? सो न होगा बीबो, कहे देती हूं!’ फिर तीर-सी छलांग मार ओसारे से देहरी कुलाची और मां के ठेलते-ठेलते सरदारीलाल वाली बैठक की कुंडी चढ़ा ली.

दिन चढ़े सरदारी ने जब आंख खोली तो पास में लेटी मित्रो ने अपने सैंया के मुंह पर चुम्‍मे जड़ दिये. फिर पूछा – “गिरदौर जी, पिछली रात कहां कहां हुए दौरे, पड़ाव?”सरदारी ने घरवाली को घूरा और सिर पर छोटी-सी चपत दे कहा – “रात तो न कहीं ढुकाव हुआ न पड़ा पड़ाव. बस, बैठ हवा के घोड़े बांटे, कहां की कहां निकल गई !” 

मित्रो ने इतना ही कहा – “मेरे हरमन मौला!यही बीता तुम्‍हारी मित्रो के साथ !फिर बाहों में अंगड़ाई ली, हाथों को चटखा-मुरका उठ बैठी. सैयां के हाथ दाबे, पांव दाबे, सिर-हथेली होठों से लगा झूठ-मूठ की थू कर बोली – “कहीं मेरे साहिब जी को नजर न लग जाए इस मित्रो मरजानी की !और इसी निर्णायक मोड़ पर पहुंचकर कृष्‍णा सोबती ने अपनी इस कथा को विराम दिया, जहां से उनके जीवंत चरित्र मित्रो की मुख्‍य धारा के सामाजिक जीवन में लौटने की साध पूरी होती है और यहीं से एक स्‍त्री की सहज जीवन-यात्रा आरंभ होती है.

कितनी विचित्र बात है कि कृष्‍णा सोबती ने जिस गहरी मानवीय दृष्टि से यौन-व्‍यवसाय से जुड़ी एक स्‍त्री की कोख से पैदा हुई और उसी माहौल में पली-बढ़ी उन्‍मुक्‍त स्‍वभाववाली युवती की वैयक्तिक उूर्जा और उसके मानवीय गुणों को उभारते हुए उसे एक मध्‍यवर्गीय परिवार की जिम्‍मेदार बहू के रूप में चित्रित किया है, और जो विषम परिस्थितियों से संघर्ष करते हुए हर कदम पर अपने सास-ससुर, जेठ-जिठानी और परिवार के सदस्‍यों से गहरा लगाव अनुभव करती है, कमलाकान्‍त त्रिपाठी को उसमें कोई ‘मानवीय संवेदन’ ही नहीं दिखाई देता. कहीं ऐसा तो नहीं कि मानवीय संवेदन देखने की यह दृष्टि ही किन्‍हीं और कारणों से बाधित हो गई हो. 


कृष्‍णा जी की व्‍यापक मानवीय दृष्टि की खूबी यह है कि वे सामाजिक दृष्टि से बुरा या वर्जित समझे जाने वाले किसी कर्म में परिस्थितवश घिरे इन्‍सान से घृणा नहीं करतीं, बल्कि उसे उस परिस्थित से उबारने में सभी से सहयोग की अपेक्षा करती हैं, जो स्‍वयं उबरने के लिए संघर्ष करता है, उसका हौसला बढ़ाती हैं और अपनी सर्जना में ऐसे संघर्षशील चरित्रों को बल प्रदान करती हैं, जिन पर कलम चलाने से सनातनी लेखक संकोच करते हैं. मित्रो ऐसा ही जीवंत चरित्र है, जिसकी मां देह-व्‍यापार में मुब्तिला थी. जो मां अपनी बेटी को एक सोची-बूझी चाल के तहत ऐसे मध्‍य-वर्गीय परिवार में ब्‍याह कर उसे वापस अपने धंधे में खींच लाने की कामना रखती है, यह मरजानी मित्रो की अपनी हूंस, विवेक और सूझ-बूझ का ही परिणाम रहा कि वह उस दुष्‍चक्र से उबरकर एक जीवंत चरित्र के रूप में विकसित हो सकी. निश्‍चय ही इस अर्थ में मित्रो की मर्म-कथा को कृष्‍णा सोबती ने जिस मनोयोग से रचा है, वह अपने आप में अनूठी उपलब्धि है.  
_____________________

नंद भारद्वाज
1/247, मध्‍यम मार्ग
मानसरोवर, जयपुर – 302020
Email : nandbhardwaj@gmail.com

रंग- राग : पदमावत : सत्यदेव त्रिपाठी

$
0
0




  
मलिक मोहम्मद जायसी (१३९८-१४९४ ई.) की कृति पदमावत पर आलोचक रवि रंजन का आलेख– ‘साहित्य  और पदमावत’ आपने समालोचन पर पढ़ा. अब फ़िल्म पदमावत पर प्रस्तुत है लेखक रंग-समीक्षक सत्यदेव त्रिपाठी  का आलेख ‘पदमावत : भव्यता की विद्रूपता’.

आक्रामक बाज़ार  कृतियों की अतिवादी व्याख्या प्रस्तुत कर अपना दायरा विस्तृत करता चलता है.  भारतीय फिल्मों में कालजयी कृतियों को भव्यता से प्रस्तुत करने की होड़ लगी हुई है चाहे इस होड़ में कृति ही विकृत क्यों न हो जाए. फ़िल्म पदमावत को लेकर जो हुआ आपके समक्ष है.

सत्यदेव त्रिपाठी  ने कृति और फ़िल्म के बीच कथा और किरदार की जो दुर्गति हुई है उसे यहाँ प्रत्यक्ष किया है.

                                     
पदमावत : भव्यता की विद्रूपता                  
सत्यदेव त्रिपाठी 





ख़िर भंसाली के थैले से बिल्ली बाहर आ ही गयी.(द कैट इज़ आउट ऑफ भंसालीज़ बैग)!! और थैले में हमेशा के लिए बन्द कर रखने की मंशा रखने वालों ने भी देख लिया कि यह बिल्ली वैसी क़तई नहीं है, जैसा सोचकर उसे बाहर आने से रोका जा रहा था. हो सकता है, बल्कि ज्यादा उम्मीद इसी की है कि रोकने वालों की ताक़त से डरकर गिरगिट ने रंग बदल लिया है और प्रेमी-युगल के अंतरंग दृश्य के बदले भर फिल्म क़दम-क़दम पर राजपूती आन-बान-शान को भर दिया है, जिससे रोकने वालों को भरमुँह का जवाब मिल गया है और अवाम की भावनाओं का दोहन भी हो गया है. इस तरह अवरित नयी बिल्ली में संजय की लीला रंग ला रही है पाँचवें दिन फिल्म सौ करोडी संघ (क्लब) में शामिल हो गयी तथा आज (यह लिखते हुए) सातवें दिन भारतीय बाज़ार में डेढ सौ करोड एवं विश्व-बाज़ार को मिला लिया जाये, तो ढाई सौ करोड की कमाई कर चुकी है. ऐसे दोहन बहुत हैं फिल्म में, जो यहाँ आगे आते रहेंगे और जिनके बल उनकी कमाई आगे बढती रहेगी.
     
अभी यह कि काट-छाँटक समिति (सेंसर बोर्ड) की परीक्षा में पद्मावतीउत्तीर्ण हुई पद्मावतहोके, तो समिति को तसल्ली हो गयी कि अस्वीकरण’ (डिस्क्लेमर) के मुताबिक फिल्म को जायसी-काव्य का ही नाम मिल गया और शीर्षक भी व्यक्तिवाची से भाववाची बनके अधिक उपयुक्तता पा सका, लेकिन इन (और तीआदि) से भंसाली को कोई फर्क़ नहीं पडा, क्योंकि बाज़ार को नहीं पडा. असली मक़सद पूरा हो रहा साहित्यिक मिथकों पर बनी भंसालीजी की देवदासबाजीराव मस्तानीसे भी अधिक कमाई हो रही.... और इस सफलता ने थप्पड (यदि वह भी प्रायोजित न रहा हो) का ग़म भी भुलवा दिया होगा. अब वे बेचने के लिए और भी साहित्यिक मिथकों की खोज में लग जायेंगे.

पद्मावत’ : फिल्म बनाम काव्य– ‘फिल्म कोई ऐतिहासिक दस्तावेज़ नहीं है, न ही संजय ने बनाने की कोशिश की है’, जैसी गलतबयानी करने वाले आलोचक तीन तक नहीं गिन पा रहे कि मंगोलों को परास्त करने के उल्लेख व चाचा को मारकर सुल्तान बनने के अलावा पूरी फिल्म साहित्यिक मिथक है, इतिहास नहीं. फिर अस्वीकरण’ (डिस्क्लेमर) में इसे जायसी के महाकव्य पद्मावतपर आधारित बताया गया है. ऐसा कर देना निरापद होता है, क्योंकि अब जायसी या शरत बाबू तो आज रहे नहीं कि अस्वीकरण और असलियत को लेकर सवाल या मुक़दमा करें. उनके लिए लडने वाली कोईकरणी सेनाभी नहीं. और उनका दुरुपयोग करने वालों में ऐसे कला-संस्कार व दियानत नहीं कि क्लासिक के नाम पर अपना उल्लू सीधा करने से बाज आयें. लिहाज़ा संजय भी अब स्क्रिप्टको सर्वोपरि माननेके लिए तो अपने कलाकारों को आगाह करते पाये जा रहे हैं (2 फरवरी, 2018 - दैनिक जागरण’), परंतु यह नहीं बता रहे हैं कि जब स्क्रिप्ट के लिए आप किसी क्लासिक को आधार बनाते हैं, तो किसे सर्वोपरि मानते हैं - अपनी स्क्रिप्ट को या उस क्लासिक आधार को कुछ उदाहरण लें -

क्या जायसी ने रावल रतन सिंह को सिंहल भेजा था नागमती के लिए नायाब मोती लाने या इसमें उनके बुद्धिशाली तोते व रानी नागमती के बीच की कोई कहानी और तोते की कोई अहम भूमिका थी, जो ली जाती, तो फिल्म के लिए कहीं ज्यादा मोहक होती. जिस निर्गुण सूफी मत के चलते पद्मावतक्लासिक बना, उस दर्शन में गुरू सुआ तेहिं पंथ बतावा, बिनु गुरु कहहु को निरगुन पावाकितना मायने रखता है...? लेकिन फिल्म में उस तोते का तो भ्रूण भी नहीं आने दिया और उस दर्शन के संस्पर्श को भी शामिल करना आज की कमाऊ मंशा में कहाँ सम्भव था? सो, सब कुछ को रूपसी नायिका के तीरन्दाज़ी के निखार पर वार दिया!! फिर उसके साथ एकांत गुफा में इलाज़ कराके सीधे प्रेम पनपा दिया गया !!

क्लासिक में तो सिंहल का राजा यूँ ही नहीं व्याह देता अपनी बेटी को, बल्कि गुरू सुआसे सुनकर रतन सेन हजारों सैनिकों को साधु वेश में लेकर सिंहल जाते हैं. पद्मिनी-सौन्दर्य के प्रथम दर्शन में बेहोश भी हो जाते हैं, लेकिन लाते हैं उसे जीत कर ही. परंतु संजय जी पद्मिनी के ग्लैमर के सामने रतनसेन की बुद्धि-बहादुरी को क्यों दिखाते? सो, बस गुडी-गुडी कर दिया....

काव्य के राघव चेतन ने तो पण्डितों को अपना विद्या-बल दिखाने के लिए एकम के दिन ही दूज कर दी थी, इसलिए देश-निकाला दिया था स्वत: रतनसेन ने. पद्मिनी का तो इससे कुछ लेना-देना ही न था. लेकिन फिल्म ने कथा के इस भाग को तोड-मरोड (ट्विस्ट) करके तीन-तीन तानें तोडी हैं. एक तो पद्मिनी के शयन-कक्ष में राघव चेतन से ताक-झाँक कराके और कुछ उसके हाव-भाव भी बदलवाके एक तांत्रिक को पद्मिनी के रूप पर लट्टू या आशिक़ बना दिया है.

दूसरे यह कि देश-निकाला में पद्मिनी की पहल दिखाकर उससे बदला लेने वाला फोक़स भर  दिया है और इस तरह तीसरी बात यह बन गयी है कि पद्मिनी के चरित्र की उठान के लिए रावल रतन प्रेमी नहीं, पत्नी-भक्त मेहरबस (हेनपैक्ड) बन गया है.

बन्दी रावल रतन को छुडा लाने में अलाउद्दीन से बेतरह क्षुब्ध उसकी पत्नी मेहरुन्निसा की मदद से भी बाज़ार के कई तोड जोडे गये हैं, पर यह महाकवि से एकदम ही टूट कर मेहरुन्निसा और पद्मिनी दोनो के दुख से फिल्म के एक सुख वाली भंसाली की ही स्क्रिप्ट हो गयी है. 

कई मामले में निर्णायक भूमिका वाला मलिक काफूर का किरदार कपोल कल्पना है. फिर बादशाह के लिए शूटर जैसा काम करने वाला शख़्स और किन्नर!! गज़ब का विरोधाभास है तथा बादशाह की मलिका बनने की इच्छा में विद्रूप भी.

ऐसी बहुतेरी बातें-वारदातें हैं, छोटी-छोटी ढेरों शृंखलाएं (सेक्वेंसेज़) हैं, जिन सबका उल्लेख यहाँ सम्भव नहीं, पर इन सबके मद्देनज़र यह सवाल उठता है कि जब सिर्फ प्रमुख पात्रों एवं स्थलों के नामों तथा रतन सिंह की धोखे से गिरफ्तारी और रानियों के जौहर जैसे कथा-ढाँचे के स्तम्भों के सिवा भंसाली को सबकुछ भहरा ही देना था, तो सरनाम साहित्यिक मिथकों को उठाया ही क्यों? अपनी कथा बनायें. जो चाहें, करायें. लेकिन नहीं, लोकविश्रुत देवदास, बाजीराव मस्तानी और अब पद्मावती जैसे चरित्रों व कथाओं की लोकप्रियता का जो बम्फर मुनाफा और नाम मिलता है, वह कैसे होता? यदि पसन्दीदा साहित्यिक कृतियों या मिथकों को साकार करने का जुनूँ (पैशन) होता, उन्हें लेकर नयी व्याख्या की वैचारिक चेतना होती, तो आम्रपाली’, ‘तीसरी कसम’, ‘नटसम्राटया फिर सूरज का सातवाँ घोडाही सही...जैसा कुछ बनाते. लेकिन वैसी ज़हनियत व नीयत से महरूम लोगों की क़ुदरत ही है - सरनामों-सम्मान्यों को उठाना, विवाद पैदा करना और कमाना.... पद्मावत-कथा पर भारत : एक खोजकी मात्र 25 मिनट की प्रस्तुति के समक्ष भुनाने और सृजन का फर्क़ देखा जा सकता है. ख़ैर,



किरदार बनाम कलाकार
जब मूल कथा के प्रति कलात्मक सरोकार की जवाबदेही ही ऐसी है, तो उसे व्यक्त करने वाले किरदारों का क्या पूछना!! जड-चेतन गुण-दोषमयका ऐसा विद्रूप है कि अच्छे को इतना अच्छा बनाया, जिसे देख स्रष्टा भी चकरा जाये और बुरे को इतना बुरा कि बुराई भी त्राहि-त्राहि करने लगे.... यही जलजला है अलाउद्दीन खिलजी और रावल रतन के किरदारों में. राजपूती उसूलों व शान-स्वाभिमान को भरने में रत्नसेन देवता हो जाते हैं और अपनी सारी हविश को किसी भी कीमत पर पूरा करने में खिलजी राक्षस हो जाता है. आज के दौर में यह विलोमी रूप आम दर्शक के लिए हिन्दू-मुस्लिम का पर्याय बने बिना न रहेगा, जिसके लिए फिल्मकार ने कोई परहेज़ न बरता...क्या इरादतन? दोनो के धवल-कालिमा लिए पहनावों में भी यह साफ है. शादी के दिन किसी अन्य के साथ देह-रति तथा पत्नी के साथ जबरदस्ती सेक्स करने की हविश में मनमाना खिलजी बनाने के लिए रनवीर के चलने-बोलने व ख़ासकर मांस खाने से लेकर सभी अदा-ओ-अन्दाज़ व मेकअप-वेश-भूषादि पर जितना काम किया गया है, उसका दसवाँ हिस्सा भी रतन बने शाहिद पर नहीं. मूल्यवता रत्नसेन की, पर फिल्म रनवीर की हो गयी है. मूल्यों की मर्यादाएं लिये रतन बने शाहिद (विशाल भारद्वाज के हैदर के मुक़ाबले)  बुझे-बुझे व फ्लैट हैं; तो सबकुछ को ध्वंस करता खिलजी बना रनवीर डाँफ रहा है.

यही सलूक पद्मिनी बनी दीपिका पडुकोण के समक्ष भी शाहिद का है. पद्मिनी पर ही फिल्म है और राजा रतन के मुक़ाबले रानी के महिमा-मण्डन की थोडी झाँकी ऊपर दिखायी गयी. रतन के जीतेजी मृत्यु की आशंका के साथ जौहर करने की आज्ञा लेने तक में महत्ता दिखती है दीपिका की ही. और इस सलूक में सिनेमाई फितरत कम, टिकिट खिडकी पर इनकी औक़ात से प्रेरित पसन्दगी का ही मामला ज्यादा है. बाकी कलाकारों को कोई ख़ास तवज्जो नहीं दी गयी है. जैसे अलाउद्दीन के लिए काम-पूर्त्ति तक का साधन है राघव चेतन, उसी तरह पद्मिनी-खिलजी के अलावा सारे किरदार व कलाकार भंसाली के लिए काम-पूर्त्ति तक ही कीलित हैं. गोरा-बादल को राजपूती शान में शरीक़ करके उनकी मिथकीय हैसियत का सम्मान किया जा सकता था. बादल की माँ में किंचित ऐसा हुआ भी है, पर उसका भी ज्यादा हिस्सा दीपिका के चरित्र को उभारने में परवान चढ गया है. नागमती का होना भी पद्मिनी के उठान की बलि है. ऐसी पूर्वग्रही किरदारी और कलाकारियत के साथ ऐसा सलूक!! कम ही मिलेगा कहीं.   



भव्यता बनाम वास्तविकता
भव्यता भंसाली की फिल्मों की अपनी ख़ासियत है. और यह भी अपने महिमा-मण्डन में वास्तविकता और सामाजिक चेतना को रौंदती हुई नुमायां हुई है. नयनाभिराम दृश्य संयोजन हर चौखटे (फ्रेम) में मौजूद हैं, किन्तु भव्यता की ऐसी भी कैसी आत्मरति कि स्त्रियों, जिसमें गर्भवती भी शामिल हैं, के सामूहिक अग्निस्नान के संवादहीन 15 मिनट सजी-धजी सुन्दरी नायिका की मारक गति और उस पर जँचते पार्श्व-संगीत के साथ भंसालीजी जैसे निर्देशक के लिए अविस्मरणीय क्लाइमेक्स’ (की जुगाली) बन जायें. वरना खिलजी का सिर्फ आना और धुआं उठते राखों के ढेर को देखने भर से इस लम्बी फिल्म के 15 मिनट तो बचते ही, वह भीषण त्रासदी जितनी गहराती, वो इस भव्यता में बह गयी है....
सौन्दर्य-हानि और उससे छीजती भव्यता के डर से शिकार करती नायिका के भी सर-कमर तो बँधते नहीं, केश भी खुले ही रहते हैं, पर संजय की लीला ऐसी कि मज़ाल है जो आँचल तक खिसक जाये.... घूमर नृत्य दिखाने का कथित उद्देश्य तो राजस्थानी संस्कृति के प्रतीक का निदर्शन है, पर हाय री भव्यता की लत (लस्ट) कि उसे रानी पर ही फिल्माना है, जिससे वस्त्र-आभूषण की भव्यता का निख़ार भी आ जाये - फिर चाहे भले महारानी को नचाने में उसी राजपूती संस्कृति का पूरा विखण्डन ही क्यों न हो जाये...!! और विरोध न हुए होते, तो भंसाली की रानी पद्मिनी भरी महफिल में ही नाचती. और क्या अब कहने की ज़रूरत रह जाती है कि इस पूरे प्रकरण की चाबी दीपिका-रूप के दोहन में छिपी है. भव्यताओं की ऐसी विद्रूपतायें शयन-कक्ष में होली-गीत जैसी तमाम और भी हैं, जो 3डी की तकनीक में अधिक जगमगा उठी हैं.



फिल्म बनाम दर्शक
ऊपर से शालीन लगती फिल्म में बडी चतुराई से पिरोये उक्त हॉट तत्त्वों से हिट हुई जा रही फिल्म को अधिकांश समीक्षाओं में ढाई स्टार देने वालों ने शायद समझा भी है. लेकिन आम दर्शक को तो यही भाता है, जो और जिस तरह भंसाली परोस रहे हैं. और असल बात यही है कि जायसी की कालजयी कृति, दीपिका पडुकोण के सौन्दर्य व अलाउद्दीनी नृशंसता के नाम पर रनवीर सिंह के जलवे...आदि सब कारक मात्र ही हैं. सच में दोहन तो हो रहा है अवाम की इसी मानसिकता का, जिसे भंसाली ने देवदाससे लेकर पद्ममावततक निरंतर बढाया है बल्कि ऐसे तमाम फिल्मकार अवाम की सोयी हुई ईहाओं को जगाने का यही काम कर रहे हैं और इसी के बल उसे लूट रहे हैं. इससे समाज और संस्कृति पर पडने वाले फर्क़ को भी वे जानते हैं, पर दुर्योधन के जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्ति:की तरह उन्हें इसकी पडी नहीं और अवाम को इसका पता नहीं. सो, आम दर्शक इन्हीं सब पर दिल खोल कर पैसे लुटा रहा है और अपनी इसी लीला को लूट रहे हैं भंसाली..आदि.

लेकिन लूटने वाले भी काव्य, कला व सौन्दर्य को बज़ार में बेचने के बदले वही माँग-पा रहे हैं, जिसके लिए बाबा तुलसी कह गये हैं – ‘का माँगौँ कछु थिर न रहाई. तो, नाम-दाम लेकर ये लोग भी थिर न रहाईहो जायेंगे.... लेकिन छह सौ सालों से जड जमाये पद्मावतको हिला न सकेंगे, जैसे 16 साल हो गये देवदासका विद्रूप बनाये, पर शरत् बाबू के देवदासका कुछ न बिगडा. सच्ची कला व संस्कृति की फ़ितरत यह भी है.


पर बरवक़्त क्या हो इसका कि रनवीर के कारनामे सडकों-नुक्क्डों पर सराहे जा रहे हैं. मूल्यों के लिए क़ुर्बान हो जाने वाले रावल रतन बने शाहिद के साथ फिल्म ने जितनी अनवधानता बरती, वही जनता में उतर रही.... दीपिका की देहयष्टि पर फ़बते विविध रूपरंगी लहँगों और विशिष्ट कोणों से नुमायां किये गये आंगिक सौन्दर्य व दिलक़श अदाओं पर फ़िदा हैं लोग. 

दुष्यंतकुमारके शब्द उधार लेकर कहूँ, तो इन तथाकथित रहनुमाओं की अदाओं पे फ़िदा है दुनिया, इस बहकती हुई दुनिया को सँभालो यारो..... 
___
सत्यदेव त्रिपाठी
बनारस
satyadevtripathi@gmail.com

रंग- राग : छोटे शहर का बड़ा पर्दा : संजीव कुमार

$
0
0



















अभिनेत्री श्री देवी के सम्मान में
_______________________

कला माध्यमों में सिनेमा को अपार लोकप्रियता मिली है, वह हमारे सार्वजनिक जीवन में हर जगह उपस्थित है. वह अब हमारी संस्कृति का अटूट हिस्सा है. कुछ दशक पहले शहरों और कस्बों में मिलने, बैठने, खाने-पीने और प्रेम सीखने का वह एक दिलफरेब अड्डा था. पर अब वे वहां अपनी आखिरी सांसे ले रहे हैं.

लेखक आलोचक संजीव कुमार ने बड़ी शिद्दत से उस समय को याद किया है जब युवा होता लड़का सिनेमा के चमकीले परदे की ओर रुख करता ही था, कभी बेटिकट भी. यह  आम मध्यवर्गीय सिनेमची किशोर की ज़िंदगी में एक दिलचस्प अध्याय है.  




छोटे शहर का बड़ा पर्दा                                                  
आज़ादी के आस्वाद पर चंदछुट्टे नोट्स

संजीव कुमार


(भात-दाल-तरकारी तक तो ठीक है, पर विशेष व्यंजन मैं स्वांतः सुखाय नहीं बना सकता. कोई होना चाहिए जिसके लिए मैं विशेष व्यंजन बनाऊँ. इसी तरह संस्मरण और व्यंग्य जैसी विधाओं में लेखन मैं तब तक नहीं कर पाता जब तक किसी जुटान के अवसर पर कुछ सुनाने का न्योता न हो. लिखी हुई चीज़ के श्रोता मिलने जा रहे हैं, इस आश्वस्ति से ही मेरे लिए संस्मरण या व्यंग्य लिखना सुकर हो जाता है. पहली बार अपने बचपन के एक सिनेमा-घर को याद करते हुए संस्मरण तब लिखा जब सेंटर फॉर स्टडीज इन डेवलपिंग सोसाइटीज़ (सीएसडीएस), दिल्ली में ‘सराय’के उद्घाटन का जलसा रखा गया और रविकांत ने मुझे उस मौक़े के लिए कुछ ऐसा लिख लाने को कहा जिसमें ‘सराय’ की शोध रुचियों के क्षेत्र, यानी मीडिया, सिनेमा, शहर इत्यादि की कुछ झलक हो. मैंने लिखा, सुनाया, और लोगों को वह पसंद आया. प्रभात रंजन उन दिनों ‘बहुवचन’ का सम्पादन कर रहे थे. उन्होंने उस संस्मरण में बेहतरी लाने के कुछ उम्दा सुझाव दिए और उन परिवर्धनों के साथ ‘बहुवचन’ में उसे छापा भी. उनके सुझावों में से एक यह था कि जे.पी. मूवमेंट के बारे में कुछ और बातें शामिल कीजिये. दूसरा यह कि शीर्षक ‘दास्तान-ए-वैशाली’ कुछ जम नहीं रहा. तो मैंने जे.पी. मूवमेंट वाले हिस्से को थोड़ा बढ़ाया और संस्मरण का शीर्षक रखा, ‘मानस चलान्तिका टीका के मटमैले परदे पर दास्तान-ए-वैशाली’. फिर इस शीर्षक की व्याख्या करते हुए एक भूमिका-सी लिखी.

इसी शीर्षक से वह ‘बहुवचन’ में प्रकाशित हुआ. यह 2002 की बात है. उसके बाद फरमाइश पर मैं व्यंग्य-लेखन तो करता रहा, पर संस्मरण की बारी नहीं आयी. हालांकि मेरे दोस्त, ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ वाले संजय जोशी  बीच-बीच में टोकते रहे कि दर्शक के रूप में अपनी और यादों को कलमबद्ध कीजिये, पर हो नहीं पाया. अभी कोई दो हफ़्ते पहले दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज के इतिहास के विद्यार्थी अयन मृणालऔर वहाँ के बेहद लोकप्रिय शिक्षक मुकुल मांगलिकने कहा कि ‘हद-अनहद’ के नाम से इतिहास विभाग का जो सालाना जलसा होता है, उसमें इस बार ‘टाइम, मेमोरी, सिनेमा’ पर एक हिस्सा रखा गया है जिसमें मुझे भी विद्यार्थियों को अपना वही संस्मरण सुनाना है. मुझे तुरंत लगा कि इतने समय बाद तो एक अवसर हाथ आया है, और उसे भी मैं पुराना संस्मरण सुनाकर ज़ाया कर दूं? सुनने के लिए कुछ लोग होंगे, और वह भी कॉलेज में पढ़नेवाले युवा, इस प्रेरणा से ही मेरे अन्दर कई यादें उमड़ने-घुमड़ने लगीं. मैंने मुकुल से कहा कि कुछ नया सुनाऊंगा. उन्हें क्या दिक्क़त थी! इस तरह यह संस्मरण तैयार हुआ....
अब देखें, अगली प्रेरणा कब मिलती है! –सं.कु.)




सिने-प्रेमी के रूप में मेरी कहानी पिछली सदी के 80 के दशक के एक आम मध्यवर्गीय सिनेमची किशोर की कहानी है, जो निस्संदेह थोड़े फेर-बदल के साथ अनगिनत ज़िंदगियोंमें लगभग इसी तरह दुहराई गयी है, पर बहुत कम सुनी-सुनाई गयी है. यह चाहत, लगन, आतुरता और दुस्साहस से भरी ऐसी कहानी है जिसे याद करते हुए, पता नहीं किस जादू से, इसकी हर शै कॉमेडी में ढल जाती है और इसीलिए कोई इसे गंभीरता से नहीं लेता.

पर आश्चर्यजनक रूप से, सिनेमा के साथ की मेरी कहानी अपनी शुरुआत में गाढ़ी भावुकता से लबरेज़ है, और वह इतनी सच्ची है कि मैं उसे किसी भी कीमत पर कॉमेडी में ढलने देने को तैयार नहीं हूँ.

पहली छवि एकदम क्षणिक और अधूरी है. गोद वाले बच्चे के रूप में देखा गया एक धुंधला, डबडबाया-सा बिम्ब.... मैं रो रहा हूँ और शायद चुप कराने के लिए कोई मुझे हॉल से बाहर ले जा रहा है. पीछे परदे पर उभरती श्वेत-श्याम तस्वीर में लम्बी दाढ़ी वाला एक बेहद उदास चेहरा है और गाने की आवाज़ आ रही है, ‘ऐ मेरे प्यारे वतन, ऐ मेरे बिछड़े चमन’. उस चेहरे पर खेलता निचाट अकेलापन ही है जो शायद मुझसे देखा न गया होगा और रुलाई फूट पड़ी होगी. आज भी यह गाना सुनता हूँ तो बुक्का फाड़ने का मन करता है. बहुत बाद में मैंने अपनी मां से पूछा तो पता चला, ‘काबुलीवाला’ मेरी पहली फिल्म थी, जिसमें मैंने उन्हें खूब तंग किया था.

दूसरी छवि भी इससे बहुत अलग नहीं है. सुबह का वक्त है. मैं अपने बिस्तर पर घुटने अन्दर की ओर मोड़े, सिर तकिये में गाँथे, बाक़ायदा रो रहा हूँ. बारी-बारी से सब आते हैं. बड़ी बहन, मां, पिता. सब जानना चाहते हैं कि हुआ क्या, मैं क्यों रो रहा हूँ? काफ़ी मान-मनौव्वल के बाद मैं भेद खोलता हूँ, ‘उसके हाथी को मार दिया, इसलिए.’पिछले ही शाम हमने ‘हाथी मेरे साथी’देखी है. ‘नफरत की दुनिया को छोड़के प्यार की दुनिया में ख़ुश रहना मेरे यार’, यह गाना कानों में नहीं, कहीं मेरी आत्मा में गूँज रहा है.... मेरा जवाब सुनकर सभी हंसने लगते हैं. मुझे खूब प्यार किया जाता है, लेकिन घर भर में इस कोने से उस कोने तक हर किसी के चेहरे पर हंसी है.... मैं दुलारा हूँ, पर उतना ही हास्यास्पद भी.

शायद यहीं से मैंने फिल्मों को लेकर अपनी भावुकता के सार्वजनिक प्रदर्शन पर रोक लगाने की शुरुआत की होगी. बहुत बाद तक यह सिलसिला जारी रहा कि जिन फिल्मों को देखकर अपनी भावुकता के विरेचन का पर्याप्त मौक़ा मिलता, उन्हें अपनी पसंदीदा फिल्म बताने से मैं बचता था. ‘दीवार’मेरी सबसे पसंदीदा फिल्मों में से है, जिसे देखकर आज भी कम-से-कम दस बार तो रोता ही हूँ, और अगर निर्मल वर्मा के शब्दों में ज़मीन से डेढ़ इंच ऊपर हुआ, तो शायद बीस बार भी (यह अलग बात है कि आधी बार वे खुशी के आंसू होते हैं). लेकिन विडम्बना देखिये कि जब पहली बार एम..में पढ़ते हुए हिन्दू कॉलेज की वार्षिक पत्रिका के लिए फिल्म पर कुछ लिखने का मौक़ा मिला तो मैंने उसमें ‘मृगया’का ज़िक्र किया, ‘दीवार’का नहीं. यह बात बहुत बाद में समझ आयी कि ‘दीवार’ का मुझ पर जो गहरा असर था, वह भी सोचने-विचारने का विषय हो सकता है. अब मैं हिन्दी सिनेमा की अपनी क्लास में ‘दीवार’ को एक पाठ के रूप में पढाता हूँ और हर साल अपने विद्यार्थियों के आगे फिल्म के एक प्रतिनिधि दृश्य की द्वयर्थकता पर मुग्ध भाव से बात करता हूँ. अपनी कहानी पर वापस आने से पहले थोड़ी बात उस दृश्य की.

यह ‘दीवार’ की कथा का एक निर्णायक सीक्वेंस है जहां क़ानून का रखवाला छोटा भाई यह तय करता है कि ग़ैर-कानूनी धंधे में लगे बड़े भाई का केस अपने हाथ में लेने से उसे बचना नहीं है और खून के रिश्ते को क़ानून की हिफ़ाज़त के रास्ते में—या फिल्म के एक संवाद से प्रेरणा लें तो, उन उसूलों की हिफ़ाज़त के रास्ते में जिन्हें गूंथकर एक वक्त की रोटी भी नहीं बनायी जा सकती—आने नहीं देना है. यह तीन दृश्यों की एक शृंखला है. पहला है जिसमें इंस्पेक्टर अजय वर्मा यानी शशि कपूर बाज़ार में कुछ चुराकर भागते हुए एक लड़के का पीछा करता है और आख़िरकार गोली चला देता है. लड़का गिर जाता है और जब इंस्पेक्टर उसके पास पहुंचता है तो यह देखकर ग्लानि से भर जाता है कि वह पावरोटी चुराकर भाग रहा था. अगले दृश्य में वह उस लड़के के घर पहुंचता है. दुखी पिता ए के हंगल से मुलाक़ात होती है. ये एक रिटायर्ड शिक्षक हैं. घर की माली हालत बहुत खराब है. बेटे के बारे में पूछे जाने पर कुछ बहानेबाज़ी करते हैं, पर इंस्पेक्टर यह ज़ाहिर कर देता है कि उसे सचाई पता है. वह उनके घर के लिए रोटियाँ लेकर आया है. जैसे ही यह पता चलता है कि यह वही पुलिसवाला है जिसकी गोली से इस घर का लड़का घायल हुआ है, अन्दर से लड़के की मां निकल आती है और इंस्पेक्टर को खूब खरी-खोटी सुनाती है. उसकी बात का लब्बोलुआब यह है कि इसी शहर में बड़े-बड़े ग़ैर-कानूनी धंधे करनेवाले खुले आम घूम रहे हैं, उन्हें तो पुलिस कुछ करती नहीं, और एक पाव चुराने वाले लड़के को गोली मार कर बहुत शाणा बनती है. सुनकर शशि कपूर की ग्लानि और बढ़ जाती है. अगले दृश्य में वह अपने बॉस के पास पहुंचता है और कहता है कि विजय वर्मा यानी बड़े भाई का केस उसे ही सौंप दिया जाए. मतलब बहुत साफ़ है. पाव चुरानेवाले की मां ने उसकी आँखें खोल दी हैं. विजय इस शहर की उन्हीं अंडरवर्ल्ड हस्तियों में से है जिस तक क़ानून के हाथ नहीं पहुँच पाते.

लेकिन क्या एक दर्शक के रूप में मेरे लिए भी इसका यही मतलब है? मुझे लगता है, इस पूरे प्रसंग की द्वयर्थकता अद्भुत है जिससे यह फ़िल्म अपनी असल ताक़त हासिल करती है. पाव चुराने वाले लड़के की मां जो कुछ कहती है, वह जितना विजय के ख़िलाफ़ जाता है, उतना ही उसके पक्ष में. वह भी तो कल का पाव चुरानेवाला लड़का ही है! वह भी तो एक प्रतिकूल दुनिया में उन अन्यायों से लड़कर यहां तक पहुंचा है जिनके ख़िलाफ़ स्टेट उसे कोई संरक्षण नहीं दे पाता! तो इंस्पेक्टर अजय उस मां के संवाद से जो भी सन्देश निकाल ले, हम जैसे दर्शक वही सन्देश कैसे निकाल सकते हैं जो विजय के संघर्ष के सबसे क़रीबी साक्षी रहे हैं, जिन्होंने उसकी लड़ाई को अपने विशिष्ट वेंटेज पॉइंट के कारण खुद विजय की दुनिया के किसी भी मनुष्य के मुक़ाबले ज़्यादा क़रीब से देखा है! कोई आश्चर्य नहीं कि ‘जाओ साइन लेके आओ उस आदमी का’ बेहद नाटकीय और अस्वाभाविक होते हुए भी हिन्दी फ़िल्मी इतिहास के सबसे दमदार और कन्विंसिंग संवादों में से है. वह पूरी व्यवस्था पर लगाया गया महाभियोग है जिसे उचारते हुए विजय पाव चुराने वाला किशोर बन जाता है और क़ानून के रखवाले और क़ानून तोड़नेवाले के बीच आपकी पूरी सहानुभूति क़ानून तोड़नेवाले के साथ चली जाती है. बल्कि कहना चाहिए कि क़ानून का प्रश्न ही आपके लिए बेमानी हो जाता है, छोटे भाई के लिए और फ़िल्म की कथा के प्रकट सन्देश के लिए वह जितना भी मानीखेज़ हो. गरज़ कि फ़िल्म जो कुछ कहती हुई दिखना चाहती है, वह एक कमज़ोर फुसफुसाहट में तब्दील हो जाता है और जो कहती हुई दिखना नहीं चाहती, वह अमिताभ की संवाद-अदायगी की तरह हमें सबसे ठोस आवाज़ और स्पष्ट उच्चारण में सुनाई पड़ता है.   

पर अपनी कहानी में मैं ‘दीवार’ की कहानी को क्यों घुसा रहा हूँ? एक तो इसलिए कि जिस फ़िल्म को देखकर मैं ज़ारो-क़तार रोता आया हूँ, उसका विश्लेषण करके अपने रोंदू दर्शक स्वभाव को एक सम्मानजनक आधार दे सकूं. आख़िर अपनी पसंदीदा फ़िल्म पर इस तरह से सोच पाने का ही तो असर है कि आज मैं अपने रोंदूपने को निस्संकोच सार्वजनिक कर पा रहा हूँ! दूसरे इसलिए कि हिन्दी सिनेमा भले ही अपने राष्ट्रीय कर्तव्य के तहत हमेशा से प्रकटतः अच्छे नागरिक बनने का सन्देश देती आयी हो, अच्छे नागरिक को अच्छे मनुष्य का पर्याय बनाने की ग़लती शायद उसने कभी नहीं की. उसका प्रच्छन्न सन्देश रहा है कि बुरे नागरिकों में भी अच्छे और बुरे मनुष्य हो सकते हैं—एक ओर डाबर और विजय, तो दूसरी ओर सावंत और उसके आदमी (दीवार); या एक ओर बिरजू, तो दूसरी ओर सुक्खी लाला (मदर इंडिया). इसने सिनेमा के किशोर दर्शक के रूप में हमें अच्छे नागरिक बनने की चिंता से बरी कर दिया और नागरिकता की जगह मनुष्यता हमारा सरोकार बना. हमने समझा कि बुरे यानी अनुशासनहीन बच्चे बनने का मतलब बुरा मनुष्य होना नहीं है. मेरी आगे की कहानी सुनकर शायद इस बात का मतलब खुले.   

मैं ऐसे परिवार से नहीं आता जहां फ़िल्में ख़राब चीज़ मानी जाती हों और उन्हें देखना प्रतिबंधित रहा हो (हमें औसतन हर महीने एक फ़िल्म दिखाई जाती थी). लेकिन हमारा परिवार इतना खुला भी नहीं था कि हर तरह की फ़िल्म देखने की इजाज़त हो. जब मैं तीसरी कक्षा का छात्र था, तब पटना में ‘बॉबी’लगी थी और ‘हम तुम एक कमरे में बंद हों’ जैसे ‘अश्लील’ गाने वाली यह फ़िल्म हमें देखने नहीं दी गयी थी, हालांकि फ़िल्म की कहानी कॉमरेड ख्वाज़ा अहमद अब्बास की लिखी हुई थी और उनके प्रति मेरे पिता के मन में उतना ही सम्मान था जितना हंसिये हथौड़े से अपना प्रतीक-चिन्ह बनानेवाले कॉमरेड महबूब खान या इप्टा में धूम मचाकर फिल्मों की ओर रुख करनेवाले कॉमरेड बलराज साहनी और कॉमरेड ए के हंगल के प्रति था. बावजूद इसके हमें ‘बॉबी’ से दूर रखा गया तो शायद इसीलिए कि आख़िर कामरेड्स भी गाहे-ब-गाहे विचलन के शिकार होते हैं और बाज़ दफ़ा तो उनसे ऐतिहासिक भूलें भी हो जाती हैं! और जहां तक अब्बास साहिब का सवाल है, उनके पास तो विचलन का शिकार होने के अलावा कोई उपाय भी नहीं था. अपनी सुपर फ्लॉप फ़िल्में बनाने के लिए उन्हें पैसों की ज़रूरत होती थी और वह राज कपूर के लिए सुपर हिट फ़िल्में लिखकर ही कमाये जा सकते थे.

तो कुछ फ़िल्मों के देखने पर प्रतिबन्ध या महीने में ज़्यादा-सेज़्यादा एक फ़िल्म देखने के नियम का ही नतीजा रहा होगा कि टीन-एजर होते-होते हम उस पतन के शिकार हुए जिसे ‘भागकर फ़िल्म देखना’ कहते हैं. ‘भागकर फ़िल्म देखना’एक पारिभाषिक पद है जिसका मतलब है, घरवालों को बिना बताये फ़िल्म देखना या स्कूल न जाकर सिनेमा हॉल पहुँच जाना. यह दूसरा तरीका मैं कभी आजमा नहीं पाया, क्योंकि मां उसी स्कूल में पढ़ाती थीं जिसमें मैं पढता था. आज भी सोचकर दुःख होता है कि एक जनम यूं ही निकल गया. अगले जनम में तो भला क्या देख पाऊंगा. इसी जनम में वह ज़माना देख लिया जब सिनेमा हॉल में जाकर फ़िल्म देखना पॉकेट पर इतना भारी पड़ता है कि महीने में एक बार जाने की भी क़ायदे से हिम्मत नहीं होती! हमें अपनी किशोरावस्था में फ़िल्म देखने के लिए महज़ दो रुपये पचपन पैसे की ज़रूरत होती थी जो आज के हिसाब से भी 25-30 रुपये से ज़्यादा नहीं ठहरते. इतने पैसे तो दो या अधिक-से-अधिक तीन बार की सब्ज़ी खरीद में बचाए ही जा सकते थे! आप कितनी बार में बचा पायेंगे, यह इस पर निर्भर था कि आपमें कितना बड़ा स्कैम कर गुज़रने का माद्दा है. बचाने की क्षमता, असल में, घोटाले को पचाने की क्षमता का ही दूसरा नाम था.

खैर, हम बात कर रहे थे कि स्कूल को गच्चा देकर फ़िल्में मैं नहीं देख पाया. लेकिन कोई वजह तो है कि मैं छुप-छुपाकर फ़िल्में देखने के दौर को स्कूल से अलग रखकर नहीं सोच पाता. दरअसल, यह स्कूली अवस्था यानी बच्चा कहलाने की उम्र ही थी जब बाहर रहने की सफ़ाई देनी पड़ती थी और भगोड़ेपन का सम्बन्ध इसी सफ़ाई से था. कॉलेज में आने के बाद तो कौन किसे पूछता है और कौन किसे सफ़ाई देता है! तो मेरी ज़िंदगी में घरवालों को बिना बताये फ़िल्में देखने का सिलसिला तब शुरू हुआ, जब तक मैं आठवीं-नवीं कक्षा में था, यानी जीवन के 13-14 वसंत मैंने देख लिए थे. इस समय तक आते-आते घर से थोड़ी ज़्यादा देर तक बाहर रहने के सिलसिले को मौन स्वीकृति मिल चुकी थी, मगर फिल्मों के मैटिनी, ईवनिंग और नाईट शो की समय-सारणी इतनी तयशुदा थी कि अभी भी ऐन 2:30 बजे घर से निकलकर 6:30 बजे घर लौटने का मतलब था कि बालक तीन से छह वाले मैटिनी शो से लौट रहा है. इसलिए इस काम में ख़ासा दिमाग लगाना पड़ता था कि कैसे अपने ग़ायब होने को शक के घेरे में न आने दिया जाए.

घर में एक अदद अलार्म घड़ी थी. वही टाइम देखने के काम आती थी. उस घड़ी में पीछे कई चाभियाँ बनी थीं. एक चाभी तो उसमें चौबीस घंटे चलने की ताक़त भरती थी. दूसरी उसमें अलार्म सेट करने के लिए थी. तीसरी चाभी से सुइयों को आगे-पीछे करने का काम लिया जाता था. और चौथी चाभी, लगता है, बनानेवाले ने हम जैसों के लिए ही बनायी थी. वह घड़ी की सुइयों के चलने की गति को कम-ज़्यादा कर सकती थी. यही चाभी मेरी सिने-सफलता की कुंजी बनी. घर से ढाई बजे निकलते हुए घड़ी की सुई को तीन पर सेट किया जाता (ताकि नज़र रखनेवालों के लिए यह सनद रहे कि हम तीन बजने के बाद घर से निकले ही थे) और फिर चौथी चाभी की मदद से सुइयों की गति को इतना कम कर दिया जाता कि जब हम साढ़े छह बजे लौटें तो घड़ी छह बजा रही हो. इस तरह चार घंटे बाहर रहने पर घड़ी के हिसाब से हम तीन घंटे ही बाहर होते थे. इस तरक़ीब का इस्तेमाल कर मैंने कितनी ही फ़िल्में देखीं. अनुशासनप्रिय मां घड़ी पर निगाह रखती भी थीं या नहीं, पता नहीं, लेकिन यह सारा इंतज़ाम अपने संतोष के लिए था. अगर संतोष ही न हो तो दुनिया में फिर क्या है!

भागकर देखी हुई कई फ़िल्में एक से बढ़कर एक फालतू थीं, लेकिन आज सोचकर लगता है कि उनका सारा सुख असल में भागे हुए होने का सुख था—मुक्ति का सुख—डर जिसका स्थायी हमज़ाद था. दोनों साथ पैदा हुए थे. उस डर के बगैर यह सुख नहीं था और यह भोगनेवाले पर निर्भर था कि वह दोनों में से किसे अधिक अहमियत दे. मेरे ज़्यादातर लंगोटिया यार डर को ठेंगे पर रखते थे, उन्होंने गब्बर की बात मान ली थी कि‘जो डर गया समझो मर गया’, पर मैं कॉलेज के दिनों की शुरुआत होने से पहले तक डर और सुख के सी-सॉ में झूलता रहा. आज भी निषिद्ध सुखों को लेकर अपना यही चिरकुटाना रवैया है.

बहरहाल, इस तरह देखी हुई पहली फिल्म का नाम था, ‘चौकी नंबर 11’. विनोद मेहरा हीरो थे और फिल्म निहायत बण्डल थी. इसी तरह के नाम वाली एक और फिल्म थी, ‘कमरा नंबर 555’, जिसने मुझे सबसे अधिक धर्मसंकट में डाला. मैं फिल्म शुरू होने के 5-10 मिनट बाद हॉल में घुसा था. अँधेरे में अपनी सीट तलाशते हुए स्क्रीन पर हैट और ओवरकोट में अमजद खान दिखे थे जो किसी आदमी के कमरे में अन्दर तक घुसकर उससे पूछ रहे थे, ‘क्या मैं अन्दर आ सकता हूँ?’ यही देखते हुए मैं टटोलकर अपनी सीट पर बैठा था. स्क्रीन पर तस्वीरें बहुत साफ़ नहीं थीं. सब कुछ धुंधला-धुंधला-सा दिख रहा था. दसेक मिनट इसी तरह गुज़र गए तो मैंने बगल में बैठे सज्जन से पूछा कि इतना धुंधला-धुंधला, नीला-नीला-सा क्यों दिख रहा है? सज्जन ने फुसफुसाकर कहा, “ब्लू फिल्म है ना, नहीं जानते हैं? ऐसे ही दिखता है, ब्लू ब्लू टाइप.” मुझे काटो तो खून नहीं. भागकर फिल्म देखने का रोमांच तो चाहिए था, पर ब्लू फिल्म जैसी बदनाम चीज़ देखने के रोमांच के लिए मैं अभी तैयार नहीं था. उसके लिए तैयार होने में अभी कई साल बाक़ी थे.

भागकर देखी हुई ज़्यादातर फ़िल्में बण्डल क्यों होती थीं, इसके दो कारण समझ में आते हैं. एक तो साल में लगभग बारह फ़िल्में हम बाइजाज़त और बाइज्ज़त देख सकते थे. तो कायदे की फ़िल्में उसी खाते में निकल जाती थीं. दूसरे, रद्दी फिल्मों के साथ ही ऐसा संभव था कि उनमें टिकट-संग्राम के लिए बहुत सारा वक्त हाथ में लेकर चलने की ज़रूरत न हो. चर्चित फिल्मों का टिकट-संग्राम हमसे लगभग दो घंटे अधिक समय की मांग करता था और वह हमारे पास होता नहीं था. उस ज़माने के कुछ पटनहिया सिनेमा-घरों में फर्स्ट और सेकंड क्लास की टिकट खिड़कियों के आसपास का सरंजाम देखकर ही आप समझ जाते कि संग्राम कितना भीषण होता होगा! खिड़की तक पहुँचने के लिए उससे जुड़ा लगभग 40-50 मीटर लंबा सुरंगनुमा सीमेंटेड ढांचा बना होता था. इसमें इतनी ही जगह होती थी कि आदमी औसत से ज़्यादा लंबा हो तो किसी तरह सिर झुकाकर और औसत से ज़्यादा चौड़ा हो तो किसी तरह बदन सिकोड़ कर 50 मीटर की दूरी तय करे. अब आप सोचिये कि वे कैसे वीर बांकुड़े होते होंगे जो ऐसी सुरंग में भी लोगों के सिरों के ऊपर से गुज़र कर टिकट खिड़की तक पहले पहुँच जाते होंगे! सुरंग की खुरदुरी छत उनकी पीठ और पिछवाड़े का, और मां-बहन की गालियाँ उनकी आत्मा का कैसा हाल करती होंगी! लेकिन टिकट जैसी नायाब चीज़ इन सारे जख्मों का अचूक मरहम थी. वे जब टिकट लेकर सुरंग की दूसरी तरफ़ निकलते तो उन्हें देखकर कोई कह नहीं सकता था कि उनकी देह और आत्मा जख्मों से छलनी है.

टिकट-संग्राम को लेकर मेरा यह भी अनुभव रहा कि कई बार उनका सम्बन्ध ज़रूरत से नहीं, उसूल से होता था. उन्हीं दिनों एक बार मैं अपेक्षाकृत छोटे कस्बे कटिहार में फिल्म देखने पहुंचा. यह दसवीं के इम्तहान के ठीक बाद की बात है. मैं कटिहार के पास एक गाँव में बने प्राकृतिक चिकित्सालय में मां की तीमारदारी पर था. उन्हें दिन भर डाभ यानी कच्चे नारियल के पानी पर रखा जाता. वही खरीदने मुझे कटिहार जाना होता था. तो एक बार किसी अनजान प्रेरणा से मेरे पैर क़स्बे के एकमात्र सिनेमा घर की ओर मुड़ गए. देखा कि मनोज कुमार और हेमा मालिनी की कोई पांच-सात साल पुरानी फिल्म ‘दस नम्बरी’लगी है. अन्दर फिल्म से ठीक पहले चलनेवाली फिल्म प्रभाग की न्यूज़-रील शुरू हो चुकी थी और बाहर टिकट खिड़की पर मार मची हुई थी. यह टिकट खिड़की खुले में थी, किसी सुरंग के आख़िरी छोर पर नहीं. मैंने पाया कि महज़ पांच लोग खिड़की पर हैं और उनका घमासान ऐसा है कि पचास की भीड़ का वहम होता है. अगर वे क्यू में होते तो उनके निपटने में दो मिनट से ज़्यादा का वक्त न लगता. लेकिन यहां तो मामला उसूल का था. बिना घमासान किये टिकट ले कैसे लें! मैं मायूसी से इधर-उधर देखने लगा. तभी ‘टिकट-टिकट-टिकट’की दबी आवाज़ लगता एक ब्लैकियर पास से गुज़रा. मैंने पूछ लिया, ‘भाई, कितने का?’ पता चला, 2 रुपये 55 पैसे का टिकट महज 2 रुपये 65 पैसे में मिल रहा है. इतनी बड़ी सहूलियत के लिए सिर्फ़ 10 पैसे का सर्विस चार्ज! और वह भी कोई टिकट-संग्रामी उसे देने को राज़ी नहीं! इस प्रेरक घटना से मेरा यह विश्वास और दृढ हुआ कि टिकट-संग्राम ज़रूरत का नहीं, उसूल का मसला है. और यह भी कि शहर जितना छोटा होगा, लोग उसूल के उतने पक्के होंगे.

तो टिकट-संग्राम के लिए समय न होना एक बड़ी वजह थी कि भागकर देखी गयी सत्तर फ़ीसद फ़िल्में ऐसी निकलीं जिन्हें किसी भी दृष्टि से उल्लेखनीय नहीं कहा जा सकता. बावजूद इसके, भागकर देखने का लोभ कम नहीं हुआ. और ऐसा भी नहीं था कि भागकर देखने में अच्छी फिल्म की गुंजाइश बिल्कुल न हो. उस ज़माने में पुरानी फ़िल्में दुबारा, तिबारा, चौबारा भी रिलीज़ होती थीं. उसे स्थानीय अखबारों में छपे विज्ञापनों में ‘ग्रैंड गाला रिवाइवल’ कहा जाता था. उन फिल्मों में वैसी मार न पड़ती. मैंने ‘आवारा’, ‘श्री चार सौ बीस’, ‘मेला’, ‘कोहिनूर’, राज कपूर-नर्गिस वाली ‘चुपके-चुपके’, ‘तीसरी क़सम’, ‘वक्त’ जैसी फ़िल्में ग्रैंड रिवाइवल पर ही देखीं, अलबत्ता यह याद करना मुश्किल है कि इनमें से कौन-सी भगोड़े दौर में देखी थी और कौन-सी वह दौर बीतने के बाद.

हमारे भगोड़े दौर में एक नया आयाम तब जुड़ा जब मेरे कुछ लंगोटिया यारों ने हमारे मोहल्ले में बने सिनेमा-घर ‘वैशाली’ में हाफ टाइम से मुफ़्त फिल्म देखने का एक नायाब तरीक़ा ईजाद कर लिया (‘वैशाली’ पर लिखे गए एक संस्मरण में यह प्रसंग आ चुका है, बस दुहरा रहा हूँ). तरीक़ा यह था कि इंटरवल से ठीक पहले अगर हॉल की चारदीवारी के भीतर चले आओ तो इंटरवल में बाहर निकली हुई भीड़ के साथ अंदर जाकर बैठा जा सकता है और बाद की आधी फ़िल्म देखी जा सकती है. जानी दुश्मनका हाउसफुल दौर बीतने के बाद आइडिया पर अमल किया गया. क़ामयाबी मिली. उत्साहित होकर जानी दुश्मनके उत्तरार्द्ध को हमने सात-आठ दफ़ा देखा. इसके बाद तो सिलसिला ही चल पड़ा. इस कार्रवाई में सिर्फ़ दो-तीन चीज़ों का ख़याल रखना पड़ता था. एक तो यह कि मैटिनी शो के दौरान चार से सवा चार बजे के बीच हॉल की चारदीवारी के भीतर चले जाएं, क्योंकि इंटरवल से ठीक पहले मेन गेट बंद कर दिये जाते थे. दूसरा यह कि बालकनी में बैठें, क्योंकि उसके वर्गीय आधार के चलते वहां चेकिंग कम होती थी. तीसरे, एक बार में चार से ज़्यादा लोग न जाएं. ये सावधानियां बरतते हुए हम साल भर से ज़्यादा समय तक यह सिलसिला चला ले गये. उसके बाद, छोटी-सी इक भूल ने सारा गुलशन जला दिया. हुआ यों कि एक दिन हम तीन लोग बालकनी के सुख से ऊब कर फ़र्स्ट क्लास में बैठ गये और वह भी ऐसी क़तार में जहां हमारे अलावा और कोई नहीं था. राजेंद्र कुमार की कोई फ़िल्म थी जिसका नाम सदमे के कारण भूल गया हूं. जनाब अभी यात्रा से लौट कर नायिका को तस्वीरों से भरी अलबम दिखा ही रहे थे कि हमारे चेहरों पर टॉर्च की चुंधियाती रोशनी पड़ी. रोशनी ने टिकट की मांग की और हमने रोशनी से ही मुख़ातिब होकर कहा कि नहीं है. तीनों को बुक करो,’ रोशनी ने गरज कर कहा. फिर दो लोग हमें अर्द्धचंद्र यानी गर्दनिया देकर बाहर की ओर चले. क़तारों के बीच धकियाये जाते हुए मैंने विधाता को धन्यवाद दिया जिसने हॉल के भीतर अंधेरे का प्रावधान रखा है. साथ ही यह प्रार्थना भी की कि यह जो तकनीकी शब्दावली है—बुक करना—उसका कोई भयावह अर्थ न हो.

बाहर आये. पहलवान जी, अर्थात् मुख्य दरबान के सामने पेशी हुई. पहलवान ने क़द-काठी में सबसे बड़ा देख कर मुझी से पूछना शुरू किया.

अंदर कैसे आया?’
इंटरवल में.
कहां रहता है?’
राजेंद्र नगर, 1 नंबर.
कहां पढ़ता है?’
पाटलीपुत्रा.
किस क्लास में?’
नौवां नवीन.
सेक्शन?’
ए.
रौल नंबर?’
एक.

पहलवान हैरत से मुझे ऊपर-नीचे देखने लगा. पाटलिपुत्र उच्च विद्यालय में सेक्शन का रोल नंबर 1 होना मायने रखता था. उसका मतलब था, इस नामी स्कूल के एक पूरे बैच में अव्वल आने वाला विद्यार्थी. लिहाज़ा, पहलवान का स्वर थोड़ा बदल गया. जैसे किसी देवता को पतित होता देख रहा हो, इस अंदाज़ में उसने पूछा, ‘पाटलीपुत्रा में फस्ट आता है, और ई धंधा? क्लास-टीचर शमीम साहब हैं ना?’
जी.
बतला दें उनको?’
‘...’
जाओ, भागो. आगे से आया है त बड़ी मार मारेंगे. बड़ा आदमी बनना है कि हॉल का दरबानी करना है!

हम बुक न किये जाने का—उसका जो भी मतलब हो—शुक्र मनाते बाहर आए. फिर बेटिकट क्या, बाटिकट भी वैशाली में घुसने का साहस कम-से-कम मुझे अगले एक-डेढ़ साल तक नहीं हुआ.....
यह घटना, जैसा कि आप सुन चुके हैं, तब की है जब मैं नौवीं में था.  साल-डेढ़ साल बाद दसवीं पास करके कॉलेज में आ गया. हमारी पीढ़ी आज के बच्चों की तरह अभागी नहीं थी जिन्हें हमारी तुलना में दो साल बाद तक स्कूली बच्चे बने रहना पड़ता है. हमने ग्यारहवीं-बारहवीं की पढ़ाई कॉलेज में की. कॉलेज का मतलब था, भरपूर आज़ादी. पहली बार हमने जाना कि एक बार हाज़िरी लगाकर एक ही कमरे में बैठे नहीं रहना पड़ता. आप घूम-घूमकर क्लास करते हैं और यह आपकी सदिच्छा पर है कि एक क्लासरूम से निकलते हुए दूसरी में जाएँ या किसी और दिशा की ओर मुड़ जाएँ.

इस आज़ादी के साथ हमारा भगोड़ा दौर ख़त्म हुआ. ‘भागकर फिल्म देखने’ का कांसेप्ट गुज़रे ज़माने की चीज़ हो गया और एक आम मध्यवर्गीय सिनेमची किशोर की ज़िंदगी में एक नए अध्याय की शुरुआत हुई.


______________________
संजीव कुमार,  नवम्बर 1967, पटना

बहुत अलग-अलग तरह के मुद्दों पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कई निबंध-टिप्पणियां प्रकाशित.
एक आलोचना-पुस्तक जैनेन्द्र और अज्ञेय: सृजन का सैद्धांतिक नेपथ्यप्रकाशित, जिस पर 2011 का देवीशंकर अवस्थी सम्मान मिला;
2013 में प्रकाशित तीन सौ रामायणें एवं अन्य निबंध / ए.के.रामानुजन का आलेख: विवाद और विमर्शपुस्तक का संपादन
वसुधा डालमिया के साथ सह-संपादन में भारतेंदु द्वारा निकाली गई हिंदी की पहली स्त्री-पत्रिका बालाबोधिनीकी पूरी फ़ाइल एक ज़िल्द में शीघ्र प्रकाश्य;
सारिका’, ‘कथादेशऔर बनास जनमें कहानियां प्रकाशित; पिछले पांच सालों से जलेस केंद्र की पत्रिका नया पथके संपादन से संबद्ध.
संप्रति: दिल्ली विश्वविद्यालय के देशबंधु कालेज में अध्यापन.
मोबाइल ९८१८५७७८३३

sanjusanjeev67@gmail.com
Viewing all 1573 articles
Browse latest View live


<script src="https://jsc.adskeeper.com/r/s/rssing.com.1596347.js" async> </script>