विकासशील समाज अध्ययन पीठ (CSDS) के प्रोफ़ेसर, भारतीय भाषा कार्यक्रम के निदेशक और 'प्रतिमान'के प्रधान संपादक अभय कुमार दुबे को अक्सर टीवी चैनलों की बहसों में हम सुचिंतित हस्तक्षेप करते हुए देखते हैं.
हिंदी में सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर मौलिक स्तरीय लेखन की कमी तो है ही, अभय कुमार दुबे पिछले कई दशकों से इस क्षेत्र में लिख रहें हैं. ‘हिंदू-एकता बनाम ज्ञान की राजनीति’उनकी नवीनतम पुस्तक है जो वाणी से प्रकाशित हुई है. भारत की दक्षिणपंथी विचारधारा और राजनीति को समझने की यह हिंदी में एक महत्वपूर्ण कोशिश है जिसे इसके समीक्षक नरेश गोस्वामी के अनुसार यह किसी को ‘प्रछन्न प्रतिक्रियावाद या पराजय से उपजी आत्म-भर्त्सना भी लग सकती है.’
बहरहाल इस बहसतलब कृति की गम्भीर विवेचना यहाँ प्रस्तुत है.
हिंदू-एकता बनाम ज्ञान की राजनीति
प्रदत्त विमर्श से सवाल पूछने का साहस
नरेश गोस्वामी
अभय कुमार दुबे की यह किताब एक ऐसे वक़्त में आई है जब भारत की बाहरी और भीतरी पहचान के परिचित चिह्न हर दिन अपना अर्थ खोते जा रहे हैं. मसलन, आज स्वाधीनता-संघर्ष की प्रक्रिया में अर्जित समता, सहअस्तित्व, सहिष्णुता और बंधुत्व जैसे मूल्य हांफते नज़र आते हैं. राजनीति समाज के बृहत्तर कल्याण के आदर्श से स्खलित होकर चुनाव का पूर्व-प्रबंधित गणनशास्त्र बन चुकी है, और धर्म को राजनीति से दूर रखने का संकल्प असंदिग्ध रूप से भुलाया जा चुका है. सामाजिक न्याय का उदात्त आदर्श संबंधित राजनीतिज्ञों के भ्रष्ट आचरण, लूट-खसोट, संपत्ति-अर्जन, परिवार और कुनबापरस्ती के कारण धूल-धूसरित हो चुका है. अर्थव्यवस्था के सूचकांक औंधे पड़े हैं. मीडिया पुराने कंकालों पर रंग-रोगन करके उनसे इतिहास और समाज की व्याख्या करवा रहा है. जो गर्हित, अशुभ और त्याज्य था, वह राजनीति और समाज का नीति-निर्देशक बन बैठा है. हालत यह हो गयी है कि राजनीतिज्ञों और अपराधियों की भाषा में अंतर करना मुश्किल होता जा रहा है. लोकतंत्र बहुसंख्यकवाद का पर्याय बन गया है और सत्ता की नृशंस कारगुज़ारियों का न्यूनतम प्रतिरोध भी राष्ट्रद्रोह कहलाने लगा है.
ज़ाहिर है कि ऐसे असामान्य वक़्त और माहौल में लिखी गयी किताब पुरानी आश्वस्तियों और निष्कर्षों का भाष्य नहीं हो सकती. इसलिए, अभय कुमार दुबे की यह किताब बहुत से लोगों को प्रछन्न प्रतिक्रियावाद या पराजय से उपजी आत्म-भर्त्सना भी लग सकती है.
यह किताब भारत की राजनीति में पिछले दो दशकों के दौरान हुए अंत:स्फोट को हिंदुत्व बनाम सेकुलर-वामपंथी-उदारतावादी जैसे दो प्रतिस्पर्धी विमर्शों के ज़रिये समझने का प्रयत्न करती है. लेखक ने सेकुलर, वामपंथी और उदारतावादी शक्तियों के विमर्श को मध्यमार्गी विमर्श कहकर संबोधित किया है. किताब का बुनियादी तर्क साफ़ और ऊंचे स्वर में कहता है कि मध्यमार्गी विमर्श से निकली राजनीति लोकतंत्र में बहुसंख्यकवाद के अंदेशों को पढ़ने और उसका प्रतिरोध करने में नाकाम रही है. ज़ाहिर है कि यह अपने आप में कोई विलक्षण सूत्रीकरण नहीं है. दरअसल, किताब की विलक्षणता इस विफलता के कारणों की पड़ताल में लगे बौद्धिक श्रम— तथ्यान्वेषण, तर्क-योजना, समाज-वैज्ञानिक लेखन के सघन और आवश्यक ब्योरों, उद्धरणों के व्यापक उपयोग तथा आम सहमति के तहत वर्जित मान लिए गए परिप्रेक्ष्यों के पुनरीक्षण में निहित है.
लेखक का विश्लेषण बताता है कि संघ परिवार की वैचारिक प्रयोगशाला में हिंदू-एकता की व्यूह-रचना 1974 में तैयार हो चुकी थी. तीन दशक तक यह व्यूह-रचना व्यावहारिक राजनीति में अपना मुक़ाम ढूंढती रही. राज्यों के अलावा वह एकाधिक बार केंद्रीय सत्ता तक पहुंची, फिर उससे बाहर भी हुई लेकिन 2004 वह इस स्थिति में आ चुकी थी कि चुनाव में स्पष्ट पराजय के बावजूद उसे कांग्रेस से ज़्यादा हिंदू वोट मिले. कांग्रेस के दस वर्षीय शासन के दौरान संघ परिवार के कामकाज का अबाध गति से विस्तार होता रहा. केंद्र और कई राज्यों में ग़ैर-भाजपाई सरकारें बनीं लेकिन राजनीतिक विमर्श लगातार बहुसंख्यकवादी होता चला गया. लेखक का स्पष्ट कहना है कि ग़ैर-भाजपा दलों की राजनीति और उसके सहायक-समर्थक बुद्धिजीवियों का विमर्शी हस्तक्षेप इस बहुसंख्यकवाद का मुक़ाबला करने में विफल रहा.
इस तरह यह किताब संघ-भाजपा विरोधी विमर्श की प्रस्थापनागत सीमाओं और उसकी व्यावहारिक कमियों व विफलताओं का विश्लेषण करती है. लेखक अपने उद्यम को इस विमर्श की आंतरिक आलोचना के रूप में देखता है. लेकिन, ग़ौर से देखें तो लेखक ने एक तरह से इस मध्यमार्गी प्रतिरोधी विमर्श का तख़्ता पलट दिया है.
लेखक का तर्क है कि बहुसंख्यकवाद विरोधी विमर्श के ऊपर ज्ञान की एक ख़ास राजनीति हावी रही है, और इस राजनीति की सीमा केवल इस बात में निहित नहीं है कि वह संघ परिवार की हिंदुत्ववादी परियोजना के बदलते पते और विन्यास को समझने में अक्षम रही है, बल्कि उसका ज़्यादा संगीन दोष यह है कि उसने अपने ही उस हिस्से को मौन कर दिया है जो हिंदुत्व की प्रचलित समझ से हट कर कुछ अलग कहना चाहता है. इस प्रकार, हिंदुत्व की बहुसंख्यकवाद विरोधी राजनीति के मध्यमार्गी विमर्श को लेखक ने दो हिस्सों में विभाजित किया है. उसके अनुसार इसमें एक ही हिस्सा मुखर है, जबकि दूसरे हिस्से को राजनीतिक सहीपन (पॉलिटिकल करेक्टनेस) के दबाव में उपेक्षित कर दिया गया है. मुखर हिस्से के साथ दिक़्क़त ये है कि वह ‘अत्यधिक विचारधारात्मक होने के नाते तक़रीबन एक आस्था का रूप ले चुका है’, और मौन हिस्से का संकट यह है कि ‘समाज, संस्कृति और राजनीति की ज़मीन के कहीं अधिक निकट’ तथा ‘अधिक शोधपरक और तर्कसंगत समाज-वैज्ञानिकता से संपन्न’ होने के बावजूद उसे ताक पर रख दिया है.
राजनीतिक सहीपन से यहां लेखक का मंतव्य उस वर्चस्वी आग्रह से है जो अपने ‘अनुकूल न बैठने वाली या उसके लिए थोड़ी भी दिक़्क़ततलब प्रत्येक वैचारिक संरचना को अपनी तार्किकता, सुसंगति और तथ्यात्मकता के बावजूद या तो ख़ारिज’ कर देता है ‘या अगर ख़ारिज करना मुश्किल हो तो उसे एक चालाक ख़ामोशी के तहत पृष्ठभूमि में’ धकेल देता है.
लेखक की दलील है कि ज्ञान की राजनीति का यह मध्यमार्गी विमर्श छह प्रकार की विसंगतियों से ग्रस्त रहा है. एक तरह से कहा जाए तो यह पूरी किताब इस विमर्श में चिह्नित की गयी इन विसंगतियों की चतुर्दिक् विवेचना ही है. इसलिए किताब के बाक़ी पहलुओं पर बात करने से पहले इन विसंगतियों का जायज़ा लेना ज़रूरी होगा. लेखक के अनुसार मध्यमार्गी बहुसंख्यकवादी विमर्श की संरचना मुख्यत: छह ‘आस्थाओं’ पर टिकी है:
एक,भारत में हिंदू बहुसंख्यक हैं लेकिन यह एक जनसंख्यामूलक तथ्य भर है; भारतीय सभ्यता एक सामासिक सभ्यता है जिसे पूरी तरह हिंदू सभ्यता कहना ग़लत होगा;हिंदू भिन्न-भिन्न अस्मिताओं से मिल कर बने हैं, और उनके बीच इतने अंतर्विरोध एवं विरोधाभास मौजूद हैं कि उनमें किसी समरूप चेतना की निशानदेही नहीं की जा सकती. इस आस्था के संबंध में लेखक का तर्क यह है कि सेकुलर और उदारतावादी नज़रिये से किए गए अनुसंधानों से भी यह बात पुष्ट होती है कि समय की दीर्घावधि में हिंदुओं की विविध अस्मिताओं के बीच एकरूपता का प्रसार हुआ है, लेकिन बहुसंख्यकवाद विरोधी विमर्श ऐसे अनुसंधानों पर अघोषित मौन आरोपित कर देता है.
दो,भारतीय समाज बहुत से छोटे-बड़े समुदायों का समुच्चय है जिसे किसी भी तरह की समरूप और एकाश्म संरचना में नहीं ढाला जा सकता; भारत का यही बहुलतावाद हिंदुत्ववादी एकता में बाधा बनता रहा है, और उसकी यह भूमिका आगे भी जारी रहेगी. लेखक इस आस्था का प्रत्याख्यान करते हुए कहता है कि हिंदू या मुसलमानों की विशाल राजनीतिक एकताओं की संभावना का यह नकार बहुसंख्यकवाद के अंदेशों पर पर्दा डालने का काम करता है क्योंकि इससे बहुलतावाद के राजनीतिक और सामाजिक पहलू गड्डमड्ड हो जाते हैं. इसके चलते बहुसंख्यकवाद के आलोचक यह देखना भूल जाते हैं कि सामाजिक बहुलतावाद को उसकी जगह जस का तस छोड़ कर उस पर राजनीतिक एकरूपता बख़ूबी क़ायम की जा सकती है.
तीन, भारतीय सेकुलरवाद की पहली जि़म्मेदारी अल्पसंख्यकों के अधिकारों और दूसरा दायित्व यहां के बहुलतावाद की रक्षा करना है. लेखक इस आस्था का खण्डन करते हुए यह तजवीज़ करता है कि यह स्वीकार करते ही हमारा सेकुलरवाद अल्पसंख्यकों के अधिकारों और बहुलतावाद का पर्याय बन जाता है, और इसका परिणाम यह होता है कि बहुसंख्यकवाद के आलोचक अल्पसंख्यक समुदायों, विशेष रूप से मुस्लिम समुदायों की विकृतियों पर सवाल करना छोड़ देते हैं. इस प्रवृत्ति का फ़ायदा हिंदुत्ववादी राजनीति को मिलता है. लेखक के अनुसार यह आस्था इसलिए भी अनिष्टकारी हो जाती है क्योंकि वह संविधान में उल्लिखित सर्वधर्मसमभाव को भारतीय सेकुलरवाद की अंतिम परिभाषा मान बैठती है, जबकि उसका अभिप्रेत यह है कि राज्य धर्म की बहुलताओं से फ़ासला बनाकर रखे. लेकिन धीरे-धीरे हुआ यह कि भारतीय सेकुलरवाद बहुलताओं का पर्याय बनता गया है. लेखक की दलील है कि सेकलुरवाद का यह अर्थ-संकुचन मुसलमान, सिख और ईसाई जैसे समुदायों को लोकतांत्रिक व्यवस्था की एकाश्म इकाइयों में बदलकर पूरे लोकतंत्र को ही ‘समुदायों के लोकतंत्र’ में तब्दील कर देता है. अंतत: इस सोच की व्यावहारिक निष्पत्ति ‘सेकुलरवाद और साम्प्रदायिकता की समुदायगत परिभाषा’ में निकलती है, और यहीं से वह भ्रामक नज़रिया प्रबल होने लगता है जिसके तहत कुछ समुदायों को सेकुलरवाद का और कुछ को साम्प्रदायिकता का वाहक घोषित कर दिया जाता है.
एक,भारत में हिंदू बहुसंख्यक हैं लेकिन यह एक जनसंख्यामूलक तथ्य भर है; भारतीय सभ्यता एक सामासिक सभ्यता है जिसे पूरी तरह हिंदू सभ्यता कहना ग़लत होगा;हिंदू भिन्न-भिन्न अस्मिताओं से मिल कर बने हैं, और उनके बीच इतने अंतर्विरोध एवं विरोधाभास मौजूद हैं कि उनमें किसी समरूप चेतना की निशानदेही नहीं की जा सकती. इस आस्था के संबंध में लेखक का तर्क यह है कि सेकुलर और उदारतावादी नज़रिये से किए गए अनुसंधानों से भी यह बात पुष्ट होती है कि समय की दीर्घावधि में हिंदुओं की विविध अस्मिताओं के बीच एकरूपता का प्रसार हुआ है, लेकिन बहुसंख्यकवाद विरोधी विमर्श ऐसे अनुसंधानों पर अघोषित मौन आरोपित कर देता है.
दो,भारतीय समाज बहुत से छोटे-बड़े समुदायों का समुच्चय है जिसे किसी भी तरह की समरूप और एकाश्म संरचना में नहीं ढाला जा सकता; भारत का यही बहुलतावाद हिंदुत्ववादी एकता में बाधा बनता रहा है, और उसकी यह भूमिका आगे भी जारी रहेगी. लेखक इस आस्था का प्रत्याख्यान करते हुए कहता है कि हिंदू या मुसलमानों की विशाल राजनीतिक एकताओं की संभावना का यह नकार बहुसंख्यकवाद के अंदेशों पर पर्दा डालने का काम करता है क्योंकि इससे बहुलतावाद के राजनीतिक और सामाजिक पहलू गड्डमड्ड हो जाते हैं. इसके चलते बहुसंख्यकवाद के आलोचक यह देखना भूल जाते हैं कि सामाजिक बहुलतावाद को उसकी जगह जस का तस छोड़ कर उस पर राजनीतिक एकरूपता बख़ूबी क़ायम की जा सकती है.
तीन, भारतीय सेकुलरवाद की पहली जि़म्मेदारी अल्पसंख्यकों के अधिकारों और दूसरा दायित्व यहां के बहुलतावाद की रक्षा करना है. लेखक इस आस्था का खण्डन करते हुए यह तजवीज़ करता है कि यह स्वीकार करते ही हमारा सेकुलरवाद अल्पसंख्यकों के अधिकारों और बहुलतावाद का पर्याय बन जाता है, और इसका परिणाम यह होता है कि बहुसंख्यकवाद के आलोचक अल्पसंख्यक समुदायों, विशेष रूप से मुस्लिम समुदायों की विकृतियों पर सवाल करना छोड़ देते हैं. इस प्रवृत्ति का फ़ायदा हिंदुत्ववादी राजनीति को मिलता है. लेखक के अनुसार यह आस्था इसलिए भी अनिष्टकारी हो जाती है क्योंकि वह संविधान में उल्लिखित सर्वधर्मसमभाव को भारतीय सेकुलरवाद की अंतिम परिभाषा मान बैठती है, जबकि उसका अभिप्रेत यह है कि राज्य धर्म की बहुलताओं से फ़ासला बनाकर रखे. लेकिन धीरे-धीरे हुआ यह कि भारतीय सेकुलरवाद बहुलताओं का पर्याय बनता गया है. लेखक की दलील है कि सेकलुरवाद का यह अर्थ-संकुचन मुसलमान, सिख और ईसाई जैसे समुदायों को लोकतांत्रिक व्यवस्था की एकाश्म इकाइयों में बदलकर पूरे लोकतंत्र को ही ‘समुदायों के लोकतंत्र’ में तब्दील कर देता है. अंतत: इस सोच की व्यावहारिक निष्पत्ति ‘सेकुलरवाद और साम्प्रदायिकता की समुदायगत परिभाषा’ में निकलती है, और यहीं से वह भ्रामक नज़रिया प्रबल होने लगता है जिसके तहत कुछ समुदायों को सेकुलरवाद का और कुछ को साम्प्रदायिकता का वाहक घोषित कर दिया जाता है.
मसलन, पिछले तीन दशकों में जिन द्विज समुदायों ने भाजपा को वोट दिया है उन्हें साम्प्रदायिकता का वाहक, जबकि पिछड़े और दलित समुदायों को सेकुलरवाद का पैरोकार मान लिया गया है. लेखक का कहना है कि यह एक विकट घालमेल है क्योंकि बहुलतावाद समुदायों और सांस्कृतिक विविधताओं की ओर इंगित करता है, जबकि एक सिद्धांत के रूप में सेकुलरवाद राज्य की समुदायों और धर्मों के प्रति तटस्थता की बात करता है. इस घालमेल के कारण एक ओर तो मध्यमार्गी विमर्श धर्म के मामले में राज्य की दृढ़ तटस्थता की हिमायत नहीं कर पाता और दूसरे, उसे हिंदुत्ववादियों की तरफ़ से अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण का आरोप झेलना पड़ता है.
चार, मध्यमार्गी विमर्श इस धारणा का शिकार हो गया है कि पारंपरिक रूप से उपेक्षित, वंचित, शोषित और दमित जातियां ब्राह्मणवाद के विरुद्ध एक क्रांतिकारी संघर्ष में जुटी हैं. इस धारणा के तहत हिंदू और द्विज होने को एक दूसरे का पर्याय मान लिया गया है. इसका असर यहां तक जाता है कि ‘जैसे शूद्र (पिछड़ी) जातियां चातुर्वर्ण्य का हिस्सा न होकर तीन सर्वण जातियों के मुका़बले अवर्ण समाज का अंग हों’. ब्राह्मणवाद के विरुद्ध कथित तौर पर सन्नद्ध इन जातियों का विमर्श कुछ ऐसा दावा करना चाहता है कि कमज़ोर जातियां (विशेषकर पूर्व-अछूत अनुसूचित जातियां) हिंदू पहचान से बाहर जाने को बैठी हैं. इस धारणा के पैरोकारों को लगता है कि इससे निकलने वाली राजनीति हिंदुत्व के प्रभाव और उसकी रणनीति को बेअसर करने की क्षमता रखती है. लेखक के अनुसार ‘दुष्ट ब्राह्मणवाद’ का यह विचार हिंदुत्व के आलोचकों के बीच इतना प्रभावशाली है कि वे इस धारणा को हिंदू समुदाय की विभिन्न जातियों के बीच बन सकने वाली राजनीतिक एकता पर ही विचार करने की ज़हमत ही नहीं उठाना चाहते, जबकि इसके उलट वे हिंदू बहुसंख्यकवाद के खि़लाफ़ वंचित, कमज़ोर जातियों तथा अल्पसंख्यकों की एक विशाल बहुजन एकता की कल्पना कर डालते हैं.
इस सिलसिले में पांचवीधारणा भारतीय उदारतावाद से वास्ता रखती है. इस उदारतावाद के सिद्धांतकार यह मान कर चलते हैं कि भारत में लोकतंत्र का एक ऐसा संवैधानिक चुनावी तंत्र विकसित हो चुका है जिसमें किसी भी दल को राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए अपना अतिवाद छोड़ना पड़ता है. इस संबंध में बहुधा विभिन्न कम्युनिस्ट दलों और बहुजन समाज पार्टी का उदाहरण दिया जाता है. इसलिए उदारतावाद के सिद्धांतकारों को लगता है कि अंतत: हिंदू राष्ट्रवाद की उग्रता भी इसी तरह ख़त्म हो जाएगी. लेकिन, लेखक का तर्क है कि इस धारणा और भारतीय बहुलतावाद का योगफल भारत में दिनोंदिन मज़बूत होते जाते बहुसंख्यकवाद को परास्त नहीं कर सकता. उसका कहना है कि पिछले पैंतीस सालों से केवल संघ परिवार ही नहीं, बल्कि लगभग सभी राजनीतिक दल अपनी-अपनी तरह से बहुसंख्यकवादी राजनीति कर रहे हैं, और हमारा चुनावी लोकतंत्र इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने का कोई तरीक़ा विकसित नहीं कर पाया है. इस धारणा का एक बेहद नकारात्मक प्रभाव यह हुआ है कि बहुसंख्यकवाद के अधिकांश आलोचक भाजपा की चुनावी हार के बाद निष्क्रिय हो जाते हैं. उन्हें यह तक ध्यान नहीं रहता कि हिंदुत्ववादी विकृतियां ग़ैर-भाजपाई सरकारों के शासन में बदस्तूर फलती-फूलती रहती हैं.
मध्यमार्गी विमर्श की छठीभ्रांत धारणा के रूप में लेखक ने वामपंथी, सेकुलर तथा उदारतावादी बौद्धिकता के उन्नासिक रवैये को चिह्न्ति किया है. लेखक के अनुसार यह रवैया हिंदुत्ववादियों—ख़ास तौर पर संघ परिवार की बौद्धिकता को हीन और विचार करने लायक़ ही नहीं मानता. उसे धर्म से प्रभावित कोई भी राजनीतिक-सामाजिक कार्रवाई या उद्यम अकल्पनीय और अवांछनीय लगता है. वह नये समाज की रचना को मूलत: ग़ैर-धार्मिक— प्रगतिशील, आधुनिक, उदारतावादी, सेकुलर और समतामूलक परिप्रेक्ष्य में ही कल्पित करता है. लेखक के अनुसार ‘यह मान्यता इतनी प्रभावशाली है कि इसके तहत ऐसी कोई भी बौद्धिकता भारतीय समाज के लिए बेकार मान ली गयी है जो किसी धर्म के मूल्यों के प्रभुत्व में उदारता, सेकुलरवाद और समता के विचार का उपकरण के तौर पर इस्तेमाल करती हो’.
चार, मध्यमार्गी विमर्श इस धारणा का शिकार हो गया है कि पारंपरिक रूप से उपेक्षित, वंचित, शोषित और दमित जातियां ब्राह्मणवाद के विरुद्ध एक क्रांतिकारी संघर्ष में जुटी हैं. इस धारणा के तहत हिंदू और द्विज होने को एक दूसरे का पर्याय मान लिया गया है. इसका असर यहां तक जाता है कि ‘जैसे शूद्र (पिछड़ी) जातियां चातुर्वर्ण्य का हिस्सा न होकर तीन सर्वण जातियों के मुका़बले अवर्ण समाज का अंग हों’. ब्राह्मणवाद के विरुद्ध कथित तौर पर सन्नद्ध इन जातियों का विमर्श कुछ ऐसा दावा करना चाहता है कि कमज़ोर जातियां (विशेषकर पूर्व-अछूत अनुसूचित जातियां) हिंदू पहचान से बाहर जाने को बैठी हैं. इस धारणा के पैरोकारों को लगता है कि इससे निकलने वाली राजनीति हिंदुत्व के प्रभाव और उसकी रणनीति को बेअसर करने की क्षमता रखती है. लेखक के अनुसार ‘दुष्ट ब्राह्मणवाद’ का यह विचार हिंदुत्व के आलोचकों के बीच इतना प्रभावशाली है कि वे इस धारणा को हिंदू समुदाय की विभिन्न जातियों के बीच बन सकने वाली राजनीतिक एकता पर ही विचार करने की ज़हमत ही नहीं उठाना चाहते, जबकि इसके उलट वे हिंदू बहुसंख्यकवाद के खि़लाफ़ वंचित, कमज़ोर जातियों तथा अल्पसंख्यकों की एक विशाल बहुजन एकता की कल्पना कर डालते हैं.
इस सिलसिले में पांचवीधारणा भारतीय उदारतावाद से वास्ता रखती है. इस उदारतावाद के सिद्धांतकार यह मान कर चलते हैं कि भारत में लोकतंत्र का एक ऐसा संवैधानिक चुनावी तंत्र विकसित हो चुका है जिसमें किसी भी दल को राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए अपना अतिवाद छोड़ना पड़ता है. इस संबंध में बहुधा विभिन्न कम्युनिस्ट दलों और बहुजन समाज पार्टी का उदाहरण दिया जाता है. इसलिए उदारतावाद के सिद्धांतकारों को लगता है कि अंतत: हिंदू राष्ट्रवाद की उग्रता भी इसी तरह ख़त्म हो जाएगी. लेकिन, लेखक का तर्क है कि इस धारणा और भारतीय बहुलतावाद का योगफल भारत में दिनोंदिन मज़बूत होते जाते बहुसंख्यकवाद को परास्त नहीं कर सकता. उसका कहना है कि पिछले पैंतीस सालों से केवल संघ परिवार ही नहीं, बल्कि लगभग सभी राजनीतिक दल अपनी-अपनी तरह से बहुसंख्यकवादी राजनीति कर रहे हैं, और हमारा चुनावी लोकतंत्र इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने का कोई तरीक़ा विकसित नहीं कर पाया है. इस धारणा का एक बेहद नकारात्मक प्रभाव यह हुआ है कि बहुसंख्यकवाद के अधिकांश आलोचक भाजपा की चुनावी हार के बाद निष्क्रिय हो जाते हैं. उन्हें यह तक ध्यान नहीं रहता कि हिंदुत्ववादी विकृतियां ग़ैर-भाजपाई सरकारों के शासन में बदस्तूर फलती-फूलती रहती हैं.
मध्यमार्गी विमर्श की छठीभ्रांत धारणा के रूप में लेखक ने वामपंथी, सेकुलर तथा उदारतावादी बौद्धिकता के उन्नासिक रवैये को चिह्न्ति किया है. लेखक के अनुसार यह रवैया हिंदुत्ववादियों—ख़ास तौर पर संघ परिवार की बौद्धिकता को हीन और विचार करने लायक़ ही नहीं मानता. उसे धर्म से प्रभावित कोई भी राजनीतिक-सामाजिक कार्रवाई या उद्यम अकल्पनीय और अवांछनीय लगता है. वह नये समाज की रचना को मूलत: ग़ैर-धार्मिक— प्रगतिशील, आधुनिक, उदारतावादी, सेकुलर और समतामूलक परिप्रेक्ष्य में ही कल्पित करता है. लेखक के अनुसार ‘यह मान्यता इतनी प्रभावशाली है कि इसके तहत ऐसी कोई भी बौद्धिकता भारतीय समाज के लिए बेकार मान ली गयी है जो किसी धर्म के मूल्यों के प्रभुत्व में उदारता, सेकुलरवाद और समता के विचार का उपकरण के तौर पर इस्तेमाल करती हो’.
इस धारणा का परिणाम यह हुआ कि बहुसंख्यकवाद विरोधी विमर्श के मुखर पक्ष ने कभी हिंदू एकता के संघ-पूर्व विमर्श— दयानंद और विवेकानंद आदि के चिंतन से उद्भूत सामाजिक-वैचारिक सूत्रों पर ध्यान नहीं दिया. वह यह नहीं देख सका कि ये चिंतक धर्म और उसके सामाजिक ढांचे को अक्षुण्ण रखते हुए सामाजिक व्यवस्था और उसकी संस्थाओं में संशोधन की ज़मीन तैयार कर रहे थे. इस धारणा के अंतर्सूत्रों की एक दूसरी और ज़्यादा सामयिक समस्या की ओर इशारा करते हुए लेखक बिजली की कौंध सरीखी दलील पेश करता है कि मध्यमार्गी विमर्श के मुखर सिद्धातकारों का संघ परिवार की राजनीति का विश्लेषण सातवें दशक से आगे नहीं देख पाता. लेखक ने बेधक ढंग से कहा है कि इन सिद्धांतकारों को हिंदुत्व के उन सामाजिक-राजनीतिक सूत्रीकरणों की कोई ख़ास ख़बर नहीं है जो उसने सातवें दशक के बाद तैयार किए हैं.
(II)
जैसा कि हमने शुरू में इंगित किया था, लेखक का मानना है कि मध्यमार्गी विमर्श के इस आधिकारिक संस्करण ने अपने समांतर चलने वाले एक ज़्यादा ज़मीनी और यथार्थ-सजग हिस्से को हमेशा चर्चा से बाहर रखा है, जबकि हिंदू बहुसंख्यकवाद के उभार के संदर्भ में यह हिस्सा समाज और राजनीति के नये विन्यास की ओर इशारा करता है. लेकिन इस संबंध में यह सूत्र ओझल नहीं होना चाहिए कि मध्यमार्गी विमर्श का यह मौन पक्ष उसके मुखर पक्ष का विलोम नहीं है. यह पक्ष भारतीय राजनीति, समाज, संस्कृति और इतिहास की ज्वलंत बहसों को अलग नज़रिये से देखता रहा है.
मसलन, यह नज़रिया बताता है कि जिस मनुवादी व्यवस्था को मध्यमार्गी विमर्श हिंदुत्व की केंद्रीय परियोजना मानता है, उसे सरसंघचालक बालासाहब देवरस ने 1974 में यह कहते हुए ख़ारिज कर दिया था कि ‘जन्मत: वर्ण-व्यवस्था अथवा जाति-व्यवस्था का भाव समाप्त हो गया, ढांचा रह गया... अत: सभी को मिल कर सोचना चाहिए कि जिसका समाप्त होना उचित है, जो स्वयं ही समाप्त हो रहा है, वह ठीक ढंग से कैसे समाप्त हो’.इससे यह भी पता चलता है कि संघ हिंदू समाज में बिना कोई रैडिकल बदलाव किए व्यापक एकता की सफल योजनाएं बनाता रहा है. इससे स्पष्ट होता है कि मध्यमार्गी विमर्श का मुखर पक्ष हिंदू धर्म के उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में उभरते ग्रहणशील, समावेशी और सहिष्णु पाठ के साथ न केवल रचनात्मक संवाद करने से बचता रहा, बल्कि उसने इसे एक प्राच्यवादी निर्मिति घोषित करके ब्राह्मणवाद की लांछित श्रेणी में डाल दिया. इसका परिणाम यह हुआ वह केवल हिंदू राष्ट्रवादियों के इस्तेमाल की चीज़ बन कर रह गया.
दूसरे, वह उन अलक्षित रह जाने वाली प्रक्रियाओं और घटना-क्रमों की ओर इंगित करता है जिनके चलते यह हिंदू पहचान उत्तरोत्तर मजबूत होती गई है. इस संबंध में औपनिवेशिक जनगणना, प्रतिनिधित्वमूलक राजनीति तथा आज़ादी के बाद संस्थापित किए गए क़ानूनों का उल्लेख किया जा सकता है. क्रमश: बात करें तो औपनिवेशिक सत्ता द्वारा जनगणना के निर्णय ने हिंदू समुदाय के ढीले-ढाले आत्म-बोध को समरूपीकरण की दिशा में प्रवृत्त कर दिया. चूंकि औपनिवेशिक शासन प्राच्यवाद द्वारा थमाए गए निष्कर्षों की रोशनी में काम कर रहा था. इसलिए वह जनगणना के आंकड़ों को हिंदू धर्म की चातुर्वण्य-व्यवस्था में फि़ट करना चाहता था. जनगणना अधिकारियों को इस मिशन में लंबे समय तक सफलता नहीं मिली क्योंकि ज़्यादातार लोगों को अपने वर्ण के बारे में स्पष्ट जानकारी ही नहीं थी. लेकिन, एक बार जब यह तय हो गया कि जातियों और समुदायों को एक निश्चित पदानुक्रम में रखा जाएगा तो लोगों में सामाजिक हैसियत का सवाल महत्वपूर्ण हो गया. यादव और कुर्मी जैसी किसान जातियां क्षत्रिय वर्ण की दावेदारी करने लगीं. आगे चलकर जब औपनिवेशिक सत्ता ने प्रतिनिधित्व के सिद्धांत के अंतर्गत भारत के लोगों को सरकार के ढांचे में शामिल करने का निर्णय लिया तो उसने हिंदू समुदाय को प्रकारांतर से यह भी जतला दिया कि उसकी राजनीति मुसलमानों की राजनीति से केवल अलग ही नहीं, बल्कि उनकी प्रातिनिधिक राजनीति के साथ उसका छत्तीस का संबंध है. हिंदू समुदाय के समरूपीकरण की प्रक्रिया में यह एक अहम मुक़ाम था.
समरूपीकरण में बहुसंख्यकवाद का अंदेशा अंतर्निहित होता है. यहां इस तथ्य का उल्लेख ज़रूरी है कि हिंदू बहुमत के आग्रह को मज़बूत करने में उत्तर-औपनिवेशिक क़ानूनों की स्पष्ट भूमिका रही है. यानी दूसरे शब्दों में कहें तो बहुंख्यकवाद का नाभिक तैयार करने में हमारे उदारतावादी लोकतंत्र का भी अदृश्य हाथ रहा है. लेखक समाजशास्त्री दीपांकर गुप्ता के हवाले से बताते हैं कि हिंदू ‘बहुमत’ आज़ादी के बाद बने क़ानूनों की देन है. इनके पहले विवाह, उत्तराधिकार और अभिभावकत्व के नियमों में एकरूपता नहीं थी. अगर एक स्थान और समुदाय में उत्तराधिकार के नियम मिताक्षरा प्रणाली के तहत आते थे तो दूसरे स्थान और समुदाय में दायभाग के नियम चलते थे. लेकिन नये क़ानूनों ने विभिन्न रीति-नीतियों पर पाटा फेरकर उन्हें एकरूप बना दिया.
इस क्रम में लेखक ने रत्ना कपूर के विश्लेषण को उद्धृत करते हुए दिखाया है उच्च न्यायालयों सहित सर्वोच्च न्यायालय भी हिंदू धर्म को एक समरूप और शास्त्रोक्त संहिता के तौर पर परिभाषित करता रहा है. अयोध्या विवाद तक आते-आते तो यह प्रक्रिया इतनी सहज मान ली गयी थी कि सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक फ़ैसले में ‘हिंदुत्व‘ और ‘हिंदू धर्म’ को एक दूसरे का समानार्थी ही ठहरा दिया. ग़ौरतलब है कि अयोध्या मामले में न्यायालय ने हिंदुत्ववादी पक्ष का यह तर्क स्वीकार कर लिया था कि हिंदुओं की धार्मिक स्वतंत्रता सिर्फ़ उपासना की व्यक्तिगत स्वतंत्रता तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें किसी स्थान पर सामूहिक रूप से पूजा करने का अधिकार भी शामिल है. आज जब हम इन घटनाओं पर पलट कर देखते हैं तो हैरानी होती है कि यह सब खुले तौर पर हो रहा था, लेकिन मध्यमार्गी विमर्श का मुखर हिस्सा इस प्रवृत्ति से वाकिफ़ होने के बावजूद उसे न अपनी प्रतिरोधी दलीलों में शामिल कर पाया, और न ही उसका प्रतिवाद करने की नीति बना पाया.
मध्यमार्गी विमर्श का मौन पक्ष यह खुलासा करता है कि रजनी कोठारी जैसे विद्वानों ने हिंदू बहुसंख्यकवाद की आहट आज से तीन दशक पहले ही सुन ली थी. 1985 में प्रकाशित अपने एक लेख में उन्होंने यह बात साफ़ तौर पर दर्ज की थी कि हमारी राजनीति एक चुनावी खेल में अवमूल्यित कर दी गयी है और इस प्रवृत्ति ने लोकतंत्र को साम्प्रदायिक बहुसंख्यकवाद में बदल दिया है. इस लेख में उन्होंने उन विकृतियों— राज्य और नागरिक समाज के बीच मौजूद मध्यवर्ती व राजकीय संस्थाओं की अनदेखी करके सीधे जनता से अपील करने, सर्वोच्च नेता पर ज़ोर देने, राजनीतिक प्रक्रियाओं और संहिताओं के बजाय चुनावी विजय को सर्वोपरि समझने तथा राजनीतिक दलों को व्यापक सामाजिक-आर्थिक बदलाव का साधन न मानकर सत्ता तक पहुंचने का औज़ार मान लेने की मानसिकता का विस्तृत विश्लेषण किया था. कोठारी ने यह भी कहा था कि चुनावों को संख्या के खेल में अपघटित करने के परिणाम फ़ौरन प्रकट नहीं हुए क्योंकि उन्हें जाति और क्षेत्र के मुहावरे में पेश किया जाता रहा. सूत्र रूप में कहा जाए तो कोठारी इस नतीजे तक पहुंच गए थे कि चुनाव आधारित राजनीति में बहुसंख्यकवाद एक एक दुर्दम परिघटना बन चुकी है जिस पर न भारतीय समाज की बहुलताओं का वश चलता है, न लोकतंत्र का. ग़ौरतलब है कि यह वह दौर था जब कांग्रेस अपनी सत्ता के शीर्ष पर थी. उसे अभूतपूर्व बहुमत मिला था. लेकिन इसी समय हिंदूवादी संगठन भी अपनी सुप्तावस्था से बाहर आ रहे थे.
लेकिन यह विचित्र है कि नवें दशक में जब पिछड़ी और दलित जातियों ने पहली बार स्वतंत्र रूप सत्ता की दावेदारी की तो कोठारी ने इस राजनीतिक गोलबंदी को भारतीय लोकतंत्र की सकारात्मक ऊर्जा के रूप में चिह्नित किया. यह एक ऐसा विमर्श था जो द्विज जातियों को साम्प्रदायिक और कमज़ोर जातियों को धर्मनिरपेक्षता का वाहक घोषित कर रहा था. लेखक के अनुसार मध्यमार्गी विमर्श के मुखर हिस्से की बुनियादी ख़ामी यह थी कि उसने बिना जांच-पड़ताल किए ही यह मान लिया कि दलित-पिछड़ी जातियों का गठजोड़ हिंदू बहुसंख्यकता के आग्रहों को स्वयं ही परास्त कर देगा, जबकि आज यह बात पूरी तरह साफ़ हो चुकी है कि दलित और पिछड़ी जातियों की यह गोलबंदी पूरे दलित या पिछड़े समुदायों की गोलबंदी न होकर दलितों और पिछड़ों के सबसे प्रभावीशाली जाति-समूहों की गोलबंदी थी. जब ये जाति-समूह सत्तारूढ़ हुए तो उन्होंने संख्यात्मक तथा आर्थिक-सामाजिक स्थिति के हिसाब से कमतर माने जानेवाले अन्य जाति-समूहों को हाशिये पर ठेल दिया.
वंचित समुदायों के दूरगामी सशक्तीकरण और उनकी मुक्ति की संभावनाओं से लैस सामाजिक न्याय जैसी अवधारणा का जैसा अवमूल्यन इस राजनीतिक नेतृत्व ने गठजोड़ के तौर पर या स्वतंत्र रूप से किया है, वह पिछले तीन दशकों की राजनीति का बेहद स्याह पक्ष है. इस नेतृत्व से उम्मीद की जाती थी कि वह ‘राजनीति की नयी भाषा’ गढ़ेगा और ‘नयी संस्थागत राजनीति की गुंजाइश’ खोलेगा, लेकिन अपने भ्रष्टाचार और सिद्धांतहीनता के कारण सामाजिक न्याय की पूरी राजनीति दो हिस्सों में बंट कर रह गयी, जिनमें एक ताक़तवर हिस्सा मुसलमान वोटरों को साथ लेकर सेकुलर राजनीति का स्वांग करता रहा, जबकि दूसरा हिस्सा राजनीतिक प्रतिनिधित्व और आर्थिक अवसरों, दोनों से वंचित रह गया. ज़ाहिर है कि मध्यमार्गी विमर्श के मुखर हिस्से पर यह आरोप ग़लत नहीं है कि उसने इस विपर्यय पर उसी समय उंगली नहीं रखी.
इस प्रसंग में यह भी रेखांकित करना ज़रूरी है कि सामाजिक न्याय की राजनीति का द्विभाजन जाति के स्तर पर भी जारी रहा. सामाजिक न्याय का दलित घटक अपने इस सिद्धांत को इच्छा की तरह देखता रहा कि पिछड़े वर्गों को भी उसकी मुहिम में शामिल हो जाना चाहिए, जबकि सच्चाई यह है कि पिछड़े समुदायों की ताक़तवर जातियों को दलित राजनीति से जुड़ने में कोई दिलचस्पी नहीं थी.
विमर्श का मौन पक्ष इस तथ्य पर ज़ोर देता है कि जिस तरह मुखर पक्ष ने दलितों और पिछड़े वर्गों के अंदरूनी विभाजनों को देखने से इंकार किया, उसी तरह मुस्लिम समाज में व्याप्त ऊंच-नीच का भी यथातथ्य विश्लेषण नहीं किया. वह मुस्लिम समाज की निचली जातियों के राजनीतिक सशक्तीकरण की मुहिम— पसमांदा आंदोलन की दूर-दूर से तारीफ़ करता रहा लेकिन उसने कभी इस आंदोलन के ज़रिये मुस्लिम समाज की ज़मीनी आलोचना विकसित करने की कोशिश नहीं की.
मौन विमर्श का विश्लेषण करते हुए लेखक ने भारतीय राजनीति की एक अत्यंत विवादास्पद अवधारणा— सेकुलरवाद के व्यावहारिक फलितार्थों की शिनाख़्त की है. इस संबंध में उन्होंने हमारे समय के दो प्रखर राजनीतिक विचारकों— धीरूभाई शेठ और राजीव भार्गव के हालिया कृतित्व को उद्धृत किया है.
उल्लेखनीय है कि धीरूभाई शेठ कभी भी मध्यमार्गी विमर्श के औपचारिक पैरोकार नहीं रहे हैं. भारतीय राजनीति में बहुसंख्यकवाद के अंदेशों, अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों, लोकतंत्र में समुदायगत पहचान तथा व्यक्ति की स्वतंत्रता के टकराव तथा सेकुलरवाद और बहुलतावाद के घालमेल को वे अलग नज़रिये से देखते रहे हैं.
हिंदुत्ववादी राजनीति की उग्रता और उसकी बढ़ती स्वीकार्यता को धीरूभाई सेकुलर विमर्श की संकीर्णता का परिणाम मानते हैं. उनके मुताबिक़ पिछले तीन दशकों के दौरान सेकुलर विमर्श एक चुनावी गतिविधि बन कर रह गया. उसने हिंदुत्व के विरोध और अल्पसंख्यकों के समर्थन में जो भी व्यहू-रचना तैयार की, वह प्रति-साम्प्रदायिक पदावली में सिमट कर रह गयी. यह प्रति-विमर्श भाजपा को जब तब चुनावों में तो हराता रहा पर वह उस राष्ट्रीय-सेकुलर स्पेस में वापसी नहीं कर पाया जहां हिंदू राष्ट्रवाद से लोहा लेने की संभावना मौजूद थी. धीरूभाई इस प्रति-विमर्श की कमज़ोरी की ओर इंगित करते हुए कहते हैं कि अगर उसने भाजपा के छद्म-सेकुलरवाद के आरोप का सामने आकर मुक़ाबला किया होता और उसे अपने कथित सच्चे सेकुलरवाद की दावेदारी साबित करने की चुनौती दी होती तो ‘सेकुलर’ दल सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के सेकुलर और राष्ट्र-विरोधी चरित्र की बात जनता तक ले जाने में सफल हो सकते थे.
इस प्रसंग में धीरूभाई पहचान की राजनीति को भी प्रश्नांकित करते हैं. उनका मानना है कि पहचान की राजनीति करते हुए हमने हिंदू, मुसलमान, सिक्ख और ईसाई को अपनी लोकतांत्रिक व्यवस्था की इकाई बना दिया है. उनके अनुसार यह एक ऐसी व्यवस्था बन गयी है जिसमें नागरिक होने के बजाय किसी धार्मिक समुदाय का सदस्य होने को ज़्यादा महत्व दिया जाता है. इस प्रक्रिया के तहत राजनीति ने नागरिकों से उनका चेहरा छीनकर उनकी जगह समुदायों और समूहों को प्रतिष्ठित कर दिया है.
धीरूभाई यह भी मानते हैं कि राज्य की नीति के तौर पर नेहरू का सेकुलरवाद लोगों के लिए एक अपरिचित विचार था. चूंकि वह लोगों के ‘अंतर-सामुदायिक सहजीवन के वास्तविक अनुभवों’ पर आधारित नहीं था, इसलिए इस सेकुलरवाद को बहुलतावाद के मुहावरे में ढालने की कोशिश की गयी. उनका कहना है कि सेकुलरवाद और बहुलतावाद का यह अपमिश्रण अंतत: प्रतिस्पर्धी साम्प्रदायिकता की ज़मीन तैयार करता है क्योंकि समूहों की प्रतिस्पर्धी राजनीति उन्हें सेकुलरवाद के साथ एक घातक भिडंत में झोंक देती है.
भारतीय सेकुलरवाद की संरचना, उसके अंतर्निहित उद्देश्य तथा उसके क्रियात्मक रूप पर राजनीतिक सिद्धांतकार राजीव भार्गव का चिंतन पिष्टपेषित फारमूलों से हमेशा अलग रहा है. उदारतावादी शिविर के अन्य चिंतकों की तरह नवें दशक के दौरान राजीव भार्गव भी यही मानते थे कि अंतत: संविधान का बहुलतावादी और समावेशी स्वरूप हिंदुत्ववादी शक्तियों की उग्रता और उसके अतिवाद को नियंत्रित कर लेगा. लेकिन, अपने हालिया लेखन में उन्होंने भारतीय सेकुलरवाद के सत्य और उसकी प्रतीति का बेजोड़ विश्लेषण किया है. राजीव का कहना है कि
‘हम लोगों ने अपने सेकुलरवाद को धर्म-विरोधी के रूप में प्रस्तुत करके समुदायवादी और सम्प्रदायवादी के बीच का फ़र्क़ ख़त्म कर दिया तथा हर समुदायवादी को भी तत्त्व को भी साम्प्रदायिक ख़ाने में डाल दिया है. लेकिन ऐसा बहुसंख्यकों के साथ ही हुआ. दूसरी ओर, अल्पसंख्यक समुदायों की साम्प्रदायिक गतिविधि को हमने समुदायवादी ही माना... हम सेकुलरवाद के इस पहलू को तक़रीबन भूल ही गए कि यह एक धर्म के भीतर एक समूह द्वारा दूसरे समूह के शोषण या दमन का निषेध करता है’.
(III)
कहना न होगा कि यह किताब सेकुलर, वामपंथी, उदारतावादी और बहुजनवादी तमात खित्तों के विमर्शकारों और समर्थकों को नाराज़ कर सकती है. पाठक को मध्यमार्गीय विमर्श का यह विवेचन एक सीमा के बाद आंतरिक आलोचना के बजाय कुछ-कुछ भर्त्सना जैसा भी लग सकता है. इसका एहसास लिए लेखक को भी है कि
‘चूंकि इस प्रक्रिया में स्वाभाविक तौर पर संघ-विरोधी विमर्श की स्थापित संरचनाओं की बुनियादी ख़ामियां उभर कर आएंगी, इसलिए ज्ञान की विवादात्मक राजनीति के तहत मुझ पर हिंदुत्ववादी परियोजना के एक नये प्रच्छन्न समर्थक होने का आरोप लगाया जा सकता है’.
अपने-अपने वैचारिक शिविरों के पहचान-पत्र लेकर चलने वाले लोगों को लेखक का तार्किक परिप्रेक्ष्य बहुत निष्ठुर और आक्रामक लग सकता है. यह बेचैनी तब और तेज़तर हो जाती है जब लेखक मध्यमार्गी विमर्श के दशकों से प्रचलित-परिचित शीराज़े को अपने तर्कों और तथ्यों छिन्न-भिन्न कर डालता है. यह किताब भारतीय इतिहास, संस्कृति, समाज और राजनीति से बावस्ता उन धारणाओं और परिप्रेक्ष्यों को अस्थिर कर देती है जिन्हें हम स्कूली पाठ्यक्रम से लेकर उच्च शिक्षा तक पढ़ते-समझते-गुनते और साझा करते रहे हैं.
ऐसे में, यह कहना बहुत ग़लत नहीं होगा कि इस किताब को पढ़ने के लिए ख़ास तरह का बौद्धिक धैर्य चाहिए.यह धैर्य पाठक से मांग करता है कि वह अपने सक्रिय जीवन में सायास-अनायास अर्जित की गयी अवधारणाओं, मान्यताओं, वैचारिक पदों और श्रेणियों पर पुनर्विचार करने के लिए तैयार रहे. इस मानसिक तैयारी में यह सजगता भी शामिल है कि अंतत: कोई भी विमर्श अपने समय के समग्र यथार्थ का पर्याय न होकर उसका संकेतक मात्र होता है. चूंकि यथार्थ के नियामक तत्व हमेशा परिवर्तनशील होते हैं, इसलिए हमें विमर्श की प्रासंगिकता और उसके औचित्य की समय-समय पर समीक्षा करते रहना चाहिए.
लेकिन, मौजूदा विमर्शों की लगभग विस्मित कर देने वाली नक़्शा-नवीसी और द्वितीयक स्रोतों के कुशल उपयोग के बावजूद इस किताब में हिंदुत्व के राजनीतिक अर्थशास्त्र की अनदेखी एक बहसतलब मुद्दा है.
बहरहाल, आखि़र में, चंद सतरें इस किताब की बनावट के बारे में. यह किताब विवादात्मक शैली में लिखा गया एक लंबा निबंध है. इस तरह, यह किताब की उस पारंपरिक सरंचना से एक अलग नवाचार है जिसमें पाठ्य-वस्तु अध्यायों में विन्यस्त रहती है, लिहाज़ा पाठक के पास यह निर्णय करने की गुंजाइश रहती है कि वह जहां-तहां नज़र डालते हुए किस अध्याय पर फ़ोकस करे. लेकिन, यह निबंध पाठक से आद्योपांत पढ़े जाने की उम्मीद करता है क्योंकि यहां विषय के अन्यान्य सूत्र इतने अंतर्ग्रथित हैं कि उन्हें समग्रता में पढ़े बग़ैर इस निबंध के उद्देश्य तक नहीं पहुंचा जा सकता.
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