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(कथाकार रणेंद्र के सौजन्य से : Photo by Igor Prosto Igor ) |
साहित्य की अपनी कोई राजनीति नहीं होती, साहित्य समाज की राजनीति करता है और इसके लिए समाज को समझने और उसे बेहतर करने की इच्छा शक्ति उसमें होनी चाहिए. कविता का सौन्दर्य साहस और संघर्ष से भी निखारा जा सकता है. कबीर इस अर्थ में बड़े राजनीतिक कवि हैं. समाज की राजनीति के मूल जाति और धर्म को उसकी वास्तविकता में वह समझते हैं और उसे अनभय होकर सम्बोधित करते हैं.
आधुनिक हिंदी कविता में इस धारा का विकास हुआ है. पंकज चौधरी की कविताएँ इसका प्रमाण हैं. जाति, वर्ग और धर्म के इस त्रिगुट की राजनीति को वह तिलमिला देने के हद तक अभिव्यक्त करते हैं. उनमें कबीर की ही तरह गहरे व्यंग्य करने का हुनर है.
उनकी कुछ नई कविताएँ प्रस्तुत हैं.
पंकज चौधरी की कविताएँ
रेणु का शुद्धिकरण
कोई उन्हें मुखर्जी बता रहा है
कोई उन्हें चटर्जी
कोई उन्हें भट्टाचार्जी बता रहा है
कोई उन्हें बनर्जी.
कोई उन्हें कोइराला बता रहा है
कोई उन्हें सिन्हा
कोई उन्हें झा बता रहा है
कोई उन्हें मिश्रा.
कोई उन्हें पाठक बता रहा है
कोई उन्हें त्रिपाठी
कोई उन्हें शर्मा बता रहा है
कोई उन्हें पांडे.
कोई उन्हें सिंह बता रहा है
कोई उन्हें ठाकुर
कोई उन्हें चौहान बता रहा है
कोई उन्हें सिसोदिया.
मैला आंचल, परती परिकथा
आदिम रात्रि की महक, मृदंगिया, पंचलाइट, संवदिया
ठेस, तीसरी कसम के रचनाकार को
महानता के वृत्त में
मंडल (धानुक) बनाकर
कैसे शामिल किया जा सकता है?
हम और कम हिंदुस्तानी हो रहे
पहले से अधिक हम भूमिहार हो रहे
पहले से अधिक हम ब्राह्मण हो रहे
पहले से अधिक हम राजपूत हो रहे
पहले से अधिक हम कायस्थ हो रहे.
पहले से अधिक हम वैश्य हो रहे
पहले से अधिक हम बनिया हो रहे.
पहले से अधिक हम जाट हो रहे
पहले से अधिक हम गुर्जर हो रहे.
पहले से अधिक हम यादव हो रहे
पहले से अधिक हम कुर्मी हो रहे
पहले से अधिक हम कुशवाहा हो रहे.
अब हम भी कुम्हार हो रहे
अब हम भी कहार हो रहे
अब हम भी हज्जाम हो रहे
अब हम भी बढ़ई हो रहे.
अब हम भी चमार हो रहे
अब हम भी दुसाध हो रहे
अब हम भी खटिक हो रहे
अब हम भी वाल्मीकि हो रहे.
अब हम भी मुसलमां हो रहे.
पहले से हम और कम हिंदुस्तानी हो रहे!
प्रेम
पहला भाजपाई है
तो दूसरा कांग्रेसी
तीसरा समाजवादी है
तो चौथा मार्क्सवादी
पांचवां सपाई है
तो छठा लोजपाई
सातवां तेदेपाई है
तो आठवां शिवसेनाई
पहला प्रचारक है
तो दूसरा विचारक
तीसरा राजनेता है
तो चौथा अभिनेता
पांचवां समाजशास्त्री है
तो छठा अर्थशास्त्री
सातवां कविगुरु है
तो आठवां लवगुरु
एक राजस्थान का रहने वाला है
तो दूसरा पंजाब का
तीसरा कर्नाटक का रहने वाला है
तो चौथा बंगाल का
पांचवां यूपी का रहने वाला है
तो छठा बिहार का
सातवां दक्षिण का रहने वाला है
तो आठवां मध्य का
पहला सांवला है
तो दूसरा भूरा
तीसरा तांबई है
तो चौथा लाल
पांचवां कत्थई है
तो छठा गेहुंअन
सातवां नीला है
तो आठवां पीला
फिर भी इनमें कितना प्रेम है
इस प्रेम का कारण
कहीं इनकी जाति का मेल तो नहीं है?
भारत का यह कैसा खेल है!
साहित्य में आरक्षण
मैं कहां कह रहा हूं कि
तुम शेक्सपीयर नहीं हो?
गेटे नहीं हो?
वर्ड्सवर्थ नहीं हो?
वाल्ट व्हिटमैन नहीं हो?
इलियट नहीं हो?
एजरा पाउंड नहीं हो?
पाब्लो नेरूदा नहीं हो?
नाजिम हिकमत नहीं हो?
तुम सब हो
औेर तुम्हारी असाधारणता का
मैं क्या
आकाश, सूर्य, चंद्रमा, सितारे
पृथ्वी, महासागर भी साक्षी हैं.
तुम जो नहीं हो
वही तो वह है.
तुम जेनरल कैटेगरी में टॉपर कवि होते हुए भी
रिजर्व कैटेगरी के कवि हो!
उदाहरण
उसने पच्चीस हजार के कपड़े खरीदे
बीस हजार के जूते
अस्सी हजार के गहने खरीदे
और बीस हजार के खिलौने
उसने दस हजार के फल-फूल भी खरीदे
तो बीस हजार के मेवा-मिष्ठान्न.
ये सब खरीदारियां
उस दोस्त के सामने होती रहीं
जिसको फकत दो हजार की दरकार थी
कर्ज के रूप में.
मुंह खोलकर बोला था उसने
लेकिन आंखें नम कर चला आया.
अहम् ब्रह्मास्मि् ऊर्फ कोरोना वायरस
भूमिहार सभा, भूमिहार चेतना समिति
भूमिहार विचार मंच, भूमिहार प्रेरणा स्थल
भूमिहार अभ्युदय दल, भूमिहार मोर्चा
ब्राह्मण सभा, ब्राह्मण बचाओ समिति
ब्राह्मण विचार मंच, ब्राह्मण निर्माण स्थल
ब्राह्मण उत्थान संघ, ब्राह्मण हितकारिणी दल
राजपूत सभा, राजपूत जागृति मंच
राजपूत उत्थान संघ, राजपूत सेना
राजपूत सम्मेलन, राजपूत समाज सेवक संघ
कायस्थ महासभा, कायस्थ हिन्दू संघ
कायस्थ जागरण मंच, कायस्थ मिलन समारोह
कायस्थ मेल, कायस्थ प्रकोष्ठ, कायस्थ एक्सप्रेस
वैश्य महासभा, वैश्य प्रेस, वैश्य महारैली
अग्रवाल विचार मंच, मोदी युवक संघ
केजरीवाल धर्मशाला, माहेश्वरी प्रकाशन
कलबार कॉलेज, तैली दैनिक, सुनार दर्पण
जाट किसान मंच, जाट अखाड़ा
जाट मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल, जाट अधिकार महासम्मेलन
गुर्जर विकास पार्टी, गुर्जर औषधालय
गुर्जर आरक्षण समिति, गुर्जर भोजनालय
यादव महारैली, यादव महासभा, यादव विश्वविद्यालय
कुर्मी सनलाइट सेना, कुर्मी राजनीतिक दल, कुर्मी मंदिर
कुशवाहा पाठशाला, कुशवाहा राज, कुशवाहा संगम
‘’ब्रह्मजन सुपर-100’’
अरे ओ जात-पात में लिथड़े अगम-अगोचर, आपादमस्तक
ब्रह्मज्ञानियो,
अब तक तुमने यही किया
जीवन यही जिया
बताओ तो अपने अलावा
किस-किसके लिए तुम दौड़ गए?
करुणा के दृश्यों से हाय! मुंह मोड़ गए
बन गए पत्थर
अपने लिए बहुत-बहुत ज्यादा लिया
दिया बहुत-बहुत कम
मर गया देश, अरे जीवित रह गए तुम.
(कविता में अंत की पंक्तियां मुक्तिबोध की कविता ‘’अंधेरे में’’ से साभार और सायास ली गई हैं.)
कोरोना और दिहाड़ी मजदूर
यह उमड़ते हुए जनसैलाब जो आप देख रहे हैं
यह किसी मेले की तस्वीर नहीं है
या किसी नेता-अभिनेता का रैला भी नहीं है
यह तस्वीर है
साहित्य में वर्णित उन भारत भाग्यविधाताओं की
जो दिल्ली, मुम्बई, बेंगलुरु, चंडीगढ़
गुड़गांव, नोएडा, गाजियाबाद जैसे स्मार्ट महानगरों के निर्माता हैं.
तस्वीर में छोटे-छोटे बच्चे जो दिख रहे हैं
और उनके माथों पर भारी-भारी मोटरियां
वे उनके दुखों और संतापों की मोटरियां हैं
वही मोटरियां लेकर वे
अपने तथाकथित वतन से परदेस को आए थे
और फिर वही लेकर
परदेस से अपने वतन को लौट रहे हैं.
हजारों किलोमीटर की वतन वापसी के लिए
उनके पास न कोई हाथी है, न कोई घोड़ा है
वहां पैदल ही जाना है.
रास्ते में उन्हें सांप डंसेगा या बिच्छू
घडि़याल जकड़ेगा या मगरमच्छ
पैरों में छाले पड़ेंगे या फफोले
सूरज की आग जलाएगी या बारिश के ओले
इसकी चिंता करके भी वे क्या कर सकते हैं.
परदेस में उनके हाथों को जब कोई काम ही नहीं रहा
घरों से उनको बेघर ही कर दिया गया
राशन की दुकानें जब खाक ही हो गईं
तब वे करें तो क्या करें
जाएं तो कहां जाएं.
वे उसी वतन को लौट रहे हैं
जिनको मुक्ति की अभिलाषा में छोड़ना
उन्हें कतई अनैतिक-अनुचित नहीं लगा था
यह जानते हुए भी
फिर वहीं लौट रहे हैं
कि वह उनके लिए किसी नरक के द्वार से कम नहीं है
उन्हें पता है कि
जिनसे मुक्ति के लिए उन्होंने गांवों को छोड़ा था
वे उनसे इस बार कहीं ज्यादा कीमत वसूलेंगे
उन्हें उनकी मजूरी के लिए
दो सेर नहीं एक सेर अनाज देंगे
उनके जिगर के टुकड़ों को
बाल और बंधुआ मजदूर बनाएंगे
उनकी बेटियों-पत्नियों को दिनदहाड़े नोचेंगे-खसोटेंगे
शिकायत करने पर
डांर में रस्सा लगाकर
ट्रकों में बांधकर गांवों में घसीटेंगे
सर उठाने पर सर कलम कर देंगे
आंखें दिखाने पर आंखें फोड़ देंगे
नलों से पानी पीने पर गोली मार देंगे
गले में घड़ा और कमर में झाडूं फिर से बंधवाएंगे
जो कमोबेश अभी भी गांवों में लोगों को भुगतना पड़ता है.
भारतीय संविधान ने उनमें आजादी के जो पंख लगाए थे
वे फिर से कतरे जाएंगे
मनुष्य की गरिमा की अकड़ ढीली किए जाएंगे.
वे जाएं तो जाएं कहां
करें तो करें क्या.
अंधकार युग में उन्हें ही क्यों ढकेला जा रहा है?
और तो सवैतनिक अवकाश पर हैं
अपने-अपने घरों में सुरक्षित हैं
और वे सड़कों पर दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं!
पीछे कुआं था तो आगे खाई है
उनके जीवन की यही कहानी है.
कोरोना महामारी होगी
लेकिन उनके लिए तो यह दोहरी-तिहरी महामारी है!
सारी सभ्यताएं नदियों और नगरों की सभ्यताएं हैं
पहली बार कोई नागर सभ्यता
उनके लिए अभिशाप बनाई गई है.
वे जाएं तो जाएं कहां
वे करें तो करें क्या.
कबीर और कोरोना
यदि वह ईश्वर है
भगवान है
तब फिर किसी मंदिर की मूर्तियों में ही कैसे कैद है?
यदि वह अल्लाह है
खुदा है, रहमान है
तब फिर किसी मस्जिद में ही क्यों खुदाया है?
यदि वह गॉड है
तब फिर कोई गिरिजाघर ही उसका क्यों घर है?
वह क्या है, नहीं है
इस आपद् घड़ी में हमें बता दिया है
कि जिसने इस पूरे ब्रह्मांड को रचा है
वह मूर्तियों में कैसे समा सकता है?
वह मस्जिद की दीवारों में क्योंकर खुदाएगा?
वह गिरिजाघरों में क्यों दुबक जाएगा?
इस महामारी में
जब उसके अनुयायी भी
अपने-अपने घरों में नजरबंद हो चुके हैं
वह अपने निवासस्थानों को छोड़कर क्यों भाग जाएगा?
जिसकी खोज
हजारों-लाखों साल से जारी है
वह किसी मंदिर, मस्जिद, गिरिजाघर में
कैसे मिल जाएगा?
जिसका कोई रूप नहीं है
कोई आकार नहीं है
वह कैसे बार-बार
किसी रूप में अवतार लेगा?
जो दसों दिशाओं में है
आठों पहर में है
जो नृत्य करते पत्तों में है
पछाड़ खाते समुद्र की लहरों में है
जो संगीत में है
जो दीदारगंज की यक्षिणी में है
जो पहाड़ों पर है
मैदानों में है
जो झूमती हवाओं में है
सूरज की सुनहरी धूप में है
जो खिलते फूलों में है
पत्रहीन नग्न गाछों में है
जो बिरहमन में है
जो दलित में है
जो शेख में है
जो पसमांदा में है
जो पंजाब में है
जो ओडिशा की कालाहांडी में है
जो काकेशियन में है
जो अफ्रीकन में है
जो साईबेरिया के बर्खोयानस्क में है
जो अमेरिका की डैथ वैली में है
जो बच्चों के आंसुओं में है
जो उनकी मुस्कानों में है
जो मुझमें है
जो तुझमें है
वह कहां नहीं है!
जो निर्गुण है
उसे किसी खास गुण में
किसी खास स्थान पर
कैसे बांध पाओगे?
यह बात
कबीर बाबा ने
कितना पहले समझा दी थी!
मनुष्य प्रदत्त दुख को भी प्रकृति धोती है
मनुष्य जब मुझे दुखी करता है
प्रकृति से वह देखा नहीं जाता
मुझे खुश करने के लिए वह
सौ तरकीबें ढूंढती है
आत्मा से आंसू लूढके
उससे पहले ही उसको थाम लेती है.
मनुष्य प्रदत्त दुख को भी प्रकृति ही धोती है.
प्रकृति की एक खासियत और है
वह दुख देती भी है तो सुख देने के लिए

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पंकज चौधरी
सितंबर, 1976 कर्णपुर, सुपौल (बिहार
प्रकाशन : कविता संग्रह 'उस देश की कथा' तथा पिछड़ा वर्ग और आंबेडकर का न्याय दर्शन (संपादित)
बिहार राष्ट्रंभाषा परिषद का 'युवा साहित्यकार सम्मान', पटना पुस्तक मेला का 'विद्यापति सम्मान' और प्रगतिशील लेखक संघ का 'कवि कन्हैोया स्मृति सम्मान'.
कुछ कविताएं गुजराती,अंग्रेजी आदि में अनूदित
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