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Channel: समालोचन
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पंकज चौधरी की कविताएँ

(कथाकार रणेंद्र के सौजन्य से : Photo by Igor Prosto Igor )साहित्य की अपनी कोई राजनीति नहीं होती, साहित्य समाज की राजनीति करता है और इसके लिए समाज को समझने और उसे बेहतर करने की इच्छा शक्ति उसमें होनी...

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उस्ताद के क़िस्से मेरे हिस्से (एक) : विवेक टेंबे

चित्रकार, कलाकार, विचारक और कवि जगदीश स्वामीनाथन (जून २१, १९२८ – १९९४) के शिष्य विवेक टेंबे ने अपने उस्ताद के संग-साथ को इधर लिखना शुरू किया है. ये संस्मरण अप्रतिम कलाशीर्ष  स्वामीनाथन के विविध रंगों...

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फ़रीद ख़ाँ की कविताएँ

फ़रीद  ख़ाँ  की कुछ कविताएँ                             मैंने पहली बार रसोई देखीमैंने पहली बार रसोई देखी, अभी. जब हर किसी के लिए पूरा शहर बंद है और कुछ लोगों का चूल्हा भी बुझ गया है. मैंने सत्य को सुलगता...

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बटरोही : हम तीन थोकदार (छह)

हम तीन थोकदार (छह)  जोशी मनोहरादित्यनाथ जोगीबिष्ट                 एक कौम की वसीयत जाति के नाम  बटरोहीआख्यान की शुरुआत जाति-नाम से हुई थी, मगर जल्दी ही मामला अस्मिता की पहचान में सरक आया.ऐसा होना ही था...

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रेणु की राजनीति : प्रेमकुमार मणि

यह फणीश्वरनाथ रेणु का जन्म शताब्दी वर्ष है, रेणु के लेखन के विविध आयामों को समझने के प्रयास हो रहें हैं. उनकी राजनीतिक चेतना क्या थी, किस तरह से इसने अपना रूप लिया और फिर वह क्योंकर सक्रिय राजनीति से...

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बटरोही : हम तीन थोकदार (छह)

हिंदी के वरिष्ठ कथाकार-उपन्यासकार बटरोही इधर ‘हम तीन थोकदार’ शीर्षक से आख्यान लिख रहें हैं जिसे आप समालोचन पर क्रमश: पढ़ रहें हैं. इस आत्म और अस्मितामूलक श्रृंखला की इस कड़ी में भारतीय समाज में जाति का...

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बलराम शुक्ल की संस्कृत कविताएं

२०१६ के मार्च महीने में बलराम शुक्ल की कुछ संस्कृत कविताएँ और उनके हिंदी अनुवाद समालोचन पर प्रकाशित हुए थे. संस्कृत में समकालीन काव्य रीति में आधुनिक बोध की इन कविताओं का लिखा जाना सबके लिए सुखद...

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मुक्तिबोधीय फैंटेसी में वास्तविक का पुनरागमन : अनूप बाली

अनूप बाली ‘स्कूल ऑफ़ कल्चर एंड क्रिएटिव एक्सप्रेशन’ अम्बेडकर विश्वविद्यालय दिल्ली के शोध छात्र हैं. मुक्तिबोध के फैंटेसी के मनोविश्लेषण पक्ष पर यह उनका संजीदा शोध लेख है.   मुक्तिबोधीय फैंटेसी में...

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मैला आँचल में राजनीति की बारादरी: अमरेन्द्र कुमार शर्मा

‘फणीश्वरनाथ रेणु जन्म शताब्दी वर्ष’ में रेणु के लेखन की व्याख्या,विचार, पुनर्विचार की कोशिशें बड़े स्तर पर हो रहीं हैं. उनकी राजनीति पर कुछ दिन पूर्व आपने समालोचन पर ही प्रेमकुमार मणि का आलेख पढ़ा...

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आवाज़ें जो सुनी नहीं गयीं : गरिमा श्रीवास्तव

स्त्रियों का लेखन प्रारम्भ से ही संदेह और सवालों के घेरे में रहा है, चाहे भारत हो या यूरोप. अव्वल तो उन्हें बहुत दिनों तक सुना ही नहीं गया. सुना भी गया तो  जैसा पुरुष सुनना चाहता था. प्रखर स्त्री चेतना...

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हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता और मधुमती: पंकज पराशर

भारत में पत्रकारिता और स्वाधीनता संघर्ष का नजदीकी रिश्ता रहा है, हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता भी इसी औपनिवेशिक विरोधी चेतना के बीच विकसित हुई. हिंदी साहित्य के एक युग का नाम ‘सरस्वती’ के संपादक...

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रज़ा स्मृति: वटवृक्ष और रंगों का बिखराव: उदयन वाजपेयी

सैयद हैदर रज़ा (२२ फरवरी १९२२ – २३  जुलाई २०१६) की आज  पुण्यतिथि है. एक महान चित्रकार और साहित्य का अनुरागी, हिंदी कविता से उनका रिश्ता प्रगाढ़ था. अब जब वे नहीं हैं यह रिश्ता और गाढ़ा होता चला जा रहा...

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उस्ताद के क़िस्से मेरे हिस्से (दो) : विवेक टेंबे

मूर्धन्य चित्रकार जगदीश स्वामीनाथन के शिष्य विवेक टेंबे इधर  अपने गुरु के संस्मरण लिख रहें हैं. इन संस्मरणों में स्वामीनाथन का व्यक्तित्व जहाँ उभरकर  सामने आ रहा है, वहीं चित्रकला की संस्थागत...

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लाली मेरे लाल की : इरशाद ख़ान सिकन्दर

पेंटिग : Salman Toorइरशाद ख़ान सिकन्दर शायर हैं और उनके दो संग्रह भी प्रकाशित हैं. इधर कहानियाँ भी लिख रहें हैं.  भाषा अच्छी और चुस्त है. कहानी पढ़ा ले जाती है. हिन्दू मुस्लिम रिश्तों के तल्ख़ होते जाने...

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भाष्य : ब्रह्मराक्षस ( मुक्तिबोध) : सदाशिव श्रोत्रिय

सदाशिव श्रोत्रिय ने ‘श्रेष्ठ काव्य के प्रति पाठकों की बढती अरुचि और घटती समझ को देखते हुए’ अपनी पसंद की कविताओं के भाष्य का उपक्रम इधर आरम्भ किया है. कविता की उनकी अपनी सुगम व्याख्या आप समालोचन पर पढ़ते...

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बटरोही : हम तीन थोकदार (सात)

हम तीन थोकदार का एक थोकदार ख़ुद इस आख्यान का लेखक है और वह किस तरह से पहाड़ के एक गाँव से निकलकर नैनीताल पहुंचता है, मुक्तिबोध से प्रभावित होता है. वह अस्तित्ववाद पर शोध करना चाहता है. होते हवाते वह...

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राजविन्दर मीर की कविताएँ (पंजाबी) : अनुवाद : रुस्तम सिंह

पेंटिग : SHEETAL GATTANIराजविन्दर मीर की इन पंजाबी कविताओं के रुस्तम सिंह के इस हिंदी अनुवाद को पढ़ते हुए पहले तो इस बात का दुःख हुआ कि मुझे पंजाबी क्यों नहीं आती है. फिर संतोष हुआ कि हिंदी में रुस्तम...

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अंतर्दृष्टि पत्रिका की अथकथा : विनोद दास

हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता की बात ‘मधुमती’ के बहाने शुरू हुई है तो अब दूर तलक जाएगी. साहित्यिक पत्रिका निकालना दीवानों का काम है. कोई अच्छा भला आदमी यह काम क्यों कर करेगा भला ?पत्रिका निकालना, स्तर...

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टोनी हॉगलैंड की कविता "द चेंज"और नस्लवाद: यादवेन्द्र

अमेरिकी कवि टोनी हॉगलैंड अब नहीं हैं. ६४ वर्ष की अवस्था में २०१८ में उनका निधन हो गया. २००३ में प्रकाशित  कविता संग्रह ‘What Narcissism Means to Me’ में शामिल ‘The Change’ नाम की कविता के कारण वे...

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शमशेर बहादुर सिंह का काव्य रहस्य और सौंदर्य के भयावह फूल: सविता सिंह

‘हाँ मुझसे प्रेम करोजैसे मछलियाँ लहरों से करती हैं’समालोचन का ‘भाष्य’ स्तम्भ रचनाओं के पुनर्पाठ पर आधारित आलेखों को काफी समय से प्रकाशित करता आ रहा है इसके अंतर्गत आपने निराला,मुक्तिबोध,श्रीकांत वर्मा,...

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