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सहजि सहजि गुन रमैं : संदीप नाईक

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प्रेम में अबोला रहना भी एक रस है

कविताओं को जहाँ अन्य कलाओं ने प्यार किया, अपनाया और सहेज कर रखा, वहीँ कविताओं ने भी उन्हें अपने अंदर रचा. कलाओं के घर में सब एक साथ रहते हैं.

संदीप नाईक की प्रस्तुत कविताओं में एक कविता शास्त्रीय गायिका ‘शोभा गुर्टू’ के लिए और एक ओडिसी नृत्यकार ‘केलुचरण महापात्रा’ के लिए है.

शोभा गुर्टू की आवाज़ का जादू अविस्मरणीय है.संदीप नाईक की इन सुगठित कविताओं को पढ़ते हुए गुर्टू का  प्रसिद्ध दादरा ‘सैंयाँ रूठ गये’ और ठुमरी ‘हमरी अटरियाँ पर आजा रे सवरियां’ की याद आये और आप उन्हें सुनने बैठ जाएँ तो कोई आश्चर्य नहीं.


प्रस्तुत हैं कविताएँ.

  
  


संदीप  नाईक  की  कविताएँ                   






।। प्रीतम घर नही आये ।।
[ स्व.शोभा गुर्टू को याद करते हुए ]



1)
बेलगाम वह जगह है जहां भानुमति जन्मी थी
उन्नीस सौं पच्चीस में
बड़ी होती गई तो माँ मेनकाबाई शिरोडकर ने कहा कि
जब मैं नाचती हूं तो सुनो
तुम्हारे कान में सुनाई देगी है धरती के घूमने की आवाज़
मंच को अपने पांव से नाप दो
संसार को वह दो जो कोई नहीं दे सका
कभी अल्लादिया खान साहब की शिष्या रही मेनकाबाई अतरौली घराने की गायिका थी
जो बाद में घुंघरू बांध मंच पर समा गई



2)
भानुमति ने जब मां को घुंघरू से थिरकते देखा
अचरज में थी और देखती रही देर तक औचक सी
उस्ताद भुर्जी खान ने उसकी आंखों में नृत्य नही
संगीत का विशाल समंदर देखा
उसे लपक कर खींचा और सितार, पेटी,
तबले के सुरों में गूंथ दिया
यहाँ से उसकी ठुमरी, दादरा और
कजरी की शुरुआत हुई जो होरी पर जाकर खत्म हुई



3)
बड़े गुलाम अली खां और बेगम अख्तर को
सुनकर भानुमति बड़ी हुई
बेलगाम से मुम्बई का सफर भी रोचक रहा
जब गाने लगी तो ऐसा गाया कि
कमाल अमरोही भी चकित थे
पाक़ीज़ा में गाया
बेदर्दी बन गए कोई जाओ मनाओ मोरे सैयां
पाकीज़ा और फागुन से शुरू हुए सफर में
कर्नाटक की लड़की मुम्बई में फिल्म फेयर ले बैठी



4)
मैं तुलसी तेरे आंगन की में वह सैयां रूठ गए गाती रही
खूब गाया - खूब गाया दादरा, खूब गाई ठुमरी
मराठी में भी सामना और लाल माटी में गाती रही
बिरजू महाराज की संगत में गाया
मेहंदी हसन साहब की संगत में ग़ज़ल भी
संगीत नाटक अकादमी का पुरस्कार पाया
विश्वनाथ गुर्टू के घर आई तो भानुमति
शोभा बन गई उनके घर की - शोभा गुर्टू



5)
एक दिन मेरे शहर के पुराने हॉल में
जब वह बहुत देर तक अपनी बंदिश सुना रही थी
एक खूबसूरत मिट्ठू रंग के हरी साड़ी पहने
जिस पर सफेद फुलकियाँ लगी थी
तीन संगत कलाकारों के साथ दादरा गा रही थी
पर जनता थोड़ी देर सुनती रही
यह वही शहर था जिसने कलाकारों को
सर पर चढ़ाया था - नजरों से गिराया था
बाशिंदे संगीत के मुरीद थे और गुलाम भी
जो संगीत समारोह सुनकर गर्दन हिलाते हुए
अहम और दर्द को घर छोड़ कर चले आते थे
उस दिन शोभा गुर्टू के दादरा में
किसी को रस नहीं आ रहा था
बाद में शोभा गुर्टू ने देखा कि
लोग उठकर जा रहे हैं तो वह गाने लगी
सावन की ऋतु आई रे सजनिया
खनकदार आवाज़ में कजरी सुनकर
बाहर खड़े लोग भी हॉल में आ गए
देर तक सुनते रहें जब तक नही गाई शोभा गुर्टू ने भैरवी
हिला नही जगह से कोई अपने
शोभा गुर्टू ने तीन घँटे सतत गाकर थकने की दुहाई दी
मंच से विदा लेते समय उनकी आंखों में अश्रु थे



6)
अफसोस है कि मैं उसके बाद कभी
शोभा गुर्टू को आमने-सामने बैठकर नहीं सुन पाया
मुस्कुराता चेहरा और विरल दृष्टि के सघन अश्रु आज
मुझे याद आते है आज
जनता रूठ कर जाती है मंच को अपमानित कर
किसी भी गायक के दादरा, ठुमरी या कजरी गाने पर भी कोई लौटता नहीं हॉल में
भीड़ गायब है गायक जिंदा है
बाज़ार ने सुरों का धंधा ऐसा बुना है जो
सुर, साधना और तपस्या सब के ऊपर है
आज की गायिका जुगाड़ की पारंगत कलाकार,
सफल उद्यमी है जो सब बेच सकती है
ठुमरी, कजरा, दादरा, होरी या कबीर
आप क्या लेंगे श्रीमान


( युवा कवि डॉ देवेश पथ सारिया के लिए )







मिथ्या


नींद में याद आता है कि
खटका दबाना भूल गया
कमरे की बत्ती जल रही होगी
मोटर चल रही होगी बहुत तेज़
पानी टँकी से बहकर सड़क पर
आया होगा भीगता सा

टीवी चालू रह जाता है
गैस खुला रह जाता है
लेपटॉप खुला छोड़कर निकल जाता हूँ
दरवाजों पर लटका रहता है ताला
चाभी निकालना रह जाता है स्थगित
यह बढ़ गया है इधर कुछ दिनों में

जगहें भटकाव में ला देती है
रास्ते, पगडंडियाँ, झील, नदियाँ
समुंदर और जंगल शेष है दिलों दिमाग़ में
पूछता हूँ हर कही पगलाया सा
और रोज के अर्थहीन काम भूलता हूँ

पौधों को पानी नही दिया हफ्तों से
सफाई की नही कमरे की
अपनी किताबों की धूल नही झाड़ी
कपड़े पड़े है अवांगर्द से
पैदल नही चला बरसों से

घूमकर गया नही कभी अपने ही पीछे
अतीत के कोनों में बुझाई नही चिंगारी
दोस्तों से मिला नही खुले दिल से
कितना चूक रहा हूँ आहिस्ते आहिस्ते

अपने में जिंदा है कौन
यह बूझ पाना क्या मुश्किल है इतना
ये स्मृतियों के विलोप का समय है
कविता लिखकर याद रखना चाहता हूँ







केलुचरण महापात्रा की मूर्तियां


रास्ता तो हमने बनाया था
यक्षिणी वही थी एकांत में
बाट जोहती, कामातुर खड़ी थी
अजंता, कोणार्क या खजुराहो में

प्रेम में पड़कर ओरछा से लेकर
नदियों के तट तक और समंदर
कुओं से नालों , बावड़ियों नहरों में
हर जगह खड़ी ही मिली मुझे

दुख की आँख में सुनहले
स्वप्न लिए, हर बार पत्थर हो गई
लज्जा भूली और औचक ही रह गई
हर जगह मानो, प्रेम में सन्निपात हुआ हो
लकवा मार गया हो अंगों पर

बोल सकती तो कहती कली, केलि,
कमलिनी, ओडिसी नृत्य करते हुए
कुछ ना कहती तो निहारती रहती
प्रेम में अबोला रहना भी एक रस है




अदर्ज


बाकी था नही कहने को
सुनने में सब ढह गया
विस्मृत होता तो कही दर्ज होता
छूटना तो तय ही था फिर भी

चलने में याद भी नही रहता
हड़बड़ी में स्वाभाविक है होना
गलियों के बीच जगह नही शेष
सड़कें दुहराव से भरी है

अतल पानी और आसमान
धरती के अनंतिम छोर
अपने ही बाये बाजू में बसे
दिल के बीच दूरी ना थी

दूर कही एक पगडंडी है
मेड़ के किनारे - किनारे
वहां कभी बहा होगा पानी
गीली यादें तस्दीक करती है

उस पेड़ से जंगल के खत्म होने तक
पसरा था तो प्रेम, जो दिखता नही था


अगढ़


दुख के इतने प्रकार थे
इतने आकार और पैमाने
कि प्रेम की हर फ्रेम में फिट थे

आहत और बेचारगी में प्रेम
अवसाद, तमस, सन्ताप में प्रेम
इतना कि एक दिन प्रेम भी ढल गया
एकाकार होकर विक्षप्त सा

साम्राज्य और विस्तृत हुआ
हर जगह अब प्रेम था, दुख नही
शाश्वत, बिलखता, दास्तान सुनाता
प्रेम को जानना आसान था
बजाय व्यक्त करने या स्वीकारने के

यह बात अभी कोहरे में
प्रेम में पगी बून्द ने कही

___

संदीप नाईक
जन्म 5 अप्रेल 1967 महू मप्र

शिक्षा: एम ए, एम फिल (अंग्रेज़ी साहित्य एवं ग्रामीण विकास) टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान, मुंबई से विशेष पाठ्यक्रम

32 वर्षों तक विभिन्न शासकीय/ अशासकीय पदों पर काम करने के बाद 2014 से  स्वतंत्र लेखन, कंसल्टेंसी का कार्य आदि

कविताएँ, कहनियाँ, आलेख प्रकाशित
नर्मदा किनारे से बेचैनी कथाएं-कहानी संकलन को 2015 का प्रतिष्ठित वागीश्वरी सम्मान

सी - 55, कालानी बाग़,
देवास, मप्र, 455001

9425919221मोबाईल naiksandi@gmail.com

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