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Channel: समालोचन
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सहजि सहजि गुन रमैं : सुमीता ओझा

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने महत्वपूर्ण निबन्ध ‘कविता क्या है’ में लिखा है “ज्यों-ज्यों हमारी वृत्तियों पर सभ्यता के नये-नये आवरण चढ़ते जायँगे त्यों-त्यों एक ओर तो कविता की आवश्यकता बढ़ती जायगी, दूसरी...

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सहजि सहजि गुन रमैं : पूनम अरोड़ा

पूनम अरोड़ा कहानियाँ और कविताएँ लिखती हैं, नृत्य और संगीत में भी गति है. कविताओं की  भाषा और उसके बर्ताव में ताज़गी और चमक है. बिम्बों की संगति पर और ध्यान अपेक्षित है.उनकी पांच कविताएँ आपके लिएपूनम...

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सहजि सहजि गुन रमैं : सुमीता ओझा

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने महत्वपूर्ण निबन्ध ‘कविता क्या है’ में लिखा है “ज्यों-ज्यों हमारी वृत्तियों पर सभ्यता के नये-नये आवरण चढ़ते जायँगे त्यों-त्यों एक ओर तो कविता की आवश्यकता बढ़ती जायगी, दूसरी...

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कथा- गाथा : ख़्यालनामा : वन्दना राग

ख़्यालनामा                            वन्दना रागचारों ओर रेत का विस्तार है. चिलचिलाती धूप है. लगता है कि सोना बरस रहा है. अंधड़, सोने के उन कणों को आँखों में झोंक रहा है. कुछ दिखाई नहीं दे रहा है. अब और...

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भूमंडलोत्तर कहानी – २३ : चयनित अकेलेपन का अनिवार्य उपोत्पाद (समापन)

आलोचक और कथाकार राकेश बिहारी के स्तम्भ ‘भूमंडलोत्तर कहानी’ का समापन वन्दना राग की कहानी ‘ख़्यालनामा’ की विवेचना से हो रहा है, इसके अंतर्गत आपने निम्न कहानियों पर आधारित आलोचनात्मक आलेख पढ़ें हैं –1)...

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सहजि सहजि गुन रमैं : संदीप नाईक

‘प्रेम में अबोला रहना भी एक रस है’कविताओं को जहाँ अन्य कलाओं ने प्यार किया, अपनाया और सहेज कर रखा, वहीँ कविताओं ने भी उन्हें अपने अंदर रचा. कलाओं के घर में सब एक साथ रहते हैं. संदीप नाईक की प्रस्तुत...

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कथा-गाथा : पिरामिड के नीचे : नरेश गोस्वामी

(by Ben Dhaliwal)अकादमिक दुनिया को आधार बनाकर हिंदी में कम ही कहानियाँ लिखी गयीं हैं उनमें से कथाकार देवेन्द्र की कहानी ‘नालंदा पर गिद्ध’अविस्मरणीय है. ज्ञान के कथित पीठ महीन कूटनीति के भी पीठ हैं....

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शिवपूजन सहाय : परम्परा और प्रगतिशीलता : विमल कुमार

यह वर्ष राहुल सांकृत्यायन के साथ-साथ शिवपूजन सहाय की भी १२५ वीं जयंती का साल है, दोनों एक ही वर्ष में पैदा हुए और दोनों का निधन वर्ष भी एक ही है. आज शिवपूजन सहाय (९ अगस्त, १८९३ : २१ जनवरी, १९६३) की ५६...

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कथा-गाथा : क्षमा करो हे वत्स ! : देवेंद्र

क्षमा करो हे वत्स !                     देवेंद्र ''सर सुंदरलाल अस्पताल के कैंसर वार्ड में दर्द से तड़पती छटपटाती आपकी आखिरी उम्मीद मुझसे कभी पूरी न हो सकेगी. माँ, मेरे सारे अपराधों को क्षमा कर दो. मैं...

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क्षमा करो हे वत्स ! : जीवन राग और अनबीते व्यतीत की मृत्युकथा : अल्पना सिंह

कथाकार देवेन्द्र की कहानी ‘नालंदा पर गिद्ध’का ज़िक्र कुछ दिन पहले समालोचन पर नरेश गोस्वामी की कहानी ‘पिरामिड के नीचे’के सन्दर्भ में हुआ था. देवेन्द्र की एक और चर्चित कहानी है ‘क्षमा करो हे वत्स’, यह...

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उपन्यास के भारत की स्त्री (दो) : आशुतोष भारद्वाज

उपन्यासों के उदय को राष्ट्र-राज्यों की निर्मिति से जोड़ कर देखा जाता है. ‘वंदे मातरम्’ उपन्यास की ही देन है. आशुतोष भारद्वाज भारत के प्रारम्भिक उपन्यासों में स्त्री और राष्ट्रवाद के सम्बन्धों को देख-परख...

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कृष्णा सोबती : मृत्युलोक के नश्वर

कृष्णा सोबती : मृत्युलोक के नश्वर कृष्णा सोबती ने मुक्तिबोध के लिए इस शीर्षक के नीचे लिखा है – “मुक्तिबोध के लेखकीय अस्तित्व में ब्रह्माण्ड के विशाल, विराट विस्तार का भौगोलिक अहसास और उससे उभरती,...

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मंगलाचार : अखिलेश प्रताप सिंह

(Waygoing Photo by Nikos Prionas)कविताओं का पहला प्रकाशन ख़ुशी, उम्मीद और ज़िम्मेदारी एक साथ है. अखिलेश प्रताप सिंह की इन कविताओं में नवोन्मेष है पर इसे शिल्प में रचने के लिए मिहनत की अभी दरकार है....

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महात्मा गांधी का राष्ट्र : मोहसिन ख़ान

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी अपने स्वतंत्र राष्ट्र में छह महीने भी जीवित नहीं रह सके, उनकी हत्या अंध राष्ट्रवाद और सांप्रदायिक उन्माद ने कर दी. भारत इस अपराध-बोध से कभी भी उबर नहीं सकता. यह इतिहास की...

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मैं और मेरी कविताएँ (२) : अनिरुद्ध उमट

“Let our scars fall in love.” Galway Kinnell  ‘मैं और मेरी कविताएँ’ स्तम्भ के अंतर्गत समकालीन महत्वपूर्ण कवियों की कविताएँ और वे ‘कविता क्यों लिखते हैं’ विषयक उनका वक्तव्य आप पढ़ेंगे. आशुतोष दुबे को...

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परख : इसी से बचा जीवन (राकेशरेणु) : मीना बुद्धिराजा

इसी से बचा जीवनराकेशरेणुप्रथम संस्करण-  2019 प्रकाशक- लोकमित्र प्रकाशन,  दिल्ली- 110032आवरण चित्र- अनुप्रियामूल्य- रू- 250‘इसी से बचा जीवन’जीवन वैभव की कविताएँ                               मीना...

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उपन्यास के भारत की स्त्री (तीन) : आशुतोष भारद्वाज

(by DianeFeissel voilee)मुहम्मद हादी रुसवा ने ‘उमराव जान अदा’ उपन्यास में तवायफ उमराव की कथा कह दी, कम लोग जानते हैं रुसवा के दूसरे उपन्यास ‘जुनून-ए-इंतजार’ (१८९९)में इसी उमराव ने उपन्यासकार रुसवा के...

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मैं और मेरी कविताएँ (३) : रुस्तम

“What is that you express in your eyes? It seems to me more than all the print I have read in my life.” Walt Whitmanसमकालीन महत्वपूर्ण कवियों पर आधारित स्तम्भ ‘मैं और मेरी कविताएँ’ के अंतर्गत आपने...

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मेघ-दूत : चु चछिंग - पिताजी की पार्श्व-छवि : पंकज मोहन

पिता-पुत्र के रिश्तों पर, उनके बीच के प्रेम और अहम् पर हर भाषा में लिखा गया है. पिता, पुत्र में अपना बेहतर होता हुआ देखना चाहता है, वह अपने पीछे एक बेहतर पिता छोड़ जाना चाहता है. पुत्र जब पिता बन जाता...

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मैं कहता आँखिन देखी : उदय प्रकाश से संतोष अर्श की बातचीत

उदय प्रकाश साहित्य में अब एक वैश्विक उपस्थिति हैं. उनके कथा-संसार का विश्व की अनेक प्रमुख भाषाओँ में अनुवाद हो चुका है, कई राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय सम्मान उन्हें मिले हैं, सत्ता के प्रतिपक्ष के एक...

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