उपन्यासों के उदय को राष्ट्र-राज्यों की निर्मिति से जोड़ कर देखा जाता है. ‘वंदे मातरम्’ उपन्यास की ही देन है. आशुतोष भारद्वाज भारत के प्रारम्भिक उपन्यासों में स्त्री और राष्ट्रवाद के सम्बन्धों को देख-परख रहें हैं. इस ‘पौरुषेय’ राष्ट्र-राज्य में ‘स्त्रियाँ’ कहाँ थीं ? इस अध्ययन में मुख्य रूप से झूठा सच, आनंदमठ,घरेबैयरे और गोरा को केंद्र में रखा गया है.
मूल रूप से अंग्रेजी में लिखे इस शोष आलेख का हिंदी में अनुवाद खुद लेखक ने किया है.पहला हिस्सा आपने पढ़ लिया है– ‘आरंभिका : हसरतें और हिचकियाँ’ यहाँ दूसरा अध्याय प्रस्तुत है.
(दो)
उपन्यास के भारत की स्त्री
स्त्री और राष्ट्रवाद: एक वेध्य आलिंगन
आशुतोष भारद्वाज