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रेणु, पटना और पत्र : निवेदिता

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कल महान कथाकार फणीश्वर नाथ रेणु की पूण्यतिथि थी, उन्हें याद कर रहीं हैं निवेदिता.



रेणु, पटना और पत्र                                      
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निवेदिता






आँखें खुली तो खिड़की के बाहर गाछ पर हरी-हरी पत्तियां दमक रही थी. भोर लाल-लाल कुमुद फूलो में लिपटा था. शेफाली और अड़हुल के पौधे फूलों से भरे हुए थे. चारो तरफ फूल ही फूल हैं. गुल अब्बास, गेंदा, सूरजमुखी नीले लाल सफेद गुलाबी फूल आहा प्राणों में बस गए. ये वही जगह है जहाँ  फणीश्वर नाथ "रेणु"आया करते थे.बाहर दीवारों पर शीशे में मढ़े हुए रेणु के ख़त टंगें हैं. मैं  उनकी लिखावट देख रही हूँ. ख़त पढ़ रहीं हूँ. फारविसगंज की मशहूर कोठी. जहाँ कभी साहित्य और राजनीति के कई रंग मिलते थे . नम मिट्टी की सौंधी खुशबू और ताजगी फिजा में बसी हुयी है.


मैं उन्हें महसूस कर रही हूँ.  वे यहाँ की मिट्टी की खुशबू में रचे बसे हैं. कमरे के बाहर उनके हर्फ़ झिलमिला रहे हैं. सुलग रहे हैं. मैं देख रही हूँ उन दीवारों को, ईट मिटटी से बने इस घर को. रेणु से मेरी पहचान  इस कदर गहरा गयी है कि मैं हाथ बढ़ा कर उनकी हरारत महसूस कर सकती हूँ. मैंने सतहों के नीचे झाँकने की कोशिश की है जिस से रेणु आख्यान की छवियाँ उजागर हो सके .रेणु की यादें जहाँ-जहाँ, मैं वहां-वहां हूँ. दौर कोई हो शब्द की तरह लेखक जिन्दा रहते हैं. मैं उनके ख़त पढ़ रही थी की बाबूजी मिल गए.

बाबूजी गुनगुनी धूप का मज़ा ले रहे हैं. किताबें और फूलों के बीच.

क्या रेणु यहाँ रुकते थे ? हाँ बहुत बार !
ऐनक के भीतर उनकी आँखें चमकती है .
यादें चुपके से हमारे पास ठहर जाती है
रेणु जी को मेरे भाई साहब बहुत प्यार करते थे
दोनों में गजब की मुहब्बत थी
अज़ब आजाद इन्सान थे और फ़नकार भी.

घोर निराशा और हताशा के बीच भी अफसानों, लेखों, और पत्रों के ज़रिये वे सृजन में जुटे रहे. बाबूजी को लोग यहाँ  विद्या बाबू बुलाते हैं. विद्या सागर गुप्त मेरे लिए मेरे पिता की तरह हैं. मेरी दोस्त  रुचिरा के पिता. जाने माने सोसलिस्ट बालकृष्ण गुप्त उनके बड़े भाई थे. रेणु की खूब छनती थी उनसे. बालकृष्ण गुप्त और समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया गहरे मित्र थे. उनके घर की दीवारों पर गाँधी से लेकर लोहिया की तस्वीर लगी है. मैने ऐसे मारवाड़ी परिवार कम देखे हैं जिनके जीवन में किताबें महत्वपूर्ण हो. एक बड़ा कमरा किताबों से भरा है.

ये लोग मुख्यतः पटसन और कपडे का व्यपार करते थे. इनके दादाजी १८९० के आस-पास कमाने के लिए जोरहट (आसाम) गए फिर कोलकाता. कोलकाता में अपनी गद्दी कायम की. व्यपार बढ़ने लगा तो बिहार के फारविसगंज में गद्दी कायम की. १९४० में इनलोगों ने चावल मिल की स्थापना की. इस घर के इतिहास को  जानना इसलिए जरुरी है कि राममनोहर लोहिया से लेकर रेणु तक की यात्रा ने इस जगह और इस गांव को नयी जमीन दी. उनकी जिन्दगी में रंग भरे. जिन्दगी के आखरी लम्हें तक रिश्ता बना रहा.

बाबूजी ने अपने अतीत को सहेज कर रखा है. इस पर न धूल चढ़ने दी, न खरोंच आने दी. परेशानियों, तकलीफों और भयावह आर्थिक संकट के दौरान रेणु ने जब-जब उन्हें याद किया उनका परिवार उनके साथ रहा. १० मार्च १९७८ को अपने लिखे एक पत्र रेणु ने लिखा – 

मैं अच्छी तरह हूँ.- यदि इसी को  “अच्छी तरह” रहना कहा जाता है. स्वर्ग का सुख भोग रहा हूँ और क्या चाहिए. मनुष्य योनि में जन्म लेकर धन्य हो रहा हूँ. आपसे मिलने की  उत्कट अभिलाषा मन में सदा बनी रहती है. किन्तु, जिस कारण  से मुंह नहीं दिखला पा रहा हूँ वह आप भली भांति समझते होंगे.”

ये दिन रेणु के मुश्किल दिन थे. पैसे की तंगी हमेशा रहती थी. ऐसे समय में पूरा परिवार रेणु की  मदद के लिए तैयार रहता था. दुनिया के इतिहास ने ये बताया है की महान साहित्यकारों, लेखकों और कलाकारों ने कितनी ग़ुरबत में दिन काटे हैं. अगर एंगिल्स नहीं होते तो शायद मार्क्स दुनिया के महान चिंतक नहीं बनते. अगर बाबूजी का परिवार नहीं होता तो शायद “रेणु” की जिन्दगी और कठिन होती. उनकी चिट्ठियां बताती है जीवन के अंतिम दिनों तक वे लोग रेणु की जिन्दगी के अहम् हिस्सा थे. रेणु अपने विचारों में, व्यवहार और आचरण में घरेलू जिन्दगी का बहुत एहतराम करते थे. वे लिखते हैं –


पिछले एक माह से अख़बार पढ़ना और रेडियो सुनना बंद है. चिट्ठी पतरी भी कहीं से नहीं आती, न किसी को लिखता हूँ. ऐसे में आपका पत्र होली के पहले पाकर मन में एक अजीब सी गुदगुदी लग रही है. मन के किसी कोने में ठेसू खिल उठता है.रंग गुलाल उड़ने लगते हैं.”

ऐसे कई ख़त है जिससे हम अपने महान अफसानानिगार को समझ सकते हैं. इन खतों  से रेणु की व्यक्तिगत जिन्दगी, सोच और साहित्य के बारे में कई संकेत मिलते हैं. रेणु अजीब कैफियत से गुज़र रहे थे. वे दिन  गहरी आत्मा पीड़ा के दिन थे. जहाँ से उम्मीद थी वही से अँधेरा पसरा था. अँधेरे के सुलगने के इंतजार में वे जूझते रहे. वे लिखते हैं – 


यहाँ की सारी बातें और अपने दिल दिमाग पर जोर गुज़र रही है. उन्हें पत्र में लिख कर बता नहीं सकता...., बस यही समझ लीजिये कि असाध्य साधना कर रहा हूँ. नहीं तो  और क्या? गृहस्थी की तत्कालीन जिम्मेदारियां, लेखकीये कर्तव्य और शारिरिक स्वास्थ्य– इनसब को एक साथ निभाने के क्रम में ......ज्यादा “ ट्रेंकिवलायिज़र” (Tranqiliser) लेना पड़ रहा है’.

ऐसे तमाम ख़तवेदस्तावेज़ है जिससे हमसब रेणु को समझ सकते हैं. मैं देख पा रही हूँ उन्हें, उनके शब्द मेरे कानों में गूंज रहे हैं.प्यार से लबरेज़ चेहरा, उनका पुरखुलूज़ लहज़ा. उनकी चमकती दमकती बोलती आँखें. जिसे दुनिया ने बहुत बाद में जाना. मेरी मुलाकात उनसे वर्षो पहले हो चुकी है.  मेरी स्मृतियो में उनका वही रूप बसा है. काले घुंघराले बाल और सफेद धोती कुर्त्ता. जब मैं उनसे मिली तब क्या पता था की ये वही” रेणु” हैं जिसे दुनिया  महान कथाकार फणीश्वर नाथ रेणु के नाम से जानती है. मैं डूब रही हूँ चाहती हूँ आप भी डूब जाएँ मेरे प्रिय कथाकार के साथ



रिक्शा एक मकान के सामने जाकर रुका. काले घुंगराले लंबे बाल, सफेद धोती कुर्ते में एक आदमी उतरा और अंदर चला गया. दरवाजे पर सूर्ख फूलों वाला पर्दा पड़ा था.अंदर दो कमरे.दूसरी तरफ बाबर्चीखाना. अमरुद के दरख्त के नीचे पानी का नल. वह आदमी सीढियों से होते हुए दूसरी मंजिल पर चला गया. हम बच्चे उसी घर के नीचे खेल रहे थे. बच्चों ने कहा लतिका दीदी के घर कोई आया है. दूसरे  बच्चे ने कहा तुम नहीं जानती इन्हें ! अरे ये वही हैं जिनकी किताब पर ‘तीसरी कसम’  फिल्म बनी है.  बच्चे हैरानी से उन्हें देखने लगे. यही हैं!  ‘फणीश्वर नाथ रेणु’  ये बात आज से करीब ४१ साल पहले की है. पटना के तारीक का एक खूबसूरत अध्याय. यह वही जगह है जहाँ हमने जिन्दगी के बेहतरीन वक़्त गुज़ारा है.

पहली बार हमने उन्हें यहीं  देखा था. उनदिनों मेरे पिता राजेन्द्र नगर में रहते थे . हमारे घर के ठीक बगल में लतिका जी रहती थीं. लतिका जी  के बहनोई बुद्धदेव भटाचार्य मेरे पिता के दोस्त थे. वे लोग अक्सर लतिका जी से मिलने आते और फिर हमारे घर आते. रेणु जी से तो कभी कभार ही मिलना होता पर लतिका जी  के घर बच्चों का अड्डा रहता. लतिका जी  राजेन्द्र के ब्लॉक नंबर दो में पटना इंप्रूवमेंट ट्रस्ट के  मकान के दूसरी मंजिल पर रहती थीं.

किताबों से मुहब्बत मुझे बचपन से थी. जब रेणु जी के बारे में पता चला तो एक दिन मैं चुपके से उनके घर पहुँच गयी. दबे पांव चलती कमरे के खुले दरीचे के नीचे पहुँच कर अन्दर झाँका. कमरे में शाम की पीली धूप चमक रही थी. जिसकी आभा रेणु जी के चेहरे पर  पड  रही थी. उनके हाथों में कोई किताब थी.  कमरे में विधानचंद्र राय, नेहरू और रेणु जी की तसवीर. किताबें और नटराज की प्रतिमा.

मैं चुपचाप खड़ी उन्हें निहारती रही. अचानक उनकी नज़र मुझ पर पड़ी. अरे तुम बाहर क्यों खड़ी हो. लतिका देखो कोई बच्ची आई है. ये कह कर उन्होंने मुझे अन्दर बुलाया. अपनी  किताब बंद कर दी. मुस्कुराते हुए मेरा नाम पूछा. मैंने शरमाते हुए कहा निवेदिता. वे हंस पड़े. अरे वाह तुम्हारा नाम बहुत सुन्दर है. बाहर अमलताश की झुकी शाखाएं हलकी हवा में डोल रही थी. और मेरी आँखों के सामने हिरामन डोल रहा था.

बहुत बाद में मैंने रेणु को पढ़ा और डूबती रही. उनको पढ़ते हुए लगा कहानी उनके रेशे–रेशे में थी. जितनी बाहर  थी  उससे कहीं ज्यादे उनके भीतर थी. उनकी सारी कहानियां और उपन्यास के पात्र जैसे हमसब के आसपास बिखरे पड़े हैं. चाहे रसप्रिया हो या तीसरी कसम, लाल पान की बेगम हो या पंचलाईट हो रेणु हिन्दी में नई कहानी की विशेष धारा हैं. जिसमें  आंचलिकता की खुशबू है. उनपर बहुत कुछ लिखा जा चुका है. मैं तो उनके बहाने  उस पटना को याद  कर रही हूँ जिसने रेणु जैसे कथाकार को जिया है. पटना में आज भी मुझे राजेन्द्र नगर का इलाका सबसे ज्यादा पसंद है. शायद  बचपन और जवानी के दिन ही ऐसे होते हैं की आप जहाँ रहें वो जगह गुलज़ार रहती है. मेरी यादो में पटना और पटना में राजेन्द्र नगर सबसे ज्यादा बसा है. जहाँ पुराने शहर की झलक मिल जाती है. 

सड़क के दोनों किनारे पुरानी  ईटों की इमारतें. जिनकी मेहराबों के नीचे बूढ़े, जवान बात करते मिल जाते हैं. नर्म धीमी धीमी तहजीब. यहाँ आज भी अंग्रेजी अहद की यादगार इमारतें  गर्द – आलूद सड़कों के किनारे खड़ी है. वही कचरियां, वही बागात, वही डाकबंगले, वही रेले स्टेशनों के ऊँची चाट वाले वेटिंगरूम और पुराने टूटे फर्नीचर. अगर आपको पुराना पटना याद हो तो पटना में तांगे, बसों और साईकिल और रिक्शा सवारों के रेले गुजरते थे. तब मोटर कार से सड़कें इस कदर लहू लुहान नहीं थीं.  ऊँचे दरख्त और गंगा पर बरसती हुयी चांदनी  से नहाया हुआ मेरा पटना ऐसा ही था.
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उर्दू के शायर अदीब, हिन्दी और बंगला के अफसानानिगार पटना के गलियों, चौराहों पर मज़मा लगाये मिल जाते थे. चंद मील के फासले पर पटना यूनिवर्सिटी की खूबसूरत इमारतें. किताब की दुकानें. पुरानी चीज़े पुराने दोस्तों की तरह होते हैं. जिनको देखते हुए  हम उन्हें नहीं अपनी गुजरी हुयी जिन्दगी को देखतें हैं. आज फिर वर्षो बाद अपने प्रिय अफसानानिगार से मिल रही हूँ. उनकी जमीं पर. वे नहीं है पर यहाँ की हर चीज़ पर उनकी छाप है. उस महान अफसानानिगार को मेरा सलाम !
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niveditashakeel@gmail.com

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