सुषमा नैथानी की कविताएँ
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सत्यातीत समय में
पोस्ट ट्रुथ
वैश्वीकरण की नाव पर चढ़कर आया है.
दीवार खड़ी करने का हठ हो या ब्रेक्जिट
सब ग्लोबल गाँव में छीना-झपटी के नये पैंतरे हैं.
पिछले पच्चीस की खुली अर्थ-व्यवस्था पर पलटवार है.
नफ़रत इतिहास में दफ़्न नहीं हुई थी
उस पर शर्म का बस झींना पर्दा था
अब इतना हुआ कि जो दबा-ढंका था
वह बेनकाब हुआ.
भासी-आभासी और यथार्थ में लिसरती दुनिया में
अजनबीयत के अटूट सिलसिले हैं.
घुमावदार गालियाँ के ठीक ऊपर रोशनी के जगमगाते टॉवर्स
और नीचे जमीन पर हर ओर बज़बज़ाती नस्लीयहिंसा है.
इस और उस को सबक सिखाने हेतु वैश्विक उद्घघोष हैं.
पैने नाख़ून और दांत लिए यत्र-तत्र-सर्वत्र झुंड के झुंड हैं.
एक पूरा बियाबान पसर रहा है!
एक-एक कर ढहती जा रही हैं संरचनायें,
पाताल में गिरते रहे हैं इलेक्ट्रॉन्स,
नियंडरथल गुफा की भीत पर
डोलती हैं आड़ी-तिरछी छायायें,
और हवा में टकी है चीख़
इसके इतर बाकी सब
हू... लू... लू...
हवा हवा सब...
धमकियों, संशय, अलगाव के बीच
अवांगर्द सकपकाए सन्न खड़े
और रिएक्शनरी मार्च पर हैं.
पूँजी के जरख़रीद
अश्लीलसेलेब्रिटीज़, धर्मगुरु, नेता-अध्येता
बात-बात पर तालियाँ
सीटियाँ और तालियाँ
मज़मा लगा है.
विद्रुप—यह समय हमारे हिस्से आया है...
इसी दुनिया में
चित्त होना बारम्बार,
दुःख में रेत-रेत दरकना
और फिर खड़े होते रहना है.
मेरे इस होने मेंतुम्हारा होना
बहुत-बहुत शामिल है.
उम्मीद करती हूँ कि तुम्हारे होने में
जरा सी मैं भी शामिल रहूँ...
***
अन्वेक्षण
लालसाकेगर्भसे
पहले-पहलजन्मलेगाविषही,
अमृतघटकापताकहींनहीं.
हलाहलसबकेभाग!
बाहरनिकलनेसेपहले
और थककर ढेर हो जाने केबाद
फिरदौड़तेरहनाभीतर-भीतर.
भटकनकेलिएजरूरीहैभूगोल,
लेकिन पर्याप्तनहीं.
प्रेममेंहोगी आकुलाहट,
सदाशयता,औरविदामेंहिलताहाथभी.
अनहोनियोंकेजंगलमें
वटवृक्षकीकतर-ब्यौंतहोतीनहीं.
प्रेममेंहोनाआत्महंताहोनाहै!
जीवनमेंउलटहैपाठ्यक्रम,
अंतकेमुहानेबैठाआरम्भ.
धूसरस्मृतिऔरउबड़खाबड़जीवनकेबीच
हरेकीइच्छासेतरहैआत्माकाकैनवस.
कलनयादिनहोगा!
किकालकीगतिरूकतीनहीं!
कथाकहवैयाकीगुननेकीसीमाहै
यूँ कहानीकहींख़त्महोतीनहीं!
***
मेहदी हसन
कहना उसे
अब नहीं हैं
काले तवे,
पुराना ग्रामोफोन
या कठिन दिनों का
ओटोरिवर्स पॉकेट प्लयेर.
फिर भी
ओस की बूँद के
सलोनेपन
में लिपटी
वह
आवाज़
गूँजती
रहती है
मेरे
आसपास...
***
छुट्टी के दो दिन
आज फिर धूल फांकी,
फालतू चीज़ों से घर से खाली किया,
इस्तरी की, कपड़े-लत्ते तहाये,
मन अटका रहा,
दिन निकल गया.
कुछ देर घाम में बैठी,
कुछ देर घूमते-घूमते हिसर टूंगे,
रस्ते पर एक सांप दिखा,
दो खरहे, एक कनगोजर
दिन निकल गया.
***
नैनीताल
हे अयारपाटा के बाँझ-बुरांस
देर रात गए
जब सीटी बजाती, सरसराती, हवा चले
तो मुझे याद करना.
कितने तो रतजगों का हमारा साथ रहा.
अप्रैल-मई की गुनगुनी धूप,
जुलाई-अगस्त के कोहरे,
नवम्बर की उदासी,
तुम्हें याद रखूँगी मैं.
पहाड़ तुम दरकना नहीं,
जब तक तुम हो मेरा घर रहेगा.
जिनकी नराई घेरती है वक़्त-बेवक्त
अबवेबहुत से लोग नहीं रहे.
हरे-सब्ज़ रंग की झील तू बने रहना.
मेरे बच्चों और फिर उनके के बच्चों के लिए भी.
किसी दिन तुम्हारे भीतर झाँक कर
वो मेरा अख्स देखेंगे...
***
ताजमहल
लालबलुआ-पत्थरोंकेबीचएकफूलखिलाहै
ताजमहल!
मुगलियासपनोंमेंतीनसदीतकडोलतेरहेहोंगे
मिश्रकेपिरामिड,उलूगबेगकेमदरसे,
समरकंद-हिरात-काबुलकेहुज़रें.
उत्तर सेदक्खिनतकफैलेकिलों, मकबरों, महलोंपर
फैलीहुईहैइनसपनोंकीछाया.
बीसियोंसालपत्थरोंसेपटारहाहोगाआगरा,
हज़ारों-हज़ारपीठ-हाथहोगएहोंगेपत्थर.
नक्कासों, गुम्बजकारों, शिल्पीयोंकेजहनमें
क़तरा-क़तराउभरीहोंगीयहमहराबेंवमीनारें.
चित्रकारों, संगतराशों, पच्चीकारोंकीउँगलियोंकेपोरपर
खिले होंगेट्यूलिप्स, सूरजमुखी, गुलबहार, चम्पा, चमेली.
झिर्रियोंसेछलनी-छलनीहुएहोंगेमन
और आंसुओंकेतालाबमेंमुस्कराएहोंगेकमल!
तसल्लीबख्शकिसीआख़िरीक्षणमें
किसी लिपिकारकेहोठोंपरउभरीआहहै
ताजमहल!
अर्जुमन्दबानोबेगमउर्फमुमताजमहल
कायनातकीअजीमसौगातोंकेबीच
कितनेप्यारसेरखेहुएहैंतुम्हारेअवशेष.
दक्खिनीदरवाजेकेजरासाइधर
सहेलीबुर्जएकमेंदफ़नहैंबेग़मअकबराबादी^
सहेलीबुर्जदोमेंफतेहपुरीबेगम^
क्यामालूमकहाँमरीखपीहरमकीहूरें,
औरदर्ज़नोंकुंवारीशहजादियाँ*.
सिर्फएकशहंशाहकाहीविलापहै
ताजमहल!
______________
^शाहजहांकीदोबेग़मेंजोताजमहलपरिसरमेंहीदफ़नहैं.
*अकबरनेमुग़लशहजादियोंकेविवाहपररोकलगादीथी, जोमुमताजकीबेटियोंकेलिएभीरही.
(21 दिसम्बर, 2013)
***
छिन्नमस्ता!
तिरुपतिसे
लौटीऔरतेंदेखीं
शोकतजआयीं
केशतजआयीं.
देखीं
हिन्दूविधवा
शिन्तोविधवा
नन,सन्यासिन
ऑर्थोडॉक्सयहूदीसधवा
केशतजआयीं
कामनातजआयीं.
अनचाहेखिले
बैगैरतकामनाफूल
येकेशकिसकीकामनाहैं?
किसकीमुक्ति?
क्यानहीं रीझती
विरहरागनहींसुनतीमुंडिता?
पूरब-पश्चिम
उत्तर-दक्षिण
तिल-तिलतिरोहित
होती
लालसाकी
कामनाकी
नदीमें
छिन्नमस्ता!
***
संगत
घनाबरगदकाजंगलहुई
आसानरहापहुंचना
मुश्किलनिकलना.
नमीहुई, हवाहई,
रातकेसिरहाने
बहतेझरनेकीकलकलहुई.
भूमिगतनदीकीहिलोरहुई,
नाक की नोक में टिकी सर्द टीस
और आग का ख़्वाब हुई
कवितायें.
धीमाज़हरहुई.
सरपरचढ़ाउनकासरूर
धीमें-धीमेंउतरा.
पढ़ते हुए तुम याद आये.
***
जीवन
मैं आधी उम्र इस नपीतुली रहस्यहीन, रसहीन दुनिया से बाहर
कहीं से कहीं निकल जाना चाहती रही.
और फिर शेष जीवन वापसी का रास्ता ढूँढती रही...
चौतरफालामबंदहैजोसाजसामानइसकेबीचनहींरहती,
नइसदिनकेभीतरजोचौबीसदाँतोंसेसोखताहैमेरीचेतना.
खुशी, ज़िद्द,औरदुस्साहसकेबीचघिरी,शैने: शैने:मेरीआत्माहोतीहै हरी...
दुनियाकीलपस्यामेरेहिस्सेबहुतआईनहीं,
फिरभीकिसी-किसीदिनलगताहै इस दिनकेभीतरकुछऔरदिनहोते.
औरकभीऐसी बेकली रहती हैकियेदिनगुज़रेतोकोईबातबने...
अक्सर जीवन अल्बेयर कामू के 'अजनबी'का प्लाट हो जाता है,
कोई वाज़िब बहाना भी नहीं होता, कहने को कोई बात नहीं बचती.
सिवा इसके कि 'बहुत गरमी थी, झुंझलाहट या थकान थी', कुछ का कुछ हो गया...
किसी बहाने अचानक वह बात खुलती है, जिसका वहम भी जहन में नहीं रहता.
याद रखने और भूल जाने से अलग भी मन में बेखबरी की जगह होती है बहुत बड़ी.
उस छुपी जगह के बाशिंदों पर कोई क्लेम नहीं, बस ज़रा सा उन्हें जान लेने की ख़्वाहिश है...
फ़ैसलेसिर्फइसलिएकठिननहींहोतेकि उनकेसाथदुःखऔरमुसीबतेंआतीहैं.
दुःखऔरमुसीबतअपनीजगहकमऔरज्यादाहोसकतेहैं,
लेकिनउनकेसाथख़ालिसअकेलापनआताहै...
दिल दुखा,चोटसही, लेकिन दिलदारी भी हिस्से में आयी.
दोस्ती के फूल खिले, अजनबी सोहबत में दिल कई बार हरा हुआ.
घिरती साँझ में जुगनू जो जादू कर गुज़रते हैं, उसके सरूर में बनी रहती हूँ...
अबलालकुछकमसुर्ख़,पीलाकुछज़र्द,नीलालगभगस्याहदिखताहै,
सलेटीमेंकुछउजासहैभरी,औरहरेमेंथोड़ीसीख़ुशी.
करनेकोढेरसारेकाम औरबिसूरतेरहनेकोदुनियाबाक़ीहै...
***
रामगढ़
बारहा
देवदार के
टुक्खु से
उड़ी चली
आती है.
छज़्ज़े पर,
खिड़की से
पहलू में
अबाबील.
ऐसे ठहर गयी
यहाँ
जैसे
बस
यहीं
हो
घर...
***
संचय
आगेबढ़नेकेपहले
बसजरादोकदमपीछे
अपनेभीतरउतरतीहूँ
टटोलती वह
जो बचा रह जाता है
नष्ट होने के बाद भी...
***
विदा
अचानक यूँ ही खड़े-खड़े गिर जाता है
विशालकाय चिनार का पेड़
छूट जाता है संग-साथ
बीत जाती है उम्र
ख़त्म हो जाता है प्रेम.
एक-एककरनिकलजातेहैंलोग
एक दिनदरकजातींहैंदीवारें
ढहजातीहैछत.
छूटगये घर
टूट गए प्रेम,
कट गये पेड़ों
विलुप्त हो चुके पक्षियों
मैं ठहर कर
साफ़ मन और स्नेह में भीगी
कहना चाहती हूँ एक बार
विदा!
***
तस्वीर
बीस साल की लड़की
तस्वीर में फूल सी खिली है
कितनी उम्मीद भरी
यूँ कुछ वर्ष बाद
जिस घर ब्याह कर पहुंची
कुचल दी गयी.
शिक्षा, नौकरी, मेहनत, संवेदना
किसी से उसका भला न हुआ...
***
माँ
तुम एकपूरीउम्र
नट की कुशलता से
महीन सूत पर चलती रही,
और साध लिया संतुलन.
उग आए तुम्हारे पंख,
उड़ आईं तुम ओर-छोर,
जुटा लिया हँसी ठट्ठा
और अपनेइर्द-गिर्द
खड़ाकरकिया
एक बेहतर संसार.
मेरीपलकों पर बैठीहै
ढेर सारी नींद,
गहरा अवसाद,
औरदुश्चिंता.
माँ तुने बहुत दिया
मुझे धीरज.
थोड़ी सी
हँसी भीदे दे!
***
घर
एक नदी बहती है
वर्षों से हमारे बीच
इसी में तर हुये
डूबे-उतरे
फिर-फिर हुये हरे
कलपते रहे जिसके लिए
यहीं वो घर बना.
***
बेघर
जब नहीं होती बात
हवा नहीं बहती
चिड़िया नहीं गाती
झर जाते हैं एक-एक कर सारे फूल
सूख जाती है नदी.
धूसर, उजाड़ पगडंडी के ऊपर
गोल-गोल चक्कर काटती
फड़फड़ाती है एक चील
पतझर के मौसम में
मैं ढूंढ़ती हूँ
घर का पता...
***
मृत्यु
जीवनतोपंखुड़ी-पंखुड़ीटूटतारहा,
अभी-अभीवहआख़िरीज़र्दपत्ताबेआवाज़गिरा,
एककांपतीलौबुझगई,
वहतोबहुतपहलेजाचुकाथा.
***
जरूरीहै
किबनीरहेमेरीभीकुछअकेलेपनकीआदत
***
परुली की बेटी
तुमरामकली, श्यामकली,
परुलीकीबेटी
तेरहयाचौदहकी
असम, झारखंड
याउत्तराखंडसे
किसी एजेंसीकेमार्फ़त
बाकायदाकरारनामा
पहुँचीहो
गुड़गाँव, दिल्ली,
मुम्बई, कलकत्ता,
चेन्नईऔरबंगलूर के
घरोंकेभीतर.
दोसदीपुरानादक्षिणअफ्रीका
हैती, गयाना, मारिशस
फिजी, सिन्तिरामयहीं है अब.
बहुमंजिलाफ्लेटकेभीतर
कबउठतीहो, कबसोती
क्याखाती, कहाँसोती
कहाँकपडेपसारतीहो?
कितनेओवरसियरघरभर
कभीआतीहैनींद—सी—नींद
सचमुचकभीनींदआती है?
दिखतेहोंगे
हमउम्रबच्चेलिएसितार-गिटार
कम्पूटर, आइपेडटिपियाते,
जूठीप्लेटमेंछूटाबर्गर-पित्ज़ा,
महँगे कॉस्मेटिक,
विक्टोरियासीक्रेटकेअंगवस्त्र.
किटपिटचलतीअजानीज़बानकेबीच
कहाँ होतीहोबेटी
किसीमंगलगृहपर,
या पिछली सदी के
मलावी, त्रिनिदाद, गयानामें
तुमकिसी रामकली, श्यामकली, परुलीकीबेटी
किसजहाज़परसवार हो
इससदीकीजहाजीबेटी*
_______
*जहाजीभाईयोंकीनक़लपर
***
प्रेमी
मेरेपासथोड़ीसीहँसी
ढेरसानमकहै
औरदेनेकेलिएखूबसारादुःख
ऑब्सेसिवकम्पल्सिवडिसऑर्डरहूँ
कुछलम्पट, कुछकायर, कुछनार्सिस्ट
पुरानेग्रामोफोनकीअटकी सुईहूँ
वहांघर्र-घरर -घररकेकुछनहींबजता
सहेजलेनेकोअवसादकाकुँआहै
जहाँसेबारबारलौटतीहै
मेरीहीप्रतिध्वनि.
***
मेमौग्राम
(स्व. आर. अनुराधा के लिए)
टालतीरही
जबतकटालसकी
बेसलाइनमेमौग्राम.
इसआश्वस्तिकीटेकपरकि
नानी-दादी, फूफी-मौसी
अस्सी-नब्बेतकसबसलामतरहीं.
लेकिनफिरडरनेकोआंकड़ेहैही
वर्षकीशुरुआतमेंडॉक्टरनेअल्टीमेटमदियाथा
हिम्मतजुटातेअबदिसंबरहोगया
कईदिनघर-दफ्तरमेंखटतीरही
अनमनीरही,
रह-रहपेटमेंउठतीमरोड़,
औरजीभपरआजाताकसैलास्वाद.
ऐसेडरनहींथा, फ़कतझुंझलाहटथी.
मेरीबारीआईतोगनीमतरहीकिटैक्नीशियनउम्रदराज़औरतथी
बाक़ीमशीनथी, खड़ी-पड़ी
आड़ी / तिरछी
औरउसकाआघातथा, ठंडापनथा.
मेरेपासब्रुफ़ेनथी,
औरझोलेमेंपड़ीएककिताबथी
जिसे खोलसकनेकी
दिन भर गुंजाइशनबनी
यूंफ़जीहतकासिलसिलाशुरूहुआ..
(12 दिसम्बर, 2015)
***
कमल जोशी के लिए
याद आता है वो सड़क के किनारे का ख़ूबसूरत, घनेरी छांव वाला पेड़
जिसके नीचे तुम बैठे रहे बहुत देर
और उस रस्ते में खायी हुई ताज़ा हरी ककड़ी.
देखने को अब बची हैं तस्वीरें और याद है तुम्हारा कहना
‘मैं कभी दूसरा शॉट नहीं लेता, जो पकड़ना है एक में ही पकड़ लेता हूँ.”
हमारी पकड़ में यूँ तुम्हारा नाख़ून भी नहीं आया.
लड़नाभीएकचुनावहुआऔरमुँहफेरलेनाभी.
हम तुम्हें सिर्फ़ पहली ही बात के लिए जानते थे,
और कितना कम जानते थे कि दूसरी का गुमान न था.
कमल जोशी दोस्त याद करेंगे अब तुम्हें पहाड़ चढ़ कर,
ठंडी हवा और पानी के बीच, अकेलेपन में.
याद करेंगे तुम्हारी उस उन्मुक्त हँसी, बुलंद आवाज़ और लापरवाही को.
***
सूर्यग्रहण
आज चाँद की सोलह कलाएँ
सूरज ने चोरी की.
पेड़-पत्तों ने गवाही दी
उकेरी उसकी अनगिनत छवियाँ.
मैंने याद किया पिछलीसदीमेंकभी
उस चाँद को जो
बाख़ली के आँगन में
रखीकाँसे की थाली में
उतर आया था
मेरे ही लिए.
याद किया तारे गिनते बूढ़े दादा को,
फूले सर वाली ताई औरदादीको,
और अखरोट के पेड़ को.
नीम की पत्तियों को याद किया.
उस आम के पेड़ को याद किया
जिससे गिरकर टूट गयी थी
मेरी दाहिनी हँसुली.
(21 अगस्त 2017 को कोरवालिस में पूर्णसूर्यग्रहण देखतेहुए.)
***
बापूकाचरखा
बापू इक्क्सवीं सदी के दुसरे दशक में
दुनिया की 100 सबसे अधिक लोकप्रिय फोटो में
शामिल हो गया अब तुम्हारा चरखा.
वो दिख जाता है दुनिया के सबसे ताकतवर आदमी के साथ
जो बैठा है आणविक हथियारों के जख़ीरे पर
और मक्खी की तरह मसल सकता है बड़ी आबादी.
वो जो स्वनाम जड़ित सूट पहनता है
या वह भी जो बुलेट ट्रेन बेच सकता है
या खदानों का कच्चा माल बेचता-ख़रीदता है
और गिरमिट का इंतज़ाम कर सकता है
कात रहा है सूत...
***
चोपता से सप्रेम
असली वैभव वृक्षों का नसीब है!
***
अफ़सोस!
मैं
एक उम्र बेवजह उलझी रही,
और शेषशोक में डूबी रही.
विध्वंश की पूरी एक रेल चलती रही.
***
आयोवा की याद
सर्दी से मुठभेड़ के पहले ही दिन
चुक गया भोटिया ऊन का मोटा खुरदरा स्वेटर
और लखनवी नफ़ासत का गरम कोट.
एन्टार्टिका की सर्द रेत सरीखी
चाँदनी में चमकती
अंधड़ से उड़ती
ख़ंजर से चुभती
बर्फ़!
रात के दूसरे पहर
सुनसान रस्ते
कमर-कमर तक धंसती
पैदल-पैदल पहुँची थी घर.
जूते के भीतर शायद
जमे हुए पैर
नीले से बैंगनी होते
लगभग जलते रहे.
ठंड पर शर्म भारी रही
और जैसे-तैसे कट गए सात दिन.
फिर गुडविल स्टोर से ख़रीदे हुए
सेकेंड हैंड जैकेट, दस्ताने, जूते.
बने मेरा जिरहबख़्तर.
जिनके बूते फ़तह की
वह मौसम की पहली जंग
अब बीस वर्ष बाद ट्रोफ़ी से टंगे हैं खूँटी पर.
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डा. सुषमा नैथानी ऑरेगन स्टेट यूनिवर्सिटी, कोरवालिस, अमेरिका में वनस्पति विज्ञान की रिसर्च असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं. वह साहित्य, संगीत और घुम्मक्कड़ी में गहरी रुचि रखती हैं, और हिंदी व अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में लिखती हैं. 2011 में हिंदी में काव्य संकलन ‘उड़ते हैं अबाबील’(2011) और ‘धूप में ही मिलेगी छाँह कहीं’ (2019) प्रकाशित. कुछ कविताएँ व लेख पब्लिक एजेंडा, कादम्बिनी, पहाड़, हंस, आउट्लुक, आदि हिंदी पत्रिकाओं में प्रकाशित.