मति का धीर : महाश्वेता देवी
अपने उपन्यास ‘मास्टर साब’ के हिंदी अनुवाद की भूमिका में महाश्वेता देवी ने लिखा है- ‘लेखकों को वहाँ और अधिक चौकस रहना पड़ता है, जहाँ अँधेरा कुंडली मारे बैठा है. उसे वहाँ प्रकाश फैलाना होता है, अविवेक पर...
View Articleविष्णु खरे : कई हजार चौरासियों की माँ
महाश्वेता देवी के कथा साहित्य ने भारतीय सिनेमा को कुछ बेहतरीन फिल्मे दी हैं जिसमें ‘संघर्ष’, 'हजार चौरासी की मां’, ‘रुदाली’ आदि शामिल हैं, उनकी आधारित फिल्में अपना अलग व्यक्तित्व रखती हैं. कई हजार...
View Articleपरिप्रेक्ष्य : समय जैसा है, उसे ही लिखा जाए : अरुण माहेश्वरी
समय जैसा है, उसे ही लिखा जाए (प्रेमचंद की 137वीं सालगिरह पर)अरुण माहेश्वरी1880 में जन्म ; 20वीं सदी के प्रारंभ के साथ लेखन का प्रारंभ ; और 1936 में मृत्यु की लगभग...
View Articleसहजि सहजि गुन रमैं : शंकरानंद
(Photo by Portia Hensley : Two homeless boys in Kathmandu) शंकरानंद के दो कविता संग्रह ‘दूसरे दिन के लिए’और ‘पदचाप के साथ’प्रकाशित हैं. बेघर लोगों पर आकर में छोटी ये आठ कविताएँ सहजता से मार्मिक हैं,...
View Articleपरख : एक और ब्रह्मांड : अरुण माहेश्वरी
‘एक और ब्रह्मांड’ ख्यात लेखक अरुण माहेश्वरी की कृति है, यह इमामी समूह के संस्थापक श्री राधेश्याम अग्रवाल के जीवन पर आधारित है. पर यह जीवनी नहीं है और इसे उपन्यास भी नहीं कहा गया है. इसे शानदार ढंग से...
View Articleसहजि सहजि गुन रमैं : प्रेम पर फुटकर नोट्स : अंतिम : लवली गोस्वामी
कविताओं पर अंतिम रूप से कुछ भी नहीं कहा जा सकता. कविताएँ अर्थ बदलती रहती हैं. हर पाठक उसमें कुछ जोड़ता है. यही नहीं समय और स्थान भी उसमें बदलाव लाते हैं. आप किसी कविता में जो आपको अच्छा लगा है उसे तरह...
View Articleरंग - राग : चौथी कूट (ਚੌਥੀ ਕੂਟ) : सूरज कुमार
निर्देशक गुरविन्दर सिंह की सिख अलगाववादी आन्दोलन की पृष्ठभूमि पर बनी पंजाबी फ़िल्म चौथी कूट (ਚੌਥੀ ਕੂਟ)अभी प्रदर्शित हुई है. यह कथाकार वरयाम सिंह संधु की दो कहानियों पर आधारित है. यह पहली ऐसी पंजाबी...
View Articleमीमांसा : बौद्रिला : अच्युतानंद मिश्र
फ़्रांसिसी दार्शनिक बौद्रिला (Jean Baudrillard, 27 July 1929 – 6 March 2007) बीसवीं शताब्दी के महत्वपूर्ण चिंतकों में शामिल हैं, खासकर उत्तर-आधुनिकता और उपभोक्तवाद को समझने के लिए उन्हें जरुर पढना...
View Articleसहजि सहजि गुन रमैं : अम्बर रंजना पाण्डेय
जबकि समय जटिलतर होता जा रहा है, कलाओं से हम उनके एकआयामी होने की जिद्द ठान बैठे हैं. बस एकबार में ही अनावृत्त होकर किसी क्षणिक उत्तेजना में लुप्त हो जाए, कविता में गहरे बैठने का न धीरज बचा है न उसके...
View Articleपरख : हिंदू परम्पराओं का राष्ट्रीयकरण : वसुधा डालमिया
वसुधा डालमियाअंग्रेजी में 1997 में प्रकशित वसुधा डालमिया की पुस्तक – ‘The Nationalisation of Hindu Tradition’का हिंदी अनुवाद ‘हिंदू परम्पराओं का राष्ट्रीयकरण’ राजकमल प्रकाशन से इस वर्ष छप कर आया है....
View Articleपरिप्रेक्ष्य : चित्त जेथा भयशून्य
विश्वकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर की रचना –‘चित्त जेथा भयशून्य’का प्रकाशन जून-जुलाई १९०१ के आस-पास माना जाता है. यह बांगला में प्रकाशित गीतांजलि में शामिल है पर अंग्रेजी के उस गीतांजलि में नहीं शामिल है जिसे...
View Articleसबद भेद : साहित्य के वधस्थल से : कर्ण सिंह चौहान
पेंटिग : A perfect murder: Kim Sobatशिवदान सिंह चौहान प्रगतिशील साहित्य के संस्थापक सदस्य थे. नामवर सिंह ने उनकी जमीन पर अपने प्रभाव का विस्तार किया. कैसे शिवदान सिंह की बेकदरी हुई, कैसे वह धीरे-धीरे...
View Articleमति का धीर : गुरदयाल सिंह
गुरदयाल सिंह राही(10 January 1933 – 16 August 2016) अमृता प्रीतम के बाद पंजाबी भाषा के ऐसे दूसरे रचनाकार हैं जिन्हें भारतीय ज्ञानपीठ सम्मान प्राप्त हुआ था. उनके उपन्यासों के देश– विदेश में अनुवाद हुए...
View Articleबात - बेबात : खुशामद के खतरे : इक़बाल हिन्दुस्तानी
कभी हालीने ग़ालिब के लिए लिखा था – एक रौशन दिमाग था न रहाशहर में एक चिराग था न रहा. कहना न होगा हमारे तमाम शहर ‘रौशन दिमाग’ से ख़ाली होते जा रहे हैं वहां तमाम तरह की ज़हनी कालिख पुतती जा रही है. लेखक और...
View Articleसहजि सहजि गुन रमैं : विनोद भारद्वाज
प्रकाशक Copper Coin ने बड़े ही आकर्षक ढंग से हिंदी के कवि विनोद भारद्वाज की कविताओं की किताब – ‘होशियारपुर और अन्य कविताएँ’ इस वर्ष प्रकाशित की है. इसमें १०० से कुछ अधिक है कविताएँ हैं. _“विनोद...
View Articleपरख : आलाप और अन्तरंग (गोबिंद प्रसाद)
कवि गोबिंद प्रसाद के सृजनात्मक-आलोचनात्मक गद्य ‘आलाप और अन्तरंग’ पर राजेश कुमार का आलेख.अनुभव संवेदन का गझिन ग्राफ़ राजेश कुमारसमानान्तरखड़ी-ऊर्ध्वमुखी रेखाओं के सहारे...
View Articleसहजि सहजि गुन रमैं : अविनाश मिश्र : नवरास
कांगड़ा पेंटिग12 वीं शती के महाकवि जयदेव विरचित ‘गीतगोविन्द’ ऐसी कृति है जिसकी अनुकृति का आकर्षण अभी समाप्त नहीं हुआ है. केवल भारतीय भाषाओँ में इसके २०० से अधिक अनुवाद हुए हैं. हिन्दी के भीष्म पितामह...
View Articleसहजि सहजि गुन रमैं : मनोज कुमार झा (६ कविताएँ)
पेंटिग : LAXMA GOUDमनोज कुमार झा हिंदी कविता में न परिचय के मोहताज हैं न किसी प्रस्तावना के.उनकी कविता की अपनी जमीन है जिसे उन्होंने मशक्कत से तैयार किया है.किसी तात्कालिक उपभोक्तावाद में उनकी कविताएँ...
View Articleरंग - राग : अखिलेश से पीयूष दईया का संवाद
(पीयूष दईया और अखिलेश, फोटो द्वारा योगिता शुक्ल)28अगस्त को मशहूर चित्रकार अखिलेश अपने जीवन के साठ वर्ष पूरे करने जा रहे हैं.कोलकोता में १ दिसम्बर को अखिलेश जी की षष्ठिपूर्ति के सिलसिले में एक बड़ी...
View Articleबात - बेबात : भारतीय "जबर स्मार्ट"सिटी और विराट एकात्म वाद : संजय जोठे
युवा सामाज वैज्ञानिक संजय जोठे कभी-कभी व्यंग्य भी लिखते हैं. स्मार्ट सिटी का जुमला खूब चला हुआ है, जबकि शहर ढंग से शहर भी नहीं बन सके हैं.भारतीय "जबर स्मार्ट"सिटी और विराट एकात्म वाद...
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