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Channel: समालोचन
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परख : अपनों में नहीं रह पाने का गीत (प्रभात) : प्रमोद कुमार तिवारी

समकालीन हिंदी आलोचना में प्रभात की कविताओं को लेकर उत्साह है, हालाँकि अभी उनका एक ही काव्य-संग्रह ‘अपनों में नहीं रह पाने का गीत’ प्रकाशित है. कविताओं के अतरिक्त आदिवासी लोक साहित्य पर भी  उनका कार्य...

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हस्तक्षेप : तुम्हें किसका भरोसा है राम ! : सारंग उपाध्याय

                                       सारंग का यह आलेख महानगरों के जीवन की आपाधापी में लगभग अदृश्य हो गए चेहेरों की पहचान का एक उपक्रम है, ये चेहरे अपनी उभरी हुई श्रम रेखाओं से अपनी कथा कहते हैं....

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रंग राग : सत्यजित राय का इतिहास बोध : पुरुषोत्तम अग्रवाल

वरिष्ठ लेखक-आलोचक प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल२५ अगस्त २०१५ को अपने सक्रिय जीवन के साठ साल पूरे कर रहे हैं. इस अवसर पर उनकी तीन किताबें लोकार्पित हो रही हैं - किया अनकिया (प्रतिनिधि संकलन), स्कोलेरिस की...

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परख : कैनवास पर प्रेम (उपन्यास) : विमलेश त्रिपाठी

पुस्तक समीक्षामद्धिम पीड़ा की आंच पर पके प्रेम का रोचक आख्यान                          डॉ. राकेश कुमार सिंहपीड़ा जैसा भाव चाहे जिस स्रोत से अपना आकार ग्रहण करे उससे पड़ने वाला प्रभाव उससे जुड़े स्रोतगत...

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सबद - भेद : मुक्तिबोध की नई प्रवृत्तियाँ : नंद भारद्वाज

कवि –आलोचक नंद भारद्वाज सघन उपचार के बाद घर लौटे हैं, मुक्तिबोध पर लिखी दूधनाथ की आलोचना पुस्तक –‘साहित्य में नई प्रवृत्तियाँ' पर आलेख  पूरा किया है. यह आलेख संवाद है मुक्तिबोध और मुक्तिबोध पर विचार...

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विष्णु खरे : यह भी क्या कोई जीवनी होगी !

यह जानते हुए भी कि अज़हर की भूमिका में इमरान हाशमी हैं, हिन्दुस्तानी क्रिकेटर मुहम्मद अज़हरुद्दीन के जीवन पर आधारित फ़िल्म ‘अज़हर’ आप किन कारणों से देखना चाहेंगे?  क्या अज़हरुद्दीन का जीवन सच में ऐसा नाटकीय...

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सहजि सहजि गुन रमैं : विपिन चौधरी

विपिन चौधरी की कुछ कविताएँ                                _____________________________अभिसारिकाढेरों सात्विक अंलकारों को थामें हवा रोशनी ध्वनि की गति से भी तेज़ भागते मन को थाम  होगी  धीरोचित नायक से...

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मति का धीर : अवधनारायण मुदगल

अवधनारायण मुदगल केवल सारिका के संपादक ही नहीं, एक उम्दा लेखक और बेहतरीन इंसान भी थे. खट्टे-मीठे अनुभवों को समेटे राजकुमार गौतम का स्मृति-लेख. की गल है? .... मुदगल है!...

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हस्तक्षेप : विवेक के हक़ में

विवेक के हक़ में (IN DEFENCE OF RATIONALITY)        प्रो. एम एम कल्बुर्गी को याद करते हुए (5,सितम्बर 2015, जंतर-मंतर.3 से ७ बजे शाम तक)ताकि लोकतन्त्र बचा रहे..._______________________________धर्म और...

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परिप्रेक्ष्य : पुरुषोत्तम @ 60

साठ  के पुरुषोत्तम अग्रवाल- एक पड़ाव...   पिक्चर अभी बाकी है...  तृप्ति वामा समय और समाज की वर्तमान स्थिति और हृदय हीनता के कारण आज का आदमी प्रसन्नता के अवबोध से वंचित है, कि किसी भी सम्वेदनशील मनुष्य...

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सहजि सहजि गुन रमैं : हरे प्रकाश उपाध्याय

सोशल मीडिया से आज आप इंकार नहीं कर सकते, फेसबुक-वाट्सअप आदि से मध्यवर्ग का अब लगभग रोज का सम्बन्ध है. इस पर बनती-बिगडती मित्रताओं से भी सभी परिचित हैं. साहित्य में इसे लेकर कविताएँ- कहानियाँ लिखीं जा...

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परख : पिछड़ा वर्ग और साहित्य

पिछड़ा वर्ग  और साहित्य                अमलेश प्रसादसबसे ज्‍यादा मतदाता हैं, लेकिन राष्‍ट्रीय मुद्दों में हस्‍तक्षेप न के बराबर है.सबसे ज्‍यादा आबादी है, लेकिन सबसे ज्‍यादा असंगठित समाज यही है.सबसे...

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विष्णु खरे : आख़िर इस मर्ज़की दवा क्या है

आख़िर इस मर्ज़की दवा क्या है                       विष्णु खरे अपने भारत महान में तथाकथित ‘अमव्य’ (‘अति महत्वपूर्ण व्यक्ति’,’वी आइ पी’– मुझे इस शब्द से उबकाई आती है -) को कोई भी दावत देना बड़े जोखिम का काम...

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हिंदी में कामकाज : राहुल राजेश

हिंदी केवल साहित्य की भाषा नहीं है वह कामकाज की भी भाषा है, हिंदी के समक्ष जब हम चुनौतियों की चिंता करें तब हिंदी की इस भूमिका को भी गम्भीरता से देखना चाहिए. राहुल राजेश ने विस्तार से हिंदी की इस...

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परिप्रेक्ष्य : आओ, हिंदी- हिंदी खेलें : राजीव रंजन गिरि

आओ, हिन्दी-हिन्दी खेलें                                                 राजीव रंजन गिरिसितम्बर में हिंदी के बारे में जरा जोर से शोर सुनायी पड़ता है. जिधर जाएँ ज्यादातर सरकारी और कुछ गैर सरकारी संस्थाओं...

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हस्तक्षेप : विकल्प की पत्रकारिता : संजय जोठे

भारत में हिंसक-साम्प्रदायिक शक्तियों  के बेखौफ होने का यह (कु) समय है. विचारकों – साहित्यकारों की हत्याएं हो रहीं हैं. संस्थाओं पर जाहिल-कुंदजहन सरदारों की ताजपोशी हो गयी है. प्रगतिशील पत्रकारों को...

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सहजि सहजि गुन रमैं : विष्णु खरे

टर्की के पास डूबे सीरियाई बच्चे ‘आलैन’ की तस्वीर ने पूरी दुनिया को विचलित किया है. इस दुर्घटना में उसका भाई ग़ालिब और माँ रेहाना की भी मृत्यु हो गयी थी. हिंसा और युद्ध के सबसे पहले शिकार मासूम ही होते...

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भूमंडलोत्तर कहानी (९) : दादी, मुल्तान और टच एंड गो (तरुण भटनागर) : राकेश बिहारी

भूमंडलोत्तर कहानी विमर्श के अंतर्गत प्रस्तुत है तरुण भटनागर की कहानी – ‘दादी, मुल्तान और टच एंड गो’ पर आलोचक राकेश बिहारी का आलेख – ‘आरोपित विस्मरण के विरुद्ध स्मृतियों का जीवनराग’.  भारत-विभाजन भारतीय...

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विष्णु खरे : ख़ूनी राष्ट्र-प्रसव से उपजी विवादित महाफ़िल्म

’दि बर्थ ऑफ़ ए नेशन’’ अपनी सिनेमाई-कला में अद्भुत कृति है पर अपनी बनावट में  समस्यामूलक भी. 1915 की इस मूक फ़िल्म को देखना सच में किसी महाकाव्य को पढने जैसा है. मीमांसक और कवि विष्णु खरे जिस तरह से इस...

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स्मरण : वीरेन डंगवाल : विष्णु खरे

रात नही कटती? लम्बी यह बेहद लम्बी लगती है ?इसी रात में दस-दस बारी मरना है जीना हैइसी रात में खोना-पाना-सोना-सीना है.ज़ख्म इसी में फिर-फिर कितने खुलते जाने हैंकभी मिलें थे औचक जो सुख वे भी तो पाने...

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