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दयाशंकर शरण की कविताएं

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दयाशंकर शरण वरिष्ठ पीढ़ी के रचनाकार हैं,इधर उन्होंने नयी पीढ़ी से गज़ब का रचनात्मक संवाद स्थापित किया है,शायद ही कोई लेखक हो जिसको वह पढ़ते न हों और अर्थगर्भित टिप्पणियाँ न करते हों.

दयाशंकर शरण कविताएँ लिखते हैं,इधर की लिखी उनकी कुछ कविताएँ प्रस्तुत हैं.

 

दयाशंकर शरण की कविताएँ

  

 

1)

मेरा घर

 

यह जो मेरा घर है यह भी कोई घर है

अक्सर लोग कहते हैं

लेकिन मैं तो इसी घर में रहता हूँ एक अरसे से

बहुत मजे में और सुख-चैन से

कभी लगा नहीं कि मैं यहाँ क्यों रहता हूँ

अब मैं यह कैसे बताऊँ

कि यह घर तो मैंने ही खुद बनाया है

अपने हाथों से

तिनका-तिनका जोड़कर

 

यह घर जो अपना ठांव है अपनी राम मड़ैया

मेरे ख्वाबों की ताबीर मेरा चिर-आवास

लगता है मानो कई जन्मों का रिश्ता है इससे

 

कल किसी ने व्यंग्य भी किया था

बाहर-भीतर सब तो उघड़ा है नहीं कोई लुकाव-छुपाव

उम्र बीत गयी पर अक्ल ठिकाने नहीं आयी

बिना दीवारों के इस तरह कोई रहता है भला

उपर से कोई छत भी तो नहीं सर ढँकने को निरा आसमान दिखता है

 

यह जो मेरा घर है

यह भी कोई घर है

अक्सर लोग कहते हैं. 

 

 

२)

वह जो अब नहीं दीखती

 

याद आती है सीढ़ियों पर बैठी एक स्त्री

जो अब नहीं दीखती है वहाँ

 

एक समय था

जब भी जाता उस शापिंग मार्केट में

वह दूर से हीं दीख जाती मुझे

अपनी गोद में एक बच्चा लिए

तब हरबार उससे कन्नी काट लिया करता अपनी आँखें दूसरी तरफ़ फेर

और अक्सर वापसी में भी उसे चकमा देकर दूसरे रास्ते से निकल लेता

वह कोरोना के पहले का समय था

 

अब जिन्दगी लौट आयी है फिर से पुराने ढर्रे पर

लेकिन वह स्त्री अब नहीं दीखती है वहाँ

 

उस जगह से गुजरते हुए

अब एक अपराधबोध-सा होता है

कभी कुछ नहीं दिया उसे

 

आँखें अब भी खोजती हैं उस बच्चे को

जिसे लिए रहती थी वह सीढ़ियों पर

जैसे खोजती थीं कई साल पहले दफ्तर जाते रोज की रेल-यात्रा में घर से भागी उस बच्ची को

जो बनारस से भागकर आयी थी उस रेलवे स्टेशन पर

जहाँ मैं रोज उतरता-चढ़ता था

 

और हफ्तों रुकी थी वहाँ के वेटिंग रूम में

लेकिन बाद में मालूम नहीं कहाँ चली गयी.

 

 

3)

माई

 

सोलह साल हुए

इतने समय से वह नहीं है इस पृथ्वी पर

 

वह चली गयी

एक दिन अचानक बिना किसी पूर्व सूचना के

सबको छोड़

यहाँ तक कि अपनी देह भी

जिस देह से इतना लगाव था उसे कि घंटों निहारती अलग-अलग कोणों से अपने कमरे की खिड़की से सटे उस आदमकद आइनें के सामने खड़े होकर

 

क्या उसने पुनर्जन्म ले लिया होगा कहीं             

बाबूजी भी कहाँ रह पाये बहुत दिन उसके जाने के बाद

बस साल भी नहीं लगने दिये

 

क्या वह भी गये होंगे वहीं जहाँ रहती होगी माँ

माँ से तो कभी पटी ही नहीं

जब देखो लड़ते-भीड़ते हीं रहते

फिर क्यों सूख गया उनका जीवन-रस

उसके जाते ही ?

फिर कहाँ होंगे वे !

 

माई ने उस रात सपने में मुझसे शायद झूठ कहा था

मैं तो मुक्त हूँ कबसे मोह-माया सबसे

अब क्यों खोजते हो ?

अब नहीं रहे तुम मेरी आँख का तारा

अब कौन देखने आ रही मैं तुम्हें

 

लेकिन मन नहीं मानता ये सब

मुझे पता है

तुम मुझे अब भी फुसलाती हो ये सब कह-सुनकर

जैसे बचपन में डराया करती थी मुझे खिलाते समय

तुम तो अब भी हो वैसी ही जस-की-तस

 

तुम इतनी निष्ठुर कब से हुई माँ !

कि तुम्हें तनिक भी सुध नहीं कि मैं दो दिनों से तप रहा हूँ बुखार में ! 

 

 

 

४)

यह दु:स्वप्न नहीं

 

मैं आप से सहमत नहीं हूँ

मैंने सीधे और साफ-साफ कहा

लेकिन मेरी असहमति उन्हें नाफरमानी-सी लगी

इसलिए मुझे तत्काल देशद्रोही घोषित कर दिया गया

 

मैंने देखा कोई मेरे पक्ष में खड़ा नहीं था

अखबारनवीस उलटे मुझे ही दोषी ठहरा रहे थे

जनता को सिर्फ़ तालियाँ बजाने की इजाजत थी

लोकतंत्र से गायब था लोक सिर्फ़ दिखाने के दाँत भर रह गये थे

सारे सत्ता संस्थान अब मसखरों और मवालियों से पटे थे

सबसे दयनीय स्थिति में तो अंधभक्त थे

उन्हें वध-स्थल की तरफ धकेला जा रहा था

पर उन्हें इसका तनिक भी भान न था

उलटे वे आरती उतार रहे थे

प्रजा भूखी थी और उन्हें भजन सुनाया जा रहा था

गोदामों में अनाज सड़ रहे थे

देश आकड़ों में बहुत खुशहाल और समृद्ध था

 

विदेशी राष्ट्राध्यक्ष के आगमन पर बगल की झुग्गी-झोपड़ियों को फूलों से ढँका जा चुका था

गंदे बदबूदार नालों में इत्र का छिड़काव हुआ था

 

नये संशोधित संविधान का मसविदा बनकर तैयार था

जिसमें खिलाफ़ बोलने पर राजद्रोह और दंड का प्रावधान था

केंचुल छोड़ते साँप की तरह

तंत्र धीरे-धीरे तानाशाही में बदल रहा था

 

फिर भी कुछ लोग थे जो खुशफहमी के शिकार थे

जनता का दु:ख उन्हें नाटक लगता

शत्रुओं की सोची-समझी चाल

जिसे वे प्रजा-वत्सल और गरीबों का मसीहा मानते थे

वही लुट के नये-नये मसविदों पर हस्ताक्षर कर रहा था

 

सबसे हैरत की बात थी

यह मेरा कोई दु:स्वप्न नहीं था.

 

 

५)

हमारा डर

 

हमारा डर हमें पाठ पढ़ाता है

खुलकर कुछ भी कहना खतरे से खाली नहीं

फूंक-फूंक कर चल रहे हैं सब

हमारा डर हमें गुर सिखाता है

किस तरह बचा जा सकता है किसी भी लफड़े से

हमारा डर हमें रोक लेता है ऐनवक्त

जब सामने वाले अजनबी से

एक गहरे उच्छवास के साथ

हम सिर्फ इतना भर कह पाते हैं

बहुत खराब समय है, भाई साहब !

 

___________________________

दयाशंकर शरण

(१० सितम्बर, १९५९ सीवान) 

नब्बे के दशक से साहित्य लेखन और पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ और कहानियाँ प्रकाशित. मैनेजर पाण्डेय द्वारा संपादित 'सीवान की कवितामें कविताएँ संकलित. एक दशक तक 'अद्यतनपत्रिका में सक्रिय रचनात्मक सहयोग. 

पता :

राजवंशी नगर

पो./जिला-सीवान (बिहार)841226

मोब.-9430480879


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