Quantcast
Channel: समालोचन
Viewing all 1573 articles
Browse latest View live

सिद्धेश्वर सिंह की कविताएँ

$
0
0




















मनुष्य जब मनुष्यता से गिर जाता है, उसकी तुलना पशुओं से हम करते हैं. पर क्या पशु कभी अपनी ‘पशुता’ से गिरा है ? 

आख़िर मनुष्य ने सभ्यता की इस दौड़ में क्या हासिल किया है? कठुआ और उन्नाव में जो कुछ हुआ है उससे तो आदमी होने पर शर्म आने लगी है. सबसे बर्बर कृत तो यह है कि इस क्रूरता के समर्थन में भी लोग बाहर आए. क्या हमारा समाज मनोरोगी हो गया है ?

इतना न गिरो कि तुम्हारा गिरना देखकर सभ्यता शर्मसार हो जाए.


कहते हैं कि कविता मनुष्यता की आवाज़ है. वही हमारी अंतिम शरणस्थली है. हमारी सामूहिक चेतना की उदात्त प्रार्थना.  आज सिद्धेश्वर   सिंह   की   कविताएँ प्रस्तुत हैं.

“दिख रहा है 
कि चुपचाप खड़े हैं पुरखे
और मैं अपराधी की तरह सिर झुकाए 
कुरेद रहा हूँ जमीन
जिस पर वास करता रहा हूँ एक स्त्री के साथ”






सिद्धेश्वर   सिंह   की   कविताएँ                                     







लिखना एक स्त्री पर


एक कविता लिखनी है मुझे स्त्री पर
और देखा तो
लगा कि छूँछा हो गया है समूचा शब्द भंडार

अनुभव हो रहा है  कि किताबों की लिखावट 
उड़ गई है भाप बनकर
और आसमान में 
घुमड़ रहे हैं कलछौंहे मेघ

दिख रहा है 
कि चुपचाप खड़े हैं पुरखे
और मैं अपराधी की तरह सिर झुकाए 
कुरेद रहा हूँ जमीन
जिस पर वास करता रहा हूँ एक स्त्री के साथ

पृथ्वी की पीठ को छू रहा हूँ
हाथों में उभर आए हैं कुछ नीले निशान
समुद्र में डुबो देना चाहता हूँ भाषा को
जो कि उफन रहा है आँसुओं से लगातार

आज का यह दिन है  
शुभकामनाओं के भार से श्लथ
और मेरे हाथ में एक कलम है दर्प से भरी
कवि होने के गुरूर से चूर 

शब्द अदृश्य हैं
विचारों की वीथी में कोई हलचल भी नहीं
फिर भी
कविता लिखनी है मुझे स्त्री पर

एक अजब ज़िद है यह भी
पिछली हर बार की तरह ही
कितनी बेतुकी कितनी अश्लील !




शब्दकोश 

गर्मियों में लगभग सूख जाती है नदी
पुल पर खड़े होकर देखो तो
एकसार दिखाई देते हैं दोनों ओर के दो पाट
जहाँ होना चाहिए था जल वहाँ अब रेत है
जहाँ होना चाहिए था जलचर को विहार करते
वहाँ अब काँस है सरपत है और उड़ती हुई धूल है

यह लगभग सूखना शब्द भी इतना क्रूर है 
कि इसे मान लिया जाना चाहिए सूख जाने का पर्याय
मैं चुपचाप शब्दकोश उठाता हूँ 
और काट देता हूँ सदानीरा शब्द को लगभग निर्दयता से
कागज की काया पर फैल जाती है एक लाल लकीर
जैसे कि धीरे -धीरे रिस रहा हो रक्त

नदी को सबसे ज्यादा प्रतीक्षा रहती थी कभी बारिश की
बारिश को देख कर कभी उमगता था नदी का मन
अब जबकि शुष्क होते चले गए  हैं सारे कुएं
पाट कर मकान बना दिए गए हैं सब ताल - पोखर
तबसे बारिश है कि वह हो गई है लगभग बारिश
मेघ हो गए हैं लगभग मेघ
और मैं  चिंतित हूँ कि किसी दिन अचानक ही
कंठ में अटकी हुई भाषा भी न हो जाय लगभग भाषा

मैं एक सूखी हुई हुई नदी के बेमकसद पुल पर
उम्मीद की पतंगों का गट्ठर लिए खड़ा हूँ
यह एक आदिम ज़िद की अकड़ है या कि कुछ और
आसमान में पूरी बेशर्मी से 
चमक रहा है दोपहर का दर्प भरा सूर्य
हवा ठिठकी हुई है किसी अनिष्ट के भय से
फिर भी नदी है कि बार - बार दे रही है दिलासा 

मैं फिर से उठाता हूँ शब्दकोश
नदी शब्द का एक और अर्थ दिखता है - आशा





चाँद

कुल कितने पर्यायवाची हैं
चाँद शब्द के?

देर हुई
खंगाल रहा हूँ पोथियाँ
बांच रहा हूँ पत्रा - पुरान
कलम पकड़ने वाले हाथों से
उलीच रहा हूँ 
भाषा के पोखर को बार - बार।

आर्द्र होती जा रही है गहराती हुई रात
झर कर हल्का हो गया  है हरसिंगार
जो अब भी हरा है स्मृति के उपवन में।

बंद कमरे में 
करता हूँ अनुमान
कि चलते - चलते चंद्रमा ने भी 
नाप लिया होगा आधा आकाश
और मैं हूँ  
कि लिख नहीं पा रहा हूँ 
एक बस एक  छोटा -सा नाम।






शोले

वह बार - बार बताती है अपना नाम
बगैर पूछे भी
बार - बार पूछता है जय -
     तुम्हारा नाम क्या है बसंती ?

बसंती को आदत नहीं है बेफिजूल बात करने की
उसके पास पड़े हुए हैं ढेर सारे काम
करना है अपनी आजीविका का ईमानदार उपाय
ध्यान रखना है मौसी और धन्नो का
खबर रखनी है  रामगढ़ की एक -एक बात की
बचना है गब्बर की गंदी निगाह से
और टूटकर प्रेम भी तो करना है बिगड़ैल बीरू से.

अपनी रौ में बीत रहा है वक़्त
कब का उजड़ गया सिनेमा का सेट
संग्रहालयों में सहेज दिए गए पोस्टर
इतिहास की किताबों में 
दर्ज हो गए घोड़े दौड़ाने वाले डकैत
टूट गई मशहूर जोड़ी भी सलीम जावेद की 
दोस्ती न तोड़ने की प्रतिज्ञा वाले गीत पड़ गए पुराने
और तो और अब कोई दुहाई भी नही देता नमक की।

उजाड़ हो गए जुबली मनाने वाले टॉकीज
घिस गईं पुरानी रीलें रगड़ खाकर
अब तो दर्शक भी बचे नहीं वे पुराने खेवे के
जो मार खाते गद्दार को देखकर 
बजाते थे तालियाँ जोरदार।

क्या करूँ
मुझे अब भी सुनाई देती है 
एक बूढ़े की  प्रश्नाकुल आवाज 
      - इतना सन्नाटा क्यों है भाई ?
अब भी रह - रह कर गुर्राता है कोई खलपात्र
      - ये हाथ मुझे दे दे ठाकुर !
सहसा काँप जाते हैं मोबाइल थामे मेरे हाथ
और रात में कई - कई बार उचट जाती है नींद भी बेबात.




यूटोपिया


कोई बात तो हो 
जिस पर बना रहे यकीन
कोई विचार तो हो
जिससे सोच की धार न हो कुन्द
कोई तो हो 
जिससे मिला जा सके सहज होकर
कोई जगह तो हो
जहाँ पहुंचकर पछतावा न हो पैरों को.

बस
एक शब्द भर बना रहे संशय
और भाषा में 
अनुपस्थित हो जाय उसका इस्तेमाल.

सोचो कि ऐसा हो संसार
कहो  कि ऐसा हो संसार
करो कुछ 
कि सिर्फ सपना न हो यह संसार.


-----
 
सिद्धेश्वर सिंह
11  नवम्बर 1963, 
गाँव मिर्चा, दिलदार नगर, जिला गा़जीपुर (उत्तर प्रदेश)

  
प्रकाशन : विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कवितायें , कहानियाँ, समीक्षा  व शोध आलेख प्रकाशित. भारतीय लोक भाषा सर्वेक्षण की टीम के सदस्य के रूप में उत्तराखंड की थारू भाषा पर कार्य.विश्व कविता से अन्ना अख़्मतोवा, निज़ार क़ब्बानी, ओरहान वेली, वेरा पावलोवा , हालीना पोस्वियातोव्स्का , बिली कालिंस और अन्य महत्वपूर्ण कवियों की कविताओं के अनुवादकविता संग्रह 'कर्मनाशा' 2012  में प्रकाशित.
एक कविता संग्रह व अनुवाद  की दो पुस्तकें शीघ्र प्रकाश्य.   

फिलहाल : उत्तराखंड प्रान्तीय उच्च शिक्षा सेवा में एसोशिएट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत.  

संपर्क : ए- 03, आफीसर्स कालोनी, टनकपुर रोड
अमाऊँ, पो० - खटीमा
जिला - ऊधमसिंह नगर  ( उत्तराखंड ) पिन :262308 मोबाइल - 9412905632

sidhshail@gmail.com 




भाष्य : मुक्तिबोध : अन्तः करण का आयतन : शिव किशोर तिवारी

$
0
0


शिव किशोर तिवारी (१६ अप्रैल १९४७) का कविता की दुनिया में आगमन किसी घटना की तरह अचानक से हुआ है.इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदी में एम. ए. करने के बाद साहित्य से उनका लगाव  सामने नहीं आया था.  अब जब वह सामने है तो लगता है कि इन बीच के वर्षों में वह हिंदी, असमिया, बंगला, संस्कृत, अंग्रेजी, सिलहटी और भोजपुरी की कविताओं की दुनिया में भूमिगत होकर रमें हुए थे.
  
कविताओं का अनुवाद, उनकी व्याखाएं और आलोचना  के उनके उद्यम ने उन्हें आज आवश्यक बना दिया है. समालोचन पर ही आपने बंगला, असमिया आदि भाषाओं से हिन्दी में  उनके महत्वपूर्ण अनुवाद पढ़े हैं. निराला की कविता पर उनकी व्याख्या पढ़ी है. आज मुक्तिबोध की कविता ‘अन्तःकरण का आयतन’ पर उनका  यह आलेख आपके लिए प्रस्तुत है.

आज शिव किशोर तिवारी का  जन्म दिन है. अब वह ७१ साल के हो गए हैं.
समालोचन के पाठकों की तरफ से जन्म दिन की बहुत- बहुत बधाई.

लेख पर आपकी प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा है. 



कविता से होकर : अन्तःकरण का आयतन
शिव किशोर तिवारी

मोनिका कुमार की कविताएँ (पंजाबी)

$
0
0



कवि दो अलग भाषाओँ में कविताएँ लिख रहा हो तो दोनों तरह की कविताओं में संवेदनात्मक, वैचारिक और शिल्पगत अंतर होंगे. क्या ये अंतर भाषा के हैं, भाषा के पाठकों को ध्यान में रखने से क्या कविता का चेहरा बदल जाता है ? क्या शब्द ही अर्थ गढ़ते हैं ?

मोनिका कुमार समकालीन ‘हिंदी’ कविता की एक पहचानी जाने वाली कवयित्री हैं. हिंदी के अलावा पंजाबी में भी कविताएँ लिखती हैं. समालोचन पर आपने उनकी हिंदी कविताएँ पढ़ी हैं, आज उनकी कुछ पंजाबी कविताओं का उन्हीं के द्वारा किया गया अनुवाद प्रस्तुत है. 






मोनिका  कुमार  की  कविताएँ                       



काला कैन्टीन वाला

लंबे लंबे क़दम रखता
किसी आदमी से बात कर रहा
काले को उस दिन मैनें बस अड्डे से निकलते हुए देखा

काला बस अड्डे पर !
काले को वहां देखकर मैं हैरान रह गई
काले को मैनें हमेशा कैन्टीन में देखा है
समोसे, ब्रैड पकौड़े, चाय और राजमांह चावल परोसते हुए

काला राशन के बढ़ते हुए दाम की चिंता और शिकायत करता रहता है 
लेकिन किसी कार्यक्रम में खाने वालों की गिनती बढ़ जाए
तो खींच तान कर मौक़ा संभाल लेता है  
प्रोफ़ेसरों की तीस पच्चीस साल की नौकरी की विदाई पार्टी की क़ीमत
काला दस मिनट में निकाल देता है

चौकन्ना और चिंतित
ठेकेदारी के झमेले में विवश
कैन्टीन में काम करने वाले प्रवासी लड़कों से काला हिंदी में बात करता है
काला हास्यस्पद पर सुघड़ व्यापारी है
उसे पता है कौन चाय में कितनी शक्कर डालता है
वह मतलब और बेमतलब की चाय का मतलब अच्छी तरह समझता है
पर इन सब तथ्यों का हिसाब मन में रखकर वह अपना समय नहीं ख़राब करता
काले के पास इतनी सूचनाएं हैं
कि वह लेखक बनने के बारे में सोच सकता है
पर काला सुघड़ सयाना है
वह सिर नीचे करके चुपचाप तेल की महक वाली अपनी गुच्छा मुछा कॉपी में
रोज़ की देनदारी और उधारी लिखता है

यह सब तो ठीक है
पर काला बस अड्डे पर !
काला उस आदमी से क्या बात कर रहा था ?
बेशक काला बस अड्डे जा सकता है
बल्कि शहर में कहीं भी आ जा सकता है
फिर भी काले को बस अड्डे में देखने से
कोई भ्रम टूट गया है
और काला मेरे लिए एक अजनबी बन गया है.





ईंटों की चिनाई

छत पर पड़े सामान का कोई वली ना वारिस है 
ये गिरता लुढ़कता कई सालों तक यहीं पड़ा रहेगा
चमड़े का टूटा हुआ अटैची, कांच के कप प्लेट
लोहे की कुर्सी, प्लास्टिक की बाल्टी
और छोटा मोटा बहुत कुछ
कबाड़ी के पास इसे बेचने की बात बनते बनते ढह जाती है
छत पर रखे गमलों में कोई पानी नहीं डालता
फिर भी इस में उग आई घास हरी रहती है  

इस छत को कोई नहीं बुहारता
पर यह साफ़ रहती है
हालाँकि सुंदर नहीं दिखती
यहाँ पड़ा सामान पड़ा पड़ा और भुरभुराता रहता है
बाल्टी का गुलाबी रंग उड़ गया है
पर बाल्टी के कोने में कटोरे जितनी जगह है
जिस में बारिश का पानी जमा हो जाता है
लोहे की कुर्सी की बाँह टूटी पड़ी है
पर एक दुबला बच्चा इस पर बैठ सकता है
अटैची का एक बटन अभी भी लग रहा है
जैसे रीझ से रीत गए शरीर में
बहुत धीरे पर दिल धड़कता रहता है

घर के अंदर इन चीज़ों की अब ज़रूरत नहीं है
फिर भी ये चीज़ें तुरंत नहीं मर जातीं
दम दम ख़त्म होकर अपना जीवन पूरा करती हैं

छत की ईंटों की चिनाई में राग बजता रहता है
इंतज़ार का मद्धम राग
इसके पास जा कर सुनो
तो लगता है
शरारती बच्चे छत पर ज़ोर ज़ोर से कूद रहे हैं.





दोपहर होने तक

दोपहर होने तक
चेत की हवा के टोने से
मुझे झपकी आने लगी थी
झूलते हुए सिर को हाथ से टेक जो दी
तो अचानक मेरे हाथों से लहसुन की गंध आई
हाथ की गर्मी से यह गंध और गहरी हो गई
लेकिन लहसुन की गंध ने मुझे होश लौटा दी 

मुझे धीरे धीरे सब याद आ गया
छतों की दीवारें छोटी थीं   
मेरे जैसे क़द का मनुष्य भी आसानी से दीवारें टाप सकता था
हमारे पड़ोसी दिन के समय मिलनसार थे
लेकिन संध्या का टोना सभी को बदल देता था
माएँ बच्चों को गलियों से घसीट कर घरों के अंदर ले जाती थीं
मुझे याद गया
ड्योढ़ी में शाम को साईकल निष्प्राण होकर गिर जाते थे
और पिता
पिता लौट कर घर को मेहमान की तरह देखते थे
बच्चे सुबह से कुछ बड़े हो गए थे
लहसुन की बघार से सीझ रही दाल की महक छत तक पहुँच जाती थी
और हम बरामदे में बैठ कर रोटी खाने लगते. 





जुगनू

गर्मी की एक रात
उड़ते उड़ते एक जुगनू मेरे कमरे में घुस आया
अँधेरे में जलता बुझता जुगनू
घुसते ही कमरा नापने लगा था

हवा के बिना
यह रात काली खोह थी
पसीने में भीगी मैं
कमरे में पसरे सेंक को सूंघ रही थी
इस रात का हासिल सिर्फ ताप था
क्यूंकि गर्मी ने कमरे की हर चीज़ कील रखी थी
सेंक के तलिस्म में
मैं चमत्कार का इंतज़ार कर रही थी

इतने में कमरे में जुगनू घुस आया
उसे किताब के नीचे दबा कर मैनें बत्ती जलाई
जलता बुझता जुगनू कितना आम कीड़ा था!
मैं हैरान हुई
यह अद्भुत लौ इस निरीह देह में जल रही थी

डरता, काँपता और अपने पंख फड़फड़ाता
जुगनू मेरे जैसा ही स्तब्ध प्राणी था

सेंक के पहरे में
जुगनू की हाज़िरी में
रात का चमत्कार होने लगा था
मैंने जुगनू के ऊपर से किताब हटा दी
दीप्त कमरे को छोड़ कर जुगनू बाहर उड़ गया.




शहर का मोह

जिस दिन शहर छोड़ कर कुछ दिन बाहर जाना होता है
उसी दिन शहर का मोह जाग जाता है
अचानक याद आता है
यहाँ का गुड़ियों का संग्रहालय तो मैनें अभी देखा नहीं
बड़ा डाक घर नहीं, यहाँ का दशहरा नहीं
इसी उम्मीद में
कि आगे चल कर मन ख़ाली और समय खुला होगा
और शायद शहर भी दूध का भरा हुआ गिलास है
जिसे घूँट घूँट पीना ठीक रहेगा

घूँट घूँट पीते हुए भी कई साल बीत गए
डर भी लगता है
कि सारा दूध पी लिया
तो यहाँ से भी अन्न जल उठ जाएगा
कोई शहर जब अपना बन जाता है
तो लगता है यहाँ से दूर चले जाने का वक़्त आ गया है

मेरी रिक्शा स्कूल के बच्चों की बस की बगल से निकली
तो बस की खिड़की से एक बच्चा दिखा
उसके हाथ पर पट्टी बंधी हुई थी
खेल कर चूर हुआ बच्चा मूर्ति बना सीट पर बैठा था  
मूर्ति जो दिखने में भारी और सुंदर लगती है
और जब हाथों में पकड़ो
तो पता चलता है यह कितनी हल्की और कीमती है
उसे देखकर  
मेरे मोह को ममता की राह मिल गई

स्कूल की बस जल्दी से आगे निकल गई
मेरी रिक्शा भी बस अड्डे पहुँच गई
यह सोचते हुए मैं भी अपनी सीट पर बैठ गई
उस बच्चे को तो ठीक से अभी देखा भी नहीं.
_____________________

ये कविताएँ मैंने पंजाबी में लिखीं थी, इन में से कुछ कविताएँ पंजाब और पश्चिमी पंजाब के समकालीन लेखन को एक जगह लाने की नियत से शुरू की गई पंजाबी पत्रिका 'वाहगा'में 2017में छपी थीं. कवितायों का हिंदी में अनुवाद मैनें समालोचन के लिए किया है.” 

मोनिका कुमार
अंग्रेज़ी विभाग
रीजनल इंस्टीच्यूट ऑफ इंग्लिश
चंडीगढ़.
09417532822 /turtle.walks@gmail.com
________
मोनिका कुमार की कुछ कविताएँ यहाँ भी पढ़ें १ . / ३  

गुरप्रीत की कविताएँ (पंजाबी)

$
0
0







पंजाबी भाषा के चर्चित कवि गुरप्रीत की चौदह कविताओं का हिंदी अनुवाद रुस्तम सिंह ने कवि की मदद से किया है.

हिंदी के पाठकों के लिए इतर भाषाओँ के साहित्य का प्रमाणिक अनुवाद समालोचन प्रस्तुत करता रहा है, इसी सिलसिले में गुरप्रीत की ये कविताएँ हैं. विषय को कविताओं में बरतने का तरीका सधा हुआ है. ये कविताएँ बड़ी गहरी हैं और इनमें मनुष्यता की गर्माहट है. हिंदी में महाकवि ग़ालिब पर अच्छी–बुरी तमाम कविताएँ लिखी गयीं, पर इस कवि की ‘ग़ालिब की हवेली’ कविता बांध लेती है. एक कवि को दूसरे कवि से इसी तरह मिलना चाहिए.

गुरप्रीत की इन कविताओं के लिए कवि रुस्तम का आभार.   




गुरप्रीत  की  कविताएँ                             
(पंजाबी से अनुवाद : कवि और रुस्तम सिंह द्वारा)


रात की गाड़ी 
अभी-अभी गयी है
रात की गाड़ी 
मैं गाड़ी पर नहीं 
उसकी  कूक  पर चढ़ता हूँ
मेरे भीतर हैं 
असंख्य स्टेशन  
मैं कभी
किसी पर उतरता हूँ
कभी किसी पर







पत्थर 
एक दिन 
नदी किनारे पड़े पत्थर से 
पूछता हूँ 
बनना चाहोगे 
किसी कलाकार के हाथों 
एक कलाकृति
फिर तुझे  रखा जाएगा 
किसी आर्ट गैलरी में 
दूर-दूर से आयेंगे लोग तुझे देखने 
लिखे जायेंगे 
तेरे रंग रूप आकार पर असंख्य लेख
पत्थर हिलता है 
ना ना
मुझे पत्थर ही रहने दो
हि  ता  पत्थर
     ना   कोमल  
इतना तो मैंने कभी 
फूल भी नहीं देखा






ग़ालिब की हवेली 
मैं और मित्र कासिम गली में 
ग़ालिब की हवेली के सामने 
हवेली बन्द थी 
शायद चौकीदार का
मन नहीं होगा
हवेली को खोलने का  
चौकीदार, मन और ग़ालिब मिलकर 
ऐसा कुछ सहज ही कर सकते हैं 
हवेली के साथ वाले चुबारे से
उतरा  एक  आदमी और बोला ---
हवेली को उस जीने से देख लो  
उसने सीढ़ी की तरफ इशारा किया 
जिस से वो उतर कर आया था 

ग़ालिब की हवेली को देखने के लिए
सीढ़ियों पर चढ़ना कितना ज़रूरी है  

पूरे नौ वर्ष रहे ग़ालिब साहब यहाँ 
और पूरे नौ महीने वो अपनी माँ की कोख में  

बहुत से लोग इस हवेली को
देखने आते हैं  
थोड़े दिन पहले एक अफ्रीकन आया 
सीधा अफ्रीका से 
केवल ग़ालिब की हवेली  देखने
देखते-देखते रोने लगा
कितना समय रोता रहा 
और जाते समय
इस हवेली की मिट्टी अपने साथ ले गया  

चुबारे से उतरकर आया आदमी
बता रहा था  
एक साँस में सब कुछ

मैं देख रहा था उस अफ्रीकन के पैर  
उसके आंसुओं के शीशे में से अपना-आप 
कहाँ-कहाँ जाते हैं पैर 
पैर उन सभी जगह जाना चाहते हैं
जहाँ-जहाँ जाना चाहते हैं आंसू  

मुझे आंख से टपका हर आंसू
ग़ालिब की हवेली लगता है.






मार्च की एक सवेर 

तार पर लटक रहे हैं
अभी 
धोये 
कमीज़ 
आधी बाजू के
महीन पतले 
हल्के रंगों के
पास का वृक्ष
खुश होता है
सोचता है
मेरी तरह
किसी और शय पर भी
आते हैं पत्ते नये.






कामरेड
सबसे प्यारा शब्द कामरेड है
कभी-कभार 
कहता हूँ अपने-आप को 
कामरेड  
मेरे भीतर जागता है
एक छोटा सा कार्ल मार्क्स 
इस संसार को बदलना चाहता      
जेनी के लिए प्यार कविताएँ लिखता
आखिर के दिनों में बेचना पड़ा 
जेनी को अपना बिस्तर तक
फिर भी उसे धरती पर सोना 
किसी गलीचे से कम नहीं लगा 
लो ! मैं कहता हूँ  
अपने-आप को कामरेड
लांघता हूँ अपने-आप को
लिखता हूँ एक और कविता
जेनी को आदर देने के लिए... 
कविता  दर कविता 
सफर में हूँ मैं ... 







पक्षियों को पत्र

मैंने पक्षियों को पत्र लिखना है    
मैंने पक्षियों को पत्र लिखना है
मैंने पक्षियों को पत्र लिखना है
मैंने पक्षियों को पत्र लिखना है
मैंने पक्षियों को पत्र लिखना है
मैंने पक्षियों को पत्र लिखना है
मैंने पक्षियों को पत्र लिखना है
मैंने पक्षियों को पत्र लिखना है 
लाखों करोड़ों अरबों खरबों बार लिखकर भी
नहीं लिख होना मेरे से
पक्षियों को पत्र. 







प्यार
मैं कहीं भी जाऊँ
मेरे पैरों तले बिछी होती है
धरती
मैं धरती को प्यार करता हूँ
या धरती करती है मुझे
क्या इसी का नाम है प्यार
मैं कहीं भी जाऊँ
मेरे सर पर तना होता है
आकाश

मैं आकाश को प्यार करता हूँ
या आकाश करता है मुझे
प्यार धरती करती है आकाश को
आकाश धरती को
मैं इन दोनों के वीच
कौन हूँ
कहीं इन दोनों का
प्यार तो नहीं.







ख्याल
अभी तेरा ख्याल आया
मिल गयी तू
तू मिली
और कहने लगी
अभी तेरा ख्याल आया
और मिल गया तू
हँसते-हँसते
आया दोनों को ख्याल
अगर न होता ख्याल
तो इस संसार में
कोई कैसे मिलता
एक-दूसरे को...






नींद
क्या हाल है
हरनाम*आपका
थोड़ा समय पहले
मैं आपकी हथेली से
उठाकर ठहाका आपका
सब से बच-बचाकर
ले आया   
उस बच्चे के पास
जो गयी रात तक
साफ कर रहा है
अपने छोटे-छोटे हाथों से
बड़े-बड़े बर्तन
मुझे लगता है
इस तरह शायद
बच जाएँ उसके हाथ
घिस  जाने  से
यह जो नींद भटक रही है
ख़याल में
ज़रूर इस बच्चे की होगी 
क्या हाल है
हरनाम आपका ...
* पंजाबी का अनोखा कविजिसके मूड-स्केप अभी भी असमझे हैं. 








पिता
अपने-आप को बेच
शाम को वापस आता घर
पिता
होता सालम-साबुत  
हम सभी के बीच बैठा
शहर की कितनी ही इमारतों में
ईंट-ईंट हो चिने जाने के बावजूद
अजीब है
पिता के सब्र का दरिया  
कई बार उछल जाता है
छोटे-से कंकर से भी
और कई बार बहता रहता है
शांत 
तूफानी ऋतु में भी
हमारे लिए बहुत कुछ होता है
पिता की जेब में
हरी पत्तियों  जैसा
साँसों की तरह
घर आजकल
और भी बहुत कुछ लगता  है
पिता को
पिता तो पिता है
कोई अदाकार नहीं
हमारे सामने ज़ाहिर हो ही जाती है
यह बात 
कि बाज़ार में
घटती जा रही है
उसकी कीमत 
पिता को चिन्ता है
माँ के सपनों की
हमारी चाहतों की
और हमें चिन्ता है
पिता की 
दिनों-दिन कम होती
कीमत की...  







आदि काल से लिखी जाती कविता
बहुत पहले
किसी युग में
लगवाया था मेरे दादा जी ने
अपनी पसन्द का
एक खूबसूरत दरवाज़ा
फिर किसी युग में उखाड़ दिया था
मेरे पिता ने वो दरवाज़ा
लगवा लिया था
अपनी पसन्द का एक नया दरवाज़ा
घर के मुख्य-द्वार पर लगा
अब मुझे भी पसन्द नहीं
वो दरवाज़ा.
   

मकबूल फ़िदा हुसैन 
एक बच्चा फेंकता है 
मेरी ओर 
रंग-बिरंगी गेंद 
तीन टिप्पे खा 
वो गयी 
वो गयी
मैं हँसता हूँ अपने-आप पर 
गेंद को कैच करने के लिए 
बच्चा होना पड़ेगा 


नंगे पैरों का सफ़र 
ख़त्म नहीं होगा 
यह रहेगा हमेशा के लिए
लम्बे बुर्श का एक सिरा 
आकाश में चिमनियाँ टाँगता
दूसरा धरती को रँगता है
वो जब भी ऑंखें बन्द करता 
मिट्टी का तोता उड़ान भरता    
कागज़ पर पेंट की हुई लड़की
हँसने लगती



नंगे पैरों के सफ़र में
मिली होती धूल-मिट्टी की महक 
जलते  पैरों के तले
फैल जाती हरे रंग की छाया
सर्दी के दिनों में धूप हो जाती गलीचा
नंगे पैर नहीं डाले जा सकते
किसी पिंजरे में
नंगे पैरों का हर कदम
स्वतंत्र  लिपि का स्वतंत्र वरण
पढ़ने के लिए नंगा होना पड़ेगा
मैं डर जाता 



एक बार उसकी दोस्त ने 
तोहफे के तौर पर दिये दो जोड़ी बूट 
नर्म  लैदर
कहा उसने 
बाज़ार चलते हैं 
पहनो यह बूट
पहन लिया उसने
एक पैर में भूरा 
दूसरे में काला
कलाकार  की यात्रा  है यह



शुरूआत रंगो की थी 
और अन्त भी 
हो गये रंग 
रंगों पर कोई मुकदमा नहीं हो सकता 
हदों-सरहदों का क्या अर्थ  रंगों के लिए
संसार  के किसी कोने में 
बना रहा होगा कोई बच्चा सियाही
संसार के किसी कोने में
अभी बना रहा होगा
कोई बच्चा
अपने नन्हे हाथों से
नीले काले घुग्गू घोड़े
रंगों की कोई कब्र नहीं होती.







अन्त नहीं
मैं तितली पर लिखता हूँ एक कविता 
दूर पहाड़ों से
लुढ़कता पत्थर एक
मेरे पैरों के पास  टिका 
 मैं पत्थर पर लिखता हूँ एक कविता
बुलाती है महक मुझे 
देखता हूँ पीछे 
पंखुड़ी खोल गुलाब 
झूम रहा था टहनी के साथ 
मैं फूल पर लिखता हूँ एक कविता
उठाने लगा कदम 
कमीज़ की कन्नी में फँसे 
काँटों ने रोक लिया मुझे
टूट  जायें काँटे
बच-बचा कर निकालता हूँ
काँटों से बाहर
कुर्ता अपना 
मैं काँटों पर लिखता हूँ एक कविता
मेरे अन्दर से आती है एक आवाज़ 
कभी भी खत्म नहीं होगी धरती की कविता.







बिम्ब बनता मिटता
मैं चला जा रहा था
भीड़ भरे बाज़ार में
शायद कुछ खरीदने
शायद कुछ बेचने 
अचानक एक हाथ
मेरे कन्धे पर आ टिका
जैसे कोई बच्चा
फूल को छू रहा हो
वृक्ष एक हरा-भरा
हाथ मिलाने के लिए
निकालता है मेरी तरफ
अपना हाथ
मैं पहली बार महसूस कर रहा था
हाथ मिलाने की गर्माहट 
वो मेरा हाल-चाल पूछकर 
फिर मिलने का वचन दे 
चल दिया 
उसका घर कहाँ होगा
किसी नदी के किनारे 
खेत-खलिहान के बीच
किसी घने जंगल में
सब्जी का थैला 
कन्धे पर लटका 
घर की ओर चलते 
सोचता हूँ मैं
थोडा समय और बैठे रहना चाहिए था मुझे

स्टेशन की बेंच पर.
__

गुरप्रीत (जन्म १९६८) इस समय के पंजाबी के महत्वपूर्ण कवि हैं. अब तक उनके चार कविता संग्रह प्रकाशित हुए हैं. अन्तिम संग्रह २०१६ में प्रकाशित हुआ. इसके इलावा उन्होंने दो पुस्तकों का सम्पादन भी किया है. उन्हें प्रोफेसर मोहन सिंह माहर कविता पुरस्कार (१९९६) और प्रोफेसर जोगा सिंह यादगारी कविता पुरस्कार (२०१३) प्राप्त हुए हैं. वे पंजाब के एक छोटे शहर मानसा में रहते हैं.

फ़कत तुम्हारा हरजीत

$
0
0


















हरजीत सिंह (1959-22अप्रैल, 1999) की शख़्सियत और शायरी के सम्बन्ध में तेजी ग्रोवर की मदद से समालोचन की प्रस्तुति (4 मार्च 2018) से हुआ यह कि उनके चाहने और उनके लिखे को सहेजकर रखने वाले सामने आ गए. योजना यह बनी कि उनकी सभी ग़ज़लें और ख़त एकसाथ प्रकाशित हों. तेजी जी के पास चीजें पहुँच रही हैं.  

उन्हें गए १९ वर्ष हो गए हैं. उनको याद करते हुए आज  कुछ ख़त और उनकी कुछ ग़ज़लें पढ़ते हैं.




फ़कत    तुम्हारा   हरजीत           





(चित्र द्वारा रुस्तम सिंह)



प्रैल 22, 1999हरजीत से बिछुड़ जाने की तारीख़, आज के दिन, ठीक उन्नीस बरस के बाद भी यूं टीसती है जैसे यह आज सुबह की ही बात हो...मेरे कॉलेज के दफ्तर में आया हुआ उस  एक मित्र का फ़ोन जो उस घड़ी हरजीत के बारे में मुझसे कम से कम एक बात ज़्यादा जानता था. लेकिन कम से कम आज के दिन मैं भी उस टीस को इजलाल मजीद के तस्सवुर में ढाल अपने इस कम्बख्तदोस्त को आप सब के बीच लौटा लाने की कोशिश करके देखती हूँ. हरजीत को याद करते हुए मजीद साहब फ़रमाते हैं:

कोई मरने से मर नहीं जाता
देखना  वो  यहीं-कहीं  होगा

हरजीत सिंह के सभी दोस्त चाहें तो इजलाल मजीद के हरजीत को अपने माहौल के किसी दिलफ़रेब कोने में शाम की महफ़िल जमाए वक्तन-बेवक्तन अपने-अपने हरजीत की तरह महसूस कर सकते हैं. और फिर भला भूल भी कौन सकता होगा नज़ाकत से काटे गये उस हरजीत सिंह-स्पेशल सलाद को जिसके सहारे सांसों की माला में ग़ज़लें पिरोए सुबह के चार तो वे बजाकर ही रहते थे कमोबेश!

समालोचन के पाठकों के साथ हरजीत के लिखे चार ख़त और इसके अलावा ग्यारह ग़ज़लें साझा कर रही हूँ, जो उनके संग्रह एक पुलसे मैनें चुनी हैं. जो क़िरदार हरजीत के लिखे इन खतों में आये हैं, वे किरदार ही हैं, जैसा कि हरजीत उन्हें समझते थे या फिर समझने की फिराक में रहते थे. रुस्तम को शायद वह फ़िरदौसी के शाहनामा से नमूदार हुआ मानते रहे अंत तक...बाकी क़िरदारों  के नाम आपको इन खतों में मिल जाएँगे. जो आप शायद न बूझ पायें वह बताए देती हूँ: K.B. हैं कृष्ण बलदेव वैद, जो किसी कारणवश अपने चंडीगढ़ वाले घर को हम कुछ क़िरदारोंका परिचय देना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि चौथा सप्तक के यह देहरादूनी कवि हरजीत के अभिन्न मित्र थे और उन्हीं ने हमारा परिचय हरजीत से करवाया था. खतों में आये बाकी नाम और दोस्त आपकी नज़र में पहले ही से हैं. 

मैं हरजीत के मित्रों को यह जानकारी भी देना चाहती हूँ कि हम सभी के मित्र वीरेन्द्र कुमार बरनवाल ने हरजीत सिंह की शायरी को एक ही जिल्द में लाने का ज़िम्मेदारी ली है, और वे चाहते हैं की हरजीत के कुछ ख़त और उनकी डायरी को भी दीवान-ए-हरजीत में शामिल कर लिया जाए. लिहाज़ा सब दोस्तों से हर क़िस्म की फराखदिली और गुफ़्तगू की दरकार बनी रहेगी. बरनवाल जी के इस काम में मैं हर तरह से शामिल हूँ और अंत तक रहने की कोशिश करूंगी.

गौर फरमाएं कि 22 अप्रैल, 1999 से कुछ ही दिन पहले हरजीत ने एक शेर लिख भेजा था हमें, जैसे इस फ़ानी दुनिया से नजात पा, कोई दूसरा ठीहा-ठिकाना जमा लेने के बाद भी मानो उन्हें रह-रहकर लग रहा हो:

सोचता हूँ  कहाँ  गए  दोनों
मेरी साइकिल वो मेरा देहरादून. 
_________
तेजी ग्रोवर 






हरजीत के लिखे  ख़त  







जुलाई 91 (पोस्टकार्ड)

तेजस, कभी भी आ टपक सकता हूँ इतवार के आसपास --  तूने लिखा है इस बीच इतना कुछ घट गया,  यही सत्य है और यही माया है, लगता है कुछ जुड़ गया है मगर सब कुछ घट जाता है जानने वाले के लिए -फ़िरदौसी के शाहनामा से निकलकर रुस्तम –- यहाँ चंडीगढ़ के टैरेस तक कब पहुँचा -एक शेर के साथ –-

तुम जो बैठे हो कुछ जगह रखकर
क्या तुम्हारे किसी ने    आना है
(हरजीत)                            






तेजी,
अवधेश ने तुम्हारा ख़त पढ़वाया, मैंने उस शाम को २ बजे से रात २:३० बजे तक की सारी बाते क्रम से सुना दी, अवधेश को कई बातों का पता नहीं था जिसे मैंने भी साथ निभाने के बावजूद अपने होश की डायरी में साथ साथ उतार लिया था. मैं जिस जगह, जिन वाक़ियात को याद रखने की नीयत से जीता हूँ उन्हें मैं पूरी तरह याद रखता हूँ! बहुत सी बातें हुईं उस शाम की और टुकड़ों में याद उस कविता की, मगर तमाम बातें अभी अधूरी हैं, जैसा कि अवधेश तुम्हे पत्र लिख चुका है तुम वो कविता भेज दो..... मेरा अवधेश के साथ चंडीगढ़ आने का मक़सद सिर्फ़ यही था कि कुछ अच्छे, हम ख़याल, हमनज़र दोस्तों से मुलाक़ात होगी, और मुझे अपने मक़सद में कामयाबी भी मिली है, मैं कतई यह सोचकर नहीं आया था कि चंडीगढ़ में मैं सिर्फ़  ग़ज़ले ही साथ लेकर घूमूं –-

तुम तीनों  का मिलना
, एक यादगार वाक़िया है और रहेगा भी !------तुम्हारे इस ख़त से भी यह बात ज़ाहिर नहीं हो पाई की तुम्हारी वो कविता क्या थी, अब हम दोनों को उसका शिद्दत से इंतजार है ! मैं उस शाम भले ही पहली बार मिला था मगर मैं अपने आपको आप तीनों के बहुत क़रीब पा रहा हूँ –- मुझे तुम्हारीबिजूकाकविता की कुछ पंक्तियां अब भी याद है और याद रहेंगी ----- चिड़िया क्या तेरे बच्चों की चोंच में गेंहू का पूरा खेत आ जायेगा......कुछ इस तरह ही थी !.......

उस ख़त में एक हिस्सा मेरे लिए भी था....उसको पढ़ने के बाद इतना ही कह सकता हूँ, एक छोटी सी मुलाक़ात में तुमने मेरा काफ़ी बड़ा सच Trace कर लिया है ! मानना पड़ेगा कि तुममे किसी को पहचानने की अद्भुत क्षमता है ! उसके लिए शुक्रिया कहने का तक़ल्लुफ़ नहीं कर रहा हूँ ! बाक़ी इतना ज़रूर है कि वो शाम एक अधूरी शाम थी, यहाँ अवधेश और मैं इसी नतीजे पर पहुंचे हैं कि वह शाम एक यादगार मगर अधूरी शाम थी और हमे (हम पांचों को) एक बार फिर उसी तरह बैठना है ! और हमे यक़ीन है कि हम एक शाम फिर उसी तरह बैठेंगे...... Ernest  के collage मैंने Span में उस वक्त देखकर ही पसंद किये थे जब मुझे यह पता नहीं था कि ये Ernest के है, बाद में अब तारीफ़ करना formality होगी –- फिर भी इतने अच्छे और बामानी college के लिए बधाई !......

नज़्म’ –“दीवारें’’ भेज रहा हूँ, अपने अंदाज़ की अकेली नज़्म है अपने तअस्सुरात भेजना, वैसे मेरी कुछ ग़ज़लें है जिनको मैंने दरवाजे’’, “सीढ़ियां’’, “हरा मैदान’’ आदि रदीफ़ो में लिखा है, वो ग़ज़लें नज़्मके काफ़ी क़रीब है, मगर मैं उन्हें नहीं भेज रहा हूँ क्यूंकि तुमने सिर्फ नज़्ममांगी थी ! अतुलवीर मिले तो उन्हें दोस्त का सलाम !

अब एक शेर के साथ इजाज़त......

एहसास के परिंदे, आँखों की सरहदों से
उस पार जा चुके है, जिस पार रोशनी है.





अप्रैल 85 का आख़िरी दिन

तेजी,

एक मुद्दत से लगभग पिछले साल से, जबसे मैंने ख़त लिखने एक तरह से छोड़े हुए से है, एक छूट दे रखी है अपने आपको एक तर्ज़ यह बनायीं कि जब कभी भी किसी दुकान से सामान या कुछ ख़रीदने के बाद छुट्टे पैसों की बजाय मुझे लिफाफा या डाक टिकट या पोस्ट कार्ड मिलेगा मैं उसे ज़रूर लिख दूंगा -- सो सच तो यह है की मन कोई तीन चार दिन पहले से तुझे चिट्ठी लिखने का हो रहा था और कल एक दुकान से चाक मिट्टी और दो ईंच की कीले ख़रीदने पर मुझे रुपयों के साथ एक लिफाफा मिला और आज की शब अपने कमरे में सूफी बैठे हुए (क्यूंकि कल तक कई दिनों से लगातार हो रही थी) यह ख़त-नुमा लफ़्ज़ों को यूँ ही एक काग़ज़ पर जमा करने की प्रकिया चल रही है क्यूंकि लफ़्ज़ अब कम ही जमा हो पाते है –-

एक तो यह कि  गुलाम अली की एक कैसेट जो K.B. वाले मकान में छूट गयी थी, याद आती है, तेरे लहजे की थकान याद आई -- और इस बार की छुट्टियों में कहाँ हो तुम लोग, टीनू की नई Exhibition का क्या हुआ, कई अर्से से बेख़बर चल रहे हैं हम मगर ऐसा लगता नहीं –- अल्बर्ट से कहना कि अब मैं कुछ अजीब चीज़ें जमा करने लगा हूँ !

लोहे की टुकड़े, पत्थर, लकड़ी के टुकड़े, सूखे हुए मशरूम, यानि कि कुछ भी टूटा-फूटा सा अलग सा –- और पता नहीं कोई नई तर्तीब बनेगी या  नहीं मगर उम्मीद सी है ----- हाँ तो लिखना ज़रूर मुख़्तसर ही कि इस बार छुट्टियों में कहाँ हो. दिल्ली जाना हो तो मेरी किताब का हाल या उसकी दशा मालूम करना. वैसे काग़ज़ की कीमतें बढ़ने से किताबों का धंधा अब मंदा पड़ गया. मेरा फ़रवरी तो यूँ ही गुजरा, मार्च में कुछ कारोबार की तरफ़ होने को हुआ ही था कि एक हादसे का शिकार हो कर कुछ दिन आराम करना पड़ा, आंख के क़रीब चोट के निशान अब मौजूद हैं, बाक़ी तो सब भूल चुका हूँ -- हाँ वो टूटा हुआ चश्मा नही सिरहाने के नीचे पड़ा है जिसके काँच से घाव हुआ था –- और अप्रैल में लगभग दो महीने कारोबार से उखड़ने के बाद पाँव जमाने की कोशिश भर रही.

मई इसी तरह गुज़रेगा तब कहीं अपने आप से छुट्टी लूँगा, भटकने की, और लगता है इस बार गढ़वाल के  पहाड़ी इलाकों का बुलावा मिलेगा –- चल देंगे जिधर को पाँव चले ---- छुटकल फुटकल लिखना चलता रहता है, शायरी तो ज़्यादातर बाज़गश्त की शायरी है, अपनी ही बाज़गश्त और कविता के नाम पर Raw ही कुछ पंक्तियों जमा होती रहती हैं. मुझे दरअसल कविता में बात को कविता की  शक्ल में पेश करना नहीं आता –- मैं तो सीधा-सीधा लिख देता हूँ –- और शेर तो चुनने पड़ेंगे अगड़म शगड़म में से शायद यह इंतखाब का काम तेरे हाथों ही होना बेहतर है -मैं ख़ुद अगर अब इंतखाब का काम करूँगा तो शायद ठीक न हो –- मगर अभी तो सब कुछ पुर्जा पुर्जा जमा हो रहा है ----- 

अच्छा, फ़कत ------हरजीत     


तेजी,
इस बार तुम्हें  जितना जाना और समझा, यहाँ लौटने की अगली सुबह आंगन में एक गिलहरी नज़र आई और बेसाख्ता यह ख़याल आया की तेजी तो गिलहरी है –- अब मैं नहीं जानता क्यों --मगर मुझे ऐसा लगा -और मैंने यह बात लिख ली –- अब तुम्हे लिख रहा हूँ इतने दिन बाद ! दरअसल 11 मई को ख़त शुरू किया था, सो अब Flashback :





11-5-83

दस दिन हो चुके हैं आज ख़त शुरू कर रहा हूँ अभी पता नहीं इस ख़त को लिखने में कितने दिन लगेंगे. चंडीगड़ –- शिमला दोनों ने इस बार मुझे इतना लबरेज़ कर दिया कि एक हफ़्ता लगा खुद को दोनों जगहों की यादों के नशे से रिहा कराने में, बड़ी ज़मानतें दीं दिमाग़ ने दिल को, तब कहीं में रिहा हुआ ! आज मौसम इतना खुशगवार है कि बस ------- गर्मियों में बूंदाबांदी और ठंड से भरे दिन. मौसम कुछ ख़ास खतों को लिखवाने के लिए ही ख़ास लोगों तक समेट कर लाता है.

इस बार तुम लोगों से मिलकर पिछले साल अपने आप से किया हुआ वायदा पूरा हुआ बस ! वरना जिस तर्ज़ पर इस साल चल रहा हूँ गोष्ठी को बुलावे पर तो मैं कतई न आता. मैंने तो 1983 से अपने आपको बहुत बदल लिया है. ये गोष्ठियांफोष्ठियां बेमानी लगती हैं मुझे. मैंने तो खुद को खुला छोड़ दिया है अब ! लिखा लिखा न लिखा, एक कॉपी है उस पर जो भी अन्दर से निकलता है लिख कर बड़ी बेक़दरी से उसे भुला देता हूँ कोई मतलब नहीं -कोई चिंता नहीं -बड़ी बेफिक्री से जी रहा हूँ –- 82 ने छपने-छपाने की एक बड़ी मंजिल तय कर दी –- रविवार, आजकल, सारिका, कथन, धर्मयुग और कथादेश –-इन सब में ग़ज़ले आ गयीं  और कुछ छोटी पत्रिकाओं में भी. इस तरह अब गोष्ठियों में ग़ज़ले सुनाने की भी आदत से एकसारता से खुद को अलग कर चुका हूँ. मैं तो कभी सोच भी नहीं सकता कि अगर मेरी किताब छपी तो उस पर इस तरह की गोष्ठी भी हो सकती है –- उस शाममेहंदीरत्ताजी के घर भी कोई दिल से नहीं, बल्कि उनकी इज़्ज़त जो मन में है इस वजह से ग़ज़ले सुनाईं वरना हम दोनों उस शाम जाने कहाँ होते. सिर्फ़ कुछ बहुत ही ख़ास दोस्त रह गए है जिन्हें मैं अपनी चीज़ें सुनाता हूँ (रहूँगा).

यहाँ आकर कारोबार की भी सुनी, तुम्हारी किताब की उस’’ कविता के दोनों पन्नों को चिपका दिया. तीसरे सफ़े पे जो आख़िरी चार पंक्तियां थी उन पर भी एक काग़ज़ चिपका दिया और तुम्हारी किताब पढ़ी –- दो एक कविताओं को छोड़कर जिनकी शुरुआत से मन ही नहीं बना –-- किताब पर अगले किसी पत्र में लिखूंगा अगर तुम चाहोगी तो...... अभी तो पेन्सिल से निशान लगा दिए हैं जगह जगह - - - - - - - - -  

सबसे पहले तो अपनी डायरी में तमाम यादें लिखीं बाक़ायदा, तब कहीं खुद को दोनों शहरों से ख़ाली कर सका. एक बात लिखनी है उस ग़ज़ल के बारे में कि इस पूरे सफ़र में शिमला में ३ मई की आधी रात तक भी ये मोजज़ा.....को कभी अवधेश गुनगुनाने लगता कभी मैं. और हम दोनों उस ग़ज़ल की धुन से अपने आपको अलग नहीं कर सके, इतना ज़्यादा उसने हमको जकड़ रखा था कि ज़रा ख़ामोश हुए और वो धुन.... मैंने तो यहाँ आते ही रात अपनी पसंदीदा ग़ुलाम अली पंजाबी ग़ज़ल सुनी तो कहीं खुद को उस धुन से अलग किया –- इस वक्त भी ख़त लिखते हुए ग़ुलाम अली की कैसेट चल रही है -------

          ख़यालोंख़्वाब हुई हैं मुहब्बतें कैसी 
          लहू में नाच रही हैं ये वहशतें कैसी. 

पहली मई की जागते हुए ग़ज़लों में ही सुबह हो जाने वाली रात इतनी ज़्यादा याद है कि कुछ कहूँ तो क्या –- तुम दोनों को कुछ और क़रीब से जाना. एक वाक़िया लिख रहा हूँ –- अल्बर्ट बीच में कुछ देर के लिए सिगरेट वगैरह लेने गया तो मैंने तुम्हे चांदनीऔर किताब घरवाली ग़ज़ले सुनाई, चांदनी के एक शेर को तुमने बहुत पसंद किया -- कहा कि बड़ा खौफ़नाक शेर है उसे Visualise भी किया कोई Blackbird वाली Poem से भी उसे जोड़ के देखा. कुछ देर में टीनू आया -- तुमने कहा कि चांदनी वाली ग़ज़ल नहीं सुनी तुमने –- इसमें एक शेर है गौर से सुनो –- मैं कुछ नहीं कहूँगी –- मैंने दोबारा ग़ज़ल सुनाई और ठीक उसी शेर पर अल्बर्ट ने हाथ के Action से उस शेर को वैसा ही Visualise किया जैसा तुमने कहा था और टीनू ने कहा –- बड़ा ख़तरनाक शेर है –- यहाँ से मैंने तुम दोनों की Tuning को जान लिया. वो शेर याद ही होगा मगर फिर भी भेज रहा हूँ –- इस बात को तो याद रखोगे ही -------

              जिस नदी में रोज़ सूरज डूबता है हर शाम को
               रात   उस काली नदी में    नाचती है चांदनी


हमें एक दूसरे  को इसी तरह समझना और जानना चाहिए -- यूँ नहीं कि अपने बारे में कुछ भी लिख के भेजो –- आई गल समझ च कुझ नी......

अपने ख़ास दोस्तों को समझने में जल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिए –- उनको कहीं ज़रा-ज़रा जमा करते रहने का अलग ही मज़ा है. अब अवधेश ही है वह रंगमंच नाटकों से काफ़ी जुड़ा हुआ है और वह यह भी जानता है कि मुझे रंगमंच में कोई दिलचस्पी नहीं है सो हम कभी भी ज़्यादा बात नहीं करते इस Topic पर, इसी तरह मैं जो कुछ भी Photography के शौक़ में सीखा हूँ उसकी ज़्यादा बात अवधेश के साथ कभी नहीं होती.

अवधेश की एक बात यहाँ लिख रहा हूँ. उसने कहा एक बार -कि हम सब के अलग अलग होने वाले सिरे तो बहुत हैं मगर कुछ सिरे ऐसे हैं जिनसे हम आपस में जुड़े हुए हैं इसलिए हमें अपने उन सिरों को ही मज़बूत करना चाहिए --  एक काम और किया कि इधर-उधर magazines में, या कापियों, या डायरियों, या कतरनों में जो सिरहाने के नीचे जमा होती रहती है जहाँ भी जो कवितायें बिखरी पड़ी थीं उन सबको मैंने जमा किया –- बड़ी बेक़दरी से इधर उधर पड़ी थीं –- कच्ची पक्की जैसी भी हैं. अभी भी वो सब ख़ामोश पड़ी रहेंगी –- फिर एक वक्त के बाद उन्हें निकालूंगा जिन्होंने ज़िन्दा रहना होगा वो ही बचेंगी बाक़ी मर चुकी होंगी. कवितायेँ तो पड़ी रहनी चाहिए एक मुद्दत तक, फिर सब कुछ सामने आ जाता है सही सही.......

चंडीगड़ छोड़ते वक्त Busstand से शिवबटालवी की एक किताब मिल गयी उसके सभी संग्रहों में से चुनींदा रचनाओं का एक संग्रह बिरहा तूं सुल्तान” -– इस तरह मेरा चंडीगड़ आना पूरा हुआ ------




12-5-83

इतनी ग़ज़लें कह लीं मगर खुद को कभी शायर नहीं समझा मैंने, शायर In the sense कि  जनाब अदबी बहसों में लगे हैं, मीर, ग़ालिब, इक़बाल के शेरों के साथ आज की शायरी को जोड़कर परखने वाली बहसें या कहीं कोई कुछ सुनाने को कह दे तो बहाने बनाना कि कुछ याद नहीं है, या ये कह देना कि अमां हम चाय की दुकान में ग़ज़ल नहीं सुनाते, और ऐसी बहुत सारी बातें हैं अपनी शेखी बघारने वाली बातें –- जो आज के नए शायरों में भी हैं –-

मगर पिछले लोगों से कम ----- हाँ तो मैं कह रहा था कि जब ग़ज़लें कहनी शुरू की थीं तब भी और इस तमाम शोरो-गुल के बाद अब भी अपनी ज़िन्दगी में कोई ख़ास तब्दीली नहीं आई, Cricket बचपन से पसंदीदा खेल रहा है तो अब भी है. Badminton भी seasonal चलता है, ज़्यादातर वक्त ग़ैर साहित्यिक दोस्तों के साथ ही गुज़रता है जिन्हें मेरे लिखने छपने से, ग़ज़ल से कोई मतलब नहीं है सभी तरह की magazines पड़ता हूँ Veg. Non veg Jokes चलते है खूब, कभी कभी गन्दी गलियां भी देता हूँ –- अगर गुस्से से बात करनी है तो गुस्सा भी मेरा वही है -- वहां अदब को कोई दख़ल नहीं है –-

ज़िन्दगी के किसी भी हिस्से में शायरी कोई फ़र्क नहीं ला सकी, इसीलिए मैंने कहा न खुद को कभी भी शायर नहीं समझता ---- इस बार तुम्हारे घर भी दो एक बार मैंने बातों में कहीं गालियों का उपयोग भी किया, शायद तुम लोगों ने नोट न किया हो --- एक दिन अवधेश के साथ पीते हुए कोई ख़ास Topic न छिड़ा तो गालियों पर ही हम दोनों ने खूब देर तक बात की, अपने-अपने कुछ अनुभव सुनाये और शाम गुज़ारी ---- चलो इस बात को यहीं छोड़ें ----

यहाँ लौटकर कुछ कवितायेँ सी लिखीं कच्ची हैं अभी -एक बेफिक्री वाली ग़ज़ल शुरू हुई जब मुड बनता है उसमे शेर कह देता हूँ वरना कोई ध्यान ही नहीं है कि अच्छे शेर कहें हैं या क्या कहा है –- बस कहा और किनारे किया -------
मुझे दाग़देहलवी का एक शेर याद आ रहा है शायरी में कम्बख्तका इस्तेमाल यहीं हुआ है शायद
          
दी मुअज्ज़न ने शबे-वस्ल अजां पिछले  पहर 
हाय! कमबख्त को किस वक़्त खुदा याद आया                  




14-5-83

कुछ देर के लिए अवधेश के घर गया (वो तो शिमला में है) भाभी बच्चों से मिला, बातों में ही मैंने भाभी से पूछा वो तेजी की कविता पढ़ी जो उसने हम दोनों के लिए लिखी है दिल्ली में तुम्हारे होते हुए ही लिखी थी उसने”. भाभी ने हैरत से पूछा कब!मैंने कहा, “Date नहीं देखी, जब मेरा वो Postcard गया था, ख़त पर बात करते रहे थे वो” -– तो भाभी ने बताया, तेजी तुम्हारी दो बातों पर बहुत देर तक हँसती रही थी -----

एक तो मैंने ही तुम्हें दिल्ली वाला बनने पार ज़ोर दिया थादूसरे मैं बीस का नोट जेब में लिए घूमता रहा”... और कुछ बातें हुई तुम लोगों की. हाँ एक बात और बताई भाभी ने कि अगले दिन (जिस रात तुम अवधेश के घर रहे थे) तुम्हारा दुल्लर की जानआया और अवधेश से बहुत पूछता रहा कि क्या कह रहे थे वे -मगर अवधेश ने कुछ नहीं बताया उसे –- फिर वो खुद ही किताब में नाम देने की सफ़ाई पेश करने लगा -----

अवधेश से एक दिन तुम्हें बुलाने वाली बात की बात हुई थी --- अभी तक तो यही तय हुआ है कि 7 जून अवधेश का Birthday, तुम सब यहीं celebrate करो अब वो खुदा का बन्दा शिमला से लौटे तो Final Letter मैं उसी से लिखवाऊंगा ---

इस तरह Flashback से अब फिर आज की Date यानि 19 मई की रात पे लौटते है अवधेश शिमला से अभी तक नहीं लौटा. मौसम ने इस शहर को Hill-station का सगा भाई बना के रख दिया है. दिन बड़े सुकून से गुज़र रहे है. कल अपने एक दोस्त (Bookshop) के पास पुरानी Magazines देख रहा था March 27-April 2 वाली Illustrated  Weekly में Letter from Chandigarh column में अल्बर्ट की Exhibition पर एक paragraph पढ़ा (वो magazine तो मैं घर ले आया हूँ --) अच्छा लगना था ही, हाँ ! काका, अपनी अलग पहचान बनाने में कामयाब हो रहा है, हुआ है, यही सबसे ख़ास बात है -- ऐसा है न दुल्लर अगर पिकासो की Painting पर अपना नाम लिख के पेश करे तो वह कोई Artist थोड़े ही बन जायेगा ---

अल्बर्ट से कहना --- Please –-- वो   Bathroom के दरवाज़े के लिए कुछ बनाये --- वो Joker वहां से हटा दे --- मुझे तुम्हारे घर में सबसे ज़्यादा Odd वही लगा --- और अल्बर्ट का रियाज़ कैसा चल रहा है ---- अच्छा तेजी, अब पहले तो एक शेर कुछ दिन तुम्हें भेजने की सोची अब भेज रहा हूँ. अकेला ही

               तमाम शहर में कोई नहीं है उस जैसा
                उसे ये बात पता है यही तो मुश्किल है

इस ख़त का बाक़ी हिस्सा एक ऐसी Ink से लिख कर भेज रहा हूँ जिसे रात को तो पढ़ा ही नहीं जा सकता था, आसानी से नहीं --- सिर्फ़ Daylight में ही पढ़ा जा सकता है और लिखा भी इसलिए कल दिन में लिखूंगा.  

नोट: (ख़त का यह हिस्सा अब पढ़ने में नहीं आता, सो आगे चलते हैं )
आख़िर में आज शाम आवारगी करने गया तो एक शेर कहा, शेर खुद बोल रहा है सारी कहानी -----   
           चलो हम अपनी उदासी की कुछ दवा तो करें 
           वो शहर  में  है या  नहीं    पता तो  करें.

एक ख़त लिख देना कि तुम्हें ये ख़त मिल चुका है कि नहीं –- इसमें जानबूझकर कुछ ऐवंई किस्म की बातें भी लिख दीं है मैंने वरना ये ख़त तो बहुत छोटा होता --- मगर...... अब इजाज़त........







तुम्हारा कमबख्त दोस्त
फ़कत -हरजीत






हरजीत सिंह  की   ग़ज़लें




(1)
वो शख़्स है कि जैसे कलाई    की घड़ी है
अपनी ही किसी वजह से जो बंद पड़ी है


वो लोग कभी बर्फ में रहने की न सोचें
जिनको ये लग रहा है यहाँ धूप कड़ी है


जिनको कभी पहाड़ का कुछ तजुर्बा न था
ऐसे जवान लोगों के हाथों में छड़ी है


इसने सभी की शक्ल को बेशक्ल कर दिया
इस आईने के पानी में इक लहर पड़ी है


जिस काँच पर है तेरी सियासत की सियाही
उस काँच में हमने तेरी तस्वीर जड़ी है


कुछ लोग हैं कि जिनको कोई सुन नहीं रहा
वो लोग हैं कि उनको सुनने की पड़ी है






(2)
वो एक शहर जो आंखो के दरमियान रहा
कभी यक़ीन की सूरत कभी गुमान    रहा


बहुत से घर थे कई खिड़कियाँ खुली थी मगर
कुछेक  बंद घरों का ही मुझको ध्यान      रहा


मैं अपने आप में टूटा भी और बिखरा भी
वजूद में तो ब-हर-शक्ल सख़्तजान  रहा


सफ़ेद रंग बहुत दिन हुए दिखा ही नहीं
ज़मीन सुर्ख़ रही        ज़र्द आसमान रहा



हरेक ढहते हुए घर में मैं ही था मौजूद
ये और बात सलामत मेरा मकान रहा


अब के दिल्ली में चंद घर उजड़े
जिनके ज़ख्मों का भरना मुश्किल है


मेरा इक भाई जिसमे कत्ल हुआ
मेरा इक भाई जिसका क़ातिल है




(3)
जब मैं कुछ आदतों को भूल गया
फिर बहुत से दुखों को भूल गया


जब से देखा है मैंने मछ्ली घर
सीपीयों मोतियों को भूल गया


इक गिलहरी से दोस्ती करके
और सब दोस्तों को भूल गया


कच्ची मिट्टी थी खेल में जिनकी
अपने उन साथियों को भूल गया


नीली स्याही से जिनको भरता था
अपनी उन कॉपियों को भूल गया


नाम छोटा था यह तो याद रहा
नाम के अक्षरों को भूल गया


हो गए बाग़ देहरादून में कम
ये नगर लीचियों को भूल गया


इतना सादा था एक सख्श कि मैं
सारी  रंगीनीयों  को  भूल  गया


एक  छोटी  ख़बर  पढ़ी  मैंने
और सब सुर्ख़ियों को भूल गया



(4)
कोई   ख़ुशबू इधर निकल आये
मेरा दर उसका घर निकल आये


राह पर आके मैंने  सोचा  तो
जाने कितने सफ़र निकल आये


सारी सदियों का एक-सा क़द क्यों
इक सदी मुख़्तसर निकल आये


अब वो बातें हवा की करता है
अब तो उसके भी पर निकल आये


खुरदुरे हाथ थे मगर उनमें
कैसे-कैसे हुनर निकल आये




(5)
रोज़ बढ़ते रहते है कुछ मकान बस्ती में
रोज़ घटता रहता है आसमान बस्ती में


सारा दिन उड़ाते है धूल सब बड़े-छोटे
सारी रात गाती है इक थकान बस्ती में


शहर में हो घर उसका हैसियत नहीं इतनी
ढूंढ ही लिया उसने इक मकान बस्ती में


सुगबुगा रही है अब रात की मुण्डेरों पर
गुमशुदा चिरागों की दास्तान बस्ती में


रात हो या दिन कोई धूप हो कि बारिश हो
बंद ही नहीं होती  इक  दुकान  बस्ती  में


(6)
जो अपने ख़ून में जारी नहीं है
अदाकारी  अदाकारी  नहीं  है


सभी फूलों में जितना खौफ़ है अब
ख़िज़ाँ की इतनी तैयारी नहीं है


ख़ला में जो भी मेरे हमसफ़र है
कोई हल्का कोई भारी नहीं है


निकलकर घर की दीवारों से बाहर
कोई  भी चारदीवारी  नहीं  है


सभी मेहनत से बचना चाहते है
वगरना  इतनी  बेकारी  नहीं है


मैं उनके खेल में शामिल हूँ लेकिन
वो कहते हैं  मेरी  बारी  नहीं  हैं




(7)
बंद  घरों  की दीवारों के अंदर बाहर धूल
आईने पर धूल जमी है और चेहरे पर धूल


दिन भर जिनके पाने को दिल रहता है बेताब
शाम की आँधी कर जाती है सारे मंज़र  धूल


इतनी शरारत करती है सब लोग करें तौबा
बरसातें आने से पहले शहर में अक्सर धूल


धूल में खेले धूल ही फाँकी धूल ही उनका गाँव
धूल ही उनके तन की चादर उनका बिस्तर धूल


सदियों  पहले इस सहरा में एक  समन्दर  था
छोड़ गया जो अपनी जगह पर एक समंदर  धूल


किश्तों में सब सफर किये हैं किश्तों में आराम
दूर  गई  बैठी फिर चल दी थोड़ा रुककर धूल




(8)
हो सकता है तुमको या मुझको वो धूप नहीं दिखती
लेकिन हर  इंसान में कोई  धूप  सितारों  जैसी है

आओ हम उस लहर के सीने पर जाकर विश्राम करें
देखो तो उस लहर को वो इक लहर किनारों जैसी है

इस जंगल में शोर हवा का गूंज रहा है चारों ओर
शोर  के  भीतर  पेड़ों  की आवाज़ पुकारों जैसी है

अब ही बनी है लेकिन मैं इसकी उस उम्र से हूँ वाकिफ़
आने  वाले  दौर  में  ये  दीवार  दरारों  जैसी  है





(9)
यूँ भी तो होता है यूँ भी होता है
होश  में कुछ जुनून भी होता है


क्या कहाँ कैसे कब किया किसने
इन  सवालों  में क्यूँ भी होता है


ऐसे  कितने  जवाब  होते है
हाँ भी होती है  हूँ भी होता है


ये नहीं सब जुनून में होता है
कितना कुछ बेजुनूँ भी होता है


शोर जो ज़िंदगी का हिस्सा हो
उसमें शामिल सुकूँ भी होता है




(10)
मेरा  मौसम  कच्चे  आमों जैसा था
लड़कों का हर पत्थर मुझको सहना था


उसको  बेकोशिश  ही  मैंने  पाना  था
कोशिश करने से जो कुछ मिल सकता था


बच्चो  की  आवाज़ें  यूं  ले  उड़ती है
लगता  है  मैं अभी-अभी इक बच्चा था


रात जो थे फिर सुबह कहाँ वो लम्हे थे
मैंने वो लिखा  जो  मुझको लिखना था


मैं हूँ  अँधेरे  में भी लिखने  का आदी
मेरी माँ को यह सब समझ न आता था


कुछ दिन पहले मैंने उसको ढूंढ लिया
आने वाले वक़्त में जिसको खोना था


मैंने उसकी  कोई  बात  नहीं  मानी
वो अन्दर से इतनी हद तक सच्चा था


दो दीवारें एक जगह पर मिलती थीं 
कहने को वो कोना ख़ाली कोना था


चल  अच्छा  है  तेरा जादू टूट गया
मुझको और बहुत लोगों से मिलना था 



(11)
मुझको इतना काम नहीं है
हाँ फिर भी आराम नहीं है


कितनी अच्छी एक ख़बर है
आज कोई नीलाम  नहीं है


कुछ तो सच्ची है वो दुकानें 
जिनका  कोई गोदाम नहीं है

फ़नकारों का नाम है लेकिन
कारीगर  का  नाम नहीं है


मत पानी में लाश बहाओ
पानी का यह काम नहीं है
_______________________________
यहाँ भी पढ़ें :

हरजीत सिंह : शेर और ग़ज़लें


कथा - गाथा : राजजात यात्रा की भेड़ें : किरण सिंह

$
0
0























"किरण के पास कथा कहने की समर्थ शैली है और कथा के चरित्रों की मन:स्थितियों की गहरी समझ है." २०११ में नामवर सिंह के दिए इस कथन के साथ 'पहल'के नए अंक में किरण सिंहकी लंबी कहानी ‘राजजात यात्रा की भेड़ेंप्रकाशित हुई है.  

यह कहानी वरिष्ठ कथाकार ‘बटरोही’ की टिप्पणी के साथ आपके लिए.




किरण  सिंह  की  कहानी   राजजात यात्रा की भेड़े
बटरोही





स घटना का जिक्र मैं पहले भी कई बार कर चुका हूँ, किरण सिंह की कहानी पढ़ने के बाद वो मुझे  फिर से याद आ गई.

राजेन्द्र यादवने जब हंसकी योजना बनाई, पत्रिका की थीम को लेकर उन्होंने अपने घनिष्ठ मित्रों को लम्बे-लम्बे पत्र लिखे. पत्र में उन्होंने बड़े अधिकार से लिखा कि जब भी वो अपनी सर्वोत्कृष्ट कहानी लिखें, उसे सबसे पहले हंसको भेजें क्योंकि उनका सपना हंसको भारतीय रचनाशीलता की सर्वोत्कृष्ट पत्रिका के रूप में देखने का है.मेरे पास भी पत्र आया, जाहिर है कि मेरे लिए यह सबसे बड़ा सम्मान था और मैंने खूब मेहनत के साथ एक कहानी तैयार की.

चिट्ठियों का जवाब देने में राजेन्द्र जी (उनकी पीढ़ी के दूसरे अनेक लेखकों की तरह) काफी गंभीर रहे हैं. करीब डेढ़ सप्ताह के बाद कहानी वापस आ गयी इस नोट के साथ कि उन्हें मुझसे इससे बेहतर कहानी की उम्मीद थी. हम जैसे छोटे कस्बों के लेखकों के लिए रचनाओं की अस्वीकृति कोई घटना नहीं होती. दो-चार दिन तक मन खिन्न रहा, अंततः मैं नई कहानी लिखने मैं जुट गया. एक साल के अंतराल में मैंने तीन-चार कहानियां भेजीं और सभी एक निश्चित अवधि में वापस आती चली आईं. जाहिर है, मन में शातिर दिमाग संपादक को लेकर अनेक संदेह पैदा हुए; फिर भी संपादक के निर्णय को आप किस बिना पर चुनौती दे सकते थे! मैंने इस बार गुस्से में उनकी गुटबाजी का पर्दाफाश करते हुए उनसे बुरा-भला कहा और अब कहानी अस्वीकृत करके तो देखोकी तर्ज पर चुनौती देते हुए खूब मेहनत के साथ एक नई कहानी लिखकर उन्हें भेजी.

दो सप्ताह के बाद पहले की तरह डाक से कहानी का यह लिफाफा भी वापस आ गया. लिफाफे के अन्दर पाण्डुलिपि के साथ हंसके लैटर-हेड पर हाथ से लिखा उनका पत्र था, प्रिय बटरोही, कहानी अच्छी है, मगर अनुभव की नहीं, जानकारी की उपज है. तुम इससे बेहतर कहानी लिख सकते हो. इंतजार रहेगा. सस्नेह, रा. या. (यह बताने में मुझे कोई शर्म नहीं है की हंसमें राजेन्द्र जी ने मेरी कोई कहानी प्रकाशित नहीं की. कहानी की आलोचना के प्रसंगों को लेकर हम आपस में खूब झगड़े, व्यक्तिगत रूप से भी और पत्रिकाओं में लेख लिखकर भी. मगर न वो मेरी रचनात्मक दृष्टि से सहमत हुए, न मैं उनकी. अलबत्ता उनके अंतिम दिनों मे अर्चना वर्मा जी ने एक दिन  फोन से मुझसे मेरा संक्षिप्त परिचय और  फोटो मंगाया जिनके साथ उन्होंने हंसमें मेरी एकमात्र कहानी खश राजा के साथ कुलदीपप्रकाशित की.



#####
भाई अरुण देव ने जब पिछले दिनोंपहलमें प्रकाशित किरण सिंह की कहानी राजजात यात्रा की भेड़ेंकी ओर मेरा ध्यान आकर्षित किया, एकाएक राजेन्द्र जी की खीझ मेरी समझ में आई. मेरी खीझ दो कारणों से थी. पहलऔर ज्ञानरंजनजी की छवि मेरे दिमाग में हंसऔर राजेंद्र जी की ही तरह बड़े रचनाकार की रही है. अमूमन ऐसी पत्रिका में किसी कमजोर रचना के प्रकाशन का अर्थ है, एक पाठक के रूप में मेरे समझने में ही कोई चूक रही होगी. खीझ का कारण यह भी था कि मैं किरण सिंह की कहानियों का शुरू से प्रशंसक रहा हूँ. इसलिए मैं कुछ भी कहने से पहले अपने दुराग्रहों के बारे में सोचने लगा था.

किरण सिंह की कहानी राजजात यात्रा की भेड़ेंपहाड़ी समाज के सांस्कृतिक अंतर्विरोधों और पलायन के दंश की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित करती है. इसलिए नहीं कि लेखिका ने मेरे भौगोलिक क्षेत्र में घुसपैठ की है, और मेरे अन्दर का स्वाभिमानी पहाड़ीजाग गया हो; मेरी तकलीफ की वजह सिर्फ यह है कि लेखिका ने अपनी पर्यटक नजर को ही हमारे क्षेत्र के सांस्कृतिक अंतर्विरोधों की जड़ मान लिया है. अब इस बात का क्या तुक है कि एक गढ़वाली ग्रामीण के संवादों के क्रिया-रूप पश्चिमी हिंदी के हैं. (जयकारी नेगी जी का, दाम लेने से मना कर दिए...’ ‘चौसिंघिया खाडू मंगवाए पुरोहित जी...

जिस क्षेत्र की यह कहानी है वह गढ़वाल-कुमाऊँ का दोसाद क्षेत्र है जहाँ आदरसूचक संबोधन ज्यूहै, ‘जीनहीं. पुरोहितजैसा शिष्ट शब्द तो आज तक नहीं आया है, अलबत्ता पंडिज्यूप्रचलन में है, कस्बों-शहरों में भी पुरहेतशब्द भले सुनने में मिल जाए. गढ़वाल-कुमाऊँ का ग्रामीण इलाका तो अन्दर तक भी संस्कृत के पढ़े-लिखे कर्मकांडी पंडितों से भरा पड़ा है, तो भी गाँवों में साग-सब्जी के लिए भाजीऔर भोटी (वास्कट) के लिए सदरीका प्रयोग नहीं होता. 


छोटे भाई के लिए भुल्लानहीं, ‘भुलाशब्द का प्रयोग होता है. कहानी में एक रोचक सूचना यह है कि पहाड़ों में चिल्लाकर बातें नहीं करते. पहाड़ियां पहले कांपती हैं, फिर चिल्लाने वाले पर गिर पड़ती हैं.” ‘असभ्यउत्तराखंडी पहाड़ियों की वनस्पतियों के बारे में जानकारी का आलम यह है कि वो सियूण’ (बिच्छू घास- शुद्ध उच्चारण श्योणया शिश्योण’)को जहरीला मानते हैं.” (“विषैले सियूड़ (बिच्छू घास) से श्यामलाल भाई की मौत हो गयी थी”. उत्तर-पूर्व के पहाड़ी लोग तो सबसे स्वादिष्ट सूप के रूप में इसे पीने के बाद ही मुख्य खाना शुरू करते हैं और इसमें सबसे अधिक लौह तत्व होता है. हालाँकि कुमाऊँ में इसे संपन्न लोग नहीं खाते लेकिन थोकदार परिवार की मेरी दादी इसके कोमल कल्लों को तोड़कर उसका बेहद स्वादिष्ट साग बनाती थी.

यह कहानी अतीत और वर्तमान की एक साथ यात्रा करती हुई पहाड़ी समाज में घुसपैठ कर चुके अंधविश्वासों और जड़ताओं को लेकर सवाल उठाना चाहती है. असल में जो विषय लेखिका ने चुना है वह उत्तराखंडी समाज के बीच सदियों से रसा-बसा प्रसंग है. यह प्रसंग यहाँ के जन-जीवन के बीच इतना घुलमिल चुका है कि उसकी कोई नयी व्याख्या स्वीकार कर सकने की स्थिति में कम-से-कम आज का समाज तो हो ही नहीं सकता.

दरअसल इस प्रसंग की नयी व्याख्या समाज में तभी स्वीकार हो सकती है जब कि वर्तमान के पास भावी सपनों के साथ कोई अधिक मजबूत मॉडल मौजूद हो. ऐसा भी नहीं है कि ऐसा कोई मॉडल आज के पहाड़ी समाज के पास नहीं है. जिस रूप में नए समाज की जानकारियों का वृत्त बढ़ा है, इसके बीच यह असंभव भी नहीं है. मगर क्या यह उसी रास्ते जाकर संभव है, जिस रास्ते पर हमारी नयी वैश्विक दुनिया बढ़ रही है! और इस नए समन्वय का कर्ता कौन होगा! खासकर ऐसे समाज में, जहाँ सत्ताधारी वर्ग खुद अन्धविश्वास और जड़ताओं के बीच घुसकर रास्ता तलाश रहा हो, क्या किसी सार्थक रास्ते की तलाश संभव है? और ऐसे तंत्र में, जहाँ बहुसंख्यक वर्ग समूचे तंत्र की दिशा तय करने के दंभ से भरा हो, और यही स्पष्ट न हो कि जिसे हम जनमत कह रहे हैं वह (बहुसंख्यक) भीड़ है या समाज, उसका लक्ष्य कैसे तय होगा... कौन करेगा तय!

कथा का आरम्भ कत्यूरी राजवंश की इष्टदेवी राज-राजेश्वरी नंदा देवी के नैहर से विदा-प्रसंग से होता है. अणबेवाई नौनी मैंत बीटिन जाणीच... गाजा-बाजा के साथ कैलाश पर्वत पर अपने सुहाग स्वामी देवाधिदेव औघड़ बर्फानी... महादेव के पास...चार सींगों वाला भेड़ा (चौसिंगिया खाडू मेठ यानि अगुवा... पथ-प्रदर्शक”...

जिन लोगों ने गढ़वाली लोक-गायक नरेंद्र सिंह नेगी के स्वर में नंदा राजजात की गाथा सुनी है, वे जानते हैं कि इस कथा की लोक जीवन में कितनी गहरी पैठ है. ऐसे में एक साहित्यिक कथा को स्थानापन्न के रूप में खड़ा करना कितनी बड़ी चुनौती है, खासकर ऐसे समय में जब साहित्य खुद ही जन-अभिव्यक्ति के बीच से लगभग गायब हो चुका हो. लोक और जन के बीच इतना फासला क्या अतीत में कभी दिखाई दिया था?...



#####
मुझे माफ़ करेंगे, अगर मैं बड़बोला हो गया होऊँ; लेकिन पाठकों को वास्तविकता से वाकिफ तो होना ही चाहिए. मैं ऐसा न करता, असल में एक जगह गरीबी की इन्तहा दिखाने के लिए लेखिका ने कहानी के नायक बुलबुल’ (यह नाम भी मैंने परंपरागत गाँव के गढ़वाली लड़कों का नहीं सुना) से दरवाजे का फट्टा तोड़कर आग जला दी है. पहाड़ी समाजों में ही नहीं, किसी भी संस्कारशील भारतीय परिवार में दरवाजा जलाने का क्या अर्थ होता है, बताने की जरूरत नहीं होनी चाहिए. खैर.

प्रख्यात कथाकार-आलोचक विश्वम्भरनाथ उपाध्याय हमें एम. ए. में कवि-प्रसिद्धियाँपढ़ाते थे. भक्ति और रीति काल को समझने के लिए उन्होंने इनके जरिये हमें नयी समझ दी. उन्होंने ही हमें बताया कि किस तरह चर्चा किसी लेखक के अन्दर घुन की तरह घुसकर उसकी रचनाशीलता की हत्या कर देती है. यही घुन उसे मिथक का अवतार लेने में मदद करती है और एक बार चर्चा के भंवर में फँस जाने के बाद उसका इतना चस्का लग जाता है कि लेखक खुद ही उससे बाहर नहीं निकलना चाहता. जीतेजी मिथक बन जाने का शौक...

अगर आपको आजादी के बाद चर्चा में आई विभिन्न प्रतिभाओं की अति महत्वाकांक्षी पीढ़ियों की याद हो तो मेंरे इस आशय को आसानी से समझा जा सकता है. अब वो जमाना तो गया, अलबत्ता नए ज़माने में संपादकों-पत्रकारों ने नए तरह की कवि-प्रसिद्धियों और मिथकों को जन्म दिया है. इसने लेखकों का अनुभव-संसार तो सिकोड़ा है मगर जानकारी का विस्तृत वितान सौंपकर खुद को ही सर्वेसर्वा समझने का अहंकार प्रदान किया है. क्या कारण है कि वही जैनेन्द्र, अज्ञेय, अश्क, मुक्तिबोध, रामविलास, शमशेर, नागार्जुन, त्रिलोचन, रेणु, मोहन राकेश, रघुवीर सहाय, निर्मल वर्मा, अशोक वाजपेयी, कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, ज्ञानरंजन, उदय प्रकाश, दूधनाथ, रवीन्द्र कालियावगैरह लेखक छठे दशक से पहले कितने शांत और उर्वर ढंग से अपनी रचनाशीलता को विस्तार देकर हिंदी का नया पाठक वर्ग तैयार कर रहे थे. मगर यही लोग आठवें-नवे दशक तक आते-आते एक बार जो महंत की गद्दी में बैठे, वहां ऐसे चिपके कि अपनी रचनाशीलता की शक्ति का उपयोग खुद को अपने आसन से चिपकाये रखने के लिए करने लगे. और यह केवल साहित्य की बानगी नहीं है, हर क्षेत्र में ऐसा ही होने लगा.

फिल्म की दुनिया को ही लीजिये, पचास के दशक में प्रेम करने की जो उम्र पच्चीस से शुरू होती थी, आठवे दशक में वह पंद्रह हो गयी और नयी सदी के दूसरे दशक में तो हर तीसरा बलात्कारी माईनर सुनाई देता है. जाहिर है, इसका कारण सिर्फ यही नहीं है कि समय के साथ लड़कों में पौरुष ग्रंथि का जल्दी विकास होने लगा है. आखिर ग्रंथियों को विकसित करने वाले तत्व पैदा तो सामाजिक परिवेश में ही हैं.

हो सकता है कि कुछ लोग मेरी बातों से सहमत न हों, मुझे लगता है, मनुष्य की मूल प्रवृत्ति कम-से-कम मेहनत से बड़ी उपलब्धि हासिल करने की होती है, नैतिकता, मर्यादा वगैरह कभी मूल्य नहीं रहे हैं. पुराने समय में लोगों के पास अवसर नहीं थे, इसलिए मर्यादित रहना उनकी मजबूरी थी. अब अवसर हाथ लगे हैं तो उनका भरपूर फायदा उठाया जा रहा है, भले ही उपलब्धियाँ समय से पहले पक गए फल या बोनसाई के रूप में क्यों न हों.

हिंदी की ताज़ा पीढ़ी की विसंगति मुझे यही लगती है. चर्चाएँ आदमी में आत्मविश्वास पैदा जरूर करती हैं, मगर एक सीमा के बाद वह अहंकार के रूप में बदलने लगती हैं. और किसी के लिए भी खुद के अहंकार और आत्मविश्वास में फर्क कर पाना लगभग असंभवहोता है.

किरण सिंह, जिनकी शुरुआत एक कल्पनाशील, प्रयोगधर्मी और संवेदनशील कथाकार के रूप में हुई थी, हमारे समय की इस तरह की कोई अकेली रचनाकार नहीं हैं. उनके हमउम्र लगभग हर लेखक की यही विडंबना है. नाम गिनाने में वक़्त बर्बाद करने का कोई अर्थ नहीं है.

मैं अब वहीँ आ रहा हूँ, जहाँ से मैंने शुरुआत की थी. निष्कर्ष यह कि किरण सिंह के युग तक आते-आते संपादक-राजेन्द्र यादवहमारे बीच से गायब हो गए हैं और जो नए संपादक ज्ञानरंजन के रूप में उभर रहे हैं, उनके लिए साहित्य नहीं, ‘पहला प्यारकुछ और ही चीजें हैं. मसलन पत्रिका के लेखक की राजनीतिक पक्षधरता क्या है, उसकी पहली भाषाक्या है, उसका लिंग क्या है, वर्ण क्या है, उसमें समर्पणका भाव कितना है आदि-आदि!

राजेन्द्र यादव ने मेरी कहानी भले ही न छापी हो, उन्हें लेकर यह कवि-प्रसिद्धितो है ही कि महिला रचनाकारों के प्रति उनका निर्णय सख्त नहीं होता था. उनके वक़्त की सबसे चर्चित कहानियाँ देह की उत्तेजना से जुडी प्रेम कहानियां हैं. अलबत्ता बाद में इस पंक्ति में दलित और पिछड़े भी जुड़ते चले गए, और यह सिर्फ साहित्य का मामला नहीं है. नए भारतीय समाज में आज यह हर क्षेत्र की बानगी है.

अरुण देव इस टिप्पणी के साथ किरण सिंह की कहानी भी छापेंगे ही, अंत में एक बात की ओर मैं पाठकों का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ. सहृदय पाठक इस पर विचार करें और मेरी जिज्ञासा का समाधान कर मेरी मदद करें.

सही है कि यह एक घटनापरक कौतूहल शांत करने वाली सपनीली कहानी नहीं है, फिर भी कहानी में भाषा और संवेदना का परस्पर जुड़ाव तो होता ही है. इस कहानी के बीच में बर्तोल्त ब्रेख्त का एक उद्धरण और लार्ड डलहौजी से जुड़ा लेखिका का एक उपसंहारात्मक वाक्य है.

कहानी आप के सामने है. मेरी जिज्ञासा सिर्फ इतनी-सी है कि कहानी के साथ निम्नलिखित दो वाक्यों और उनके रचनाकारों को किस तरह पढ़ा जाए :

पहाड़ों की यातनाएँ हमारे पीछे हैं
मैदानों की हमारे आगे...
एक घाटी पाट दी गई है
और बना दी गई है एक खाई.
-बर्तोल्त ब्रेख्त.

और कहानी का यह अंतिम वाक्य :
ओ डलहौजी! वहीँ रुक! मैं जीते जी अपना कांसुआ नहीं दूँगी!

कौन हैं ये बर्तोल्त ब्रेख्त और डलहौजी ?


_____________________________
बटरोही 
जन्म : 25  अप्रैल, 1946  अल्मोड़ा (उत्तराखंड) का एक गाँव
पहली कहानी 1960 के दशक के आखिरी वर्षों में प्रकाशित
हाल में अपने शहर के बहाने एक समूची सभ्यता के उपनिवेश बन जाने की त्रासदी पर केन्द्रित आत्मकथात्मक उपन्यास 'गर्भगृह में नैनीताल'प्रकाशित
अब तक चार कहानी संग्रहपांच उपन्यास. तीन आलोचना पुस्तकें और कुछ बच्चों के लिए किताबें प्रकाशित.
इन दिनों नैनीताल में रहना. मोबाइल : 9412084322




राजजात  यात्रा   की  भेड़ें
किरण सिंह





'दीदी! सुन तो...वो जात्रा की...!''बुलबुल काई लगी ढलान पर दौड़ता हुआ सा उतर रहा था. बदहवासी में भी उसे खूब ध्यान था कि रोज के चढऩे-उतरने वाले अपने परिचितों के साथ  भी ये पहाडिय़ाँ कोई मुरव्वत नहीं करतीं. जरा लडख़ड़ाए कि गये खाई में. वह घुटनों पर हाथ रख कर झुका हुआ सा ठहर गया. उसकी साँस उखड़ रही थी. छह पहाड़ी नीचे बसे अपने गाँव कांसुवा की ओर मुँह करके उसने बात पूरी की, ''दीदीऽऽ वो जात्रा की भेड़ गायब हो गई... ढेबरूमेठ ख्वेगी!''नीचे से दीदी का जवाब न पाकर उसकी चाल धीमी हो गई. ठहर कर चलने पर महसूस हुआ कि नन्दा-मंदिर से उठते सामूहिक रूदन की लहरों से हवा में थरथराहट है.

बुलबुल के गाँव कांसुवा से, नन्दा मन्दिर की ध्वजा भर दिखाई देती थी लेकिन सूनी घाटियों में घंटे की आवाज ऐसी साफ  सुनाई देती जैसे मन्दिर दो घर छोड़ कर हो. छह पहाड़ी ऊपर बसानन्दा-मन्दिर था तो नन्हा सा पर 'आदमी के जनम से भी पुराना और मान्नता वाला' था. ''बुलबुल! आज बसन्त पंचमी है. जा मैया के दरबार हाथ जोड़ के आ!'' यह तो दीदी बचपन से सिखाती चली आ रही हैं. वाह भई बुलबुल ! अभी छह महीने पहले से दीदी ने गाँव की पहाडिय़ाँ पार करने की छूट दी है. और छह महीने पुरानी बातों को वह बचपन की बातें कहने लगा है. वह मुस्कुराया. नौटियालों के कुरूड़ गाँव के सिद्ध पीठ से हर साल नन्दा देवी की राजयात्रा शुरू होती है. इस बार, बारह बरस पर महाजात्रा का योग बना है. दीदी ने उसे अँधेरे में ही उठा दिया था. पुरानी साइकिल के गार्डर से वह करीर के फूलों का जंजाल काटता चल दिया था. मन्दिर में मैया की छतर-डोली का पहला पड़ाव था. ढोल-दमाऊ के साथ जगरिये, देवी कथा सुना रहे थे-

''भक्त जन! कत्युरी राजवंश की इष्ट देवी राजराजेश्वरी नन्दा देवी नैहर से विदा हो रहीं हैं. अड़ बेवई नौनी मैत बीटिन जाणींच (कुमारी कन्या मायके से जा रही है.)...गाजा-बाजा के साथ...कैलाश पर्वत पर...अपने सुहागस्वामी देवाधिदेव...औघड़ बर्फानी...महादेव के पास. हम सभी मैया की छतर-डोली के साथ होमकुण्ड तक चलेंगे. उसके आगे हिमगिरी के धुँआ-धुंध में...देवी के आगे-आगे कौन जायेगा भला ? यही चार सींगों वाला भेड़ा...चौसिंग्या खाडू...मेठ यानी अगुवा... पथप्रदर्शक. पहाड़ों का सीना चौड़ा रहे कि यह चार सींगों वाला भेड़ा, दशोलीपट्टी के किसी न किसी घर में जन्म लेता है. इस बार वह घर है सुरेन्द्र नेगी का. मेले के कर्ता-धर्ता... राज्य सभा के माननीय सदस्य... कत्युरी शिरोमणि श्री धर्मवीर सिंह जी, उन्होंने चौसिंग्या भेड़ा के लिये मुँहमाँगा ईनाम देना चाहा. लेकिन जयकारा नेगी जी का...दाम लेने से मना कर दिये...सवा रुपये में दान कर दिया चौसिंग्या को...मैया के नाम पर...हे लहकार जयकारा!''

''चौसिंग्या खाडू मँगवाए पुरोहित जी! जनता दर्शन चाहती है.''

''भक्त जन! दो सौ इक्यावन किलोमीटर की इस कठिन पद यात्रा में जहाँ शाम होगी वहाँ लंगर बैठेगा...भण्डारा होगा. रूपकुण्ड, नन्दकेशरी, चंदिन्या घाट, होमकुण्ड के बीच पडऩे वाले गाँवों की छतर-डोलियाँ हमसे राह में मिलती जाएँगी. जयकारा-जागरण...सुन ओ औजी! (ढोल-दमाऊ बजाने वाले) साज-बाजा घड़ी एक न रुके और....''

बुलबुल लौटने लगा था. इतने दिनों का साथ और ये लोग चौसिंग्या को बर्फ  में छोड़ कर क्या सचमुच लौट आयेंगे? ऊँचाई पर बसे उसके गाँव के सूरज बहुत नजदीक था. तेज धूप से आँखें चकमक हो रही थीं. बाई ओर की पहाड़ी से झायँझम लाल-पीले कपड़ों में जात्रा, नीचे उतर रही थी. कि अचानक शोर उठा चौसिंग्या खाडू कहाँ गया ? खोजो उसे...वे ढूढ़ा! पहाडिय़ों से भरभराते हुए यात्री उतर रहे थे. स्त्रियाँ पत्थरों बैठ कर झूमने लगीं. उन्होंने झोटा खोल लिया और उन पर देवी मैया आ चुकी थीं.

''दीदी! तुम कहाँ थी...चुन्नी में धूल-जाला लगा है...क्या चौसिंग्या को खोज रही थी.''
''नहीं, मैं काकी के साथ थी. आओ, चलो!''लछमी बैसाखी के सहारे घर की ओर बढ़ रही थी.
''अब क्या होगा दीदी ?''

''होगा क्या! उस भेड़ा को सब मिल कर खोज लेते हैं. कहते हैं कि यह भेड़ा अशुद्ध हो गया. राह भटक गया था. इसलिये उसकी बलि देते हैं. फिर जात्रा शुरू हो जाती है...सब ठीक हो जाता है.''

''पुरोहित बाबा बता रहे थे कि सोलह साल और नौ साल पहले...दो बार ऐसा हो चुका है. दोनों साल आँधी-तूफान आया था...पहाड़ टूटा था.''
''अच्छा सोचो तो अच्छा होगा! अब तू घर चल...अपनी रोटी-पानी की चिन्ता कर.''
''पाँव दुख रहा है दीदी!''बुलबुल चारपाई पर पड़ गया था. 
''बात नहीं सुनते...दिन भर दौड़ोगे तो क्या होगा!''लछमी, भाई के पाँव दबाने लगी.
करवट बदलते हुए बुलबुल ने नींदासी आँखों से देखा कि लछमी दीदी चीटियों की कतार को एकटक देख रही हैं. आज उसने पूछ ही लिया-''दीदी! हमेशा चीटियों सैं क्यों देख दें ?''
''चीटियाँ अपना घर नहीं छोड़तीं. आसमान छूने की चाह वाले अपना घोसला छोड़ देते हैं. तुम्हें रास्ते में बलवन्त चाचा दिखे थे ?''

''हाँ ! पीठ पर गडोलू छि...गठरी छोटी थी. जात्रा में जा रहे होंगे.''

''नहीं, कांसुवा से विदा ले चुके हैं...जाते समय उनसे तुम मिल नहीं पाये. मैं तो जानबूझ कर पहाड़ी के पीछे चली गई थी. उसी समय, जब तुम मुझे पुकार रहे थे.''

बुलबुल नींद पोछते हुए पहाड़ी की ओर बढ़ रहा था- ''बल्ली दादा! मत जाइए...न जाइए...नी जा बल्ली दादा ऽ ऽ !''

घाटी उसकी पुकार लौटा दे रही थी. बल्ली दादा को खोजने के लिए उसने निगाह दौड़ाई. विदा समय के रिवाज से बल्ली दादा ने अपने पाँव धोये होंगे. पहाड़ी से उतरते हुये मिट्टी सने पैरों की छाप धुँधली हो रही थी. दो पहाडिय़ों के बीच सूरज ऐसे बैठा था जैसे दिन भर दौडऩे के बाद लाल मुँह वाला बन्दर, गुलेलनुमा शाख पर आराम कर रहा हो. नन्दा देवी के मन्दिर में स्त्रियाँ अभी भी रो रही थीं. चौसिंग्या को खोजने के लिये जला दी गई झाडिय़ों से धुँआ उठ रहा था. कभी इसी तरह सैकड़ों चूल्हों से गोल-गोल धुआँ उठता था. आज ये छोटे दुमंजिले घरों के _ारहोंगाँव लता-गुल्मों से ढके है... हरे रंग का कफन ओढ़े हुए. खाली हो चुके घरों के दरवाजों पर लटके बड़े ताले, ताबूत में ठुकी कीलों की तरह चमक जाते. सूनी घाटियों में बादल भटक रहे थे, प्रेतात्माओं की तरह.

''ये प्रेतात्माएँ नहीं है बुलबुल! गाँव छोड़ कर चले गये लोगों की स्मृतियाँ हैं...पुरणीं बत्थ छन! पुरानी बातें घूम-घूम कर एक दूसरे से बतियाती रहती हैं.''दीदी उसे टोक दिया करती हैं.
''दीदी चाय बनाओ...मीठी पत्तियाँ थोड़ी चूल्हे में भी झोंक देना...देर तक धुँआ उठने देना !''उसने पहाड़ी पर खड़े-खड़े,सामने के धूल-धूम से खाली गाँवों को देखते हुए कहा.
''विद्या के दरवाजे से लाती हूँ भइया!''लछमी ने अपने आठ साल के भाई को स्नेह से देखा. रोज तो 'मीठी तुलसी मैया की पत्ती'कहता था.

एक दो...तीन...बैसाखी के सहारे चलते हुए साठ कदम पर विद्या का घर पड़ता है. बाहर की सीढिय़ों पर वह सुस्ताने के लिये बैठ गई. पुरानी बातें वह इतनी बार अपने मन में दुहरा चुकी है कि सब कुछ रट गया है. नींद में भी सुना सकती है कि इन्हीं सीढिय़ों पर उसके बगल बैठी विद्या कह रही थी-

''लछमी! चन्दन से सलाह-बात करती रहना. समझ रही हो न...वो मुझे याद न करे...मतलब थोड़ा तो करे ही...बहुत उदास न हो जाये. ''

''तुम खुद तो यहाँ से भाग रही हो...और चंदन को मेरे सिर लादे जा रही हो ?''

''तुम मेरे भाई की हालत नहीं देख रही हो लछमी ? जिस बस से भाईजी आ रहे थे उसी बस पर बादल फटा. अस्सी में से पचपन यात्री उनकी आँख के सामने बाल्दा नदी में बहते चले गये. फिर भी तुम मुझे कांसुवा में रुकने के लिये कह रही हो ?''

''राजधानी...स्वर्ग...जहाँ तुम जा रही हो...दो लड़कियों की देहखाई में मिली है. मन्दिर का अखबार मैं अक्षर जोड़ के पढ़ लेती हूँ. तुम्हारा नया स्वर्ग बसाने के लिए जो मजूदरों की बस्ती बनाई गई है वहीं की लड़कियाँ थीं. वे कौन सी बिजली गिरने से जली थीं...उन पर कौन सा बादल फटा था!''

''भाईजी इन पहाड़ों में किसी कीमत पर नहीं रहना चाहते.''   

''मुझे तो लगता है तू भी शहराती बनना चाहती है.''


कांसुवा गाँव सोलह घरों का था. बड़ी सी दरी जैसी चौक या घोटियार के तीन ओर, दिखाई देने भर की दूरी पर ये घर थे. कुछ सीढ़ीदार खेतों के बीच, कुछ पहाडिय़ों पर. ईंट-पत्थर से बनीं छोटी-छोटी कोठरियों वाले दो मंजिले घरों के बाहर लकड़ी की सीढिय़ाँ थी. बाई ओर एक ही घर था लछमी-बुलबुल का. वहीं पीछे से ढाल शुरू होती थी. सामने की पहाड़ी पर काकी और चंदन का दुमंजिला था. इस समय कांसुवा के दो घरों में तीन लोग रह गये थे.

लछमी उँगली पर जोडऩे लगी... उस दिन को बीते आज एक साल से ऊपर हो गया... विद्या का परिवार गाँव से विदा ले रहा था. खच्चरों पर गठरियाँ लद गईं थीं. काकी, लछमी और बुलबुल, महावीर जी के भाला के पास खड़े थे. बिजली गिरने से बचाने के लिये यह भाला गाड़ा गया था. चंदन, तेजपत्ता के जंगलों की ओर निकल गया था. उसे ढूढ़ती हुई विद्या की आँखें कांसुवा को अपने में बसा लेना चाहती थीं. लेकिन भरी आँखों से सब बहा जा रहा था. चाचा-चाची सुबह से ही दिशाएँ, पहाड़, नन्दा देवी, चिडिय़ा, वन और कांसुवा से हाथ जोड़ कर भूलचूक के लिये क्षमा माँग रहे थे. इसी जीवन में फिर भेंट हो यह मनौती भी. लेकिन ओझल होने से पहले, उन्होंने पीछे मुड़ कर कांसुवा को देखा तो समझ गये कि अब शायद ही मुलाकात हो.

लछमी बैसाखी सम्भालते हुए खड़ी हो गई. ये समृतियाँ उसे जिन्दा रखती हैं या मार रही हैं! इसका जवाब सोचते हुए वह रास्तों को देखने लगी. कांसुवा की ओर पीठ और राजधानी की ओर मुँह करके सोये हैं ये रास्ते...कोई उधर से पुरखों के गाँव में कुल देवता को चढ़ावा देने तो नहीं आ रहा...नई बहू या नाती-पोता के साथ.

विद्या, विद्या के भैया-भाभी और चाचा-चाची को बस में बैठाने के बाद इन्ही रास्तों से उस दिन चंदन आता दिखाई दिया था-

''यहाँ डॉक्टर-वैद्य नहीं हैं लछमी. वो देखो केवास का वन...विषैले सियूँड़ (बिच्छू घास) से श्यामलाल भाई की मौत हो गई थी.''
''विद्या की ओर से सफाई दे रहे हो चंदन! यहाँ हम चौड़े नथुनों से चकली छाती में हवा भरते हैं, जहर नहीं. हम पहाड़ चढ़ते हुए मरते हैं, पंखों से लटक कर नहीं.''
''लछमी! चारो ओर सन्नाटा है. इसमें मद्धिम हवा भी आँधी लगती है. बुलबुल को मना करो, यहाँ-वहाँ घूमता रहता है.''


''बुलबुल...बुलबुल! कहाँ गया ये लड़का.''पाँव पर रेंगती हुई चींटियों से वह वर्तमान में लौटी. चीटियाँ अपने अंडे दबाये भाग रही हैं...ये बारिश का इशारा है. नहीं-नहीं! ये अंडे नहीं...चीनी का दाना लिये हैं...गंगाराम चाचा के घर से निकल रही हैं.

गंगाराम चाचा का घर सामने से ताला-बन्द था. पीछे की दीवार खंडहर होकर गिर गई थी. उसकी सहेली विद्या के घर की तो एक ही ईंट निकली थी. उसने उस छेद के ऊपर-नीचे की ईटें निकाल दीं. साँप की तरह देह घुमाती हुई भीतर घुस गई थी. विद्या के बक्से से उसके सारे कपड़े निकाल लाई थी. विद्या के भैया की पैंट काट कर उसने बुलबुल के नाप का बना लिया था. चंदन ने पहचान कर कहा था- ''दो साल पहले की राजजात में विद्या यही सलवार-कुर्ता पहने हुए थी. मैंने उससे कहा कि चलो आज ही नन्दा-मन्दिर में ब्याह कर लें. विद्या तैयार नहीं हुई. कहने लगी भाभी के बच्चा हो जाये तब वह भइया से नेग में मुझे माँग लेगी.''

''विद्या को बहुत कुछ याद दिलाना है. मैं दो-चार रोज में लौटता हूँ लछमी!''कह कर चंदन राजधानी गया था. चंदन के दो-चार दिन को आज दो-चार महीना बीत गये.

लछमी ने लंबी साँस ली और कटोरा उठा लिया. वो तो कहो उसने बुलबुल को सिखा रखा है कि मन्दिर में झाड़ू लगाने के बदले पुरोहित जी से चायपत्ती और अखबार माँग लाया कर. मीठी तुलसी पत्तियों की चाय पीकर मन ऊब गया है. आज चीनी का सुराग मिला है. 

गंगाराम चाचा के घर के पीछे के टूटे हिस्से तक वह पहुँची ही थी कि, ''दीदी! दीदी!'', ''यह तो मेरा बुलबुल पुकार रहा है!''हाथ का कटोरा गिर गया. टूटी दीवार पर झुकी लतरों को बाएँ हाथ की बैसाखी से हटाती हुई बाहर आई. सामने पहाड़ी से, बुलबुल अपनी देह पीछे किए, छोटे-छोटे कदमों से उतरता चला आ रहा था. बाई पहाड़ी पर काकी निकल आई थीं.
''दीदी! किसी खाली घर में न घुसना!''
''मैं किलै जवों कै क कुड़ माँ !'' (मैं क्यों घूँसू किसी के घर में!)
''पुरोहित बाबा कहे हैं कि चौसिंग्या यहीं आस-पास छिपा है...किसी खाली घर में. मालूम दीदी! कई दिनों से उसे पूजा के लिये भूखा रखा गया था. चार सींगोंवाला मरकहा...उसने एक पुलिस वाले की बांह में सींग घुसा दिया है. मैंने देखा उस पुलिस वाले को...जैसे बाँह पर चक्कू मारा गया हो.''

''बज्जर पड़ी! परलय हवे जाली! देवभूमि के राजधानी बडऩ से एक बरस पैली की बात च. ढेबरू गदना पोडग़ी. व्वै साल भौत मार-काट मची.'' (बज्र गिरेगा! प्रलय होगी! देवभूमि के राजधानी बनने से एक बरस पहले की घटना है. भेड़ा फिसल कर खाई में गिर गया था.) उस बरस की गोलीबारी को याद करती हुई काकी सिर पीटती बैठ गई थीं.
''सब के बीच से चौसिंग्या गायब कैसे हो गया ? जात्रा में इतने लोग थे...सब अंधे हो गये थे क्या ?''

''पुरोहित बाबा सबको बता-बता के थक गये हैं दीदी! वासुकि गुफा से सबसे आगे भेड़ा निकला. चौसिंग्या के पीछे-पीछे राजा साहब को जाना था. उन्हें पालकी से उतरने में देर हुई...बहुत मोटे हैं न. गुफा पार करके देखते हैं कि भेड़ा दूर-दूर तक नहीं है. मालूम दीदी! राजधानी से ये बड़े-बड़े ट्रक भर के सिपाही आए हैं. जंगल में पत्ता उठा कर भी देखा जा रहा है.''

''कखी मैमू न पूछे जाऊ. कि व्वै साल पूछताछ हवे. सिपै बोललू बुढऱी अभी तकै बची च.''(कहीं मुझसे न पूछा जाये...उस साल पूछताछ हुई थी...सिपाही कहेंगे बुढिय़ा अभी तक जिन्दा है.) काकी अपनी कोठरी में चली गई थीं.

''मैं ट्रक से टक्-टक् कूदते सिपाहियों को देखने जा रहा हूँ.''डलिया में रखी रोटी लपेटते हुए बुलबुल पहाड़ी की ओर मुड़ गया था.

''तू फिर चल दिया! उनसे दूर ही रहना बुलबुल!''भाई के जाते ही वह गंगाराम चाचा के घर की ओर बड़बड़ाते हुए बढ़ी-''कहता है किसी के घर में नहीं घुसना. अरे ये कोई चोरी थोड़े है. अनाज का...सामान का...आदर करना है. रखे-रखे सब सड़ ही तो जायेगा.''चंदन के खेत का अनाज वह पहले ही काकी को दे चुकी है. बुलबुल ने एक दिन पूछ लिया-''दीदी! तुम विद्या दीदी के कपड़े क्यों पहने हो ?''तब वह सच नहीं बोल पाई थी. उसने बुलबुल से कहा कि विद्या ये कपड़े मुझे देकर गई है. वैसे तो विद्या, अपना सबसे कीमती सामान...चंदन को भी उसे सौंप गई थी. ओह ! फिर वही चंदन पुराण....

गंगाराम चाचा के खाली घर में कभी उसकी आने की हिम्मत नहीं पड़ी. सामने की दीवार पर उसके अम्मा-बाबा की फोटो लगी थी. बोरियों में भरे पुराने कपड़ों की भुरभुरी चूहों के काटने से फैली थी. टाँड़ की लकड़ी आधी जुड़ी, आधी टूट कर लटक गई थी. टूटे हिस्से का गूदा दीमक खा गये थे. चूल्हे के पीछे के दीवार की कालिख धूल से सफेद थी. चीटियों की कतार एक लकड़ी के बक्से से निकल रही थी. एक बार की चोट से जंग लगा ताला टूट गया.

गंगाराम चाचा तीन पहाड़ी नीचे, अम्मा के गाँव के थे. अम्मा के गाँव के सभी घरों में ताला पड़ गया. तब वे बाबा के साथ रहने के लिये कांसुवा आ गये थे.
बाबा हमेशा कहते ''सैसुरसे मैं से द्वि इनाम मिलेन...एक ये बढिय़ा घड़ी और दूसरा ये खड़ंजा गंगाराम!''
''खडंज़ा नहीं है गंगाराम!''चाचा कहते-''देख लछमी के बाबा! ये पचास का नोट मुझे भूरी वाली सदरी से मिला है. चल, बीस तू रख और तीस मैं रखता हूँ.''

''मैं भला कैसे रख सकता हूँ गंगाराम! ये तेरे हैं.''

''क्योंकि मेरी किस्मते से ये पैसे खो गये थे. तेरी किस्मत से मिले हैं. तो तेरा हिस्सा हुआ न ?''

''तुझे भूलने की बीमारी है. किस्मत को मत डाल बीच में. हर तीसरे दिन कहता है कुर्ते की जेब से मिले...कपड़ों की तह में मिले.''

''बगडिय़ा! त्वै सड़े चढ़ौड़़ू रलू तब हरच्यूं-खोयूँ सब मिननू रौलू.''(दोस्त! तुझे चढ़ावा करता रहूँगा तो बिछड़ा-खोया सब मिलता रहेगा.)

''अरे सुनती हैं लछमी की माँ! येरुंसूढ़ (रसोई) ओर देख रहा है. अपने मायके वाले को चाय दीजिये.''
''खाना भी बन गया है.''रसोई से अम्मा कहतीं.

गंगाराम चाचा को फौज से पेंशन मिलती थी. उसके बाबा-अम्मा के पास अनाज तो था पर पैसे नहीं रहते थे. चाचा के पैसों से किरासिन, चीनी-चायपत्ती और बाद के दिनों में बाबा की गठिया की दवा आने लगी थी.

गंगाराम चाचा के किसी सदरी या कुर्ते की जेब में आज भी तो पैसे नहीं होंगे? चाचा की सदरियाँ निकाल कर वह जेबें टटोलती गई. कुछ नहीं मिला-''चाचा! सिर्फ  बाबा के लिए तुम्हारा रुपया था...मेरे लिए कुछ नहीं ?''सदरियाँ तह करके वह दबा कर रखने लगी. कुछ हथेली में गड़ रहा था. उसने फिर टटोला हाँ, कुछ है... इसी सदरी में है. सदरी की भीतर की जेब फट गई थी...उसके अन्दर...अस्तर में क्या है ? वह काठ जैसी खड़ी रही-
हथेली पर...यह तो उसके बाबा की घड़ी है!


''तू सुन रहा है बगडिय़ा! रिश्ते का भतीजा मुझे राजधानी बुला रहा है. मैं पहाड़ छोड़ कर कहीं नहीं जाऊँगा.''

''लेकिन तुम बीमार रह रहे हो गंगाराम!''

''मैं अब तुम्हारे पास आ गया न! अपने गाँव में अकेला पड़ गया था...भौजी के हाथ का खाना...बेटी लछमी के हाथ का पानी...मैं ठीक हो जाऊँगा. यहाँ से गया तो पक्का मर जाऊँगा.''
''रोटी और भंगजीरे की चटनी से कहीं सेहत बनती है. ठंडा घर ने रेट भौत बढ़ा दिया...पहाड़ी अल्लू के बीज ऐस्से महँगे हुए. इस बार बो नहीं पाया.''
''ये ले...मेरी पेंशन रख. चिन्ता किस बात की यार!''
''देख रही हो लछमी की अम्मा! तुम्हारे गाँव के यही लच्छन हैं? थाली के पैसे दे रहा है.''
''नहीं-नहीं दोस्त! ऐसा मत कहो. तुम्ही लोग मेरा परिवार हो.''

गंगाराम चाचा के पैसों से अब साग-भाजी भी आने लगी. अम्मा जब गंगाराम चाचा की थाली में भात रखतीं तो फैला देतीं. बाबा की थाली का भात खूब दबा देती और भात के बीच में मसले आलू रख देतीं. हम सबकी कटोरियों में दाल डालने के बाद भगोने में थोड़ी दाल बची रहती. उसमें पानी मिला कर भगोना हिलाती और गंगाराम चाचा की कटोरी में डाल देतीं. अम्मा, दाहिने हाथ में बाबा की और बाएँ हाथ में गंगाराम चाचा की थाली पकड़ा कर उससे कहतीं- ''जा लछमी! बाहर दे आ, ध्यान से...हाथ न बदले.''

कम खाकर भी गंगाराम चाचा सेहत मन्द हो रहे थे. उसके बाबा दुबले होते जा रहे थे. उस रात, भरे बादलों जैसी आवाज सुन कर उसकी नींद खुल गई थी. यह बाबा थे जो अम्मा से कह रहे थे-

''तुम्हारे पिताजी ने मंडप में वो घड़ी मेरी कलाई पर बाँधी थी. अपने घड़ी वाले हाथ से तुम्हारा कंगन वाला हाथ पकड़े हुए मैं दिन भर बिना थके चला था. बाराती आगे निकल चुके थे. मैं तुम्हारे साथ बाल्दा नदी के किनारे-किनारे... नन्दा-मन्दिर... पहाडिय़ाँ चढ़ता... दिन ढले कांसुवा पहुँचा था. पहाड़ी पर खड़े मेरे बाबूजी राह देखते हुए मुस्कुरा रहे थे. मैं दिन में कई बार अपनी घड़ी देखता था. और मेरे लिये समय वहीं ठहर जाता. मुझे लगता था कि मैं आज भी अपने बाबूजी का वही जवान लड़का हूँ, गुलाबी पगड़ी बाँधे. लछमी की अम्मा! मेरी घड़ी खो गई...हर जगह देखा...ये देखो झाडिय़ों में खोजते हुए देह फट गई...घड़ी नहीं मिली. ऐसा लग रहा है...मेरा समय खो गया...मैं बूढ़ा हो जाऊँगा जल्दी ही !''
''मेरे रहते आप क्यों बूढ़े होगे भला! पुरणूं सामान छौ...हरचीगै!'' (पुराना सामान था... खो गया!)
''इन पहाड़ों में जिन्दा रहने के लिए वो सनक मेरा सहारा था.''
''हम भी राजधानी चलें क्या ? ''
''लछमी को लेकर हम कहाँ भटकते फिरेंगे ? हमारा कौन है राजधानी में!''
''सुनिए, आप गंगाराम भाई को क्यों रोकते हैं ? मैं आपसे कितनी बार कह चुकी हूँ... उन्हें शहर जाने दीजिए.''
''वो चला जायेगा तो बात किससे करूँगा ?''
''आप हमसे बात कीजिए.''
''तुमसे ? तुम हर समय...मेरी नौनी लछमी कू क्या होलू...मेरी बच्ची का क्या होगा...कैसे पार लगेगी...यही रटती रहती हो. गंगाराम मुझे हँसाता है.''बाबा थोड़ी देर चुप रहे फिर बोले,''जिस दिन तुम कह दोगी कि गंगाराम को शहर मत जाने दीजियेगा... यहीं गाँव में रहने दीजिए... उस दिन मैं इस दुनिया में नहीं रहूँगा.''

''आप सब जानते हैं तब शान्ति से सो जाइये.''

बाबा राजधानी नहीं गये इसका कारण वह थी. लेकिन गंगाराम चाचा, गाँव से प्रेम में नहीं बल्कि...ओह! पहले ही दिन उन्होंने 'मामा'कहने पर टोक दिया था-''बेटी! मैं तुम्हारे बाबा का यार हूँ. मुझे चाचा कहो.''नहीं-नहीं, गंगाराम चाचा के पास यह घड़ी भूल से आ गई होगी... चाचा वापस करना भूल गये होंगे... वह समझने में भूल न करे... इसके लिये फिर स्मृतियों में जाना होगा-

गंगाराम चाचा पर उनका भतीजा राजधानी चलने के लिये दबाव बढ़ा रहा था. गंगाराम चाचा, बाबा से पहले और अचानक एक सुबह इस दुनिया से चले गये. अम्मा को यह याद नहीं रहता था कि गंगाराम चाचा अब नहीं हैं. वो हर दूसरे-तीसरे दिन चार रोटी या दो मुट्ठी भात ज्यादा बना देतीं. बासी खाना वह घर में किसी को नहीं देती थी. बाबा की नजर बचा कर वह दूसरे पहर खातीं और थाल में बूँद टपक जाती.
''साथ रहते-रहते जानवर से भी प्रेम हो जाता है!''एक बार जब अम्मा नौला पर बर्तन धो रही थीं और बाबा खेत में काम कर रहे थे तब गंगाराम चाचा ने बहुत जोर से यह बात कही थी. बाबा कुदाल रोक कर हँस पड़े थे-''अबे...तू मेरी बच्ची का चाचा बन बैठा है. मैं तुझे साला कहके ढंग से गरिया भी नहीं कह सकता!''

अब यह बक्सा बन्द करो और चाचा से जुड़ी यादें भीं. उसने कुंडा फँसा कर बक्से को बोरिया से दबा दिया. आदतन, अपने कुर्ते के भीतर कीमती सामान रखने लगी. उसे याद आया कि सारी शमीजें फट गई हैं. कुर्ते के भीतर उसने अम्मा का ब्लाउज पहना है. ब्लाउज भी फट गये... बन्द घरों के भी सामान खत्म हो गये तब क्या होगा ? माल्टा और झरबेर से कैसे काम चलेगा. बुलबुल अब बड़ा हो रहा है. उसकी देह बाबूजी जैसी तैयार होनी चाहिये. चंदन से उसने कहा था कि तुम राजधानी में अपने रहने का इंतजाम करके बुलबुल को ले जाना. तब कांसुवा में सिर्फ  वह और काकी रह जाएँगें! घबरा कर उसने पुकारा-

''काकी...काकी ऽ! बाहर आइये.''काकी और उसके बीच एक समझौता है. काकी हर सुबह कोठरी से बाहर निकल कर ''जैऽऽ हो नन्दा मैया !''जयकारा लगाती हैं. लछमी इधर से, ''जयऽ हो!''में जवाब देती है. इसका मतलब है, 'आज तो हम जिन्दा हैं. कल की देखी जाएगी.'काकी से उसने कितनी बार कहा कि नीचे आकर उसके साथ रहें. वो कहतीं-''चार कदम तुमरा बुन्नन उतरलू....फिर क्वी बोललू चार कदम दैणा राजधानी चला! मैं नी हलकण वली.'' (चार कदम तुम्हारे कहने से उतरूँ... फिर कोई कहेगा चार कदम दाहिने राजधानी चल चलो! मैं नहीं हिलने वाली.)जिन दिनों कांसुवा आबाद था उन दिनों निसंतान विधवा काकी की जमीन का लोभ रखने वाले उनकी टहल किया करते थे. धीरे-धीरे जब अपनी जमीन छोड़ कर लोग भागने लगे तब काकी को उनकी जमीन के लिये कौन पूछता.
''काकी! कब से बुला रही हूँ.''
''मिन अपणा डाला का माल्टा...यू देख...ईं जगा गड्ढा मां ढकै लिन. छ: महीना तके खराब नी होण्या. तुम लोग खैल्यान!'' (मैंने अपनी डाल का माल्टा...ये देख...यहाँ गड्ढे में ढक दिया है. छ: महीने तक खराब नहीं होगा. तुम लोग खाना!)

''क्यों, आप क्यों नहीं खायेगी ?''

''मैं छ: महीना बच्यू रोलू तब न ? तब न खोल्यू यूँ माल्टो!''(मैं छह महीने बची रहूँगी तब न!)
''जो बचेगा क्या वो माल्टा खाकर बचेगा !''

''मेरा चौक वाला पुराणां डाला माँ हारिल का घोसला छ. तुमुन त नी देखिन पर बुलबुल देखिणी छै. आसमान देखणी रै...(मेरे आँगन वाले पुराने पेड़ की डाल पर हारिल का घोसला है. तुमने तो देखा है...नहीं, बुलबुल देख रहा था. आसमान ताकती रहना...)
''क्यों भला ? दूसरे भौत काम हैं. ओरे! काका तो नहीं झाँकने वाले आसमान से?''
''चुप रेले! आँधी से पैली मैं वै पुराणां डाला का तौल लखड़ू लगै द्योलू. सहारू रोलू.''( चुप रह! आँधी से पहले मैं पुराने पेड़ की उस ओर की डाल के नीचे लक्कड़ लगा दूँगी. सहारा रहेगा.)
''काकी! तो आज आसमान लाल च (है).''

''इतगं त रो लाल रौन्दू. बुलबुल कख च? बच्चा कू जरा ध्यान राखा. सुबेरे निकल्यूँ श्याम ह्वेगी.(इतना तो रोज लाल रहता है. बुलबुल कहाँ है? बच्चे का तनिक होश रखो. सुबह के निकले शाम हो गई.'')

''अभी बुला लेती हूँ! बुलबुलऽऽ!''

बूँदों की लड़ को, तेज हवा पत्थर पर पछार रही थी. जैसे 'देबी आईं हैं'वाली औरतें 'हुम्म...हुम्म!'करके झूमते हुए नन्दा-मन्दिर के चबूतरे पर अपने केश पटक रहीं हों. खाली घरों की खिड़कियाँ-दरवाजे टकरा रहे थे. कडड़़कड़!...लगा कि कहीं पास ही बिजली गिरी है. बुलबुल के कान पर उसने धीरे से तकिया रख दिया था. छोटू भुल्ला (छोटे भाई ) की पीठ पर हाथ रखे रात भर बैठी रही. सुबह का अंदाज करके उसने खिड़की की झिर्री के पास मुँह किया और पुकार लगाई-''जय ऽ हो काकी!''कहने के साथ ही समझ गई कि वहाँ तक आवाज नहीं पहुँचेगी. बुलबुल जरूर उठ गया. ''जय हो!''उसने मुस्कुरा कर जवाब दिया. पिछली बारिश में माचिस सील गई थी और बुलबुल को दो दिन भूखा रहना पड़ा था. इसलिए आसमान लाल होते ही वह रोटियाँ बढ़ा कर बना लेती है.

टूटी छत और दीवारों वाले घरों में पानी भर रहा होगा. क्यों उसने बुलबुल के कहे पर कान दिया...सारा सामान उठा लाना चाहिए था. ये बुलबुल क्या कर रहा है ? अरे वाह रे! बुलबुल एक चमकती आँख वाले चूहे के आगे रोटियों के टुकड़े रख रहा था. लछमी ने एक बार भी नहीं कहा कि ''बुलबुल! रोटियाँ क्यों बेकार कर रहे हो ?''शाम तक चूहा आराम से कोठरी में मँडराने लगा था. लछमी को राहत महसूस हुई. कोई तीसरा भी है आस-पास !
दो रात के बाद तीसरी सुबह बारिश बन्द हुई.

''काकी...काकी ऽ ऽ!''भीगी घाटियों में उसकी आवाज बैठती जा रही थी.
''बुलबुल! तुम पुरोहित जी के पास जाओ और कहो कि चौसिंग्या भेड़ा हमारे गाँव में नहीं है. लछमी दीदी ने सारे घर देख लिये हैं. और हाँ, माचिस लेते आना!''
''थोड़ी देर में चला जाऊँगा.''
''नहीं, तुरन्त जाओ! कहीं बारिश फिर न शुरू हो जाये.''
आसमान साफ था. बुलबुल के ओझल होते ही वह बाएँ हाथ में बैसाखी सँभाले, दाहिने हाथ से पत्थरों को पकड़ती हुई चढऩे लगी. बजरी से लिपटी हुई मिट्टी बह चुकी थी. लछमी ने एक बड़ी गोल चट्टान को पार किया और चुपचाप बैठ गई.
उसे दो पल यह समझने में लगा कि उसके भय और भ्रम ने आकार नहीं लिया है. जो कुछ सामने दिखाई दे रहा है, वह सच है.

सामने काकी औंधी पड़ी थीं. काकी के घर से यहाँ तक की घास दबी थी. जैसे कोई इन पर फिसलता चला आया हो. चट्टान से टकरा कर सिर खुल गया था. खुला हुआ सिर धुल चुका था. त्वचा सफेद हो कर सिकुड़ गई थी. उसने वन की ओर व्यर्थ ही देखा. लकडिय़ाँ गीली थीं. वह सँभल कर खड़ी हुई और एक हाथ से तेजी से लंबी घास नोचने लगी. उसने काकी की देह को घास और चपटे पत्थरों से ढक दिया. हाँफते हुये हाथ जोड़ा. साँस लेकर बुदबुदाई- ''काकी ! दुख-सुख कहने-सुनने वाली कोई हमजात न रही. तुम्हारी आत्मा कांसुवा में न भटकती रहे...बाल्दा नदी में बह जाये. जयऽ हो काकी!''
''दीदी!''पहाडिय़ों पर खड़े बुलबुल के रोने में उलाहना था-''अब क्या देखने के लिए इस गाँव में रूकी हो?''

''तुम यहाँ कब से? क्या देखा ?''
''निकल चलो नहीं तो ऐसे ही एक दिन हम भी मर जाएँगे.''
''मैं निकल गई तो यह गाँव मर जायेगा...मैं चल जौलू त यू गौं मर जौलू.''
''कहती रहो...मैं तुम्हें यहाँ नहीं रहने दूँगा. पीठ पर लाद कर ले चलूँगा तुम्हें! राजधानी के होटलों में छोटे लड़कों को काम पर रखते हैं. खाना भी देते हैं. पुरोहित बाबा जानते हैं. मैं अभी उनसे बात करके आता हूँ!''


''कोई कहीं नहीं जायेगा जब तक चौसिंग्या भेड़ा मिल नहीं जाता.''दाहिनी पहाड़ी पर आठ-दस पुलिसवाले खड़े थे. सबसे आगे...सम्भवत: वह पुलिस अधिकारी था...उसी ने वहीं से ठंडी आवाज में कहा-''सुन ऐ लँगड़ी! मेरा मतलब लड़की...तू इन टूटे घरों के कोने-अँतरे देख लेना. और लड़के! तू खाई की ओर देख ले. हम कल फिर आएँगे.''

''ये मेरा गाँव है. तुम्हारी खुली जेल नहीं.''
''अब तक इस भुतहा गाँव में अपने मन से रह रही थी. मैंने रोका तो ऐंठ रही है. चारों ओर घेरा है. कोई निकल नहीं सकता.''

''मैदान का गँवार है कोई. उसे ये नहीं मालूम कि पहाड़ों में चिल्ला कर बात नहीं करते. पहाडिय़ाँ पहले काँपती हैं फिर चिल्लाने वाले पर गिर पड़ती हैं.''

''दीदी! वो पुलिस है. इन गिच्चू नी चलौदन! ऐसे जबान नहीं लड़ाते. चलो! उसका काम कर दें.''
''पहले मेरे साथ चलो. गंगाराम चाचा के घर का दरवाजा उठा कर यहाँ लाना होगा. एक उन्हीं के घर में तेबरी (छज्जा)है...दरवाजा भीगा नहीं है. काकी का शव जला कर राख बिखेर देनी है.''

''दरवाजा तोड़ेंगे तो पुलिसवाला लौट आयेगा.''
''दरवाजा कोई पहले ही तोड़ चुका है.'' 
''भेड़ा तो दरवाजा तोड़ नहीं सकता.''

''बारिश बन्द होने के बाद मैं सारे घरों को एक बार देख रही थी. दरवाजों को दीमक खा चुके हैं. तोडऩे में बहुत जोर नहीं लगा होगा.''

''अँधेरे में...ताबड़तोड़ बारिश में कोई आया है दीदी! ये...इधर देखो!''
''हाँ! छोटे-छोटे गड्ढे...वह जो कोई है...बारिश में जगह-जगह बैठा है और बार-बार गिरा है.''
चौखट से दिखाई दे रहा था. कोने में, दीवार के सहारे एक युवक कभी बैठ रहा था, कभी लुढ़क जाता. अपने घुटनों पर हथेलियाँ मारता हुआ कराह रहा था-''मेरी मदद करो!''
''कौन हैं आप ?''

''मैं ? मैं...राजजात यात्रा का चौसिंग्या भेड़ा हूँ.''मुस्कुराने से उसके फटे होंठों में फँसी रक्त की लकीर चमक गई.

बुलबुल ने दरवाजे का एक फट्ठा तोड़ कर जला दिया. लछमी जड़ी पीस कर उसके घायल पाँव पर बाँध चुकी थी. ठंड और दर्द से काँपते युवक के पास दोनों बैठे रहे. आग और इंसान की गर्मी पाकर वह युवक सो चुका था. लकड़ी का एक और फट्ठा जलाकर वहीं, ईटों के चूल्हे पर खाना बना.
''दीदी! आधा दरवाजा बचा कर रखना है, वो...!''
''हाँ, अभी इस मेहमान को बचा लें.''

''ओ भेड़ा भाई जी! उठो खाना खालो.''सोये हुए युवक के नाक के पास बुलबुल रोटी लहरा रहा था. उसका टोटका काम कर गया. उठने के लिये वह युवक करवट घूम रहा था. भाई-बहन एक दूसरे को देख कर बहुत दिन बाद मुस्कुराये थे.
''हमें एक जरूरी काम है भेड़ा भाईजी ! हम लोग जाएँ ?''

''मैं ठीक हूँ.''उसकी आवाज साफ  और पतली थी. चूल्हे की रोशनी में लछमी ने ध्यान से उसका चेहरा देखा. उसके गाल तने हुए थे. आँखों की कोर और माथे पर रेखाएँ पड़ गई थीं जैसे ये हिस्से भींची हुई हालत में रहते हों.

''आप मास्टर हैं?''लछमी ने उसकी जेब में खोंसी कलम से अनुमान लगाया.
''हाँ!''रोटियाँ चुभलाने से उसके जबड़ों में दर्द हो रहा था. फिर भी वह जल्दी-जल्दी खा रहा था.
''लेकिन यहाँ दूर-दूर तक स्कूल नहीं है फिर आप मास्टर कैसे?''
''स्कूल था...था न स्कूल. बहुत बच्चे थे. मैं अपने हाथ से उनके लिए पन्ने बटोर कर कॉपी बनाता था.''खाने के लिये उठाया हुआ कौर वह थाली में ठोंकने लगा.
''आप खाते रहिए. यहाँ सब ऐसे ही है...हमारे  कांसुवा के भी सब लोग....''
''मैं कांसुवा के कई लोगों से राजधानी में मिला हूँ.''
''अच्छा! क्या विद्या से मिले हैं ? विसम्भर काका, मदन भैया, शीला चाची....''
''तुम कांसुवा आये भाईजी! बहुत अच्छा किये. गाँव आये. मैं बेर की कांटो भरी डाल पर न ! कैसे कोई चढ़ेगा...सारी पकी बेर ऊप्पर-ऊप्पर बच गई हैं. तुम अपने डंडे जैसे लंबे हाथों से...वाह!''बुलबुल ने अपनी जंघा पर ताल मारते हुए कहा.

''मुझे बात करने दो बुलबुल!''लछमी चिरौरी करने लगी-''आप ये बताइये भेड़ा जी... मेरा मतलब मास्टर जी! शीला चाची की बहू के नौनी हुई है या नोनू? चाची नाम क्या रखी हैं... आपको कमजोरी तो नहीं लग रही... कि बात कर सकती हूँ.''

''दीदी! बस एक बात कह लेने दो. भेड़ा भैया! कोयल अपना अंडा कौए के घोसले में रख गयी है...मेरे साथ चलना...मैं दिखाऊँगा कि कौआ कैसा उल्लू होता है!''

''चल बुलबुल! इन्हें सो लेने दे.''युवक को बहुत देर तक चुप देख कर लछमी ने उठते हुए कहा.
''बुलबुल! पुलिस एक बार इलाका खाली कर दे फिर तुम्हारे लिये बोरा भर झरबेर तोड़ दूँगा.''उसने सिर झुकाये हुए ही कहा.
''आप बुलबुल का नाम कैसे जानते हैं ?''

''आपने ही कई बार इसका नाम लिया है. आप खड़ी मत रहिये. मुझे गर्दन उठाकर बात करने में तकलीफ  हो रही है. आपकी सखी विद्या से मैं आज से तीन महीना पहले मिला था... राह चलते. वह किसी नौकरी पेशा मैडम के बच्चे की देखभाल करती हैं.''

''वो तो कहती थी मैं अनजान लोगों से बात नहीं करती...थोड़ी सुन्दर है न!''वह बैसाखी एक ओर रखते हुये बैठ रही थी.

''मैंने उससे कहा कि कांसुवा से आपकी सहेली लक्ष्मी ने हाल लेने भेजा है.''

''लेकिन हम और आप पहली बार मिल रहे हैं!''

''लड़कियाँ...उनकी सहेली...भाइयों के नाम...हम लड़के सब पता किये रहते हैं. है न भैया बुलबुल!''
''लेकिन आप कांसुवा के लोगों से क्यों मिले ? ऐसे ही या....''

''लक्ष्मी जी! आप की रुचि मुझमें ज्यादा दिखाई दे रही है, कांसुवा के लोगों में कम.''

''लक्ष्मी नहीं, लछमी कहिये. मेरे बाबा मुझे लछमी कहते थे. हाँ, अब बताइये वहाँ सब कैसे हैं ?''

''आप भी राजजात यात्रा नहीं, राजाजाति की यात्रा कहिए. तब सुनिये...आपके कांसुवा से विश्वनाथ चाचा का बेटा रमेश सबसे पहले राजधानी गया. चार महीने बाद गाँव आया और पत्थर कटाई के लिये मेटाडोर में भर के लड़कों को ले गया. कमीशन पर वह ठेकेदार के लिये चौड़े फेफड़े और मजबूत बाहों वाले मजदूरों की डिलीवरी देने लगा. रमेश तो ठीक है. पर उसके साथ के तीन मजूदर दिल्ली के बड़े अस्पताल में भर्ती हैं. उनके फेफड़ों पर पत्थर कटाई की गर्द जम गई है...वहाँ के डॉक्टर ने कहा है कि इनको पहाड़ की साफ  हवा में रखिए.''
''यहाँ लौट कर कोई नहीं आया है.''

''मालूम है. राजधानी की नयी बनती इमारतों में अब उनकी पत्नियाँ और बच्चे पत्थर ढोने लगे हैं.''
 ''यहाँ कोई लौटे भी तो कैसे...यहाँ कुछ तो नहीं है. रात-बिरात तबीयत खराब हो...कई पहाड़ पार भी अस्पताल नहीं. ''

''अब कल बात करते हैं.''

चूल्हे के पास बुलबुल को गोद में लेकर वह लुढ़क गई. बुलबुल ने धीरे से कहा-''दीदी...काकी!''
''सुबह इस मेहमान की मदद से हम उनका दाह कर देंगे. एक उम्र के बाद तो सभी को मरना है भइया! सो जाओ.''

   
उजाले का छत्ता ओसारे की जमीन पर सोये अजनबी पर गिर रहा था. लछमी ने उससे कहा-''मास्टर! करवट बदल कर इस बोरे पर आ जाओ! ना..ना, उठो नहीं. लेटे हुए ही.''ईंट निकली दीवार में हाथ फँसा कर वह धीरे से अपने को पीछे खींचती, फिर दोनों हाथों से बोरा घसीटती हुई, मास्टर को पीछे की कोठरी में ले गई.

''आप तो अच्छी-भली नर्स हैं. जड़ी-बूटियों की भी इतनी जानकारी है. आपके बारे में यह बात मुझे नहीं मालूम थी.''
''मेरे बारे में अगर कोई एक बात तुम नहीं जानते हो तो इतना पछतावा क्यों हो रहा है?''
''मेरी जानकारी से कोई बात भले छूट जाये लेकिन तुम्हें और बुलबुल को सब कुछ जानना है. वैद्य की... मास्टरी... अनाज उगाना... मछली मारना सब कुछ सीखना होगा...बन्दूक और चाकू चलाना भी.''

''उठो! मेरे हाथ की चाय पीलो. सन्निपात में तुम जाने क्या-क्या बके जा रहे हो.''लछमी ने बुलबुल को भी जगा दिया था. गरम चाय की घूँट से मास्टर के चेहरे पर आराम मिलता देख लछमी ने बात आगे बढ़ाई- ''राजधानी में आप...नहीं...तुम क्या कांसुवा के सब लोगों से मिले थे ?

''चंदन से न? मिला था. वो गार्ड की नौकरी कर रहा है.''वह मुस्कुराया.
''उसका सेना में जाने का बहुत मन था.''लछमी ने जोर से कहा. युवक के तिरछे मुस्कुराने और मजाक करने की आदत पर उसे गुस्सा आ रहा था- ''दर्द में आराम दिखाई दे रहा है. उठो, मेरे साथ चल कर कुछ काम करो!''

''मैं तुम्हारा काम कर दूँगा. उसके पहले तुम मेरा काम करो. ये कागज पकड़ो...पढऩा भूल तो नहीं गई...मैं बुलबुल को लेकर दाहिनी ढाल के वन की ओर जा रहा हूँ. जब तक लौटूँ यह कविता याद हो जानी चाहिए.''

''तुम्हारा पाँव चोटिल है. कहीं मत जाओ!''

''मैं तुम्हारी बाहों की ताकत देखने के लिये बोरे पर लेट गया था. बैसाखी की जरूरत तुम्हें नहीं, मुझे है.''लछमी, ''अरे-अरे...नहीं-नहीं मास्टर!''कहती रह गई. युवक ने बैसाखी खींच ली और बुलबुल का हाथ पकड़ कर बाहर निकल गया.

कागज हाथ में पकड़े वह सोचने लगी कि गार्ड की वर्दी में चंदन कैसा दिखता होगा. पिछली बार उसने चंदन से पूछा था-

''तुम विद्या से प्रेम करते हो और साथ मुझे रखना चाहते हो !''

''विद्या ने ही मुझे तुम्हारी और बुलबुल की जिम्मेदारी सौपी है.''

''बुलबुल मेरी जिम्मेदारी है. और विद्या के जाने के बाद तुम्हे भी मैंने ही सँभाला है.''

''कांसुवा और विद्या में से किसी एक को चुनने की दुविधा मुझे पागल कर देगी.''

''तुम विद्या को चुनो और खुश रहो.''

''देखना है कि राजधानी की जमीन में ज्यादा चुंबक है या कांसुवा में.''

''मानी बात है, राजधानी की जमीनें ज्यादा लोहा हैं. कांसुवा तो पत्थर हो रहा है.''

''मैं विद्या से बात करने जा रहा हूँ. जैसा भी होगा तुम्हें लौट कर बताता हूँ.''

तबसे वह राह देख रही है. चंदन हँसेगा कि आज बुलबुल को मेरे साथ राजधानी भेज रही हो. कल खुद चलोगी.

''चंदन! मुझ पर मत हँसो. हालात पर हँसो!''वह अपनी ही बड़बड़ाहट से चौंक गई. और अक्षर जोड़ कर जोर-जोर से कविता पढऩे लगी-
“पहाड़ों की यातनाएँ हमारे पीछे हैं
मैदानों की हमारे आगे....एक घाटी पाट दी गई है
और बना दी गई है एक खाई.''
(बर्तोल्त ब्रेख्त)
बाहर झाडिय़ाँ काटे जाने का शोर उठा.

''कौन है बाहर! पुलिस है क्या ?''जमीन पर हथेलियों के दबाव के सहारे वह घिसटती हुई चौखट तक आई. 

''ऐ लँग...लड़की! इन बन्द घरों की चाभियाँ तुम्हारे पास हैं ?''सैकड़ों राजजात यात्री झाडिय़ाँ काटने में जुटे थे. कई पुलिस वाले वर्दी-बेल्ट में खड़े थे. पिस्टल खोंसे कल वाला अधिकारी भी था.
''नहीं, मेरे पास इनकी चाभी नहीं है.''

''हम इन तालों पर अपना ताला लगा कर सील कर कर रहे हैं. जो घर टूट गये हैं उन्हें ढहा दिया जायेगा.''

''जिनके घर हैं वे लौट कर आयें तो ?''

''तो कह देना प्रशासन की अनुमति के बिना सरकारी ताले नहीं टूटेंगे.''
''ऐसा क्यों कर रहे हैं साहब जी! घर किसी का...ताला किसी का.''लछमी ने रुक-रुक कर अपनी बात कही.

''इन अठ्ठारह गाँवों में कुल आठ-दस लोग हैं. वे चौसिंग्या को छिपा रहे हैं. बारह बरस बाद जन्मा है चौसिंग्या...कल विधान सभा में प्रश्न उठा है. कहाँ गया? मिलना चाहिए.''

पुलिस और राजजात यात्रियों के जाने के बहुत देर बाद बुलबुल और मास्टर आये थे- ''मास्टर! क्या तुम खाई की ओर गये थे. उस ओर उगा तेजपत्ता तुम्हारे बाल में फँसा है.''

''मैं काकी के शव को खाई में फेंकने गया था.''

''तुम अनजान आदमी! अपनी औकात से बाहर जा रहे हो! काकी हमारी थीं. बुलबुल काकी को अग्नि देता.''

''दीदी! पुलिस दूर नहीं गई होगी.''लछमी की गोद में बैठ कर बुलबुल ने उसका चेहरा अपनी ओर घुमा लिया था.

''लकड़बग्घे भी आबादी की ओर भाग रहे हैं. मरने के बाद देह किसी काम आये. जीवन की बात करो. यह बताओ कविता याद कर ली? ''मास्टर शान्त था.

''नहीं, कविता याद करने से क्या मिलेगा जो याद कर लूँ मास्टर ?''बोलने से पहले लछमी, बुलबुल को गोद से उतार चुकी थी.

''बुलबुल! तुम मेरे पास आओ भैया! कल बुलबुल उस चट्टान पर बैठ कर पाठ याद करेगा. बुलबुल! चारों तरफ  निगाह भी रहना भैया! उस समय मैं और आप...हम दोनों नीचे औषधि छांटने चलेंगे.

''तुम होते कौन हो मुझे हुक्म देने वाले ? मैं तुम्हारे साथ नहीं जाऊँगी! ''

''विनती है. सिर्फ  दो घंटे के लिये मेरे साथ चलो. वे औषधि की पत्तियाँ दिखा दो जो तुमने मेरे घाव पर बाँधी हैं.''

''ठीक है. काम खत्म करो...फिर हमारा-तुम्हारा कोई नाता-वास्ता नहीं.''लछमी बड़बड़ाती हुई दाहिने हाथ से मास्टर का कंधा पकड़े और बाईं ओर बैसाखी लगाए नीचे उतर रही थी.

''सुनो! तुम कैसे आये इस रास्ते ? इस छोटे रास्ते के बारे में सिर्फ  हम जानते थे. इधर से ही स्कूल आते थे. वो देखो हमारे स्कूल का चबूतरा जिस पर बैठ कर रमादीन मास्साब पहाड़ा रटाते थे...दो एकम दो...दो दूनी चार...! मैं, विद्या, चन्दन, रघुपति, महेश्वर, बिमला...हम लोग पानी...वो घास का मैदान नहीं... सेवार से ढका ताल है. वहाँ हम अपनी स्लेट धोने जाते थे. मैं जाने से मना करती तो वे मुझे पीठ पर लाद लेते. एक बार मैं फिसल गई और डूबने लगी...चंदन ने मेरे लंबे बाल...पानी पर लहरा रहे थे...वो पकड़ कर खींचा...बापरे!''
''रमादीन मास्साब अब कहाँ हैं ?''

''पता नहीं. वो यहीं उस कोने वाली कोठरी में रहते थे. वोऽ उधर टूटी कोठरी दिखाई दे रही है! जाने से पन्द्रह दिन पहले उन्होंने पढ़ाना बन्द कर दिया था. सारी खडिय़ा बाल्टी में डाल दिये. और स्कूल की पुताई करते रहते थे. वो थक कर खडिय़ा में लिपटी दीवार के सहारे बैठ जाते. हम उनकी मदद को आते तो कहते बस बैठो... मुझे देखते रहो... मुझे भूलना मत... याद रखना. मेरे मास्साब का खडिय़ा पुता चेहरा...!''

''रुको! तुम्हारे आँसू पोंछने के लिए मेरे पास रूमाल नहीं. इसलिये रोना मत.''
''मरने से पहले मैं यहाँ आना चाहती थी.''

''मरने से पहले का क्या मतलब ?''

''मेरी बातें खत्म हो चुकी हैं. मैं और काकी, हम दोनों को कांसुवा के बारे में जितनी बातें मालूम थीं, हम दोनों एक दूसरे को बता चुके थे. फिर हम दोनों फसलों की बात करने के लिए अपने सीढ़ीदार खेतों की ओर देखते. जहाँ झाडिय़ाँ थीं. चिडिय़ों की किस्मों की बात करने के लिये आसमान देखते जो सूना था. उसी आसमान में चिडिय़ाँ उड़ती हैं जिसकी जमीन पर दाना होता है. जिन पगडंडियों को आदमी छोड़ देता है उन पर साँप चलते हैं... जैसे मेरे स्कूल का रास्ता...कितनी आसानी से मैं यहाँ आ जाती थी.''

''तुम्हें अपने स्कूल के सामने लाने के पीछे मेरा एक मकसद था.''

''क्या तुमने चौसिंग्या भेड़ा को यहाँ छिपाया है  ?''

''जिन लोगों ने अस्पताल यह कह कर बन्द करवा दिया कि यहाँ डॉक्टर नहीं हैं. फिर स्कूल बन्द करवाया कि यहाँ बच्चे नहीं हैं. उन लोगों ने भेड़ा चुराया है.''

''मैं नहीं मानती...उजाड़ कर किसी को क्या मिलेगा ? ''

''उजड़वाने में, बनाने जितना ही पैसा खर्च करना पड़ता...वो बच गया. विस्थापितों की बगावत से छुट्टी मिली. और कराड़ों में मुआवजा नहीं देना पड़ा.''
''ये क्या कह रहे हैं? अपने ही घर में हमें कोई मुवावजा क्यों देगा?''
''ये पहाडिय़ाँ आपकी नहीं हैं. बेची जा चुकी हैं. जहाँ हम खड़े हैं... जहाँ हम रहते हैं सब बिक चुका है. यहाँ रिसार्ट बनेगा. हम लोगों के विरोध के कारण काम रूका है.''
''हम लोग कौन ?''

''हम कई साथी हैं. खाली हो चुके घरों में रहते हैं. पहाड़ उजाडऩे में लगे अधिकरियों को उनका काम नहीं करने देते. इन्हें राजधानी के भवनों के लिये मजदूर चाहिये और भवनों में रह रहे मालिकों के मनोरंजन के लिये पहाड़ चाहिये. हम यहाँ से निकल कर नगरों में बस गये लोगों से मिलते हैं. मेरे जिम्मे कांसुवा से राजधानी गये लोगों से मिलना था. उनसे मिल कर यह समझाना था कि वे अपनी जड़ों की ओर लौटें. हम अपना अस्पताल, अपना स्कूल खोलें.''

''तुम संभवत: इनके अगुवा...मेठ हो.''

''पहरा ढीला पड़ते ही मैं अपना काम शुरू कर दूँगा. तुरन्त राजधानी जाऊँगा.''
''चंदन मेरे कहने से कांसुवा लौट आयेगा.''

''तुम चंदन के नाम एक पत्र बोल कर लिखवा दो. और तेजी से पढऩा-लिखना सीखो.''

''आज से ही शुरु करते हैं.''

''आज मैं तुम्हें लक्ष्मीबाई के बारे में बताऊँगा.''

''तय रहा. चलो पहले मैं तुम्हें मीठी तुलसी पत्ती की अच्छी सी चाय पिलाती हूँ.''

''नंदा देवी की जय!'जय राजजात यात्रा!''जयकारे की आवाज सुन कर लछमी की नींद खुली. आँखों पर गीली हथेली फेरते हुए जल्दी से बैसाखी उठा कर बाहर निकल आई.
ऊँचे पत्थर पर वह कल वाला पुलिस का अधिकारी खड़ा था. ढलान पर फैले सैकड़ों राजजात यात्रियों को संबोधित कर रहा था-''भक्तो! चार सींगों वाला भेड़ा बहुत तेज था. नंदा मैया की तरह बहादुर. लेकिन सरकारी अमला भी श्रद्धा से लगा हुआ था. ...जात्रियो! हमारे बीच राजा साहब जो हमारे माननीय सांसद भी हैं... इनके आशीर्वाद से... मइया की कृपा से...
...भेड़ा की बलि दी जा चुकी है!''

''जय चौसिंग्या मेठ!''

''मैं माननीय से आग्रह करता हूँ कि वे यात्रा पुन: आरंभ करने की घोषणा करें.''
''यात्रा आरंभ हो! जय नंदा देवी...जय चौसिंग्या मेठ!''ढोल-दमाऊ, झाल-मजीरे बज उठे.
''बुलबुल! उठो भइया! अब सब ठीक होगा... राजजात शुरू हो गई है.''वह सामने गंगाराम चाचा के घर की ओर तेजी से बढ़ी-''साथी! मास्टर जी! सोओ मत...उठो! शुभ दिन है! काम शुरु करें!''

टूटे दरवाजे वाले ओसारे में वह युवक पेट के बल पड़ा था. उसकी पीठ में छेद था. हृदय से रक्त बह कर जम चुका था.

''नन्दा देवी! पालकी से उतरो!'' जयकारा लगाते यात्री एक चीखती हुई आवाज सुन कर मुड़ गये. उन्होंने देखा कि बाई कांख में बैसाखी दबाये, दाहिने हाथ में पत्थर लिये, पीठ पर एक लड़के को चिपकाये, वह पहाडिय़ों पर खड़ी है. उसने नंदा देवी के मंदिर की ओर खींच कर पत्थर उछाला- ''वह अगुवा था...धुंध में तुम्हारा पथ प्रदर्शक था नन्दा देवी!''
''ऐ  लड़की!'' अधिकारी और राजा साहब झपटते हुए बढ़े.
राजजात यात्री देख रहे थे कि लड़की सँभलते हुए पत्थर पर बैठ रही है. उस छोटे लड़के को पीठ से चिपकाये है... बैसाखी को लाठी की तरह दोनों हाथों में उठा लिया है और उसकी पूरे दम की आवाज पहाड़ों से टकराने लगी-''ओ ऽ डलहौजी! वहीं रुक! मैं जीते जी अपना कांसुवा नहीं दूँगी!''
(लेखिका की अनुमति और पहल के प्रति आभार के साथ कहानी यहाँ भी प्रकाशित)
__________________________      
किरण सिंह : कहानी संग्रह ‘यीशू की कीलें’ 2016में आधार प्रकाशन से प्रकाशित. इप्टासे मिलकर अभिनय भी.
kiransingh66@gmail.com
मो0-09415800397 

परख : अज्ञातवास की कविताएँ (अविनाश मिश्र)

$
0
0




























युवा कवि अविनाश मिश्र की कविताएँ ज़िद और जिरह की कविताएँ हैं, अपनी शर्तों पर जीने की ज़िद और तमाम शातिर, हिंसक, गुप्त दुरभिसंधियों से जिरह.  उनका पहला कविता संग्रह ‘अज्ञातवास की कविताएँ’ साहित्य अकादेमी से अभी हाल ही में प्रकाशित हुआ है. इस संग्रह पर मीना बुद्धिराजा की  समीक्षा.  



आत्ममुग्धता के शोर में आत्मसजग  ईमानदार  कविता         
मीना बुद्धिराजा




विनाश मिश्र का पहला कविता संग्रह अज्ञातवास की कविताएँअभी हाल ही में प्रतिष्ठत साहित्य अकादमीसे प्रकाशित हुआ है जो  समकालीन युवा कविता में एक सार्थक रचनात्मक हस्तक्षेप है. निश्चय ही यह पुस्तक हिंदी कविता की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है जो निरर्थक शोर और अंहकार से भरे आक्रामक समय में एक खामोशी, आत्मसजगता और संज़ीदगी को आत्मसात कर के मानवीय नियति के कुछ बुनियादी सवालों को उठाती है. इन कविताओं में आज की चिंताएँ भी शामिल हैं और निकट भविष्य में अस्तित्व से जुड़े प्रश्नों को देखने- समझने की खास क्रिटिकलदृष्टि भी जो समकालीन कविता में परंपरा और लीक से हटकर कवि की अपनी स्वंतत्र दिशा को भी विकसित करती है. हिंदी के प्रसिद्ध कवि असद ज़ैदीने इस पुस्तक की भूमिका में लिखा है –


अविनाश मिश्र की कविता जहां से भी आती हो सीधे पाठक की तरफ आती है. कुछ ही कविताएँ पढ़कर पता चल जाता है कि वह एक अच्छे और टिकने वाले कवि हैं. कमनीय लगने की इच्छा से रहित. वह तिरछी निगाह से नहीं देखते, भाषिक सादगी और किफायत शुआरी से काम लेते हैं, नेपथ्य में मौजूद आवाज़ों का इस्तेमाल नहीं करते. कविता के एक कारीगर के बतौर वह स्वर-बहुलता और भाषिक वैभव के उपलब्ध संसाधनों की खोज भी नहीं करते. सच तो यह है कि अपनी तेज़-तर्रारी, सहज उम्दगी और आत्मविश्वास के बावजूद यह बहुत कम बोलने वाली और बहुत कम दावा पेश करने वाली कविता है. यह अपनी खामोश तबीअत को ढकने के लिये कहीं-कहीं वाचालता का भ्रम पैदा करती है. कभी आक्रामक भी लगती है, गौर से देखिये तो सोग मना रही होती है. पर इसमें भी वह हर क़दम पर अपनी पारदर्शिता और ईमानदारी को साबित करती चलती है. कुल मिलाकर अविनाश की कविता एक कठिन प्रतिज्ञा और अर्जन की कविता है.’

अज्ञातवास की कविताएँउन्हें समकालीन कविता में सक्रिय सृजनात्मक युवा प्रतिभा और अपनी पीढ़ी के प्रतिनिधि कवि के रूप में  सामने लाती हैं. इन कविताओं में हमारा सजग वर्तमान है और हमारे समय की विडंबनाओं की गहरी पड़ताल है. सधी हुई भाषा और अपनी सुघड़ अभिव्यक्ति में कुछ बुनियादी सिद्धांतों में अटूट आस्था कवि के विद्रोह और समर्पण सभी रूपों में उसकी वैचारिक और संवेदनात्मक दुनिया का विस्तार करती है जो इन कविताओं को एक अलग पहचान देती है. हमारे समय में कविता और क्या हो सकती है,वह उस सीमा-रेखा की खोज है जिसके एक तरफ अर्थहीन शोर है तो दूसरी तरफ जड़ खामोशियां. अविनाश मिश्र की कविता इन दोनो स्थितियों के बीच तमाम विडबंनाओं और त्रासदियों से गुज़रते हुए सभी तरह की क्रूरताओं, धोखों, प्रपंचों और बदकारियों का सामना करते हुए भरोसे की कोई अंतिम चीज़ बन जाना चाह्ती है. वह इस पूरे बेरहम समय का एक निदान चाहती है लेकिन जाहिर है कि यह कोई आसान काम नहीं है. इसलिये जब अव्यवस्था असहनीय हो जाती है तब कविता व्यवस्था के लिये अंतिम प्रयास है-
   
आततायियों को सदा यह यकीन दिलाते रहो
कि तुम अब भी मूलत: कवि हो
भले ही वक्त के थपेड़ों ने
तुम्हें कविता में नालायक बनाकर छोड़ दिया है
बावजूद इसके तुम्हारा यह कहना
कि तुम अब भी कभी कभी कविताएँ लिखते हो
उन्हें कुछ कमजोर करेगा

ये कविताएँ उन तमाम तरह की विरोधाभासी स्थितियों की तहें खोलती हैं, जिनमें अवचेतन और अमूर्तता की दुरूहता नहींएक तीखा तार्किक दृष्टिकोण है जो नियति और अस्मिता के प्रश्नों के सरल समाधान में यकीन नहीं रखतीं-
  
समझदारियाँ इतनी खोखली और बुराईयाँ इतनी सामान्य क्यों है आजकल
जबकि महानुभाव सब कुछ हिंदी में समझाते आए हैं
कोई कुछ बदलने के लिये मतदान
और कोई कुछ बदलने के लिये जनसंहार क्यों करेगा 
कुछ गलतफहमियाँ हैं आइए उन्हें दूर कर लें

चारों तरफ की अस्थिरताओं और संवेदनहीनता के बीच ये कविताएँ मानों जीवन की पुनर्रचना करती हैं. निजी परिस्थितियों से शुरु होकर एक निसंग तटस्थता के साथ वे तुरंत किसी सार्वजनिक सच तक पहुंच जाना चाहती हैं जिनमे भावनात्मक बहाव या आत्मसंलग्नता लगभग नहीं है. एक कविता के रूप में आज के अंतर्विरोधों और महानगरीय संस्कृति की दुशवारियों की तरफ वह सीधे सरल रूप में आती हैं और पाठक का ध्यान एक गहरे विडंबना बोध से खिंचता है –

बहुत सारी आत्मस्वीकृतियाँ हैं            
बहुत सारी पीड़ाएं और सांत्वनाएँ
बहुत कम समय और बहुत सारी शुभकामनाएँ
हालाँकि सब परिचित पीछे छूट चुके हैं
मुझे अवसाद और नाउम्मीदियों से बचना है
ईर्ष्या और अधैर्य से भी
मुझे अभिनय नहीं सच के साथ जीना है
जबकि यह दिन-ब-दिन मुश्किल होता जाएगा
लेकिन घृणा नहीं सब कुछ में यक़ीन बचाए रखना है मुझे
स्थितियाँ अब भी संभावनाओं से खाली नहीं.


अपने  आलोचनात्मक गद्य में अविनाश जी ने एक जगह स्वीकार भी किया है कि “रचना प्रक्रिया सरीखा धुंधला और कुछ भी नहीं होता एक रचनाकार के जीवन में.”  इसलिये अवसाद और अँधेरे की पुरजोर ताकतों के विरुद्ध अकेले व्यक्ति की गरिमा की दलील उनकी कविताओं में मिलती है. इस महत्वाकांक्षी और अवसरवादी,अमानवीय समय में उपेक्षित और छोड़ दी गई ईकाइयों के माध्यम से वे उस ज्यादा मूल्यवान सच की और ले जाती हैं जो कविता का मूल स्वभाव है. सैद्धांतिक रूप से यह कविता आत्मनिर्वासन, मृत्यु और पागलपन के खिलाफ नहीं है, पंरतु जो कुछ  हमारे चारों ओरभीतर और बाहर, समाज और हमारे ऐन बीचों-बीच हमारे खिलाफ जो भी घटित हो रहा है- वह उसके खिलाफ है. वास्तव में यह कविता भयावह हो रही रिक्तता और शून्यता के विरुद्ध है-  
 
मैं कुछ नहीं बस एक संतुलन भर हूं
विक्षिप्तताओं और आत्महत्याओं के बीच
मैं जो साँस ले रहा हूं वह एक औसत यथार्थ की आदी है
इस साँस का क्या करूँ मैं
यह जहाँ होती है वहाँ वारदातें टल जाती हैं
इस तरह जीवन कायरताओं से एक लंबा प्रलाप था
और मैं बच गया यथार्थ समय के अंतिम अरण्यमें

निश्चय ही यह हमारे समय के कवि की वह हताशा, तड़प तथा एकाकीपन है जिसने प्रचार परक उपभोगवादी जीवन की चमक- दमक के पीछे छिपे अँधेरे को देखा है. व्यैक्तिक स्वर होते हुए भी अविनाश जी की कविता अपनी प्रतिबद्धता और बुनियादी मानवीय सरोकारों को नहीं छोड़ती तथा इन गहरे सवालों के भीतर उतरने का नैतिक साहस रखती हैं.

समकालीन हिंदी कवि कृष्ण कल्पितने कहा है- आलोचक कवि हो यह जरूरी नहीं,लेकिन कवि का आलोचक होना अपरिहार्य है.’ इस दृष्टि से कवि के रूप में अविनाश मिश्र की अपनी एक अलग शैली है जो आंडबंर विहीन है और सत्ता-संरचनाओं के बड़े भारी-भरकम विमर्शों,  सिद्धांतो और छ्द्म चेतनाओं की पंरपरा से अलग लीक पर चलते हुए अपनी नयी ज़मीन तैयार करती है. संवेदनाओं के जिस स्तर तक  इस कविता की पहुंच है और सच्चाई को वह जिस तरह से जानती है वह तमाम बुद्धिजीवियों की उपलब्धियों से अधिक मौलिक और विश्वसनीय हो सकती है-

आपत्तियाँ केवल निर्लज्जों के पास बची हैं
और प्रतिरोध केवल उपेक्षितों के पास
बहुत सारे विभाजन प्रतीक्षा में हैं
स्त्रियों को स्त्रियों से अलगाते हुए
बलात्कारों को बलात्कारों से ही अलगाते हुए
अत्याचारियों को अत्याचारियों से ही अलगाते हुए
संकीर्णता इस कदर बढ़ी है कि संदेहास्पद हो गये हैं समूह

आज कविता को एक उत्पादबनाने की कोशिश में बाज़ार की ताकतों में जो हलचलें पैदा हुई हैं वह भी कविता पर एक नये संकट का आरंभ है. जबकि वास्तव में कविता एक खास तरह के अंसतोष और भीतरी शून्य से जन्म लेती है. उस समय के विरुद्ध जब सभी सजीव चीज़ें निष्प्राण और विस्मृत की जा रही है, उस कठिनतम समय में भी कविता सीधे एक ईमानदार कविता के रूप में ही पाठक के सामने आना चाहती है. आज के परिदृश्य में कविता को जब केवल यश,पुरस्कार,लोकप्रियताबाज़ार में सफलता और आलोचकीय मूल्यांकन से आगे नहीं  देखा जा रहा और कविता आत्मकेंद्रित, महत्वांकाक्षी स्वरूप लेते हुए सरोकारों से दूर हो रही है. एक कवि के रूप में ‘अज्ञातवास की कविताएँअपनी रचनात्मक अस्मिता और मानसिक आज़ादी को बचाने का जोखिम उठाती हैं. जब न्याय और सच एक निषिद्ध क्षेत्र बन जाता है तब ये कविताएँ एक गहरे आत्मालोचन के साथ मनुष्य की पहचान को बचाती हैं-  

मैं इस तरह सोचा करता हूं कि
एक कविता पर्याप्त होगी एक कवि के लिए
और कभी कभी कई कवियों के लिये
एक कविता भी बहुत अधिक होगी
मानवीयता के असंख्य नुमाईंदों
और उनकी कल्पनातीत नृशंसताओं के विरुद्ध

यह कविता कई अर्थों में उस नयी पीढ़ी की प्रतिनिधि कविता है जो लगातार अपने भौतिक और आत्मिक परिवेश से विस्थापित हुई है. जिसकी स्मृतियों में छूटी हुई चीज़ें भी हैं तो दूसरी ओर वह तेजी से बदलती हुई दुनिया में बेहद आक्रामक समय के सामने निहत्थी खड़ी है. इस सदी की बहुत सी असाधारण और विलक्षण कविता व्यैक्तिक स्वर और अनुभव से जुडे होने पर भी मनुष्य की सामूहिक नियति और त्रासद सवालों से जन्मी है. जहां जीवन  निर्मम  जटिल यथार्थ और असंख्य चुनौतियों के रूप में सामने फैला हुआ है. जहां सच्ची कविता और कवि या तो तिरस्कृत और निर्वासित कर दिये जाते हैं अथवा बिना कोई निशानी छोड़े अदृश्य हो जाते हैं. अज्ञातवास की कविताओं में मनुष्य की यातना, स्वप्नों और संघर्षों की वह आंच निरंतर जलती रहती है जो बाज़ार, पूंजी, अन्याय और असमानता के अँधेरे मे डूबती मानवता के लिये कविता के रूप में जरूरी है –

मैं बहुत दिनों से सीने में उठते दर्द को दबाए हुए हूँ
लेकिन वे चाहते हैं कि मैं उनके साथ ज़ोर ज़ोर से हसूं

स्वप्नों और आदर्शों के बाहर एक बोझिल, वास्तविक स्याह संसार फैला है लेकिन कवि द्वारा शब्दों पर भरोसा करना बंद नहीं किया जा सकता –

उन कविताओं के बारे में क्या कहूँ
वे ऐसे ही नहीं अभिहित हुई थीं
जैसे यह एक आत्मप्रलाप में विन्यस्त होती हुई
कहीं कोई विरोध नहीं
इस सहमत समय में
उन्हें खोकर ही उनसे बचा जा सकता था
लेकिन इस बदलाव ने मेरी मासूमियत मुझसे छीन ली है
इस स्वीकार को मै अस्वीकार करने की
मैं भरसक कोशिश करता हूं
लेकिन कर नहीं पाता
बस इतना ही सच हूँ
मैं स्थगित पंक्तियों का कवि
तुम्हें खोकर
यूँ होकर

एक हिसंक समय के बीचों- बीच लिखी गई ये कविताएँ जिनमें अस्मिता की बेचैनी,हताशा और विकलता के साथ नैतिक प्रतिरोध भी दर्ज़ है क्योंकि कविता में जीवन अभी भी बचा हुआ है. इनकी भाषिक सादगी में एक कसावट, सतर्कता और जीवंतता है जो पारंपरिक रूढ़िगत अविश्वसनीय प्रतिमानों से आगे बढ़कर पाठकों से सीधा स्पष्ट संवाद करती है. कविता को आत्मघाती सत्ता-केंद्रों की आत्ममुग्धता से बचाते हुए इनमें जो लेखकीय ईमानदारी दिखाई देती है,वह इन्हें फार्मूलाबद्ध शिल्प और सतही भावुकता से अलग आत्मसजग कविताओं का रूप देती है. ये कविताएँ वहां एक बौद्धिक, आत्मालोची और विचारशील सजग पाठकीय समाज का निर्माण करती हैं जहां बढ़ता हुआ वैमनस्य, असमानताएं  और स्त्रियों के प्रति बढ़ती हिसंक वारदातें मानो सदी का शोक गीत बन गई हैं. यथार्थ और स्वप्न एक दूसरे के पूरक बनने की बजाय एक दूसरे से टकरा रहे हैं और स्वप्न टूट रहे हैं –

वह हर वर्ष एक नए फलसफे के साथ लौटता है अपने नगर में
आज से सात वर्ष पहले वह आश्चर्य लिए लौटा था
इसके बाद ढेर सारी किताबें
इसके बाद कुछ कविताएँ
इसके बाद यूटोपिया
इसके बाद मोह्भंग
इसके बाद अवसाद
और अब वह प्रेम लेकर लौटा है

अज्ञातवास की कविताएँएक युवा और नए स्वर की कविता के रूप में उस पूरी पंरपरा को खारिज करती हैं जो रूमानी ढ़ग से छद्म आस्था का मुखरगान करती है,शब्द बहुलता कोउपादानों को जुटाती है और भाषा को सजाती है. ये कविताएँ अपने अंत:करण और आत्मसंघर्ष के द्वारा हमारे समय और कविता के संबंधों को पुनर्पारिभाषित करती हैं. निर्ममता और आत्मग्लानि के इस समय में इन कविताओं के सादा स्वर को समझने और सुनने की जरूरत है. जहां चारों और इतनी कृत्रिमताओं और तथाकथित सता-केद्रों की बौद्धिक सुरक्षाओ‌” के आवरण में,आत्ममुग्ध,सुविधापरस्त रचनात्मकता निरंतर सक्रिय है,वहां उनसे बाहर ये कविताएँ उन्हें चुनौती देते हुए भी सहज- स्वाभाविक बनी रहती हैं. विचलनों से बचते हुए नैतिक- अनैतिक के आत्यंतिक विभाजन का आत्मविश्वास इन कविताओं की अंदरूनी शक्ति है. 

इन कविताओं की बेचैनियाँ वास्तविक हैं,इनके सरोकार और सवाल हमारे समय से जुड़े हैं और इनमें एक नए ढ़ग का चैलेंज है जो बदलाव की गहरी माँग और आकांक्षा को सामने लाता है. हमारी नयी कविता के लिए नया रास्ता बनाते हुए अज्ञातवास की कविताएँआज के समय और उसकी हकीकत की कसौटी पर खरी उतरती हैं.  
________________
मीना बुद्धिराजा
हिंदी विभाग
अदिति कॉलेजदिल्ली विश्वविद्यालय
संपर्क- 9873806557
meenabudhiraja67@gmail.


प्रमोद पाठक की कविताएँ

$
0
0






















ये कविताएँ बच्चों के लिए लिखी गयी हैं पर बचकानी नहीं हैं, बच्चों के लिए लिखना चुनौतीपूर्ण तो है पर इनका लिखा जाना बहुत जरूरी है ?

प्रमोद पाठक को आप समालोचन पर पिछले कई वर्षों से पढ़ते आ रहे हैं,  उनकी प्रेम कविताओं ने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा है. भविष्य की पीढ़ी को तराशने के लिए लिखी इन कविताओं ने तो विस्मित ही कर दिया.  

फ्रेश, चमकदार, गुनगुनी इन कविताओं को पढ़कर बच्चे जहाँ खिलखिलाएंगे बड़े मुस्कराएँ बिना नहीं रह पायेंगे. ये कविताएँ अपने आस-पास से लगाव की कविताएँ हैं.  

आज आप जरुर इन कविताओं को अपने आस-पास के बच्चों से साझा करें.



प्रमोद  पाठक   की   कविताएँ                                              



पानी उतरा टीन पर

पानी उतरा टीन पर
फिर कूदा जमीन पर

पत्ती और फूल पर
खूब-खूब झूलकर

कोहरे में हवाओं में
नाचकर झूमकर

छुप गया खो गया
मिट्टी को चूमकर.






बुनकर हैं बया जी

दया जी दया जी
देखो बया जी
देखो देखो बिट्टी
घोंसले में मिट्टी
सूखी-सूखी घास
बहुत ही खास
लाई चुन चुनकर
बया जी हैं बुनकर
बया जी का हौंसला
बुना लम्बा घोंसला
बया जी ने चुनकर
अण्डे दिए गिनकर
अण्डा फूट गया जी
चूजा निकला नया जी
दया जी दया जी
चहक रही बया जी





चोंच

चिड़िया की चोंच
चूजे की चोंच
चूजे की चोंच में
चिड़िया की चोंच

चुग्गा लाए
चिड़िया की चोंच
चुग्गा खाए
चूजे की चोंच.





रात

रात नाम की इक अम्मा के
बच्चे बहुत ही प्यारे
एक था उनमें चंदा
और बहुत से तारे.






भोर

चाँद हुआ अब मद्धम मद्धम
तारे हो गए छुप्पम छुप्पम 
रात हो गई ढल्लम ढल्लम
सूरज हो गया उग्गम उग्गम
निकली चिड़िया फुर्रम फुर्रम 
करने दाना चुग्गम चुग्गम.







हाथी और चींटी 

हाथी चिंघाड़ा 
जंगल गूँज गया 
चींटी चिल्‍लाई 
किसी ने ना सुना 

हाथी ने फूँका 
आँधी आ गई 
चींटी ने फूँका 
पत्‍ती तक ना हिली 

हाथी रोया 
नदी बह गई 
चींटी रोई 
बूँद तक ना बही 

हाथी छिपा 
सबको दिखा 
चींटी छिपी  
किसी को ना दिखी. 








तीतर तारे 

रात-झाड़ से निकले सारे
तीतर तारे तीतर तारे 
एक शिकारी चन्दा आया 
देखके उसको छुप गए सारे 
जब चन्दा थक हार गया
उजली रात के पार गया 
धीरे धीरे निकले सारे 
तीतर तारे तीतर तारे




चाँद

रात के भुट्टे में
तारों के दाने हैं
एक नहीं,दो नहीं
कई-कई हजार
चाँद की चिड़िया
चुग-चुग उनको
उड़े भोर के पार.





ओस

भोर माघ-पोस की
चिड़िया आई ओस की
दूब का है घोंसला
धूप में धुला-धुला







पेड़ 

पेड़ों का कोई घर होता 
तो कैसा होता
क्या वह हरा ही होता
फिर क्या उसमें फूल भी खिलते
अगर खिलते 
तो क्या पीले होते
या आसमानी 
लाल नीले 
या फिर बैंगनी
तो क्या तितलियाँ भी आतीं 
फिर क्या उसमें पक्षी कीड़े मकोड़े भी रहने आते 
लेकिन पेड़ों को शायद यह बहुत पहले पता चल गया था
फिर उन्होंने देखा भी
कि ऐसा कोई घर मनुष्य अभी तक नहीं बना पाया
इसीलिए उन्होंने कोई घर नहीं बनाया
और खुद ऐसे पेड़ बन गए
जिन पर रंग बिरंगे फूल खिलते हैं
तितलियाँ आती हैं
पक्षी कीड़े मकोड़े रहते हैं
और हम मनुष्य अभी तक
पेड़ों जितना सुंदर कोई घर नहीं बना पाए.





तितली 

पंखुरियाँ दो खिलीं खिलीं
नाज़ुक सी बस हिलीं 
रंगों में घुली घुली 
तितली एक उड़ चली.






बरखा रानी 

पहने
बादलों का सूट 
पानियों के बूट 

डाले
हवा का दुशाला
बिजलियों की माला 

देखो 
नदियों की अम्मा 
झरनों की नानी 

आई 
धरती की सहेली 
जंगलों की रानी 

नन्हीं
बूँदों की शैतानी
आई बरखा रानी. 

___________________________


बिपनप्रीत की कविताएँ (पंजाबी)

$
0
0




























पंजाबी भाषा के कवि गुरप्रीत की कविताएँ आपने समालोचन पर पढ़ीं हैं. इस कड़ी में आज पंजाबी कवयित्री बिपनप्रीत की  बीस कविताओं का हिंदी अनुवाद आपके लिएप्रस्तुत है. बिपनप्रीत के दो कविता संग्रह प्रकाशित हैं और वे अपने महीन और नाज़ुक ख्याल के लिए जानी जाती हैं. इन कविताओं का अनुवाद कवि- लेखक रुस्तम और अम्बरीश ने कवयित्री की मदद से किया है.


बिपनप्रीत  की  कविताएँ (पंजाबी)                             
(पहले आठ अनुवाद : हिन्दी कवि रुस्तम द्वारा. शेष अनुवाद : कवयित्री की मदद से पंजाबी कवि अम्बरीश एवम् रुस्तम द्वारा)


ओस
यह किसने
छिड़काव किया
दूर-दूर तक
मेरी आँखों की चमक
टिमटिमा रही.



ओट में   
परदे के पीछे मैं
मेरी ओट में छुपा अंधेरा
अंधेरा देखने की चाहत में
टकटकी लगाए
झाँक रहा है चाँद.



काश
वह पत्थर होता तो अच्छा था
मैं उसे मोम कर देती
या कर देता वह मुझे टुकड़े-टुकड़े
पर वह तो महीन रेशा था
अपने ही जाल में उलझकर फँस गया
मकड़ी पिघल रही है जाले में
और मेरी पत्थर आँखें
बस उसी को देख रही हैं.



याद
उसे याद करना चाहती हूँ
पर वह मुझे याद नहीं आता
मैं गवाँ चुकी हूँ अपने-आप को
सब कुछ धुँधला दिखाई देता है
उसे कहो
सिर्फ वो ही मुझे ढूँढ सकता है
कुछ तो करो
अब मैं उदास नहीं होती
मैं उदास होना चाहती हूँ.



चुप्पी
चुप्प हूँ
पर फिर भी कोई
गुफ़्तगू चल रही है
कुछ है जो मेरी
चुप्पी तोड़ने की
कोशिश में है
मैं ढेमा उठाकर
झील में फेंकती हूँ
अपनी चुप्पी को बचाने की कोशिश करती हूँ.



अभी-अभी
मैं सिर झुकाए बैठी थी
धूप मेरी पीठ सहला रही थी
अभी-अभी मैं
रोने और हँसने के बीच में थी
अभी-अभी
मैं रो पड़ी
धूप हँस पड़ी
अभी-अभी
हवा चली
आँसू सूख गये
अभी-अभी
मैं पीठ में
गर्माहट लिए
अपने अन्दर चली गयी
अभी-अभी.



रात भर
टहनियाँ झूमती रहीं
गड्ढों में भर चुके पानी में
आकाश का अक्स
काला नहीं था
चाँदी की लकीर
उसे निखार रही थी
मैं रात भर करवटें लेती रही
बन्द आँखों से रही ताकती
रात भर बारिश होती रही.



लाश
कन्धों पर लाश लिए
शमशान से मुड़ती हूँ
लाश की परछाईं
पैरों की तरफ
घसीट रही है मुझे
सड़क पर निशान छोड़ रही है
मेरी आँखें चौंधिया रहा है
सूरज
लाश के माथे पर त्योरी
एक चेहरा
समझ नहीं पा रही
कौन सा है   कौन है.



ओम
बोल रही
जो सुनाई नहीं देता
कहती
जो जानती नहीं
लिखती
जो पढ़ नहीं पाती
मेरे होने
और करने के बीच
नींद है       सपना
डर और सन्नाटा
शब्द और सन्नाटे के बीच
ओम की धुन
और
गहरी नींद में मैं.



समाधी

मौन ---
बुलबुलों में
समुद्र

पानी में तैरता पत्थर
ऊपर मछली
धूप में नहा रही.



फल
दरख़्त की जड़
पैरों से लिपटी
पक्षी हवा को ठकोरते
चोंचें ज़ख़्मी करते
महक
लार में मिठास बन टपक रही
फल पक चुका
पशु जुगाली कर रहे
मैं
काट दिए गये
अमरूद के
बचे हुए तने में से
फल गिन रही.



ईश्वर
चिड़िया के गर्भ में कहकशां
 
दाना-दाना चुगती
गुलाबी पंजों से
अपने पंख सहला रही
ईश्वर चहचहा रहा.




तड़प
पानी पर
परछाइयों की
असंख्य परतें बिछी हुईं
जश्न मना रहे ---
पेड़ सूरज आकाश
पक्षी पहाड़
और नीचे चुप्पी
कुछ था
जो पानी में से निकलकर
फ़ना होना चाहता था
सूरज की किरणें
पानी चीरकर
ढूँढ रही थीं अपनी जगह

पानी तड़प रहाथा
या कि आनन्द में था
मैं सोच रही.



इसी तरह
तुम्हारी आँखों में
टिमटिमाहट है
तारे देखते हुए
तुम इसी तरह
मेरा हाथ
ज़ोर से पकड़े रहो
मैंने चाँद पर
छलाँग लगानी है.
       



शब्द
साँस लेते
मुँह से धुआँ उगलते
अपनी रोशनी फेंकते
एक-दूसरे की आँखों में
कहानी पढ़ रहे
शब्दों को पकड़ती हवा
भाषा रच रही.
              



डूब रही
पानी गोते खा रहा
डूब रही मैं
किरणों को पकड़ा हुआ है
पर मुझे खींचता नहीं
सूरज
अभी एक झटका  दूँ
धड़ाम से फेंक डालूँ
सूरज को.
           



स्वार्थी
टहनी पर
अटका सूरज
अपने लिए
तोड़ लेना चाहती हूँ
सूरज कुतरते
पक्षियों को
छिछकारती हूँ
उड़ा देती हूँ
किरणों का गोला
लपेटता आकाश
मेरा उधड़ा हुआ स्वेटर देख
खिलखिला कर हँस रहा है.
                 



आखिरी पल
क्या तुम मुझे
मेरे आखिरी पल में
मिल सकोगे वैसे ही
जैसे पहले पल में मिले थे ?
अन्तराल बीच का
भूल जाऊँगी मैं
और यह भी
कि कभी हम
मिले भी थे.
                  



खाली पन्ना
भर चुकी डायरी का
आखिरीपन्ना
पलटा तो
वह खाली निकला
मैंने पन्ना फाड़ा
कश्ती बना ली
और ठेल दी
बारिश के पानी में
अब मैं उस पर सवार
कर रही हूँ समंदर पार.
             



धोखा
होश में हूँ
पर आवाज़ अपनी
सुनाई नहीं देती
तेरे साथ हूँ  लेकिन
बेगानी हूँ
रोशनी छल होती है
अंधेरे में जाना चाहती है
मैं खुद को सुनना चाहती हूँ.


बिपनप्रीत का पहला कविता संग्रह “जनम” २००९ में प्रकाशित हुआ था. उसके बाद उन्होंने बड़ी तेजी से पंजाबी कविता के परिदृश्य में अपनी विशेष जगह बना ली. चीज़ों को देखने का उनका नज़रिया और उनको कविता में लाने का तरीका ठेठ उनके अपने हैं. उनका दूसरा कविता संग्रह “रफूगर” अभी हाल ही में २०१८ में प्रकाशित हुआ है. वे अमृतसर में रहती हैं. 




भाष्य : सेवादार (देवीप्रसाद मिश्र) : सदाशिव श्रोत्रिय

$
0
0
(गूगल से साभार)

समालोचन के स्तम्भ ‘भाष्य’ के अंतर्गत किसी एक कविता पर व्याख्याता अपने आप को केन्द्रित रखता है और तरह-तरह से उसके मन्तव्य और काव्य-सौन्दर्य को उद्घाटित करता है. सदाशिव श्रोत्रिय को आपने विष्णु खरे, अलोक धन्वा (पतंग), दूधनाथ सिंह (कृष्णकान्त की खोज में दिल्ली-यात्रा ) और राजेश जोशी (बिजली सुधारने वाले) के सन्दर्भ में यहीं पढ़ा है.

आज हिंदी के महत्वपूर्ण कवि देवी प्रसाद मिश्र की कविता ‘सेवादार’ पर उनका यह आलेख प्रस्तुत है. ‘सेवादार’ एन.जी.ओ. संस्कृति पर हिंदी में लिखी शायद अकेली समर्थ कविता है. देवी प्रसाद की अपनी अर्जित शैलीगत वक्रोक्ति ने इस कविता को और मारक बना दिया है. 



सेवादार / देवी प्रसाद मिश्र
_____________________________





इस लड़की ने जो कार में बैठी थी
सेवा का व्रत उठा रखा था शुरू से ही उसमें सेवा
का भाव था जिसे देखते हुए माता पिता ने उसे
दिल्ली युनिवर्सिटी से सोशल वर्क में एमए करवा दिया
जबकि उसने एमफ़िल इस विषय पर किया कि हरियाणा में
लड़कियां कम क्यों हो रही हैं

संजीवनी सूरी कार में बैठी थी
और उसके सर उसे छोड़ने आये थे
मीटिंग के बाद काफ़ी देर हो गई थी इसलिये

जीके टू में एक घर के सामने कार रुकी तो
सर ने कहा कि अभी १० लाख के पैकेज पर
काम शुरू करो बाद में देख लेंगे संजीवनी ने कहा
सर वैसे तो ठीक है लेकिन थोड़ा कम है सर ने हंसते
हुए कहा कि थोड़ा कम तो हमेशा रहना चाहिए 

संजीवनी ने कहा कि सर घर के अन्दर आइये
मम्मी से मिलिये l पापा के जाने के बाद
शी इज़ डेड अलोन l सर ने कहा ओह l
बट कीप इट द नेक्स्ट टाइम l संजीवनी ने कहा कि
सर आप अन्दर नहीं आ रहे तो मेरे कुत्ते से
ज़रूर मिल लीजिये l शी इज़ जर्मन शेपर्ड l प्लीज़ सर l
सर ने कहा कि वे ज़रूर किसी दिन आएंगे l फिर उन्होंने संजीवनी को याद
दिलाया कि वह खरिआर  - हाउ टेरिबल द प्रननसिएशन इज़ खरिआर ज़िले
के दस गांवों की स्त्रियों की महीने की औसत
मज़दूरी पर रिपोर्ट तैयार कर ले संजीवनी ने आह भर कर कहा कि
सर एक औरत को औसत महीने में तेरह रुपये मिलते हैं
एक दिन में चालीस पैसे
सर ने कहा कि हम क्या कर सकते हैं रिपोर्ट ही
दे सकते हैं और जब तक वो नहीं दी जाती
वर्ल्ड बैंक से अगले छियासठ लाख रिलीज़ नहीं होने वाले

कर दूंगी सर कर दूंगी कहते  हुए संजीवनी कुत्ते से लिपट गयी
और सर चले गये सिली गर्ल,यू आर सच अ रैविशिंग स्टफ़ जैसी कोई बात
कहते हुए जो अगर सुन ली जाती
तो संजीवनी सूरी क्यों है इतनी दूरी जैसी घोर स्त्री विरोधी बात कहने के लिये
स्त्रियों के लिये काम करने वाली उनकी संस्था को मिलने वाली सालाना तीन
करोड़ की यूरोपीय ग्रांट बंद हो जाती.








सेवादार
सदाशिव श्रोत्रिय




क समर्थ कवि अपनी अतिरिक्त संवेदनशीलता की बदौलत अपने समय की युगचेतना (zeitgeist) को अपने काव्य में अधिक प्रभावी रूप से अभिव्यक्त करने में समर्थ होता है. अपनी रचनात्मक प्रतिभा से वह बहुत से दृश्यों, घटनाओं, संवादों आदि में से  उन चीज़ों को छांटने-चुनने में  समर्थ होता है जो थोड़े में  ही बहुत कह जाए. हमारे समय के  कवि देवी प्रसाद मिश्र में हमारी  युगचेतना को अभिव्यक्त करने की इस सामर्थ्य को मैं भरपूर देखता हूँ. आज के झूठ और चालाकी भरे समय में वास्तविकता को पहचानने और उसके संबंध में प्रभावी ढंग से अपनी बात कहने के लिए जिस “विट” (wit) की आवश्यकता होती है उसकी भी  मुझे इस कवि में कोई कमी नज़र आती. उनके इस गुण को कोई भी वह पाठक बड़ी आसानी से देख सकता है जिसने उनकी “ब्लू लाइन” शीर्षक कविता पढ़ी है.


मेरी मान्यता है युगचेतना की  काव्यात्मक अभिव्यक्ति की यह सामर्थ्य किसी कवि को सचेतन प्रयत्न से नहीं हासिल होती.  श्रेष्ठ  कविता की रचना पर किसी कवि का उतना ही नियंत्रण संभव है जितना किसी अनूठा  स्वप्न देखने वाले का उसके स्वप्न पर हो सकता है. अन्तःप्रेरणा के किसी अनाहूत क्षण में वह अपने मन में संचित विभिन्न अनुभवों का उपयोग करते हुए कुछ ऐसा कह जाता है जो पाठकों – श्रोताओं को उसकी मौलिकता और  नवीनता से चकित कर देता है.


देवी प्रसाद मिश्र की एक विशेषता मुझे यह लगती है कि काव्य-रचना के किसी उर्वर काल में उनका ध्यान किसी विशिष्ट विषय पर केन्द्रित रहता है और तब वे उस विषय से सम्बंधित कई  रचनाएँ अपने पाठकों को एक साथ  देने की स्थिति में होते  हैं. 2010 में जब असद ज़ैदी ने अपनी पत्रिका जलसा के पहले अंक का प्रकाशन किया तब मिश्रजी के मन में हमारे शैक्षणिक और  अकादमिक क्षेत्रों  में व्याप्त भ्रष्टाचार को लेकर  कई बातें आ रही होंगी. शायद यही कारण रहा होगा कि जलसा के इस अंक में इस तरह के  भ्रष्टाचार से सम्बंधित उनकी चार-पांच कविताएँ शामिल  हैं.


राजनेताओं  ने अपनी अनावश्यक दखलंदाजी़ से  शिक्षा की जो दुर्दशा की  उसका वर्णन देवी प्रसाद मिश्र जलसा के इस अंक के पृष्ठ 95 पर प्रकाशित  कविता “हमारे पूर्वज सीरीज़ में सबसे पहले प्रभाकर शुक्ल” में इस अंदाज़ में करते हैं :


प्रभाकर शुक्ल को प्रधानमंत्री होना चाहिये था  - ग़नीमत है कि उन्होंने प्रतापगढ़ की एक तहसील में एक स्कूल का प्रिंसिपल रह कर उम्र गुज़ार दी लेकिन उन्होंने स्कूल का उतना ही कबाड़ा किया जितना किसी भी प्रधानमंत्री ने इस देश का किया है उनकी पत्नी ने और ख़बर पक्की है कि उनकी बेटियों ने भी चपरासियों से पैर दबवाये टीचरों से सब्ज़ी मंगवाई और तबला सर से जहां तहां तेल लगवाया सर में भी लगवाया.

भुवनेश्वर दत्त जिनके ज़िले में कई स्कूल थे से कहकर  उनकी नियुक्ति हुई थी – क्वालिफिकेशन यह थी कि वैद जी के बेटे थे, मामखोर सुकुल थे और दो थर्ड क्लास यमए – हिंदी और एजुकेशन में.


इसी सीरीज़ की एक अन्य कविता “हमारे पूर्वज सीरीज़ में राम समुझ मिश्र” में वे कहते हैं :

राम समुझ मिश्र मामूली आदमी नहीं थे – पीसी रेन के अंग्रेज़ी व्याकरण से अंग्रेज़ी सीखी थी और कहते थे कि उच्चारण रंदवू है रेंडेज़वस  वगैरह नहीं. गांधी के नेतृत्वमें आज़ादी की लड़ाई लड़ी,विधायक हुए –धोती कुरता पहनते थे, सारस की तरह चलते थे, और जितने थे उससे कम चालाक नहीं लगते थे .........लखनऊ से इलाहाबाद जाते हुए लालगंज में उनके नाम का स्कूल है. ठीक से न भी देखिये तो वह चीनी मिल की तरह लगता है. स्कूल को उन्होंने तेल मिल की तरह चलाया. मतलब कि गन्ना पेरो , सरसों या आदमी एक ही बात है.


हम देख सकते हैं  कि “शिक्षा का व्यवसायीकरण हो गया है” जैसी किसी  गद्यात्मक अभिव्यक्ति का प्रभाव किसी पाठक के मन-मस्तिष्क पर कभी उतना गहरा नहीं हो सकता जितना देवी प्रसाद जी  की इस  काव्यात्मक अभिव्यक्ति  का होता है.
 

शिक्षा–तंत्र में नौकरी के लिए  पैसे के खुले और नंगे खेल का वर्णन वे इसी सीरीज़  की एक अन्य कविता  “हमारे समकालीन सीरीज़ में कल्लू मामा” में करते हैं :


[कल्लू मामा ] ने हाल में प्राइमरी के अध्यापक के तौर पर ढिंगवस नाम की जगह के स्कूल में नियुक्ति प्राप्त की है – इसके लिए जूनियर इंजीनियर पिता ने दो लाख दिये. हफ़्ते में कल्लू दो तीन बार स्कूल जाते हैं पढ़ाते तब भी नहीं हैं . बच्चों की मांएं कहती हैं कि इन हरामखोर टीचरों के लम लम कीड़े पड़ेंगे.


पर जो दूर की कौड़ी देवी प्रसाद जी अकादमिक हल्कों में  एन.जी.ओज़ के माध्यम से किए जा रहे करोड़ों रुपये के अपव्यय, उनकी निरर्थकता और उनके असली मक़सद के सम्बन्ध में  उनकी इसी काल की उनकी रचना “सेवादार” (पृष्ठ 95) के माध्यम से लाते हैं उसका सचमुच कोई मुकाबला नहीं.


इस कविता को पढ़ना और इसके माध्यम से हमारे यहाँ काम कर रहे कई ग़ैर सरकारी संगठनों के वास्तविक क्रिया-कलापों  के बारे में जानना किसी भी पाठक के लिए एक रोमांचक और आल्हादकारी अनुभव होगा. वस्तुतः इस कविता की सफलता इस रोमांच और आल्हाद में ही निहित है.


हम देख सकते हैं कि इस कविता के केंद्र में संजीवनी सूरी नाम की उच्च मध्यवर्गीय परिवार की एक आकर्षक युवती  है जिसके पिता की मृत्यु हो चुकी है और जो किसी NGO के लिए समाजशास्त्र के किसी विद्वान् के मार्गदर्शन  में किसी प्रोजेक्ट पर काम कर रही है. इस NGO को किसी यूरोपीय देश से तीन करोड़ रुपये का  सालाना अनुदान मिलता है और इसका घोषित उद्देश्य नारी-कल्याण है.


कविता का पहला बंद इस बात की पोल खोल देता है कि यह शोधार्थी युवती अपने वर्तमान शोध कार्य के लिए वास्तव में कितनी शैक्षिक अर्हता रखती है :



इस लड़की ने जो कार में बैठी थी
सेवा का व्रत उठा रखा था शुरू से ही उसमें सेवा
का भाव था जिसे देखते हुए माता पिता ने उसे
दिल्ली युनिवर्सिटी से सोशल वर्क में एमए करवा दिया
जबकि उसने एमफ़िल इस विषय पर किया कि हरियाणा में
लड़कियां कम क्यों हो रही हैं


अपने बच्चों को किसी उपलब्ध मौके का फायदा दिलाने के लिए उनकी तारीफ़ में माँ – बाप आजकल जिस तरह की कोई भी बात  कहने को तैयार रहते हैं इसे कविता की दूसरी और तीसरी पंक्ति पढ़ कर समझा जा सकता है. पढ़े हुए विषय और किए जाने वाले काम के बीच कोई  स्पष्ट सम्बन्ध हो यह  भी आजकल आवश्यक नहीं ; इस बात को  यह कविता यहाँ एक बार फिर  अपने ढंग से प्रकट कर देती है.


कविता में जिस रात्रि का वर्णन है उसमें संजीवनी सूरी  काफ़ी देर से घर पहुँची है. कवि जिस ढंग से इस विलम्ब का कारण बताता है वह पाठक के सामने यह स्पष्ट  कर देता  है कि इसका वास्तविक कारण शायद  मीटिंग के बाद इस शिष्या और उसके गुरुजी का लम्बे समय तक साथ  रहा है जिससे उसके घर वाले या तो बेखबर हैं या वे जानबूझ कर इसके बारे में अनजान बने रहना चाहते हैं क्योंकि  उनके ज़्यादा खोज –खबर करने का मतलब शोध-कार्य की बदौलत इस लड़की को मिलने वाले पैसे से हाथ धो बैठना है जो न तो यह लड़की खुद चाहती है और न ही उसके घर वाले . उनकी ख्वाहिश इस समय यह है कि भरम फ़िलहाल दोनों तरफ़ से बना रहे ताकि मोटी आय  का यह जरिया लड़की के हाथ से निकल न जाए.


समाज सेवा और शिक्षा के क्षेत्र में भी पैसे की भूमिका ही आज के मध्यवर्गीय समाज में सर्वाधिक महत्वपूर्ण रहती है इसे संजीवनी और उसके “सर” के बीच होने वाली सौदेबाज़ी की भाषा साफ़  कर  देती है :


जीके टू में एक घर के सामने कार रुकी तो
सर ने कहा कि अभी १० लाख के पैकेज पर
काम शुरू करो बाद में देख लेंगे संजीवनी ने कहा
सर वैसे तो ठीक है लेकिन थोड़ा कम है सर ने हंसते
हुए कहा कि थोड़ा कम तो हमेशा रहना चाहिए   


स्त्री-कल्याण के घोषित उद्देश्य से हाथ में लिए गए इस प्रोजेक्ट के लिए काम करने वालों की कितनी सहानुभूति और कितना लगाव उन ग्रामीण  स्त्रियों के प्रति है जिनके लिए वे काम कर रहे हैं  इसे इस कविता के तीसरे पदबंद की निम्नांकित अंतिम पंक्तियाँ भलीभांति प्रकट कर देती हैं:
                                                   
फिर उन्होंने संजीवनी को याद
दिलाया कि वह खरिआर  - हाउ टेरिबल द प्रननसिएशन इज़ – खरिआर ज़िले
के दस गांवों की स्त्रियों की महीने की औसत
मज़दूरी पर रिपोर्ट तैयार कर ले संजीवनी ने आह भर कर कहा कि
सर एक औरत को औसत महीने में तेरह रुपये मिलते हैं –
एक दिन में चालीस पैसे
सर ने कहा कि हम क्या कर सकते हैं रिपोर्ट ही
दे सकते हैं और जब तक वो नहीं दी जाती
वर्ल्ड बैंक से अगले छियासठ लाख रिलीज़ नहीं होने वाले



पर सेवादारी के इस खेल की असलियत को देवी प्रसाद इस कविता की अंतिम पंक्तियों में जिस तरह खोलते हैं वह  सचमुच अनूठा है. संजीवनी अंततः  अपने सर से जो कहती है वह इस बात को प्रकट करने के लिए पर्याप्त है कि उसे भी अब इस बात का पूरी तरह अनुमान हो  गया है कि उसके सर असल में उससे चाहते क्या हैं. उसका नाटकीय ढंग से कुत्ते के गले में लिपटते हुए  “कर दूंगी सर कर दूंगी” कहना इस बात को स्पष्ट कर देता है कि पैसे और पवित्रता के बीच सौदेबाज़ी के इस खेल में संजीवनी ने 10 लाख के सालाना पैकेज के लिए अपने आप को समर्पण के लिए तैयार कर लिया है. विडम्बना यह है कि वर्तमान परिस्थितियों में  अपने  मध्यवर्गीय परिवार की बाहर टीमटाम को बचाए  रखने के लिए शायद उसके पास इसके अलावा कोई विकल्प  नहीं  बचा  है.





कविता की अंतिम पंक्तियों में कवि  पाठक की निगाह में यह बात ला देता है कि वर्तमान नौकरी के लिए इस लड़की की वास्तविक अर्हता केवल उसका शारीरिक आकर्षण और उसके विद्वान् निदेशक की उसके युवा सौन्दर्य में गहरी रुचि  है ; साथ ही वह उसे इस बात का भी ज्ञान करवा देता है कि विदेशी पैसे की मदद से हमारे यहाँ जो अनेक ग़ैर सरकारी संस्थाएं काम कर रहीं हैं वे वस्तुतः किन लोगों के कल्याण के लिए और किस तरह काम कर रही हैं – कि उनके घोषित उद्देश्यों और उनके वास्तविक क्रिया-कलापों के बीच कितनी गहरी दरार है :  


और सर चले गये सिली गर्ल, यू आर सच अ रैविशिंग स्टफ़ जैसी कोई बात
कहते हुए जो अगर सुन ली जाती
तो संजीवनी सूरी क्यों है इतनी दूरी जैसी घोर स्त्री विरोधी बात कहने के लिये
स्त्रियों के लिये काम करने वाली उनकी संस्था को मिलने वाली सालाना तीन
करोड़ की यूरोपीय ग्रांट बंद हो जाती.


यह रचना हमारे समय की उस विडम्बनापूर्ण स्थिति को भी बखूबी उजागर करती है जिसमें नारी-कल्याण के लिए काम करने का दावा करने वाली एक संस्था अंततः एक पुरुष द्वारा  किसी ज़रूरतमंद नारी के शोषण और उत्पीड़न का कारण बन जाती है.
__________________________ 
sadashivshrotriya1941@gmail
क्लिक करके यहाँ पढ़ें.
_______________
४.राजेश जोशी (बिजली सुधारने वाले)

ख़ा मो श रामकुमार : अखिलेश

$
0
0



























“मेरे अन्दर एक तरह का नैरन्तर्य (रहता) है”
(मरहूम चित्रकार ‘रामकुमार के साथ पीयूष दईया का संवाद’ से) 
  
भारत के श्रेष्ठम अमूर्त चित्रकार (23 सितम्बर, 1924 – 14 अप्रैल,2018) रामकुमार हिंदी के लेखक भी हैं. उनके ‘हुस्ना बीबी तथा अन्य कहानियाँ’, ‘एक चेहरा’, ‘समुद्र’, ‘एक लंबा रास्ता’, ‘मेरी प्रिय कहानियाँ’, ‘दीमक तथा अन्य कहानियाँ’ और दो उपन्यास ‘चार बने घर टूटे’, ‘देर सवेर’ आदि प्रकाशित हैं. कथा और चित्रों के आपसी रिश्तों पर भी उम्मीद है कभी बात निकलेगी.

चित्रकार रामकुमार के महत्व और विशिष्ठता पर यह आलेख चित्रकार–लेखक अखिलेश ने लिखा है, उनके चित्र – संसार  की विविध छबियां यहाँ आपको दिखेंगी.   
   


ख़ा मो श    रामकुमार                                    
अखिलेश




रामकुमार के चित्रों पर लिखने की दुविधा स्वामी जी को भी आयी थी, वे लिखते हैं 'राम के चित्रकर्म पर लिखना किसी भी चित्रकर्मी के कृतित्व पर लिखने की ही तरह दुस्साहस है.'पिछले हफ्ते भर से मैं भी सोच रहा हूँ कि कहाँ से शुरू किया जाये.  क्या रामकुमार के चित्रों का संसार इतना सीमित है कि कुछ सूझ नहीं रहा या फिर उनका वितान इतना विस्तृत है कि पकड़ में नहीं आ रहा. रामकुमार स्वयं लेखक हैं और उन्होंने कहानियाँ लिखी किन्तु बहुत कम चित्रकारों या चित्रकला पर लिखा. अपने समकालीन मित्रों पर उनका लिखा नगण्य है. 


बहुत खोजने पर उनका एक वक्तव्य, 'The New Generation' जो कॉण्ट्रा मैगज़ीन के तीसरे अंक में छपा है, मिला और उसमें भी रामकुमार कला पर बहुत कुछ कहते नहीं नज़र आते हैं. इस लेख में उनकी चिंता नयी पीढ़ी के कलाकारों द्वारा कुछ न कर पाने की मज़बूरी पर मुखर होती दिखती है. उन्नीस सौ त्रैसठ के इन दिनों रामकुमार के चित्र कहानी कहते दिखते हैं जिसके पात्र चित्र में यहाँ वहाँ उदास खड़े नज़र आते हैं. जिनकी शारीरिकता  मोद्ग्लियानी के पात्रों सी है और बाद के चित्र जिन्हें हम अमूर्त कहते हैं, वे भी लम्बी कहानियाँ कहते दिख रहे हैं.

हुसेन और रामकुमार की मित्रता किसी से छिपी नहीं है जिसकी प्रगाढ़ता बनारस यात्रा से शुरू हुई. हुसेन जीवन भर मिथकों और प्रमुख घटनाओं को अपने चित्र का आधार वाचाल ढंग से बनाये हुए थे,जो इसी बनारस की मुखरता, उत्सव प्रियता और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से उपजी थी. दूसरी तरफ रामकुमार ने लाल रंग के उदास होने को रेखांकित यदि किया है तब उसके पीछे बनारस के मणिकर्णिका घाट पर चिता में जल रही लकड़ी के बीच अज्ञात मृत ख़ामोशी का अनुभव है. बनारस के रहस्य और उसकी  विचित्र दृश्यावली रामकुमार के चित्रों में स्थायी रूप से बस गए.

बनारस को लेकर रामकुमार का कहना है कि उसके बाद वे कई बार बनारस गए और हर बार अलग अनुभव हुआ, वे कहते हैं -

"पिछले तीस बरस में मैं कई बार बनारस गया और हर बार मेरा अनुभव कुछ अलग रहा. यह मुश्किल ही था कि मेरे चित्रों की दृश्यात्मक धारणायें भी बदली उन अनुभव की मेरी व्याख्या के अनुरूप. अस्सी के दशक में मैं कुछ दिनों के लिए बनारस गया और मैंने तय किया कि इस बार यथार्थवादी रेखांकन ही करूँगा बिना किसी तोड़-फोड़ के. मैंने दस रेखांकन किये फिर रुक गया. मैंने सोचा मैं बनारस की आत्मा को दिखाऊंगा."   

उधर हुसेन लिखतें हैं

"साठ के दशक के प्रारम्भ में रामकुमार बनारस पहुँचे. अकेले नहीं, हुसेन उनके साथ था. दो चित्रकार, दो ब्रश. एक ब्रश गंगा की बैचेन लहरों से खेला. दूसरा स्थिर-मानो बनारस के घाट पर सदियों से धूनी जमाये है."

दोनों ही चित्रकार बनारस से दीक्षित होकर लौटे.

यह स्थिरता जिसे हुसेन ने शिद्दत से महसूस किया रामकुमार का स्थायी भाव बन गया. उनके चित्र ठहरे हुए हैं. किसी दृश्य को मानो जमा दिया गया हो. रावी नदी जिस तरह सात हज़ार फुट की ऊँचाई से जमी हुई दिखती है. उसका प्रवाह, चंचलता, वेग सब दूरी के कारण जम जाता सा दिखता है. रामकुमार के चित्रों में यही दृश्य स्थिर हो जाता है चाहे वो माचू-पीचू, इंका सभ्यता का अवशेष हो या बहती गंगा. ये स्थिरता रामकुमार की भी है उनसे मिलकर आपको यही लगता रहेगा कि किसी ठहरे हुए समय में आ गए हैं. ऐसा नहीं है कि रामकुमार बिलकुल ही उदास और स्थिर व्यक्ति हैं, उनसे ज्यादा सक्रीय और विनोदप्रिय शायद ही कोई होगा.


उदासी रामकुमार के चित्रों का स्थायी भाव है और इस उदासी को किसी भी रंग से प्रस्तुत करने का कौशल भी उन्ही के पास दिखाई देता है. रामकुमार के चित्र हमें खाली जगहें, सन्नाटा, बंजर वीरान इलाकें, सूनी, उखड़ी हुई स्मृतियाँ, उदास दृश्य, झरे वृक्ष और निपट एकान्त में बहती नदी की याद दिलातें हैं.  इन सब में सन्नाटे का मौन फैला है. रामकुमार के चित्र बहुत बोलते हैं और अक्सर उदास रहते हैं. उनका प्रसिद्ध चित्र माचू-पीचूइस उदासी को चमकदार ग्रे रंग से आलोकित करता है. बनारस का असर दोनों चित्रकारों को अपने अतीत में छोड़ आया. हुसेन को वहाँ मिथक मिले और रामकुमार को ख़ामोशी. ये ख़ामोशी रामकुमार के शिमला में बीते बचपन की ख़ामोशी तो नहीं? रामकुमार के चित्रों की ख़ास बात यह भी है कि वे अपनी ख़ामोश उपस्थिति में भी आकर्षित करते हैं. ये दुर्लभ गुण है रामकुमार का. 


वे एक चित्रकार की तरह अपने रंगों को बरतते हैं और उनमें से अधिकांश रंगों को उनके रूढ़ स्वाभाव के विपरीत लगाते हैं. एक दूसरा गुण किफ़ायत का है. उनकी रंग पैलेट में वैविध्य नहीं है. रंगों का आकर्षण उन्हें भरपूर है किन्तु अपने रंग प्रयोग में खुद को कुछ ही रंगों तक सीमित रखते हैं. यह भी नहीं है कि उन्होंने कभी रंग पैलेट के साथ प्रयोग नहीं किया. वो भी बहुत है और लगभग सभी रंग कुशलता से इस्तेमाल किये गए हैं. प्रमुख प्रक्षेपण ग्रे रंग का ही है. यह ग्रे रंग रामकुमार की पहचान बन गया हो ऐसा भी नहीं है. वे रंगों का इस्तेमाल चित्रकार की तरह ही करते हैं और उसमें अपना देखना डालते हैं.

रामकुमार के चित्रों में सबसे ज्यादा आकर्षित करने वाली बात यही है कि वे रंग प्रयोग में अपना विशिष्ट देखना शामिल करते हैं. उनके पहले के चित्र यदि मोद्ग्लियानी प्रभाव से मुक्त नहीं तो बाद के चित्रों में दृश्यचित्रण उनका आधार है. इस तरह के दृश्य चित्रण की सम्भावना अनेक हैं और रामकुमार भी अपने को इन अनेक संभावनाओं में नहीं उलझाते वे बस एक दृश्य रचते हैं और रंग-प्रयोग में उसे ख़ास बना देते हैं. स्वामी ने इसे ही 'विशुद्ध आवर्तन'कहा है. दृश्य-चित्रण का आवर्तन रंगों के कारण अकेला हो जाता है. यह अकेलापन रामकुमार का भी है.

स्वामी जिसे विशुद्ध आवर्तन कह रहे हैं उसका उदहारण माचू-पीचू है. उन्नीस सौ अस्सी में रामकुमार इंका सभ्यता के अवशेष पेरू में देखते हैं और न्यूयार्क आकर एक स्टूडियो किराये पर लेकर 'माचू-पीचू'चित्र बनाते हैं, यह एक बड़ा चित्र है जो अब भारत भवन के संग्रह में है, इस चित्र को देखने पर दर्शक को बनारस का अहसास भी होता है. रामकुमार अनजाने ही दो प्राचीन सभ्यताओ के साम्य को इस चित्र के रास्ते सुझा रहे हैं. यह बनारस उनके अवचेतन में बसा वो शहर है जिसे वे दुनिया के हर कोने में पा लेते हैं. इस अर्थ में रामकुमार अवचेतन के कलाकार हैं जिसका यथार्थ बनारस है.

अकेलेपन की उदासी रामकुमार के चित्रों का विषय है. शिबू नटेसन संभवतः इसी कारण इन चित्रों को, जिसे सभी अमूर्त मानते हैं, अमूर्त नहीं कह रहा है. इस अकेलेपन को दर्शक तक पंहुचा देना ही रामकुमार के चित्रों की सफ़लता कही जाएगी.

भारतीय चित्रकला संसार में रामकुमार ऐसे कलाकार हैं जिन्होंने अपना समय महत्वपूर्ण कलाकारों, कवियों, चिन्तक, विचारकों के साथ गुजारा. वे फ़र्नांड लेजे (Fernand Leger) के स्टूडियो में काम करते थे और लेजे उनके शिक्षक थे. यहाँ मैं नाम नहीं गिनाना चाहता किन्तु पिकासो को जब शान्ति दूत के रेखांकन के लिए पुरुस्कृत किया जा रहा था उस समारोह वे शामिल थे. यूरोप के अनेक विद्वानों के साथ उनकी मुलाकातें, बहसें और सम्वाद ने रामकुमार को अपने स्वाभाव तक पहुचने में बड़ी मदद की होगी. यहाँ भी उनकी शुरूआती प्रदर्शनी (१९५४) का उद्घाटन प्रसिद्द उर्दू शायर जोश मलिहाबादी ने किया. उनके छोटे भाई निर्मल वर्मा हिंदी के प्रख्यात लेखक हैं. इस तरह साहित्य, संगीत और अन्य कलाओं से उनकी समझ और कला का दायरा विस्तृत होता गया. उनकी खुद की लगभग बारह किताबें हैं जो समकालीन  समय के आधुनिक मनुष्य की पीड़ा और सामाजिक दुविधा के इर्द-गिर्द बुनी गयी हैं. रामकुमार कहते हैं  

"मूलतः मेरी कहानियाँ मध्य-वर्गीय मनुष्य के मेरे निजी अनुभव से जुडी हैं. हमारा परिवार बड़ा था और समस्याओं, दिलचस्प घटनाओं की कोई कमी न थी. मैं इतना साहसी न था कि इनसे दूर भाग जाता."

रामकुमार सुश्री गगन गिल को दिए साक्षात्कार में कहते हैं

"और इससे क्या फर्क पड़ता है कि एक चित्र का शीर्षक है 'फूलों के साथ लड़की'या 'नीले सूट में आदमी'- इस तरह के शीर्षक का क्या अर्थ है? जब मैं चित्र बनता हूँ- मैं किसी विशेष तत्व के बारे में नहीं सोचता, चाहे वो आध्यात्मिक हो या प्रकृति का कोई अलौकिक तत्व, ये चित्र हैं, शुद्ध, साधारण, सहज, चित्रित रंगों के प्रस्ताव, जो किसी के अनुभव से उपज रहे हैं"      

ये सही भी है इन रंग प्रस्ताव और इस विशुद्ध आवर्तन के समक्ष हम कई बार हतप्रभ रह जाते हैं. साधारण, सहज यथार्थ की उपस्थिति, उसका प्यार से सींचा गया स्वरुप, रंग योजना, और सम्भला हुआ रंग लेपन हमें भी लपेट लेता है. हम अनुभव के पाले में प्रवेश कर जाते हैं और उसका विस्तार हमारे अनुभव को जन्म देता है. 

रामकुमार हमारे समय के विशुद्ध चित्रकार हैं जिनके सीमित संसार का विस्तार विराट है. वे कहने को ख़ामोश हैं किन्तु उनका रचा संसार मुखर और अपने में समेट लेने वाला है. उनका जाना भारतीय कला संसार के लिए उतना ही असहनीय है जितना बनारस में दिसंबर की कड़कड़ाती ठण्ड में गंगा-डुबकी.    
____________ 
अखिलेश
२ मई २०१८ भोपाल 

ख़ राब कविता का अंत:करण : देवी प्रसाद मिश्र

$
0
0
(कृति - Saks Afridi)


समकालीन महत्वपूर्ण हिंदी कवि देवी प्रसाद मिश्र की कविता ‘सेवादार’ की सदाशिव श्रोत्रिय द्वारा की गयी व्याख्या पिछले दिनों से बहस मे है. विष्णु खरे का मानना था 
“जब आप एक उम्दा कवि के रूप में स्वीकृत-प्रतिष्ठित हो चुके होते हैं तो अचानक आपकी ज़िम्मेदारियाँ कठिन,जटिल और जानलेवा होती जाती हैं. यह आप ही करते हैं. आपके पाठक आपसे एक न्यूनतम उत्कृष्टता की माँग और उम्मीद करने लगते हैं. हर कला, हुनर और स्पोर्ट आदि में यह विचित्र 'demand and supply'का दुर्निवार नियम अपने-आप आयद हो जाता है. आपके चाहने-न चाहने से फिर कुछ नहीं होगा.” 
देवी प्रसाद मिश्र का मानना है – “कई बार काव्य मूल्य को आयत्त करने के लिए काव्य गुण का परित्याग करना पड़ता है. -"कविता, भाष्य, टिप्पणियाँ और देवीप्रसाद मिश्र का यह सुचिंतित प्रतिपक्ष यहाँ आप पढ़ें.






‘गर नहीं हैं मिरे अशआ'र में मा'नी न सही’
ख़ राब कविता का अंत:करण                                       

देवी प्रसाद मिश्र







मेरी कविता सेवादार का भाष्य हो, ऐसा मैंने नहीं चाहा था. बिल्कुल नहीं चाहा था, मेरे भाई. इसे एक बुरी कविता के तौर पर छोड़े रखना चाहिए था. सदाशिव जी को और उसके बाद बहसकर्ताओं को भी. जब अच्छे को अच्छा कहने की परंपरा इतना क्षीण है तो बुरे को बुरा कहने के लिये काहे इतनी मशक्कत. लेकिन दिक्कत यह है कि उसकी निहंग निंदा ही नहीं हुई, हिंदी के इस समय के बेहद समर्थ कथाकार योगेंद्र आहूजा ने इसे पसंद भी किया.

निरंतर ब़ड़े हस्तक्षेप के तैयार कवयित्री निर्मला गर्ग और अवांगार्दी तबीयत के कवि अजेय को इसकी प्रासंगिकता से इंकार नहीं था. लेकिन यह बात एकाधिकारवादी और लानतवादी कोहराम के जटिल तंत्र और आधिपत्यमूलक दबंग वकीली जिरह के संजाल में खो गई.  समालोचन के समर्थ एडिटर ने किसी समझदारी के तहत ही कहा होगा कि एनजीओ के धंधों  को लेकर सेवादार एक अकेली सी ही कविता है.  जब यह कविता जलसा में अन्य कविताओं के साथ आई ही थी तो ज्ञान जी ने इस कविता का नोटिस लिया था. असद जैदी जैसे समर्थ कवि और संपादक ने इसे छापा. तो यह कविता उतनी छतहीन, बेसहारा, बिराऊ सी नहीं थी जितना दिखाने या बताने की कोशिशें की गई है.

लेकिन फैसलाकुन होना एक तबीयत है, विमर्श हीन होना एक विकल्प और मंतव्य को छिपाने के लिये छद्म भाषिक तंत्र का कांस्ट्रक्ट एक चातुर्य. कविता की अंतर्वस्तु पर विचार किये बिना जिन्होंने इसे ख़राब कविता कहा है वह रचना से कवि व्यक्तित्व के निरसन और संरचना पर ज़ोर देने का काफी मार्मिक उदाहरण है जो रचनात्मक मीमांसा में मंतव्यवाद के संदेह को हरा भरा रखाता है और नव संरचनावाद की वापसी की भूमि तैयार करता है.  और मैं कब कह रहा कि यह महान कविता है या कि अच्छी ही कविता. यह एक बेहद साधारण कविता है जो हमारे समय की असाधारण लूट, असमान वितरण तंत्र,  बिचौलिया संस्कृति, देह को माल में बदलने की होशियारी, सेवा सेक्टर में अंग्रेज़ी तंत्र के वर्चस्व और पौरुषेय आधिपत्य  का वृत्तांत बनने की कोशिश करती है. वैसे यह भी कह दूँ कि महान और अच्छी कविताओं ने महान और अच्छे लोगों की तरह समाज और साहित्य का आत्यंतिक नुकसान किया है. मुझे सबवर्सिव पोएट्री ही ठीक लगती है- साधारण सी दिखने वाली, पलीता लगाने वाली, टेढ़ी मेढ़ी, नीली पीली, बाज़ दफा यह कहने के लिये मजबूर करने वाली कि इसमें कविता कहाँ है. 



मेरा कहना है कि काफी दिनों से काम करते कवियों की रचनाओं को उनकी एकांतिकता में नहीं किसी अवधारणात्मक विस्तार में भी देखना चाहिए. लेकिन जनाब, मैं किसी रियायत की माँग नहीं कर रहा. कुछ सूत्र दे रहा हूँ और ले भी रहा हूँ जो यहाँ नहीं भी तो कहीं और काम  आ सकते हैं. यह तो तय है कि यह प्योर पोएट्री नहीं है. शुद्ध कविता का परमौदात्य यहाँ नहीं है. आह्वान में काँपती इबारत नहीं है तो नहीं है. यह हमारे समाज के निरंतर गैरजिम्मेदार होते जाने का लगभग एंटी पोएट्री आख्यान है जिसे जानबूझकर शैली के चलताऊ  ऊबड़खाबड़पन के सहारे बयां करने की कोशिश की गई.

एक खड़खड़ करती भाषा में हमारे समय की अकथ क्रूरता के गहरे इशारे यहाँ ज़रूर हैं. एक ओर खरिआर की 13 नये पैसे रोज़ कमाती औरतें हैं  तो  दूसरी ओर संजीवनी सूरी है जिसे लगभग रोज़ 2200 रु मिलते हैं. यह खरिआर और जीकेटू के बीच का सामाजिक, सांस्कृतिक और संसाधनीय तनाव ह. संजीवनी का मायने होता है जीवनदायिनी लेकिन सोचकर रखा गया संजीवनी नाम महानगराधृत खाऊ तंत्र का अनिवार्य हिस्सा है. तो यहाँ पंडित राम चंद्र शुक्ल के विरुद्धों का सामंजस्य नहीं है-होना भी नहीं चाहिए. जो विरुद्ध है वह एकमेक  नहीं हो सकता. लेकिन विकट वैपरीत्य संजीवनी और खरिआरकी औरतों के बीच का ही नहीं है. संजीवनी अपने बॉस की सेक्सिस्ट घेरेबंदी (और प्राउलिंग)से बच नहीं सकती. 


संजीवनी की देह उसकी शक्ति संरचना और विपत्ति और उसके निरंतर आहतव्य होने का स्त्रोत है. पुरुष की दमक और धमक वाले बाज़ार में यह स्त्री की आस्तित्विक दुविधा है. तो यह रिश्तों का ऐंद्रजालीय पावर स्ट्रक्चर है जिसको समझने के लिये जिसकी दरकार हुआ करती है उसे ऐतिहासिक अवस्थिति की समझ के नाम से भी जाना जाता है. understanding of historical situation.एक बात और:कविता में आसपास एक जर्मन नस्ल का जानवर भी घूम रहा है जो भारतीय मानस में घूमते अनिर्वचनीय नस्लवाद की, आदिवासी और नागर जीवन की, काले और गोरे की, मैं और वह की, आर्य और अनार्य के विभाजन की  न मिटती ऐतिहासिक वैश्वीयस्मृति है. चाहिएवाद का लंबा पहाड़ा पढानेवालों को पुनर्स्मरण कराना चाहता हूं कि कविता को जांचने का बुनियादी प्रतिमान यह भी होता है कि उसमें हमारे समय की केंद्रीय अंतर्वस्तु का कोई सिरा है या नहीं.

हो सकता है कि यह विषमतावर्णन किसी निबंध का विषय हो लेकिन इस तरह के निबंध हिंदी में बहुत होते तो भरोसा कीजिए मैं यह कविता न लिखता. मेरे यार,मुझे एक विकट नैतिक चुगली कर लेने दो फिर कविता बने या न बने.

यह कविता अमरता विमर्श से हलकान कवि की कविता नहीं है. काव्य गुण खोकर भी कुछ कहने की ज़रूरत से न तो मायकव्स्की का इंकार था और न नज़ीर अकबराबादी  और न मुक्तिबोध का और न कबीर का. यह मत सोचिएगा कि इन महान कवियों के समकक्ष मैं खुद को रखने की कोशिश कर रहा हूँ. मैं न हुआ इतना गुस्ताख़. लेकिन काव्य गुण को बीच बीच में खोना रचना धर्म के लिए काफी ज़रूरी प्रक्रिया है. कई बार काव्य मूल्य को आयत्त करने के लिए काव्य गुण का परित्याग करना पड़ता है. कविता को जांचने के लिए इस प्रतिमान बिराऊ प्रतिमान की भी उपेक्षा नहीं की जा सकती .


और अंत में.....जो लोग इस कविता में प्रयुक्त अंग्रेज़ी को लेकर विपत्तिग्रस्त हैं वे पहचान के संकट से आलोड़ित हैं और निरर्थ मिली ताकत से भ्रमित.
_________ 

d.pm@hotmail.com



मीमांसा : मार्क्स की प्रासंगिकता और हमारा वर्तमान : अच्युतानंद मिश्र

$
0
0














कार्ल मार्क्स (5 May 1818-14 March 1883):  कार्ल मार्क्स मूलतः दार्शनिक थे, जिनकी चिंता समाज को समझने के साथ उसे बदलने की थी. धर्मों के उदय, प्रभाव और प्रभुत्व के बाद  मार्क्स की सोच ही वह संगठित विचारधारा थी जिसने पूरे विश्व को गहराई से प्रभावित किया. समाज के विकास को उसकी अर्थनीति से समझने के उनके फलसफे ने मनुष्य निर्मित प्रत्येक वस्तु पर तार्किक पुर्नविचार की जरूरत पैदा कर दी थी. श्रमिकों के जीवन में बदलाव के उनके उद्देश्य ने पूंजी और श्रम के शोषणमूलक रिश्ते को हमेशा के लिए बदल दिया.   

आज मार्क्स होते तो २०० वर्ष के होते. वह तो नहीं हैं पर उनकी विचारधारा है. पूंजीवाद अब दलाल पूंजीवाद में बदलकर हमारे सामने खड़ा है और अंधधार्मिकता तथा अंधराष्ट्रवाद के साथ मिलाकर इस धरती के अस्तित्व के लिए खतरा बन चुका है.

क्या हमारी वर्तमान चुनौतियों का सामना करने के लिए मार्क्स के बाद के दार्शनिकों ने मार्क्सवाद का विकास किया है.

साहित्य और दर्शन के गम्भीर अध्येता अचुतानंद मिश्र ने इसी विकास प्रक्रिया को परखा है.       

मार्क्स  की  प्रासंगिकता  और  हमारा  वर्तमान                           
अच्युतानंद मिश्र

मंगलाचार : सुमीता ओझा

$
0
0

























समालोचन पर सुमीता पहली बार छप रही हैं. कविताएँ ध्यान खींचती हैं, रोकती टोकती हैं, सोचने पर विवश करती हैं. जो दुनिया हमने अपने लिए बनाई है वह अब जगह-जगह से चुभती है, बदकिस्मती से जिनका इसमें कोई हाथ नहीं है वे इसके अधिक शिकार हैं. कवि अधिक से अधिक आगाह ही तो कर सकता है.  


सुमीता ओझा  की पांच कविताएँ








         सुमीता ओझा  की  कविताएँ                              





बिलो द बेल्ट

दिलकश, फरेबी
जिंदगी के दराँतीदार जबड़े का
अगला ग्रास मैं थी.
उसने बेहिचक कौर भरा और
मेरी सीधी खड़ी रीढ़
कमर से अलग हो गई.
बेपनाह दर्द से बिलबिलाती
अब मैं अधकटे तेलचट्टे जैसी थी.
गायब हो चुका था मेरा सिर, आँखें और चेहरा
चेहरा गर होती हो पहचान तो
अब वह नहीं था मेरे पास
अधकटे जीवों की जमात में
अब शामिल थी मैं

यह बिलो द बेल्ट
बर्बर, स्याह संसार था
यहाँ की भाषा, संस्कार, रीति-रिवाज
खान-पान, चाल-चलन
और यहाँ तक कि
राज-काज भी बिलो द बेल्ट थे
यहाँ मुकुटों से ज्यादा सम्मानित थे बेल्ट
और जूते प्रदर्शन की सबसे ऊँची चीज.

आख़िरकार
मुझपर इल्ज़म यह लगा कि
मौत के बेरहम नुकीले पंजे
जब पिन्हा हो रहे थे
मेरे बचे-खुचे अस्तित्व में
मैं बिना चीखे मर गई.
ज़िन्दा होने का सबूत दिए बगैर
यूँ गुज़र जाने से
बहुत ख़फा है ज़िन्दगी
उसे बेतरह शिकायत है कि
फरेब हुआ उसके साथ
कि आत्मा के छीजकर समाप्त हो जाने तक
मुझे लिख देने चाहिए थे
उसकी प्रशस्ति में एक सौन्दर्यातीत
कालजयी कविता
कोई धड़कता विचार या
हर दिल अजीज कोई नारा ही
ताकि मेरे न होने पर भी
ज़िंदगी जब चाहे
खेल ले
विचार-विचार या नारा-नारा.




सूरज को नहीं होती आँखें

सहनशीलता बेहद टुच्ची शय है
जिसके सहन में
पीपल बीज सी पलती
उम्मीद है कि मरती नहीं.

उम्मीद है कि किसी दिन आ ही जाएगा वह दिन
जिसके लिए दुनिया भर के कवियों की
निर्दोष आँखें अपलक जागती हैं
रात-रात भर मंत्रविद्ध:
न स्वप्न, न सुषुप्ति
न जागृति, न मुक्ति
एक ऐंठन, एक मरोड़
एक चक्करदार बेचैनी
न आदि, न अन्त
न मात्रा, न सम
बेहिसाब प्रकाशवर्षों की परिधि पर
ऑटोमेटिकली चलते ही चले जाने की यान्त्रिक मजबूरी
खिंचे चले जाने से रुकते नहीं प्राण
किसी महाशक्तिशाली ब्लैकहोल की
असीम गुरुत्वीय शक्ति में.

दिन सबसे शक्तिशाली ब्लैकहोल
सूरज जिसके काले छेद की सीवन की कोशिश में
औंधे मुँह गुड़प जाता है
हर शाम महासमुद्र के खारे अँधियारे में.
क्योंकि सूरज को नहीं होती आँखें
उसके तेज को रोशन करने
जागती हैं कवियों की आँखें
रात-रात भर.

पैंतरेबाज अघोरी दिन की
मायाविनी भैरवी रात
जब दसों दिशाओं से उफनते हाहाकारी अंधकार के
मूसलों से कूटने लगती
सुकोमल क्षणों की छाती
उससे निर्भय छाती भिड़ा देने के लिए
कवियों की निःशंक, निराक्रांत, निष्पलक
जागती आँखें ही होती हैं मौजूद

जब ज्ञान, सत्य और अभिव्यक्ति की
कसती जा रही हो घेराबंदी
सभी शोध, सारे आविष्कार
रंगीन काँच की दीवारों वाली
पता नहीं किस व्यापारिक दुनिया में
कैद किए जा रहे हों
महामनीषी वैज्ञानिक उचार रहे हों
पृथ्वी का भविष्य
उसकी उम्र के दिनों की गणना
कर रहे हों अँगुलियों पर
ऐसे कठिनतम समय में
कवियों के जागती आँखों के
अग्निशरों की नोक पर ही
घूमती हुई बची रहेगी पृथ्वी.




(क्योंकि) इल्म से शायरी नहीं आती 

दर्द इतना था ज्यादा
कि छोटा पड़ने लगा
ब्रह्माण्ड समा सके जितना बड़ा दिल
तो मैंने विकराल दर्दों के
घनीभूत नैनो कणों से बना दी
स्फटिक सी सुच्ची,  गोल एक हरी-भरी पृथ्वी
ये उल्काएँ, आकाशगंगाएँ और मन्दाकिनियाँ
मेरे ही घनीभूत दर्द के कतरें हैं
जो छिटककर बिखरें हैं यहाँ-वहाँ
मेरे ही दर्द का धनीभूत पिण्ड है पृथ्वी.

क्लोन और क्लाउन के इस भ्रामक दौर में
शब्दसाजी भी जब हाइब्रिड हो
तब खरी संवेदनाओं के अर्थ तलाशना व्यर्थ है
मंगल और चाँद पर प्लॉट खरीदने की होड़ में
(वैसे विक्रेता कौन है भला???)
रोजी और रोटी के तर्क का
भला क्या अर्थ है?

भोर का तारा उदित हो
इससे पहले रोज़ ही
घनघना उठते हैं लाउडस्पीकर
प्रबल आस्था(?) के विषबुझे छर्रों के
वयुवेगी रेलों से सुन्न है चेतना
सुसाइडऔर बच्चाबम निर्माता
पोर्टेबल कारखाना बन गया है
आस्तिकता का दुर्दम्य दावेदार...

सन्न हैं पेड़-पौधे
एक चिड़िया चहचहा गई है
छत की मुंडेर पर
एक औरत गा रही है
लाउडस्पीकर पर
एक शिशु चिचिया रहा है
सड़क पर
कई औरतें सोहर गा रही हैं
जैसे रुदालियाँ हो मर्सिया मनाती.

अनुभव और अनुभूति के बीच की
सघन, बेराह, घुप्प जंगल सी तन्द्रा में
अनिवार परम सत्य-सा
अकेलापन फड़फड़ा रहा है चारों ओर
अधकच्ची नींद में
कानों में कुबोले कोरस घोलते
मच्छर सरीखा.

मैं इस धूर्त मच्छर को चुटकियों में
मसल देना चाहती हूँ.
मैं सोना चाहती हूँ
एक बेफिक्र गहरी नींद
बिना सपनों की मिलावट वाली.






उजलापन

मेरी डायरी के एक पन्ने भर की पृथ्वी
कि तर्जनी जब पहुँचती है इस्ताम्बुल
तब मध्यमा उज़्बेकिस्तान के उत्तर को छू रही होती है
हथेली में वैसे ही समा जाते हैं सभी देश
जैसे कि मेरा माउस
और छुअन भर ले आती है
सीमा रेखाओं के पार सौहार्द के मस्तूलों पर
मजबूती से पाँव टिकाए
उजली हँसियों के चंदोवे तानने में व्यस्त
दोस्तों के सभी हाल-चाल.

हँसी के उजलेपन में
धनक के सभी रँग ज़ज्ब हैं
निश्चित मात्रा, निश्चित अनुपात में
दर्द के रसायन से सींचे हुए...

यह उजलापन उतना ही आसान
जितना अपने माथे के ठीक बीचोबीच ठोके जाते कील पर
हथौड़े के हर प्रहार के साथ
क्षमा और दुआ को उठे खुद के हाथ...

दिलोदिमाग के बीहड़ माँगते हैं
अपरिसीम श्रम और सद्भाव के
रहस्यमयी औजार
कोई चकमक
कि चमचमाती-सी कोई लौ
छू जाए अस्ति-तत्व के किसी छोर से...

यह बीहड़ों का प्रशांत उजलापन ही तो है
कि अफ्रीकन जंगलों में
हाथी भी सफेद हो गए
और अंतरिक्ष के घटाटोप अँधियारे में
सैकड़ों सूरज खिल गए.
     



बदलते दौर में

यह सुनी-सुनाई बात ग़लत साबित होती दीख रही है
कि काटे जाने के लिए
सबसे पहले चुना जाता है
एकदम सीधा खड़ा पेड़.

मुहावरे भी बदल रहे हैं अपनी रूपछवियाँ
बदलते दौर में
औद्योगीकरण, सौन्दर्यीकरण,
हाई-फाई फोर लेन
हाईटेक फ्लाईओवर्स जैसे
आयातित, अभिजात्य उपादान
बदलते जा रहे हैं
अबतक के जीवन का पूरे-का-पूरा आख्यान.

अत्याधुनिक दिखने की गलाकाट रस्साकस्शी में
सीधे-टेढ़े की फिक्र करने जैसी बातें
एकदम से आउटडेटेड हैं.
धरती की खाल खोदकर
उसकी धमनी-शिराओं में धँसे
पेड़ों की जड़ों के दूधिया, मुलायम रेशे-रेशे तक
चुनकर साफ किए जा रहे हैं
एकदम साफ
कि भूतल के भीतर से
सरपट दौड़ सकें फर्राटा ट्रेनें...

जबकि सबसे सीधे खड़े पेड़
जैसे कि टीक यानी सागवान
सँभाले जा रहे हैं बड़े जतन से.

सीधे पेड़ के
चाहे जितने टुकड़े काटिए
वह सीधा ही होता है
जबकि टेढ़े से सीधा निकाल पाना
टेढ़ी खीर सा मुश्किल.

टेढ़े-मेढ़े सरकने वाले साँप जैसे
प्राणियों की पसन्द के नहीं होते सीधे पेड़.
सोचती हूँ कि सीधे, पतले, लम्बे पाइप-से रास्ते में
चलने की मजबूरी में
शायद मर ही जाते हों साँप.

और सीधा इन्सान!
किसी धूर्त्त से पूछकर देखिए
सीधे इन्सान को सबसे खतरनाक बताएगा वह

आत्मीय छाया की छोटी-सी ओट थामे
एक आश्वस्तिदाई भंगिमा के साथ सीधा इन्सान
इस सरल अपनेपन से मिलता है कि
चटकती प्यास में सूखे गले को तर करने को
कोई अजनवी भी झिझक छोड़ माँग ले पानी
या पूछ ले टाइम या
खोल दे मन का संशय, विषाद
या बेहिचक बता सके अपनी परेशानी का हाल...

धीरे-धीरे विलुप्त होती प्रजाति जिसकी
ऐसी सरल रेख-सा सीधा इन्सान ही
धुमैले बवंडरों के आगे खड़ा पर्वत हो जाता है
सीधा ही बन सकता है
तीर या त्रिशूल या चक्र भी

शिवेतर का क्षत करने के लिए.
________________

सुमीता ओझा
गणित विषय में गणित और हिन्दुस्तानी संगीत के अन्तर्सम्बन्धपर शोध. इस शोध पर आधारित पुस्तक जल्द ही प्रकाश्य. पत्रकारिता और जन-सम्पर्क में परास्नातक. मशहूर फिल्म पत्रिका स्टारडस्टमें कुछ समय तक एसोसिएट एडिटर के पद पर कार्यरत. बिहार (डुमरांव, बक्सर) के गवई इलाके में जमीनी स्तर पर जुड़ने के लिए कुछ समय तक समाधाननामक दीवार-पत्रिका का सम्पादन.

सम्प्रति अपने शोध से सम्बन्धित अनेकानेक विषयों पर विभिन्न संस्थानों और विश्वविद्यालयों के साथ कार्यशालाओं में भागीदारी और स्वतन्त्र लेखन. वाराणसी में निवास.

sumeetauo1@gmail.com

सबद भेद : रामविलास शर्मा का कवि-कर्म : रवि रंजन

$
0
0












रामविलास शर्मा बड़े आलोचक हैं, १९४३ तक वह एक उदीयमान कवि भी थे. सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ ने ‘तार सप्तक’ में उन्हें इसीलिए शामिल भी किया था. हालाँकि रामविलास शर्मा ने तब तक अपना रास्ता ‘चीन्ह’ लिया था. हमारे समय के अचूक संपादक ‘अज्ञेय’ के लगातार तक़ाज़ेके बाद उन्होंने कविताएँ तो दे दी पर सन्यास की घोषणा भी लगे हाथों कर दी थी. रामविलास शर्मा कविता लिखने में अपने को असमर्थ पा रहे थे ख़ासकर प्रेम कविताएँ – ‘जिसके ह्रदय में प्रेम की नदी न बहे, वह कवि ही क्या !’  

बाद में उनके दो कविता संग्रह प्रकाशित हुए – ‘रूपतरंग’ तथा सदियों के सोये जाग उठेउनकी कविताओं की खोज़ ख़बर लेते हुए कवि रामविलास शर्मा पर यह आलेख प्रो.रवि रंजन ने लिखा है.



अरथ अमित अति आखर थोरे                      
(रामविलास शर्मा का कवि-कर्म)

रवि रंजन




रामविलास शर्मा के कवि-कर्म को लेकर हिन्दी के पाठकों व आलोचकों के मन में शुरू से ही कई तरह का अंदेशा रहा है और आज भी उनकी आलोचना के मुकाबले कविताओं की सर्जनात्मक सार्थकता एवं सामजिक अभिप्राय व प्रभाव को कम करके आंकने वाले लोगों की कमी न होगी. इन लोगों को खुद रामविलास जी के उस वक्तव्य का बल भी प्राप्त है, जो तारसप्तकमें प्रकाशित है :

कविता लिखने की ओर मेरी रुचि बराबर रही है लेकिन लिखा है मैंने कम. जो व्यक्ति एक विकासोन्मुख साहित्य की आवश्यकताओं को चीन्ह कर उनके अनुरूप गद्य लिखे, वह कवि हो भी कैसे सकता है ? मेरे बहुत से लेख साहित्य के अशाश्वत सत्य, वाद-विवादों से पूर्ण हैं. कविता में शाश्वत सत्य की मैंने खोज की हो, यह भी दिल पर हाथ रखकर नहीं कह सकता. .......पता नहीं कविता पढकर अपरिचित मित्र मेरे बारे में किस तरह की कल्पना करेंगे. मैं उन्हें इस बात का आश्वासन देना चाहता हूँ:जैसे वे मेरी कविताओं के बारे में सीरियस नहीं हैं, वैसे मैं भी नहीं हूँ. .......आशा है यह प्रकाशन अंतिम होगा.

कभी अपर्याप्त, अनुपयुक्त तथा बेमन से किया प्रतीत होने वाला शब्द-कर्म अक्षर-जगत में कैसे अपनी एक खास जगह बना लेता है, कैसे वह एक ऐतिहासिक वास्तविकता का व्यंजक या सर्जनात्मक पर्याय हो उठता है, रामविलास शर्मा की कविताएँ इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हैं..  जिन्हें आज भी रामविलास जी के आलोचना-साहित्य, सामाजिक-सांस्कृतिक एवं भाषाई चिंतन के बरअक्स उनकी कविताओं को पढ़ना अस्वाभाविक और कमतर प्रतीत होता है, ऐसे तथाकथित बुद्धिजीवियों की कठिनाइयों के कारण साहित्येतर भी हो सकते हैं. अन्यथा,वे रामविलास जी की कविताओं की समाजशास्त्रीय प्रमाणिकता एवं कलात्मक सौंदर्यशीलता के साथ-साथ उनमें निहित अर्थव्यजनाओं को रेखांकित कर पाते,जो प्रगतिशील आंदोलन के दरम्यान साहित्य-सृजन के क्षेत्र में प्रचलन और प्रयोग से ही नहीं, बल्कि एक खास तरह की ऐतिहासिक परिस्थिति के दबाव के चलते वहाँ मौजूद हैं.

कविता संग्रह के नाम पर रामविलास शर्मा के कुल दो पुस्तकें प्रकाशित हैं- रूपतरंग और प्रगतिशील कविता की वैचारिक पृष्ठभूमिऔर सदियों के सोये जाग उठे.रूपतरंगअपने मूल रूप में सन् 1956 में प्रकाशित हुआ था और स्पष्ट ही वह हिंदी मेंनयी कविताके विकास का दौर था.  अपने मौजूदा रूप में रूपतरंग(1990) तीन भागों में विभाजित है.  प्रथम भाग में रामविलास जी की कविताएँ,दूसरे भाग में बल्गारिया  के विद्रोही कवि निकोला वप्त्सारोव की कविताओं का हिंदी अनुवाद है और तीसरे भाग में प्रगतिशील कविता की वैचारिक पृष्ठभूमिशीर्षक के अंतर्गत विनिबंध संकलित हैं.  वस्तुतः प्रगतिशील कविता की वैचारिक पृष्ठभूमिशीर्षक विनिबंध की शुरुआत रूपतरंगके दूसरे संस्करण की भूमिका के तौर पर हुई थी पर संभवत: विस्तार की वजह से ऐसे तमाम निबंधों को पुस्तक के अंत में संकलित करना पड़ा होगा. प्रगतिशील कविता की वैचारिक पृष्ठभूमिशीर्षक के अंतर्गत लिखित ये निबंध रूपतरंगकी भूमिका हों या न हों पर खुद रूपतरंगकी कविताएँ रामविलास जी के संपूर्ण गद्य लेखन की भूमिका अवश्य हैं.  उन्होंने खुद स्वीकार किया है कि मेरे समस्त विवेचनात्मक गद्य के भावस्रोत यहीं हैं.  जो लोग पूछते हैं, कविता लिखना क्यों छोड़ दिया, उन्हें मैं कह सकता हूँ, अपनी कविता की व्याख्या ही तो करता रहा हूँ.

रामविलास जी के इस संग्रह की कविताओं का वस्तु-फलक अत्यन्त व्यापक है.  इसका एक सिरा यदि अपनी ठेठ स्थानीयता से जुड़ा है तो दूसरा सिरा संपूर्ण भारतीय परिवेश तक प्रसरित है.  तार सप्तकके अपने वक्तव्य में उनहोंने लिखा था :

बचपन गाँव के खेतों में बीता है और वह संपर्क कभी नहीं छूटा.... मैं साधारणतः छह घण्टे काम करूँ तो खेतों के बीच में रहकर दस घण्टे कर सकता हूँ. हिन्दुस्तान के जिस गाँव पर भी साँझ की सुनहली धूप पड़ती है, वह अपने गाँव जैसा ही लगता है.          

रूपतरंगमें यदि एक ओर अवध की ग्रामीण प्रकृति और उसकी संस्कृति को रूपायित करने वाली बहुत-सी कविताएँ हैं तो दूसरी ओर वहाँ खजुराहो, ‘मातृतीर्थ:तिरुच्चिरापल्लीतथा केरल:एक दृश्यजैसी कविताएँ भी हैं और स्पष्ट ही ऐसी अनेकानेक कविताएँ कवि रामविलास शर्मा की संवेदना के अखिल भारतीय आयाम को सृजन के स्तर पर उद्घाटित करती हैं.

ग़ौरतलब है कि रामविलास जी जब अपनी कविताओं में अवध से लेकर भारतवर्ष के विभिन्न क्षेत्रों की प्राकृतिक सुषमा को रूपायित करते हैं तो उनका कवि एक विलक्षण संवेदनात्मक आग्रह के साथ संबद्ध देश और काल से जुड़ा रहता है..  कृष्णा तट पर विजयवाड़ाकविता इसका अच्छा उदाहरण है:

आंध्र देश की शस्य-स्यामला
धरती को आप्लावित करती
दक्षिण की गंगा-सी बहती है विराट्
कृष्णा की धारा.
आज नयी आशा से आंध्र प्रदेश जागा है
युगों-युगों के पीड़ित जन उठ खड़े हुए हैं.
प्राणों से स्वर फूट पड़े हैं.
(रूपतरंग, पृ.80)


ऊपर की पंक्तियों में छोड़ द्रुमों की मृदु छायायाअहा! ग्राम्य जीवन भी क्या हैवाली किशोर-भावुकता नहीं है.  समाज में सदियों से व्यवस्था का नरक भोगने को अभिशप्त दबे-कुचले लोगों के साथ कवि के आत्मीय रिश्ते की झलक यहाँ स्पष्ट है.  वस्तुतः आंध्र देश की शस्य स्यामलाधरतीऔर कृष्णा नदी की विराट धारा से कवि का यह अनन्य अनुराग उसके रोमांटिक दृष्टिकोण की तुलना में जनवादी साहित्य-विवेक का परिचायक है, जहाँ बी.टी.रणदिवे के नेतृत्व में उस जमाने में चलाए जाने वाले जनांदोलन के प्रति सहानुभूति व्यक्त हुई है. रामविलास शर्मा ने नयी कविता और अस्तित्ववादमें लिखा है :

पूँजीवादी व्यवस्था श्रमिक जनता का आर्थिक रूप से ही शोषण नहीं करती, वह उसके सौंदर्य-बोध को कुण्ठित करती, उसके जीवन को घृणित और कुरूप भी बनाती है. फूलों-फव्वारों से सजे हुए बाग़-बगीचे पूँजीपतियों और उनकी रखैलों के लिए हैं, मज़दूरों के लिए गन्दी बस्तियों की तंग कोठरियाँ हैं, समाजवाद का उद्देश्य शहर और गाँव के भेद मिटाना है, खेतों की हरियाली के बीच स्कूल-अस्पताल क़ायम करना, वहाँ बिजली की सुविधाएँ पहुँचाना और शहरी बस्तियों की गंदगी मिटाकर हरे-भरे पार्कों, पेड़ों और फलों से उन्हें सुन्दर बनाना है.  जो चेतना मनुष्य की इस प्राकृतिक आवश्यकता को समझती है, वही उसे सामाजिक संघर्ष में भाग लेने की प्रेरणा भी देती है. 


इस दृष्टि से रूपतरंगमें संगृहीत चाँदनी, शारदीया, प्रत्यूष केपूर्व,कतकी,डलमऊ की गंगा, बैसवाड़ा, चिदंबरम्तथा महाबलिपुरम् का समुद्र तटजैसी कविताएँ अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं. याद रहे कि जिन्हें पता नहीं है कि पेन्ना, कावेरी,  शम्पा व तुंगभद्रा नदियाँ किन इलाके से होकर गुजरती हैं या विजयनगरम, चिदंबरम व तंजाउर क्यों महत्त्वपूर्ण स्थल हैं, रायलसीमा, त्रावणकोर एवं मालाबार किस प्रांत में हैं, उनका अबोध भारत प्रेम कितना हास्यास्पद है, यह अलग से बताना ज़रूरी नहीं है.  

तार सप्तक’के दूसरे संस्करण के अपने वक्तव्य में रामविलास जी कहते हैं: ‘मेरा बचपन अवध के गाँवों में बीता. उन संस्कारों के बल पर मैंने वहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य और सामाजिक जीवन पर कुछ कविताएँ लिखीं.’  पर, रूपतरंगमें ऐसी कई कविताएँ हैं, जिनमें गाँव के प्राकृतिक सौंदर्य एवं ग्रामीण सामाजिक जीवन के यथार्थ के बीच एक तरह के तनाव की स्थिति दिखाई पड़ती है.   उदाहरण के लिए इस संग्रह की सिलहारशीर्षक कविता द्रष्टव्य हैं:

पूरी हुई कटाई अब खलिहान में
पीपल के नीचे है राशि सुची हुई,
दानों भरी पकी बालों वाले बड़े
फूलों पर पूलों के लगे अरम्भ हैं.
बिगही बरहे दीख पड़े अब खेत में,
छोटे-छोटे ठूँठ ठूँठ ही रह गये
अभी दुपहरी में पर, जब आकाश को
चाँदी का-सा पात किये हैं तप रहा,
छोटा-सा सूरज सिर पर बैसाख का,
काले धब्बों-से बिखरे वे खेत में
फटे अँगोछों में, बच्चे भी साथ ले,
ध्यान लगा सीला चमार हैं बीनते,
खेत कटाई की मज़दूरी इन्हीं ने
जोता बोया सींचा भी था खेत को.
(रूपतरंग, पृ.37)


सन् 1937 में रचित इस कविता में फसल कटने के बाद अनाज की ढेरी से भरेपुरे खेतों का सौंदर्य वर्णित है. पर कविता के अंत में इन खेतों को जोतने, बोने और सींचनेवाले लोगों को जब हम बतौर पारिश्रमिक खेतों में बिखरे हुए दाने बीनते हुए पाते हैं तो खेत को देखकर पैदा हुआ हमारा सौंदर्य-बोध एक बेचैन कर देने वाली नाटकीय विडम्बना में परिणत हो जाता है. 

कवि केदारनाथ सिंह के शब्दों में  

यहाँ कला की दृष्टि से जो बात हमारा ध्यान आकृष्ट करती है, वह यह कि वह इस पूरे वर्णन में कवि आभास यही दे रहा है कि वह अपनी ओर से जो जैसा है,  उसको वैसा-का-वैसा रख लेने के सिवा कुछ नहीं कर रहा है.  पर सच्चाई यह है कि वह बहुत महीने ढंग से धीरे-धीरे पाठक को एक खास बिन्दु तक ले जाना चाहता है और इस तरह गहरे स्तर पर उसकी बँधी हुई सौंदर्य-चेतना को विचलित या आंदोलित करना चाहता है.  रामविलास जी की कल्पना यथार्थ के इर्द-गिर्द घूमती है और उसके साथ एक कलात्मक संगीत की तलाश करती है.  इसीलिए उनकी इस तरह की कविताओं में शब्दों और दृश्यों की एक अद्भुत मितव्ययिता है.

सिलहारकविता के बारे में केदार जी की इस टिप्पणी से गुजरते हुए याद आ सकते हैं आलोचानात्मक समाजशास्त्री लियो लावेंथल,जिनका मानना था कि रचना में कई बार यथार्थ के मुकाबले यथार्थ के प्रति रचनाकार का दृष्टिकोण महत्त्वपूर्ण होता है, जिसके चलते किसी रचना से गुजरते हुए पाठकों का ऐसे विशिष्ट जीवनानुभवों से साक्षात्कार होता है जो वैयक्तिक के साथ-साथ सामाजिक- ऐतिहासिक भी होते हैं. सच तो यह है कि कवि रामविलास शर्मा वस्तुओं, घटनाओं और संस्थाओं के केवल यथार्थ रूप की चिंता करने के बजाए उन्हें मानवीय यथार्थ के रूप में ग्रहण करते हैं. इसलिए उनकी कविता में उनकी निजी रचना-दृष्टि एवं अनुभूतियाँ शामिल हैं.

यथार्थ जगत और साहित्यशीर्षक विनिबंध में रामविलास शर्मा ने लिखा है: यथार्थवाद को सीमित अर्थ में लेना अनुचित है. उसमें सामाजिक समस्याओं के चित्रण के अलावा प्रकृति-चित्रण भी हो सकता है; संघर्ष के चित्रण के अलावा प्रेम के मुक्तक भी लिखे जा सकतें हैं. मनुष्य के सौंदर्यबोध में जो परिवर्तन होते हैं, वे प्रत्यक्ष रूप में यथार्थ-चित्रण से असम्बद्ध होते हुए भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं होते.प्रसंगवश उनकी एक प्रकृति विषयक कविता दृष्टव्य  है जो अपनी क्लासिकी बनावट व बुनावट के चलते वैदिक ऋचाओं की याद दिलाती है :

तैर रहे हैं
ललछौहें आकाश में
सिंगाल मछलियों-से
सुरमई बादल.
खिल  उठा
अचानक
विंध्या की दाल पर
अनार-पुष्प-सा
नारंगी सूर्य.
मँडराने लगी
झूमती फुनगियों पर
धूप की असंख्य तितलियाँ
उतर रही है उतावले डग भरती
नर्मदा घाटी में चुलबुली सुबह.


प्राकृतिक सौंदर्य एवं सामाजिक जीवन के कटु यथार्थ के बीच गहरे स्तर पर सर्जनात्मक तनाव को उनकी शारदीयाकविता में भी लक्षित किया जा सकता है.  इसमें जहाँ एक ओर पश्चिमी क्षितिज पर अपनी स्वर्ण किरणें बिखरते अस्ताचलगामी सूर्य के साथ-साथ भरे ज्वार के पके भुट्टे का बिंब है, वहीं दूसरी ओर एस ऐसी ग्राम वधू का चित्र है, जिसकी भरी जवानी पक कर झुक गयीहै. वस्तुतः यहाँ कवि की कला-चेतना एवं सामाजिक चेतना के बीच द्वद्वात्मक एकमेकता की अभिव्यक्ति मिलती है :

सोना ही सोना छाया आकाश में,
पश्चिम में सोने का सूरज डूबता,
पका रंग कंचन जैसा ताया हुआ,
भरे ज्वार के भुट्टे पककर झुक गये .
गला-गलाकर हॉंक रही गुफना लिए,
दाने चुगती हुई गलरियों को खड़ी,
सोने से भी निखरी जिसका रंग है,
भरी जवानी जिसकी पककर झुक गई .

(रूपतरंग पृ. 31)

भारत में अंग्रेज़ी राज और मार्क्सवादनामक दो खण्डों में प्रकाशित अपने महाग्रंथ में रामविलास शर्मा ने नवजागरण की सामाजिक, सांस्कृतिक बुनियाद की पहचान करते हुए नवजागरण के आगामी सोपानों के राजनीतिक, ऐतिहासिक और आर्थिक पहलुओं को स्पष्ट किया है. इस ग्रंथ के दूसरे खण्ड की भूमिका में उन्होंने लिखा है कि

हमारी सांस्कृतिक स्थिति के एक छोर पर करोड़ों आदमियों की निरक्षरता है, दूसरे छोर पर हज़ारों बुद्धिजीवियों पर अमेरिकी संस्कृति का प्रभाव है. क्या संगीत और फिल्में, क्या अर्थशास्त्र और भाषाविज्ञान, मनुष्य को नैतिक पतन और प्रगतिविरोधी  मार्ग की ओर ले जाने वाली प्रवृत्तियाँ सब तरफ़ दिखायी देती हैं.

रामविलास जी की कविताओं में भी इस सामाजिक-सांस्कृतिक संकट को अपने तईं अभिव्यक्ति मिली है :

गहरी निद्रा से सहसा जगने वालों को
बोध हुआ यह तो जीवन की काल रात्रि है .
यज्ञ ध्वंस-सी,
माँस-रक्त की वर्षा होती है धरती पर
अंधकार के दास हृदय से मना रह हैं,
यह तीसरा पहर जीवन की कालरात्रि हो.


कवि के अनुसार इस कालरात्रिकी विभीषिका से मुक़ाबला करने के लिए अर्थतंत्र से लेकर भाषा और संस्कृति तक स्वदेशी को धुरी बनाकर एक शक्तिशाली साम्राज्यविरोधी राष्ट्रीय संयुक्त मोर्चे का निर्माण किया जा सकता है. ऐसा मोर्चा जनवादी क्रांति के शेष कर्त्तव्य पूरे कर सकता है. इस विचार का भावस्त्रोतरूपतरंगकी तीसरे पहरशीर्षक कविता में निहित है, जहाँ यह कविता के कलेवर में इस प्रकार व्यक्त हुआ है :

नहीं मृत्यु की अमा निशा, तीसरा पहर है,
नीड़ों में खगकुल गाता है नयी प्रभाती .
निकट आ रही है क्रमश:प्रभात की बेला .
बुझ जायेगी पीत चाँदनी, अस्थिर आभा;
हरी दूब पर किरणों से मोती चमकेंगे .
(रूपतरंग पृ. 74.)



इस संदर्भ में रामविलास जी की डॉलर की संसार यात्राकविता भी उल्लेखनीय है:

एक अजूबा देश बना है,
नाम भला अमेरीका .
बाहर से तो रंगरंगीला,
भीतर से है फीका .
भीतर से है फीका यारो,
गजब और रजधानी .
दुनिया भर की ठगी यहीं पर
और यहीं बेइमानी .
कह अगिया बैताल,
यहाँ सोने का डॉलर राजा .
देस-देस को देख बिचारै,
जल्दी सबको खाजा ..
                                    
(सदियों के सोये जग उठे, पृ. 165)


सन् 1956 में जब रूपतरंगप्रकाशित हुआ तो उसमें अगिया बैताल, निरंजन एवं भजनदासजैसे छद्मनामों से रचित रामविलास जी की हास्य-व्यंग्यपरक कविताएँ, उदबोधनात्मक कविताएँ तथा अवधी में रचित मज़दूर सभा का आल्हाऔर डाकियों कीहड़तालजैसी रचनाएँ संगृहीत नहीं थीं, जबकि इसके क़रीब बारह साल पहले तार सप्तकमें हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैयालाल कीजैसी उनकी सुपरिचित व्यंग्य कविता प्रशंसित हुई थी. तुलसीदास की शब्दावली में कहें तो कवि रामविलास शर्मा के इस संग्रह-त्यागविवेक को उस ज़माने में साहित्यिकों ने उनके काव्यबोध एवं कवितासंबंधी मान्यता के प्रश्न से जोड़ कर देखते हुए इसे कवि रामविलास शर्मा पर आलोचक रामविलास शर्मा की एक अर्थपूर्ण टिप्पणी एक बेहद ईमानदार और निर्मम टिप्पणीमाना था. संभवत:तब रूपतरंगनाम की आत्यन्तिक स्वच्छंदतावादी अर्थध्वनि से आक्रांत इन महानुभावों को आचार्य रामचंद्र शुक्लका एक कथन की याद न रही हो कि संसारसागर की रूप-तरंगों से ही मनुष्य की कल्पना का निर्माण और इसी की रूपगति से उसके भीतर विविध भावों या मनोविकारों का विधान हुआ है .

सन् 1988 में रामविलास जी की 1945-47 के बीच रचित राजनीतिक कविताओं का संग्रह जब सदियों के सोए जाग उठेके नाम से छपा तो हिन्दी के अक्षर-जगत् में अग्रणी कहलाने वाले कुछ लोगों मे रूपतरंगकी कविताओं से अलगाते हुए इसे कवि के दोहरे व्यक्तित्व का सूचक बताया था. इस तरह की फ़तवेबाज़ी पर अपने निराले अंदाज़ में चुटकी लेते हुए रामविलास जी ने लिखा है कि दोहरे व्यक्तित्व की परंपरा बहुत पुरानी, बहुत व्यापक है, अंतरराष्ट्रीय है. उससे जुड़ने में घाटा नहीं है. मुख्य बात यह है कि विकासशील औरपतनशील पक्षों मे भेद करना आवश्यक है. इस संदर्भ मे उन्होंने भारतेन्दु, निराला एवं शेली की अनेकानेक कविताओं का साक्ष्य भी प्रस्तुत किया है.

सच तो यह है कि सदियों के सोये जाग उठेमें संगृहीत रामविलास शर्मा  की राजनीतिक कविताओं की अर्थसंवेदना के प्रति उत्सुक साहित्यिकों को कम-से-कम हिन्दी में रचित राजनीतिक कविता की उस परंपरा के मद्देनज़र ही कोई बात कहनी चाहिए जिसमें भारतेन्दु, निराला, दिनकर, केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, त्रिलोचन, रघुवीर सहाय,केदारनाथ सिंह जैसे बड़े कवियों की कविताएँ आती हैं . दूसरी बात यह कि रामविलास जी के इस दूसरे संग्रह की कविताओं की सर्जानात्मक बनावट व बुनावट के मद्देनज़र सवाल उठना वाजिब है कि इस संग्रह की राजनीतिक कविताएँ क्या केवल राजनीतिक वस्तु या संदर्भ वाली कविताएँ हैं या वे गहरे अर्थ में जीवनधर्मी कविता का साक्ष्य बन सकने में समर्थ हैं. कहना न होगा कि केवल राजनीतिक संदर्भ या वस्तु को आधार बनाकर लिखी गयी तमाम रचनाएँ प्राय:सार्थक राजनीतिक कविता की उँचाई प्राप्त नहीं कर पातीं .

कवि रामविलास शर्मा महज काव्य कौतुक के लिए या बौद्धिक या काव्यात्मक अमूर्तन के कलात्मक प्रलोभन के तहत अपनी राजनीतिक कविताओं में ‘सिनिकल’ दिखने की कोशिश हरगिज़ नहीं करते.  उनमें ‘सिनिसिज्म’ को विद्रोही -चेतना का लगभग पर्याय बना सकने के लिए अपरिहार्य राजनीतिक विवेक के साथ-साथ गहरा नैतिक विक्षोभ भी है. उनके लिए जीवनासक्ति के अर्थ और अभिप्राय क्रान्ति का दमामा पीटनेवाले  कवियों की तुलना में नितांत भिन्न हैं. वस्तुत: रामविलास जी की कविताओं में निहित जीवन के प्रति रागसमृद्ध उत्सुकता तथा ट्रैजिक एवं विनोदपूर्ण के बीच सर्जनात्मक संबंध संसार के दबे-कुचले लोगों के प्रति उनके गहरे तादत्म्य का ही परिणाम है.

अंतत: ‘नई महाजनी सभ्यता’, ‘बाजारवाद’, ‘भूमण्डलीकरण’ और सूचना तकनीक के विस्फोट के इस तथाकथित उत्तर-आधुनिक युग में हमारे लगातार बनते-बिगड़ते राजनीतिक, आर्थिक, सामजिक एवं सांस्कृतिक समीकरणों से पैदा हुई हाइपर रियलिटीके मद्देनज़र आज खुद से सवाल पूछना ग़ैरवाजिब न होगा कि बीसवीं शताब्दी के तीसरे-चौथे दशक में साम्राज्यविरोधी जन-उभार के मद्देनज़र कवि रामविलास शर्मा ने सदियों के सोये जिन लोगों के जाग उठने की बात की थी तथा आगे चल कर कवि गोरख पाण्डे ने जिन्हें लगातार जागते रहने के लिए सतर्क किया था,

वह ‘जागरण’ आखिर किसी तार्किक परिणति तक क्यों नहीं पहुंच पाया ? प्रश्न यह भी कि विश्व बैंकएवं अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोषकी नीतियों के तहत भारत में आयी तथाकथित विकास की आँधी व गर्दोगुबार से परेशान बड़ी आबादी का भविष्य क्या है और कला-संस्कृति की दुनिया में इस आबादी की आशा-आकांक्षा, सहजता, प्रखरता, नफ़रत, प्यार, साहस, नैतिक संवेदना आदि को अभिव्यक्त करनेवाली रचनाओं का कोई मूल्य है या नहीं?

प्रेमचंद के बारे में रामविलास शर्मा ने लिखा है : उनकी आशा उथली नहीं है. उनके नीचे परिस्थिति की भयंकरता का पूरा ज्ञान है. उन्होंने यथार्थ की निष्ठुरता को तिल-भर भी घटाकर चित्रित नहीं किया. बीसवीं शताब्दी की अमानुषिकता की कठोर कहानी उन्होंने पूरी-पूरी कह दी है.
ऊपर उठाये गए सवालों के मद्देनज़र ऐसा लगता है कि रामविलास शर्मा के रचना-संसार से गुज़रे बिना इस कठोर कहानीकी पूरी समझ शायद आज भी असंभव है.
.........................................................................................................................

प्रोफ़ेसर एवं पूर्व अध्यक्ष
हिन्दी विभाग,मानविकी संकाय,हैदराबाद केद्रीय विश्वविद्यालय
हैदराबाद- 500046.  

विज़िटिंग प्रोफ़ेसर, फैकल्टी ऑफ़ ओरिएण्टल स्टडीज, वारसा विश्वविद्यालय, पोलैंड 
फोन. 040- 23133450(भारत), ई. मेल: raviranjan_hcu@yahoo.com

भूपिंदरप्रीत की कविताएँ (पंजाबी)

$
0
0


कविताओं का अनुवाद ज़ोखिम से भरा मुश्किल काम है, एक ही कवि की एक ही कविता के दो अनुवादों में बड़ा अंतर भी कई बार दिख जाता है. अनुवाद एक तरह से अपनी भाषा में कवि को फिर से निर्मित करते हैं.   

हिंदी में अनूदित पंजाबी कविताओं की प्रस्तुति- क्रम में अपने गुरप्रीत और बिपनप्रीत की कविताएँ पढ़ी हैं, आज भूपिंदरप्रीत की अठारह कविताओं का अनुवाद आपके लिए प्रस्तुत है.भूपिंदरप्रीत पंजाबी के अग्रणी कवि हैं. इन कविताओं का अनुवाद पंजाबी कवि बिपनप्रीत और हिन्दी कवि रुस्तम द्वारा किया गया है.

इन कविताओं को पढ़ते हुए भूपिंदरप्रीत और पंजाबी कविता की परिपक्वता का पता चलता है.  




          भूपिंदरप्रीत की अठारह कविताएँ (पंजाबी)           
(अनुवाद : पंजाबी कवि बिपनप्रीत और हिन्दी कवि रुस्तम द्वारा)







छोटी सी बात
एक पीला पत्ता
कश्ती की तरह हिल रहा है
सूरज की
हल्की पीली रोशनी को
अपने अन्दर समेट रहा है
अभी-अभी बारिश थमी है
मेरी छत पर समुद्र है
और सूरज आज यहीं पर डूबेगा.




ख़ाली जगह
रोज़ अपने अन्दर मैं एक जगह  ख़ाली करता हूँ
फिर रखता हूँ वहाँ
पक्षियों के लिये दाना, अपने लिए शब्द, खुरदरी ज़मीन के लिए पत्ते
फिर उस भरी जगह में बची
ख़ाली जगह को देखता हूँ
ताकि
सब विसंगतियों के बावजूद जीवन जी सकूँ
मौत को
एक विराम चिन्ह बनाकर.



नैपकिन
महफ़िल में बैठा
तुम्हें एक नैपकिन पर लिख सकता हूँ ?
शोर बहुत तीखा है
तुम्हारी स्मृतियों को काटकर
कोई आवाज़
पार नहीं जा सकती

यहाँ हर जगह भरी हुई है

सिर्फ़ एक नैपकिन ख़ाली है
जिस पर मैंने तुम्हें लिख दिया है

जब भी बासी होने लगूँ
मक्खियाँ मुझ पर भिनभिनाने लगें

मुझे इस से ढक देना.
 



उत्सव
क्या बज रहा है घंटियों जैसा
मेरा कमरा कोई मन्दिर या गिरजाघर नहीं
बारिश नहीं हो रही
लेकिन होने की आहट
शीशे पर छलछला रही है
यह उस उम्मीद की तरह है
जो टूटकर भी
अपना प्रतिबिम्ब छोड़ जाती है
इस समय
अकेला होना ही मेरा उत्सव है
देख रहा हूँ हर वस्तु को
अकेली होते
हैरानी है
कि मैं अन्दर हूँ
और बाहर मिट्टी में से आ रही है
मेरे जज़्ब होने की आवाज़.




जनवरी
रोशनी
बेसुध पड़ी है बर्फ़ पर
निश्छल
अपनी पारदर्शिता को
शीत कणों की तासीर में पिघलाती
बादलों को देख
मृत्यु की तरह छटपटाती
हवा और काँच से मिलकर
देह में छुपे सात रंगों को बनाती
बेसुधी में कैसे टूटते हैं धरातल
बिन आवाज़
बर्फ़ को बताती
जनवरी की नग्न रोशनी.
          



सन्तुलन
अचानक मुझे लगा
वहाँ कोई है...पहाड़ी के पीछे
मैंने बहती हवा में पत्तों की सरसराहट सुनी
और देखने चल पड़ा
कौन है
मेरे सिवा
वहाँ ज़मीन पर सिगरेट के कुछ जले हुए टुकड़े पड़े थे
पवित्र किताब और अधजली तीली
टूटी हुई टहनी थोड़ी राख और ख़ाली पन्ना
कौन हो सकता है
इतना सन्तुलित
लेकिन वहाँ कोई नहीं था
सारा सामान एक स्टिल पेंटिंग की तरह पड़ा था
मैंने पूरे जंगल की खामोशी में झाँका
और चल पड़ा 'उसे'ढूँढने
स्टिल पेंटिंग में से गुज़रता हुआ.
  



छुपी रात का संगीत
यह घास में छुपी वह रात है
जिसने कई पहेलियाँ हल कर दी हैं

एक दरख़्त की टहनियाँ
वायलिन के धनु की तरह हिल रही हैं
एक गैरहाज़िर ऊँगली सब से श्रेष्ठ धुन निकाल रही है

इस रात जब कि
पौधे और कीड़े हवा का सन्तुलन तोड़ते जीवित हैं मिट्टी में
मेरे जैसा कोई
कामना और बेचैनी से भरा
बेजान सड़क को चूमताहै
सन्नाटे में दस्तक देने के अन्दाज़ में हाथ उठाता है

तेज़ बौछार में से
पत्तों की आवाज़ सुर उठाती है
और रात भर जाती है
छिप-छिप कर कंपोज़ हो रहे नये गीत से.
 



कलाई घड़ी 
कलाई घड़ी
भला कितनी जगह घेरती है
सँभाल लो
माँ की आखिरी यह निशानी
समय के लम्बे अन्तराल में से निकलते
पिता ने कहा
और खामोश हो गया.




माँ बिन पिता
ख़ाली-ख़ाली आँखों से पिता देखता है
माँ बिन ख़ाली कमरा
कमरे के ख़ाली स्थान में दिखता है उसे
एक और स्थान
जहाँ माँ देखा करती थी
माँ वाले ख़ाली स्थान में देखने के लिए
देख रहा है पिता
वह माँ का चश्मा और सिलाइयां सम्भालता हुआ कहता है ---
मेरे कमरे में से उसकी तस्वीर उठा दो
कमरा भरा हुआ रहने दो
उसकी ख़ाली आँखों से.




मैं इतना जालसाज़ क्यों हूँ
माँ समुद्र थी

देखा पिता को एक दिन मैंने उसके
तट पर नहाते
पिता डूबे हुए थे
कमर तक पानी में
और माँ बार-बार उछाल रही थी
अपना समुद्र
उनकी तरफ़
जब पिता लहरों में नहीं फंसे
माँ एकदम समुद्र से
जाल में बदल गयी
उस दिन से जाना
मैं इतना जालसाज़
क्यों हूँ.
          



याददाश्त
एक दिन आसमान का नाम भूल जाऊँगा
यह भी न कह सकूँगा
नीला
हरे रंग में पड़ी पेंटिंग
धूप में पड़ी
परछाईं भूल जाऊँगा
पीले के अन्दर नीला
हरे के अन्दर वृक्ष
मैं अपनी शाखाओं को हिलाना भूल जाऊँगा
अन्तहीन सड़कों पर पागलों की तरह दौड़ना
सृष्टि को एक गड्ढा समझना
और खुद को इस में
कंचे की तरह फेंकना भूल जाऊँगा
ईश्वर   देह   बुद्धि   आत्मा  सब
निहत्था हो जाऊँगा
ख़ाली
कि तुम्हारे अन्दर से अपना आप उठाना भूल जाऊँगा.




रुस्तम 
तुम्हारे नीले बिम्ब
मेरी लाल धमनियों में फैल रहे हैं
वो मेज़ पर पड़ा घूंघरू
और समुद्र में बहता एक और समुद्र
वो आग में बदलती चट्टान
वो लाल दिन
और लाल शिराएँ
अपनी परछाईं से टूटती एक और
परछाईं
नीली रोशनी
काली पत्ती
इन बिम्बों में मैं
एक पर्वत की आवाज़ सुनता हूँ
जिस पर बैठा एक उदास कौवा
मेरी नींद में खलल डाल रहा है
और मेरी आत्मा काँप रही है .




मैं कोई और भेड़ हूँ
उस दिन मैंने
अपनी मृत्यु को एक चरवाहे की तरह
मुझे बचाते हुए देखा
क्या है यह मौत
पोटैशियम साइनाइड
फूल का कम्पन
गायब हो रहा धुआँ
या रात के सन्नाटे में गुम होती
हवा-घण्टियों की आवाज़
इसकी अटल रोशनी में
बहता है पानी
और अनन्त का सिरा तलाशता
मैं साँस लेता हूँ
लेकिन उस दिन तो चीज़ों को
तरतीब देने का समय ही ना मिला
वह आयी
और चरवाहे की छड़ी की तरह छूकर गुज़र गयी
जैसे छूना किसी और को था
और मैं कोई और भेड़ था .
 



मानसिक बोझ
इस तरह मैं
कुछ 'होने'से बच गया
अपने इर्द-गिर्द बुनी कहानी में से
खुद को एक
महत्वपूर्ण तथ्य की तरह
निकाल दिया
बस इतनी सी बात थी
कि आत्मा ने मेरा मानसिक बोझ
चींटी समझ
उठा लिया .




हाँ और ना के बीच
कुछ भी ना कहने तक
पहुँचने के लिए
मैं रोज़
कागज़ काले करता हूँ
कुछ भी ना होने तक
होने के लिए
रोज़ कुछ होता हूँ
हाँ और ना के बीच
मेरी हवा
काँपती है
कल इस तेज़ काँपती हवा ने
एक तितली को
मार दिया
उसकी आत्मा अब
जन्म लेने
और ना लेने के बीच
तड़प रही है .
     




अवचेतन
यह मेरा संसार है
यहाँ अनैतिकता
लाल चींटी की तरह
मिट्टी के भीतर चलती है
नैतिकता के फूल खिलते हैं
अनछुई डाल पर
कभी-कभी
पतझड़ का मौसम आता है
फूल झड़ते हैं
लाल चींटी
डंक मारती है .




छप-छप
कब के सोच रहे थे
कहाँ करें
समुद्र ख़ाली
भोर के वक्त
कायनात जब
अपने थैले में से
निकाल रही थीसूरज
मैंने उसके पानियों में
रख दी
अपनीछप-छप
उसने मेरी छप-छप में
ख़ाली कर दिया
समुद्र .
         




मगरमच्छ
देह
एक बहती नदी है
जिसमें है एक
ज़ख्म
मगरमच्छ की तरह
सुस्त
तट को खुरचता.
_______

भूपिंदरप्रीत (जन्म 1967):

पंजाबी के महत्वपूर्ण और अग्रणी कवि  भूपिंदरप्रीत  के छह कविता संग्रह प्रकाशित हैं. वे अमृतसर में रहते हैं.
________




स्त्री -चेतना : (२) : शिवरानी देवी : प्रेमचंद का विलोम : रोहिणी अग्रवाल

$
0
0








लेखिका शिवरानी देवी ‘प्रेमचंद अपने घर में’के लिए जानी जाती हैं, वह एक समर्थ कथाकार भी थीं. 'नारी हृदय'उनका कहानी संग्रह है. बाल विधवा शिवरानी देवी का विवाह 1905में प्रेमचंद से हुआ था, वह स्वाधीनता संघर्ष में भी सक्रिय रहीं, उन्हें 1930 में 2 महीने का कारावास भोगना पड़ा था.

शिवरानी देवी स्त्री- अधिकारों के प्रति सचेत थीं. प्रेमचंद का कद इतना बड़ा है कि हम कथाकार शिवरानी देवी को नज़रअन्दाज़ कर देते हैं. देखना तो यह भी चाहिए कि प्रेमचंद की समझ (स्त्री-चेतना)में शिवरानी देवी के होने से क्या कोई फर्क पड़ा था ?

आलोचक रोहिणी अग्रवाल के स्तम्भ ‘स्त्री-चेतना’ में आपने लेखिका ‘अज्ञात हिन्दू महिला’ के विषय में पढ़ा है, आज प्रस्तुत है – ‘शिवरानी देवी :  प्रेमचंद का विलोम’





शिवरानी देवी:  प्रेमचंद का विलोम                             

रोहिणी अग्रवाल

(''स्त्री में स्त्रीत्व ही नहीं, बल्कि मातृत्व भी होना चाहिए''  बनाम ''अगर आप मेरी बीवी होते तो मैं बताती कि स्त्रिायों के साथ कैसे रहना चाहिए'') 






'प्रेमचंद: घर में' तथा 'नारी हृदय'कहानी संग्रह की कुछेक कहानियों के आधार पर यदि शिवरानी देवी का मूल्यांकन किया जाए तो वे बीसवीं सदी के प्रारंभिक दशकों की पहली लेखिका हैं जो अभिमानपूर्वक स्वयं को 'उद्दण्ड'कहती हैं और पति उन्हें 'योद्धा'स्त्री. जिस दबंग निर्भीकता से वे पति के भीतर बैठे सामंती पुरुष की ख़बर लेती हैं, उससे पुस्तक के भूमिकाकार बनारसीदास चतुर्वेदीख़ासे भयभीत हैं. हालांकि पतिपरायणा पत्नी की भूमिका में स्वयं शिवरानी देवी भी जहां-तहां दो फांकों में विभाजित अपने व्यक्तित्व की झलक देती चलती हैं, लेकिन बनारसीदास चतुर्वेदीखिसियायी मुद्रा में ऐसे श्रद्धाविगलित भावुक समर्पणों को रेखांकित कर उनकी तेजी और ताप पर लीपापोती करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते.

मसलन शिवरानी देवी में
''विचार करने का और उन विचारों को प्रकट करने का साहस पहले से ही मौजूद रहा है. इस पुस्तक में यद्यपि जगह-जगह पर उनकी पतिभक्ति के उदाहरण विद्यमान हैं तथापि प्रेमचंद जी से मतभेद होने की भी कई मिसालें उन्होंने दी हैं और उनके कारण स्वयं उनका और पुस्तक का भी गौरव बहुत बढ़ गया है'' तथा
''इन वार्तालापों से जहां प्रेमचंद जी का सहृदयतापूर्ण रूप प्रकट होता है, वहां शिवरानी जी का अपना अक्खड़पन भी कम आकर्षक नहीं. . . . शिवरानी जी प्रेमचंद जी की पूरक थीं, उनकी कोरमकोर छाया या प्रतिबिंब नहीं.'' 

इन लीपापेतियों का मूल लक्ष्य  प्रेमचंद को उस 'गुनाह'के लिए क्लीन चिट दे देना है जिसका जिक्र अमूमन 'सती'स्त्रियां किसी और से नहीं करतीं. वे लिखते हैं –

''इस ग्रंथ में लेखिका ने अपनी सहज स्वाभाविकता के साथ प्रेमचंद की त्रुटियों का उल्लेख कर दिया है. प्रेमचंद जी की एक उपपत्नी या रखैल का जिक्र ऐसे प्रसंग में किया गया है कि कोई भी सहृदय पाठक प्रेमचंद जी को अपराधी नहीं कह सकता और न उन पर जज बन कर बैठ सकता है. अपनी अंतिम बीमारी के दिनों में वे मानो अपनी सती-साध्वी पत्नी से क्षमायाचना कर रहे थे.''

आश्चर्य है कि बेहद आक्रामक ढंग से आत्माभिव्यक्ति करने वाली शिवरानी देवी ने संस्मरणात्मक पुस्तक या कहानियों में पति/पुरुष की इस 'करनी'की भर्त्सना क्यों नहीं की?

शिवरानी देवीका दुर्भाग्य रहा कि प्रतिष्ठित लेखक की पत्नी होने के कारण वे लेखिका के रूप में  अलग पहचान और स्वतंत्र व्यक्तित्व अर्जित नहीं कर पाईं. बल्कि इस हद तक वे पुरुष-द्वेष का शिकार रहीं कि ईर्ष्यालु लोगों द्वारा प्रेमचंद को उनकी कहानियों के रचयिता के रूप में  प्रचारित किया जाता रहा. प्रेमचंद भले ही इस अभियोग का खंडन करते रहें -

''मेरे जैसा शांतिप्रिय स्वभाव वाला आदमी इस प्रकार के अक्खड़पन से भरे जोरदार स्त्री जाति सम्बन्धी प्लाटों की कल्पना भी नहीं कर सकता''.

 शिवरानी देवी कंधे उचका कर हर तरह के लोकापवाद की धज्जियां उड़ाती रही हैं. हां, इतना भर प्रयास अवश्य रहा कि कोई भी कहानी पति के अनुकरण पर न जा रही हो. शिवरानी देवी का लेखन आत्मकथात्मक नहीं है. अपने युग की ज्वलंत समस्याओं से जूझते हुए वे दहेज प्रथा, अनमेल विवाह, सौतेली मां की क्रूरता, स्त्री के दायित्वों, हिंदू-मुस्लिम दंगों और देशप्रेम को कहानियों का कथ्य बनाती रही हैं, लेकिन बारीक जांच करने पर स्त्री मुद्दों को लेकर लिखी गई कहानियों में निजी जीवन के अनुभव की टीस या कड़वाहट अवश्य झलकती है. प्रेमचंद के साथ उन्होंने एकलम्बा मधुर दाम्पत्य जीवन जिया है. वे स्वयं स्वीकार करती हैं कि वे प्रेमचंद के घर की मालकिन न होकर'उनके हृदय की मालकिन थीं' (पृ. 145), लेकिन वैवाहिक जीवन के प्रारंभिक आठ वर्षों के अजनबीपन में वस्तुपरक ढंग से पति के पुरुष-चरित्र में उन्होंने जिन दुर्बलताओं को देखा, उन्हें स्त्री-जीवन को अभिशप्त करने वाली बुराई के रूप में अपनी कहानियों में चित्रित किया है.

वे सबसे ज्यादा आहत हैं पति के झूठ से जिसने एक साथ दो स्त्रियों को बरबाद किया. पहली स्त्री वे स्वयं हैं जिनसे पहली पत्नी की मृत्यु की झूठी बात कह कर ब्याह रचाया गया, दूसरी स्त्री उनकी पहली पत्नी है जिसे इसलिए छोड़ा गया कि वह निर्लज्ज है, बदसूरत तथा कर्कशा है. उस बदनसीब स्त्री की 'मिट्टी पलीद'कर दिए जाने की 'कुरेदन'से व्यथित शिवरानी देवी सखीभाव विस्तार करते हुए पति से उन्हें लिवा लाने को कहती हैं; पति के इस कथन - 'जिसको इंसान समझे कि जीवित है, वही जीवित है, जिसे समझे मर गया, वह मर गया' -पर फटकार लगाने से भी नहीं चूकतीं; और पति के इंकार करने पर उनकी पूर्व-पत्नी को घर की बड़ी मालकिन के रूप में चले आने का निमंत्रण भरा पत्र भी लिखती हैं. रूप-लोलुप पुरुष-प्रवृत्ति को वे जीवन भर क्षमा नहीं कर पाईं. जब-तब प्रेमचंद को आड़े हाथों लेती रही हैं 

''आप दावे के साथ कह सकते हैं कि आपका अपना चरित्र अच्छा था? खामोश . . . मैं बदसूरत होती तो आप मुझे भी छोड़ देते? अगर मेरा बस होता तो मैं सब जगह ढिंढोरा पिटवाती कि कोई भी तुम्हारे साथ शादी न करे.'' (पृ. 8)

या फिर 'नारी हृदय', 'सौत', 'वरयात्रा'आदि कहानियों में उनकी भ्रमर-वृत्तिपर व्यंग्य करती रही हैं. 'वरयात्रा'कहानी की पहली पंक्ति ही इसका प्रमाण है - ''आज रामनाथ अपनी पंद्रह साल की ब्याही हुई स्त्री से मुंह मोड़ कर दूसरा ब्याह करने की तैयारी कर रहे हैं.'' (नारी हृदय, पृ. 73)  पिता के घर विधवाओं का सा जीवन काटती रही रामनाथ की पहली पत्नी रामेश्वरी का कसूर यही है कि वह अभिमानिनी है, न दबना जानती है और न पुरुष की गुलामी करने को अपनी खुशनसीबी. समानता और बंधुत्व का अहसास हो तो वह सब कुछ कर दे लेकिन 'वह स्त्री है और पति उसका भरण-पोषण करता है'जैसी कृतज्ञताओं को गले में ढोल की तरह लटका कर लिथड़ती रहे? , वह अपमान से तिलमिला जाती है. इसी रामेश्वरी को उसकी 'औकात'बताने रामनाथ चुपके से ब्याह रचा रहे हैं, उसका ठीक विलोम- अनपढ़, सुशील, दब्बू पत्नी घर ला कर.

पढ़ी-लिखी पत्नी से मन भर गया है; और फिर मन में पलता मासूम विश्वास है कि अनपढ़ बहू खूब चाकरी करेगी, अदब मानेगी, घर के काम-धंधे में जी लगाएगी. यानी चारों तरफ सुख की बरसात! रामेश्वरी को कोई खबर नहीं, न ही उसके परिजनों को. ठीक बारात वाले दिन रहस्योद्घाटन होता है जब अधेड़ दूल्हे मियां मौर सजा कर दुल्हन को लिवाने जा रहे हैं. शिवरानी की विशेषता है कि निजी जीवन की कड़वाहटें कुंठा या घृणा बन कर उनके मन में विकार पैदा नहीं करतीं, बल्कि वे स्त्री जाति की नियति, पुरुष-प्रवृत्ति की पहचान और समाजशास्त्रीय व्यवस्था की तटस्थ पड़ताल का सबब बन जाती हैं. इसलिए जब वे कहती हैं कि
''मैं स्वयं तकलीफ सहने को तैयार हूं, पर स्त्री जाति की तकलीफ मैं नहीं देख सकती''

तब अपनी संवेदना का विस्तार कर वे निजी टीस और असहमति को आक्रोश और विद्रोह सरीखे रचनात्मक औजारों में ढाल लेती हैं. 'वरयात्रा'में रामनाथ की गुपचुप बारात-यात्रा के विवरण के पीछे उनके हृदय में गर्व और व्यंग्य से सनी कसैली स्मृति है अपने विवाह की कि विधवा से विवाह करके ''आप (प्रेमचंद) समाज का बंधन तोड़ना चाहते थे. यहां तक कि आपने अपने घरवालों को भी खबर नहीं दी.''(पृ. 11) साथ ही हृदय को छलनी कर रही है उस अभागिनी की मनोवेदना जो सौत के आगमन पर रो-पीट कर या कोस कर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त ही नहीं कर पा रही है.

शिवरानी इस अत्याचार को मूक भाव से सहने को तैयार नहीं. वे निरपराध पत्नी की मूक वेदना में हृदय का हाहाकार पिरो कर समकालीनों से शाबासी नहीं लेना चाहतीं बल्कि प्रवाह के प्रतिकूल बहते हुए उसे अग्निपिंड में तब्दील कर देती हैं. अन्याय को चुपचाप सह लिया तो अन्याय का प्रतिकार कहां? , वह आत्महत्या करके अपराधी की राह को निष्कंटक क्यों बनाए? इसलिए स्त्रियों को प्रिय प्रतीत होने वाला प्राण त्यागने का नुस्खा रामेश्वरी को जरा भी नहीं भाता. मरना ही है तो शहादत क्यों नहीं - समाज के सामने उदाहरण रचती मौत का वरण! ''तुम नवेली बहू के साथ जिंदगी की बहार नहीं उड़ा सकते. अगर मैं रो-रो कर जिंदगी के दिन पूरे कर रही हूं तो तुम्हें भी यों ही जलते रहना पड़ेगा.'' (पृ. 73)


दूल्हे को लेकर गंतव्य तक जाने को तैयार मोटर के ऐन सामने खड़े होकर वह पति की निर्लज्जता को ललकारती है - या तो ब्याह का नाटक छोड़ दो या कुचल कर चलते बनो. दूल्हे मियां पुरुष और दूल्हा होने के दूने अभिमान में भर कर मोटर को स्पीड से रामेश्वरी की ओर दौड़ाते हैं. विश्वास है कमजोर औरतजात जान बचाने के लिए एक ओर हट जाएगी. लेकिन लेखिका की मानसिक-वैचारिक दृढ़ता से सिरजी यह स्त्री सिर पर कफन बांध कर आई है. उसकी जीवन-लीला मौत के मातम के साथ समाप्त नहीं होती, पुरुष समाज की क्रूरता और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ चेतना और स्त्री सक्रियता की पहलकदमी के साथ नए युग का आह्वान करती है.

शिवरानी देवी की नायिकाएं युगीन सत्य को प्रतिबिंबित करते हुए पीड़िता और पुरुष-प्रताड़िता हैं, लेकिन युगीन सत्य का अतिक्रमण कर वे अपने लिए नई राहों का संधान करने का सामर्थ्य भी रखती हैं.

'करनी का फल'कहानी में लम्पट युवक को उसकी करतूतों का फल चखाती तेज-तर्रार युवती हो या 'साहस'कहानी में ऐन विवाह-मंडप के बीच वृद्ध वर महाशय की खोपड़ी पर जूते बरसाती वधू - शिवरानी की नायिकाएं प्रतिकूल परिस्थितियों के समक्ष घुटने नहीं टेकतीं. शिवरानी के अपने व्यक्तित्व में लिजलिजापन या द्वंद्वग्रस्तता नहीं. वहां है गत्यात्मक ऊर्जा, वैचारिक स्पष्टता, ईमानदारी, निर्भीकता और अपने को दूर तक साफ-साफ देख पाने की पारदर्शिता. ''मैंने जीवन में कभी डरना नहीं सीखा. अपने से मैं किसी को छेडूंगी नहीं, मगर जो मुझे छेड़ेगा, उससे डर कर कहीं भागूंगी भी नहीं.'' (प्रेमचंद घर में, पृ. 52) .

शिवरानी अपने युग की दबी-सिकुड़ी स्त्री छवि (जो पुरुष रचनाकारों की रचनाओं के माध्यम से आज के पाठक के मस्तिष्क में आकार ग्रहण करती है) को परे फेंकती हैं. वे जिस स्त्री-छवि को गढ़ती हैं, उसमें शराब पीकर आधी रात को घर लौटे पति की प्रतीक्षा में पलक-पांवड़े बिछाती पत्नी की कातरता नहीं है, खनकती आवाज में अपने को सुधारने का आदेश देती सलाह है - ''मैं इन आदतों के फेर में पड़ने वाली नहीं हूं. मैं उसी दिन आपसे कह चुकी हूं.''यह स्त्री ताउम्र समझौते करते-करते अपने वजूद को गलाती नहीं, अरुचि और असहमति का स्पष्ट ऐलान कर समझौते करने की दिशा और सीमा बताती है - ''मैं अपनी रुचि के प्रतिकूल आदमियों के साथ रह ही नहीं सकती.'' (पृ. 73) सांस-सांस में नैतिक और मानसिक स्वतंत्रता जीती यह स्त्री जानती है कि ''जरूरतों का गुलाम होना ठीक नहीं'' (पृ. 64), इसलिए स्वतंत्र निर्णय लेने में जरा भी देरी नहीं लगाती. प्रेस लगाने के मामले में प्रेमचंद आंख मूंद कर पार्टनर की शर्तों पर सहमति की मुहर लगा देना चाहते हैं, लेकिन शिवरानी देवी स्याह-सफेद, शर्तें-कायदे सब कुछ बारीकी से जान लेना चाहती हैं. 


पति के विरोध के आगे मिमियाने का तो सवाल ही नहीं  बल्कि गृहस्थी के खर्चों से पाई-पाई जोड़ कर जमा की गई बचत की पूंजी देने से साफ इंकार कर देती हैं - ''ये रुपए आपके नहीं, आप अपने रुपए दीजिए. (मेरे) रुपए मेरी ही शर्त पर जाएंगे.'' (पृ. 46) जाहिर है यह स्त्री पति के भ्रू-संकेत पर गहने तो क्या सर्वस्व न्योछावर करती रूढ़ स्त्री-छवि को पटकनी देती है. तद्युगीन समाजसुधारकों, नेताओं और लेखकों ने जिस मातृत्व को झुनझना बना कर स्त्री के हाथ में थमा दिया कि आंचल में दूध और आंख में पानी भर कर वह संतान को सेती-खिलाती रहे, उस रूढ़ मातृ छवि को शिवरानी देवी सिरे से खारिज कर देती हैं.

वे भारतीय परंपराओं की विरोधी नहीं, लेकिन 'आंख खोल कर चलने'के 'दोष'के कारण जर्जर परंपरा को पूरी ताकत के साथ अस्वीकार करती हैं. वे मां हैं, और मां का दायित्व संतान को जन्म देकर उसका शारीरिक विकास करना और उसकी हर जायज-नाजायज इच्छा के आगे घुटने टेकना नहीं है, बल्कि उसे नैतिक-मानसिक-बौद्धिक रूप से एक ज़िम्मेदार नागरिक बनाना है. साधना की इस कठिन डगर पर कड़ा अनुशासन तो है ही, पुचकार के साथ भरपूर फटकार भी है. नहीं है तो ताउम्र बेटे को गोद में बैठा कर अंधी ममता लुटाने की मानसिक रुग्णता. 

पति का विलोम बन कर शिवरानी बच्चों को मजबूत और आत्मनिर्भर बनाना चाहती हैं, अपने को खाद की तरह गला डालना नहीं - ''बच्चे खुद अपनी ख्वाहिश अपने हाथ-पैरों से पूरी करेंगे. . . . अगर ये न वैसे बने तो मैं समझ लूंगी ये मेरे बच्चे हई नहीं हैं.''(पृ. 72) पुरुष-पोषित रूढ़ मातृ छवि (जिसका चरमोत्कर्ष यशोदा-कृष्ण में दिखाई देता है) का तीखा नकार पहली बार हिंदी साहित्य में स्त्री रचनाकार द्वारा किया जाना निःसंदेह एक अद्भुत घटना है, और उतनी ही अद्भुत है इस गूंजती टंकार को अनसुना करतीं बहरी हरकतें. जाहिर है यहां वर्जीनिया वुल्फकी इस उक्ति का स्मरण हो आना अस्वाभाविक नहीं कि यदि यथार्थ जगत में अपनी गति-मति से जीती वास्तविक स्त्री विद्यमान न होती तो पुरुष-रचित साहित्य में स्त्रीद्वेष से सनी अथवा निरर्थक महिमामंडन से संवरी स्त्री छवि देख स्त्रियों के बारे में निर्मूल धारणाएं ही बनी रहतीं.तब अपने समकालीनों की तुलना में यशपालज्यादा ईमानदार और प्रखर जान पड़ते हैं जब डंके की चोट पर अपनी असफलता का ऐलान करते वे कहते हैं कि ''पुरुष कभी स्त्री के दृष्टिकोण से समस्या को नहीं देख सकता.''लेकिन दुर्भाग्यवश किसी दुरभिसंधि के अधीन शिवरानी देवी और यशपाल सहित हर उस आवाज को आज तक अनसुना कर दिया जाता रहा है जो स्त्री की मनुष्यता को सही परिप्रेक्ष्य और स्वर देने का प्रयास करती है.

'योद्धा'शिवरानी का लेखकीय व्यक्तित्व पति की लेखकीय मिशनबद्धता के अनुकरण पर आकार ग्रहण करता है, लेकिन फैलने-फूटने के लिए अपनी ही दिशाएं स्वयं चुनता है. इसलिए उसमें उपदेश का बड़प्पन नहीं, जुझारु व्यक्ति की ऊर्जा और संकल्पदृढ़ता है. शिवरानी 'नारी हृदय, 'सौत', 'आंसू', 'बूढ़ी काकी', 'माता', 'हत्यारा', 'सच्ची सती'जैसी कहानियों में स्त्री की रूढ़ छवियों (दुष्ट सौतेली मां, पतिपरायणा पत्नी, बेबस गरीब मां, देश के लिए पुत्र की कुर्बानी देती राष्ट्रमाता) को स्टीरियोटाइप ढंग से पुष्ट करती चलती हैं, किंतु फिर भी उनकी संवेदना और अंतर्दृष्टि का संस्पर्श पा वे कहानियां किसी एक बिंदु पर विशिष्ट हो जाती हैं.

मसलन, सौतेली मां की नकारात्मक छवि प्रस्तुत करते-करते कहानी अचानक यह प्रश्न उठाने का आभास देने लगती है कि यदि स्त्री अंततः और मूलतः मां है तो सगी-सौतेली विशेषणों से उसकी मातृ छवि में अंतर क्यों आता है? तो क्या मातृ-छवि का आरोपण स्त्री को न जानने का अथवा अपनी अपूर्ण जानकारी को पूर्ण सत्य बना कर पोसने का दंभ मात्र है?

'विजय'कहानी में पतिपरायणा स्त्री-छवि जोर-शोर से उद्घोष करती है कि आत्मसमर्पण द्वारा ही स्त्री पुरुष पर राज कर सकती है (नारी हृदय, पृ. 56) , लेकिन बहुत गहरे जाकर तेजी से इस प्रश्न को सतह पर भी उभार लाती है कि 'आत्मसमर्पण'का अर्थ क्या है? व्यक्तित्वहीनता? चिर-दासीत्व की स्वीकृति? या सम्बन्धों में समानता की कोई नवीन संकल्पना? यदि आत्मसमर्पण का अर्थ युद्धक्षेत्र में पराजित योद्धा का मान-मर्दन है तो क्या इस पर सुमधुर दाम्पत्य सम्बन्ध की नींव रखी जा सकेगी?

शिवरानी देवी लेखन में प्रेमचंद का कंट्रास्ट रचती हैं. दहेज और अनमेल विवाह जैसी कुप्रथाओं के दुष्परिणामों को लेकर प्रेमचंद 'निर्मला'जैसा भावविगलित और करुण उपन्यास लिखते हैं तो शिवरानी देवी 'साहस'जैसी उद्बोधनात्मक एवं सक्रियता से भरपूर कहानी. यहां भी विवाह-योग्य कन्या को ब्याहने यानी 'पाप टालने'को आतुर मां है कि ''पड़ोसियों के ताने-मेहने कौन सुने?''जवान बेटों के बाप पचपन वर्षीय वृद्ध से फूल सी कोमल बेटी को ब्याहने के प्रस्ताव और समृद्ध वर द्वारा ब्याह का खर्च उठाने को दी गई राशि स्वीकारने के अनिवार्य विकल्प (प्रलोभन?) पर शाइस्तगी भरी चुप्पी है कि ''किसी तरह इसकी भांवरे पड़ जाएं तो क्लेश कटे''.

बेटी के भविष्य के प्रति चिंता और मंगलकामना के बावजूद सौतेली मां-सी हृदयहीना यह मां अपनी हर प्रतिक्रिया के साथ व्यवस्था के दबाव और उत्पीड़क स्वरूप को दर्शा रही है. यहां उनकी नायिका वृद्धावस्था में विवाह करने को कामातुर पुरुष पर जूतियां बरसा कर परिवार और समाज के न्याय-विधान पर सवालिया निशान लगाती है तो दूसरी ओर अबला छवि से स्वयं को मुक्त कर जीवन-यथार्थ से जूझने के सामर्थ्य को मिसाल के रूप में रखती है. यह तेजस स्त्री-छवि ब्याही गुड़िया की भांति घर की चारदीवारी के भीतर कैद नहीं की जा सकती. इसे तो देश के चप्पे-चप्पे में घूम कर अपनी बहनों को स्वावलम्बन और स्वाभिमान का संदेश देना है. इस नौकरीपेशा अविवाहित स्त्री पर ही नए युग का महाभाष्य लिखने का गुरु भार है. 'निर्मला'की तरह यदि शिवरानी यहां सारी पीड़ा और अन्याय को आंसुओं के साथ बहा देतीं तो अमानवीयता असहनीय घुटन और घुटन जानलेवा सवाल बन कर कहानी के प्रभाव को सघन न करती.

कहानी-लेखन शिवरानी देवी के लिए आत्माभिव्यक्ति का माध्यम मात्र नहीं है; समाज के नवनिर्माण के महत् दायित्व का गंभीर निर्वहण है. इसलिए कहानी के अंत में वे अपनी हर विद्रोहिणी नायिका की पीठ ठोंकती हैं -
तुमने आर्यदेवियों का मुख उज्ज्वल कर दिया''और पाठकों से उन्हें रोल मॉडल बना लेने का प्रच्छन्न अनुरोध भी करती हैं
''सारे शहर में रामप्यारी की प्रशंसा हो रही थी . . . वाह, कैसी दिलेर लड़की है. ऐसी ही देवियों से जाति का मुख उज्ज्वल होता है. . . . भोली भेड़-बकरियां जो अपना उद्धार स्वयं नहीं कर सकतीं, उनसे क्या आशा की जा सकती है?''

वस्तुतः ऐसी प्रेरणादायक कहानियां लिखना शिवरानी देवी का 'नशा'है. प्रेमचंद उन्हें लाख मना करते रहें कि साहित्य साधना के नाम पर वे क्यों अपना 'खूनजला'रही हैं, लेकिन शिवरानी तो मानो खून जलाने को ही तैयार बैठी हैं. पति का उलाहना - ''पर तुम कहां बाज आओगी' - उन्हें रोक नहीं सकता. उसकी दो टूक काट उनके पास मौजूद है - ''बाज आते रहे हैं, कब तक बाज आते रहें.'' (प्रेमचंद घर में, पृ. 76)

दरअसल यही उद्धतता शिवरानी के व्यक्तित्व को मौलिकता, ऊर्जस्विता और निजता देती है जो 'वधू परीक्षा'और 'समझौता'कहानियों में अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच जाती हैं. 'वधू परीक्षा'कहानी में शिवरानी मीठी चुटकियां ले-ले कर घर की औरतों की आड़ में दहेज के नाम पर बेटे की सौदेबाजी करते पुरुषों और सतीत्व के नाम पर पुरुषों को कामुक अदाओं से रिझाने की शिक्षा-दीक्षा लेतीं-देतीं लड़कियों  को फटकारने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़तीं. लेकिन यह उनका अभीष्ट नहीं है. वे तो नायिका निर्मलाके साथ खड़ी होकर पहले विवाह संस्था को ही रिव्यू कर लेना चाहती हैं कि क्या विवाह की सारी गरज स्त्री को ही है? क्यों बगैर रुपए की थैली के वह वर के साथ तराजू पर रखी ही नहीं जा सकती? कि सदियों से स्त्री इस अपमान को सहती क्यों चली आ रही है? सिर्फ पेट भर रोटी खाने के लिए? लेकिन उसके लिए क्या वह खुद कमा नहीं सकती? क्या उसे खुद कमाना नहीं चाहिए? अकेली औरत यदि कमजोर है और उसे सदैव एक रक्षक की जरूरत है तो क्यों नहीं दस-पांच स्त्रियां मिल कर 'साथ रहतीं'?

विवाह संस्था का उन्मूलन नहीं तो उसके विकल्पों पर विचार तो किया ही जा सकता है न! यहां कथा नायिका निर्मला और वेश्याओं की नियति पर विचार कर-कर के क्रुद्ध और क्षुब्ध होती कथा लेखिका शिवरानी में गहरी समानता द्रष्टव्य है. शिवरानी 'प्रेमचंदः घर में’  लिखती हैं - ''ईश्वर ने पुरुषों को स्त्रियों  की जिम्मेदारी दी है. वे चाहे जो कर सकते हैं. मेरी समझ में बिल्कुल नहीं आता कि परमात्मा स्त्रियों को जन्म क्यों देता है. दुनिया में आकर वे क्या सुख उठाती हैं . . . शायद पुरुषों के पैरों तले रौंदी जाने के लिए ही वे संसार में आती हैं और हमेशा उन्हीं सब की वे सेवा भी करती हैं. अगर मेरा वश होता तो मैं स्त्री मात्र को संसार से अलग कर देती. न रहता बांस, न बजती बांसुरी.'' (पृ. 136)

लेकिन कहानी में निर्मला और लेखिका दोनों के लिए फिलहाल ये सैद्धांतिक बातें 'हवाई'बातें हैं क्योंकि सिर पर लटकी है वधू-परीक्षा की तलवार. मानो वह हाट-बाजार में पड़ा सौदा-वस्तु है जिसे ग्राहक नाप-तोल कर जांचे और पसंद आने पर खरीद कर चलता बने. उसके स्त्रीत्व में क्या मनुष्यत्व का अंश मात्र भी नहीं? निर्मला सती होना अस्वीकार करती है. वह घूंघट खोल कर वर-पक्ष से नपा-तुला एक ही सवाल करती है कि क्या विवाह स्त्री औरपुरुष दोनों ही की पसंद से होना चाहिए? यदि हां, तो ''मुझे इन महाशय से विवाह करना मंजूर नहीं''क्योंकि जिस विवाह का आधार रूप है, वह रूप ही की तरह अस्थिर होगा. यह कहानी इसलिए महत्वपूर्ण है कि अपने वक्त से आगे जाकर स्थितियों को नए आलोक में देखने का आग्रह करती है.

एक, ब्याह जैसे मामलों में स्त्री की स्वीकृति मानी हुई बात क्यों हो? दूसरे, पुरुष इस अहंकार को छोड़ दे कि विवाह करके वह कन्या का उद्धार करता है, बल्कि उसे समझना चाहिए कि कन्या विवाह करके पुरुष का उद्धार करती है. तीसरे, विवाह स्त्री के जीवन का अंतिम सत्य नहीं. आर्थिक स्वावलम्बन के जरिए वह बेहतर जीवन जीने का विकल्प अपनाने को तैयार बैठी है.

भावना और बौद्धिकता का संतुलित तालमेल शिवरानी की कहानियों में मास अपील पैदा करता है. उनकी अपनी स्वभावगत धीरता, जुझारु वृत्ति और दृष्टिगत उदारता किसी भी पूर्वग्रह या दुराग्रह में कैद नहीं होती वरन् तर्क-वितर्क के जरिए स्थितियों की पड़ताल करती चलती है. 'समझौता'कहानी में वे स्वतंत्र भारत में स्वराज्य की परिकल्पना से गद्गद् हैं. उन्हें विश्वास है कि स्त्री-पुरुष समानता का उनका स्वप्न अंततः स्वतंत्र भारत में पूर्ण हो जाएगा. सम्पत्ति, संतान, धर्म और देह पर स्त्री के अधिकार की कामना करती शिवरानी देवी आज के स्त्री विमर्श की जननी प्रतीत होती हैं, विशेषकर देह पर स्त्री-अधिकार की पैरवी के संदर्भ में. लेकिन जिस प्रकार आज का 'प्रगतिशील'पुरुष स्त्री विमर्श में देहमुक्ति के आग्रह को स्त्रीमुक्ति आंदोलन के स्खलन और नकारात्मक पाश्चात्य प्रभाव की दुहाई देकर खारिज करता है, उसी प्रकार तद्युगीन पुरुष भी पश्चिम की दुहाई देकर अपनी परिणीता/प्रबुद्ध स्त्री का मुंह बंद कर देना चाहता है - 


''तुम लोगों पर भी पच्छिम का जादू चल गया और तुम भी हकों के लिए लड़ने पर तैयार हो गईं. स्त्री का महत्व और बड़प्पन इसी बात में है कि वह माता है और माता का गुण है त्याग और उत्सर्ग. अगर स्त्री उस पद को त्याग कर पुरुषों के बराबर आना चाहती है तो शौक से आवे, लेकिन उसे बहुत जल्द मालूम हो जाएगा कि इन हकों को लेकर उसने महंगा सौदा किया है.'' (नारी हृदय, पृ. 151) या समानाधिकार के दावे के बरक्स दफ्तर में बराबर का काम करने का भय दिखाना चाहता है.

लेकिन शिवरानी की नायिका किसी भी शै से भयभीत होने वाली स्त्री नहीं. मुंहतोड़ जवाब उसके पास सदा तैयार है –

''स्त्रियां जितने त्याग से काम कर सकती हैं, पुरुष नहीं कर सकते; लेकिन तब बच्चे आप ही पैदा कीजिएगा और घर के सब काम-काज भी आपको करने पड़ेंगे.'' (पृ. 152)

यह स्त्री स्वतंत्र भारत में वेश्यावृत्ति का उन्मूलन  और बहुविवाह प्रथा को कानूनन निषिद्ध करवाने  के लिए कटिबद्ध है. 'आधी दुनिया'के लिए 'आधी जमीन और आधे आसमान'की पैरवी करती यह स्त्री नौकरियों में 'आधी जगहें'लेकर आर्थिक स्वाधीनता अर्जित करना चाहती है - 


''नौकरी करना आसान है या मुश्किल, इसके बारे में स्त्रियां आप लोगों की राय नहीं पूछने जातीं. वे यह जानती हैं कि बिना मुश्किल काम किए उनका यथार्थ आदर नहीं हो सकता. इसीलिए अब वह आसान काम छोड़ कर मुश्किल काम करेंगी. जब पुरुषों को घर के आसान काम करने का तजरबा हो जाएगा, तब उन्हें स्त्रियों की कदर मालूम होगी. अगर पुरुष मुश्किल काम कर सकता है तो स्त्री भी कर सकती है.'' (पृ. 158)

व्यंग्य नहीं, उलाहना नहीं, सहयोग की कातर पुकार नहीं, चुनौती के जवाब में चुनौती को स्वीकारने का हौसला, आत्मविश्वास और दृढ़ संकल्प! सपनों को साकार करने के लिए इसके अतिरिक्त और चाहिए भी क्या?

लेकिन ठीक यहीं लेखिका की सर्जनात्मक स्वप्नशीलता का विलोम रचते हुए प्रेमचंद की गूंजती आवाज को अनसुना करना भी ठीक नहीं कि स्त्रियां ''नौकरियां करने लगी हैं, मगर मैं इसको अच्छा नहीं समझता. अब इसका नतीजा क्या हो रहा है? अब पुरुष और स्त्री दोनों नौकरियां करने लगे, तब इसके माने क्या हैं? रुपये ज्यादा आ जाएंगे. उसी का तो यह फल है कि बेकारी बढ़ रही है.'' (प्रेमचंद: घर में, पृ. 192)

उनकी दृष्टि में स्त्रियों की ''कमाई का सवाल अभी थोड़े दिनों से उठा है; नहीं तो पहले स्त्रियों की कमाई एक पैसा नहीं होती थी और स्त्रियां काफी दबदबे के साथ घर पर शासन करतीं थीं. तब क्या वह कमाई करती थी.''अलबत्ता वे पुरुष के बड़प्पन को जरूर रेखांकित करना नहीं भूलते कि ''पुरुष खुद मजदूर बन सकता है, मगर अपने घर की स्त्री को मजदूरनी बनाना पसंद नहीं करता.''उनकी लच्छेदार बातों को सुन कर शिवरानी उन पर अकसर कटाक्ष भी करती हैं कि ''खुशामद करना हो तो आपको बुला ले. स्त्रियों को तो इस तरह की बातों से और भी अभिमान हो जाएगा.'' (पृ. 125)

तो ऐसी थीं शिवरानी देवी - निर्भीकता और साफगोई की मिसाल! हिंदी आलोचना के हाशिए पर बैठ कर तंज कसती लेखिकाओं में एक!
_______________________
प्रोफेसर एवं अध्यक्ष
हिंदी विभाग
महर्षि दयानंद विश्वविद्यालयरोहतकहरियाणा



रंग-राग : राज़ी के अंतर्द्वंद्व : रवीन्द्र त्रिपाठी

$
0
0

























बहुत दिनों बाद ऐसी फ़िल्म प्रदर्शित हुई है जिसके प्रशंसकों में बुद्धिजीवी भी शामिल हैं. युद्ध, और त्याग-बलिदान पर आधारित फिल्मे ख़ासकर हिंदी फिल्में अपने इकहरे नरैटिव के कारण कभी भी गम्भीर बहस के केंद्र में नहीं रही हैं अमूमन.

इस फ़िल्म ने युद्ध में शामिल (हुईं/ की गयीं/ शिकार हुईं) स्त्रियों के अन्तर्द्वन्द्व/यातना और उनके प्रति सत्ता और समाज की उपेक्षा/अन्तर्विरोधों को समाने ला दिया है. संस्कृतिकर्मी और लेखक रवीन्द्र त्रिपाठी का यह आलेख इस फ़िल्म की समीक्षा नहीं है.  यह ‘सहमत (तों)’ के अन्तर्द्वन्द्व और यातना की पहचान करता है.




ओ सहमत! तुम्हारे अंतर्दद्वद्व क्या थे           
रवीन्द्र त्रिपाठी



मेघना गुलजार की फिल्म `राज़ीसहमत नाम की एक ऐसी कश्मीरी लड़की के केंद्र में है जो भारतीय खुफिया एजेंसी की जासूस बनकर सन् 1971 में पाकिस्तान जाती है. फिल्म हरिंदर सिक्का की पुस्तक `कॉलिंग सहमतके  एक अंश से प्रेरित है. सिक्का के जो बयान आए हैं उनसे पता चलता है कि असल में एक ऐसी लड़की थी जो जिसने भारत के लिए जासूसी का काम किया था. सिक्का ने अपनी रचना में लड़की का नाम बदल दिया है. यानी सहमत उसका वास्तविक नाम नहीं था. सहमत को संबोधित कर यहां जो लिखा जा रहा है वह मुख्य रूप से फिल्मी चरित्र को लेकर है. फिर भी जो लिखा जा रहा है वह फिल्मी सहमत के साथ साथ वास्तविक `सहमतको भी संबोधित है.


अक्सर हम कल्पित चरित्रों के, चाहे वो साहित्य की हों या फिल्मों की, सामाजिक और सांस्कृतिक पक्ष ही देखते हैं. उनके मनोवैज्ञानिक पक्ष को अनदेखा- सा कर देते हैं.  हालांकि  `राज़ीमें मेघना गुलजारने आलिया भट्टके माध्यम से पाकिस्तान में जासूस की भूमिका निभानेवाली सहमत के  भय और संकोचों को भी भरपूर दिखाया है. पर मेरा मानना ये है कि सहमत का एक बड़ा मनोवैज्ञानिक आत्म-संघर्ष पाकिस्तान में जासूसी करने के दौरान भी उसके अंतर में चल रहा था और ये फिल्म में उभरता नहीं है. वास्तविक सहमत का ये मनोवैज्ञानिक आत्म-संघर्ष  भारत आने के बाद चलता रहा होगा.


अक्सर हम कल्पित चरित्रों के, चाहे वो साहित्य की हों या फिल्मों की, सामाजिक और सांस्कृतिक पक्ष ही देखते हैं. उनके मनोवैज्ञानिक पक्ष को अनदेखा- सा कर देते हैं.  हालांकि  `राज़ीमें मेघना गुलजारने आलिया भट्टके माध्यम से पाकिस्तान में जासूस की भूमिका निभानेवाली सहमत के  भय और संकोचों को भी भरपूर दिखाया है. पर मेरा मानना ये है कि सहमत का एक बड़ा मनोवैज्ञानिक आत्म-संघर्ष पाकिस्तान में जासूसी करने के दौरान भी उसके अंतर में चल रहा था और ये फिल्म में उभरता नहीं है. वास्तविक सहमत का ये मनोवैज्ञानिक आत्म-संघर्ष  भारत आने के बाद चलता रहा होगा.




तना तो फिल्म में बताया गया है राज़ खुलने के बाद पाकिस्तानियों के  हाथों में पड़ने से सहमत को बचाने की कोशिश लगभग असफल हो चुकी थी, फिर भी किसी तरह बचकर वह जब भारत लौटती है तो वह गर्भवती होती है. वो गर्भपात करवाने का फैसला करती है. क्या  वह फैसला आसान रहा होगाऔर क्या पाकिस्तान में अपने पति इकबालसे लंबे समय तक शारीरिक रिश्ता बनाए  रखना भी एक किस्म की आंतरिक लड़ाई नहीं रही होगी? ये ठीक है कि सहमत की इकबालसे (फिल्म में) शादी हुई थी और पति के साथ शारीरिक रिश्ता बनाने में कैसा संकोच? पर, याद रहे, सहमत एक मिशन पर थी  और उसके लिए शादी एक पेशेगत मजबूरी थी. क्या पेशेगत दबाव में जो  लड़की  अपने `पतिया किसी पुरुष  से लगातार शारीरिक रिश्ता बनाए रखती है तो वो अपने  भीतर के हलचलों से परे रही होगी?

जासूस भी कोई मशीन नहीं कि उसकी प्रोग्रामिंग कर दी जाए और सबकुछ ठीक ठाक चलता रहे. सहमत तो मनुष्य थी. कोई बवंडर उसके अंदर नहीं पैदा होता होगा कि ये मैं क्या कर रही हूं? मेघना गुलजार ने फिल्म में सहमत के जो डर और आशंकाएं दिखाई हैं वो इस बात को लेकर हैं कि कहीं जासूसी वाला राज़ फाश न हो जाए. लेकिन सहमत नाम की औरत के मन के भीतर झांकने की जरूरत निर्देशक के मन में उपजी या नहीं? फिल्म में भीतर का ये आंतरित मन लगभग नहीं के बराबर दिखाई देता है. शायद जासूसी या एक्शन फिल्मों का व्याकरण इसकी इजाजत नहीं देता है. या ये कि एक्शन फिल्मों की बनावट पुरुष-सोच से निर्मित हुई है और उसमें ऐसी चीजों को लिए जगह नहीं है? या इन सबके बारे में सोचा ही नहीं गया है?

फिर भी सजग और सचेत दर्शक के मन में तो ये प्रश्न उठेगा कि उन लम्हों में जब सहमत और इकबाल एक दूसरे से प्रेम कर रहे होंगे तो इस  महिला जासूस क्या अंतरंग किस तरह आलोड़ित होता होगा. क्या वो ये सोचती होगी कि  मैं तो एकांत के इन लम्हों में भी नाटक कर रही हूं और  इसमें मुझे अपनी भूमिका इस तरह निभानी है कि मेरे मिंयां के दिमाग में कोई शक न हो.  क्या ये  नाटक भर था? उस तरह का जिसे हम मंच पर देखते हैं  और जिसमें अभिनेता किसी चरित्र की भूमिका को डेढ़-दो घंटे तक निभाता है कि और उसके बाद अपने हकीकत में वापस लौट आता है.  लेकिन यहां तो नाटक सहमत के भीतर प्रवेश कर गया था. इस दौरान कोई मनोवैज्ञानिक टूटफूट सहमत के अंदर हुई या नहीं?

ये भी सोचने की बात है कि भारत आने के बाद और इकबाल के साथ संबंध के दौरान गर्भस्थ हुए बच्चे के मुक्त होने के बाद  सहमत की बाकी जिंदगी कैसी गुजरी?  जो खबरें आई हैं उनके मुताबिक  सहमत (या उसका जो भी वास्तविक नाम हो) ने फिर से शादी की और उसका पुत्र भारतीय सेना में अधिकारी भी रहा. हालांकि दूसरी शादी करने में किसी तरह का अनौचित्य नहीं है. फिर भी जिन परिस्थितियों में सहमत ने दूसरी शादी की वह सामान्य  नहीं थी. क्या पहली शादी को नाटक समझना और दूसरी शादी को असल- एक सहज अनुभव रहा होगा? और फिर भारत- पाकिस्तान युद्ध के बाद इतने दिनों तक अनाम बने रहना भी मन के भीतर कुछ खालीपन नहीं पैदा करता होगा? 

देश के लिए अपने को खतरे में डालना और अपनी भावनाओं को पाकिस्तान में रहने के दौरान लगातार दबाए रखना निश्चय ही सहमत के लिए भीषण भीतरी  लड़ाई रही होगी. दोनो लड़ाइयों को लड़ने के बाद और उनमें जीतने (?) के बाद भी, गुमनामी का जीवन जीना मन के भीतर कुछ खलल नहीं पैदा करता होगा? सहमत के इस अस्तित्वगत संघर्ष में उन तनाम लोगों का दर्द शामिल है जो दुनिया भर की लड़ाइयों में गुमनाम रहे. आखिर युद्ध सिर्फ सीमा पर तैनात सैनिक या अपने कक्षों में बैठे जनरल नहीं लड़ते. वे भी लड़ते और झेलते  हैं जो इसमें दूसरी तरह से सहभागी होते हैं और जिनका बाद में कोई उल्लेख नहीं होता. लड़ाई में  मारे गए सैनिकों की भी अपनी पीड़ा होती है. पर उनकी बहादुरी को तो दर्ज कर लिया जाता है और उनको मेडल या सम्मान मिलते हैं. इस प्रक्रिया में उनकी एक मुकम्मल पहचान बन जाती है. पर सहमत जैसे लोगों का, जो जिस्मानी तौर पर ही नहीं बल्कि रूहानी तौर पर युद्ध में हताहत होते हैं, की कोई पहचान नहीं बनती. उनके योगदान को किसी भी स्तर पर दर्ज भी नहीं किया जाता.




क्यावीरता को जिस अर्थ में  हम अभी तक समझते आए हैं वह समस्य़ामूलक है? यहां `हमसे तात्पर्य सिर्फ भारतीय भर नही है. पूरी दुनिया में वीरता की अवधारणा का आरोपण उन पर ही होता रहा है जो युद्ध के मैदान में अस्त्रशस्त्र के साथ लड़ते हैं. भले ही वे लड़ाई में भरपूर क्रूरता क्यों न दिखाएं. दुनिया के बड़े साहित्य में भी वीरता ऐसे ही चित्रित हुई है. पर उनका क्या जो किसी लड़ाई में भाग लेते हैं, या उसके शिकार तो होते हैं, मगर इतिहास में कहीं कोई जगह नहीं बना पाते. वैसे तो युद्ध ही अपने में मानवविरोधी उपक्रम है लेकिन जो उनमें अनाम रह जाते हैं उनके होने को ही भुला दिया जाता है. ये दोहरी त्रासदी है. ऐसे लोगों के एहसास, उनकी पीड़ाएं और उनके दर्द को कौन सुनेगा? है. इस मसले का एक और अध्याय है जिसे हर देश और समाज को याद करना चाहिए.

वह अध्याय लिखा गया बांग्लादेश में. ये अध्याय अन्य युद्धों की तरह ये भी बताता है कि युद्ध एक पुरुषोचित कर्म है और औरतों को उनका शिकार ही होना पड़ता है. 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध उस पूर्व पाकिस्तान की आजादी के लिए हुआ था जिसे अब बांग्ला देश कहा जाता है. उस युद्ध में (पश्चिमी) पाकिस्तानी सेना ने पूर्व पाकिस्तानी  महिलाओं के साथ बड़े पैमाने पर बलात्कार किए थे. बांग्ला देश की आजादी की लड़ाई के अगुआ और वहां के पूर्व-राष्ट्रपति और पूर्व-प्रधानमंत्री शेख मुजीबुर्ररहमान (जिनकी 1975 में हत्या कर दी गई) ने युद्ध के बाद बलात्कृत महिलाओं को वीरांगना कहा. वीरांगना यानी वीर महिलाएं. आगे चलकर वहां की सरकार ने भी ऐसी कुछ महिलाओं को आधिकारिक तौर पर वीरांगना माना. हालांकि ये सबकुछ बहुत पेचीदा रहा और कहानी लंबी है. इन `वीरांगनामहिलाओं  को सामाजिक लांछन भी झेलने  पड़े. पर फिलहाल यहां इस मुद्दे का प्रासंगिक  पहलू ये है कि बांग्लादेश ने वीरता की एक नई परिभाषा पेश की.


पहले भी दुनिया के कई देशों और इलाकों में महिलाओं के साथ इस तरह के वाकये हुए थे और आज भी हो रहे हैं. जापानी सेना ने कोरियाई  महिलाओं का `कंफर्ट गर्लके रूप में इस्तेमाल किया इसे भी आज तक भूला नहीं गया है. ऐसी तमाम महिलाओं को भी  वीरांगना क्यों न माना जाए? ऐसी महिलाएं भी क्या योद्धा नहीं होतींये प्रश्न `राज़ी’  और सहमत  से सीधे सीधे भले न जुड़े पर दूर से तो जुड़ता है. 

हम भी  सहमत (या जो भी उसका वास्तविक नाम हो) और उस जैसे तमाम गुमनामों को वीर या वीरांगना के रूप में प्रतिष्ठित न क्यों करें? सरकार भले न करे या देर से करे, समाज तो जल्द कर सकता है. आइए, चलाएं एक अभियान इस `सहमतऔर दूसरी `सहमतों’  के लिए.
_______
tripathi.ravindra@gmail.com

सेवादार : पॉवर प्ले की कविता : आशुतोष कुमार

$
0
0













समालोचन पर सदाशिव श्रोत्रियकी सेवादार (देवी प्रसाद मिश्र) की प्रकाशित व्याख्या ने सबका ध्यान अपनी तरफ खींचा है. हिंदी के अलावा दूसरी भाषाओँ में भी इस पर बहस ज़ारी है. आलोचक आशुतोष कुमार ने इस कविता और इस पर आधारित विमर्श को फिर से परखा है. वह इसे ‘पॉवर प्ले’ की कविता मानते हैं. क्या यह स्त्री-पुरुष के बीच का पॉवर प्ले’ है या मालिक और मातहत के बीच का. आइए पढ़ते हैं.  



सेवा  करना  हिंदी  की  सबसे ख़तरनाक  क्रिया  है        
आशुतोष कुमार






देवी प्रसाद मिश्र की कविता सेवादारपर समालोचनपर एक बहस हो गई है. पुरस्कारों और लेखकों के चरित्र-चित्रण से अलग किसी रचना पर बहस हो तो अच्छा ही लगता है. लेकिन इस बहस को अधिक ध्यान से यह जानने के लिए देखना चाहिए कि कविता के गम्भीर पाठक भी कविता पर बात करते हुए कितनी असावधानी से काम लेते हैं.

सारी उठापटक इस कविता पर सदाशिव श्रोत्रियकी टिप्पणी से शुरू हुई. कविता के संवेदनशील पाठक-आलोचक श्रोत्रिय जी इस कविता की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं. युगचेतना की काव्यात्मक अभिव्यक्तिके कारण और एनजीओ संस्कृति की गर्हित वास्तविकता को रोमांचक और आह्लादकारी ढंग से व्यक्त करने के लिए. इस टिप्पणी में कविता की प्रशंसा तो है, लेकिन कविता के साथ न्याय नहीं. लेकिन इस पर कुछ देर में लौटेंगे. पहले यह देख लें कि इस पर विवाद क्या हुआ.

पहला विवादी स्वर आया शिव किशोरतिवारीकी ओर से. तिवारी जी कविता के अनन्य प्रेमी,संग्राहक, आलोचक और अनुवादक हैं. उन्हें कविता के चुनाव पर ही आपत्ति है. यानी कविता टिप्पणी करने लायक नहीं है. कहते हैं-
इस कविता में कोई गहराई नहीं है. व्यंग्य छिछला है क्योंकि चरित्र अतिरंजित हैं. उनकी बातें अस्वाभाविक हैं. बीच-बीच में अंग्रेज़ी के (अशुद्ध) वाक्य बेतुके हैं. आख़िरी पंक्तियों में पता ही नहीं चलता कि 'सर'ने क्या कहा -"यू आर सच अ रैविशिंग स्टफ़" (इसका अर्थ? कोई किसी को रैविशिंग स्टफ़ कहता है क्या?) या "संजीवनी सूरी क्यों है इतनी दूरी"?

कविता में सर ने जो कहा साफ-साफ ही कहा. वाचक ने उसे साफ-साफ दर्ज भी किया. हालांकि सर ने किसी को सुनाने के लिए नहीं, बुदबुदाते हुए अपने आप से कहा. कोई किसी को रैविशिंग स्टफया दिलकश चीजउसके मुंह पर भी कह सकता है, बशर्ते उनके ऐसे सम्बंध हों. संजीवनी सूरी से सर के सम्बन्ध ऐसे नहीं हैं, इसीलिए वे बुदबुदाकर रह जाते हैं. आख़िर इसमें न समझ में आने वाली कौन सी बात है? क्या तिवारी जी को यह समझ नहीं आ रहा सर के मन में अपनी युवा कलीग के लिए ऐसे पापी विचार कैसे आ सकते हैं? क्या यह स्थिति ही उन्हें अस्वाभाविक लग रही है? और क्या इसी कारण कविता भी अस्वाभाविक, अतिरंजित और बेतुकी लग रही है?


सर के इन पापी खयालों में अस्वाभाविक जैसा तो कुछ है नहीं. अगर हो भी तो सवाल यह है कि क्या कविता का काम केवल स्वाभाविक, सांस्कारिक और नैतिक का बयान करना है? ज़ाहिर है तिवारी जी ने इस कविता कुछ अधैर्य के साथ पढा और जहां उलझने की गुंजाइश नहीं थी, वहीं उलझ गए.

बहस में तिवारी जी को सबसे जोशीला समर्थन मिला हमारे प्रिय कवि विष्णु खरेसे. उन्हें यह कविता इतनी ख़राब लगी कि वे समीक्षा के लिए इस कविता को चुनने के लिए श्रोत्रिय जी को, इसके पहले जलसापत्रिका में इसे छापने के लिए जलसा वालों को और इसे छपने देने के लिए कवि की सख़्त मज़म्मत करते हैं. आगे इस बात को यहां तक ले जाते हैं कि ऐसी कविताओं के छपने औऱ उन पर चर्चा होने से केवल देवी प्रसादजैसे श्रेष्ठ कवि की छवि ही ख़राब नहीं होती,  हिंदी कविता के समूचे पर्यावरण के नष्ट हो जाने का खतरा है.

लेकिन विष्णु जी देर तक इस बात का खुलासा नहीं करते कि आख़िर उन्हें यह कविता इतनी ख़राब क्यों लगी. खुलासा तब करते हैं,  जब कवि आलोचक कात्यायनी इस कविता के पक्ष में अपने तार्किक विश्लेषण के साथ उतरती है और विष्णु जी को लगता है कि उन्होंने ऐसी बमबारी कर दी है कि कविता की समूची पृथ्वी झुलस गई है. मामला स्कॉर्च्ड अर्थ में तब्दील हो गया है.

अब जाकर वे साफ-साफ  कहते हैं कि 

कविता इसलिए भी संदिग्ध और आपत्तिजनक है कि मूलतः वह pathalogically स्त्री-विरोधी है और संजीवनी को एक भावी महँगी, बड़े पैकेज वाले casting couch पर स्वेच्छा से बिछ-बिछ जाने वाली slut दिखाने पर आमादा है. इस लिहाज़ से यह पोर्नोग्राफी-उन्मुख है.
आगे भी जोड़ते हैं-
मैं देवी प्रसाद का तब से प्रशंसक हूँ जब वह और भी ज़्यादा युवा थे. उनकी और उस स्तर के कई रचनाकारों की कविताओं में स्वयं को एक stakeholder समझता हूँ. लेकिन मैं उनकी ''सेवादार''से बहुत निराश हूँ कि उसमें एक अभागी युवती को लेकर सिर्फ़ घृणा और तिरस्कार है,उसकी वैसी ज़िन्दगी को समझने की कोई कोशिश नहीं है. मैं अभी-अभी समझ नहीं पा रहा हूँ कि देवी प्रसाद से ऐसी reactionary और cliche कविता संभव कैसे हुई.

कविता में क्या सचमुच ऐसा कुछ है, जैसा विष्णु जी बता रहे हैं? इसकी जांच करने के पहले कहना जरूरी है कि इस कविता पर इस इल्जाम के बीज ख़ुद श्रोत्रिय जी के प्रशंसात्मक भाष्य में मौज़ूद हैं.
उन्होंने लिखा है-

सेवादारी के इस खेल की असलियत को देवी प्रसाद इस कविता की अंतिम पंक्तियों में जिस तरह खोलते हैं वह सचमुच अनूठा है. संजीवनी अंततः  अपने सर से जो कहती है वह इस बात को प्रकट करने के लिए पर्याप्त है कि उसे भी अब इस बात का पूरी तरह अनुमान हो  गया है कि उसके सर असल में उससे चाहते क्या हैं. उसका नाटकीय ढंग से कुत्ते के गले में लिपटते हुए  कर दूंगी सर कर दूंगी कहना इस बात को स्पष्ट कर देता है कि पैसे और पवित्रता के बीच सौदेबाज़ी के इस खेल में संजीवनी ने 10लाख के सालाना पैकेज के लिए अपने आप को समर्पण के लिए तैयार कर लिया है. विडम्बना यह है कि वर्तमान परिस्थितियों में  अपने  मध्यवर्गीय परिवार की बाहर टीमटाम को बचाए  रखने के लिए शायद उसके पास इसके अलावा कोई विकल्प  नहीं  बचा  है.

जो बात सदाशिव श्रोत्रिय जी और विष्णु जी के सामने इतनी स्पष्ट है,  वह कविता में ख़ुद सर के सामने साफ नहीं है. अगर होती तो वे ‘संजीवनी सूरी क्यों है इतनी दूरी’ जैसी बातें बुदबुदाते वहां से फूट न लेते.

आश्चर्य की बात है कि कविता असल में संजीवनी सूरी और उसके सर के बीच ताक़त की जिस खींचतान या पावर प्ले को चित्रित करती है, उसकी ओर किसी का ध्यान ही नहीं गया.

सर की पापी  बुदबदाहटों से उनकी मंशा तो साफ है, लेकिन यह भी साफ है कि वह अभी पूरी नहीं हुई है. कविता पाठक को यह अनुमान लगाने का मौका देती है कि हो सकता है मीटिंग में जान बूझकर देर की गई हो. यह भी कि इसके पीछे नीयत यह रही हो कि दिल्ली जैसे असुरक्षित शहर में लड़की को घर छोड़ने का बहाना मिल जाएगा. इसके आगे पाठक के लिए कयासबाजी की गुंजाइश नहीं है, क्योंकि इसके आगे की कहानी कविता ख़ुद कहती है.

देर रात के उस वक़्त छोड़ने आए सर को संजीवनी सूरी घर के भीतर चलने का न्यौता जरूर देती है, लेकिन उसी सांस में यह भी कह देती है कि घर के भीतर माँ मौज़ूद है, जो पिता के मरने के बाद से काफी अकेलापन महसूस कर रही हैं. मतलब सर भीतर तभी तशरीफ़ लाएं जब उन्हें इस वक़्त बूढ़ी अम्मा के साथ ढेर सारा वक़्त बिताना मंजूर हो.

सर इस पर अगली बार देखेंगे के सिवा कहते भी तो क्या कहते?

लड़की जानती है कि अब वह सुरक्षित है. बाज़ी पूरी तरह उसके हाथ में है. अब वह अपनी जीत और सर के मंसूबों की हार का मज़ा लेने के मूड में आ चुकी है. सर के घावों पर पूरी तरह नमक छिड़कते हुए कहती है- अगर आप अंदर नहीं आ रहे तो कम से कम मेरे कुत्ते से मिल लीजिए!

इतना ही नहीं, सर के सामने ही अपने कुत्ते से लिपट भी जाती है. कितना मारक तरीका है यह एक स्त्री के यह जताने का कि सर की तुलना में कुत्ता उसे कहीं अधिक प्यारा लगता है! अगर सर के मंसूबों के बारे में पाठक का अनुमान सही है तो अब वह अच्छी तरह जानता है कि इस पावर प्ले में सर पूरी तरह नेस्तनाबूद हो चुके हैं. उनके अरमानों की कम से कम फ़िलवक्त मिट्टी पलीद हो चुकी है.

इस हश्र से बचने के लिए अपना एकमात्र तुरुप का पत्ता वो पहले ही चल चुके हैं. नौकरी का आश्वासन और वेतन वृद्धि की गोली पहले ही दी जा चुकी है. लड़की पर इन चालों का कुछ ख़ास असर नहीं हुआ. क्यों? क्या इसलिए कि ग्रेटर कैलाश में रहने वाली दिल्ली यूनिवर्सिटी में शोध कर चुकी छात्रा को भरोसा है कि नौकरी तो मिल ही जाएगी? एनजीओ सेक्टर की ऐसी ही किसी नौकरी के लिए माता पिता ने  शुरू से ही उसे तैयार किया है. इतने दूरदर्शी और सक्षम माता पिता की इस तेज तर्रार संतान के लिए जीवन इतना असुरक्षित और अभावग्रस्त शायद नहीं है. वह अपनी युवा देह के आकर्षण की कीमत पहचानती है. कुत्ते के बहाने सर को दूर से ललचा कर आजमाती भी है.लेकिन उसका काम इतने भर से चल सकता है, यह भी जानती है.

लेकिन यह सब, जाहिर है, अनुमान का विषय है. कविता स्वयं इन प्रश्नों के उत्तर नहीं देती.  इतना जरूर बताती है कि सूरी और सर के बीच शिकार और शिकारी जैसा इकतरफा मामला नहीं है. दोनों ही एक दूसरे का शिकार कर लेने की फ़िराक़ में हैं. कविता इन दो चरित्रों के बीच ताक़त की रस्साकशी को नाटकीय ढंग से किंतु बिना तमाशा बनाए दिखा देती है.

सर भी जानते हैं कि आज के दिन वे भले ही मात खा गए हों, लेकिन बाजी अभी खत्म नहीं हुई है. इस पावर प्ले को लम्बा चलना है और इसमें अंततः जीत उनके हाथ लग सकती है, क्योंकि वे पुरुष हैं. संजीवनी के लिए सिली गर्ल या बेवक़ूफ़ लड़की जैसे विशेषण इसी सोच से निकले हैं.

कविता जो रचती है, वो यही पावर प्ले है. इसे श्रोत्रिय जी के अंदाज़ में शुद्ध सौदेबाजी समझना या विष्णु जी की तरह स्त्री के दारुण शोषण के प्रति कवि की क्रूरता का नमूना मानना कविता पढ़ने में बरती गई असवाधानी का नतीजा है.

सौदेबाजी और शोषण पर बहुत साहित्य रचा गया है, लेकिन देवीप्रसाद की कविता इंसानी सम्बंधों में शक्ति के जिस खेल को पकड़ती है, वह हिंदी कविता में ख़ास उनका इलाक़ा है. इस इलाक़े की खोज करने वाला शुरुआती प्रमुख कविता संग्रह प्रार्थना के शिल्प में नहींथा.

सूरी और सर के रिश्तों में भावुकता अथवा सामान्य मानवीय संवेदना की भी कोई गुंजाइश नहीं है. यह पावर प्ले ऊपर से बहुत शिष्ट और मासूम दिखता है, लेकिन इसके  भीतर विशुद्ध हिंसा भरी हुई है. यह शत प्रतिशत निश्चित नहीं है कि इसमें आखिरकार किसका वध होगा, लेकिन पलड़ा निश्चय ही सर की तरफ झुका हुआ है. उन्हें पितृसत्तात्मक सामाजिक- आर्थिक संरचना का  मजबूत समर्थन हासिल है.

कविता पाठक को जहां छोड़ती है,  वहां कोई आवेश नहीं है, कोई उत्ताप नहीं है, कोई उत्तेजना नहीं है. जहां सरलता से कोई मूल्य निर्णय नहीं किया जा सकता.  वह कत्लगाह की तरह एक ठंढ़ी क्रूर जगह है. कविता पाठक को इस ठंढ़ी क्रूरता के सामने निष्कवच खड़ा कर देती है. उसे इसका सामना करना है,बिना किसी भावुकता या मूल्य निर्णय के. यह निचाट सामना ही देवीप्रसाद की कविता की ताकत है. यह निचाट सामना ही स्थितियों की विडम्बना को बिना किसी काट- छांट के उजागर कर सकता है.  हिंदी में कितनी ऐसी कविताएँ होंगी, जो ऐसा कर सकती हैं?

सेवादार कविता के अंदाज़े बयां में धोखेबाज किस्म की सरलता है. जरा ठहर कर पढ़ें तो इसमें पावर प्ले के अनेक स्तर दीख पड़ेंगे. सर और सूरी के बीच एक तरह का पावर प्ले है तो  यूरोपीय फंडिंग एजेंसियों और भारत जैसे विकाशील देशों में काम करनेवाले ग़ैर सरकारी संगठनों के बीच दूसरे तरह का. एक और पावर प्ले है जो इन संगठनों और उन लोगों के बीच चल रहा है, जिनके कल्याण के  नाम पर  यह सारा तामझाम खड़ा हुआ है.

कविता में साफ संकेत है स्त्रियों के लिए काम करने के नाम पर फंड लेने वाले सर स्त्री को सिर्फ़ उपभोग की नज़र से देख पाते हैं. खरिआर की गरीब औरतें भी उनके लिए महज फंड जुटाने का जरिया हैं. वे अपनी शिष्या संजीवनी सूरी को भी यही शिक्षा दे रहे हैं, और उसे भी इससे कोई ख़ास दिक़्क़त नहीं है. दिक़्क़त है तो महज पैकेज आशानुरूप न होने से.

खरिआर की औरतें शोषण का शिकार होती रहेंगी तभी सर और सूरी धंधा चलेगा. वे फंडिंग एजेंसियों को रिपोर्ट भेजते रहेंगे, लेकिन उन शोषित स्त्रियों को वाजिब मज़दूरी दिलाने की कोई कोशिश नहीं करेंगे. एजेंसियां भी रिपोर्ट लेकर संतुष्ट रहेंगी. क्या इसलिए कि उनकी दिलचस्पी भी मुख्यतः प्रामाणिक आंकड़ों में है न कि सूरतेहाल को बदलने में. सम्पत्ति और सत्ता का वैश्विक साम्राज्य आखिरकार खरिआर जैसे पिछड़े इलाकों के औरतों-आदमियों-बच्चों के श्रम की नृशंस लूट पर ही टिका हुआ है. औरतों का शोषण दुगुना होता है, क्योंकि वे औरतें हैं.

हर स्तर पर शक्ति का यह खेल उतने ही  क्रूर हिमशीतल ढंग से चलता है. सर और सूरी के बीच घर के बाहर देर रात की यह बातचीत इस बहुस्तरीय हिमशीतल क्रूरता को पाठक की नसों तक ले जाने का एक बहाना भर है. अगर आपने उसे महसूस किया तो यह सवाल बेमानी हो जाएगा कि इस कविता में गहराई है या नहीं. वैसे गहराईकी खोज भावप्रधान कविताओं के लिए ठीक हो सकती है, लेकिन वैसी कविताओं के लिए शायद नहीं, जिन्हें मुक्तिबोध अनुभव-प्रेरित फैंटेसी के रूप में देखते थे,जो अनुभव के गहन क्रियाशील साक्षात्कार से निर्मित होती हैं. इन कविताओं में गहराई की जगह गहनता, जटिलता, व्यापकता और विडम्बना की खोज करना अधिक सार्थक हो सकता है.

सदाशिव श्रोत्रिय के भाष्य की बुनियादी समस्या यह है कि वो कविता को विषय आधारित रचना के रूप में विश्लेषित करते हैं.  इस कविता को इस रूप में पढ़ना कि यह एनजीओ सेक्टर पर लिखी गई हिंदी की पहली कविता है, पाठक के भटकाव की शुरुआत है. कविता निबंध की तरह या उसकी जगह नहीं लिखी जा सकती. यह कविता एनजीओ सेक्टर पर किसी निबंध का स्थानापन्न हरगिज नहीं है. कविता के सामूहिक कुपाठ से खिन्न कवि देवीप्रसाद भले स्वयं ऐसा घोषित करते फिरें!

सो यह बहस भी प्रासंगिक नहीं है कि कविता एनजीओ सेक्टर के समूचे यथार्थ को उद्घाटित करती या उसकी एक प्रवृत्ति को. हर कविता किसी यथार्थ से ही उपजती है, और किसी न किसी ढंग से उसे उद्घाटित करती है, लेकिन वह अख़बारी यथार्थ का रजिस्टर नहीं हो सकती. कुछ एनजीओ अच्छे और कुछ ख़राब हो सकते हैं. कुछ लोग भले और बुरे हो सकते हैं. लेकिन सम्बंधों में शक्ति का खेल हमेशा सक्रिय रहता है. निजी स्तर पर भी,  सामाजिक स्तर पर भी और अंतरराष्ट्रीय सम्बंधों के स्तर पर भी. शक्ति के इस खेल को, इसकी क्रूरता को और  विडम्बना को  मानवीय अनुभव के स्तर पर पर पकड़ना कविता है, निबंध नहीं. इस प्रक्रिया में समकालीन यथार्थ का एक  टुकड़ा लगा लिपटा चला आता है, यह और बात है.

इस कविता का शीर्षकसेवादारहै. शीर्षक की व्यंजकता पर ही ध्यान दिया गया होता तो शायद पढ़ने में इतनी लापरवाहियां न होतीं. सेवादार कहने से लगता है जैसे सेवा करने का ठेका लेने वाले ठेकेदारों  की बात हो रही है. सेवा करना शायद हिंदी की सबसे खतरनाक क्रिया हो. इसके ख़तरों का दायरा सेवादार से प्रधान सेवक तक फैला हुआ है!
__________

आशुतोष कुमार
प्रोफेसर  (हिंदी विभाग)/दिल्ली विश्वविद्यालय
ashuvandana@gmail.com




सेवादार और उसका भाष्य यहाँ पढ़ें.
ख़ राब कविता का अंत:करण  : देवी प्रसाद मिश्र

ज्येष्ठ में तपे प्रेम के तीन रंग : मनीषा कुलश्रेष्ठ

$
0
0


कथाकार मनीषा कविताएँ भी लिखती हैं. अक्सर कहानियाँ लिखने वाले कवियों से पता नहीं क्यों हम कविताओं की उम्मीद छोड़ बैठते हैं, जबकि उनकी स्वाभाविक इच्छा यह रहती है कि उनकी कविताओं को भी तवज्जो मिले. मनीषा की इस कविता में उतरते हुए यह महसूस होता है कि आप किसी अनुभवी कथाकार की सधी हुई कविता पढ़ रहे हैं.

प्रेम का रंग गुलाबी है पर जब यह प्रौढ़ (वय) होता है, धूसर क्यों हो जाता है ? आकर्षण की तप्त सुर्ख आग कहाँ चली जाती है. यह कविता उम्र की नदी में प्रेम के सूखते चले जाने की उदासी और असहायता को मार्मिक ढंग से व्यक्त करती है.               
___________________________



कविता
ज्येष्ठ में तपे प्रेम के तीन रंग                             
मनीषा कुलश्रेष्ठ






१.
जाने कौनसा क्षण था प्रिय जब
तुम्हारी प्रेम और कामना से आवेष्टित छवि
मुझसे खंडित हो गई
और वह दिन कि आज का दिन
मैं खुद से उस तरह प्रेम नहीं कर सकी
दर्पण सारे धुंधले हो गए
सौंदर्य - प्रलेप सूखते रहे पात्रों में
आसव सारे वाष्पित हो गए

क्या तुम मानते हो?
मुझसे ही खंडित हुई होगी!
तुम्हारी व्यस्तता के पीछे छिपी
उपेक्षा के खुरदुरे तल पर चलते
मैं शायद लड़खड़ा गयी थी
कि जाने किसी भोले-भाले झूठ की
फिसलन पर मेरा पैर रपटा था
या कोई प्रवंचना कुसमय द्वार खटखटा गई थी

हजारों सूर्य मानो एकदम बुझ गए थे
न केवल देह धरा पर बर्फ के बवंडर चले थे
बल्कि कहीं अंतस के जीवंत द्वीप सदियों के लिए
बर्फ में बदल गए थे
भावुकता का समुद्र बर्फ़ीली चट्टानों पर
सर पटकता रहा था
वे गीले मौसम फिर कभी लौटे ही नहीं थे

तुम कहते हो, तुम वैसा ही प्रेम करते हो
मै मान लेती हूं
मै भी दोहराती हूँ, हाँ तुम प्रेम करते हो
इस सहज बात में मैं कोई कलुष नहीं पाती
मगर क्या बात है कि तुम्हारे फेफड़ों से निकली
समस्त ऊष्मा भी
मेरी चेतना तो दूर, मन-शरीर क्या
मेरी उंगलियों के पोरुओं तक को गर्मा नहीं पाती
क्योंकि तुम्हारे ह्रदय से उठने वाले ऊष्ण भाव
मुझ तक पहुंचते ही नहीं
या बीच में ही कहीं वाष्पित हो जाते हैं
मेरे ह्रदय से निकलती धमनियों शिराओं में
अब रक्त नहीं बहता
एक घनीभूत उदासीनता वहाँ जमी है
लहकती कामनाओ, बहती बहकती श्लेष्माओं
माँस - मज्जा, रज्जुओं पर
अंतरिक्ष से उतरी राख छा गई है.

मैं सोचती हूं, प्रेम से आविष्ट वह छवि तो
जैसे भी टूटी, तुम्हारी थी और केवल छवि ही थी
मेरा मुझसे प्रेम करना कैसे छूट गया?
मेरा श्रृंगार मुझसे कैसे रूठ गया?
मेरी कामनाएं तो तुमसे पहले भी धधकती थीं
उन्हें तुम्हारे पलटने पर भी धधकना था
लास्य रचित इस देह को तो हरदम थिरकना था

तुम्हारा प्रेम एक विप्लव था
तुम्हारी छवि में साक्षात अनंग विराजता था
तुम्हारे अतीत के प्रगाढ़ अनुभवों ने मुझमें प्रस्तुत
रति को और और उकसाया था
हमने देह के गोपन की पराकाष्ठाओं को
अनंत के छोर-अछोर तक पहुँचाया था
तुम्हारी कल्पना मात्र मेरी देह पर कुमार संभव सी बीतती थी

अब यह देह तुमसे ही नहीं मुझसे भी रूठ गई है
मेरा-तुम्हारा निरंतर प्रेम-जाप
अब इसे बहलाता तक नहीं है
कोई फांस तो थी जो प्रेम के पग में गड़ी होगी
हठात तुम्हारी छवि हाथ से छूट गिरी होगी
महान-अभंग प्रेम, अनंत आकर्षण, आत्माओं का अद्वैत
कितने भ्रम इस छवि के साथ कण कण बिखरे होंगे

कि अब यह मन प्रेम शब्द पर अन्यमनस्क हो
उंगली फिराता है, ये होंठ और कोई नाम तो नहीं जानते
तुम्हारा नाम उच्चारते हुए अनमनेपन से घिर जाते हैं
न अब तुम्हारी पुकार में वह सघन लालसा होती है
मेरे उत्तर भी अब तुमसे कोई आशा नहीं बाँधते
मिलन के मेरे आग्रहों के निरंतर
मंत्र-लिखित भूर्ज पत्र भूल गए हैं अपनी राह
भटका करते हैं ठौर-बेठौर
अपने पूर्व मिलन-संयोगों  की
समीक्षा करती फिरती है ये श्वास-समीर

सुनो ! इस ढीठ और चंचल मन ने तो नहीं माना था
पर शायद देह ने पहली बार मान लिया था
कि
अब जो यह प्रेम है, चिरंतन है, एकनिष्ठ है
ये जो स्पर्श हैं, वही लक्ष्य हैं, अलक्ष्य भी.
किसी चित्र प्रहेलिका के दो टुकड़ों के
अनायास ही जुड़ जाने की संपूर्णता पर इठलाती थी
जाने किस संकुचित क्षण में
किसी छूटे अदृश्य तीसरे टुकड़े की आशंका ने
इसे काठ कर दिया है.

काष्ठ की यह पुत्तलिका बस अब मोह के धागों से बंधी है
मन-प्राण-चेतन-अचेतन-राग-काम-अध्यात्म से नहीं!










२.
जाने ऐसा है
कि मेरे वहम के वहम को
ऐसा लगता है
तुम शब्दों में छिपाते हो प्रेम
जैसे कोई जंगल में छिपा आए
बालों में आ टंकी पतझरी सुर्ख सुनहरी पत्ती
यूं तो बहुत
निरापद है तुम्हारा साथ
लेकिन मेरा मन धड़कता है
कभी
किसी छोटी - सी निरापद आपदा के लिए
माना बहुत कोरी है स्लेट
लेकिन
बच्चों के से अनभ्यस्त हाथों से
मन करता है
एक कमल, एक बिल्ली, एक बतख
तो बना ही दूं एक कोने में
ताकि तुम चाहो तो
एक गीले स्पंज से तुरंत मिटा सको
गरिमा के तट पर आ बैठी है उम्र
जो कहती है छाया मत छूना मन
बहाव के बीच की होती तो
कहती - कह देने से आसान हो जाती हैं चीजें
अब क्या !
अब सब कुछ स्थगित है
अगली किसी मदिरा के मीठे ताप में
एकान्तिका रचती किसी दूसरी शाम तक
जब कविता के फड़फड़ाते पन्ने - से मन पर
एक बार फिर
उम्र, विवेक, गरिमा अपना पेपरवेट रख जाएंगे
या कि उस पेपरवेट से
निकल भागेंगे पन्ने?
बिखर जाएंगे दिगान्तों तक.







३.
सारी नैतिकताओं/गरिमाओं का
भारी दुशाला ओढ़े बैठ गई है उम्र
वो सारी उच्छृंखलता कहाँ  जा कर सो गई है
जब लगता था, हुआ जिस पल भी किसी से प्रेम
तुरंत कह देंगे।

तब हवाओं में घुली बसंत की
महक तक से प्रेम हो जाता था
अब जब संतृप्त हैं सभी भाव
बहुत खोल कर खुल कर देख लिए सब रिश्ते
प्रेम हर जगह एक हद बाद सर पटकता मिला
दुनियादारी की चट्टान पर

अब प्रेम शब्द पर हंसी आती तो है
याद आता है कम्बख्त वह पागलपन
जब एक उजास की उम्मीद में प्रेमी
सौ योजन चल कर आते/जाते रहे

अब प्रेम चुक कर प्रभावित होने में  घट गया है.
आकर्षण सवा योजन तक चल कर कहीं नहीं पहुंचता
उम्र अपनी संख्याएँ जल्दी जल्दी पार कर गई है
देह के स्वर्ण उजास और मन की करवटों का
अब होने लगा है ममीफिकेशन

कि तुम मर चुकी होगी एक तयशुदा उम्र जी कर
तुम्हारे बिना ढले वक्षों के बीच से निकलेगी एक सीली कविता
तुम्हारे आतप्त भावों की एक सुरीली चटक चीख सी
तुमसी ही पागल फिर लिखेगी तुम्हारा जीवन
ओ प्यारी !

___________________

Viewing all 1573 articles
Browse latest View live


<script src="https://jsc.adskeeper.com/r/s/rssing.com.1596347.js" async> </script>