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Channel: समालोचन
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हस्तक्षेप : भारतीय अध्यात्म और बाज़ार

भारत विश्व में अपने मोक्ष, पुनर्जन्म आदि दार्शनिक मान्यताओं के कारण भी जाना जाता है. हजारो विकल प्राणी मोक्ष की तलाश में तमाम गुरुओं के पास भटकते रहते हैं. जनता को जन्म जन्मान्तर के बन्धनों से मुक्त...

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विष्णु खरे : ‘भारत’-भक्ति को एक और ईनाम की बलि

इस वर्ष का दादा साहब फालके पुरस्कार अभिनेता और निर्माता-निर्देशक मनोज कुमार को दिया गया है. क्या उन्हें अभिनय के लिए यह सम्मान मिला है या फिर निर्देशन के लिए या ‘मनोज कुमार स्टाइल देशभक्ति’ के लिए?...

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सहजि सहजि गुन रमैं : मोनिका कुमार

पेंटिग : Rekha Rodwittiya (MATTERS OF THE HEART )मोनिका कुमार कम लिखती हैं और अक्सर उनकी कविताएँ शीर्षक विहीन होती हैं हालाँकि शीर्षक का होना या न होना कोई गुण या दोष नहीं है. कविताएँ अपने शीर्षकों में...

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परख : हम न मरब (उपन्यास) : ज्ञान चतुर्वेदी

समीक्षाहम न मरब : जीने और मरने  के बीच फैला जीवन का महाआख्यान : विवेक मिश्ररचनाएं मनुष्यता में शौर्य का संधान करती हैं. जिजीविषा को जगाती हैं. वे कहीं-कहीं ‘फीनिक्स’ पक्षी की तरह-विनाश के गंभीर शून्य...

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सबद भेद : एक नाराज़ कवि कुबेर दत्त : ओम निश्चल

कुबेर दत्त हिंदी के कवि और दूरदर्शन के साहित्यिक-वैचारिक कार्यक्रमों के प्रसिद्ध प्रस्तोता थे. आचार्य किशोरी दास वाजपेयी, प्रेमचंद और डा. रामविलास शर्मा पर उनके बनाये वृत्त चित्र आज भी याद किये जाते...

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सहजि सहजि गुन रमैं : नरेन्द्र पुण्डरीक

llविश्वकवितादिवसll की शुभकामनाओं के साथ नरेन्द्र पुण्डरीक की इन कविताओं में हमारे समाज का वह चेहरा दिखता है जिसे अब हिंदी के कवि कहना नहीं चाहते. मध्यवर्गीय आभिजात्य में डूब रही कविता की दुनिया में...

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कथा - गाथा : मुख्यमंत्री और धरतीपुत्र

Add captionख्यात कथाकार – उपन्यासकार बटरोही का उपन्यास, ‘गर्भगृह में नैनीताल’२०१२ में प्रकाशित हुआ था. इस उपन्यास का यह हिस्सा आश्चर्यजनक ढंग से उत्तराखंड के वर्तमान राजनीतिक संकट पर प्रासंगिक हो उठा...

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मीमांसा : सूफी और इश्क की इबारत : संजय जोठे

बशीर फारुक का एक शेर है - मिरी नमाज़ मिरी बंदगी मिरा इमांlतिरा ख्याल तिरी याद आरज़ू तेरीllइस देश में तमाम तरह की आस्थाओं के साथ हजारों सालों से लोग एक साथ रहते रहे हैं. उदारता और एक दूसरे को सहने का...

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विष्णु खरे : दो बड़े लेखक : दो अमर कृतियाँ : दो बड़ी फ़िल्में

मार्च का महीना आते ही उच्च शिक्षण संस्थाओं में गोष्ठियों की भरमार हो जाती है. जैसे यह भी कोई काम हो जिसे वित्तीय सत्र के अंत तक निपटा लेना चाहिए. ज़ाहिर है इस ‘निपटान’ में घिसे पिटे विषय और आसानी से...

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मैं कहता आँखिन देखी : मनीष गुप्ता

मनीष गुप्ता आज साहित्यिक-सांस्कृतिक क्षेत्रों  में ‘हिंदी कविता’ के YouTube चैनल के कारण जाने, पहचाने और माने जा रहे हैं. इसमें हिंदी-उर्दू के साथ-साथ अन्य भारतीय भाषाओँ के साहित्य का समकालीन ही नहीं...

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बोली हमरी पूरबी : बलराम शुक्ल (संस्कृत कविताएँ)

संस्कृत बोलचाल और कार्य व्यापार की भाषा अब नहीं रही. पर इस  महान शास्त्रीय भाषा में अब भी साहित्य रचा जा रहा है. इसका विगत इतना लालित्यपूर्ण और उदात्त है कि इसका एक समकालीन भी है यह हम अक्सर नज़रंदाज़ कर...

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निज घर : रवीन्द्र कालिया : मनोज कुमार पाण्डेय

 हिंदी में पत्रिका निकालना जोखिम का काम है और यह और भी बढ़ जाता है जब आपके पास आय का कोई नियमित स्रोत नहीं हो. हरे प्रकाश उपाध्याय अपनी जिद्द और जीवट से  ‘मंतव्य’ के पांचवे अंक के साथ एक बार फिर सामने...

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सहजि सहजि गुन रमैं : मिथिलेश श्रीवास्तव

मिथिलेश श्रीवास्तव सुकवि ही नहीं साहित्य के कर्मठ कार्यकर्ता भी हैं. ‘डायलाग’ के माध्यम से वह लगातार साहित्यिक-वैचारिक कार्यक्रमों में संलग्न हैं. मिथिलेश की कविताएँ एक ख़ास किस्म से ठोस हैं जैसे लोहा,...

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सहजि सहजि गुन रमैं : पंकज चतुर्वेदी

Picasso's Guernicaकविता अपने समय के सवालों से जूझती है. वह विकट, जटिल, बदलते और निहित प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष खतरों को भी देखती है. मनुष्य विरोधी मानसिकता का प्रतिपक्ष सदैव उसके पास रहता है. उसे मनुष्यता...

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सहजि सहजि गुन रमैं : अनिल करमेले

पेंटिग : Vanity by Elena caronआज जबकि कलाकारों से विचारहीनता की मांग की जा रही है और उनके मूल्यांकन में इसे एक निर्णायक तत्व के रूप में देखा जा रहा है, अनिल जैसे प्रखर राजनीतिक चेतना से सम्पन्न कवि का...

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विष्णु खरे : भारतीय मानव-मूल्यों के आभूषण

हिंदी सिनेमा में अभिनेता भारत भूषण की अदाकारी की बारीकियों पर यह आलेख सहेज लेने लायक है खासकर ऐसे में जब हम गुजरे जमाने में दिलीप कुमार तक ठिठक कर रुक गए हैं. भारत भूषण के जीवन संघर्ष और उनके रचनात्मक...

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परख : एक थी मैना एक था कुम्हार (उपन्यास ) : राकेश बिहारी

एक थी मैना एक था कुम्हार (उपन्यास)लेखक – हरि भटनागर प्रकाशक – रचना समय, भोपालपृष्ठ संख्या – 180मूल्य – 300 रुपयेसमीक्षातुम चुप क्यों हो मैना?                       राकेश बिहारी प्यारी मैना!एक अंजान...

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सहजि सहजि गुन रमैं : सुशील कुमार

पेंटिग : Avishek Sen(OH GOD I'M AFRAID TO CRY)सुशील कुमार के तीन कविता संग्रह प्रकाशित हैं, वे अपनी कविताओं में ऐसे काव्य-पुरुष को लाते हैं जो तमाम घात – प्रतिघात के बीच, अपने निविड़ निराशा में भी...

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मंगलाचार : अनामिका शर्मा

पेंटिग :emma-uberएक बिलकुल नई पीढ़ी, हिंदी कविता को अपने तरीके से लिखती हुई.  भाव, भाषा और शिल्प में अलग. अनामिका की कविताएँ पढ़ें और अपनी राय भी दें.अनामिका शर्मा की कविताएँ                       जिंदगी...

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बात - बेबात : कवि का साक्षात्कार : राहुल देव

युवा राहुल देव व्यंग्य लिख रहे हैं. यह काम कितनी संजीदगी से किया जाता है इसे जानना हो तो हरिशंकर परसाई और शरद जोशी को पढना चाहिए. चुटकी लेने और चोट करने की यह बारीक कला अनुभव और अध्यवसाय से हासिल की...

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