आख्यान-प्रतिआख्यान (१):अग्निलीक(हृषीकेश सुलभ):राकेश बिहारी
यूरोप में राष्ट्र राज्य-और उपन्यासों का उदय साथ-साथ हुआ, लोकतंत्रात्मक समाज की ही तरह उपन्यासों में भी तरह-तरह के पात्र आपस में भिन्न विचारों के साथ संवादरत रहते हैं. भारत जैसे देशों में उपन्यास...
View Articleपाब्लो नेरुदा : प्रेम, सैक्स और "मी टू" : कर्ण सिंह चौहान
(Pablo Neruda, 1933, with a message for his lover Olga. Photograph: Juan Adrio/La Suite Subastas)बीसवीं शताब्दी के बड़े कवि पाब्लो नेरुदा (१२ जुलाई १९०४ - २३ सितम्बर १९७३) को उनकी कविताओं के लिए १९७१...
View Articleआख्यान-प्रतिआख्यान (२): चंचला चोर (शिवेन्द्र) : राकेश बिहारी
नई सदी के हिंदी उपन्यासों की अर्थवत्ता और सार्थकता के आकलन के स्तम्भ ‘आख्यान-प्रतिआख्यान’ की इस दूसरी कड़ी में युवा कथाकार शिवेन्द्र के चर्चित उपन्यास ‘चंचला चोर’ का मूल्यांकन प्रस्तुत कर रहें हैं...
View Articleबसंत त्रिपाठी की कविताएँ
बसंत त्रिपाठी की कविताएँ सुंदर दुनिया और हत्यारे कत्थई कोमल पत्तियों को मैं बारिश से धुली ढलती हुई शामें कहता हूँ और बच्चों की हथेलियाँ चूमते हुए सोचता शहद केवल छत्तों में ही नहीं होता सड़क...
View Articleगणपत्या की गजब गोष्ठी : अम्बर पाण्डेय
(Artwork: Himanshu Suri & Chiraag Bhakta (EAT PRAY THUG II) अम्बर पाण्डेय की कविताएँ और कहानियाँ आपने पढ़ी हैं,इधर वह उपन्यास लिख रहें हैं. इस उपन्यास का नायक एक कर्मकांडी पुरोहित है जो धीरे-धीरे...
View Articleबसंत त्रिपाठी की कविताएँ
बसंत त्रिपाठी की कविताएँ सुंदर दुनिया और हत्यारे कत्थई कोमल पत्तियों को मैं बारिश से धुली ढलती हुई शामें कहता हूँ और बच्चों की हथेलियाँ चूमते हुए सोचता शहद केवल छत्तों में ही नहीं होता सड़क...
View Articleकेदारनाथ सिंह : क्या आप विश्वास करेंगे ! : पंकज चतुर्वेदी
केदारनाथ सिंह (१९ नवम्बर १९३४ - १९ मार्च २०१८) की आज दूसरी पुण्यतिथि है. इस बीच उन्हें अलग अलग ढंग से याद किया गया है. समालोचन ने भी उनपर स्मृति अंक प्रकाशित किया था. कई पत्रिकाओं में उनपर एकाग्र...
View Articleशीला संधू : चौराहे–दर-चौराहे ज़िंदगी (अनुवाद - नरेश गोस्वामी)
शीला संधू चौराहे–दर-चौराहे ज़िंदगी अनुवाद: नरेश गोस्वामी वह 1940का साल था. दुर्निवार हौसलों की कुलाँचें भरती सोलह बरस की उम्र! मुझे लगता था कि मैं अपनी जि़ंदगी के मामूलीपन को अच्छी तरह समझ चुकी हूँ....
View Articleपरख : आईनासाज़ (अनामिका) : अर्पण कुमार
वरिष्ठ लेखिका अनामिका का उपन्यास 'आईनासाज़' इस वर्ष राजकमल प्रकाशन से छप कर आया है. इसको देख-परख रहें हैं अर्पण कुमार.आईनासाज़ का आईना अर्पण कुमारकवयित्री और गद्यकार...
View Articleशीला संधू : चौराहे–दर-चौराहे ज़िंदगी (अनुवाद - नरेश गोस्वामी)
राजकमल निःसंदेह हिंदी ही नहीं भारतीय भाषाओं का सर्वश्रेष्ठ प्रकाशन संस्थान है. इसकी उम्र आज़ाद भारत की ही उम्र है. इसके इतिहास का जीवंत और दीर्घ हिस्सा शीला सन्धु के बिना अधूरा और बेमानी है. १९६४ में वे...
View Articleलमही का हमारा कथा- समय : कीर्ति बंसल और शुभा श्रीवास्तव
विजय राय के संपादन में लमही का ‘हमारा कथा समय’ तीन अंको में फैला हुआ है, लगभग १७५ आलेखों वाले इस महाविशेषांक की इधर चर्चा है. २००० में वर्तमान साहित्य ने इसी तरह से ‘शताब्दी कविता विशेषांक’, ‘शताब्दी...
View Articleकथा-गाथा : भाषा में इतनी दूर चला आया हूँ, अगर लौटूँ भी तो कहाँ जाऊं? : आदित्य
भाषा में इतनी दूर चला आया हूँ, अगर लौटूँ भी तो कहाँ जाऊं? आदित्य शैलेन्द्र सिंह राठौर के लिए
View Articleहरियाणा सृजन यात्रा-वृत्तांत
हिंदी साहित्य में हरियाणा प्रदेश आज भी अधिकतर उपेक्षित ही है, हालाँकि इसकी शुरुआत बहुत दमदार थी. बाबू बालमुकुंद गुप्त यहीं से थे. ‘देस हरियाणा’ और ‘सत्यशोधक फाउंडेशन’ ने हरियाणा की साहित्यिक सांस्कृतिक...
View Articleशर्मिष्ठा और उपन्यास : कौशल तिवारी
मिथकीय पात्रों पर आधारित उपन्यासों का हिंदी में पाठक वर्ग है. अंग्रेजी भाषी पाठकों में तो इसकी मांग रहती ही है, देवदत्त पटनायक, अमीश त्रिपाठी आदि इसके लोकप्रिय लेखक हैं. हिंदी प्रकाशकों ने भी इस दिशा...
View Articleकोरोना : एक चुनौती : रश्मि रावत
साहित्य में कोरोना का प्रवेश हो गया है,विषय के रूप में. लेखकों ने मनुष्य जाति के समक्ष उपस्थित इस महा संकट को संवेदनशीलता और गम्भीरता से लेना शुरू कर दिया है. कभी मार्ख़ेस ने ‘लव इन द टाइम ऑफ़ कॉलरा’...
View Articleअंचित की प्रेम कविताएँ
जिसे आज हम प्रेम दिवस कहते हैं, कभी वह वसंतोत्सव/मदनोत्सव के रूप में इस देश में मनाया जाता था. स्त्री-पुरुष का प्रेम दो अलग वृत्तों को मिलाकर उस उभयनिष्ठ जगह का निर्माण करना है जहाँ दोनों रहते हैं,...
View Articleकोरोना : एक चुनौती : रश्मि रावत
साहित्य में कोरोना का प्रवेश हो गया है,विषय के रूप में. लेखकों ने मनुष्य जाति के समक्ष उपस्थित इस महा संकट को संवेदनशीलता और गम्भीरता से लेना शुरू कर दिया है. कभी मार्ख़ेस ने ‘लव इन द टाइम ऑफ़ कॉलरा’...
View Articleलव इन द टाइम ऑफ़ कोरोना : प्रचण्ड प्रवीर
लव इन द टाइम ऑफ़ कोरोना प्रचण्ड प्रवीरमुखयह सारी कवायद सन् २०२० की होली के दिन शुरू हुयी. दस मार्च की सुबह जब अर्चना ‘दाग़’ की नींद खुली तो वह रात में आये सपने को ले कर मायूस...
View Articleनागरी प्रचारिणी सभा और हिन्दी अस्मिता का निर्माण : सुरेश कुमार
नागरी प्रचारिणी सभा और हिन्दी अस्मिता का निर्माण सुरेश कुमार हिन्दी...
View Articleभाषा, हिंदी और उपनिवेश : उदय शंकर
भारोपीय भाषा परिवार, हिंदी और उत्तर औपनिवेशिकता[i]# उदय शंकर 1.डॉ. राजकुमार की पुस्तक हिंदी की जातीय संस्कृति और औपनिवेशिकता,अपने शीर्षक से ही स्पष्ट है, ‘उत्तर-आधुनिक सह-सबाल्टर्न सह उत्तर औपनिवेशिक...
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