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Channel: समालोचन
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हस्तक्षेप : मेरे बच्चे.

पेशावर में तालिबानों द्वारा मासूम बच्चों के कत्ले-आम से पूरी दुनिया कराह उठी है, सिसक रही है. बच्चे किसी देश, किसी कौम के नहीं होते वे तो मनुष्यता के भविष्य होते हैं. ‘धर्म-राज्य’ की स्थापना के लिए...

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मंगलाचार : अरविन्द कुमार

कलाकृति : Abdullah M. I. Syedअरविन्द कुमार की कुछ कवितायेँ __________बच्चीबच्ची अबठुमक-ठुमक कर चलने लगी हैघर-आँगन, कोना-कोना, पड़ोसगुलज़ार हो गया हैबच्ची अब....बच्ची अबचार दांतों से खिलखिलाने लगी...

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परिप्रेक्ष्य : २०१४ के किताबों की दुनिया : ओम निश्चल

हिंदी साहित्य और पुस्तकों का संसार विस्तृत और विविध है. हज़ारों की संख्या में प्रकाशक हैं जहाँ से वर्ष भर लाखों किताबें प्रकाशित होती हैं. उनमें से साहित्य के लिए उल्लेखनीय किताबों की परख और उनकी...

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रंग - राग : कुंवर रवीन्द्र

कुंवर रवीन्द्र  जन चित्रकार हैं सिर्फ इसलिए नहीं कि उनके चित्रों के विषय आम जन के सरोकारों से जुड़े हैं बल्कि इसलिए भी कि उन्होंने आम जन के लिए चित्र बनाएं हैं. शायद ही कोई ऐसा कवि रचनाकार होगा जिसका...

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सहजि सहजि गुन रमैं : बाबुषा कोहली

युवा कवयित्री बाबुषा कोहली की कविताओं की निर्मिति में सघन संवेदनात्मक बिम्बों और मिथकों की आदमकद आकृतियाँ का रचाव है. अपनी अपेक्षाकृत आकार में लम्बी कविताओं में वह इसका सार्थक संधान करती हैं. अपनी...

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मीमांसा : माइकल फूको : अच्युतानंद मिश्र

उत्तर आधुनिक दार्शनिक माइकल फूको (Michel Foucault) का जन्म १९२६ में फ्रांस में हुआ था. ज्ञान और ताकत के बीच के सम्बन्धों पर उनका दार्शनिक विवेचन बहुत प्रसिद्ध है. अच्युतानंद मिश्र का यह आलेख गम्भीरता...

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सबद भेद : राज-भाषा हिंदी : राहुल राजेश

पहला विश्व हिन्दी सम्मेलन १० जनवरी से १४ जनवरी १९७५ तक नागपुर में आयोजित किया गया था. १० जनवरी को अब अंतर्राष्ट्रीय हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है.  हिंदी की देश में दशा –दिशा – दुर्दशा प्रत्यक्ष...

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सहजि सहजि गुन रमैं : रवीन्द्र स्वप्निल प्रजापति

सर्दियों के लिए स्वेटर और जैकेट में कोई फर्क नहीं है पर कविता में वे प्रतीक हैं और उनके अर्थ बदल जाते हैं. ‘तोड़ के मर्म पते की बातें जग में कर दे हिल्ला’ कहने के लिए कविता अपना रूप बदलती है.‘जरा सा...

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कथा – गाथा : भुजाएँ (हृषीकेश सुलभ)

कलाकृति : Adeel uz Zafarहृषीकेश सुलभ  की इस कहानी में मध्यवर्गीय जीवन की वह संरचना विन्यस्त है जो अक्सर धीमी आवाज़ में कान के पास कही जाता है. कहानी में वातावरण और कथा-क्रम इतना रोचक और जीवंत है कि...

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हस्तक्षेप : शर्ली एब्दो और पीके : विष्णु खरे

पेरिस में ही पैदा हुए दार्शनिक वाल्तेयर (Voltaire : 1694 – 1778) अभिव्यक्ति की आज़ादी के सबसे बड़े पैरोकार माने जाते हैं. वह कहा करते थे कि तुम्हारी बात से मेरा सहमत होना जरूरी नहीं पर तुम अपनी बात कह...

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सहजि सहजि गुन रमैं : प्रभात

 प्रभात हिंदी कविता की नई रचनाधर्मिता की पहचान हैं. हिंदी कविता को वे फिर सादगी और मासूम संवेदनाओं के पास ले आये हैं. उनकी कविताओं में पर्यावरण की वापसी हुई है. वनस्पतियाँ, मवेशी, तालाब, गड़ेरिये...

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रंग - राग : अवधेश मिश्र (पेंटिग)

समालोचन कलाओं का साझा घर है. साहित्य के साथ-साथ पेंटिग, फ़िल्म और संगीत पर भी आप सामग्री यहाँ पढ़ते हैं. चित्रकार रामकुमार के साथ पीयूष दईया की बातचीत आपने पढ़ी इसके साथ ही चित्रकार अखिलेश, कुंवर रवीन्द्र...

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परिप्रेक्ष्य : साहित्यकार और गणतंत्र : ओम निश्चल

कभी रघुवीर सहाय ने लिखा था ‘राष्ट्रगीत में भला कौन वहभारत भाग्य- विधाता हैफटा सुथन्ना पहने जिसकागुन हरचरना गाता है.’आज हम ६६ वां गणतंत्र दिवस मना रहे हैं. आज हिंदी के साहित्यकार विश्व के इस सबसे बड़े...

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कथा - गाथा : पानी : मनोज कुमार पाण्डेय

भूमंडलोत्तर कहानी विवेचना की श्रृंखला में आलोचक राकेश बिहारी ने  मनोज पाण्डेय की कहानी पानी को परखा है. पानी में कितना यथार्थ   है कितनी कल्पना यह इतना महत्वपूर्ण नही है जितना कि  यह देखना की बिन पानी...

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भूमंडलोत्तर कहानी (५) : पानी (मनोज कुमार पाण्डेय) : राकेश बिहारी

भूमंडलोत्तर कहानी विवेचना की श्रृंखला में आलोचक राकेश बिहारी ने  मनोज पाण्डेय की कहानी पानी को परखा है. पानी में कितना यथार्थ   है कितनी कल्पना यह इतना महत्वपूर्ण नही है जितना कि  यह देखना की बिन पानी...

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रंग - राग : दिलीप कुमार और अमिताभ बच्चन : विष्णु खरे

इस वर्ष जब पद्म विभूषण सम्मान से एक साथ दिलीप कुमार और अमिताभ बच्चन को अलंकृत करने की घोषणा हुयी तब यह सवाल पूछा जाने लगा कि क्या ये दोनों उससे बेहतर और बड़े सम्मान के हकदार नहीं हैं, क्या उन्हें ये...

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विमलेश त्रिपाठी की कुछ प्रेम कवितायेँ

विमलेश त्रिपाठी की कुछ प्रेम कविताएं                दरअसलहम गये अगर दूरऔर फिर कभी लौटकर नहीं आय़ेतो यह कारण नहींकि अपने किसी सच से घबराकर हम गयेकि अपने सच को पराजितनहीं देखना था हमेंकि हमारा जाना उस सच...

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परख : हाता रहीम (वीरेंद्र सारंग) : राकेश बिहारी

जनगणना में आमजन     राकेश बिहारी ‘वज्रांगी’और ‘तीसरा बच्चा’के बाद ‘हाता रहीम’वीरेंद्र सारंग का तीसरा उपन्यास है. जनगणना इस उपन्यास का केंद्रीय संदर्भ है. मेरी सीमित जानकारी में इस विषय पर कोई दूसरा...

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सबद - भेद : 1857 और दस्तंबू : पंकज पराशर

1857 का संघर्ष न केवल इतिहास के लिए बल्कि साहित्य के लिए भी एक चुनौती है. इतिहास में जहाँ इसके महत्व को कम करके इसे स्थानीय विद्रोह के रूप में देखा गया, आधुनिकता और रूढ़िवादिता के द्वैत में परखा गया,...

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परिप्रेक्ष्य : भालचंद्र नेमाडे : प्रभुल्ल शिलेदार

भालचंद्र नेमाडे मराठी भाषा और भारतीय साहित्य की परम्परा के अपने कथाकार हैं. उन्हें इस वर्ष के भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया है. प्रफुल्ल शिलेदार ने उनके उपन्यासों के माध्यम से इस आलेख...

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