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सबद भेद : समलैंगिक कामुकता की रवायत और ग़ालिब : सच्चिदानंद सिंह

मिर्ज़ा ग़ालिब उर्दू के साथ फ़ारसी के भी महान शायर हैं. आहत और विद्रोही. बकौल अली सरदार ज़ाफरी ग़ालिब ने खुद को ‘गुस्ताख़’ कहा है. इस अज़ीम शाइर की शायरी के हज़ार रंग हैं, उनमें से एक रंग मर्दों के बीच की आपसी...

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मेघ - दूत : कमला दास की कविताएँ : अनुवाद रंजना मिश्रा

भारतीय अंग्रेजी लेखन में मलयाली भाषी कमला दास (31 March 1934– 31 May 2009) एक युग का प्रतिनिधित्व करती हैं. अपनी आत्मकथा के लिए वह ख़ासी चर्चित रहीं, स्त्री यौनिकता पर उनकी मुखरता को उस समय विचलित कर...

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परख : राकेश मिश्र की कविताएँ : ओम निश्चल

"खोई नहीं है वह लड़कीजो मिली थी सपनों में "राकेश मिश्र के तीन संग्रह एक साथ इसी वर्ष राधाकृष्ण प्रकाशन से प्रकशित होकर सामने आयें हैं. कविता के अभ्‍यस्‍त समालोचक ओम निश्‍चल ने इन कविताओं का निहितार्थ...

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निज घर : करियवा-उजरका और सुघरका : सत्यदेव त्रिपाठी

प्रेमचंद की कहानी ‘दो बैलों की कथा’ के बाद अब गाय गाय न रहीं बैल तो जैसे अदृश्य ही हो गये. गाय के साथ जितनी मासूमियत जुडी हुई थी आज उतनी ही उसके आस-पास हिंसा पसरी हुई है. लुप्त होती जाती प्रजातियों को...

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मति का धीर : गिरीश कारनाड : रंजना मिश्रा

शब्द की अपनी स्वायत्त सत्ता है और ये दीगर सत्ता केन्द्रों के समक्ष अक्सर प्रतिपक्ष में रहते हैं. शब्दों ने बद्धमूल नैतिकता पर चोट की है उसे खोला है, धर्म की विवेकहीन चर्या को प्रश्नांकित किया है उन्हें...

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मैं कहता आँखिन देखी : विष्णु खरे से व्योमेश शुक्ल की बातचीत

 (फोटो सौजन्य : सुघोष मिश्र)विष्णु खरे से व्योमेश शुक्ल की यह बातचीत मुक्तिबोध पश्चात हिंदी के दो महत्वपूर्ण कवियों रघुवीर सहाय और श्रीकांत वर्मा पर  केन्द्रित है. कविता की जैसी प्रकृति है वह कुछ भी...

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निज घर : और वह सुघरका : सत्यदेव त्रिपाठी

और  वो  सुघरका                                   सत्यदेव त्रिपाठीकरियवा-उजरका के जाने के सात साल बाद आया सुघरका .... इस बीच बडा पानी गुजरा सर से... खेत वग़ैरह रेहन रखके पहले एक, फिर काम न चलने पर दूसरा...

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परख : मल्लिका (मनीषा कुलश्रेष्ठ) : अरुण माहेश्वरी

मल्लिकाभारतेन्दु बाबू की प्रणय कथा अरुण माहेश्वरीआज मनीषा कुलश्रेष्ठ का हाल में प्रकाशित उपन्यास 'मल्लिका'पढ़ गया. मल्लिका, बंकिम चंद्र चटोपाध्याय की ममेरी बहन, बंगाल के एक शिक्षित संभ्रांत घराने की...

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अपने आकाश में (सविता भार्गव) : अनुपम सिंह

“प्रेम में पड़ी स्त्री मुझे अच्छी लगती हैलेकिन मुझे दुख होता हैकिसी पुरुष की तरह कामोत्तेजित होकर उससेमैं प्यार नहीं कर सकतीनहीं देखा जाता मुझसेछली गयी स्त्री का दुखलेकिन मुझे दुख होता हैमैं नहीं दे...

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परख : मल्लिका (मनीषा कुलश्रेष्ठ) : अरुण माहेश्वरी

भारतेंदु हरिश्चन्द्र के जीवन पर आधारित दो प्रारम्भिक महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं- १९६२ में प्रकाशित ‘भारतेंदु हरिश्चन्द्र’, लेखक हैं श्री ब्रजरत्नदास और १९७५ में प्रकाशित ‘हरिश्चन्द्र’जिसके लेखक हैं बाबू...

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परख : कुठाँव (अब्दुल बिस्मिल्लाह) : सत्य प्रकाश

‘कुठाँव’ उपन्यास में मसावात की जंग             सत्य प्रकाश अब्दुल बिस्मिल्लाह का टटका उपन्यास ‘कुठाँव’ मुस्लिम धर्म में व्याप्त जातिप्रथा और कुप्रथा के आख्यान को उद्घाटित करता है. यदि इसको दूसरे अर्थ...

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सहजि सहजि गुन रमैं : सौरभ राय

(पेंटिग : Shobha Broota)कवि और अनुवादक सौरभ राय को आप पढ़ते आ रहें हैं.वह बेंगलुरु में रहते हैं. अपने नये कविता संग्रह ‘काल वैसाखी’ की तैयारी में हैं. कुछ कविताएँ इसी संग्रह से. इन कविताओं में महानगर की...

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परख : कुठाँव (अब्दुल बिस्मिल्लाह) : सत्य प्रकाश

उपन्यास  : कुठाँव अब्दुल बिस्मिल्लाहसंस्करण - २०१९ राजकमल प्रकाशन प्रा. लि. नई दिल्लीमूल्य : ४९५ पत्रकार और एक्टिविस्ट अली अनवर की बिहार के पसमांदा मुसलमानों को केंद्र में रख कर लिखी हुए अपनी तरह की...

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मल्लिका (दो ) : शुद्ध प्रेमकथा भी कोरी प्रेमकथा नहीं होती : विनय कुमार

 (दो)मल्लिका शुद्ध  प्रेमकथा  भी  कोरी  प्रेमकथा  नहीं  होती              विनय कुमारकोई भी कथा, चाहे अतीत के बारे में ही क्यों न हो, अपने समय में ही कही जाती है और समकालीनता को ही सम्बोधित करती है....

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परख : मैं कहीं और भी होता हूँ (कुंवर नारायण ) : मीना बुद्धिराजा

मैं   कहीं          और भी होता हूँ                              __________________________मीना बुद्धिराजाकविता और हमारे समय का रिश्ता अटूट है क्योंकि स्मृतियों और स्वप्नों के बीच पूर्व विरासत और आने...

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अन्यत्र : मुम्बई : संदीप नाईक

कभी अली सरदार जाफ़री ने बम्बई पर पर अपनी एक नज़्म में कहा था -“एक जन्नत जहन्नम की आग़ोश में या इसे यूँ कहूँ एक दोज़ख़ है फ़िरदौस की गोद में” आज ‘बम्बई’ मुम्बई है पर आज भी यह तमाम नरकों का स्वर्ग है....

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परख : मैं कहीं और भी होता हूँ (कुंवर नारायण ) : मीना बुद्धिराजा

कुँवर नारायण की कविताओं का एक चयन रेखा सेठी ने किया है जिसे परख रहीं हैं मीना बुधिराजा.मैं   कहीं          और भी होता हूँ                              __________________________मीना बुद्धिराजाकविता और...

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अदनान कफ़ील दरवेश की कविताएँ

अदनान कफ़ील दरवेश की कविता ‘क़िबला’ को २०१८ के ‘भारत भूषण अग्रवाल’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था, आलोचक ‘पुरुषोत्तम अग्रवाल’ के निर्णय का स्वागत करते हुए ‘विष्णु खरे’ ने ‘समालोचन’ पर ही एक अच्छी बात...

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पितृ-वध : आशुतोष भारद्वाज

पितृ-वध                              आशुतोष भारद्वाज फ़्योडोरोविच करामाजोव मारे जा चुके हैं. पिता निर्दयी था. धन और स्त्री को लेकर बेटे पिता से अरसे से झगड़ते आए थे. पिता की हत्या करना चाहते थे, बड़े...

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भाष्य : प्रभात की कविता : सदाशिव श्रोत्रिय

प्रभात की कविताओं पर लिखते हुए अरुण कमल ने माना है कि ‘यह हिंदी कविता की उंचाई भी है और भविष्य भी’. उनका संग्रह ‘अपनों में नहीं रह पाने का गीत’ साहित्य अकादेमी ने २०१४ में प्रकाशित किया था.प्रभात की...

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