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Channel: समालोचन
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मैं कहता आँखिन देखी : प्रो. गिरीश्वर मिश्र

भारत अपनी संस्थाओं को नष्ट करने वाले देश के रूप में जाना जाता है, खासकर शैक्षिक संस्थाएं. विश्व के २०० श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में भी बमुश्किल भारत की एक–दो संस्थाएं अपना स्थान पा पाती हैं. जबकि जिसकी...

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मैं कहता आँखिन देखी : जयश्री रॉय

"पिछले कुछ वर्षों के दौरान हिंदी कथा जगत में जिन कहानीकारों के आमद की धमक साफ़ सुनाई देती है जयश्री रॉय उनमे से एक हैं. उन्होंने अपने लेखन का सफ़र बेशक अपेक्षाकृत देर से शुरू किया हो मगर अपनी शुरुआत से...

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हस्तक्षेप : भाई अभी ज़मानती मुजरिम है : विष्णु खरे

सलमान खान की सज़ा और फिर जमानत ने संचार माध्यमों में बहस का रूप ले लिया है, न्यायिक और नैतिक कई तरह के प्रश्न उठ खड़े हुए हैं. दम्भ, दबाव और दमन के इस पुराने   चलचित्र की कथा का यह अन्तराल देखना है कितना...

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सहजि सहजि गुन रमैं : मधुकर भारती

मधुकर भारती की कविताएँ आपको बेचैन करती हैं, अलहदा काव्य-स्वाद से समृद्ध करती हैं. इस बात पर विस्मय होता है कि कैसे  हिंदी साहित्य उन्हें अबतक पहचानने और मानने से इंकार करता रहा. उनकी कविताओं में अनुभव...

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कथा - गाथा : गाँव भीतर गाँव (उपन्यास अंश) : सत्यनारायण पटेल

तुम चलो सन्त दीदार,सिंगाजी घर हरि को बदावणा. बाबा मनख्या जनम दुरलब है, फिर भोर आवे न दुजी बार...उस सुबह नगजी बा भजन गाते हुए अपने बैल-बक्खर के पीछे चल रहा था. उसके एक हाथ में रास और दूसरे में पिराना...

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रंग-राग : तनु वेड्स मनु रिटर्न्स : सारंग उपाध्याय

निर्देशक आनन्द एल. राय २०११ में ‘तनु वेड्स मनु’ लाये थे, २०१५ में ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न्‍स’ सिनमा घरों में जहाँ दर्शकों को खींच रही है वहीँ अपनी पठकथा और दृश्य –बंध को लेकर आलोचकों और समीक्षकों के बीच...

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कथा - गाथा : प्रेमचंद गांधी

प्रेमचंद गाँधी कवितायेँ लिखते रहे हैं, अनुवाद किया है. नाटकों से निकट का रिश्ता है. कुछ कहानियाँ भी प्रकाशित हुई हैं. संवेदना का सहज और संवेदनशील प्रवाह इस कथा को पठनीय बनाता है. कैसे पालतू पशु भी घर...

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रंग-राग : दीपन : विष्णु खरे

६८ वें कान इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल में इस बार फ्रेंच फ़िल्म ‘दीपन’ को चुना गया है. फ़िल्म का नायक ‘दीप’ तमिल-सिंहल गृह-युद्ध के दरमियान अपनी नकली पत्नी और बेटी के साथ फ्रांस में राजनीतिक शरण लेता है....

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मंगलाचार : वल्लरी

24 वर्षीय वल्लरी मिरांडा हाउस से इतिहास में आनर्स हैं और स्कूली बच्चों में नेतृत्व विकास के लिए कार्य करती हैं. कविताएँ लिख रही हैं. प्रेम के राग का अनुगमन करती इन कविताओं में उस अनुराग की छबियों के...

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परख : हिंदी सराय: अस्त्राखान वाया येरेवान : ओम निश्चल

यात्राएँ इतिहास की हों अगर तो दूर तक जाती हैं, इतिहास के इन सरायों में केवल छूटी हुई स्मृतियां ही नहीं होतीं उनमें बहुत कुछ ऐसा होता है जो वर्तमान को भी प्रभावित करता है. जिस देश में समुद्र पार करने से...

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सबद भेद : मुक्तिबोध की पत्रकारिता : विष्णु खरे

मुक्तिबोध के कवि और आलोचक पक्ष पर पर्याप्त चर्चा हुई है, हो रही है पर उनकी पत्रकारिता कीखबर नहीं ली गयी है. इस कमी को बहुत हद तक वरिष्ठ आलोचक विष्णु खरे का यह आलेख पूरा करता है. इसमें उस समय के नागपुर...

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मैं कहता आँखिन देखी : कविता

हिंदी अफसानानिगारों में कविता जानी–पहचानी जाती हैं. तीन कहानी संग्रह और दो उपन्यास प्रकाशित हैं. उनकी एक कहानी ‘उलटबांसी’ का अंग्रेजी में तथा कुछ और कहानियों का भारतीय भाषाओँ में अनुवाद  हुआ है. इस...

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रंग - राग : साहित्य और सिनेमा : पुनीत बिसारिया

पुनीत बिसारिया  सिनेमा पर लिखते रहे हैं. २०१३ में प्रकाशित पुस्तक ‘भारतीय सिनेमा का सफरनामा’ चर्चित रही है. हिंदी साहित्य और सिनेमा का रिश्ता अपने शुरूआती दिनों से ही ‘प्यार और इंकार’ का रहा है....

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विष्णु खरे : भय भी हमें चूहा बना देता है

हिंदुस्तान के सबसे चर्चित पेंटर मकबूल फिदा हुसैन (१७, सितम्बर-१९१५) – (९, जून-२०११) के लिए यह ‘माह’ और यह ‘साल’ उन्हें याद करने और उनके मूल्यांकन का होना चाहिए था. पर अकादमिक निष्क्रियता और संचार...

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सहजि सहजि गुन रमैं : फरीद खाँ

F. N. Souza (PORTRAIT OF A MAN IN SHADOW)इक्कीसवीं शताब्दी की युवा हिंदी कविता का बीज शब्द है – ‘भय’. यह अपने साये से डर जाने वाला अस्तित्वादी भय नहीं है. यह भय पूंजी, व्यवस्था और सत्ता  द्वारा पैदा...

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परख : मरें तो उम्र भर के लिए : वैभव मणि

(मरें तो उम्र भर के लिए लेखक : आशुतोष प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ पृष्ठ संख्या : 122 मूल्य : रुपये 160.)समीक्षाहमारे समय का बयान उर्फ़ मरें तो उम्र भर के लिए       वैभव मणि त्रिपाठी1991 में हमारे देश के...

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रीझि कर एक कहा प्रसंग : नामवर सिंह

फोटो : अरुण देव प्रेमचन्द साहित्य संस्थान गोरखपुर से संपादक केदारनाथ सिंह और सह संपादक सदानंद शाही द्वारा 'साखी'पत्रिका का प्रवेशांक (अक्तूबर-दिसम्बर,१९९२) प्रकाशित हुआ. इस अंक में नामवर सिंह का लेख...

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परख : पृथ्वी को हमने जड़ें दीं (नीलोत्पल) : सरिता शर्मा

पृथ्वी को हमने जड़ें दीं (कविता संग्रह)नीलोत्पलबोधि प्रकाशन,जयपुर, मूल्य: 99रु.समीक्षा भीतरकीओरखुलतीकवितायें       सरिता शर्मा कविता और जीवन के बीच संबंध के बारे में बेन ओकरी ने कहा है- ‘ईश्वर जानता है...

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सबद भेद : अनामिका की स्त्रियाँ : राजीव रंजन गिरि

पेंटिग : हुसैन“ईसा मसीहऔरत नहीं थेवरना मासिक धर्मग्यारह वर्ष की उमर से उनको ठिठकाए ही रखतादेवालय के बाहर !”   (मरने की फुर्सत: अनामिका)हिंदी कविता के मानचित्र में अनामिका का अपना मुकाम है, कविता को...

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व्योमकेश का आकाश : पल्लव

(रमेश प्रजापति की फेसबुक वाल से साभार)भारतीय ज्ञानपीठ का २८ वां मूर्तिदेवी पुरस्कार प्रसिद्ध आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी की आख्यानपरक कृति व्योमकेश दरवेश को दिया गया है जो आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के...

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