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Channel: समालोचन
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अंचित की सात कविताएं

‘वही जो अदाकारा थी, जो नर्तकी थी, और कवि भी वही तुम्हारी मृत्यु थी.’ अंचित की ये कविताएँ उनकी पूर्व की कविताओं की ही तरह लचीली हैं. भाषा में वह लोच है जो अकथ को कह सके या कहने की कोशिश कर सके. प्रेम का...

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विनोद विट्ठल की सात कविताएं

‘सुंदर सपने जितना छोटा होता हैकम रुकता है कैलेंडर इसकी मुँडेर परजैसे सामराऊ स्टेशन पर दिल्ली-जैसलमेर इंटर्सिटी’ फरवरी जहाँ वसंत आता है, अनमना रंग पीताभ इसके आगे चलता है और ढेर सारे सुर्ख गुलाबों से भर...

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अम्बर पाण्डेय : प्रेम कथा

 ‘मैंने अन्त: वस्त्रों को देर तक सूँघावे अन्त: वस्त्र वहाँ सूख अवश्य रहे थे मगर धुले हुए नहीं थे.इस तरह उस स्त्री ने मेरा प्रेम स्वीकार किया.’ फरवरी का प्रेम गुलाब की तरह सुर्ख होता आया है, पर अम्बर की...

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अरिकमेडू: भारत के विस्मृत नगर(२) : तरुण भटनागर

कथाकार-लेखक तरुण भटनागर के ‘भारत के विस्मृत नगर’ श्रृंखला में आपने मध्य-प्रदेश के ‘ऐरिकिण’ के विषय में पढ़ा है, इस अंक में पांडिचेरी के समीप ‘अरिकमेडू’ नगर के विषय में पढ़ेंगे जो अपने समय का विख्यात...

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गूँगी रुलाई का कोरस(रणेन्द्र): प्रेमकुमार मणि

राजकमल प्रकाशन, नई दिल्लीसंस्करण-२०२१पेपर बैक मूल्य : २५०  आलोचक रविभूषण का मानना है कि रणेन्द्र का उपन्यास ‘गूँगी रुलाई का कोरस’ गहन अध्ययन, श्रम-अध्यवसाय से लिखा गया एक शोधपरक उपन्यास है. इसमें यह और...

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स्मृति: यशदेव शल्य: रमेशचंद्र शाह

यशदेव शल्य (बैठे हुए) और रमेशचन्द्र शाह. चित्र शम्पा शाह के सौजन्य से  यशदेव शल्य (26 जून,1928- 31 जनवरी, 2021) हिन्दी में लिखने वाले विश्वस्तरीय मौलिक दार्शनिक थे.  आधुनिक दार्शनिकों में यशदेव शल्य इस...

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फ़र्नांडो सोर्रेंटीनो : वापसी : अनुवाद- सुशांत सुप्रिय

फ़र्नांडो सोर्रेंटीनोवा प सी                                                   अनुवाद सुशांत सुप्रिय 1965 में मैं 23 साल का था और विद्यालय में भाषा और साहित्य का शिक्षक बनने के लिए पढ़ाई कर रहा था. उस...

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पंकज सिंह की कविता: राजाराम भादू

पंकज सिंह की कवितामाथा ऊँचा किये रहूँगा आख़िरी वार तक                                राजाराम भादू  "ऐसी कोई चुप्पी नहीं जो खत्म न हो"समकालीन कविता में मेरी दिलचस्पी जिन कवियों को पढ़ने से आरंभ हुई, उनमें...

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माँ: कुछ असमाप्त प्रसंग: सुभाष गाताडे

सुभाष गाताडे राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर लिखते हैं. माँ पर लिखा यह स्मृति-आलेख मार्मिक है और भाषा भी तदनुसार संवेदनशील है. जिसे हम साधारण का सौन्दर्य कहते हैं उसकी तलाश और उसका अंकन कामयाबी से किया...

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मुक्तिबोध : भाषा और अवचेतन का सवाल तथा ब्रह्मराक्षसीय ट्रैजेडी : एकांत अनूप

  मुक्तिबोध : भाषा और अवचेतन का सवाल तथा ब्रह्मराक्षसीय ट्रैजेडीएकांत अनूप    अनूप बाली पीएचडी रिसर्च स्कॉलरसाहित्यिक कलास्कूल ऑफ़ कल्चर एंड क्रिएटिव एक्सप्रेशनस (SCCE)अम्बेडकर  विश्वविद्यालय दिल्ली...

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देवयानी भारद्वाज की कविताएँ

 कविता शब्दों के बोझ से भारी नहीं होनी चाहिए,यह एक तरह से कवि-कर्म की प्राथमिक सीख है. देवयानी चाहती हैं कि उनके शब्द तितली की तरह कथ्य पर बैठें. देवयानी की  कविताएँ  ख़ासकर जब वे अंदर की तरफ़ मुड़ती...

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श्रुति गौतम की कविताएँ

 श्रुति गौतमकी कविताओं के प्रकाशन का यह आरम्भिक चरण है,हालाँकि वह वर्षों से कविताएँ पढ़-लिख रहीं हैं. हर कवि भाषा और संवेदना के संसार में कुछ जोड़ता है, जैसे शिशु में उसके परिवेश-परिवार के चिह्न तो रहते...

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बटरोही : हम तीन थोकदार (समापन क़िस्त)

वरिष्ठ कथाकार लक्ष्मण सिंह बिष्ट ‘बटरोही’ ने २५ अप्रैल २०२० को अपना ७५ वां जन्म दिन मनाते हुए यह सोचा कि क्यों न एक ऐसा वृत्तांत रचा जाए जो जितनी आपबीती हो उतनी ही जगबीती भी, जिसमें आत्म हो और अन्य भी....

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हमारे समय में धूमिल: ओम निश्‍चल

  हमारे समय में धूमिल(डायरियों, पत्रों, विचारों के आलोक में धूमिल का कवि-व्‍यक्‍तित्‍व)ओम निश्‍चल धूमिल की कविताओं पर अब तक बहुत बात हो चुकी है. धूमिल अपने समय के नाराज युवा कवि थे. उन्हें जीवन ने...

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जितेंद्र कुमार की कविताएं और उदयन वाजपेयी का आलेख

(चित्र सौजन्य से निर्मला शर्मा) कवि-कथाकार जितेन्द्र कुमार (1936-2006) को हम लोग लगभग भूल ही चुके हैं. उनका जीवन,कविताएँ और कथा-साहित्य सब लीक से हटकर थे. बीहड़ उनके जीवन और लेखन में अंत-अंत तक पसरा...

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रामविलास शर्मा का अर्थशास्त्रीय चिंतन: रविभूषण

 रामविलास शर्मा का अर्थशास्त्रीय चिंतनरविभूषण “विश्व पूंजीवाद के संकटकाल में केन्द्रबद्ध, सुनियोजित अर्थतंत्र को समाजवादी व्यवस्था की विशेषता कहकर उसकी खूब ले-दे हुई है. वास्तव में भारतीय इतिहास के...

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जयशंकर प्रसाद की जीवनी: सत्यदेव त्रिपाठी

प्रेमचंद ने १९३२ के हंस का आत्मकथा विशेषांक निकालने का निर्णय लिया,हंस का नामकरण प्रसाद जी ने ही किया था. उनका प्रसाद जी से विशेष आग्रह था कि वे अपनी आत्मकथा लिखें. प्रसाद जी ने आत्मकथा तो नहीं लिखी पर...

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रामविलास शर्मा का अर्थशास्त्रीय चिंतन: रविभूषण

“इतिहास इस बात की गवाही दे रहा है कि जिन देशों या जिन जातियों ने अपनी आर्थिक बातों पर विचार नहीं किया- अपने देश के कला-कौशल और उद्योग-धंधे की उन्नति के उपाय नहीं सोचे- उनकी दुर्दशा हुए बिना नहीं...

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अमूर्त कला: मनोज कचंगल

  अमूर्त कलामनोज कचंगल  (१)समकालीन अमूर्त कला मेरे विचार से उस यथार्थ का यथार्थ है जिसका हम अंतः करण से अनुभव करते हैं, हम वास्तविकता को खोजते हैं, चित्रित करते हैं और फिर हम उसमें वास्तविकता देख भी...

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फणीश्वरनाथ रेणु : कुछ स्मृतियाँ: प्रेमकुमार मणि

 सौ साल पहले आज ही के दिन फणीश्वरनाथ रेणु का जन्म जिला पूर्णिया के गाँव औराही हिंगना में हुआ था. ५६ वर्ष की अवस्था में ११ अप्रैल, १९७७ के दिन  लेखन,प्रेम और जनपक्षधर राजनीति में रमने वाले इस व्यक्तित्व...

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